गुरुवार, 12 दिसंबर 2024

लोग पुरोहित की बात क्यों मानते हैं?

पुरोहित प्रशिक्षण एवं शोध मिशन  (भाग - 13) 

एक *प्रचारक*

एक *नेता*

एक *अध्यापक* और 

एक *पुरोहित - संस्कारक* में

सबसे प्रभावशाली संवाद करने वाला कौन हो सकता है? यह सबसे अहम सवाल है, जिस पर आप भी ठहर कर विचार कीजिए। 

सबसे प्रभावशाली वक्ता यानि सबसे प्रभावशाली *सूचना केन्द्र* वह होता है, जिसके प्रति लोगों का परम्परागत

1. विश्वास होता है,

2. सम्मान होता है,

3. श्रद्धा होता है

4. परम्परा होता है,

5. ज्ञान  होता है,

6. वेशभूषा होता है,

7. संरचना होता है, और

7. जिसकी सामाजिक स्वीकार्यता होती है।

और *उपरोक्त सब एक पुरोहित संस्कारक में होता है, दिखता है, समझा जाता है और माना जाता है।* 

 *ऐसे लोगों के हर शब्द और  वाक्य "अति ग्राह्य " (Super Admissible) होता है।* 

यही गतिमान संस्कृति की

1. दृढ़ता होती है,

2. विशेषता होती है,

3. भिन्नता होती है

4. आवश्यकता  होती है, और

5. निश्चितता होता है।

ऐसे लक्षण और विशेषता किसी दूसरे वक्ताओं में नहीं होता है, सिर्फ पुरोहित में होता है।

इसीलिए समाज से बेहतर संवाद का जरिया पुरोहित और संस्कारक ही बन सकता है।

इसे समझिए। और अभी शुरुआत कीजिए। 

इसीलिए हमें इसके बारे में गंभीरता से विचार करना चाहिए। 

आचार्य प्रवर निरंजन

पुरोहित और जन-गण-मन के मनोविज्ञान को समझिए।

 पुरोहित प्रशिक्षण एवं शोध मिशन  (भाग - 14) 

"जन-गण-मन" को ही 'जनता' कहते हैं, और एक ‘पुरोहित’  'पुर' का 'हित' देखने वाला’ होता है। 

इसी तरह ‘मनोविज्ञान’ मानव की ‘भावनाओं, विचारों, व्यवहारों एवं क्रियाओं की क्रियाविधियों का विज्ञान है। अर्थात मनोविज्ञान मानव 'मन' (Mind) का विज्ञान है। 

अतः मानव भावनाओं, विचारों और व्यवहारों (क्रियाओं) को बदलने के लिए हमें

 जनता के मन को, पुरोहितों की संरचना को और मनोविज्ञान की क्रियाविधियों को अच्छी तरह समझना आवश्यक है। वैसे इसे समझे  बिना बौद्धिकता के नाम पर बकवास करने वालों को कोई रोक भी नहीं सकता है। ऐसे लोग सिर्फ "बतकूच्चन" (सिर्फ अपनी उपस्थिति दर्ज करने के लिए कुछ भी बोल या लिख देना) करेंगे, लेकिन किसी जमीनी मुहिम का नहीं तो समर्थन करेंगे और ना ही अपने विचारों को जमीन पर लाने के लिए कोई शुरुआत ही करेंगे। 

मनोविज्ञान समझाता है कि

हर आदमी मानसिक रूप से बदलाव चाहता है, लेकिन "आदतों की जड़ता" (Inertia of Habits) को नहीं समझते हैं। _एक साथ बहुत ज्यादा बदलाव बहुत परेशानी पैदा कर देता है।

इसीलिए बदलाव के साथ साथ पुराने तरीकों का सम्मान करना होता है। इसमें किए गए परिवर्तन को 'मामूली सुधार' (Nominal Improvement) ही दिखना चाहिए, कोई बडा़ बदलाव नहीं दिखना चाहिए।

