भाषा
का उद्विकास (Evolution)
एक बहुत ही जटिल और सतत प्रक्रिया है। यह किसी एक व्यक्ति या संस्था द्वारा
निर्मित नहीं होती, बल्कि
समाज, संस्कृति, भूगोल, इतिहास
और मानवीय व्यवहार के साथ धीरे-धीरे विकसित होती है। इसका उद्विकास ही शक्ति और
आधिपत्य करने के लिए ही होता है| मानव अपनी शुरुआती अवस्था में इसके द्वारा प्रकृति
और पशुओं पर आधिपत्य करना चाहा| फिर उसने इसका
उपयोग क्रमश: दूसरे मानव पर, दूसरे समाज पर और दूसरी संस्कृतियों पर आधिपत्य करने
के लिए किया| ‘अधिपत्य’ करने के लिए एक विशेष और विशिष्ट ‘शक्ति’ प्राप्त करना
होता है, और यह सब भाषा के सहयोग से ही संभव होता है|
इस
तरह यह स्पष्ट होता है कि भाषा केवल संचार का माध्यम नहीं है, बल्कि यह शक्ति (Power), अर्थ-निर्माण
(Meaning-making), और
सामाजिक नियंत्रण (Hegemony)
का उपकरण हो जाती है। भाषा का उद्विकास एक प्राकृतिक, सामाजिक और
ऐतिहासिक प्रक्रिया है,
जिसमें समाज अपनी भाषा बनाता है, उसकी संस्कृति उस भाषा को आकार देती है और समय
–काल उस विशिष्ट भाषा को अपने अनुकूल कर बदलता रहता है| भाषा के अनुकूलन में अब ‘राज्य
–शक्ति’ भी शामिल हो गया है|
सबसे
पहले हमें ‘ज्ञान’, ‘बुद्धि’ और ‘प्रज्ञा’ को स्पष्ट अन्तर के साथ समझ लेना चाहिए|
भाषा की शुरुआत तत्कालीन परिस्थितियों में
ऊर्जा के स्तर में एक 'बदलाव' से होती है,
जो हमारी संवेदी अंगों द्वारा संग्रहीत एवं उनकी अंतर्क्रियाओं द्वारा प्रस्करित (Processed)
होती है, जिसे ‘उत्तेजना’ (Excitation)
कहते है|
मानव जाति इस प्रक्रिया के लिए जैवकीय रुप में सक्षम है| यह विशेष एवं विशिष्ट
‘उत्तेजना’ एक खास 'इशारा' (Caveat) देता है। इन विशेष
एवं विशिष्ट इशारों के समेकन से विशेष एवं विशिष्ट 'चिन्ह'
(Symbol) बनता है। उन चिन्हों को 'संकेत'
(Signal) कहा जाता है। इन्ही विशेष एवं विशिष्ट ‘संकेतों’ के
व्यवस्थित और संगठित प्रेषण से एक निश्चित 'एलान' (Annunciation) होता
है, जिसे
'सूचना' (Information) कहा
जाता है। भाषा के सन्दर्भ में यह ‘संकेत’ ही ‘ध्वनि’ और यह ‘सूचना’ ही ‘शब्द एवं
वाक्य’ हैं| इन्हीं समस्त ‘सूचनाओं’ के
द्वारा किसी भी ‘चीज़’ या ‘क्रियाविधि’ को यथास्थिति में समझना संभव होता है|
किसी
भी ‘चीज़’ या ‘क्रियाविधि’ को यथास्थिति में समझना ही 'ज्ञान' (Knowledge) है। सामान्यत:
सामान्य लोगों की समझ किसी ‘चीज़’ या ‘क्रियाविधि’ को ‘उसकी यथास्थिति’ से नहीं होकर उसके ‘पूर्वाग्रहों’
से होती है| इसीलिए यह कहा जाता है कि किसी व्यक्ति का ‘सत्य’ निरपेक्ष नहीं होकर उसके
