रविवार, 31 मई 2026

डॉ० मोहन भागवत का ‘राष्ट्रवाद’

डॉ० मोहन भागवत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वर्तमान सरसंघचालक है| इनका पूरा नाम डॉ० मोहन मधुकर राव भागवत है| इनकी शैक्षणिक योग्यता ‘पशु चिकित्सा एवं पशुपालन’ (Veterinary Science and Animal Husbandary) में स्नातक की है| इन्ही के कार्यकाल में वर्तमान केंद्र सरकार निरंतरता बनाए हुए है| इसलिए इनकी दृष्टि, विचार और आदर्श को जानना समझना महत्वपूर्ण हो जाता है, कि हमारा राष्ट्र कहाँ जा रहा है? मैं यहाँ सिर्फ इनके ‘राष्ट्रवाद’ की अवधारणा की विवेचना करना चाहता हूँ, जिसे आपको भी समझना चाहिए| मैं चूँकि ‘अराजनीतिक’ व्यक्ति हूँ, इसलिए आपको किसी भी ‘राजनीतिक’ या ‘भावनात्मक’ विषयों में उलझाना नहीं चाहता हूँ|

डॉ० मोहन भागवत वर्तमान भारत को एक अखंड भारत, एक सशक्त सांस्कृतिक राष्ट्र, और इस भारत -भूमि  को वैज्ञानिक एवं आधुनिक राष्ट्र बनाना चाहते हैं, ताकि इस अखंड भारतीय उपमहाद्वीप में समृद्धि, शांति, विकास स्थापित हो सके| जब भारत आधुनिक, वैज्ञानिक और सशक्त होगा, तभी भारत समस्त मानवता के कल्याण के लिए विश्व का मार्गदर्शन कर सकेगा|

ये मानते हैं कि ‘विचार’ और ‘आदर्श’ जीवन्त होते हैं, इसलिए ‘राष्ट्र’ को भी ‘समकालिक’ (Contemporary/ Synchronize) होना होता है|  वे विचार ही उत्कृष्ट होते हैं, जो मानवता और ‘मानवता के भविष्य’ के विकास एवं संवर्धन में सहायक होते हैं| मैं पुन: दुहराता हूँ - विचार जीवन्त होते हैं| परिस्थितियाँ बदलती रहती है| सम्यक विचार को भी समय और परिस्थितियों के बदलने के साथ अनुकूलन, समायोजन, और संतुलन बनाना पड़ता है| अन्यथा वह विचार सन्दर्भ से बाहर होकर अप्रसांगिक हो जाता है| आज विश्व तेजी से बदल रहा है|

वर्ष 2021 के माह नवम्बर में, इसने ‘भारत विभाजन’ का सार्वजानिक रूप से विरोध किया और भारतीय उपमहाद्वीप के पुनर्मिलन के लिए अपना समर्थन व्यक्त किया|  उन्होंने कहा, ‘विभाजन के दर्द का एकमात्र समाधान इसे ‘पूर्ववत स्थिति’ में करने में निहित है’| इस प्रकार इन्होने 1947 में भारत के क्षेत्रीय विभाजन को उलटने की वकालत की| यह इनके ‘अखंड भारत’ की परिकल्पना  का निश्चित दृष्टि है| यह इनकी ‘जम्बुद्वीप के राष्ट्र’ की अवधारणा है| इसमें भारतीय उपमहाद्वीप के सभी भौगोलिक भू –भाग समाहित हो जाते हैं| इसका आधार इस ‘अखंड भारत’ के निवासियों की ‘सांस्कृतिक समझ’ है, जो समय समय उद्घाटित होता रहता है| यह कोई अधिग्रहण या अतिक्रमण की अवधारणा नहीं है| जैसे वियतनाम या जर्मनी का एकीकरण वहां के जन गण के ‘सांस्कृतिक एकापन’ के कारण हुई, वैसे इस ‘अखंड भारत’ का एकीकरण होना निश्चित है| यह ‘सांस्कृतिक चेतना’ अब मुखर होने लगी है|

