बुधवार, 24 जून 2026

विचार एक जीवित प्राणी है

भारत में एक कथानक है – ‘महाभारत’| इसमें पूरे भारत के शामिल होने के एक युद्ध –वर्णन है, और उसके माध्यम समाज को कई सन्देश देने का एक विशाल काव्य है| इसमें ‘पांडवों’ की एक छोटी सेना ने भारत के सबसे विशाल और भयंकर सेना को हराने में सफल हुए| इस सफलता का राज ‘सशक्त विचारों’ का प्रभाव और शक्ति थी| इन ‘सशक्त एवं संगठित विचारों’ का ही नाम ‘भगवान कृष्ण’ है| यह विचारों (Thoughts) की शक्ति थी, जिसे ‘भगवान कृष्ण’ने उत्पन्न किया और एक व्यक्ति – ‘अर्जुन’ के माध्यम उसे क्रियान्वित किया| इसीलिए हिंदी फिल्म – ‘जिंदगी और तूफ़ान’ के एक गाने में कहा गया है कि “आदमी चाहे तो तक़दीर बदल सकता है, वो पूरी दुनिया की तस्वीर बदल सकता है; आदमी ‘सोच’ (विचार) तो ले कि उसका इरादा क्या है?”

यह सही कहा गया है कि जब उपयुक्त समय आता है, तो एक ‘विचार’ दुनिया समस्त सेनाओं की संयुक्त शक्ति को भी पराजित कर देता है| लेकिन शायद ऐसा कोई उपयुक्त समय आता हो, या नहीं भी आ सकता है| कहने का तात्पर्य यह है कि कोई भी ‘उपयुक्त’ (Suitable) समय नहीं आता है, लेकिन ‘उपयुक्त’ और ‘समुचित’ (Appropriate) “विचार’” तो उत्पन्न किया ही जा सकता है, जो पूरी दुनिया को बदल सकता है| यह विचारों की शक्ति और प्रभाव है|इसीलिए "उपयुक्त और समुचित विचार" बनाना अनिवार्य होता है। 'रटे' हुए (Rote) और किताबों की "बासी" (Stale) विचार उतने कारगर नहीं होते हैं, जितने नए और कारगर की आवश्यकता होती है। आज़ इन्हीं बासी और किताबों की पुरानी बातों के कारण समस्याएं यथावत है।

 ‘विचार’ केवल ‘मन’ (Mind) का उत्पाद नहीं होता है, बल्कि यह ‘ऊर्जा’ (Energy) का एक स्वरूप होता है| या कहे कि यह ‘उर्जा’ का एक विशिष्ट संयोजन एवं विन्यास का ‘आव्यूह’ (Matrix) होता है| चूँकि ‘विचार’ ‘उर्जा’ का एक स्वरुप है, इसीलिए इसमें ‘कम्पन’ (Vibration) होता है| ज्ञात है कि ब्रह्माण्ड मौलिक स्वरुप में ही ‘क्षेत्र –बल’ (Field –Force) से निर्मित है और इसी ‘क्षेत्र –बल’ से ‘पदार्थ’, ‘ऊर्जा’, समय’ एवं ‘आकाश’ (Space) यानि ‘स्थान’ बना है| जैसे कोई प्राणी जन्म लेता है, विकसित होता है, प्रभाव डालता है और सन्दर्भ से बाहर होते ही मर भी जाता है| इसी तरह, ‘विचार’ भी जन्म लेता है, विकसित और समृद्ध होता है, अपनों एवं दूसरों पर प्रभाव डालता है और सन्दर्भ से बाहर होते ही धीरे धीरे मर भी जाता है|

एक विचार किसी व्यक्ति के मन में जन्म लेता है| वह व्यक्ति अवश्य ही संवेदनशील और जिज्ञासु होगा| वह सिर्फ सूचनाओं से पूर्ण ‘ज्ञानी’ नहीं होगा, अपितु वह ‘कल्पनाओं’ (Imagination) की उड़ान भरने वाला व्यक्ति होगा| ‘ज्ञान’ (Knowledge) तो किसी सीमा तक सीमित होता है, उसकी कुछ निश्चित बाध्यताएँ हो सकती है, लेकिन “कल्पनाओं की उड़ान” में तो ब्रह्माण्ड भी बाधक नहीं बनती है| इसीलिए हर ‘संवेदनशील’ और ‘जिज्ञासु’ व्यक्ति ‘विचारक’ होने के कारण ‘आविष्कारक’ और ‘खोजी’ होता है| ‘संवेदना’ और ‘जिज्ञासा’ ही वह बीज है, जो ‘विचार’ और ‘उसके कर्म’ को जन्म देता है, विकसित और समृद्ध करता है, और पूरी दुनिया को बदल देने की क्षमता रखता है|