‘पूर्वाग्रहों’ का प्रतिविम्ब’ होता है| लोग इसी ज्ञान का उपयोग अपनी समझ के
अनुसार करते हैं और तब यह ‘ज्ञान’ ही ‘बुद्धि’ (Intelligence) कहलाता है।
जब इस ‘बुद्धि’ का उपयोग ‘मानवता’ और ‘मानवता के भविष्य’ के लिए करते हैं, तो वही ‘ज्ञान’
'प्रज्ञा' (Wisdom) बन जाता है। ‘भाषा’
का उद्विकास इसी ‘ज्ञान’ के सम्प्रेषण के लिए होता है, जिसका मौलिक उद्देश्य ‘शक्ति’
प्राप्त करना होता है|
‘भाषा’
के उद्विकास को चार्ल्स डार्विन के ‘प्राकृतिक उद्विकास’ और हर्बर्ट स्पेंसर के ‘सामाजिक
उद्विकास’ के बिना समझा ही नहीं जा सकता है| भाषा का उद्विकास एक ‘जीवित प्रणाली’
की तरह है, और यदि किसी ‘भाषा’ की उत्पत्ति की व्याख्या इससे ‘असहमति’ जताती है,
उस ‘भाषा के उद्विकास’ की व्याख्या में एक गहरी एवं सुनियोजित साजिश छिपी हुई है|
भाषा
का जन्म और विकास मनुष्यों के आपसी संचार से होता है। जब लोग एक साथ रहते हैं, तो वे अपने
अनुभवों, आवश्यकताओं
और भावनाओं को व्यक्त करने के लिए संकेत’ और ‘शब्द’ विकसित करते हैं। समय के साथ
ये ‘संकेत’ और ‘शब्द’ व्यवस्थित ‘भाषा’ बन
जाते हैं, जैसा कि ऊपर उद्विकास की वैज्ञानिक व्याख्या से स्पष्ट है| प्रारंभ में
केवल ‘ध्वनियाँ’ थीं,
फिर वे ‘ध्वनियाँ’ अर्थ से जुड़ने लगीं और ‘शब्द’ बने। इस अवस्था की भाषा को ‘प्राकृतिक
अवस्था की भाषा’ अर्थात ‘प्राकृत’ कहते हैं| जैसा कि इस शब्द ‘प्रा’ (Pre) और ‘कृत’
(Creation) से स्पष्ट होता है कि यह पहले की अवस्था की भाषा है|
जब किसी
भाषा को अपने सम्प्रेषण में एक निश्चित अर्थ देना होता है, तब इसके लिए कुछ निश्चित
नियम निर्धारित करना अनिवार्य हो जाता है| इन नियमों को ही व्याकरण (Grammar) कहा गया| इससे
भाषा अधिक संगठित और स्पष्ट हुई। तब ‘प्राकृत’ भाषा संवर्धित होकर उस समाज,
व्यवस्था (सरकार) और संस्कृति की ‘पालक’ यानि ‘पालने वाली’ भाषा बन गयी| इस ‘पालक’
यानि ‘पालने वाली’ भाषा को ही ‘पालि’ या ‘पाली’ भाषा कहा गया| यह भाषा जब ‘और
उन्नत एवं समृद्ध’ होकर ‘संस्कारित’ हो गयी, तब यह ‘भाषा’ ‘और सम्मानित’ होकर नए ‘नाम’
से नामित हो गयी| यह व्याख्या विश्व के सभी भाषाओँ के लिए ‘प्राकृतिक उद्विकास’ और
‘सामाजिक उद्विकास’ के स्थापित सिद्धांतों के अनुरुप है, इसलिए यह व्याख्या
वैज्ञानिक और विवेकपूर्ण है| यदि कोई भाषा किसी पूर्व से स्थापित एवं जटिल भाषा के
विखंडन की प्रक्रिया से उदित हुआ है, तो प्रश्न यह है कि “उस पूर्व से स्थापित एवं
जटिल भाषा” की उत्पति की व्याख्या ‘प्राकृतिक उद्विकास’ और ‘सामाजिक उद्विकास’ के
