मैं अकसर देखता हूँ कि लोग सलाह देते रहते हैं कि
आपको प्रति सप्ताह या प्रति माह कम से कम इतनी पुस्तके पढनी चाहिए| अपनी बातों को
मजबूती देने के लिए किसी क्षेत्र विशेष में अति सफल लोगों का नाम भी जोड़ते रहते
हैं| कहने का तात्पर्य यह है कि पता नहीं उन्होंने कहा तो क्या कहा, और किस
संन्दर्भ में कहा और किन शब्दावली का उपयोग किया, वह वे ही जाने; लेकिन ये लोग
आपको इन्ही नामों की आड़ में भारी भरकम सलाह दे देंगे| ऐसे लोग शायद पुस्तकों को
देखने, पढने और उसे समझने में अन्तर समझते भी है, या नहीं, पता नहीं
पुस्तकें इसलिए पढ़ी जाती है कि कोई भी आदमी अपने
सभी अनुभव अपने स्वयं कर नहीं सीख सकता है| पुस्तकों से हम दूसरों को प्राप्त सूचना,
ज्ञान, बुद्धि और अनुभव को जानते एवं समझते होते हैं| जीवन के बहुत से घातक,
खतरनाक और असंभव अनुभव हम दूसरों के माध्यम जानते हैं| इन दूसरों के अनुभव का
माध्यम में पुस्तकों की भागीदारी बहुत अधिक होती है| पुस्तकों का भौगोलिक क्षेत्र
व्यापक होता है, इनका समय काल भी अनन्त तक विस्तृत होता है, और उन लेखकों के समझ
की विविधता के अनुसार वे अनुभव भी सूक्ष्म, गहन, तीक्ष्ण और गहरी हो सकती है|
जो लोग आपको यह बताते हैं कि आपको बहुत सी पुस्तके
पढनी चाहिए, उन्हें शायद सूचना (Information), ज्ञान (Knowledge), बुद्धि (Intelligence),
प्रज्ञा (Wisdom) और अनुभव (Experience) में अन्तर का समझ नहीं होता है| ‘सूचना’
व्यवस्थित और संसाधित ‘संकेत’ –समूह या डाटा होता है, जिससे कोई सार्थक अर्थ
निकलता है| सूचनाओं के व्यवस्थित एवं संसाधित संग्रहण को ‘ज्ञान’ कहते हैं| जब इस ‘ज्ञान’
का प्रयोग या उपयोग अपने हित के लिए किया जाता है, तब वह ‘बुद्धि’ कहलाता है| ‘ज्ञान’
का प्रयोग या उपयोग जब मानवता और मानवता के भविष्य हित के लिए किया जाता है, ‘प्रज्ञा’
कहलाता है| इस ज्ञान, बुद्धि एवं प्रज्ञा का ‘आत्म –साक्षात्कार’ करना ही ‘अनुभव’
होता है| यहाँ सवाल यह है कि हम पुस्तके सूचनाओं या डाटा के संग्रहण के लिए पढ़ते
हैं, या ज्ञान, बुद्धि (समझ), प्रज्ञा और अनुभव के लिए पढ़ते हैं? स्पष्ट है कि हम ज्ञान,
बुद्धि (समझ), प्रज्ञा और अनुभव प्राप्त करने के लिए ही पढ़ते हैं| तब तो ठहर कर
यानि समझ कर ही पढ़ना होगा, सिर्फ कहने के लिए पढने से कोई लाभ नहीं|
तथागत बुद्ध पढने यानि ज्ञान, बुद्धि, प्रज्ञा और
अनुभव के सम्बन्ध में क्या कहते है? बुद्ध का सूत्र –वाक्य – बुद्धम, धम्मम, संघम
गच्छामि है| इसका सरल और साधारण अर्थ यह हुआ कि बुद्धि के शरण में जाता हूँ| फिर उन
बुद्धियों में से जो धारण करने योग्य होगा, उसे धारण करूंगा, यानि उसे अपना लूंगा|
‘धारेति ति धम्मो’ का अर्थ हुआ – जो धारण करने योग्य है, वही ‘धर्म’ है| उन
बुद्धियों में से जो आपने ‘धारित’ किया है, क्या उसमे किसी संशोधन, परिमार्जन, सम्वर्धन,
या परिष्करण की अनिवार्यता है; और इसी के लिए आपको किसी ‘संघ’ या संगठन में जाने
की जरुरत है, ताकि समुचित विमर्श कर उस बुद्धि से शुद्ध बुद्धि प्राप्त किया जा
सके|
डा० आम्बेडकर इसी सूत्र वाक्य को जुलाई 1942 में
नागपुर के अखिल भारतीय ‘दबे हुए’ (Depressed) लोगों के सम्मलेन में अंग्रेजी में
एक सूत्र –वाक्य – “Educate, Agitate, Organise’ दिया| ध्यान रहे कि डा० आम्बेडकर
बुद्ध के अनुयायी थे| यह सूत्र –वाक्य बुद्ध के सूत्र –वाक्य का ही आधुनिक युग में
अंग्रेजी रूपान्तर है| ‘Educate’, यानि शिक्षित
बनो- अर्थात ज्ञान एवं बुद्धि का अर्जन करो| फिर ‘Agitate’ शब्द आया है, जिसका