व्यक्ति का ‘आत्म’ (Self, आत्मा नहीं) उसके ‘मन’ (Mind) और ‘चित्त’ (Spirit) से बना होता है, और इसकी सम्पूर्ण संरचना  ऊर्जा से निर्मित होती है| ‘मन’ ही ‘विचारों’ का उत्पादन, संयोजन, संश्लेषण एवं भण्डारण करता है| ‘विचार’ मन की ऊर्जा की उत्पन्न लहरों का प्रवाह है, जो ‘चित्त’ और ‘मोद्युलेटर’ (Modulator) ‘मस्तिष्क’ (Brain) एवं ‘शरीर’ (Body) को प्रभावित करता रहता है| ‘चित्त’ ही ‘भावनाओं’ (Emotions) का उत्पादन, संयोजन, संश्लेषण एवं भण्डारण करता है, और यही ‘अनन्त प्रज्ञा’ (Infinite Intelligence) के अनन्त ‘क्षेत्र –बल’ (Infinite Field –force) से संपर्क करा कर उस व्यक्ति को ‘अंतर्ज्ञान’ (Intuition) उपलब्ध कराता रहता है| मन और चित्त को ‘आवश्यक ऊर्जा’ उस व्यक्ति के शरीर के प्रत्येक कोशिकाओं के क्रोमोजोम्स उपलब्ध कराता रहता है|

आधुनिक न्यूरो -विज्ञान बताता है कि हर ‘विचार’ के साथ ‘न्यूरान्स’ (Nurones) के बीच ‘विद्युत एवं रासायनिक संकेत’ (Electro –Chemical Signals) उत्पन्न होता है| स्पष्ट है कि हर ‘विचार’ उर्जात्मक घटना है, जो ‘ऊर्जा’ से उत्पन्न होकर ‘ऊर्जा’ में ही समाप्त हो जाती है| इस तरह यह विचार उत्पन्न होती है, विकसित होती है, समय एवं सन्दर्भ के साथ अनुकूलित होती है, गमन (यात्रा) करती है, प्रभाव डालती है, समाप्त (मृत्यु प्राप्त करना) भी हो जाती है और ‘जीवितता’ (जीवित प्राणी) की तरह व्यवहार करती होती है|

‘मन’ कोई अभौतकीय (Non –Materialistic) ‘उड़नखटोला’ ही नहीं होता है| यह भौतिक जगत की ‘वास्तविकता’ होती है; और ‘विचार’ उसका प्रतिविम्ब (Reflection) होता है| इसीलिए “आर्थिक साधन और शक्तियाँ” ही समकालिक शक्तियाँ होती है, जो ‘इतिहास’ के पन्नों में “ऐतिहासिक शक्तियाँ’ कहलाती  है और इतिहास को बदलता रहता है| इन्हीं ‘विचारों’ का ‘द्वन्द’ (Conflict) ही ‘विचारों’ का संश्लेषण, सम्वर्धन और विकासपरक बनाता है| ‘समय’, ‘समाज’ और ‘प्रकृति’ तत्क्षण बदलता रहता है और ‘समायोजन’ एवं ‘अनुकूलन’ में हर विचार को संशोधित और परिमार्जित होना होता है, या समाप्त हो जाना होता है| ‘समय’, ‘समाज’ और ‘प्रकृति’ के तत्क्षण बदलने के क्रम में ‘विचारों’ के समायोजन एवं अनुकूलन होना ही ‘संघर्ष’ के रुप में दृश्य होता है, या अनुभव किया जाता है|

इसीलिए ‘विचार’ एक जीवित प्राणी होता है| आप भी इसको विकसित कीजिए, इसे पालिए – पोशिए और अपनी दुनिया को बदल डालिए|

आचार्य प्रवर निरंजन जी

अध्यक्ष, अन्तर्राष्ट्रीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान|

बुधवार, 17 जून 2026

बुद्ध बुद्धि में हैं, धर्म में नहीं

अकसर लोग बुद्ध के धर्म अर्थात बौद्ध –धर्म की बात करते हैं, जबकि यह बुद्ध के नाम पर माध्य काल के कुछ लोगों ने इसे बनाया है| बुद्ध ने जीवन दर्शन यानि जीवन जीने का वैज्ञानिक एवं मानवतावादी सिद्धान्त दिया है, कोई धर्म नहीं दिया है| हर धर्म में, कुछ या अधिक, ढोंग, पाखण्ड, अंधविश्वास और कर्मकांड अवश्य होगा, और इसके बिना कोई धर्म हो ही नहीं सकता है| कोई भी ऐतिहासिक व्यक्ति सामाजिक, सांस्कृतिक और चेतना की समझ और विकास का क्रान्तिकारी अग्रदूत होता है| ऐसे लोग विचारक और आध्यात्मिक होने के कारण ज्ञानी और मार्गदर्शक अवश्य होता है, अन्यथा वह ऐतिहासिक होगा ही नहीं| मध्य काल में इन्हीं ऐतिहासिक अग्रदूतों के नाम पर उनके जीवन दर्शन यानि जीवन जीने का वैज्ञानिक एवं मानवतावादी सिद्धान्तों को “समकालिक” (Contemporary) बनाया गया| यह “समकालिक” होने की प्रक्रिया आगे भी होती रही और आज भी हो रही है|