इस ‘राष्ट्र’ को इस ‘हिन्द स्थान’ की ‘ऐतिहासिक सांस्कृतिक आधार’ (Historical Cultural Foudation) या ‘ऐतिहासिक सांस्कृतिक सार’ के रुप में देखा समझा जाना चाहिए| यही ‘ऐतिहासिक सांस्कृतिक सार” ही ‘सनातन’ है, और यही इस अखंड भारत –भूमि की ‘सांस्कृतिक विशेषता’ है| चूँकि ‘संस्कार’ और ‘संस्कृति’ भी ‘समकालिक’ होता रहता है, लेकिन यह अपनी मूल भावना में स्थिरता लिए होता है, इसीलिए इस ‘हिन्द स्थान’ के ‘संस्कार’ और ‘संस्कृति’ ‘सनातन’ हैं| अभी ‘भारत’ एक राजनीतिक ‘राज्य’ है, लेकिन ‘हिन्द’ इस ‘अखंड भारत’ का पर्याय है|

डॉ० मोहन भागवत ने पिछले वर्ष के शताब्दी वर्ष के संबोधन में कहा - दुनिया को धर्म (धम्म) का मार्ग अपनाना होगा| यह ‘धर्म’ पूजा –पंथ और कर्मकांड से परे है| यह धर्म और सम्प्रदाय अलग अलग चीज है| संघ का कार्य शुद्ध सात्विक प्रेम और निष्ठा पर आधारित है| भारत की परम्परा इसे ‘मध्यम मार्ग’ कहती है, और यही आज दुनिया की सबसे बड़ी आवश्यकता है|  सभी प्रकार के ‘रिलीजन’ से ऊपर ‘धर्म’ है| धर्म हमें संतुलन सिखाता है| हमें भी जीना है, समाज को भी जीना है और प्रकृति को भी जीना है| धर्म ही मध्यम मार्ग है, जो अतिवाद से बचाता है| धर्म का अर्थ मर्यादा और संतुलन के साथ जीना है| इसी दृष्टिकोण से ही विश्व में शांति स्थापित हो सकता है| ‘धर्म वह है जो हमें संतुलित जीवन की ओर ले जाए, जहां विविधता को स्वीकार किया जाता है और सभी के अस्तित्व को सम्मान दिया जाता है|

डॉ० मोहन भागवत के वैचारिक दृष्टिकोण में वैज्ञानिकता, तार्किकता, विवेकशीलता, वैश्विकता, एवं वैश्विक मानवता स्पष्ट और मजबूती से दिखती है| वर्ष 2017 के माह फरवरी में मध्य प्रदेश के एक रैली में डॉ० मोहन भागवत ने दवाब देकर कहा, “इस भारत देश में पैदा हुआ हर एक व्यक्ति हिन्दू है – इनमे से कुछ मूर्तिपूजक है और कुछ नहीं है| यहाँ तक कि मुसलमान भी राष्ट्रीयता से हिन्दू हैं, वे केवल विश्वास एवं आस्था से मुसलमान हैं| यहाँ ‘हिन्दू’ शब्द ‘हिन्द की मूल संस्कार और संस्कृति’ है|

डॉ० भागवत के अनुसार संघ ‘किसी को ‘कान्विंस’ करने में नहीं, बल्कि अपने कार्य को मनोयोग से करने में विश्वास रखता है| इसे अपनी बातों से किसी को कन्विंस करने यानि मनवा लेने में विश्वास नहीं है| संघ का लक्ष्य है कि ‘भारत विश्व में अग्रणी स्थान पाए| यह अग्रणी स्थान वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए नहीं, बल्कि मानवता में योगदान देने के लिए है|

