शुक्रवार, 1 मई 2026

इतिहास गतिशील क्यों होता है?

अधिकतर लोग यही जानते और मानते हैं कि इतिहास कोई स्थिर विषय –वस्तु है| वास्तव में इतिहास भी गतिशील होता है, जबकि इतिहास में ‘जड़ता’ का गुण भी होता है| दरअसल ऐसे लोग इतिहास को सिर्फ बीते हुए काल का विवरण समझते होते हैं, जबकि इतिहास जीवित लोगों के लिए होता है| इतिहास प्रेरणा देता है और मार्गदर्शन भी करता है| इतिहास को अवश्य ही वर्तमान लोगों का हितवर्धक होना होता है| इसीलिए यह कहा जाता है कि इतिहास वह ‘अतीत का विषय’ है, जो मानवीय बुद्धि का विकास करता है| कुछ लोग इतिहास को मानवीय स्वतंत्रता को ‘और संवर्धित’ करने वाला विषय बताते हैं| वास्तव में इतिहास का मूल और मुख्य उद्देश्य वर्तमान ‘मानवता को वैज्ञानिक बनाना’ होता है| ‘मानवता को वैज्ञानिक बनाने’ का अर्थ ‘मानवता को ‘प्राकृतिक न्याय’ दिलाना’ हुआ| ‘प्राकृतिक न्याय’ में स्वतन्त्रता, समता (Equality), समानता (Equity), बन्धुत्व और विकास शामिल होता है| यदि बीते हुए काल के आधार पर वर्णित सामग्री उपरोक्त उद्देश्य नहीं रखता है, तो वह इतिहास नहीं है; इतिहास के नाम ‘कुछ और’ है|

चूँकि ‘हर इतिहास समकालिक होता है, इसीलिए हर प्राचीन इतिहास को नए सन्दर्भ में लिखा जाता रहा है| भारत में तो प्राचीन इतिहास को जला देने और नष्ट कर देने की मध्ययुगीन परम्परा भी रही| भारत के शुरुआती मध्य काल में उसी प्राचीन सामग्री को जलाने और नष्ट करने से पहले उसे नए स्वरुप में संपादित कर दिया गया| सांस्कृतिक क्रांतियों के देश में कुछ ऐतिहासिक तत्वों को मिटाने एवं हटाने का प्रयास भी ‘इतिहास को ‘समकालिक’ बनाने’ की परम्परा का ही हिस्सा है| शुरुआती मध्ययुगीन भारतीय काल में प्राचीन इतिहास को नए उभरते हुए सामन्तवाद की आवश्यकताओं के अनुकूल समकालिक बनाया गया| ‘समकालिक बनाने’ की इस भारतीय पद्धति में प्राचीन काल की लकड़ी, पत्ता, चमड़ा, धातु –पत्तर और कपड़ा पर उपलब्ध एवं संरक्षित लिखित सामग्रियों को कागज़ पर नए संवर्धित भाषा में अनुवादित कर और संपादित कर दिया गया| फिर उन प्राचीन लिखित सामग्रियों को नष्ट भी कर दिया गया| इस तरह, ‘इतिहास को समकालिक’ होने की प्रक्रिया में ‘इतिहास’ को पुराने ऐतिहासिक आधार पर नयी आवश्यकताओं के अनुरुप बदल दिया गया| ऐसा सदैव होता रहा है और आगे भी होता रहेगा| इसीलिए यह कहा गया है कि आप किसी पुराने इतिहास को रद्द तो कर सकते हैं, लेकिन आप कोई अंतिम इतिहास नहीं लिख सकते हैं|

दरअसल इतिहास में दो तत्व होते हैं| पहला, ‘तथाकथित ऐतिहासिक तथ्य’, जिसका उपयोग कर एक ‘इतिहासकार’ कोई ‘इतिहास’ लिखता है| दूसरा, वह ‘इतिहासकार’, जो उन तथ्यों के आधार पर अपनी व्याख्या देता है| वह ‘तथाकथित ऐतिहासिक तथ्य’ तो ऐतिहासिक काल का होता है, जबकि वह ‘इतिहासकार’ वर्तमान का होता है| वह ‘तथाकथित ऐतिहासिक तथ्य’ भी स्वयं कुछ नहीं कहता है, बल्कि वह ‘इतिहासकार’ ही उन ऐतिहासिक तथ्यों के बहाने ‘सबकुछ’ बोलता है, जो वह कहना चाहता है| अर्थात वह ‘तथाकथित ऐतिहासिक तथ्य’ भी निर्जीव होते हुए भी सापेक्षिक हो जाता है| एक ‘इतिहासकार’ अपने ‘मन’ (Mind) का स्वामी होता है, जो अपनी इच्छाओं, आवश्यकताओं, सांस्कृतिक जड़ताओं, बौद्धिकता और बाजार की शक्तियों के अनुकूल ‘ढला’ (Casted) हुआ होता है| इस तरह, एक इतिहासकार भी समय के सापेक्षिक होता है| वह इतिहासकार जो भी इतिहास लिखेगा, वह इन्ही सीमाओं और आवश्यकताओं के ढाँचे में लिखेगा|

समय सदैव परिवर्तनशील है| परिस्थितियों और सन्दर्भों को बाजार के साधनों और शक्तियों के अनुरुप अनुकूलित होना पड़ता है| आधुनिक युग में बाजार के साधनों और शक्तियों को आर्थिक साधन एवं शक्ति कहते हैं| बदलते विज्ञान और तकनीक ही बाजार के साधनों और शक्तियों को नियंत्रित, संचालित और नियमित करता रहता है| वर्तमान के बाजार के साधनों और शक्तियों को ही इतिहास के काल में ‘ऐतिहासिक शक्तियाँ’ (Historical Forces) कहा जाता है| यही ऐतिहासिक शक्तियाँ ही ‘इतिहास’ और ‘इतिहास के काल’ को बदलता रहता है| इसीलिए सभी इतिहास को गतिशील रहना पड़ता है| हर इतिहास की वैज्ञानिक व्याख्या होनी चाहिए, जो आर्थिक साधनों और शक्तियों की क्रियाविधियों (Mechanism) पर आधारित होगी| इस आधार पर प्राचीन भारत का हर इतिहास ‘उलट –पलट’ हो जाता है| भारत की सभी सांस्कृतिक समस्यायों का यही समाधान है| इसके अलावा, परोसा गया अन्य सभी सभी प्राचीन इतिहास बनावटी है, काल्पनिक है|  

अब, समय आ गया है कि इतिहास को सभी जीवित व्यक्तियों के अनुकूल बनाया जाय| इसके लिए आधुनिक वैज्ञानिक विधियाँ ही पर्याप्त और सक्षम है| इस पर आधरित हर ऐतिहासिक व्याख्या चार्ल्स डार्विन के ‘प्राकृतिक उद्विकासवाद’ और हर्बर्ट स्पेंसर के ‘सामाजिक उद्विकासवाद’ के वैज्ञानिक सिद्धांत से समर्थित होगा| ऐसा ही ‘इतिहास’ (व्याख्या)  भारत की सभी सांस्कृतिक समस्यायों को समाधान देगा|

आचार्य प्रवर निरंजनजी

शिक्षक, लेखक, प्रेरक एवं दार्शनिक

अध्यक्ष, अन्तर्राष्ट्रीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान

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