‘अंतिम –सत्य’ एक अजीब शब्द -युग्म लग
सकता है, लेकिन यह अपने ‘परिवेश’ को समझने का व्यावहारिक, साधारण एवं महत्वपूर्ण
अवधारणा है| इसे अवश्य ही समझा जाना चाहिए, क्योंकि इसके नाम पर ठगी का
एक व्यापक और विशाल कारोबार प्रचलन में है| इस ‘अंतिम –सत्य’ की विवेचना से आपके मन
पर पड़े बहुत से भ्रम से या यों कहें कि उस पर पडा बहुत से धुन्ध और धूल छट जाएगा| यह विवेचना जटिल जीवन को स्पष्टता
से समझने के लिए अनिवार्य है|
यह समझ लेना आवश्यक है कि एक ‘तथ्य’ के एक ही ‘सत्य’ नहीं होता है| और यह भी हो सकता है कि एक ‘तथ्य’ का वह ‘सत्य’ भी ‘सही’ और ‘व्यवहारिक’ नहीं हो| ‘तथ्य’ के एक होते हुए भी उनका ‘सत्य’ अलग –अलग व्यक्तियों के लिए अलग –अलग हो जाता है| और वह अलग –अलग ‘सत्य’ भी उन व्यक्तियों के लिए एकदम ‘सही’ और ‘समुचित’ भी होता है| एक ही ‘तथ्य’ के अलग –अलग ‘सत्य’ भी उनके लिए व्यवहारिक और प्रभावी होता है; और वह ‘सत्य’ उनके लिए ‘सही’ भी होता है, जबकि वह दूसरों के लिए ग़लत है।
स्पष्ट है कि ‘सत्य’ ‘निरपेक्ष’ नहीं होकर
भिन्न भिन्न संदर्भ के ‘सापेक्ष’ होता है| इस ‘सत्य’ का सुनिश्चियन उसकी ‘परिस्थितियों’,
‘सन्दर्भों’ और उनके ‘व्यक्तिगत समझ’ यानि उनकी ‘चेतना’ की स्तर से निर्धारित होता
है| हम जानते हैं कि एक निर्जीव और सजीव में अन्तर उसके ‘चेतना’ के होने या नहीं
होने का है, लेकिन एक स्तनपायी पशु या अन्य जीव और एक आदमी में ‘चेतना’ यानि ‘समझदारी’
का अन्तर ठीक से समझ पाना एक मुश्किल काम है|ध्यान रहे कि दो पैरों का व्यक्ति भी एक पशु ही है और अधिकांश की मानसिकता भी पशुवत है। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि एक ‘पशु’
या एक ‘आदमी’ में एक ही साथ ‘पशुओं की चेतनता’ और ‘आदमी की चेतनता’ का विभिन्न
अनुपात ‘मिश्रित’ रुप में निश्चित होता है| ‘चेतनता’ के इस ‘मिश्रित रुप में निश्चित
अनुपात’ को समझने के लिए ‘चेतना’ का विश्लेषण एवं मूल्यांकन आवशयक है|
मानव प्रजाति में ‘चेतना’ के पांच ‘कार्य –भाग’
(Functioning –Parts) तीन ‘स्तर’ (Layers) पर कार्यरत होता है| इसके पांच ‘कार्य –भाग’
क्रमश: ‘शरीर’ (Body) और ‘मस्तिष्क’ (Brain), ‘आत्म’ (Self) यानि ‘मन’ (Mind) और ‘चित्त’ (Spirit), एवं ‘अनन्त
शक्ति -क्षेत्र’ (Infinite Force Field) होता है| किसी का शरीर उसके सभी स्वरुपों का भौतिक और दृश्य
वास्तविक आधार होता है| यही शरीर चेतना के सभी अंगों यानि यंत्रों को अधिकांश
ऊर्जा की आपूर्ति करता रहता रहता है| यही शरीर सभी भौतिक क्रियायों और व्यवहार का