डॉ० भागवत मानते हैं कि आज दुनिया एक –दूसरे के बहुत करीब आ गया है, इसलिए अब वैश्विक स्तर पर सोचना जरुरी हो गया है| आज से सौ साल पहले वैश्विक जगत में ‘राष्ट्रीयता’ सबसे प्रमुख था| आज से सौ साल पहले भारत ब्रिटिश साम्राज्यवाद का एक मुख्य उपनिवेश रहा| आज भारत विश्व का सबसे प्रमुख उभरता राष्ट्र है| आज मानवता के एक होते हुए भी उसके अनेक रुप और रंग है और इन्हीं विविधताओं से विश्व की सुन्दरता बढती है| भारत जब विश्व गुरु बनेगा, तभी वह अपना वास्तविक योगदान मानवता को दे सकेगा| और अब उसका समय आ गया है|

‘हिन्दू’ शब्द बाहरी पहचान का प्रतीक नहीं, बल्कि यह ‘हिन्द की संस्कृति’ का प्रतीक है| यह एक व्यापक मानवशास्त्रीय दृष्टिकोण है| भारत की परम्परा व्यक्ति, समाज और सृष्टि को एक –दूसरे से जुड़ा और प्रभावित मानती है| ‘हिन्दू’ इस ‘हिन्द की संस्कृति’ का प्रचलित एवं परम्परागत नाम है| 

डॉ० भागवत मानते हैं कि - स्वतन्त्रता मिलने के बाद समाज को जिस प्रकार से प्रबोधित करना चाहिए था, वैसा नहीं हुआ| यह स्पष्ट है कि ‘राष्ट्र –निर्माण’ के लिए केवल आन्दोलन, संगठन या नेता ही पर्याप्त नहीं है| समाज में रुढ़ियाँ, कुरीतियाँ, अंधविश्वास व्याप्त है और शिक्षा का अभाव बना रहा| समाज की कुरीतियों और दोष को दूर किये बिना स्वतंत्रता स्थायी नहीं हो सकती| डॉ० हेडगेवार ‘राजनीतिक स्वतन्त्रता’ का अर्थ समझते थे, इसीलिए ‘नागरिक स्वतन्त्रता’ के लिए इस ‘नागरिक संगठन’ ‘संघ’ की स्थापना की|  समाज की गुणात्मक उन्नति ही राष्ट्र निर्माण का मूल है| हर नागरिक की भागीदारी और हिस्सेदारी के बिना कोई भी सशक्त और समृद्ध राष्ट्र नहीं बन सकता है| संघ की स्थापना समाज को गुणात्मक रुप से बदलने और राष्ट्र को सशक्त बनाने का एक उपाय था| भारतीय परम्परा का मूल विचार ही है – ‘वसुधैव कुटुम्बकम’|

 ‘संघ कार्य’ का आधार किसी का विरोध नहीं है, और किसी के प्रति प्रतिक्रिया नहीं है| ‘संघ कार्य’ का आधार शुद्ध सात्विक प्रेम और करुणा है| इसी भाव से विविधता में एकता देखी जाती है| संघ केवल हिन्दू समाज के चिन्ह पर नहीं, बल्कि ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ के सिद्धान्त पर चलता है| स्वयंसेवक परिवार से लेकर गाँव, देश और विश्व तक अपनेपन की भावना का विस्तार करता है| उनका विश्वास है कि सब अपने हैं| यही जीवन और विश्व विकास का क्रम है|