हर ऐतिहासिक व्यक्ति सामाजिक, सांस्कृतिक और चेतना की समझ और विकास का एक निश्चित, प्रगतिशील और स्पष्ट जीवन दर्शन रखता है| यह जीवन दर्शन उस क्षेत्र और उस काल के लोगों को सरल, सामान्य, सहज, और प्रगतिशील जीवन जीने के लिए एक स्पष्ट प्रारुप देता है| इस प्रगतिशील दर्शन को सभी अपनी अपनी समझ के अनुरुप समझता और अनुपालन करता है| स्पष्ट है कि यह सब जीवन दर्शन उस स्थान के भूगोल, उसके इतिहास एवं संस्कृति, लोगों की समझ और उन परिस्थितियों के सापेक्ष होता है|

भारत में विशिष्ट, भिन्न और उच्चतर बुद्धि की परम्परा रही है, और प्राचीन भारत के इस परम्परा (स्कूल) में कोई सौ से अधिक परम्परा बताई जाती है| भारत में बुद्धि की मुख्य धाराओं में कोई 28 लोगों को “बुद्धत्व” की उपाधि प्राप्त हुई, जिन्हें ‘बुद्ध’ कहा जाता रहा| सिद्धार्थ गोतम उनमे अंतिम और 28वे ‘बुद्ध’ बताए जाते हैं| ध्यान रहे कि गोतम को बोधगया में एक लम्बी साधना के बाद “बुद्धत्व” की प्राप्ति हुई थी| स्पष्ट है कि यह “बुद्धत्व” पहले से ही ‘बुद्धि’ की एक विशिष्ट और उच्चतर अवस्था की उपाधि रही होगी| दुनिया के तमाम मार्गदर्शकों की तरह बुद्धों ने भी यहाँ के लोगों को जीवन जीने के लिए और मानवता की निरन्तरता की व्यवस्था के लिए जीवन –दर्शन दिए| लेकिन उसने किसी ने कोई धर्म को स्थापित नहीं किया|

भारत में ज्ञात ऐतिहासिक व्यक्तियों में बुद्धों की परम्परा सबसे पुरानी है, जो सभ्यता और संस्कृति के प्रारम्भिक काल से शुरु होना स्थापित है| बुद्ध ने “धम्म” का दर्शन दिया, जो सभी मानवों का प्रगतिशील जीवन दर्शन है| इस ‘जीवन –दर्शन’ या ‘वैज्ञानिक जीवन –सिद्धांतों’ में उस समय का वर्तमान, प्राचीन काल के अनुभव और मानवता का भविष्य समाहित किये हुए था| इसमें मानव, परिवार, समाज, प्रकृति और मानवता सहित भविष्य की निरन्तरता की व्यवस्था सुनिश्चित है|

वर्तमान सभी ‘धर्म’ इसी “धम्म” की ‘स्थानीय’ और ‘समकालिक’ (Contemporary) व्याख्या है| सभी धर्मों में मानवता और मानवता का भविष्य समाहित होता है| ‘स्थानीय’’ से तात्पर्य स्थानिक भौगोलिक धरातल, उसकी जलवायु, वहाँ की संस्कार एवं संस्कृति आदि आदि शामिल होता है| इसी तरह, ‘समकालिक होना’ किसी भी इतिहास को वर्तमान में समझने का एक महत्वपूर्ण उपकरण (Tool) है| इस ‘अवधारणा’ के बिना किसी भी इतिहास को समुचित एवं वैज्ञानिक ढंग से नहीं समझा जा सकता है| इतिहास के सारे भ्रम इसी ‘अवधारणा’ की समझ के अभाव में उत्पन्न होते हैं|

‘धम्म’ के इसी’ प्रकाश’ यानि इन्हीं ‘ज्ञान’ के कारण इस भौगोलिक भू –भाग को ‘आभा’ (Aura’ Light) से ‘रत’ (Full) माना जाता रहा| इस क्षेत्र का नाम “भारत” इसी ‘आभा’ एवं ‘रत’ शब्दों से बना है| इसी प्रभाव से इस क्षेत्र के समस्त भौगोलिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और भाषाई पहचान स्थापित हुआ है| मैं सिर्फ इतिहास की बात कर रहा हूँ और किसी भी मिथकों का प्रसंग नहीं लिया है|