अर्थ होता है – मंथन करो| अर्थात आपने जो शिक्षा से प्राप्त किया, उस पर मनन -मन्थन कर जो धारण करने यानि अपनाने योय
है, उसे अपना लो| फिर इस तरह प्राप्त ज्ञान को ‘Organise’ करो, यानि उसे व्यवस्थित
करों| इसके लिए उसे विमर्श करने की भी आवश्यकता हो सकती है| बाद में कुछ तथाकथित बुद्धिमान
लोगों ने तो डा० आम्बेडकर के सूत्र –वाक्य का क्रम भी बदल दिया और एक शब्द (Agitate)
को भी बदल दिया है| पढने की इस प्रक्रिया से कोई पुस्तकों से कुछ प्राप्त कर सकता
है||
पुस्तकों को पढने के सम्बन्ध में दो प्रसिद्ध भाषाविदो
का ध्यान करना आवश्यक हो जाता है| इनमे पहला स्विट्जरलैंड के फर्डीनांड दी सौसुरे
हैं, जिन्होंने “संरचनावाद” (Structuralism) का सिद्धान्त दिया| किसी भी शब्द, या शब्द –समूह, या वाक्य का अर्थ उसके
सन्दर्भ, पृष्ठभूमि, समय, क्षेत्र आदि के संरचना के अनुसार बदलता रहता है, जिसे एक
पाठक को ध्यान रखना होता है| भारत में ‘कम्युनल’
(Communal) शब्द ‘सांप्रदायिक’ माना जाता है, जबकि यही शब्द ब्रिटेन में ‘सामुदायिक’
होता है| दूसरे भाषाविद फ़्रांस के ज़ाक देरिदा हैं, जिन्होंने अपने “विखंडनवाद” (Deconstructionism)
के सिद्धान्त में यह समझाया कि लेखक के शब्द लेखकों की समझ एवं स्तर के अनुसार
होता है, लेकिन उन्ही शब्दों या वाक्यों का अर्थ पाठकों के समझ एवं स्तर के अनुसार
भिन्न हो सकता है| भारत में सामाजिक विभाजन का शब्द ‘जाति’ अपनी भारतीय अंग्रेजी
में ‘कास्ट’ (Caste) होता है, जबकि यूरोपीय अंग्रेजी में यह ‘भारतीय ‘Caste’
पुर्तगाली शब्द ‘Caasta’ के अनुरुप दूसरा अर्थ देता है, जिसमे उर्घ्वाकार विभाजन
नहीं होता है|
जब कोई पाठक किसी पुस्तक को पढता है, तो उसे लेखक
के भाव और अर्थ को समझना होता है| इसके अलावे पाठक को उन पाठो का आलोचनात्मक
विश्लेषण एवं मूल्यांकन भी करना होता है| चार्ल्स डार्विन
ने आदमी का सम्बन्ध प्रकृति और अन्य जीवनों के साथ समझाया| हर्बर्ट स्पेंसर ने आदमी
को समाज, संस्कार, संस्कृति, भाषा, परम्परा, मान्यता, या अन्य सामाजिक –संस्कृति
अवधारणाओं के उद्विकास एवं वर्तमान अवस्था के सम्बन्ध को समझाया| सिगमंड फ्रायड ने
आदमी का सम्बन्ध उसके मन को जैवकीय इच्छाओं और उनके समाजिक मूल्यों के साथ समझाया|
कार्ल गुस्ताव जुंग ने आदमी का सम्बन्ध उसके समाज के अचेतन यानि उसके संस्कार एवं
संस्कृति के साथ समझाया| विक्टर फ्रैकल ने आदमी का सम्बन्ध उसके जीवन –प्रेरणा यानि
उसके जीवन –शक्ति से समझाया| कार्ल मार्क्स ने आदमी का सम्बन्ध आर्थिक साधनों एवं
शक्तियों से, यानि बाजार के साधनों एवं शक्तियों के सम्बन्ध में समझाया| एंटोनिया
ग्राम्शी ने आदमी का सम्बन्ध सत्ता और शासक वर्ग के गुप्त एजेंडा की क्रियाविधि से
समझाया| गैलीलियो ने आदमी का सम्बन्ध उनकी स्थितियों के सापेक्ष बताया| अल्बर्ट
आइन्स्टीन ने तो अपनी विशिष्ट एवं सामान्य सापेक्षिता के सिद्धान्तों के साथ समस्त
ब्रह्माण्ड के पदार्थ, ऊर्जा, समय एवं
स्थान (आकाश) को सापेक्षिक बता दिया| एक पाठक को अपने पठन में इन सभी का, जहाँ तक
व्यावहारिक हो, ध्यान रखना पढता है, ताकि वह उन बातों को समुचित तरीके से समझे|
इसीलिए कहा गया है कि
पढ़िए कम और समझिये ज्यादा| जीवन में सफलता का यही मंत्र है| सिर्फ पुस्तकों के
पृष्ठों को देखने और उलटने से कुछ नहीं होता है| पढने में अपनी भी बुद्धि लगाइए,
अन्यथा बहुत ‘हांकने’ वाले बैठे हैं|
आचार्य प्रवर निरंजनजी
अध्यक्ष, अन्तर्राष्ट्रीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान|
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