गुरुवार, 30 जुलाई 2026

सिविल सेवाओं की परीक्षाओं में निबन्ध लिखने के लिए ...

सिविल सेवाओं में चयन के लिए होने वाली परीक्षाओं में आजकल निबन्ध लेखन का महत्व बढ़ गया है| निबन्ध -लेखन की कला, दर्शन एवं वैज्ञानिकता का उपयोग परीक्षाओं के अन्य प्रश्न –पत्रों में भी उपयोगी होता है| सिविल सेवाओं में जनता को बहुविध सेवा देना होता है| भारत की, और बहुसंख्यक राज्यों के लोगों की पृष्टभूमि भी बहुविध है| ऐसे में प्रशासन को किसी ख़ास विषय का विशेषज्ञ नहीं चाहिए होता है, बल्कि बहुविषयक सामान्य ज्ञाता होना चाहिए| एक प्रशासक को संविधान के अंतर्गत सरकार द्वारा सुनिश्चित मार्गदर्शन में समाज के कल्याण के लिए काम करना होता है| इसलिए उन्हें देश के सर्वोच्च अधिनियम – ‘संविधान’ के उद्देश्यों एवं भावनाओं के अनुरुप मानसिकता रखनी चाहिए|   

इन परीक्षाओं में अभ्यर्थियों से यह अपेक्षा की जाती है कि उनके निबन्ध लगभग 600 से 800 शब्दों में सीमित रहे| सामान्यत: दो या तीन निबन्ध को एक ही पाली (सत्र) में लिखना होता है| शीर्षक विविध विषयों के विविध मुद्दों पर होता है| इन दो –तीन निबन्धों से आपके ज्ञान स्तर के साथ साथ आपकी तार्किकता, रचनात्मकता, सकारात्मकता, मानवीयता, संवेदनशीलता, न्यायप्रियता और विवेकशीलता की मानसिकता एवं अभिवृति का सम्यक मूल्याङ्कन हो जाता है| इसलिए एक अभ्यर्थी ऐसी मानसिकता और अभिवृति (नजरिया) विकसित करने का प्रयास करे, ताकि इसका झलक आपके निबम्ध में अवश्य ही परिलक्षित हो जाए|

आपका निबन्ध आपके द्वारा चयनित शीर्षक के अनुरुप आपके भावों को, आपके ज्ञान को और आपके आलोचनात्मक चिन्तन को बखूबी रेखांकित करता हुआ हो| लेखन में स्पष्टता, क्रमबद्धता, व्यवस्था, तार्किकता और प्रभावशीलता होनी चाहिए| आपकी अवधारणा संक्षिप्त और स्पष्ट होनी चाहिए| शब्दों के चयन में उपयुक्तता और संक्षिप्तता अवश्य होनी चाहिए| ध्यान रहे कि इसमें विशेष विशेषज्ञता नहीं चाहिए होता है, क्योंकि आपकी टकराहट किसी विशेषज्ञ से नहीं होकर आपके ही जैसा अन्य अभ्यर्थियों से है, इसलिए ज्यादा तनाव भी नहीं लें|

प्रसंगवश आप  ‘आलोचनात्मक चिन्तन’, यानि आलोचनात्मक विश्लेषण, मूल्यांकन एवं समीक्षा को समझ लें| इसे आप अंग्रेजी वर्णमाला के पाँचों स्वर – A, E, I, O, U को क्रमानुसार याद रखें| ‘A’ से Analyse (विश्लेषण करना) अर्थात दिए गए शीर्षक को उसके मूल शब्दों की अवधारणा को, उसके सन्दर्भ और पृष्ठभूमि के सन्दर्भ में विश्लेषण करे; फिर, ‘E’ से Evaluate (मूल्यांकन करना) अर्थात दिए गये शीर्षक को वर्तमान या किसी सन्दर्भ में विश्लेषित कर मूल्याकन करे; फिर, ‘I’ से Interrogate (सवाल खड़ा करना) अर्थात अपने विश्लेषण और मूल्यांकन पर विभिन्न दृष्टिकोणों से प्रश्न करना है, ताकि आप पहले निकाले गये निष्कर्ष को सत्य के नजदीक ला सके; फिर, ‘O’ से Openness (खोलना यानि सामान्यीकृत करना) है, ताकि इन निष्कर्ष को सर्वसहमति यानि सर्वस्वीकृति मिल सके; और सबसे अन्त में, ‘U’ से Unite (मिला देना), यानि पूर्व के सभी प्रक्रियाओं को एक सूत्र में पिरो देना| यही प्रक्रिया ‘आलोचनात्मक चिन्तन’ है|

