इतिहास
जीवित व्यक्तियों के लिए होता है, अन्यथा वह इतिहास है ही नहीं| इतिहास यदि जीवित
व्यक्तियों के लिए ही होता है, तो यह स्पष्ट है कि इतिहास सापेक्षिक होता है| इसका
अर्थ यह हुआ कि इतिहास को समय के सापेक्ष बदलता रहना पड़ता है| इसी कारण इतिहास का समय
समय पर पुनर्लेखन होता है| इसके लिए यह आवश्यक नहीं है कि कोई नया ऐतिहासिक तथ्य
ही सामने आए| स्पष्ट है कि इतिहास को सामाजिक आवश्यकताओं के अनुरूप अनुकूलित,
समायोजित और संतुलित होना पड़ता है|
समाज
गतिशील होता है| समाज का सदैव उद्विकास होता रहता है| समाज की आवश्यकताएँ भी बदलती
रहती है| इसीलिए उस समाज की संस्कृति भी गतिमान होती है| चूँकि इतिहास मानव, समाज,
राष्ट्र एवं मानवता के सापेक्ष होता है, इसलिए इतिहास को सदैव ही बदलना होगा| इसी
सन्दर्भ में प्रसिद्ध इतिहासकार लार्ड एक्टन ने कहा था कि आप कोई अन्तिम इतिहास
नहीं लिख सकते हैं, लेकिन आप पहले से चले आ रहे इतिहास को रद्द कर सकते हैं|
यदि
आप कोई भी कार्य मानव, समाज, राष्ट्र एवं मानवता के हित वर्धन के सन्दर्भ में नहीं
करते हैं, आप मानव नहीं है| आपका विषय या कार्यक्षेत्र चाहे इतिहास का हो, या
विज्ञान का हो, या कला का हो, या आध्यात्म का हो, या अन्य कोई भी विषय हो, उसे अवश्य ही मानव, समाज,
राष्ट्र एवं मानवता के लाभ के लिए होना ही चाहिए| कुछ लोग तथाकथित ‘तथ्य’ या ‘सत्य’
के नाम पर, या आत्म संतुष्टि के लिए, या तथाकथित ज्ञान के लिए कार्य करते हुए अपनी
‘चिन्तन की अवस्था’ को न्यायोचित बताते हैं| मैं यहाँ कोई आपत्ति भी दर्ज नहीं
करना चाहता हूँ, लेकिन मैं उन्हें इस तथ्य एवं सत्य पर विमर्श में शामिल करना
चाहता हूँ कि मानव की उत्पत्ति कैसे हुई?
यहाँ
हमें मानव जाति की उत्पत्ति एवं उद्विकास को समझना होगा| मानव मूलत: एक स्तनपायी
पशु है, लेकिन वह अन्य सामान्य पशुओं से चेतना के स्तर पर भिन्न एवं उच्चतर है|
चेतना की यही वर्तमान उच्च स्तरीय अवस्था ही इसे अन्य पशुओं से अलग करता है| जब
मानव चालीस लाख साल पहले पेड़ों से उतरा था, उसी समय से उसे खड़े होकर अपने खतरों भापना
होता था, ताकि वह संभावित खतरों से अपने को बचा सके| इसी क्रम में एक वानर (Ape) सीधा
खड़ा होते हुए ‘होमो इरेक्टस’ और ‘होमो सेपियन्स’ बन सका| इसी क्रम में मादा मानव
के गर्भाशय का मुँह सकरा (Narrow) होता गया| चार पैरों के पशुओं का गर्भाशय का
मुँह इतना पर्याप्त बड़ा (Wider) होता है कि उसके शिशु –जनन में कोई परेशानी नहीं
होती है| इसीलिए पशुओं का शिशु उसके गर्भ में ही पर्याप्त परिपक्व हो जाता है|
इससे पशुओं के शिशु अपने जन्म के समय से ही अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करने में
सक्षम हो जाता है|
लेकिन
एक मानव का शिशु और उसकी माता शिशु -जनन के समय असहाय होते है| उसे अन्य मानव के
सहयोग और सहायता की अनिवार्यता होती है| ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि मानव के खड़े
होने के क्रम में उसके गर्भाशय का मुँह छोटा (Narrow) होता गया| इससे मानव –शिशु को
अपरिपक्व अवस्था में ही प्रजनित होना पड़ गया| उसकी माता को भी इसीलिए असहनीय वेदना
होती है, जो दूसरे पशु –माताओं को नहीं होता है| शिशु के जनन में शिशु एवं उसकी माता
को ‘अन्य मानव’ के सहयोग, समर्थन और सहायता की अनिवार्यता होती है| यही से मानव
