रविवार, 22 मार्च 2026

अमेरिका 'दादागिरी' क्यों करता है?

आजकल फिर अमेरिका ‘दादागिरी’ कर रहा है| सवाल यह है कि अमेरिका ‘दादागिरी’ क्यों करता है? ‘दादागिरी’ करने के लिए क्या क्या गुण या क्या क्या क्षमताएँ होने चाहिए? क्या कोई भी ‘दादागिरी’ कर सकता है? क्या भारत भी ‘दादागिरी’ कर सकता है? क्या ‘दादागिरी’ भी सापेक्षिक होता है? तो ‘दादागिरी’ क्या है?

'दादागिरी' (Bullying) एक अनुचित प्रक्रिया माना जाता है, जिसमें बलप्रयोग कर या धमकाकर किसी अन्य पर अपना प्रभुत्व जमाने का प्रयास किया जाता हैं। ‘दादागिरी’ सदैव अपने से छोटे और कमजोर देश या समाज पर दिखाया जाता है| लेकिन यह ‘कमजोर’ क्या होता है? क्या कोई ‘कमजोर’ या ‘शक्तिशाली’ सिर्फ संख्या के आधार पर हो सकता है, या शारीरिक ताकत के आधार पर, या अपने ‘बौद्धिक’ क्षमता के आधार पर होता है? तो ‘बौद्धिक’ क्षमता क्या होता है?

आधुनिक युग में कुछ वैश्विक ‘दादा’ हुए हैं, जिनके अध्ययन करने के पश्चात इस सम्बन्ध में कुछ सार्थक निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं| आधुनिक युग में, सबसे पहले स्पेन और पुर्तगाल ‘दादा –देश’ हुए। उसके बाद इस कड़ी में कई यूरोपीय देश जुडते रहे। फिर ग्रेट ब्रिटेन (UK) एक ऐसा ‘दादा’ हुआ, जिसके साम्राज्य में कभी सूरज का अस्त नहीं होता था| द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ‘विश्व व्यवस्था’ (World Order) में संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) का स्थान प्रथम हो गया| अर्थात अमेरिका ‘दादा’ बन गया| आज उसके लिए कोई वैश्विक नियम –कानून काम के नहीं है| वह जो चाहता है, कर लेता है या कर लेना चाहता है|

लेकिन ऐसा क्यों होता है? आधुनिक युग के सभी ‘दादाओं’ के अध्ययन के बाद इन सभी में एक समान प्रवृत्ति पाया जाता है। इन सभी ‘दादाओं’ में ‘बौद्धिक शक्ति’ सबसे महत्वपूर्ण होता है। इस ‘बौद्धिक शक्ति’ का आधार ‘ज्ञान’ और ‘विज्ञान’ होता है। इन सभी ‘बौद्धिक’ देशों या समाजों में ‘धर्म –सत्ता’ का महत्त्व गौण रहता है| ‘ज्ञान’ (Knowledge) ‘सूचनाओं’ का व्यवस्थित और संगठित स्वरुप होता है। ‘ज्ञान’ को निरपेक्ष माना जाता है| यह यथास्थिति में सब कुछ जानना है| इस ‘यथास्थित’ (निष्पक्ष) ‘ज्ञान’ का उपयोग या प्रयोग ‘बुद्धि’ (Intellect) कहलाता है। किसी भी ‘दादागिरी’ का आधार अवश्य ही ‘विज्ञान’ (Science) होता है|

‘विज्ञान’ का उपयोग कर किसी ‘समस्या’ का समाधान खोजना ही ‘इंजीनियरिंग’ (Engineering/ अभियंत्रण) होता है। ‘अभियंत्रण’ वैज्ञानिक सिद्धांतों का उपयोग करके व्यावहारिक समस्याओं को हल करने की एक विधा है। किसी कार्य को सुव्यवस्थित, प्रभावी और जल्दी करने के लिए वैज्ञानिक एवं अभियंत्रण सिद्धांतों का व्यावहारिक समाधान 'तकनीक' कहलाता है। यदि किसी समस्या का समाधान करना ‘इंजीनियरिंग’ है, तो उस समाधान में मशीन, यन्त्र, औजार, उपकरण, उपस्कर, आदि बनाना एवं उपयोग करना ही तकनीक (Technology) है।

अर्थात शक्ति का स्रोत ‘विज्ञान’ (वैज्ञानिकता) से होता है, किसी दैवीय आस्था से नहीं| ‘विज्ञान’ में निरन्तर शोध एवं अनुसंधान से मौलिक नियमों एवं सिद्धांतों का परिमार्जन होना वहाँ की सामान्य संस्कृति बन जाती है| इसीलिए वहाँ नित आविष्कार होता रहता है| विज्ञान प्रकृति और भौतिक दुनिया के व्यवस्थित अध्ययन से प्राप्त ज्ञान है। यह अवलोकन (Observation), प्रयोग (Experimentation) और जांच के माध्यम से तथ्यों को समझने की एक विधि है, जो सटीक परिणाम देती है। यह जिज्ञासा से शुरू होता है, अर्थात यह सवाल पूछने से शुरु होता है| ‘दैवीय आस्था’ विज्ञान –विरोधी होता है| ज्ञान की पुनः तलाश एक परम्परा बन जाती है।