चूँकि सभी इतिहास की समुचित एवं वैज्ञानिक व्याख्या ‘समकालिक होने’ की अवधारणा से होती है, और वर्तमान सभी धर्मों का भी एक ‘इतिहास’ है, इसीलिए वर्तमान सभी धर्मों की उत्पत्ति और उद्विकास की व्याख्या भी यही ‘समकालिक होने’ की अवधारणा करता है| वर्तमान सभी धर्मों का ग्रन्थ, जिसमे उनके प्राचीनतम प्रमाणिक ग्रथ भी शामिल हैं, सिर्फ कागज पर ही उपलब्ध हैं| अर्थात इन सभी का वर्तमान स्वरुप में सम्पादन एवं व्याख्या कागज के आविष्कार होने और उनके उन क्षेत्रों में प्रचालन में आने के बाद का ही मानना वैग्यमिक, तर्कसंगत और व्यवहारिक है| कागज का आविष्कार चीन में प्राचीन काल के अंतिम काल में बताया जाता है और उसका वैश्विक प्रचलन मध्य काल में बताया जाता है| मतलब कागज पर सभी उपलब्ध धार्मिक ग्रन्थ मध्य काल में सम्पादित है| अर्थात सभी उपलब्ध धार्मिक ग्रन्थ अपने सम्पादन काल के “समकालिक” हैं|

ज्ञात है कि मध्य काल की दुनिया वर्तमान एशिया और यूरोप तक ही सीमित थी; उस समय का अफ्रीका भूमध्य सागरीय तट तक सीमित था और अफ्रिका का भीतरी भाग, अमेरिका (दोनों), आस्ट्रेलेशिया आदि कई भू भाग व्यवस्थित व्यवस्था से बाहर यानि अज्ञात थी| पूरा मध्य काल “सामन्तवाद की शक्तियों” से नियमित, निदेशित एवं संचालित था|, इसलिए ये सभी क्षेत्र भी “सामन्तवाद की शक्तियों” के सञ्चालन में था| यदि कोई व्यक्ति इन “ऐतिहासिक शक्तियों और उनकी क्रियाविधियों” को नहीं समझता है. तो ‘इतिहास’ की उसकी ‘समझ’ अधूरी. अवैज्ञानिक और अपूर्ण है; इसे स्थिर होकर समझ लें|

मध्य काल में उदित और विकसित इन ‘ऐतिहासिक सामन्ती शक्तियों’ ने तत्कालीन सम्पूर्ण वैश्विक व्यवस्था को ‘जड़’ यानि ‘गतिहीन’ कर दिया| इसका वैश्विक प्रभाव उस समय के सामाजिक. सांस्कृतिक, आर्थिक, धार्मिक, राजनीतिक सहित सम्पूर्ण व्यवस्था और मानसिकता पर पडा और प्रभावित हुआ| इन ‘ऐतिहासिक सामन्ती प्रभाव’ में मानव का ‘धाम’ यानि ‘धर्म’ को भी ‘जड़’ यानि ‘गतिहीन’ हो जाना पडा, जिसका स्वरुप आज भी विकासशील और अविकसित संस्कृतियों में सहज परिलक्षित होता है| विकसित अर्थव्यवस्था के राष्ट्रों ने अपने संस्कारों, संस्कृतियों एवं मानसिकताओं से उन ऐतिहासिक सामन्ती प्रभावों को हटाने या न्यून करने में सफल रहा|   

जिन लोगों की समझ और मानसिकता इतनी उच्चतर स्तर पर विकसित नहीं हुई है कि वे किसी भी ‘धर्म के अफीम’ (कार्ल मार्क्स) के बिना अपना सामान्य सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन नहीं जी सकते हैं, वैसे लोग किसी भी वैज्ञानिक और व्यवहारिक जीवन पद्धतियों एवं सिद्धान्तों को ही धर्म के स्वरुप में मानने को विवश होते हैं| ‘बौद्ध –धर्म’ के साथ भी यही व्याख्या मानी जा सकती है, लेकिन बुद्ध तो बौद्धिकता के प्रकाश –स्तम्भ थे, मार्गदर्शक थे| यही इतिहास है, यही तथ्य है और यही सत्य है|