आपके परिवर्तन, यदि कोई हो तो, क्रांतिकारी नहीं दिखना चाहिए। 

आपको

जन मानस के "जीवन मूल्यों और परम्पराओं"

(Values n Traditions of Public Life) का सम्मान

करना ही होगाअन्यथा आप जन मानस को स्वीकार्य नहीं हो सकतें है।

एक पुरोहित इन भावनाओं, विचारों और व्यवहारों पर अच्छी तरह से काम करता हुआ  समाज को अपने मन माफिक दिशा देता है,_ 

और यही इतिहास भी रहा है। इसे समझिए।

ऐसे पुरोहित नामक बौद्धिकों के ही हर शब्द और वाक्य जन-गण-मन को "अति ग्राह्य " (Super Acceptable) होते है।

इसीलिए समाज से बेहतर संवाद का जरिया पुरोहित और संस्कारक ही बन सकता है।  

इसे समझिए। और अभी शुरुआत कीजिए। 

स्पष्ट शब्दों में, इसके लिए इस " *पुरोहित प्रशिक्षण एवं शोध मिशन* " के राष्ट्रीय प्लेटफार्म और संगठन से जुडिए।  

विचार कीजिए। 

आचार्य प्रवर निरंजन

संस्कार, संस्कृति और पुरोहित

पुरोहित प्रशिक्षण एवं शोध मिशन  (भाग - 12) 

 संस्कार’ क्या है‘संस्कृति’ क्या है? और इसका एक पुरोहित से क्या सम्बन्ध है?

'समाज'  (Society)  की 'स्वीकृत संस्मरण (Sanctions Memoir)' को 'आकार (Shape)' देना ही 'संस्कार' (Sanskaar - Norms n Values) है। यह सामाजिक व्यवस्था विकास एवं समृद्धि के लिए आवश्यक होता है| इसमें समाज द्वारा स्वीकृत भावना, विचार, व्यवहार और कर्म शामिल रहता है|

‘संस्कार’ से युक्त भावना, विचार, व्यवहार एवं कर्म ही ‘संस्कृति’ है| व्यक्ति और समाज को संस्कारयुक्त करना ही ‘संस्कृति’ का कार्य है|

और यह संस्कार एवं संस्कृति की निरन्तरता बनाए रखने का सामाजिक सांस्कृतिक उत्तरदायित्व ‘पुरोहितों’ पर ही रहता है|

स्वभाविक है कि “संस्कार”

1. समाज का 'स्वीकृत्यादेश' (Sanctioned Orders) होगा। 

2. इसीलिए समाज के 'मानकों' (Standard) में सकारात्मक होगा। 

3. इससे सम्बन्धित अपेक्षा (Expectation) उसके सामाजिक पद या स्थिति से निर्धारित होती है। 

4. यदि आप इन संस्कारों से विहीन हैं, तो आप अनार्य हैं, अनाड़ी हैं, दुष्ट हैं, घमंडी है, और क्षुद्र भी हैं। 

और इसीलिए आप असामाजिक माने जाते हैं|

यदि आप पदधारी है,

यदि आप डिग्रीधारी है,

यदि आप धनधारी है,

और आप में संस्कार नहीं है।

तो

आप में "भावनात्मक बुद्धिमत्ता" (Emotional Intelligence) नहीं है,     

और आप में "सामाजिक बुद्धिमत्ता" (Social Intelligence) नहीं है। 

ऐसे ही लोग सभी क्षमताओं के बावजूद जीवन में असफल ही रहते हैं। 

इसीलिए संस्कार एवं संस्कारक के महत्व को समझिए

और संस्कारक बनिए। 

इसीलिए समाज से बेहतर संवाद का जरिया पुरोहित और संस्कारक ही बन सकता है।  

इसे समझिए। और अभी शुरुआत कीजिए। 

स्पष्ट शब्दों में, इसके लिए इस "पुरोहित प्रशिक्षण एवं शोध मिशन" के राष्ट्रीय प्लेटफार्म और संगठन से जुडिए।  

अब हमको और आपको ही आगे आना है। 

विचार कीजिए। 

आचार्य प्रवर निरंजन

पुरोहित सम्मानित क्यों माने जाते हैं?