एक निबन्ध के तीन खंड होते हैं –पहला, परिचयात्मक भाग; दूसरा, मुख्य भाग, जिसमे उस शीर्षक -विषय का आलोचनात्मक विश्लेषण, मूल्यांकन एवं समीक्षा होता है, और अन्त में, आपका अन्तिम निष्कर्षात्मक भाग| निबन्ध का परिचयात्मक भाग और अंतिम भाग यानि निष्कर्षात्मक भाग कम शब्दों में वर्तमान के सन्दर्भ में रहे| अंतिम यानि निष्कर्षात्मक भाग में आपकी पूर्ण सहमति, या अस्वीकृति, या आंशिक सहमति, या अन्य कोई और बात स्पष्ट होना चाहिए| निबन्ध या आलेख को अपने निर्धारित शीर्षक के द्वारा निश्चित ढांचे के अन्तर्गत ही होना चाहिए| उस निबन्ध के मुख्य भाग को उस निश्चित शीर्षक के ढाँचे में ही उसका आलोचनात्मक विश्लेषण और मूल्यांकन के साथ उपयुक्त समीक्षा होना चाहिए|

निबन्ध के मुख्य भाग को काफी आकर्षक और उत्कृष्ट बनाने के लिए यानि, मुख्य भाग में आलोचनात्मक विश्लेषण, मूल्यांकन और समीक्षा के लिए यहाँ पाँच प्रकार के टूल्स दिया जा रहा है| सभी जैविक, भौतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक वस्तुओं एवं क्रियायों की वर्तमान अवस्था को समझने के लिए चार्ल्स डार्विन (Charles Darwin)  और हर्बर्ट स्पेंसर (Herbert Spencer) का उद्विकासवाद आवश्यक है| किसी भी व्यक्ति (नेता, दार्शनिक, लेखक, इतिहासकार आदि) के सभी व्यक्तव्यों, व्यवहारों और भावनाओं की वर्तमान समझ के गूढ़ एवं अदृश्य कारण को समझने के लिए सिगमण्ड फ्रायड (Sigmund Freud), कार्ल जुंग (Carl Jung), विक्टर फ्रैकल (Viktor Frankl), और अल्फ्रेड एडलर (Alfred Adler)  का मनोविज्ञानवाद  यानि मानसिक समझ को समझना आवश्यक है| किसी भी सामाजिक, सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक प्रक्रिया को वैज्ञानिक एवं तार्किक तरीके से समझने के लिए कार्ल मार्क्स (Karl Marx) और  एंटोनिया ग्राम्शी (Antonio Gramsci) का क्रमश: आर्थिकवाद और सांस्कृतिक वर्चस्ववाद  को जान लेना महत्वपूर्ण है| सभी जैविक, भौतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक व्यवहार या प्रक्रिया को वर्तमान में समझने के लिए गैलीलियो (Galileo Galilei) और अल्बर्ट आइन्स्टीन (Albert Einstein) का विभिन्न सापेक्षवाद का ध्यान रखना जरुरी है| अन्त में, किसी भी भाषा के शब्द, मुहावरे, वाक्य या अन्य प्रस्तुति को वास्तविक संदर्भ में समझने के लिए फर्डीनांड डी सौसुरे (Ferdinand de Saussure) और जाक देरिदा (Jacques Derrida) का क्रमश: संरचनावाद और विखंडनवाद  को समझ लेना चाहिए|

