सोमवार, 4 मई 2026

कौन सा राजनीतिक दल जल्दी समाप्त हो जाता है?

भारत में राजनीतिक दलों के अस्तित्व और उसकी निरंतरता का विश्लेषण करना बहुत सहज और सरल नहीं है| इसीलिए इन राजनीतिक दलों के भविष्य के सम्बन्ध में कोई ठोस निष्कर्ष निकलना भी सरल और साधारण नहीं होता है| इसी कारण, भारत में बहुत से तथाकथित ‘चुनावी विशेषज्ञ’ (Psephologist) हवा –हवाई साबित होते हैं| इन तथाकथित ‘चुनावी विशेषज्ञों’ का इन राजनीतिक दलों के सम्बन्ध में सारे आकलन ध्वस्त हो जाते हैं| दरअसल ये ‘चुनावी विशेषज्ञ’ सांखियकी (Statistics), जनमत (Public Opinion Poll) के संग्रहण एवं सम्बन्धित ऐतिहासिक चुनावी आंकड़ों के नाम पर ‘आंकड़ों की बाजीगिरी’ कर सस्ती लोकप्रियता बटोरते रहते हैं|  

यदि भारतीय राजनीतिक दलों की कुछ मौलिक विशेषताओं का विश्लेषण और समसामयिक मूल्याङ्कन किया जाय, तो कई नए गंभीर पक्ष उभरते हैं| भारतीय राजनीतिक दलों का वर्गीकरण कुछ राजनीतिक दलों के ‘मूलभूत सिद्धांतों’ के आधार पर किया जा सकता है| इन ‘मूलभूत सिद्धांतों’ की नैतिकता पर आप विवाद तो कर सकते हैं, लेकिन इन ‘मूलभूत सिद्धांतों’ की वास्तविकता को नकार नहीं सकते हैं| इन ‘मूलभूत सिद्धांतों’ के आधार पर भारत में कुछ ही राजनीतिक दल अब अपने वजूद में हैं| कांग्रेस भारत की आजादी के लक्ष्य के लिए एक आन्दोलन के रुप में उभर कर आई, लेकिन आज इसमें कोई “स्पष्ट और स्थिर सिद्धान्त” नहीं दिखता होता है| समय के सापेक्ष सिद्धांतों का बदल जाना कोई “स्पष्ट और स्थिर सिद्धान्त” नहीं है| ‘वंशवाद’ कोई सिद्धान्त नहीं होता| कांग्रेस का वर्तमान मूल्याङ्कन उपरोक्त सभी के सापेक्ष किया जाना चाहिए|

भारत की साम्यवादी (कम्युनिस्ट) पार्टियों को ‘मूलभूत सिद्धांतों’ के आधार पर स्थापित माना जाता रहा है| आज ये सभी साम्यवादी दल अपने अस्तित्व के लिए जूझने लायक भी नहीं रह गये हैं| विश्व में आज तक कोई भी राष्ट्र ‘साम्यवादी’ (Communist) नहीं बन सका, सभी ऐसे राष्ट्र ‘समाजवादी’ (Socialist) बन कर ही आगे बढ़ सके| वैसे आज विश्व में कोई भी राष्ट्र पूर्णत: समाजवादी या पूँजीवादी नहीं है| सभी राष्ट्र मिश्रित स्वरुप में हैं| वे ‘समाजवादी राष्ट्र’ ही आज सफल हुए, जिन्होंने ‘संस्कृति की क्रियाविधि और उसकी गत्यात्मकता’ को समझा और उसके अनुसार क्रियान्वयन किया| भारत की सभी साम्यवादी नेतृत्व इसी मौलिक समझ के अभाव में भारत –भूमि पर स्थायी रुप से पनप नहीं सके| ये नेतृत्व आज तक दार्शनिक एन्टोनियो ग्राम्शी, लेनिन और माओ त्से तुंग की ‘संस्कृति की क्रियाविधि और उसकी गत्यात्मकता’ को नहीं समझ सके| इसी कारण भारत की सभी साम्यवादी दल व्यावहारिकता में असफल हो गये|

