मंगलवार, 22 सितंबर 2026

विवाह और ‘लिव इन रिलेशनशिप’

(Marriage and ‘Live –in –Relationship’)

मैं ‘बिहार लोक प्रशासन एवं ग्रामीण विकास संस्थान’ (BIPARD) में अधिकारियों के शिक्षण –प्रशिक्षण में ‘Stress and Conflict Manaement’ पढ़ा रहा था| प्रश्नोत्तरी में मुझसे ‘लिव इन रिलेशनशिप’ के सम्बन्ध में मेरी ‘राय’ जानने की उत्सुकता उन लोगो में थी| सामान्य जनों की तरह युवा अधिकारीयों में यह तनाव / दबाव (Stress) और संघर्ष (Conflict) का कारण बन जाता है, जिसका ‘प्रबंधन’ करना उनके लिए अवश्यक हो जाता है| दरअसल लोगो को ‘Stress’ and ‘Conflict’ की समस्या इन दो भिन्न शब्दों – ‘विवाह’ और ‘लिव इन रिलेशनशिप’ की अवधारणाओं में उतना नहीं है, जितना इसका सम्बन्ध उसके ‘ज्ञान (Knowledge), ‘बुद्धि’ (Intelligence) और ‘प्रज्ञा’ (Wisdom) की समझ से है| इसीलिए आजकल के अतिव्यस्त जीवन में ऐसे लोगों को परामर्श (Counselling) की आवश्यकता होती है|

सामान्यत: लोग ‘ज्ञान’, ‘बुद्धि’ और ‘प्रज्ञा’ को एक ही अर्थ के पर्यायवाची समझ लेते हैं, और इसी कारण जीवन में अनेकों तनाव /दबाव और संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो जाती है| ‘ज्ञान’ किसी वस्तु, स्थिति और क्रियाविधि को यथास्थिति में सम्पूर्णता में जानना होता है| यह ‘ज्ञान’ उनसे सभी सम्बन्धित सूचनाओं का क्रमबद्ध एवं व्यवस्थित समेकित जानकारी होती है| यह ज्ञान ‘उचित –अनुचित’ और ‘अच्छा –बुरा’ से निरपेक्ष होता है| ‘विवाह’ और ‘लिव इन रिलेशनशिप’ के सम्बन्ध में ‘नैतिकता’ के सापेक्ष देखने –समझने की प्रवृति ही Stress और Conflict पैदा करता है; जबकि इसे सबसे पहले किसी नैतिकता के निरपेक्ष जानना -समझना चाहिए| यह ज्ञान किसी और के सापेक्षिक नहीं होता है| जब हम किसी भी वस्तु, स्थिति और क्रियाविधि को यथास्थिति में जान लेते हैं, तब हमें समझदारी और विवेकपूर्ण निर्णय लेने में, यानि कोई निष्कर्ष निकलने में सहजता होती है|  

जब हम प्राप्त किसी ज्ञान का उपयोग अपने लिए करते हैं, तब वह ‘ज्ञान’ हमारे लिए हमारी ‘बुद्धि’ बन जाती है| जब हम अपनी बुद्धि को सामने वाले के (भावनाओं के) अनुरूप करते हैं, तब वह ‘भावनात्मक बुद्धि’ (Emotional Intelligence) कहलाती है| जब हम अपनी बुद्धि को समाज के सन्दर्भ में करते हैं, तब वह बुद्धि ‘सामाजिक बुद्धि’ (Social Intelligence) कहलाती है| और जब हम अपनी बुद्धि को मानवता और 'मानवता के भविष्य' के सन्दर्भ में करते हैं, तब वह ‘प्रज्ञात्मक बुद्धि’ (Wisdom Intelligence) बन जाती है| स्पष्ट है कि जब ज्ञान एवं बुद्धि का विवेकपूर्ण उपयोग 'मानवता के भविष्य' के लिए करते हैं, वह ज्ञान ही ‘प्रज्ञा’ कहलाता है| इन तोनो को समझ लेने से ‘Stress and Conflict Manaement’ कुशल हो जाता है|