पुरोहित प्रशिक्षण एवं शोध मिशन  (भाग - 11) 

एक बार फिर, ‘पुरोहित’ कौन होता है, और क्या करता है? "पुर (बसावट - Settlement)" का "हित (Intrest)" देखने वाला, भला करने वाला ही "पुरोहित" होता है। 'पुर' का अर्थ निम्न उदाहरण, यथा दिसपुर, गोरखपुर, कानपुर, जयपुर, जबलपुर, शोलापुर, खडगपुर, भागलपुर, बिलासपुर, जमशेदपुर, मणिपुर, होशियारपुर, पेशावर, बहावलपुर, जनकपुर, राजापुर इत्यादि इत्यादि से स्पष्ट है। यह उदाहरण पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में यथा भारत सहित अफगानिस्तान, पकिस्तान, श्रीलंका, नेपाल  एवं बँगलादेश में विस्तारित है| इस तरह यह 'पुरोहित' समाज का एक महत्वपूर्ण व्यक्ति होता है। 

यह  पुरोहित हमारी सांस्कृतिक परम्परा की विरासत है और अभी भी इसका महत्व है एवं आगे भी रहेगा।

जो लोग "सांस्कृतिक जड़ता" (Inertia of Culture) की अवधारणा एवं इसकी क्रियाविधि को नहीं समझते हैं, वे सामाजिक सांस्कृतिक बदलाव के इस 'मानवीय मनोविज्ञान की क्रियाविधि' (Mechanics of Human Psychology) को भी नहीं समझते हैं।  

'पुरोहिताई' एक "सांस्कृतिक ढांचा" (Cultural Framework) है, जिसका 'सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्य'' (Social n Cultural Values) होता है, भले ही उसका 'आन्तरिक संरचना' (Internal  Structure) एवं उद्देश्य भिन्न भिन्न हो।

आपको अपना ढांचा बरकरार रखना है, और आप उस ढांचे में अपने इच्छानुसार ‘संरचना’ (आतंरिक बनावट) बदल सकते हैं। इसे भारतीय संविधान के भाग-3 (मूल अधिकार) में अनुच्छेद 25 में संरक्षित किया गया है। 

‘पुर' का 'हित' करने वाले पुरोहित किसी भी पंथ, सम्प्रदाय एवं धर्म के हो सकते हैं। 

इसीलिए समाज से बेहतर संवाद का जरिया पुरोहित ही बन सकता है। 

और इसकी शुरुआत पुरोहिताई से ही संभव है। इस पर ठहर कर ध्यान दें। 

इसे समझिए। और अभी शुरुआत कीजिए। 

स्पष्ट शब्दों में, इसके लिए इस "पुरोहित प्रशिक्षण एवं शोध मिशन" के राष्ट्रीय प्लेटफार्म और संगठन से जुडिए।  

अब हमको और आपको ही आगे आना है। 

विचार कीजिए। 

आचार्य प्रवर निरंजन

पुरोहिताई से समृद्धि कैसे आती है?

