शुक्रवार, 6 नवंबर 2026

अग्रणी लोग कैसे सोचते हैं?

अग्रणी लोग कुछ अलग तरीके से सोचते हैं, जैसे अन्य लोग नहीं सोच पाते हैं| यह ‘अलग तरीके से सोचना’ क्या होता है और यह कैसे किया जाता है? ऐसा सामान्य लोगों के ‘जेहन’ में क्यों नहीं आता है? आप ध्यान देंगे कि इतिहास के पन्नों में बहुत कम ही लोगों के नाम आ पाते हैं| यह बात स्पष्ट रहना चाहिए कि इतिहास के पन्नों में उन्ही लोगों के नाम दर्ज हो पाते हैं, जो व्यवस्था के ‘चतुर्थ प्रक्षेत्र’ और ‘पंचम प्रक्षेत्र’ में कार्यरत होते हैं, यानि इन्ही क्षेत्रों में योगदान देते होते हैं| बाकी के जो लोग व्यवस्था के प्राथमिक या द्वितीयक या तृतीयक प्रक्षेत्र में कार्यरत होते है और बड़ी बड़ी उपलब्धियाँ प्राप्त करते रहते हैं, उनका भी नाम इतिहास में दर्ज नहीं हो पाता है| स्पष्ट है कि ऐसे लोग अग्रणी नहीं होते हैं|

अग्रणी लोग किसी विषय, या क्रियाविधि, या परिस्थिति का अध्ययन एक अलग तरीके से करते हैं, जिस पर सामान्य लोग ध्यान नहीं देते| अग्रणी लोग सबसे पहले अपने अध्ययन की विषय वस्तु का अवलोकन या अध्ययन उसको जानने के लिए करते हैं| किसी भी चीज को जानने के लिए अध्ययन करने का तात्पर्य यह है कि उसको उसके यथास्थिति में जाना जाय| उसके बाद उसके उपयोगिता सम्बन्धित लाभ –हानि, सही –गलत या नैतिक –अनैतिक होने का मूल्याङ्कन करता है| अर्थात पहले वह उस विषय के सम्बन्ध में ज्ञान प्राप्त करता है, और फिर उसका मूल्याङ्कन कर बुद्धि का उपयोग करता है, वही सामान्य लोग पहले उसके उचित या अनुचित और उसके सही या गलत कर ही ज्ञान प्राप्त करने को सोचता है|

अर्थात सामान्य लोग किसी विषय, या क्रियाविधि, या परिस्थिति का अध्ययन करने में सबसे पहले यह निश्चित करता है, कि वह सही है या गलत है, अथवा नैतिक है या अनैतिक है| उसके बाद ही कुछ सोचता है कि उसे समझा जाना चाहिए या नहीं? इस मानसिकता यानि ऐसे ‘माइण्ड सेट’ के कारण ऐसे सामान्य लोग बहुत कुछ जानते ही नहीं हैं, या अपूर्ण जानते हैं| इसका नतीजा यह होता है कि वह किसी विषय के बारे में सम्यक और सम्पूर्ण जानकारी नहीं पाता है| जब वह जानेगा ही नहीं, तब वह बुद्धि का उपयोग क्या करेगा? ऐसे लोगों को जब कोई बात समझ में नहीं आता है, तब ऐसे लोग उन बातों को या सम्बन्धित लोगों को विरोधियों से जोड़ कर प्रसन्न हो जाते हैं|