वास्तविक ढाँचा एवं अवयव देता है| चूँकि इसका निर्माण भौतिक पदार्थों से होता है,
इसीलिए यह सभी को दृश्य भी होता है| सभी व्यक्ति को यह शरीर सामान्य ज्ञानेन्द्रियो से ज्ञात होता है| किसी
का मस्तिष्क भौतिक रुप में शरीर का एक हिस्सा होते हुए भी उस व्यक्ति के शरीर, मन,
चित्त एवं अनन्त शक्ति –क्षेत्र के मध्य एक ‘मोड्यूलेटर’ (Modulator) के रुप में कार्यरत
होता है| उसके ‘आत्म’ में उसका ‘मन’ एवं उसका ‘चित्त’ होता है| कोई भी इस ‘आत्म’ (Self) को किसी ‘आत्मा’ (Soul) से भ्रमित नहीं करें| ‘मन’ विचारों का उत्पादन, संश्लेषण, संयोजन
एवं भंडारण करता है| इसी तरह, ‘चित्त’ भावनाओं का उत्पादन, संश्लेषण, संयोजन एवं
भंडारण करता है| ‘मन’ एवं ‘चित्त’ में ‘चित्त’ का स्थान उच्चतर होता है, और यही ‘चित्त’
सभी का संपर्क ‘अनन्त शक्ति –क्षेत्र’ के करता है| ‘अनन्त शक्ति –क्षेत्र’ ही ‘अंतर्ज्ञान’ (Intuition) यानि ‘आभास’ का उत्पादन करता है|
समाज के अधिकांश लोगों की चेतना उनकी ‘शारीरिक
ज्ञानेन्द्रियों’ तक ही सीमित होती है| समाज के बहुत ही अत्यल्प लोगों की चेतना
उसकी मानसिक एवं भावनात्मक के साथ साथ आध्यात्मिक स्तर तक पहुंचती है| मध्यवर्ती
लोगों यानि माध्यम वर्गीय लोगों (Middle Class People) की चेतनता का स्तर इन्ही निम्नतर एवं उच्चतर
ब्रैकेट –सीमा के मध्य होती है| अर्थात ये मध्य वर्ती लोग अपनी चेतना में शारीरिक ज्ञानेन्द्रियों
के अतिरिक्त अपनी मानसिक दृष्टि का तो उपयोग कर पाते हैं, लेकिन अपनी आध्यात्मिक
शक्तियों के उपयोग से अनजान रहते हैं| इसलिए एक व्यक्ति एक ही साथ चेतना के अपने –अपने
स्तर की समझ से किसी ‘सत्य’ को उसके एक निश्चित परन्तु भिन्न भिन्न अंशों तक ही पहचानता
और समझता है| कोई उसका सिर्फ ‘भौतिक -स्वरुप’ ही देख और समझ पाता है, तो कोई उसके ‘भौतिक
-स्वरुप’ के साथ –साथ उसके ‘उर्जा –स्वरुप’ को भी देख समझ पाता है| इस ‘उर्जा –स्वरुप’
को ही ‘मानसिक और भावनात्मक स्वरुप’ कहते हैं| कुछ लोग यानि अत्यल्प लोग ही ‘अनन्त क्षेत्र –बल’ के स्वरुप तक ही पहुँच पाते हैं, और इसी स्वरुप को ‘आध्यात्मिक’ उपलब्धि कहते
हैं| चूँकि अध्यात्म का पहुँच, अवधारणा और क्रिया विधि सामान्य जनों के लिए अत्यंत गूढ़ होती है, इसलिए
ही इस ‘अध्यात्म’ के नाम पर बहुत से व्यवसायिक कारोबार चलते होते हैं| ‘चेतना’ की
समझ के इसी भिन्न भिन्न स्तर के कारण ही कोई एक ही 'तथ्य' के भिन्न भिन्न ‘सत्य’ देख
एवं समझ पाता है|
