(How can the Ambience be changed)
हम
समाज की फ़िज़ाओं को बदलने की बात कर रहे हैं| समाज की फिजाओं को बदलना, अर्थात समाज
के सामाजिक और सांस्कृतिक माहौल को सकारात्मक, सृजनात्मक और मानवतावादी बनाना होता
है| किसी भी समाज या राष्ट्र को संचालित, नियंत्रित और नियमित करने के लिए
व्यवस्था तीन स्तर – ‘संरचनात्मक सुविधाएँ’ (हार्डवेयर), सामाजिक एवं सांस्कृतिक ‘बाहय
माहौल’ (साफ्टवेयर) और स्वत:स्फूर्त माहौल (फ़िज़ावेयर) पर कार्यरत होता है| फिजाएँ
दृश्य नहीं होती है, लेकिन इसका प्रभाव एवं परिणाम स्पष्ट दिखता होता है|
समाज
या राष्ट्र एक जीवन्त तंत्र होता है, जिसे उसके सदस्यों के विचार, विश्वास, मूल्य,
व्यवहार, परम्पराएँ, मान्यताएँ, पारस्परिक सम्बन्ध और संस्थाएँ निरन्तर एक दूसरे को
प्रभावित और स्वरुप देती रहती है| इसी सामूहिक चिन्तन प्रक्रिया यानि मानसिकता से
समाज या राष्ट्र की फिजाएँ काम करती है| किसी विकसित और उन्नत राष्ट्र या निम्नतर
और बदतर राष्ट्र की वर्तमान अवस्था उसकी फिज़ाओं का सुनिश्चित परिणाम होता है| किसी
बदतर और निम्नतर समाज और राष्ट्र की दयनीय अवस्था में बदलाव इनकी फिजाओं को ही बदल
कर किया जा सकता है| यदि किसी समाज में स्वतन्त्रता, समता और समानता, वैज्ञानिक
दृष्टिकोण, सहिष्णुता, सहयोग, समन्वय एवं समरसता की भावना होती है, तो वह समाज
सकारात्मक और सृजनात्मक होता है| यदि समाज में भय, भेदभाव, अंधविश्वास, हिंसा और
असहिष्णुता का प्रभाव व्याप्त होता है, तो इसके परिणाम नकारात्मक होता है| यूरोपीय
पुनर्जागरण में संस्था, विधि (Law), शिक्षा, मीडिया और धर्म अपनी भूमिका में यथावत
स्थिर बनी हुई थी, लेकिन इसके बावजूद भी उनकी ‘फिजाओं’ ने कमाल कर दिया| यह ‘फिजाओं’
का प्रत्यक्ष प्रभाव है|
समाज
की संस्कृति मुख्यत: आर्थिक साधनों और शक्तियों से संचालित और नियमित होती है,
लेकिन इसमें संस्था, विधि (Law), शिक्षा, मीडिया और धर्म की भी भूमिका महत्वपूर्ण
होती है| तकनीक में बदलाव सदैव सामाजिक मानसिकता को बदलता रहा है| इन्हें आर्थिक
या बाजार की शक्तियाँ समझी जाती है| लोगों की मानसिकता बदलने के लिए लोगों के
विचार और उनके जीवन मूल्यों को बदलना होता है| संस्थाओं को बदलने के लिए ‘फिजाओं’
को ही बदलना होता है, क्योंकि संस्थाएँ ‘काल्पनिक’ मानसिकता पर आधारित ‘वास्तविकताएँ’
होती है| यह प्रबल और प्रभावशाली होती है| यह उन लोगों के मानसिक विश्वास पर
आधारित होते हैं| अर्थात फिजाएँ ही संस्थाओं को खंडित या सशक्त कर सकती है|
फिजाओं
को पैदा करने और उसे विकसित कर सशक्त करने की क्षमता और शक्ति सिर्फ ‘दर्शन’ में
होती है| ‘एक ‘दर्शन’ और कुछ नहीं है, सिर्फ किसी भी चीज को बढ़िया से देखने -समझने
की समझ बढाता है| अर्थात उन्नत और कुशल दर्शन आपके वर्तमान वास्तविक जीवन की
समस्यायों या उलझन को सुलझाता है| यदि कोई दर्शन है, और वह मरने के बाद की स्थिति में
सांत्वना देता है, तो वह दर्शन सामन्ती दर्शन है और वह अवैज्ञानिक है| चार्ल्स
डार्विन का वैज्ञानिक दर्शन – ‘जैवकीय उद्विकासवाद’ एक ही साथ कई स्थपित संस्थाओं
को ध्वस्त कर दिया| इसके ही साथ, आदमी किसी अप्राकृतिक एजेंसी से उत्पन्न नहीं किया
गया है, स्थपित हो गया| कार्ल मार्क्स का वैज्ञानिक दर्शन आज भी विश्व को प्रभावित
कर रहा है| इस दर्शन ने स्थापित फिज़ाओं को बदलने के लिए मजबूर कर दिया|
यदि
कोई किसी समाज, या राष्ट्र, या सम्पूर्ण मानवता के भविष्य को बदल कर बेहतर भविष्य स्थापित