सामान्य लोग अपनी शारीरिक आवश्यकताओं या भौतिक आवश्यकताओं को ही देख समझ पाते हैं, और उन्ही आवश्यकताओं की पूर्ति पर केन्द्रित रहते हैं| अग्रणी लोग वैचारिक यानि मानसिक आवश्यकताओं के अतिरिक्त आध्यात्मिक आवश्यकताओं पर भी केन्द्रित होते हैं| ‘मानसिक चिन्तन’ और ‘आध्यात्मिक चिन्तन’ ‘समय, शांति और स्थिरता’ खोजता है, जिस पर सामान्य लोग ध्यान नहीं देते हैं| दरअसल अर्थव्यवस्था का प्रथम तीन प्रक्षेत्र सबको दिखता है, इसलिए सामान्य लोग की दृष्टि यही तक सीमित रहती है| लेकिन अर्थव्यवस्था का उपरी और अन्तिम दोनों प्रक्षेत्र अदृश्य रहता है, जो सामान्य आँखों से नहीं दिखता है| यही दोनों अन्तिम, यानि चतुर्थक और पंचम प्रक्षेत्र ‘शास्त्र’ (Philosophy) का विषय है| कहा भी गया है कि शस्त्र (Weapon) नहीं, शास्त्र (Philosophy – दर्शन) ही शासन करता है|

सामान्यत: लोग शक्ति का अर्थ शारीरिक प्रयोग से लगाते हैं, जैसे ‘लाठी की शक्ति’ या ‘वोट की शक्ति’| ‘लाठी’ और ‘वोट’ भौतिक वस्तु है, जो सामान्य आँखों से दिख जाता है, इसीलिए सामान्य जन गण इसके आगे नहीं देख पाते हैं| लेकिन सत्ता के शिखर पर कुछ ही लोग कार्यरत होते हैं| सामान्य लोगों को सत्ता का केन्द्र उस राज्य की राजधानी में दिखता है, और उन ‘सत्ता के दृश्य केन्द्र’ की विवशता या उन पर नियंत्रण के कारक शक्ति उनकी समझ के परे होता है| लेकिन अग्रणी लोगों को सत्ता का केन्द्र राजधानी से बाहर दिख जाता है| अग्रणी लोग शक्ति के शिखर के लोग बनना चाहते हैं और वह रास्ता ‘चेतना के संवर्धन’ से  होकर जाता है| अग्रणी लोग समाज, मानवता और भविष्य का हित –साधक होते हैं, जबकि सामान्य लोग भावनाओं में उड़ने वाले होते हैं| समान्य लोगों को ‘जाति, ‘’सम्प्रदाय’ यानि तथाकथित धर्म, भाषा या क्षेत्र की भावनाओं में आसानी से बहाया या उड़ाया जाता रहा है और वे लोग आगे भी उडाए जाते रहेंगे|

आज का युग बाजार का युग है| आज शक्ति का केन्द्र बाजार में है| इसे अग्रणी लोग समझते हैं| इसी बाजार के माध्यम से शक्ति या सत्ता के शिखर पर जाने का रास्ता बना हुआ है, और वे लोग उसे खूब समझते हैं| आज के ‘वित्तीय –युग’ और ‘सूचना युग’ में ‘सत्ता का केन्द्र’ खोज लेना संभव भी नहीं है| विश्व में बहुत कम ही लोगों के नियंत्रण में ‘बाजार’ और ‘डाटा’ है, जो शक्ति –उत्पादन का आधुनिक स्रोत है| बाजार की शक्तियों की ‘वोट’ और लाठी’ दोनों ही मजबूत सहारा देता है| ‘वोट’ और ‘लाठी’ के वर्तमान और भविष्य का निर्धारण बाजारवाद करता है| बाजारवाद ही बौद्धिकता के उत्पादन और वितरण को नियमित और नियंत्रित करता है|

इसलिए शक्ति या सत्ता के केन्द्र बनने के लिए अग्रणी लोगो की तरह सोचिए| “संख्या” अर्थात ‘वोट’ और लाठी’ आपके पीछे आपकी सहायता के लिए सदैव तत्पर है|

नजरें खोलिए, और नज़ारे देखिए|

   आचार्य प्रवर निरंजनजी                                                

शिक्षक, लेखक, प्रेरक एवं दार्शनिक

अध्यक्ष, अन्तर्राष्ट्रीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान

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