आचार्य प्रवर निरंजन जी

अध्यक्ष, अन्तर्राष्ट्रीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान|

सोमवार, 15 जून 2026

उच्चतर बौद्धिकता की चिन्तन -कला

उच्चतर बौद्धिकता को प्राप्त करने का अवश्य ही कोई निश्चित एवं प्राकृतिक 'विज्ञान', या 'कला', या इन दोनों का समन्वित स्वरुप होगा| उच्चतर बौद्धिकता को प्राप्त करने का एक निश्चित आधार होगा, जो एक तरीका, विधि या प्रक्रिया होगा| कोई भी वर्तमान मानव इन्ही तरीकों, विधियों यानि प्रक्रियायों को जान कर, समझ कर और अपना कर उच्चतर बौद्धिकता को प्राप्त कर सकटा है| यहाँ हमलोग उन्हीं का सूक्षमता से विश्लेषण एवं मूल्यांकन करेंगे|

किसी को उच्चतर बौद्धिकता किसी दैवीय कृपा, या कोई प्राकृतिक संयोग, या किसी आनुवंशिक धरोहर के रुप में नहीं मिलता है| ऐसा कहने का मेरा क्या आधार है, पहले इसे समझते हैं| चूँकि इस धरती के सभी वर्तमान मानव एक ही मानव झुण्ड या समूह की संतान हैं इसीलिए इन सभी की जैवकीय क्षमता एक समान है| हम जानते हैं कि एक मानव और एक चिम्पाजी में जीनीय गुणों में समानता लगभग 99.99% की है, इसी कारण इस धरती पर मौजूद सभी मानवों में जीनीय आधार पर कोई भिन्नता हो ही नहीं सकती| लेकिन सभी मानवों में बहुत कुछ भिन्नता दिखती होती है| हम यह भी जानते होते हैं कि जीनीय आधार के दो स्वरुप होते हैं – एक, 'फीनोटाइप' और दूसरा, 'जीनोटाइप'| सभी मानवों में जो बहुत कुछ भिन्नता दिखती होती है, वह 'फीनोटाइप' जीनों के कारण होती है, जो ऐतिहासिक काल में भौगोलिक अनुकूलन के परिणाम हैं| लेकिन सभी मानवों में जो समानता यानि एकरुपता होती है, वह 'जीनोटाइप' होता है| और इसी समानता के कारण विश्व के सभी मानव एक दूसरे विपरीत लिंगी के साथ प्रजनन कर सकते हैं और अपना वंश वृद्धि कर सकते हैं| कहने का तात्पर्य है कि किसी को उच्चतर बौद्धिकता किसी दैवीय प्रभाव, या किसी संयोग, या किसी आनुवंशिक धरोहर के रुप में नहीं मिलता है, बल्कि कोई भी इस विधा को सीख कर उसे विकसित कर सकता है|

यह उच्चतर बौद्धिकता किसी परम्परागत एवं ‘रटन्त सीखने’ (Rote Learning) की प्रक्रिया का परिणाम नहीं होता है| यह सदैव ही एक ख़ास, अलग, भिन्न और विशिष्ट चिन्तन की प्रक्रिया (Process) या प्रतिरुप (Pattern) का परिणाम होता है| इन प्रक्रियायों का ‘आधार –तत्व’ (Foundation -Elements) भी अलग और नया हो सकता है, जिसका प्रयोग या उपयोग इन मामलों में आज तक किसी ने नहीं किया हो| अल्बर्ट आइन्स्टीन ने एक बार ‘पागलपन’ की अवधारणा को इस तरह स्पष्ट किया – "किसी काम को एक ही तरीके से बार बार करना और उसका एक अलग परिणाम की आशा करना है"| इसीलिए किसी भी अलग और भिन्न परिणाम के लिए ‘आधारभूत’ तत्वों को बदलना अनिवार्य हो जाता है|  

यदि आज तक किसी समस्या का समाधान नहीं हो पाया है, इसका स्पष्ट अर्थ यह है कि आज तक किसी ने उन समस्यायों के मूलभूत तत्वों को सही तरीके से और सही यथास्थिति में नहीं समझा है, चाहे आप उन समस्यायों के सम्बन्ध में किन्ही का नाम ले लें| कोई भी समस्याएँ आज इसीलिए बनी हुई हैं, क्योंकि आज तक कोई भी उसका वास्तविक, व्यवहारिक और सटीक समाधान नहीं खोजा है| उन समस्यायों का वास्तविक, व्यवहारिक और सटीक समाधान नहीं होने के कारणों में कुछ लोग किसी की नैतिकता, या एकजुटता, या संसाधन, या समर्पण, या योग्यता के अभाव की बातें करते हैं, जो बचकानी होती है| दरअसल ये उन सिद्धान्तों की मूलभूत कमी होती है| उन स्थापित महापुरुषों ने अपनी योग्यता, क्षमता, और समर्पण तो किया था, लेकिन वे भी उन समस्यायों की वास्तविक और सम्पूर्ण 'जड़ों' तक  नहीं पहुँच सके, और इसीलिए उसका समाधान उन्हें नहीं मिल सका|

