सवाल
यह है कि एक आदमी कब कब मरता है? एक आदमी एक साथ दो जीवन जीता है, -एक निम्नतर
जीवन, जिसे ‘पशुवत जीवन’ (Animalistic Life) कहते हैं, और दूसरा, ‘उच्चतर जीवन’,
जिसे ‘मानवीय जीवन’ (Human Life) कहते हैं| ‘पशुवत जीवन’ से तात्पर्य उसके मात्र जैवकीय
यानि ‘भौतिक जीवन’ से है| इस ‘पशुवत जीवन’ को ‘शारीरिक जीवन’ भी कह सकते हैं| यह ‘शारीरिक
जीवन’ ही किसी का भी ‘बौद्धिक जीवन’ यानि ‘मानसिक’, ‘भावनात्मक’ और ‘आध्यात्मिक’
जीवन को आधार देता है| चूँकि यह ‘शारीरिक जीवन’ ही किसी का भी ‘मानसिक’, ‘भावनात्मक’
और ‘आध्यात्मिक’ जीवन को आधार देता है, इसीलिए इसके अस्तित्व को बनाए रखना सभी के
लिए अनिवार्य होता है| स्पष्ट है कि ‘जैवकीय’ यानि ‘शारीरिक’ यानि ‘भौतिक’ रुप से
मर जाना अन्तिम बार यानि निर्णायक रुप मर जाना होता है| इसमें सभी जैवकीय
प्रक्रियाएँ समाप्त हो जाती है| यह सभी के लिए होता है, जो जन्म लेता है|
लेकिन
एक आदमी इस निर्णायक मृत्यु से पहले भी मरता है, या मरता रह सकता है| यह मृत्यु
अस्थायी भी हो सकती है, या स्थायी भी हो सकती है, या यह ‘आंशिक’ भी हो सकती हैं| अपनी
क्षमता या उत्पादकता का ‘आंशिक’ उपयोग या योगदान करना ही ‘आंशिक मृत्यु’ होता है| यह
अवस्था पशुओं या ‘पशुवत जीवनों’ के लिए नहीं होता है| जिनमें ‘बौद्धिक’ जीवन यानि ‘मानसिक’,
‘भावनात्मक’ और ‘आध्यात्मिक’ जीवन नहीं होता है, वे दरअसल ‘आदमी’ होते ही नहीं हैं,
वे सभी क्षमता से युक्त ‘पशु’ ही होते हैं; और हमलोग उनकी बात भी नहीं कर रहे हैं|
इन सभी क्षमता से युक्त ‘पशुओं’ को आदमी बनाने की जबाबदेही से कोई मानव समाज या
व्यवस्था ‘मुक्त’ नहीं हो सकता है|
‘मानवीय
जीवन’ से तात्पर्य उसके ‘वैचारिक जीवन’ या ‘बौद्धिक जीवन’ से है| यह ‘बौद्धिक जीवन’
उसके ‘मानसिक’, ‘भावनात्मक’ और ‘आध्यात्मिक’ प्रक्रिया का परिणाम होता है| एक आदमी
सांस लेता रह सकता है, हाथ –पैर हिलाता रह सकता है, कुछ धन कमाता रह सकता है और मुँह चलाता रह सकता है,
लेकिन यदि वह ‘संवेदना से शून्य’ हो गया, तो वह वास्तव में मर गया होता है| वैसे ‘संवेदना
से शून्य’ कोई जीव नहीं हो सकता है, ‘संवेदना से शून्य’ होना ही मृत्यु कहलाता है|
लेकिन कोई पशु यदि आदमी बना है, तो उसमे उसके समाज का योगदान अवश्य ही होगा;
अन्यथा वह लेखक रूडयार्ड किपलिंग के ‘द जंगल बुक’ का प्रसिद्ध पात्र “मोगली” ही होता
और अन्य पशुओं के साथ ही एक पेड़ से दूसरे पेड़ों में छलांग लगाता हुआ होता| इसीलिए
यदि कोई आदमी, यदि वह वास्तव में आदमी ही है, तो वह वास्तव में ‘समाज के प्रति संवेदना
से शून्य’ हो ही नहीं सकता|
‘संवेदना’
से ही 'जिज्ञासा' उत्पन्न होता है| ‘जिज्ञासा’ के बिना बुद्धि धार –हीन हो जाता है,
ठंडा पड़ जाता है| और विनम्रता के बिना ज्ञान भी खतरनाक हो जाता है| सबसे बुद्धिमान
व्यक्ति वे लोग होते हैं, जो किसी भी विषय पर अन्तिम रुप से ‘निश्चिन्त’ नहीं होते
हैं| किसी की ‘संवेदना’ और ‘जिज्ञासा’ उसे किसी भी विषय पर अन्तिम रुप से ‘निश्चिन्त’
नहीं होने दे सकता है| तो कोई भी ‘जिन्दा आदमी’ व्यक्ति, परिवार, समाज, मानवता और
