बुधवार, 13 मई 2026

भारतीय राष्ट्र –निर्माण में इतिहास की समस्याएँ

‘राष्ट्र’ के निर्माण में ‘इतिहास’ की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है| ‘राष्ट्र’ कोई ‘देश’ नहीं होता है| यह ‘राष्ट्र’ ‘ऐतिहासिक एकापन (Historical Oneness) की मनोदशा’ होता है, जो ऐतिहासिक काल में एक साथ रहने से तैयार होता है| यह ‘राष्ट्र’ सभी लोगों की भावना पर आधारित होता है, इसीलिए भारतीय संविधान की उद्देशिका में ‘राष्ट्र की एकता और अखंडता’ के सुनिश्चयन की बात की गयी है, किसी देश या राज्य या प्रान्त की बात नहीं की गयी है| किसी ‘राष्ट्र –निर्माण’ को उसका ‘भूगोल’ और ‘इतिहास’ आधार देता है, अर्थात उस निश्चित भूगोल पर इतिहास कार्य कर उसे ‘राष्ट्र’ बनाता है| भूगोल को सामान्यत: ‘प्रकृति’ आकार देता है, लेकिन इतिहास को समकालिक ‘आर्थिक साधन एवं शक्तियाँ’ बनाता है और उसे बदलता भी रहता है| ‘आर्थिक साधन एवं शक्तियाँ’ को ‘तकनीक’ और ‘बाजार’ निर्धारित करता है, जिन्हें ‘बाजार के साधन एवं शक्तियाँ’ कहते हैं|

‘इतिहास’ ही ‘संस्कार’ और ‘संस्कृति’ को आकार देता है| ‘इतिहास’ ही ‘वर्तमान और भविष्य’ को समझता और समझाता है, क्योंकि ‘इतिहास’ ही वर्तमान और भविष्य का ‘जड़’ (Root) या ‘नींव’ (Foundation) होता है| वर्तमान और भविष्य की समस्यायों को समझने और उसके समाधान पाने में ‘इतिहास’ का समझ बहुत महत्वपूर्ण है| भारत की सभी सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक समस्यायों का समाधान ‘इतिहास’ की वैज्ञानिक, तथ्यगत और तार्किक व्याख्या में है| इसीलिए सभी ‘शासक वर्ग’ इतिहास की ऐसी ‘वैज्ञानिक व्याख्या’ से बचते हैं| ‘सत्ता’ यानि ‘शासक वर्ग’ अपने वर्चस्व की निरन्तरता को बनाये रखने के लिए इतिहास का नकारात्मक उपयोग करता है, जबकि ‘राष्ट्र –निर्माण’ के लिए इतिहास की सकारात्मक व्याख्या होनी चाहिए| साम्राज्यवादियों का अपना निहित उद्देश्य था, वह समझ में आता है, लेकिन भारतीय बौद्धिक वर्ग को यह सब समझना चाहिए| भारतीय राष्ट्र के निर्माण में इसी समझ के अभाव में बाधित पडा हुआ है| इसके बिना भारत एक सशक्त और समृद्ध राष्ट्र बन ही नहीं सकता है|

‘इतिहास’ का अत्यधिक महिमामंडन करना भी ‘वर्तमान’ को कमजोर कर सकता है, जो ‘राष्ट्र’, ‘संस्कृति’ और ‘संस्कार’ को गलत दिशा दे सकता है| यह सदैव याद रखना चाहिए कि ‘स्वर्ण –युग’ सदैव ‘भविष्य काल’ का होता है, और यही ‘आशावादी’ दृष्टिकोण है| ‘स्वर्ण –युग’ किसी ‘पुरातन’ में कभी नहीं हो सकता है| किसी इतिहास में ‘स्वर्ण –युग’ मान लेना भी मानवता के लिए घातक होता है| ‘सामूहिक भावनात्मक स्मृतियाँ’ को इतिहास नहीं माना जाना चाहिए| सभी इतिहास को अवश्य ही तथ्यों और वैज्ञानिक विधियों की तार्किकता और विवेकशीलता पर आधारित होना चाहिए| अधिकांश लोग इतिहास को समझने के बजाय ‘मान लेते’ हैं| ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि सामान्य जन गण में ‘आलोचनात्मक चिन्तन’ की समझ नहीं होती है| यदि ‘समझ’ होती है, तो इसके लिए आवश्यक ‘क्षमता’, ‘योग्यता’ और ‘स्तर’ नहीं होता है| चूँकि इसके लिए समय, वैचारिकी और क्षमता चाहिए होता है, इसीलिए सामान्य जन गण को ‘भावनात्मक कहानियो’ और ‘आख्यानों’ को इतिहास ‘मान लेने’ में ज्यादा आसानी होती है|