उपरोक्त को अच्छी तरह जान और समझ लेने मात्र से आपकी समझ में अभूतपूर्व बदलाव दिखेगा| यह बदलाव आपको सिविल सेवाओं की परीक्षाओं के निबन्ध, सामान्य अध्ययन, अन्य विषय एवं साक्षात्कार में मिले अंकों मे स्पष्ट दिखाई देगा

आप यू –ट्यूब (YouTube) के मेरे चैनल –  ‘Life Changer Niranjan’ पर भी और बहुत कुछ देख सकते हैं| (यह निबन्ध लगभग 800 शब्दों में, अग्रेजी शब्द अंग्रेजी भाषा के अभ्यर्थियों के लिए हैं)

आचार्य प्रवर निरंजनजी

अध्यक्ष, अन्तर्राष्ट्रीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान|

मंगलवार, 21 जुलाई 2026

बुद्ध और आम्बेडकर के नजरों से पुस्तके कैसे पढ़ें?

मैं अकसर देखता हूँ कि लोग सलाह देते रहते हैं कि आपको प्रति सप्ताह या प्रति माह कम से कम इतनी पुस्तके पढनी चाहिए| अपनी बातों को मजबूती देने के लिए किसी क्षेत्र विशेष में अति सफल लोगों का नाम भी जोड़ते रहते हैं| कहने का तात्पर्य यह है कि पता नहीं उन्होंने कहा तो क्या कहा, और किस संन्दर्भ में कहा और किन शब्दावली का उपयोग किया, वह वे ही जाने; लेकिन ये लोग आपको इन्ही नामों की आड़ में भारी भरकम सलाह दे देंगे| ऐसे लोग शायद पुस्तकों को देखने, पढने और उसे समझने में अन्तर समझते भी है, या नहीं, पता नहीं

पुस्तकें इसलिए पढ़ी जाती है कि कोई भी आदमी अपने सभी अनुभव अपने स्वयं कर नहीं सीख सकता है| पुस्तकों से हम दूसरों को प्राप्त सूचना, ज्ञान, बुद्धि और अनुभव को जानते एवं समझते होते हैं| जीवन के बहुत से घातक, खतरनाक और असंभव अनुभव हम दूसरों के माध्यम जानते हैं| इन दूसरों के अनुभव का माध्यम में पुस्तकों की भागीदारी बहुत अधिक होती है| पुस्तकों का भौगोलिक क्षेत्र व्यापक होता है, इनका समय काल भी अनन्त तक विस्तृत होता है, और उन लेखकों के समझ की विविधता के अनुसार वे अनुभव भी सूक्ष्म, गहन, तीक्ष्ण और गहरी हो सकती है|

जो लोग आपको यह बताते हैं कि आपको बहुत सी पुस्तके पढनी चाहिए, उन्हें शायद सूचना (Information), ज्ञान (Knowledge), बुद्धि (Intelligence), प्रज्ञा (Wisdom) और अनुभव (Experience) में अन्तर का समझ नहीं होता है| ‘सूचना’ व्यवस्थित और संसाधित ‘संकेत’ –समूह या डाटा होता है, जिससे कोई सार्थक अर्थ निकलता है| सूचनाओं के व्यवस्थित एवं संसाधित संग्रहण को ‘ज्ञान’ कहते हैं| जब इस ‘ज्ञान’ का प्रयोग या उपयोग अपने हित के लिए किया जाता है, तब वह ‘बुद्धि’ कहलाता है| ‘ज्ञान’ का प्रयोग या उपयोग जब मानवता और मानवता के भविष्य हित के लिए किया जाता है, ‘प्रज्ञा’ कहलाता है| इस ज्ञान, बुद्धि एवं प्रज्ञा का ‘आत्म –साक्षात्कार’ करना ही ‘अनुभव’ होता है| यहाँ सवाल यह है कि हम पुस्तके सूचनाओं या डाटा के संग्रहण के लिए पढ़ते हैं, या ज्ञान, बुद्धि (समझ), प्रज्ञा और अनुभव के लिए पढ़ते हैं? स्पष्ट है कि हम ज्ञान, बुद्धि (समझ), प्रज्ञा और अनुभव प्राप्त करने के लिए ही पढ़ते हैं| तब तो ठहर कर यानि समझ कर ही पढ़ना होगा, सिर्फ कहने के लिए पढने से कोई लाभ नहीं|