एक मानव एक ही साथ ‘Homo Sapience’ (पशु मानव), ‘Homo Socious’ (सामाजिक मानव) और  ‘Homo Faber’(निर्माता मानव) है| एक मानव को एक स्तनपायी पशु की ही तरह सभी जैवकीय आवश्यकतायों की पूर्ति होनी चाहिए| इन जैवकीय आवश्यकताओं में श्वसन, भोजन, पानी, आवास, कपड़ा, आराम, स्वास्थ्य, और यौन संतुष्टि शामिल होना सहज एवं स्वाभाविक है| इसके अतिरिक्त, मानव को दोस्ती, अपनापन, प्यार, समाजिकता, सहयोग एवं सहानुभूति आदि मानवीय गुणों की तीव्र चाहत होती है| अन्य प्राकृतिक व्यवस्था की तरह सभी पशुओं में विपरीत यौन -पूरकता’ से जीवन की निरंतरता, यानि उसे अमरत्व’ की प्राप्ति होती है| यह सब दो विपरीत लिंगी युग्म में, यानि पूरक लिंगी युवाओं के युग्म को ‘लिव इन रिलेशनशिप‘ में रहने से यह सब जैवकीय आवश्यकताएँ आसानी से प्राप्त हो जाता है| यह सब तानव से भरे अति व्यस्त नागरीय जीवन की विवशताएँ हैं| यह सम्बन्ध मात्र ‘यौन संतुष्टि’ का प्रबंधन नहीं है, बल्कि इससे बहुत ज्यादा मानवीय सहज एवं स्वाभविक प्रवृतियों का  प्रबंधन का होता है| इसका सम्बन्ध विवाह से है, या नहीं; एक अलग विचारणीय और नैतिकता का विषय है| ‘विवाह’ की सम्यक और पर्याप्त समझ से यह स्पष्ट हो सकता है|

सामान्यतया लोग विवाह को ‘यौन संबंधों’ का पर्याय समझ लेते है| लोग यह समझते है कि एक विवाह यौन संतुष्टि की सामाजिक स्वीकृत्त्यादेश (Sanctions) मात्र है, जबकि यह यौन संतुष्टि की सामाजिक स्वीकृत्त्यादेश विवाह का सबसे प्रमुख और एकमात्र कारण नहीं है| ‘विवाह’ इस संसार का एक ऐसा मौलिक और आधारभूत नींव (Foundation) है, जिस पर ‘परिवार’, समाज, राष्ट्र आदि सभी सामाजिक, सांस्कृतिक और अन्य व्यवस्थाएँ टिकी हुई है| विवाह एक सामाजिक एवं सांस्कृतिक ‘संस्था’ (Institution) है| सामान्यत: लोग एक ‘संस्था’ को एक ‘संस्थान’ (Institute) से भ्रमित हो जाते है| प्रत्येक ‘संस्था’ का, इसीलिए प्रत्येक सामाजिक एवं सांस्कृतिक ‘संस्था’ का भी एक मौलिक एवं मूल ‘दर्शन’ होता है, जो उन विशेष कर्तव्यों और उत्तरदायित्वों का निर्वहन को स्पष्ट करते हैं| यहाँ ‘दर्शन’ से तात्पर्य उसके मूल एवं मौलिक निहित आदर्शों से हैं, जिनके पूर्ति के लिए उस ख़ास 'संस्था' का गठन किया गया है| विवाह नामक संस्था का भी ऐसा ही स्पष्ट और सुनिश्चित  ‘दर्शन’ यानि निहित आदर्श है|

विवाह एक ऐसा सामाजिक एवं सांस्कृतिक ‘संस्था’ है, जो स्त्री एवं पुरुष के एक स्थायी युग्म पर बहुत से  विशेष पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक एवं शैक्षणिक कर्तव्यों और उत्तरदायित्वों का निर्वहन करने के लिए भारित करता है| इसमें अपने बच्चे को, चाहे उनसे उत्पन्न हो या उनके द्वारा गोद लिया गया हो, को समुचित तरीके से पालन पोषण करें| इसके साथ अपने ‘विस्तारित परिवार’ (Extendended Family)  के प्रति और अपने समाज के प्रति अपने विशेष कर्तव्यों और उत्तरदायित्वों का निर्वहन करे| भारत में ‘विस्तारित परिवार’ को नादानी वश ‘संयुक्त परिवार’ कह दिया जाता है|