पुरोहित प्रशिक्षण एवं शोध मिशन  (भाग - 10) 

 यदि हमलोग अपनी और अपने परिवार, समाज, एवं राष्ट्र की समृद्धि (Prosperity) चाहते हैं,  

तो हमारे लोगो की पहुंच में ऐसे ही संबंधित 'सूचनाओं, विचारों, विधियों और ज्ञान का प्रवाह’ चाहिए। और इसके लिए' हमारे ही लोग होने चाहिए। मैंने इस सीरिज में पहले ही ‘सूचना तंत्र’ के महत्व और इसकी क्रियाविधि के बारे में बता चुके हैं| एक पुरोहित समाज में सर्व स्वीकार्य होते हैं| इसीलिए इन्हीं के माध्यम हमें अपने समाज में सभी आवश्यक 'सूचनाओं, विचारों, विधियों और ज्ञान का प्रवाह’ करना चाहिए|

इसे ही सूचना, विचार और ज्ञान का 'मार्केटिंग प्रबंधन' (Marketing Management) कहते हैं। विश्व प्रसिद्ध 'मार्केटिंग प्रबंधन' के गुरु फिलिप कोटलर (केलौग स्कूल आफ मैनेजमेंट, संयुक्त राज्य अमेरिका) कहते हैं कि

यह युग 'सूचनाओं ' का नहीं है,

अपितु सूचनाओं के प्रसार का युग (Age of Information Expansion) है।

और

एक एक पुरोहित अपने अपने समाज और प्रभाव क्षेत्र में

सूचनाओं के प्रसार का सबसे सक्रिय तंत्र (  The Most Active System)

एवं  प्रभावशाली व्यवस्था होता है।

इस तरह

हम आप "सामाजिक सांस्कृतिक बदलाव" के

'सूचना तंत्र' (Information System) पर प्रभावी नियंत्रण कर पाते हैं।

और इसकी शुरुआत पुरोहिताई से ही संभव है।

इस पर ठहर कर ध्यान दें। 

इसे समझिए। और शुरुआत कीजिए। 

स्पष्ट शब्दों में, इसके लिए इस  राष्ट्रीय प्लेटफार्म और संगठन से जुडिए। 

ऐसा व्यवस्था ‘पुरोहित प्रशिक्षण एवं शोध मिशन’ उपलब्ध कराएगा। 

इसी उद्देश्य के लिए हमको और आपको भी पुरोहित और संस्कारक बनना है, और आगे आना है।

आइए, अपने समाज में समृद्धि की शुरुआत कीजिए|

आचार्य प्रवर निरंजन

सांस्कृतिक साम्राज्यवाद आपकी मुठ्ठी में

पुरोहित प्रशिक्षण & शोध मिशन  (भाग - 9) 

 

आप अपनी और अपने परिवार, समाज, राष्ट्र एवं मानवता की

समृद्धि चाहते हैं,

उन्नति चाहते हैं,

विकास चाहते हैं,

सम्मान चाहते हैं,

तो यह सब सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, शैक्षणिक, और सांस्कृतिक बदलाव के रास्ते से होकर ही आता है। 

और यह सब ‘पुरोहिताई” से प्राप्त होता है। 

‘सांस्कृतिक साम्राज्यवाद’ (Cultural Imperialism) क्या है?

यह संस्कृति आधारित साम्राज्यवाद है| आपका वर्तमान धर्म, सम्प्रदाय एवं पंथ भी इस ‘सांस्कृतिक साम्राज्यवाद’ का एक स्पष्ट उदाहरण है| ‘अंग्रेजियत’ भी इस ‘सांस्कृतिक साम्राज्यवाद’ का एक स्पष्ट नमूना है|

ध्यान रहे कि

तत्कालीन मुद्दे आवश्यक एवं अनिवार्य हो सकते हैं

और इस पर आधारित “राजनीति सालों और दशकों की” हो सकती हैअभी सान्दर्भिक हो सकती है|

लेकिन अभी यह बात संदर्भिक नहीं भी लगती हो, और उपयुक्त भी नहीं लगती हो, परन्तु “संस्कृति पर आधारित राजनीति सदियों और सहस्त्रब्दियों की होती है। इस बात पर ठहर कर विचार किया जाए| 