डॉ० मोहन भागवत स्पष्ट रुप से कहते हैं कि भारत: एक ‘राज्य –राष्ट्र’ (State –Nation) है, नहीं कि एक ‘राष्ट्र –राज्य’ (Nation –State) हैं| हम सभी ‘हिन्दू राष्ट्र’ के अंग हैं| ‘भारत का राष्ट्र’ सत्ता या राज्य से नहीं, बल्कि ‘सांस्कृतिक और सामाजिक एकता’ से जुड़ा है| भारतीय राष्ट्र का आधार राज्य या कानून नहीं है, बल्कि भारतीय ऐतिहासिक सांस्कृतिक विरासत है| भारतीय राष्ट्र एक उपमहाद्वीपीय भौगोलिक क्षेत्र में ऐतिहासिक रुप में एक साथ रहने का परिणाम है| यह एक भूगोल और एक इतिहास की ‘सांस्कृतिक एकापन’ के प्रति निष्ठा का परिणाम है| यह भौगोलिक आधार प्राकृतिक है| इसकी जलवायु ‘मानसूनी’ है, जो एक अलग विशिष्टता रखती है| यह ‘मानसूनी जलवायु’ ही इसकी ‘आर्थिक एकापन’ को आधार देती है| आधुनिक विज्ञान और तकनीक ने इसे और व्यवस्थित कर दिया है| भारत या इस ‘हिन्द’ का राष्ट्र प्राकृतिक है, ऐतिहासिक है, भौगोलिक है, आर्थिक है और मानवीय प्रगति का आधार भी है| कोई भी प्रकृति के स्वभाव के विरुद्ध लम्बे समय तक प्रगतिशील और समृद्ध नहीं रह सकता है|

हिन्दू राष्ट्र की अवधारणा पश्चिमी ‘राष्ट्र –राज्य’ (Nation –State) से भिन्न है| भारत एक ‘राज्य –राष्ट्र’ (State –Nation) है, लेकिन ‘राष्ट्र –राज्य’ (Nation –State) नहीं है| पश्चिमी ‘राष्ट्र –राज्य’ की स्थापना में एकल ‘राष्ट्रीयता’ प्रमुख होती है और वही उस राज्य का राजनीतिक आधार होता है| भारत में विविध संस्कृतियाँ एक साथ मिल कर सामासिक रुप में भारतीय संस्कृति को अभिव्यक्त करता है| भारत इन विविध समृद्ध संस्कृतियों के एकल पहचान के कारण एक राजनीतिक राज्य की आवश्यकता है| इसिलिर भारत एक ‘राज्य –राष्ट्र’ है|

सवाल यह है कि भारत को एक "राष्ट्र-राज्य (Nation-State)" बनना चाहिए, या एक "राज्य-राष्ट्र (State-Nation)"? यह  "राष्ट्र-राज्य " और "राज्य-राष्ट्र" दो अलग-अलग राजनीतिक और सामाजिक - सांस्कृतिक अवधारणाएं हैं। लेकिन इसे समझने से पहले हमें देश, राज्य और राष्ट्र की अवधारणा को समझ लेना चाहिए, और इसके साथ ही इसकी बदलती गत्यात्मकता (Dynamism) की क्रियाविधि (Mechanism) को भी समझा जाना चाहिए। 

एक देश (Country) वह निश्चित भौगोलिक क्षेत्र होता है, जो अपनी आबादी की एक निश्चित सामाजिक एवं सांस्कृतिक विन्यास (बनाबट/ Matrix) या पहचान का बोध कराता है। अतः एक देश एक राज्य भी हो सकता है, और साथ ही एक राष्ट्र भी हो सकता है, यानि तीनों स्वरूप एक साथ भी हो सकता है, या नहीं भी हो सकता है। एक राज्य (State) एक निश्चित भौगोलिक क्षेत्र में एक स्थिर आबादी का एक निश्चित सरकार होती है और वह संप्रभु भी होता है। एक राष्ट्र (Nation) ऐतिहासिक रूप से गठित, लोगों का एक स्थिर समुदाय है, जो एक क्षेत्र, एक आर्थिक जीवन और एक आम एवं विशिष्ट संस्कृति में प्रकट मनोवैज्ञानिक संरचना के आधार पर बनता है। 