विश्व में सिर्फ परिवार में ही ‘साम्यवाद’ (Communism) स्थापित और कार्यरत है, जहां सभी सदस्य अपनी क्षमता के अनुरुप योगदान करते हैं और अपनी आवयकता के अनुरुप पाते हैं| मानव शास्त्रियों ने बहुत से सरल एवं सहज समाजों (आदिवासी समाजों)  में ‘दादा- पोती’ और ‘दादी –पोता’ में वैवाहिक सम्बन्ध पाए हैं| ध्यान रहे कि इसमें यौन सम्बन्ध प्रमुख नहीं हुआ| स्पष्ट है कि ये सम्बन्ध यौन आधारित नहीं होकर उनकी विशेष पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक एवं शैक्षणिक कर्तव्यों और उत्तरदायित्वों का निर्वहन से सम्बन्धित हैं| समस्या यह है कि हम भारतीय ‘पश्चिमीकरण’ यानि पश्चिम के नक़ल को ही ‘आधुनिकीकरण’ या ‘वैज्ञानिक मानसिकता’ का पर्याय समझ लेते हैं|

इस तरह यह स्पष्ट है कि ‘यौन सम्बन्ध’ विवाह नामक संस्था का मूल, आधारभूत एवं अनिवार्य तत्व नहीं है| फिर भी तथाकथित मानवता के हिमायती सामान्य बुद्धिजीवी समान यौन के लोगों (समलिंगी) में विवाह को स्वीकृति देने के पक्षधर होते हैं| ऐसा इसलिए होता है, ऐसे लोग विभिन्न विषयों के तो विद्वान् होते हैं, लेकिन उनमे ‘विवाह’ नमक सामाजिक सांस्कृतिक संस्था की समझ नहीं होती है| पशु जगत में, खासकर स्तनपायी में, यौन सम्बन्ध सर्वव्यापक तो होते हैं, लेकिन उनमे ‘विवाह’ नहीं होते हैं| इसीलिए मानव को छोड़ कर कोई भी जीव अपनी विशिष्ट संसार  की रचना नहीं कर सका| प्रकृति का हरेक जैवीय उत्पाद या तो ‘सममिति’ (Symmetry) में होता है, या ‘पूरकता’ (Conplimentry) में होता है| प्रकृति का हरेक स्तनपायी दो पूरक लिंगी से ही वंशवृद्धि का सृजन करता होता है| मानव में यह पूरकता स्त्री और पुरुष में ही है, अन्यथा किसी और में यह व्यवस्था नहीं है| विवाह ही मानव को निरंतरता और अमरत्व देता है और यह कार्य सिर्फ और सिर्फ विपरीत लिंगी युग्म ही कर सकता है|

मानवशास्त्र में मानव प्रजाति के सरल एवं साधारण समाजों में मानव के सरल, साधारण, सहज और स्वाभाविक वृतियों (Instinct) का अध्ययन किया जाता है, ताकि प्राकृतिक व्यवस्था के अनुसार मानव को अधिक उपयोगी और व्यवस्थित बनाया जा सके| कोई यौन आनन्द अपने तरीके और आपसी सहमति से उठा सकता है, लेकिन वह विवाह नामक संस्था का पर्याय नहीं माना जा सकता| इसे समझ लेने से आपके ‘Stress and Conflict’ का प्रबंधन (Manaement) करना संभव है| ऐसे बहुत से प्रबंधन स्थिति विशेष के सापेक्ष हमारे ‘नजरिये’ के बदल देनें से मात्र से सम्भव हो जाता है| प्रत्येक स्थिति में सकारात्मकता और संभाव्यता की तलाश करने का दृष्टिकोण प्रत्येक  ‘Stress and Conflict’ का समुचित प्रबंधन कर देता है| इसी प्रबंधन में ‘ज्ञान’, ‘बुद्धि’ और ‘प्रज्ञा’ काम आता है| प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक विक्टर फ्रैकल इस प्रबंधन को ‘जीवन में अर्थ’ खोजने में समझाते हैं|

इसलिए ‘विवाह’ और ‘लिव इन रिलेशनशिप’ को यथास्थिति में और स्पष्ट समझ कर तनाव एवं संघर्ष मुक्त रहें|