इस तरह, ‘विज्ञान’ एक ‘विषय’ (Subject) ही नहीं है, यह  एक ‘क्रियाविधि’ (Method/ Methodology) भी है। सभी इंजीनियरिंग और तकनीक इसी विज्ञान पर आधारित है| जो समाज विज्ञान में मौलिक शोध एवं अनुसंधान करता रहता है, वही सभी क्षेत्रों में सबसे आगे रहता है| इसी आधार पर आज चीन, अमेरिका, जापान, रुस, जर्मनी, फ़्रांस, ब्रिटेन आगे हैं| आजकल यही देश एक दूसरे की दादागिरी को संतुलित कर रहे हैं, या संतुलित कर सकते हैं, बाकियों की कोई औकात नहीं है| वे सभी देश और समाज, जिनके लिए ‘विज्ञान’ के सापेक्ष ‘आस्था’ या ‘धर्म’ प्रमुख है, इन वैज्ञानिक शक्तियों के समक्ष सदैव नतमस्तक रहते हैं|

 ‘आस्था’ (Faith) का विषय किसी ‘ज्ञान’ या ‘बुद्धि’ पर आधारित नहीं होता है। यही ‘आस्था’ सभी धर्मों का आधार होता है| अर्थात सभी धार्मिक बातें आस्था की बात है, इनमे कोई ज्ञान और विज्ञान नहीं होता है| अक्सर ‘आस्था’ का आधार ‘दैवीय’ होता है। यदि ऐसे धर्म में आस्था रखने वाले देशों का कुछ महत्त्व वैश्विक व्यवस्था में है, तो वह आधार उनके ‘उपभोग’ (Consume) करने की क्षमता (खाने एवं पचाने वाले पेटो की संख्या) होगी| इन आस्था के आधार पर मूर्खो पर दादागिरी दिखाई जा सकती है, लेकिन किसी बौद्धिक शक्ति के देशों या समाजों पर ‘दादागिरी’ नहीं दिखाई जा सकती| ध्यान रहे कि सभी आधुनिक हथियार आधुनिक ‘सूचना =तकनीक’ युग में उनके ‘उत्पादक’ देशों के नियंत्रण में सदैव रहती है| अर्थात कोई भी ख़रीदा गया हथियार उनके उत्पादक देशों के मर्जी के विरुद्ध प्रयोग नहीं किया जा सकता है| अर्थात कोई भी देश ख़रीदे गए हथियारों के भरोसे ‘दादागिरी’ नहीं कर सकता|

जिन बौद्धिक शक्तियों के पास ‘न्यायिक चरित्र’ (Judicious Character) होता है और उनमे यदि ‘अखंडता’ (Integrity) का चरित्र भी होता है, तो ऐसे सभी ‘बौद्धिक शक्तियाँ’ भविष्य के ‘दादा’ बन सकते हैं| ‘अखंडता’ का सिद्धांत वह होता है, जिनके बातों, नीतियों एवं व्यवहारों में समानता रहता है| अमेरिका इस सिद्धान्त पर विश्वसनीय नहीं माना जाता है| चीन विज्ञान एवं तकनीक के साथ साथ अपने ‘न्यायिक चरित्र’ और अपनी ‘अखंडता’ के नीतियों के कारण निकट -भविष्य में विश्व के व्यवस्था में ‘प्रथम’ स्थान पर आ रहा है| चीन की इसी उभरती अवस्था के कारण अमेरिका अब बौखलाया हुआ है, जिसकी परिणति आज विश्व में दिख रहा है|

यदि आपको भी ‘दादा’ बनना है, तो अपनी बौद्धिकता बढाइए| बौद्धिकता बढ़ाने के लिए अपने ‘वैश्विक दृष्टिकोण’ में विज्ञान और वैज्ञानिक विधियों का उपयोग कीजिए| कोई और विकल्प कारगर नहीं है| आधुनिक युग में, कोई दैवीय या धार्मिक सत्ता किसी को ‘दादा’ नहीं बना सकता है| यदि किसी को  दैवीय या धार्मिक सत्ता स्थापित करना है, तो अपने विरोधियों की बौद्धिकता को कमतर कीजिए|

आचार्य प्रवर निरंजन जी

अध्यक्ष, भारतीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान|

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

अमेरिका 'दादागिरी' क्यों करता है?

आजकल फिर अमेरिका ‘दादागिरी’ कर रहा है| सवाल यह है कि अमेरिका ‘दादागिरी’ क्यों करता है? ‘दादागिरी’ करने के लिए क्या क्या गुण या क्या क्या क्ष...