इतिहास में किसी भी विषय -क्षेत्र के महान व्यक्ति सदैव किसी समस्या को 'शून्यता' (Nil) की अवस्था से समझना शुरु किया, और तभी वे सफल हो पाए| इसे मौलिक तरीके देखना और सोचना कहते हैं| इसे ही “आउट-आफ- बॉक्स चिन्तन” (Out -of –Box Thinking) कहते हैं| पुरानी ‘मान्यताओं’ (Assumptions) और ‘आधारों’ (Basics) को बदल देना ही “पैरेड़ाईम शिफ्ट” (Paradigm Shift)  कहलाता है| यही ‘बदलावों’ के क्रान्तिकारी परिणामों का आधार होता है| किसी भी चीज को ‘शून्यता’ से देखना और उसके ‘मूलभूत सिद्धांतों’ (Fundamental Principles) को समझना अनसुलझे समस्यायों का समाधान दे सकता है, लेकिन परम्परागत आधार और तरीके तो निश्चितया आपको वहीं पहुँचाएँगे, जहाँ वे आपको पहले भी पहुँचाते रहे हैं|

किसी चीज या विषय –वस्तु को यथास्थिति में समझने के लिए उस चीज या विषय –वस्तु पर ठहर जाना होता है, इससे वह उस विषय –वस्तु की गहराइयों में उतर पाता है| उसकी गहराइयों में उतरने से उनकी ‘जड़ों’ को यथास्थिति में स्पष्टता से देख और समझ पाता है| हर ‘घटना’ के पीछे ‘कारण’ होता है, और हर ‘कारण’ के पीछे एक ‘गहरा कारण’ (Root Cause) होता है| तब वह उन समस्यायों को ‘जड़’ से नष्ट करने में सक्षम हो  सकता है| यह स्थिति उस विषय पर ‘ध्यान’ करने यानि उस चीज या विषय –वस्तु पर अपने चिन्तन को स्थिर करने से आता है|

सभी विषय या स्थिति पर ‘संशय’ करना ही बौद्धिकता को उच्चतर अवस्था में ले जाता है| ‘संशय’ करना यानि ‘प्रश्न’ खड़ा करना ही उच्चतर बौद्धिकता का आधार है| साधारण व्यक्ति उत्तर खोजता है और उच्चतर बौद्धिकता वाले ‘विशिष्ट प्रश्न’ खोजते हैं कि इसके पीछे कौन से ‘शक्तियाँ’ (Forces) कार्यरत हैं? किसी विषय या समस्या को कई दृष्टिकोणों से विश्लेषण एवं मूल्याकन आवश्यक हो जाता है, ताकि उसके मूल तत्वों, इसकी उत्पत्ति और उसके उद्विकास को समझा जा सके|

किसी को किसी ‘ज्ञान’ की निश्चिन्तता या सम्पूर्णता को बोध या विश्वास उसे उस काल में रख देता है, जिस काल में वह ज्ञान विकसित या स्थापित हुआ था; और वह ज्ञान ‘ठहरे हुए पानी’ की तरह आज के सन्दर्भ में ‘सड़ गया’ (Rotten) होता है| वह ‘ज्ञान’ अवश्य ही आज से दशक या शतक या शतकों पुराना होगा| किसी भी समस्या, चाहे वह वैज्ञानिक हो, या सामाजिक हो. या सांस्कृतिक हो, या आर्थिक हो, या राजनीतिक हो, या मनोवैज्ञानिक हो, आज से दशक या शतक या शतकों पुराना ‘ज्ञान’ उसे पूर्ण समाधान या स्पष्ट समाधान नहीं दे सकता है| इसलिए यदि कोई उच्चतर बौद्धिकता चाहते हैं, तो उन्हें गैर परम्परागत आधार से, यानि शून्य से शुरु करना होगा|

अल्बर्ट आइन्स्टीन के अनुसार ‘ज्ञान’ और ‘विज्ञान’ केवल सूचनाओं का संग्रहण नहीं होता है| इनके अनुसार “सिद्धान्त” मानव बुद्धि की कल्पनाओं की रचनात्मक उड़ान से निकलती है, जिसे बाद में ‘तर्क’ और ‘तथ्य’ से जाँचे –परखे जाते हैं| बुद्धि का विकास इन्ही कल्पनाओं के आधारों पर हुआ है|

इसीलिए कोई भी उच्चतर बौद्धिकता का स्तर पाने के लिए और अभी तक के उनसुलझे समस्यायों के निश्चित समाधान पाने के लिए उपरोक्त आधारों और बातों पर गंभीरता से विचार करे|  

आचार्य प्रवर निरंजन जी

अध्यक्ष, अन्तर्राष्ट्रीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान|

शुक्रवार, 12 जून 2026

एक आदमी कब कब मरता है?