आचार्य प्रवर निरंजनजी

शिक्षक, लेखक, प्रेरक एवं दार्शनिक

अध्यक्ष, अन्तर्राष्ट्रीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान

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शनिवार, 19 सितंबर 2026

हम कितने नादान हैं

यह शीर्षक आपको थोड़ा अटपटा लग रहा होगा| बात यह है कि हमलोग अपने को बौद्धिक तो समझते हैं’ लेकिन बहुसंख्यक आबादी को ‘निरा मूर्ख’ समझते हैं| हमें अक्सर सामान्य जनों पर, यानि भारतीय बहुसंख्यकों की ‘तथाकथित अज्ञानता’ पर झुन्झुलाहट होती है| उनकी ‘तथाकथित अज्ञानता’ के लिए हम ‘कागजी बौद्धिक’ उन्हें मूर्ख समझते हैं| यहाँ समझने की बात यह है कि यदि ये बहुसंख्यक अज्ञानी, असहाय और नासमझ नहीं रहते , तो उनको समझाने और उठाने की कोई आवश्यकता ही नहीं होती और इसमें हमारी कोई भूमिका भी नहीं होती| और यदि हमारी इस मामले में हमारी आवश्यकता ही नहीं होती, तो हमलोग बौद्धिक कहलाते ही काहे के लिए हैं? चूँकि सामान्य जन अज्ञानी, असहाय और नासमझ है, इसीलिए तो उन्हें समझने और समझाने की आवश्यकता भी है, और इसीलिए हम बौद्धिक भी हैं|

वास्तव में हमारी मूर्खता, या हमारी नादानी हमारे ‘मानव स्वाभाव’ से जुड़ा हुआ है| हमलोग ‘बुद्धिमान मानव’ (होमो सेपियंस) होते हुए भी अक्सर मूर्खतापूर्ण व्यवहार करते हुए होते हैं| पिछले आलेख में मैंने ‘ज्ञान’, बुद्धि’ और ‘प्रज्ञा’ में अन्तर एवं सम्बन्ध बताया था| हमारी ‘बुद्धि’ केवल हमारे ‘ज्ञान’ पर ही निर्भर नहीं करता, बल्कि हमारी भावनाओं, आदतों, अहंकार, भय, पूर्वाग्रहों और सामाजिक –सांस्कृतिक प्रभाव से भी नियमित और संचालित होते हैं| अपनी धारणाओं को सत्य और सही समझ लेना और सामने वाली की परिस्थितियों पर ध्यान नहीं देने से हमारी नादानी स्थापित हो जाती है| अधिकतर ‘तथाकथित बौद्धिक’ लोग भी ‘कागजी बौद्धिकों’ की भीड़ में शामिल होकर ‘बौद्धिकता का बहुमत’ स्वीकार करवा लेना चाहते है| सीमित ज्ञान के लोग ही ‘हाथी के पैर’ को ‘पाया’ (Pillar) घोषित करते रहते हैं| अक्सर देखा जाता है कि कुछ लोग मात्र किसी पुराने शिलालेख पढ़ लेने से ही अपने को सर्वज्ञानी और उद्धारक समझने लगते हैं|

यही अज्ञानता, मूर्खता और बौद्धिकता को समझने में ‘मन’ (Mind) की भूमिका आती है, और इसके विज्ञान को ही ‘मनोविज्ञान’ कहां गया है| किसी का ‘मन’ ही उसके विचार, भावनाओं और व्यवहारों को नियमित, नियंत्रित, प्रभावित और संचालित करता हुआ होता है| यदि कोई किसी दूसरे के मन को समझने की कोशिश ही नहीं करता है, और सामने वाले के ‘मन’ के अनुकूल अपनी समझदारी को प्रस्तुत नहीं कर पाता है, तो वही उस समझाने वाले व्यक्ति की नादानी या मूर्खता है| जो ‘कागजी बौद्धिक’ सामान्य जनों को मूर्ख समझता है; दरअसल वह ऐसा कह कर अपनी ‘मूर्खता’ का झेंप मिटाता हुआ होता है|

हम चाहते हैं कि हमारी ‘कागजी बौद्धिकता’ के अनुरूप ही हमारे समाज के बहुसंख्यक लोगों की समझ यानि बौद्धिकता हो| हम यह भी चाहते हैं कि हमारे समाज की समस्याएँ या बीमारियाँ भी हमारी समझ के अनुरूप हो; जबकि यह होना चाहिए कि हमारी समझ ही उन समस्यायों या बीमारियों को यथास्थिति में समझने के लायक हो| हमें समाज की समस्यायों या किसी बिमारी की प्रकृति एवं स्वभाव को समझने की आवश्यकता होती है, तभी उस बिमारी या समस्या का निदान या समाधान संभव है| हर समस्या या बिमारी का स्वभाव या प्रकृति चिकित्सक या सुधारक के ज्ञान के स्तर के अनुसार या अनुरुप नहीं होता है| इसलिए हर चिकित्सक या समाज –सुधारक को बिमारी या समस्या के अनुरूप ज्ञान के स्तर को बदलना अनिवार्य होता है|

महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइन्स्टीन कहते हैं कि समस्या चेतना के जिस स्तर पर होता है, उसका समाधान उसके चेतना स्तर के उपरी स्तर पर आने से ही सम्भव हो सकता है| जब हम समस्या या बिमारी के स्तर की चेतना से ऊपर उठ पाते हैं, तो वे समस्याएँ या बिमारी अपने सम्पूर्ण परिदृश्य में दिख पाता है| इससे हम उन सम्पूर्ण परिस्थितियों, प्रभावकारी साधनों एवं शक्तियों के प्रभाव एवं क्रियाविधियों को समझ पाते हैं| जब हम समस्यायों की सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक एवं बौद्धिक जड़ों और स्वरुप को यथास्थिति में नहीं समझ पाते हैं, तब हम बहुसंख्यक जनों को ‘मूर्ख’ होने का प्रमाण पत्र बांटना शुरु कर देते हैं| दरअसल ऐसा कर समाज के ‘कागजी बौद्धिक अपनी अज्ञानता का झेंप मिटाते हुए होते हैं| ऐसा करने से ‘हवा –हवाई’ बोद्धिकों को ‘पूर्ण ज्ञानी’ होने का ‘आत्मसुख’ मिलता है| ऐसे ‘कागजी विद्वान्’ समाज में ‘टिटहरी’ की तरह ‘टे’ ‘टे’’ करते करते इस दुनिया से विदा हो जाते हैं, लेकिन इस दुनिया को कुछ भी नहीं बदल पाते हैं| बहुसंख्यक जन ‘टिटहरी’ की तरह ‘टे’ ‘टे’’करने वालों को सुनता ही नहीं है, और इसीलिए कोई अलग परिणाम नहीं दिखता है|

हार्वर्ड विश्वविद्यालय के भौतिकी और दर्शन के प्रसिद्ध विद्वान् थामस सैम्युल कुहन ने 1962 में क्रान्ति की संरचना पर एक पुस्तक – ‘The Structure of Scientific Revolution’ लिखी| उसने इस पुस्तक में बताया कि हर क्रान्ति (Revolution) के लिए विचारों, दर्शन,  तरीको, मान्यताओं, अवधारणाओं और व्यवहारों में “पैरेड़ाईम शिफ्ट” (Paradigm Shift) करने की अनिवार्यता होती है| यदि आप अपने द्वारा लगाये गए प्रयास यानि बल की दिशा में कोई ‘विस्थापन’ (Displecement) नहीं कर पा रहे हैं, तो आप कोई ‘कार्य’ (Work) नहीं कर रहे हैं; सिर्फ ‘बकवास’ कर रहे हैं| एक बार अल्बर्ट आइन्स्टीन ने ‘पागलपन’ को समझाते हुए कहा था कि एक काम को बार बार एक ही तरीके से करना और कुछ अलग एवं क्रान्तिकारी परिणाम की अपेक्षा करना ही ‘पागलपन’ है| समाज ये ‘कागजी बौद्धिक’ सिर्फ दूसरों, यानि बहुसंख्यक आबादी पर ‘कटाक्ष’ करते हुए समाज को बदल देने का प्रयास करते रहते हैं, और क्रान्तिकारी बदलाव की अपेक्षा करते रहते हैं| दरअसल ये ‘तथाकथित बौद्धिक’ लोग समाज के ‘कागजी बौद्धिक’ हैं| मैं इन्हें ‘मूर्ख’ नहीं कहना चाहता हूँ, लेकिन आप इन्हें क्या कहना कहते हैं; आप स्वयं ही निर्णय कर लें|

आचार्य प्रवर निरंजनजी

शिक्षक, लेखक, प्रेरक एवं दार्शनिक

अध्यक्ष, अन्तर्राष्ट्रीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान

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सोमवार, 7 सितंबर 2026

ज्ञान और बुद्धि क्या है?