करना चाहता है, तो उसे वहाँ की फिज़ाओं को ही बदल कर ऐसा कर सकता हैं| यदि व्यक्ति या
समाज किसी को लाभान्वित करना चाहता है, तो वह अपने संसाधन से ऐसा कर सकता है,
लेकिन उन लाभार्थियों की संख्या अति न्यून ही रहेगी| यदि लाभार्थियों की संख्या
कुछ बड़ी करनी है, तब उसे सत्ता का सहारा लेना होगा या सत्ता में आना होगा| लेकिन
यदि लाभार्थियों की संख्या करोडो या अरबों में है, तो आप सिर्फ और सिर्फ किसी नए ‘दर्शन’
के सहारे ही ऐसा संभव कर सकते हैं|
अल्बर्ट
आइन्स्टीन कहते हैं कि समस्या चेतना के जिस स्तर पर खड़ा है, उसका समाधान उसके ऊपर
के स्तर पर आने से ही संभव है| ‘चेतना के स्तर’ को ऊपर करना ही ‘नव –दर्शन’ है|
थामस सैम्युल कुहन ने क्रान्ति करने के लिए अनिवार्य तत्व के रुप में ‘पैरेड़ाईम शिफ्ट’
(Paradigm Shift) को गहराई से रेखांकित किया| क्रान्ति का आधार - ‘पैरेड़ाईम शिफ्ट’
भी एक ‘नव –दर्शन’ है| आप विश्व में सभी सामाजिक और सांस्कृतिक बदलाव, जिसने
मानवता का महान कल्याण किया, के पीछे कार्यरत शक्ति ‘नव –दर्शन’ ही है| आप अपने
समाज, या राष्ट्र, या समस्त मानवता को बेहतर भविष्य देना सुनिश्चित करना चाहते
हैं, तो आप भी ‘नव –दर्शन’ तैयार करे|
तब
सवाल यह है कि यह ‘नव –दर्शन’ क्या करेगा? इस ‘नव –दर्शन’ का लक्ष्य क्या होगा,
जिसे कोई स्पष्टतया देख, समझ और तैयार कर सके| जब तक कोई बेहतर भविष्य बनाने के रास्ते
में आने वाली बाधाओं की पहचान नहीं करेगा, तो उसे उस ‘दर्शन’ का ‘दर्शन’ ही समझ
में नहीं आएगा| नदी के जल -प्रवाह में बाधा बनी चट्टान को 'दर्शन' के डायनामाईट से ही उड़ा कर जल -प्रवाह को सुगम बनाया जा सकता है| विश्व को बेहतर भविष्य देने में आने वाली अधिकतर बाधाएँ अपनी
सांस्कृतिक आवरण में छिपी हुई होती है| संस्कृति किसी भी समाज, या राष्ट्र का ‘सम्मानजनक
विरासत’ होता है| चूँकि एक संस्कृति को ‘सम्मानजनक विरासत’ मान लिया जाता है,
इसलिए इसका ‘आवरण’ बहुत कठोर भी होता है और संवेदनशील भी होता है| ऐसी स्थिति में,
उस ‘सम्मानजनक विरासत’ के अन्दर मौजूद ‘भेड़िया’ की पहचान भी नहीं की जा सकती है|
अधिकतर मामलों में, उस समाज या राष्ट्र की मूल और मौलिक संस्कृति को मध्य काल की सामन्ती
संस्कृति ने विस्थापित कर दिया है| इस विस्थापन या रूपांतरण की प्रक्रियायों को
समझने की आवश्यकता है| इस समझ पर आधारित ‘नव- दर्शन’ सांस्कृतिक विरासत के खोल में
छिपे ‘भेड़िया’ को समाप्त कर देगा| यह ‘भेड़िया’ उस समाज या राष्ट्र की ऊर्जा.
उत्साह, संसाधन और वैचारिकी को चुप चाप खाए जा रहा है, या नष्ट करता जा रहा है|
इसीलिए अपेक्षित परिणाम बहुत दूर हैं|
इन
बाधाओं को दूर करने के लिए आवश्यक ‘नव –दर्शन’ को तैयार कीजिए| इस ‘नव –दर्शन’ के
बिना ‘विकास का नाटक’ तो किया जा सकता, लेकिन कोई क्रान्तिकारी प्रगति नहीं पाया
जा सकता है| विकास के लिए बाकी खेल –तमाशा जारी रहेगा| व्यवस्था और लोग भी विज्ञान
और तकनीक से उत्पन्न सुविधाओं और सम्पन्नता को अपने ‘विकास’ के खाते डालते रहते
हैं, और लोग वास्तविकता को समझ नहीं पाते हैं| ‘नव –दर्शन’ ही किसी समाज और
राष्ट्र की फिज़ाओं को बदलने की एकमात्र क्षमता रखता है|
आप
भी अपने समाज और राष्ट्र के प्रति थोडा गंभीर होइए|
आचार्य प्रवर निरंजनजी
शिक्षक, लेखक, प्रेरक
एवं दार्शनिक
अध्यक्ष, अन्तर्राष्ट्रीय अध्यात्म एवं
संस्कृति संवर्धन संस्थान
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