भारत 1947 से पहले भी एक देश था और आज भी एक देश है। लेकिन भारत 1947 से पहले एक राज्य नहीं था, क्योंकि भारत देश में सम्प्रभुता का अभाव था, जो राज्य के लिए एक अनिवार्य तत्व है। ज्ञातव्य है कि एक राज्य के आवश्यक तत्व में भौगोलिक क्षेत्र, स्थिर आबादी, सरकार और सम्प्रभुता शामिल होता है। भारत एक राष्ट्र के रूप में ब्रिटिश काल में उभरना शुरू हुआ था, और यह प्रक्रिया अभी भी चल रही है, मतलब इसके पहले भारत एक देश तो था, लेकिन एक राज्य भी नहीं था, और एक राष्ट्र भी नहीं था। स्पष्ट है कि उपरोक्त तीनों अवधारणाएँ अलग अलग तो हैं, परन्तु इनकी अवस्थाएँ एक दूसरे में रुपांतरित होने के लिए गतिशील भी रहती है। यह भी स्पष्ट है कि कोई एक देश वर्तमान में एक साथ सिर्फ एक देश ही हो सकता है, या तीनों अवस्था देश, राज्य और राष्ट्र का संयुक्त स्वरूप भी हो सकता है। सभी देश कालान्तर में राज्य तो बनना ही चाहते हैं, परन्तु कोई ‘राष्ट्र- राज्य’ ही बनता है, तो कोई ‘राज्य – राष्ट्र’। 

इसी उपरोक्त सन्दर्भ में अहम सवाल यह है कि भारत को क्या बनना चाहिए - "राष्ट्र-राज्य " या "राज्य-राष्ट्र"? आपने देश और राज्य की अवधारणा को स्पष्टतया समझ लिया, क्योंकि यह दोनों ही एक तथ्यात्मक अवधारणा है। राष्ट्र की अवधारणा को स्पष्टतया समझ लेना थोड़ा कठिनतर होता है, क्योंकि यह अवधारणा मूलतः मानवीय भावनाओं पर आधारित एक ‘अमूर्त स्वरुप’ में होता है और इसीलिए इन भावनाओं के आधार कईं कारकों को अपने में समेटे हुए होता है। इन कारकों में सम्प्रदाय (जिसे अधिकतर लोग धर्म समझ लेते हैं), भाषा, संस्कृति, इतिहास बोध, क्षेत्र, आर्थिक और राजनीतिक एकता सबसे प्रमुख है। अब हम "राष्ट्र-राज्य " और "राज्य-राष्ट्र" को भी उदाहरण के साथ समझते हैं। 

जहाँ "राष्ट्र-राज्य" (Nation-State) में पहले एक राष्ट्र होता है और तब एक राज्य, वहीं "राज्य-राष्ट्र" (State-Nation) में पहले एक राज्य होता है और तब राष्ट्रों को महत्त्व होता है| "राष्ट्र-राज्य" (Nation-State) एक राष्ट्रीय राजनीतिक इकाई है, जो एक सांस्कृतिक, भाषा, इतिहास और जातीयता के साझा तत्वों वाले समूह से निर्मित होता है। और इसके साथ ही, यह  स्वतंत्र सम्प्रभुता की सरकार और भौगोलिक क्षेत्र से निर्मित एक ही इकाई के रुप में एक राज्य भी होता हैं। इसके स्पष्ट उदाहरण जापान, जर्मनी, इजरायल और फ्रांस हैं। ये सभी "राष्ट्र-राज्य" हैं, क्योंकि वहां के लोग सांस्कृतिक, भाषाई और ऐतिहासिक पहचान के साथ एकजुट हैं, और उनके पास अपनी स्वतंत्र सरकार है। इसकी मुख्य विशेषताओं में एकल राष्ट्रीय पहचान और एकल सरकार होती है।