ज्ञान और बुद्धि क्या है? सामान्यत: लोग ‘सूचना’ (Information), ‘ज्ञान’ (Knowledge), बुद्धि’ (Intelligence), और ‘प्रज्ञा’ (Wisdom) को सही तरीके से ‘सत्य’ के निकट नहीं समझते हैं| हमें इसे इसके प्रारंभ प्रारम्भ बिंदु से उदविकासीय क्रम में समझना चाहिए, ताकि हम एक ‘सत्य’ की निकटता में विश्वास कर सके|

 ‘ज्ञान’ का प्रारम्भ अनन्त ‘बल क्षेत्र’ (Force Field) में परिवर्तन (Change) से प्रारम्भ होता है| स्थिति में सापेक्षिक परिवर्तन को ही ‘गति’ (Motion) कहते हैं| ध्यान रहे कि इस ब्रह्माण्ड में पदार्थ (Matter), ऊर्जा (Energy), स्थान/ आकाश (Space) और समय (Time), सभी की उत्पात्ति इसी ‘बल क्षेत्र’ से हुई है| अर्थात ज्ञान का प्रारम्भ इस ब्रह्माण्ड में पदार्थ, ऊर्जा, स्थान एवं समय में सापेक्षिक परिवर्तन से होती है| इनमे में से किसी एक के भी स्तर या मात्रा में परिवर्तन से ‘संकेत’ (Sign / Indication) पैदा होता है, जिसे स्थिर और स्वाभाविक ‘प्रतीक’ या ‘लक्षण’ माना जाता है| इन्ही ‘संकेतो’ के अर्थपूर्ण गतिशील प्रेषण ‘सिगनल’ (Signal) कहलाते हैं, यानि इन ‘संकेतों’ के गतिशील समुच्चय को ‘सिगनल’ कहते हैं| हर ‘सिगनल’ ‘संकेत’ होता है, लेकिन हर ‘संकेत’ ‘सिगनल’ नहीं है| ‘संकेत’ एक ‘सूचना’ का प्रारम्भ माना जाता है, लेकिन एक ‘सूचना’ उन्नत अवस्था है| एक स्थिर ‘संकेत’ ही  गतिशील होकर, यानि स्थान –परिवर्तन करने में  ‘सिगनल’ बन जाता है| एक ‘संकेत’ उसी समय ‘सिगनल’ बन पाता है, जब उस ‘सिगनल’ को कोई ग्रहण करने वाला होता है|

इन ‘सिगनलों’ के अर्थपूर्ण ‘समुच्चय’ (Set) या ‘मैट्रिक्स’ (Matrix) को ‘सूचना’ (Information) कहते हैं| ये ‘समुच्चय’ और ‘मैट्रिक्स’, दोनों ही किसी ‘सिगनल को ‘व्यवस्थित’ करने के दो भिन्न तरीके हैं|  यह ‘सिगनल’ ‘ऊर्जा का प्रवाह’ के रुप में होता है, जबकि एक ‘सूचना’ एक अर्थपूर्ण एवं मूर्त अर्थ देता हुआ होता है| ‘सिगनलों’ के मोड्यूलेशन (Modulation) से किसी ‘सूचना’ का निर्माण होता है| यह ‘सूचना’ ही ‘ज्ञान’ की व्यावहारिक इकाई है, जो ‘ज्ञान’ को व्यवहारिक आधार देता है|