सवाल यह है कि एक आदमी कब कब मरता है? एक आदमी एक साथ दो जीवन जीता है, -एक निम्नतर जीवन, जिसे ‘पशुवत जीवन’ (Animalistic Life) कहते हैं, और दूसरा, ‘उच्चतर जीवन’, जिसे ‘मानवीय जीवन’ (Human Life) कहते हैं| ‘पशुवत जीवन’ से तात्पर्य उसके मात्र जैवकीय यानि ‘भौतिक जीवन’ से है| इस ‘पशुवत जीवन’ को ‘शारीरिक जीवन’ भी कह सकते हैं| यह ‘शारीरिक जीवन’ ही किसी का भी ‘बौद्धिक जीवन’ यानि ‘मानसिक’, ‘भावनात्मक’ और ‘आध्यात्मिक’ जीवन को आधार देता है| चूँकि यह ‘शारीरिक जीवन’ ही किसी का भी ‘मानसिक’, ‘भावनात्मक’ और ‘आध्यात्मिक’ जीवन को आधार देता है, इसीलिए इसके अस्तित्व को बनाए रखना सभी के लिए अनिवार्य होता है| स्पष्ट है कि ‘जैवकीय’ यानि ‘शारीरिक’ यानि ‘भौतिक’ रुप से मर जाना अन्तिम बार यानि निर्णायक रुप मर जाना होता है| इसमें सभी जैवकीय प्रक्रियाएँ समाप्त हो जाती है| यह सभी के लिए होता है, जो जन्म लेता है|

लेकिन एक आदमी इस निर्णायक मृत्यु से पहले भी मरता है, या मरता रह सकता है| यह मृत्यु अस्थायी भी हो सकती है, या स्थायी भी हो सकती है, या यह ‘आंशिक’ भी हो सकती हैं| अपनी क्षमता या उत्पादकता का ‘आंशिक’ उपयोग या योगदान करना ही ‘आंशिक मृत्यु’ होता है| यह अवस्था पशुओं या ‘पशुवत जीवनों’ के लिए नहीं होता है| जिनमें ‘बौद्धिक’ जीवन यानि ‘मानसिक’, ‘भावनात्मक’ और ‘आध्यात्मिक’ जीवन नहीं होता है, वे दरअसल ‘आदमी’ होते ही नहीं हैं, वे सभी क्षमता से युक्त ‘पशु’ ही होते हैं; और हमलोग उनकी बात भी नहीं कर रहे हैं| इन सभी क्षमता से युक्त ‘पशुओं’ को आदमी बनाने की जबाबदेही से कोई मानव समाज या व्यवस्था ‘मुक्त’ नहीं हो सकता है|

‘मानवीय जीवन’ से तात्पर्य उसके ‘वैचारिक जीवन’ या ‘बौद्धिक जीवन’ से है| यह ‘बौद्धिक जीवन’ उसके ‘मानसिक’, ‘भावनात्मक’ और ‘आध्यात्मिक’ प्रक्रिया का परिणाम होता है| एक आदमी सांस लेता रह सकता है, हाथ –पैर हिलाता रह सकता है, कुछ धन कमाता रह सकता है और मुँह चलाता रह सकता है, लेकिन यदि वह ‘संवेदना से शून्य’ हो गया, तो वह वास्तव में मर गया होता है| वैसे ‘संवेदना से शून्य’ कोई जीव नहीं हो सकता है, ‘संवेदना से शून्य’ होना ही मृत्यु कहलाता है| लेकिन कोई पशु यदि आदमी बना है, तो उसमे उसके समाज का योगदान अवश्य ही होगा; अन्यथा वह लेखक रूडयार्ड किपलिंग के ‘द जंगल बुक’ का प्रसिद्ध पात्र “मोगली” ही होता और अन्य पशुओं के साथ ही एक पेड़ से दूसरे पेड़ों में छलांग लगाता हुआ होता| इसीलिए यदि कोई आदमी, यदि वह वास्तव में आदमी ही है, तो वह वास्तव में ‘समाज के प्रति संवेदना से शून्य’ हो ही नहीं सकता|

‘संवेदना’ से ही 'जिज्ञासा' उत्पन्न होता है| ‘जिज्ञासा’ के बिना बुद्धि धार –हीन हो जाता है, ठंडा पड़ जाता है| और विनम्रता के बिना ज्ञान भी खतरनाक हो जाता है| सबसे बुद्धिमान व्यक्ति वे लोग होते हैं, जो किसी भी विषय पर अन्तिम रुप से ‘निश्चिन्त’ नहीं होते हैं| किसी की ‘संवेदना’ और ‘जिज्ञासा’ उसे किसी भी विषय पर अन्तिम रुप से ‘निश्चिन्त’ नहीं होने दे सकता है| तो कोई भी ‘जिन्दा आदमी’ व्यक्ति, परिवार, समाज, मानवता और प्रकृति के प्रति ‘अपनी संवेदना’ और ‘जिज्ञासा’ को शांत होने ही नहीं दे सकता| यही तो एक पशु को आदमी बनाया है| मानव के बुद्धि के उद्विकास का आधार भी यही है|