तथागत बुद्ध पढने यानि ज्ञान, बुद्धि, प्रज्ञा और अनुभव के सम्बन्ध में क्या कहते है? बुद्ध का सूत्र –वाक्य – बुद्धम, धम्मम, संघम गच्छामि है| इसका सरल और साधारण अर्थ यह हुआ कि बुद्धि के शरण में जाता हूँ| फिर उन बुद्धियों में से जो धारण करने योग्य होगा, उसे धारण करूंगा, यानि उसे अपना लूंगा| ‘धारेति ति धम्मो’ का अर्थ हुआ – जो धारण करने योग्य है, वही ‘धर्म’ है| उन बुद्धियों में से जो आपने ‘धारित’ किया है, क्या उसमे किसी संशोधन, परिमार्जन, सम्वर्धन, या परिष्करण की अनिवार्यता है; और इसी के लिए आपको किसी ‘संघ’ या संगठन में जाने की जरुरत है, ताकि समुचित विमर्श कर उस बुद्धि से शुद्ध बुद्धि प्राप्त किया जा सके|

डा० आम्बेडकर इसी सूत्र वाक्य को जुलाई 1942 में नागपुर के अखिल भारतीय ‘दबे हुए’ (Depressed) लोगों के सम्मलेन में अंग्रेजी में एक सूत्र –वाक्य – “Educate, Agitate, Organise’ दिया| ध्यान रहे कि डा० आम्बेडकर बुद्ध के अनुयायी थे| यह सूत्र –वाक्य बुद्ध के सूत्र –वाक्य का ही आधुनिक युग में अंग्रेजी रूपान्तर है|  ‘Educate’, यानि शिक्षित बनो- अर्थात ज्ञान एवं बुद्धि का अर्जन करो| फिर ‘Agitate’ शब्द आया है, जिसका अर्थ होता है – मंथन करो| अर्थात आपने जो शिक्षा से प्राप्त किया, उस  पर मनन -मन्थन कर जो धारण करने यानि अपनाने योय है, उसे अपना लो| फिर इस तरह प्राप्त ज्ञान को ‘Organise’ करो, यानि उसे व्यवस्थित करों| इसके लिए उसे विमर्श करने की भी आवश्यकता हो सकती है| बाद में कुछ तथाकथित बुद्धिमान लोगों ने तो डा० आम्बेडकर के सूत्र –वाक्य का क्रम भी बदल दिया और एक शब्द (Agitate) को भी बदल दिया है| पढने की इस प्रक्रिया से कोई पुस्तकों से कुछ प्राप्त कर सकता है||