भारत में कुछ ‘और राजनीतिक दल’ अपने तथाकथित सैद्धांतिक मुद्दों पर स्थापित तो हुए, लेकिन वे सभी दल वर्तमान में धन एवं अन्य दबाव में पारिवारिक जागीर बन कर ‘सिद्धांतविहीन’ हो गये| ऐसे राजनीतिक दल आज इतिहास का विषय हो चुके हैं या होने वाले हैं| इसी तरह, कुछ व्यक्तियों ने अपने राजनीतिक विशेष दल बनाए, जिनका वजूद ही किसी ‘स्थापित सिद्धांतों’ पर आधारित या अन्य आधार पर स्थापित राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया पर हुआ| ऐसे व्यक्तियों के ‘पाकेटी’ (अपनी पाकेट में रखे जाने योग्य) राजनीतिक दल अपनी विरुद्ध दल (जिनकी प्रतिक्रिया में वे वजूद में आए थे) के वजूद समाप्त होते ही ऐसे दलों को विलुप्त हो जाने की विवशता हो गयी| ये सभी राजनीतिक दल समसामयिक मुद्दों को ही उभार कर अपना अस्तित्व बचाने को प्रयासरत होते दिखते रहे हैं| स्पष्ट है कि ऐसे राजनीतिक दलों का अपना कोई मूल एवं स्थापित सिद्धांत नहीं होता है| ऐसे सभी राजनीतिक दल अपने मुद्दों के लिए किसी मुख्य सत्ताधारी दलों की “तथाकथित त्रुटियों” पर आधारित होते हैं| ऐसे सभी राजनीतिक दल सिर्फ प्रतिक्रिया देना जानते हैं, क्योंकि इनके पास अपना कोई मुद्दा, योजना और सिद्धान्त ही नहीं होता है| यदि मुख्य सत्ताधारी दल इन्हें कोई मुद्दा नहीं दे, तो ये राजनीतिक दल और उनके कार्यकर्ता बेरोजगार हो जाते हैं|

यह याद रहे कि कोई भी ‘व्यक्ति या परिवार आधारित राजनीतिक दल’ कुछ वर्षों या दशकों की राजनीति कर सकते हैं, या करते हैं, लेकिन वे उससे ज्यादा दूर नहीं चल सकते हैं| आप भारत की सभी व्यक्ति या परिवार आधारित राजनीतिक दलों’ का विश्लेषण और मूल्यांकन कर सकते हैं| सिर्फ छाती पीटने से गुजर गया समय वापस नहीं आ सकता है| लेकिन जो राजनीतिक दल ‘विचारों, सिद्धांतो, और मूल्यों’ पर आधारित होते हैं, वे लम्बी दूरी की राजनीति करते हैं| ‘विचारों, सिद्धांतो, और मूल्यों’ के समेकित एवं व्यवस्थित प्रतिरुप (Pattern) को ही ‘संस्कृति’ कहते हैं| इसीलिए कहा गया है कि जो राजनीतिक दल ‘संस्कृति’ की राजनीति करते हैं, वे सदियों और सहस्त्राब्दियों की राजनीति करते हैं| ठहरिए, इसे दुबारा पढ़िए| और इस कथन की व्यापकता को समझने की कोशिश करें|

भारतीय जन गण अपनी बौद्धिकता के स्तर और पेट भरने के निश्चिन्त उपाय के बाद ही राजनीतिक हो पाता है| ऐसे भारतीय जन गण को कोई भी राजनीतिक दल उसके धर्म और जाति एवं नैतिकता के नाम पर हवा में उड़ा सकता है| ऐसे भारतीय जन गण अपनी बौद्धिकता की अपेक्षा अपनी भावनात्मकता से ज्यादा संचालित और नियंत्रित होते हैं| आप हर राजनीतिक दलों के उम्मीदवारों के चयन में और दृश्य उद्देश्यों की प्रस्तुति में धर्म, जाति एवं नैतिकता के तत्व ही प्रमुख होते हैं| यह लोगों की मनोदशा के अनुरुप अनिवार्य भी हो जाता है|

कोई भी उपरोक्त सैद्धान्तिक विश्लेषण एवं मूल्यांकन के आधार पर भारतीय राजनीतिक दलों के भविष्य को समझ सकता है|

आचार्य प्रवर निरंजन  जी

अध्यक्ष, अन्तर्राष्ट्रीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान|

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