बुद्धिमान व्यक्ति वे होते हैं, जो किसी भी ‘अस्तित्व’ के प्रति विस्मय रखते हैं। जिस क्षण कोई यह मान लेता है कि अब और सिखने को कुछ नहीं बचा है, वह उसी समय मर जाता है| जिस क्षण किसी को लगता है कि अब कोई प्रश्न करने का स्थान नहीं है, तब ही उसके जीवन का रंग धूमिल होने लगता है| भारत में अधिकाँश लोग किताबों के ज्ञान से ऊपर निकल ही नहीं पाते हैं, और वे किताबें भी दशकों या शतकों पुरानी तथ्यों या विचारों से भरी पड़ी होती है| अधिकतर लोग उसे ही अन्तिम ज्ञान समझ लेते हैं और निश्चिन्त हो जाते हैं| भारत में ज्ञान के स्तर को उसके पद, या उपाधि, या उसके धन से भी मापा जाता है| कई लोग तो ऐसे मिलेंगें, जो किसी तकनिकी विशेषज्ञ के पद पर रहे होते हैं, तो इसी के आधार पर वे अपने को सर्व ज्ञानी समझते होते हैं| दरअसल ये लोग ‘संवेदना’ और ‘जिज्ञासा’ से शून्य होने के कारण ही पुरानी किताबों की बातों तक सीमित होकर सर्वज्ञानी होने का ‘आत्ममुग्धता’ रखते हैं|    

इसीलिए एक ‘जिन्दा आदमी’ सदैव ही समाज, मानवता, प्रकृति और ‘मानवता के भविष्य’ के प्रति ‘संवेदना’ और ‘जिज्ञासा’ रखता है| उसके जीवन के उद्देश्यों में यही समाज, मानवता, प्रकृति और ‘मानवता के भविष्य’ के कल्याण समाया रहता है| और उसके लिए वह सदैव ही ‘संवेदना’ और ‘जिज्ञासा’ रखता है| इसके लिए उसे अपने ‘आत्म’ (Self) को अनन्त प्रज्ञा से भी सम्बन्ध बनाना पड़ता है| इस प्रक्रिया में किसी बिंदु पर, यानि किसी विषय के किसी ख़ास अंश पर ठहर जाना होता है| इसे ही ‘ध्यान’ लगाना कहा जाता है|

जब कोई किसी बिंदु पर, यानि किसी विषय के किसी ख़ास अंश पर ठहर जाता है, तब वह उन गहराइयों में उतर जाता है या उन ऊँचाइयों पर पहुँच जाता है, तब वह उसके जड़ों को या उसके विभिन्न पहलुओं को बड़ी सूक्ष्मता और व्यापकता से समझ पाता है| किसी बिंदु पर ठहर जाने से ही उस व्यक्ति का आत्म, यानि उसका ‘मन’ एवं ‘चित्त’ अनन्त प्रज्ञा से सम्बन्ध स्थापित कर पाता है और उसके लिए अनन्त प्रज्ञा से अन्य विशिष्ट एवं अज्ञात जानकारी पाने में सक्षम हो पाता है| ‘अंतर्ज्ञान’ (Intuition) बौद्धिकता के विकास के लिए अति महत्वपूर्ण होता है और यह किसी बिन्दु पर ठहर जाने से ही हो सकता है| सम्बन्धित साक्ष्य, तथ्य और तार्किकता बाद में आता रहता है, और उसे सही साबित कर सकता है| अल्बर्ट आइन्स्टीन के दोनों सापेक्षिता के सिद्धांतों के आने के कोई एक शताब्दी बाद तक, यानि अभी भी उससे सम्बन्धित साक्ष्य, तथ्य और तर्क प्राप्त हो रहे हैं|

दुनिया के तमाम विषयों के वैज्ञानिक या सामाजिक, सांस्कृतिक या आर्थिक विशेषज्ञ इन्ही विधिओ का उपयोग कर ही मानवता का कल्याण कर पाए| इसीलिए ये लोग अपनी शारीरिक मृत्यु के बाद भी आज ज़िंदा हैं|

आचार्य प्रवर निरंजन जी

अध्यक्ष, अन्तर्राष्ट्रीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान|

विचार एक जीवित प्राणी है

भारत में एक कथानक है – ‘महाभारत’| इसमें पूरे भारत के शामिल होने के एक युद्ध –वर्णन है, और उसके माध्यम समाज को कई सन्देश देने का एक विशाल काव...