में भावनात्मक लगाव पैदा हुआ| इसी के साथ ही परिवार, समाज आदि अन्य सामाजिक
संस्थाओं के उदय होना शुरू हुआ| इन्ही आवश्यकताओं और उससे जनित सामाजिक संस्थाओं
के साथ मानव अपना संसार बना सका|
जब
वर्तमान मानव और उसके संसार की उत्पत्ति ही इन्ही मानवीय आवश्यकताओं के कारण हुई
है, तब किसी भी अवस्था में समकालीन वर्तमान मानव और वर्तमान संसार के हित वर्धान
को ध्यान में नहीं रखना, कतई मानवीय गुण नहीं होगा| इसीलिए आपका हर विषय या
कार्यक्षेत्र, चाहे वह इतिहास का हो, या विज्ञान का हो, या कला का हो, या आध्यात्म
का हो, या अन्य कोई भी विषय हो, उसे अवश्य
ही मानव, समाज, राष्ट्र एवं मानवता के लाभ के लिए होना ही चाहिए| जब हम इतिहास का
लेखन करते हैं, तो उसका स्पष्ट उद्देश्य मानवता के हितों का संवर्धन करना होगा|
इसीलिए हर इतिहास अपने समय के लिए समकालिक या समकालीन होता है| इसका अर्थ हुआ कि कोई
भी इतिहास लेखन वर्तमान समाज के हित के लिए होता है| यह अलग बात है कि भारत में
समाज का अर्थ क्षेत्रीयता से, या जाति से, या सम्प्रदाय से, या भाषागत से लिया जाता
है, जबकि समाज का अर्थ राष्ट्रीयता और मानवता के सन्दर्भ में होना चाहिए|
किसी
भी इतिहास का लेखन किसी राजनीतिक या किसी वर्गीय सत्ता के हितों के लिए या किसी
वर्ग विशेष के हितों के लिए नहीं होना चाहिए| अभी भारत में इतिहास लेखन का आधार तथाकथित
‘स्थानीय मूल निवासी’ और ‘विदेशी मूल’ के आधार को न्यायोचित ठहराने के लिए हो रहा
है, जो पूरी तरह गलत है| जब वर्तमान सभी मानव एक ही मानव –समूह के वंशज है और एक
ही स्थान से उत्पन्न हुए, तब वह अपने उत्पत्ति –स्थल - अफ्रिका के वोत्सवाना मैदान
के बाहर के सभी लोग उस उत्पत्ति –स्थल के सापेक्ष विदेशी ही हुए| इस रुप में हर
भारतीय भारत के सापेक्ष में विदेशी ही है, क्योंकि भारत में वर्तमान होमो सेपियंस
का जन्म नहीं हुआ है| भारत के कुछ वर्ग -समूहों को लगता है कि वह किसी शासक के
वंशज हैं, तो उन्हें यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि तब शासित लोग किसके वंशज रहे? प्राचीन
विश्व इतिहास में कुछ नगर –शासन व्यवस्था के अतिरिक्त, कहीं भी वर्ग –समूह के शासन
के प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं| भारत में लिखित या वर्णित वर्ग –समूह के शासन के कोई
प्रमाणिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं| ऐसा सब व्याख्या इतिहास की तर्कहीन, तथ्यहीन और
अविवेकपूर्ण मनमानी है, जो भारतीय समाज को अनावश्यक उलझाए हुए है| सभी भारतीय एक
हैं, और उन्ही सामान्य जन –समूह से शासक एवं शासित होते रहे हैं| भारत के मध्य काल
में भारतीय जाति और वर्ण व्यवस्था का जन्म हुआ, जो ऐतिहासिक साधनों एवं शक्तियों का
आवश्यक परिणाम था| भारतीय जाति और वर्ण व्यवस्था का कोई भी प्राथमिक प्रमाणिक
प्रमाण प्राचीन भारत के इतिहास में उपलब्ध नहीं रहा है|
ठहरिए,
विचार कीजिए और भारत को सशक्त राष्ट्र बनाते हुए इसे विश्व –मार्गदर्शन के लिए
तैयार होने दीजिए|
(आप मेरे अन्य आलेख niranjan2020.blogspot.com पर देख सकते हैं।)
आचार्य प्रवर निरंजनजी
शिक्षक, लेखक, प्रेरक एवं दार्शनिक
अध्यक्ष, अन्तर्राष्ट्रीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान
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