चूँकि इतिहास पुरातन होता है और पुरातनता की अवधि ही ‘इतिहास की गहराइयों’ को निर्धारित करता है, इसीलिए इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण काल ‘प्राचीन काल’ का होता है| ‘प्राचीन काल’ का इतिहास ही ‘संस्कृति’, ‘संस्कार’ और ‘राष्ट्र’ की सबसे गहरी ‘जड़े’ होती है| इसलिए भारतीय राष्ट्र के निर्माण में ‘प्राचीन इतिहास’ ही सबसे प्रमुख है, जिससे सम्बन्धित समस्यायों को समझना अनिवार्य है|

भारतीय राष्ट्र के निर्माण में इतिहास की सबसे प्रमुख समस्या यह है कि सामान्य जन गण सहित इतिहास के अधिकतर विद्वान् भी इतिहास के ‘समकालिक होने की अनिवार्यता’ और ‘समकालिक होने की प्रक्रिया’ को नहीं समझते हैं| ऐसे लोगों को इतिहास की क्रिया विधियों की समझ नहीं होती है, या वे सब कुछ जानते और समझते हुए भी अपने वर्गीय हितों में ‘नासमझ’ बने रहते हैं| ‘इतिहास के समकालिक होने’ की प्रक्रिया में जब भी इतिहास का कोई पुनर्लेखन होता है, तब पहले की उपलब्ध इतिहास को समकालिक आवश्यकताओं, परिस्थितियों और शक्तियों के अनुरुप अनुकूलित होना पड़ता है| इसी इतिहास के अनुरुप ही प्राचीन ‘संस्कारों’ और ‘संस्कृतियों’ को भी ‘समकालिक’ होना होता है| ‘संस्कार’ और ‘संस्कृति’ एक ही साथ ‘जड़’ भी होता है और ‘गतिशील’ भी होता है, जैसे एक पेड़ का जड़ और तना ‘जड़’ रहता है और ‘फुनगियाँ’ लहराती रहती है|

इतिहास, संस्कार और संस्कृति को ऐसा ‘समकालिक’ होना हर काल की अनिवार्यता होती है| इसीलिए कोई भी इतिहासकार कोई ‘अन्तिम इतिहास’ नहीं लिख सकता है, लेकिन हर बार ‘उपलब्ध इतिहास’ को या तो रद्द कर सकता है या संशोधित करता रहता है| प्राचीन भारत का अधिकांश उपलब्ध इतिहास को मध्य कालीन सामन्ती आवश्यकताओं, परिस्थितियों, व्यवस्थाओं और शक्तियों के अनुरुप ‘समकालिक’ होना पड़ा| यह इतिहास लेखन कागज के आविष्कार होने और भारत में इसके अति प्रचालन में आने के बाद ही शुरु हुआ| भारत में कागज़ का बहु –प्रचालन मध्य युग के सामन्ती काल में ही हुआ, और इसीलिए भारत के प्राचीन इतिहास को मध्य युगीन सामन्ती शक्तियों, आवश्यकताओं, परिस्थितियों, और व्यवस्थाओं के अनुकूल होना पड़ा| इस तरह, भारत का प्राचीन इतिहास पूरी तरह ‘समकालिक’ होकर ‘सामन्ती चरित्र’ का हो गया|

आज भी प्राचीन भारत का यही इतिहास उपलब्ध है, जो मूल अवस्था में नहीं है| इन्हें समझने और उसमे यथा आवश्यक संशोधन और परिमार्जन करने की अनिवार्यता है| इस ‘संशोधन’ या ‘परिमार्जन’ के बिना भारत कभी भी एक सशक्त राष्ट्र नहीं बन सकता है| प्राचीन भारत के इतिहास को आज विकृत स्वरुप में उपलब्ध होना इसलिए कहना पड़ रहा है, क्योंकि इस इतिहास में कई तथ्यगत साक्ष्यों, सामान्य तार्किकताओं, और वैज्ञानिकताओं स्पष्ट और प्रत्यक्ष अभाव है|

भारतीय राष्ट्र –निर्माण में इतिहास की यही समस्या सबसे बाधा बनी हुई है, जो भारत की सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक एवं राजनीतिक विकास में स्पष्ट रुप में दिखती भी है|  

आचार्य प्रवर निरंजन जी

अध्यक्ष, अन्तरराष्ट्रीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान|

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