पुस्तकों को पढने के सम्बन्ध में दो प्रसिद्ध भाषाविदो का ध्यान करना आवश्यक हो जाता है| इनमे पहला स्विट्जरलैंड के फर्डीनांड दी सौसुरे हैं, जिन्होंने “संरचनावाद” (Structuralism) का सिद्धान्त दिया| किसी भी  शब्द, या शब्द –समूह, या वाक्य का अर्थ उसके सन्दर्भ, पृष्ठभूमि, समय, क्षेत्र आदि के संरचना के अनुसार बदलता रहता है, जिसे एक पाठक को ध्यान रखना होता है|  भारत में ‘कम्युनल’ (Communal) शब्द ‘सांप्रदायिक’ माना जाता है, जबकि यही शब्द ब्रिटेन में ‘सामुदायिक’ होता है| दूसरे भाषाविद फ़्रांस के ज़ाक देरिदा हैं, जिन्होंने अपने “विखंडनवाद” (Deconstructionism) के सिद्धान्त में यह समझाया कि लेखक के शब्द लेखकों की समझ एवं स्तर के अनुसार होता है, लेकिन उन्ही शब्दों या वाक्यों का अर्थ पाठकों के समझ एवं स्तर के अनुसार भिन्न हो सकता है| भारत में सामाजिक विभाजन का शब्द ‘जाति’ अपनी भारतीय अंग्रेजी में ‘कास्ट’ (Caste) होता है, जबकि यूरोपीय अंग्रेजी में यह ‘भारतीय ‘Caste’ पुर्तगाली शब्द ‘Caasta’ के अनुरुप दूसरा अर्थ देता है, जिसमे उर्घ्वाकार विभाजन नहीं होता है|  

जब कोई पाठक किसी पुस्तक को पढता है, तो उसे लेखक के भाव और अर्थ को समझना होता है| इसके अलावे पाठक को उन पाठो का आलोचनात्मक विश्लेषण एवं मूल्यांकन भी करना होता है| चार्ल्स डार्विन ने आदमी का सम्बन्ध प्रकृति और अन्य जीवनों के साथ समझाया| हर्बर्ट स्पेंसर ने आदमी को समाज, संस्कार, संस्कृति, भाषा, परम्परा, मान्यता, या अन्य सामाजिक –संस्कृति अवधारणाओं के उद्विकास एवं वर्तमान अवस्था के सम्बन्ध को समझाया| सिगमंड फ्रायड ने आदमी का सम्बन्ध उसके मन को जैवकीय इच्छाओं और उनके समाजिक मूल्यों के साथ समझाया| कार्ल गुस्ताव जुंग ने आदमी का सम्बन्ध उसके समाज के अचेतन यानि उसके संस्कार एवं संस्कृति के साथ समझाया| विक्टर फ्रैकल ने आदमी का सम्बन्ध उसके जीवन –प्रेरणा यानि उसके जीवन –शक्ति से समझाया| कार्ल मार्क्स ने आदमी का सम्बन्ध आर्थिक साधनों एवं शक्तियों से, यानि बाजार के साधनों एवं शक्तियों के सम्बन्ध में समझाया| एंटोनिया ग्राम्शी ने आदमी का सम्बन्ध सत्ता और शासक वर्ग के गुप्त एजेंडा की क्रियाविधि से समझाया| गैलीलियो ने आदमी का सम्बन्ध उनकी स्थितियों के सापेक्ष बताया| अल्बर्ट आइन्स्टीन ने तो अपनी विशिष्ट एवं सामान्य सापेक्षिता के सिद्धान्तों के साथ समस्त ब्रह्माण्ड के पदार्थ, ऊर्जा,  समय एवं स्थान (आकाश) को सापेक्षिक बता दिया| एक पाठक को अपने पठन में इन सभी का, जहाँ तक व्यावहारिक हो, ध्यान रखना पढता है, ताकि वह उन बातों को समुचित तरीके से समझे|

इसीलिए कहा गया है कि पढ़िए कम और समझिये ज्यादा| जीवन में सफलता का यही मंत्र है| सिर्फ पुस्तकों के पृष्ठों को देखने और उलटने से कुछ नहीं होता है| पढने में अपनी भी बुद्धि लगाइए, अन्यथा बहुत ‘हांकने’ वाले बैठे हैं|

आचार्य प्रवर निरंजनजी

अध्यक्ष, अन्तर्राष्ट्रीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान|

सोमवार, 13 जुलाई 2026

‘अन्तिम –सत्य’ को कैसे जानें ?