 और इसकी शुरुआत “पुरोहिताई” से ही संभव है।

इसे समझिए। और सांस्कृतिक बदलाव कीजिए। 

स्पष्ट शब्दों में, इसके लिए इस  राष्ट्रीय प्लेटफार्म और संगठन से जुडिए। 

ऐसा विकल्प "पुरोहित प्रशिक्षण एवं शोध मिशन" उपलब्ध कराएगा। 

आप अपने पसन्द की और अपने स्वेच्छा से पंथ, धर्मसम्प्रदाय का चुनाव कर सकते हैं।  

अब हमको और आपको ही आगे आना है। 

विचार कीजिए। 

आचार्य प्रवर निरंजन

पुराने पुरोहितों एवं कथावाचकों के लिए सम्मानजनक अवसर

पुरोहित प्रशिक्षण एवं शोध मिशन  (भाग - 8) 

मैंने पूर्व के सीरिज में भी बताया है कि परम्परागत, खानदानी, ज्ञानी, उच्च स्तरीय, एवं संस्कारी पुरोहितों के वंशजों के विभिन्न सेवाओं और उद्यमों में चले जाने से समाज में शिक्षित, संस्कारी, ज्ञानी’ प्रशिक्षित और स्तरीय पुरोहितों एवं संस्कारकों की भारी कमी हो गयी है। ऐसा आप भी अपने समाज में भी महसूस किया होगा|

इसी कारण अब समाज में उपलब्ध पुरोहित एवं  संस्कारक अशिक्षित है, अज्ञानी हैं, संस्कारहीन है, स्तरहीन भी हैं, लोभी भी है, कामी भी है, घमन्डी भी है, और बदतमीज़ भी है। 

ऐसी स्थिति में अपने अपने समाज की या अपनी अपनी विचारधारा या पंथ, सम्प्रदाय या धर्म के महान सांस्कृतिक विरासत की निरंतरता के लिए हमें आगे आने की आवश्यकता है। हमें अब निश्चिन्त नहीं बैठना है| अब हमें सक्रिय होना है, सजग होना है, और इसके लिए तैयार भी होना है|

हमारे लोग विभिन्न पंथो एवं सम्प्रदायों (जैसे बौद्ध, अर्जक, गायत्री, आर्य समाजी, संवैधानिक, इस्लाम, ईसायत आदि आदि) में आगे आकर ‘पुरोहिताई’ और ‘संस्कारक’ का कार्य  भी कर रहे हैं

लेकिन अभी उपलब्ध ये पुरोहित एवं संस्कारक “विधिवत एवं मान्य मानकों” (Formal Authorised Standard) के अनुरूप प्रशिक्षित नहीं है, समुचित रुप में व्यवस्थित एवं सं’गठित भी नहीं है, और वैज्ञानिक आधुनिक बदलते समय के अनुकूल भी नहीं है। 

स्पष्ट शब्दों में, ऐसे लोगों के लिए एक पुनरीक्षण संक्षिप्त प्रशिक्षण की भी आवश्यकता है। इन्हें एक प्रामाणिक प्रमाण पत्र की भी आवश्यकता है। इनको सशक्तिकरण एवं संगठित करने के लिए एक राष्ट्रीय प्लेटफार्म और संगठन की अनिवार्यता भी है। 

ऐसा विकल्प "पुरोहित प्रशिक्षण एवं शोध मिशन" उपलब्ध करा रहा है और आगे भी कराएगा। समुचित प्रशिक्षण के बाद आवश्यक प्रमाण पत्र भी मिलेगा। 

आप अपने पसन्द की और अपने स्वेच्छा से पंथ, धर्मसम्प्रदाय का चुनाव कर सकते हैं।  

अब हमको और आपको ही आगे आना है। 

विचार कीजिए। 

आचार्य प्रवर निरंजन

बहुजनों की समस्याएँ बढती ही जा रही है, क्यों?

भारत में बहुसंख्यको की समस्याएँ बढती ही जा रही है, जबकि उनलोगों की उम्मीद इसके घटने की है| ‘बहुजन’, अर्थात बहुसंख्यक जन| लोग अपनी सुविधा और ...