यदि किसी ‘अध्यात्म –क्रिया’ या किसी ‘वैचारिक –चिन्तन’ का विषय –वस्तु उस व्यक्ति या उसके आसपास तक ही सीमित रहता है, तो स्पष्ट समझिए कि वह ‘अध्यात्म –क्रिया’ या वह ‘वैचारिक –चिन्तन’ झूठी और भ्रामक है और सत्य से परे है| उदहारण के लिए समझने में मैं साधारणतया सिद्धार्थ गोतम, अल्बर्ट आइन्स्टीन और स्टीफन हौकिन्स का नाम लेता हूँ| ऐसे ही नवाचारी लोग ‘आध्यात्मिक’ होते हैं, बाकी तो उस ‘अध्यात्म’ के नाम पर क्या करते हैं, कोई भी समझ सकता है।
यदि किसी
आध्यात्मिक ज्ञान या शक्ति से मानवता लाभान्वित नहीं हुआ, तो वह ज्ञान या शक्ति
मात्र एक ढोंग है| किसी व्यक्ति को ‘एक आदमी’ उसके समाज ने बनाया है, अन्यथा वह
व्यक्ति “मोगली” की तरह वन्य –जीवों के साथ रेगता हुआ होता या पेड़ों की जटाओं में
एक पेड़ से दूसरे पेड़ तक छलांग लगाता हुआ होता, लेकिन वह ‘आदमी’ कहलाने लायक नहीं
होता| और यदि वह आदमी अपने समाज को लाभान्वित नहीं करता है, तो वह ‘अध्यात्म’ के नाम पर कुछ
और खेल करता हुआ होता है, लेकिन वह ‘अध्यात्म’ तो कदापि नहीं हो सकता|
यदि कोई मानता है या कहता है कि ‘अध्यात्म’
का विषय ‘आत्म –ज्ञान” या ‘आत्म –सुख’ है, और उससे मानवता का व्यापक कल्याण नहीं होता
है, तो उस “आत्म –सुख” के लिए इतने प्रयास करने की कोई आवश्यकता नहीं है; उसके लिए
तो ‘दो कश’ या ‘दो पेग’ ही पर्याप्त होता है| इस “आत्म –सुख” के लिए इतना तिकड़म
करने की कोई आवश्यकता नहीं है| इसी तरह, वैसे “आत्म –ज्ञान” का क्या लाभ, जिससे
समाज को कोई लाभ नहीं हो? ऐसे “आत्म –ज्ञानी” होने या नहीं होने का कोई ‘अर्थ’
नहीं होता है| यह कोई ‘सत्य’ हो ही नहीं सकता|
वैसे कोई भी ‘सत्य’ अन्तिम नहीं होता है,
फिर भी किसी वर्तमान में यदि कोई ‘सत्य’ है, तो वह अवश्य ही समाज और मानवता के सापेक्ष होगा| चूँकि समाज और
मानवता की आवश्यकताएँ तत्क्षण बदलती रहती है, इसलिए कोई भी ‘सत्य’ उस क्षण के लिए ‘अन्तिम
–सत्य’ होते भी ‘निरपेक्ष सत्य’ नहीं हो सकता है; वह तो सदैव ही सापेक्ष ही रहता
है| यदि कोई ‘सत्य’ ‘अन्तिम –सत्य’ हो जाएगा, तो विज्ञान की प्रगति ही रुक जाएगी| सत्य
की यही सापेक्ष स्थिति ही विज्ञान का आधार है| इसीलिए कोई भी किसी समय या सन्दर्भ
के सापेक्ष ही ‘अन्तिम –सत्य’ तक पहुंचे| लेकिन इसके लिए उसे अवश्य ही अपनी चेतना
को अपने सभी अवयवों के स्तर पर सक्रिय कर ‘उच्चतर’ करे| तभी वह किसी ‘सत्य’ के
निकट पहुँचा हुआ माना जा सकता है| शुरुआत तो प्रयास से हो सकता है|
आचार्य प्रवर निरंजन
जी
अध्यक्ष, अन्तर्राष्ट्रीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान, बिहटा, पटना, बिहार|