‘अंतिम –सत्य’ एक अजीब शब्द -युग्म लग सकता है, लेकिन यह अपने ‘परिवेश’ को समझने का व्यावहारिक, साधारण एवं महत्वपूर्ण अवधारणा है| इसे अवश्य ही समझा जाना चाहिए, क्योंकि इसके नाम पर ठगी का एक व्यापक और विशाल कारोबार प्रचलन में है| इस ‘अंतिम –सत्य’ की विवेचना से आपके मन पर पड़े बहुत से भ्रम से या यों कहें कि उस पर पडा बहुत से धुन्ध और धूल छट जाएगा| यह विवेचना जटिल जीवन को स्पष्टता से समझने के लिए अनिवार्य है|  

यह समझ लेना आवश्यक है कि एक ‘तथ्य’ के एक ही ‘सत्य’ नहीं होता है| और यह भी हो सकता है कि एक ‘तथ्य’ का वह ‘सत्य’ भी ‘सही’ और ‘व्यवहारिक’ नहीं हो| ‘तथ्य’ के एक होते हुए भी उनका ‘सत्य’ अलग –अलग व्यक्तियों के लिए अलग –अलग हो जाता है| और वह अलग –अलग ‘सत्य’ भी उन व्यक्तियों के लिए एकदम ‘सही’ और ‘समुचित’ भी होता है| एक ही ‘तथ्य’ के अलग –अलग ‘सत्य’ भी उनके लिए व्यवहारिक और प्रभावी होता है; और वह ‘सत्य’ उनके लिए ‘सही’ भी होता है, जबकि वह दूसरों के लिए ग़लत है।

स्पष्ट है कि ‘सत्य’ ‘निरपेक्ष’ नहीं होकर भिन्न भिन्न संदर्भ के ‘सापेक्ष’ होता है| इस ‘सत्य’ का सुनिश्चियन उसकी ‘परिस्थितियों’, ‘सन्दर्भों’ और उनके ‘व्यक्तिगत समझ’ यानि उनकी ‘चेतना’ की स्तर से निर्धारित होता है| हम जानते हैं कि एक निर्जीव और सजीव में अन्तर उसके ‘चेतना’ के होने या नहीं होने का है, लेकिन एक स्तनपायी पशु या अन्य जीव और एक आदमी में ‘चेतना’ यानि ‘समझदारी’ का अन्तर ठीक से समझ पाना एक मुश्किल काम है|ध्यान रहे कि दो पैरों का व्यक्ति भी एक पशु ही है और अधिकांश की मानसिकता भी पशुवत है। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि एक ‘पशु’ या एक ‘आदमी’ में एक ही साथ ‘पशुओं की चेतनता’ और ‘आदमी की चेतनता’ का विभिन्न अनुपात ‘मिश्रित’ रुप में निश्चित होता है| ‘चेतनता’ के इस ‘मिश्रित रुप में निश्चित अनुपात’ को समझने के लिए ‘चेतना’ का विश्लेषण एवं मूल्यांकन आवशयक है|