एक "राज्य-राष्ट्र" (State-Nation) की अवधारणा "राष्ट्र-राज्य" से अलग हो जाता है। यह एक ऐसा राज्य है, जिसमें कई राष्ट्र या सांस्कृतिक समूह एक साथ शामिल होते हैं और वे एकसाथ एक राज्य की रूप में कार्य करते हैं। एक "राज्य-राष्ट्र" (State-Nation) में सम्पूर्ण अखंड भारत यानि समस्त जम्बूद्वीप  समाहित हो जाता है, या हो सकता है| इस ‘राज्य-राष्ट्र’ के स्पष्ट उदाहरण में भारत, संयुक्त राज्य अमेरिका, स्विट्जरलैंड आदि हैं, जहां विभिन्न सांस्कृतिक, भाषाई और जातीय समूह एक ही राज्य के अंतर्गत आते हैं। इसकी मुख्य विशेषताओं में विभिन्न राष्ट्रीय पहचान होते हुए भी एकल सरकार होती है, जो अपनी विशिष्ट विविधताओं को स्वीकार करते हुए एकता बनाए रखती है। इसकी अवधारणा राष्ट्रीयता की परिभाषा के साथ ही गत्यात्मक रहती है। 

इस प्रकार, "राष्ट्र-राज्य" में एक राष्ट्र और एक राज्य का संयोजन होता है, यानि दोनों एक ही होता है। वहीं "राज्य-राष्ट्र" में विभिन्न राष्ट्रों का एक राज्य में संगठित होना शामिल होता है, और ऐसा एक निश्चित भूगोल पर ऐतिहासिक प्रक्रियाओं के द्वारा होता हुआ रहता है। हालांकि दोनों अवधारणा गलत नहीं है, परन्तु "राज्य - राष्ट्र" की अवधारणा आज वर्तमान वैज्ञानिक युग में ज्यादा सफल, समुचित और व्यवहारिक माना जाता है। अपनी विशिष्ट शर्तों के कारण राष्ट्र - राज्यएक छोटे भौगोलिक क्षेत्र, छोटी आबादी, और एक निश्चित संस्कार में सीमित होते हैं| वहीं राज्य राष्ट्रका भौगोलिक क्षेत्र विस्तृत होता है, अपने में विविध आबादी को समाहित किए होती है, उसमे सांस्कृतिक विविधताएँ होती है, और इसका मूल एवं प्राथमिक आधार मानवीयताही होता है| विश्व में ‘यूरोपीय संघ’ की स्थापना इसी ‘राज्य-राष्ट्र’ की अवधारणा को मजबूत करती है| ऐसे ही राज्य वैश्विक शक्तियाँ बनती है, या बन सकती है|

आज की बाजार की शक्तियां, यानि आर्थिक शक्तियां, यानि ऐतिहासिक शक्तियां "राज्य- राष्ट्र" के पक्ष में जा रही है, क्योंकि यह "मानवता" को उभार रही है और अन्य सांस्कृतिक पहचान को उपेक्षित कर रही है। इस पर ध्यान दिया जाना चाहिए। यह एक गम्भीर ऐतिहासिक प्रक्रिया है, जिस पर भारत में अभी तक विमर्श शुरु नहीं हुआ है। 

आप यदि इस "राज्य- राष्ट्र" अवधारणा के विरोधी हैं, तो इसका अर्थ यह हुआ कि आप 'राष्ट्र- राज्य' की अवधारणा के समर्थक हैं। इसके साथ ही यह भी स्पष्ट अर्थ निकलता है कि आप विभिन्न राष्ट्रीयताओं के सह - अस्तित्व के विरोधी हैं। लेकिन इनमें बहुत सी राष्ट्रीयताएँ वैश्विक स्तर की हैं, सशक्त भी है, संपन्न भी है, बौद्धिकता के स्तर में उच्चतर भी है, और बहुलता में भी है, और इसीलिए आप इसके अस्तित्व एवं सह- अस्तित्व से इंकार नहीं कर सकते। सह - अस्तित्व के विरोध की आपकी ऐसी भावना भारत के न्यायिक चरित्र को नुकसान भी पहुंचाती है, और भारतीय गरिमामयी पौराणिक विरासत की छवि को भी दागदार बनाती है। 

अब आप इस आलेख में डॉ० मोहन भागवत के राष्ट्र की अवधारणा को समझ गए होंगे|

आचार्य प्रवर निरंजन जी

अध्यक्ष, अन्तर्राष्ट्रीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान| 

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डॉ० मोहन भागवत का ‘राष्ट्रवाद’

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