स्थापित सिद्धांतों के अनुरूप है? किसी भी ‘दैवीय उत्पत्ति’ की व्याख्या को
वैश्विक जगत नहीं स्वीकार करता है|
किसी
भी भाषा पर संस्कृति,
धर्म, राजनीति,
इतिहास, भूगोल, विज्ञान एवं तकनीक का गहरा प्रभाव पड़ता है। आक्रमणों, व्यापार और
प्रवास के कारण नई शब्दावली जुड़ती गई| अन्य भाषाओं के संपर्क से शब्दों और
संरचनाओं का आदान-प्रदान होता रहा है। नई तकनीक और जीवनशैली के साथ नए शब्द आते
हैं| इन सभी से उच्चारण और प्रयोग भी बदलता रहा है| इससे पुराने शब्द अप्रचलित होते
गए|
भाषा
का विकास सिर्फ सत्य की खोज के लिए नहीं होकर यह मानव की आवश्यकता और शक्ति प्राप्त
करने की अभिव्यक्ति के लिए होता है। भाषा का विकास “वास्तविकता”
से नहीं, बल्कि
मानव की कल्पना और उपयोगिता से होता है। मनुष्य अपनी शक्ति स्थापित करने के लिए उसका
अर्थ गढ़ता है| भाषा उसी प्रक्रिया की अभिव्यक्ति का माध्यम है| जो समूह शक्तिशाली
होता है, वह
शब्दों के अर्थ अपनी हितो को ध्यान में रख कर तय करता है, जैसे ‘अच्छा’, ‘बुरा’, ‘नैतिक’, ‘अनैतिक’ जैसे शब्द
उसी के अनुसार बदलते हैं। भाषा कमजोर और शक्तिशाली वर्गों के ऐतिहासिक संघर्ष से
विकसित हुई और यहाँ यह भाषा ‘मूल्यों की राजनीति’ बन जाती है|
आप
भाषा के उद्विकास को सीधे-सीधे सत्ता और समाज के नियंत्रण से जोड़ सकते हैं। समाज
में जो ‘शासक वर्ग’ होता है,
वह केवल ‘बल’ से नहीं, बल्कि भाषा और विचारों के माध्यम से भी शासन करता है|
इस तरह ‘भाषा’ भी वर्चस्व (Hegemony)
का उपकरण बन जाता है|
तब भाषा का उद्विकास इस तरह कराया जाता है कि ताकि वह शासन करने वाला वर्ग अपनी
विचारधारा को ‘सामान्य’ और ‘सहज’ बना सके| तब वह ‘भाषा’ ही सामान्य जन गण की सामान्य
बुद्धि (Common
Sense) बन जाती है| इस तरह ‘भाषा’ उस समाज के जन गण की ‘सामान्य
संस्कृति’ हो जाती है| इस तरह. यह ‘प्राकृतिक उद्विकास’ नहीं होकर ‘सत्ता’ द्वारा
नियमित उद्विकास’ हो जाता है| सामाजिक और सांस्कृतिक संस्थाएँ यथा ‘राष्ट्र’, ‘धर्म’, ‘विवाह’ आदि
केवल शब्द नहीं हैं, बल्कि ये वैचारिक संरचनाएँ हैं, जो भाषा के माध्यम से स्थापित होती हैं| आप भाषा के माध्यम
से ही समाज को दिशा दे सकते हैं| भाषा ही ‘मानव –मूल्य’ गढ़ते हैं|
स्पष्ट
है कि भाषा सिर्फ ‘प्राकृतिक रुप से विकसित’ ही नहीं होती, बल्कि यह ‘शक्ति’
और ‘आधिपत्य’ के लिए भी विकसित की जाती है।
आचार्य प्रवर निरंजन जी
अध्यक्ष, भारतीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन
संस्थान, बिहटा, पटना, बिहार|
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