मानव प्रजाति में ‘चेतना’ के पांच ‘कार्य –भाग’ (Functioning –Parts) तीन ‘स्तर’ (Layers) पर कार्यरत होता है| इसके पांच ‘कार्य –भाग’ क्रमश: ‘शरीर’ (Body) और ‘मस्तिष्क’ (Brain), ‘आत्म’ (Self) यानि ‘मन’ (Mind) और ‘चित्त’ (Spirit), एवं ‘अनन्त शक्ति -क्षेत्र’ (Infinite Force Field) होता है| किसी का शरीर उसके सभी स्वरुपों का भौतिक और दृश्य वास्तविक आधार होता है| यही शरीर चेतना के सभी अंगों यानि यंत्रों को अधिकांश ऊर्जा की आपूर्ति करता रहता रहता है| यही शरीर सभी भौतिक क्रियायों और व्यवहार का वास्तविक ढाँचा एवं अवयव देता है| चूँकि इसका निर्माण भौतिक पदार्थों से होता है, इसीलिए यह सभी को दृश्य भी होता है| सभी व्यक्ति को यह शरीर सामान्य ज्ञानेन्द्रियो से ज्ञात होता है| किसी का मस्तिष्क भौतिक रुप में शरीर का एक हिस्सा होते हुए भी उस व्यक्ति के शरीर, मन, चित्त एवं अनन्त शक्ति –क्षेत्र के मध्य एक ‘मोड्यूलेटर’ (Modulator) के रुप में कार्यरत होता है| उसके ‘आत्म’ में उसका ‘मन’ एवं उसका ‘चित्त’ होता है| कोई भी इस ‘आत्म’ (Self) को किसी ‘आत्मा’ (Soul) से भ्रमित नहीं करें| ‘मन’ विचारों का उत्पादन, संश्लेषण, संयोजन एवं भंडारण करता है| इसी तरह, ‘चित्त’ भावनाओं का उत्पादन, संश्लेषण, संयोजन एवं भंडारण करता है| ‘मन’ एवं ‘चित्त’ में ‘चित्त’ का स्थान उच्चतर होता है, और यही ‘चित्त’ सभी का संपर्क ‘अनन्त शक्ति –क्षेत्र’ के करता है| ‘अनन्त शक्ति –क्षेत्र’ ही ‘अंतर्ज्ञान’ (Intuition) यानि ‘आभास’ का उत्पादन करता है|

समाज के अधिकांश लोगों की चेतना उनकी ‘शारीरिक ज्ञानेन्द्रियों’ तक ही सीमित होती है| समाज के बहुत ही अत्यल्प लोगों की चेतना उसकी मानसिक एवं भावनात्मक के साथ साथ आध्यात्मिक स्तर तक पहुंचती है| मध्यवर्ती लोगों यानि माध्यम वर्गीय लोगों (Middle Class People) की चेतनता का स्तर इन्ही निम्नतर एवं उच्चतर ब्रैकेट –सीमा के मध्य होती है| अर्थात ये मध्य वर्ती लोग अपनी चेतना में शारीरिक ज्ञानेन्द्रियों के अतिरिक्त अपनी मानसिक दृष्टि का तो उपयोग कर पाते हैं, लेकिन अपनी आध्यात्मिक शक्तियों के उपयोग से अनजान रहते हैं| इसलिए एक व्यक्ति एक ही साथ चेतना के अपने –अपने स्तर की समझ से किसी ‘सत्य’ को उसके एक निश्चित परन्तु भिन्न भिन्न अंशों तक ही पहचानता और समझता है| कोई उसका सिर्फ ‘भौतिक -स्वरुप’ ही देख और समझ पाता है, तो कोई उसके ‘भौतिक -स्वरुप’ के साथ –साथ उसके ‘उर्जा –स्वरुप’ को भी देख समझ पाता है| इस ‘उर्जा –स्वरुप’ को ही ‘मानसिक और भावनात्मक स्वरुप’ कहते हैं| कुछ लोग यानि अत्यल्प लोग ही ‘अनन्त क्षेत्र –बल’ के स्वरुप तक ही पहुँच पाते हैं, और इसी स्वरुप को ‘आध्यात्मिक’ उपलब्धि कहते हैं| चूँकि अध्यात्म का पहुँच, अवधारणा और क्रिया विधि सामान्य जनों के लिए अत्यंत गूढ़ होती है, इसलिए ही इस ‘अध्यात्म’ के नाम पर बहुत से व्यवसायिक कारोबार चलते होते हैं| ‘चेतना’ की समझ के इसी भिन्न भिन्न स्तर के कारण ही कोई एक ही 'तथ्य' के भिन्न भिन्न ‘सत्य’ देख एवं समझ पाता है|