प्रकृति के प्रति ‘अपनी संवेदना’ और ‘जिज्ञासा’ को शांत होने ही नहीं दे सकता| यही
तो एक पशु को आदमी बनाया है| मानव के बुद्धि के उद्विकास का आधार भी यही है|
बुद्धिमान
व्यक्ति वे होते हैं, जो किसी भी ‘अस्तित्व’ के प्रति विस्मय रखते हैं। जिस क्षण कोई यह मान लेता है कि अब और सिखने को
कुछ नहीं बचा है, वह उसी समय मर जाता है| जिस क्षण किसी को लगता है कि अब कोई
प्रश्न करने का स्थान नहीं है, तब ही उसके जीवन का रंग धूमिल होने लगता है| भारत
में अधिकाँश लोग किताबों के ज्ञान से ऊपर निकल ही नहीं पाते हैं, और वे किताबें भी
दशकों या शतकों पुरानी तथ्यों या विचारों से भरी पड़ी होती है| अधिकतर लोग उसे ही
अन्तिम ज्ञान समझ लेते हैं और निश्चिन्त हो जाते हैं| भारत में ज्ञान के स्तर को
उसके पद, या उपाधि, या उसके धन से भी मापा जाता है| कई लोग तो ऐसे मिलेंगें, जो
किसी तकनिकी विशेषज्ञ के पद पर रहे होते हैं, तो इसी के आधार पर वे अपने को सर्व
ज्ञानी समझते होते हैं| दरअसल ये लोग ‘संवेदना’ और ‘जिज्ञासा’ से शून्य होने के
कारण ही पुरानी किताबों की बातों तक सीमित होकर सर्वज्ञानी होने का ‘आत्ममुग्धता’ रखते
हैं|
इसीलिए
एक ‘जिन्दा आदमी’ सदैव ही समाज, मानवता, प्रकृति और ‘मानवता के भविष्य’ के प्रति ‘संवेदना’
और ‘जिज्ञासा’ रखता है| उसके जीवन के उद्देश्यों में यही समाज, मानवता, प्रकृति और
‘मानवता के भविष्य’ के कल्याण समाया रहता है| और उसके लिए वह सदैव ही ‘संवेदना’ और
‘जिज्ञासा’ रखता है| इसके लिए उसे अपने ‘आत्म’ (Self) को अनन्त प्रज्ञा से भी
सम्बन्ध बनाना पड़ता है| इस प्रक्रिया में किसी बिंदु पर, यानि किसी विषय के किसी
ख़ास अंश पर ठहर जाना होता है| इसे ही ‘ध्यान’ लगाना कहा जाता है|
जब
कोई किसी बिंदु पर, यानि किसी विषय के किसी ख़ास अंश पर ठहर जाता है, तब वह उन
गहराइयों में उतर जाता है या उन ऊँचाइयों पर पहुँच जाता है, तब वह उसके जड़ों को या
उसके विभिन्न पहलुओं को बड़ी सूक्ष्मता और व्यापकता से समझ पाता है| किसी बिंदु पर
ठहर जाने से ही उस व्यक्ति का आत्म, यानि उसका ‘मन’ एवं ‘चित्त’ अनन्त प्रज्ञा से
सम्बन्ध स्थापित कर पाता है और उसके लिए अनन्त प्रज्ञा से अन्य विशिष्ट एवं अज्ञात
जानकारी पाने में सक्षम हो पाता है| ‘अंतर्ज्ञान’ (Intuition) बौद्धिकता के विकास
के लिए अति महत्वपूर्ण होता है और यह किसी बिन्दु पर ठहर जाने से ही हो सकता है| सम्बन्धित
साक्ष्य, तथ्य और तार्किकता बाद में आता रहता है, और उसे सही साबित कर सकता है|अल्बर्ट
आइन्स्टीन के दोनों सापेक्षिता के सिद्धांतों के आने के कोई एक शताब्दी बाद तक,
यानि अभी भी उससे सम्बन्धित साक्ष्य, तथ्य और तर्क प्राप्त हो रहे हैं|
दुनिया
के तमाम विषयों के वैज्ञानिक या सामाजिक, सांस्कृतिक या आर्थिक विशेषज्ञ इन्ही
विधिओ का उपयोग कर ही मानवता का कल्याण कर पाए| इसीलिए ये लोग अपनी शारीरिक मृत्यु
के बाद भी आज ज़िंदा हैं|
आचार्य प्रवर निरंजन जी
अध्यक्ष, अन्तर्राष्ट्रीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन
संस्थान|
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