यदि किसी ‘अध्यात्म –क्रिया’ या किसी ‘वैचारिक –चिन्तन’ का विषय –वस्तु उस व्यक्ति या उसके आसपास तक ही सीमित रहता है, तो स्पष्ट समझिए कि वह ‘अध्यात्म –क्रिया’ या वह ‘वैचारिक –चिन्तन’ झूठी और भ्रामक है और सत्य से परे है| उदहारण के लिए समझने में मैं साधारणतया सिद्धार्थ गोतम, अल्बर्ट आइन्स्टीन और स्टीफन हौकिन्स का नाम लेता हूँ| ऐसे ही नवाचारी लोग ‘आध्यात्मिक’ होते हैं, बाकी तो उस ‘अध्यात्म’ के नाम पर क्या करते हैं, कोई भी समझ सकता है।

यदि किसी आध्यात्मिक ज्ञान या शक्ति से मानवता लाभान्वित नहीं हुआ, तो वह ज्ञान या शक्ति मात्र एक ढोंग है| किसी व्यक्ति को ‘एक आदमी’ उसके समाज ने बनाया है, अन्यथा वह व्यक्ति “मोगली” की तरह वन्य –जीवों के साथ रेगता हुआ होता या पेड़ों की जटाओं में एक पेड़ से दूसरे पेड़ तक छलांग लगाता हुआ होता, लेकिन वह ‘आदमी’ कहलाने लायक नहीं होता| और यदि वह आदमी अपने समाज को लाभान्वित  नहीं करता है, तो वह ‘अध्यात्म’ के नाम पर कुछ और खेल करता हुआ होता है, लेकिन वह ‘अध्यात्म’ तो  कदापि नहीं हो सकता|

यदि कोई मानता है या कहता है कि ‘अध्यात्म’ का विषय ‘आत्म –ज्ञान” या ‘आत्म –सुख’ है, और उससे मानवता का व्यापक कल्याण नहीं होता है, तो उस “आत्म –सुख” के लिए इतने प्रयास करने की कोई आवश्यकता नहीं है; उसके लिए तो ‘दो कश’ या ‘दो पेग’ ही पर्याप्त होता है| इस “आत्म –सुख” के लिए इतना तिकड़म करने की कोई आवश्यकता नहीं है| इसी तरह, वैसे “आत्म –ज्ञान” का क्या लाभ, जिससे समाज को कोई लाभ नहीं हो? ऐसे “आत्म –ज्ञानी” होने या नहीं होने का कोई ‘अर्थ’ नहीं होता है| यह कोई ‘सत्य’ हो ही नहीं सकता|

वैसे कोई भी ‘सत्य’ अन्तिम नहीं होता है, फिर भी किसी वर्तमान में यदि कोई ‘सत्य’ है, तो वह अवश्य ही  समाज और मानवता के सापेक्ष होगा| चूँकि समाज और मानवता की आवश्यकताएँ तत्क्षण बदलती रहती है, इसलिए कोई भी ‘सत्य’ उस क्षण के लिए ‘अन्तिम –सत्य’ होते भी ‘निरपेक्ष सत्य’ नहीं हो सकता है; वह तो सदैव ही सापेक्ष ही रहता है| यदि कोई ‘सत्य’ ‘अन्तिम –सत्य’ हो जाएगा, तो विज्ञान की प्रगति ही रुक जाएगी| सत्य की यही सापेक्ष स्थिति ही विज्ञान का आधार है| इसीलिए कोई भी किसी समय या सन्दर्भ के सापेक्ष ही ‘अन्तिम –सत्य’ तक पहुंचे| लेकिन इसके लिए उसे अवश्य ही अपनी चेतना को अपने सभी अवयवों के स्तर पर सक्रिय कर ‘उच्चतर’ करे| तभी वह किसी ‘सत्य’ के निकट पहुँचा हुआ माना जा सकता है| शुरुआत तो प्रयास से हो सकता है|

आचार्य प्रवर निरंजन जी

अध्यक्ष, अन्तर्राष्ट्रीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान, बिहटा, पटना, बिहार| 

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