ज्ञान –प्राप्ति के तीन अनिवार्य तत्व या अवयव होते हैं – ‘ज्ञान का स्रोत’. ‘ज्ञान प्राप्ति के साधन’, और ‘ज्ञान प्राप्त करने वाला व्यक्ति, तंत्र या व्यवस्था’| ‘ज्ञान का स्रोत’ ‘ज्ञान का सृजन’ ऊर्जा के प्रवाह या स्थिति या मात्रा में परिवर्तन कर करता है| यह ऊर्जा या तो यांत्रिक ऊर्जा (ध्वनि) के रुप में होगा, या इलेक्ट्रो –मैग्नेटिक तरंग के स्वरुप में होता है, जिसे मानव कई ज्ञानेन्द्रियाँ से ग्रहण कर सकता है| ‘ज्ञान प्राप्ति के साधन’ के लिए पांच ज्ञानेन्द्रियाँ, मानसिक साधन एवं आध्यात्मिक साधन हैं| पांचों ज्ञानेन्द्रियाँ से प्राप्त ‘सिगनल’ या ‘सूचना’ इलेक्ट्रो –मैग्नेटिक तरंग के स्वरुप में होता है, जो शरीर में जैवकीय रसायन में बदल कर अपने प्रभाव उत्पन्न करता है| ‘मन’ (Mind) एवं ‘चित्त’ (Spirit) की शक्तियां ‘मानसिक’ (Mental) यानी ‘विचारों’ एवं ‘भावनाओं’ का उत्पादन, संश्लेषण, संयोजन एवं नियंत्रण कर ‘ज्ञान’ का सृजन करती है| ‘ज्ञान’ का उत्कृष्ट सृजन ‘अंतर्ज्ञान’ (intuition) से उत्पन्न माना जाता है, जो ‘आध्यात्मिक’ चेतना से उत्पन्न होता है| सभी महान वैज्ञानिक, विचारक, समाज सुधारक, उद्यमी आदि इसी स्रोत से ज्ञान प्राप्त करते हैं| ज्ञान प्राप्त करने वाला व्यक्ति, तंत्र या व्यवस्था की क्षमता, योग्यता, ज्ञान प्राप्त करने वाला ‘परास’ (Range), गुणवता और उसकी आलोचनात्मक चिन्तन स्तर या उसके ‘अल्गोरिथम’ की स्थिति पर निर्भार करता है|

प्राप्त ज्ञान भी दो स्तर पर पाया जाता है| सभी पशुओं में, जिसमे सभी स्तनपायी (मानव भी स्तनपायी है) शामिल हैं, ज्ञान ‘प्रतिवर्ती क्रिया’ (Reflex Action) से करता होता है, जिसमे उसका मस्तिष्क सामान्यत: शामिल नहीं होता है| इसमें प्रत्येक सूचना (क्रिया भी) के लिए तत्काल ही प्रतिक्रिया दे दिया जाता है, जिसे पशुवत (Animaliका ज्ञान stic) प्रतिक्रिया कहते हैं| उत्कृष्ट मानसिक स्तर या आध्यात्मिक स्तर सिर्फ उच्चतर चेतना के व्यक्तियों को ही उपलब्ध होता है|

‘ज्ञान’ (Knowledge) किसी वस्तु (Objects) या किसी क्रियाविधि को उसकी ‘यथास्थिति’ की अवस्था, या स्थिति, या सन्दर्भ के सापेक्ष में ‘सम्यक रूप से जान लेना’ होता है| यह ‘ज्ञान’ नैतिकता (गलत –सही एवं उचित –अनुचित) और उपयोग के निरपेक्ष होता है| हालाँकि ‘सम्यक रूप से जान लेना’ भी एक सापेक्षिक स्थिति है और इस रुप में ‘ज्ञान’ को पूर्ण नहीं बताया जा सकता है| इसीलिए यह कहा जाता है एक ही ‘तथ्य’ (Fact) के कई ‘सत्य’ (Truth) होते हैं, और सभी ‘सत्य’ अपने सापेक्षिक स्थिति के अनुसार ‘सही’ (Correct) भी होता है| ‘ज्ञान’ के सापेक्षिक स्थिति के कारण ही ‘विज्ञान’ विकसित होता है, यानि एक ही ‘तथ्य’ के ‘ज्ञान’ के सम्बन्ध में ‘असहमति’ ही विज्ञान का आधार बनता है| इसीलिए किसी ‘ज्ञान’ को पूर्ण ‘सत्य’ और ‘स्थायी’ मानना भी ‘ज्ञान की अपूर्णता’ है| ‘क्षणिकवाद’ यानि ‘अनित्यवाद’ किसी ‘पूर्ण ज्ञान’’ को ‘अपूर्ण’ बना देता है| अर्थात सभी ‘सत्य’ ज्ञान ‘अपूर्ण ज्ञान’ हो जाता है| इस ब्रह्माण्ड में एक ही सत्य और स्थायी है, कि कुछ भी ‘सत्य और स्थायी’ नहीं है|

जब मानव अपने ‘प्राप्त ज्ञान’ का उपयोग अपने हित में करता है, तब वह ‘ज्ञान’ उसकी ‘बुद्धि’ (Intelligence) कहलाती है| ‘बुद्धि’ भी ‘सामान्य बुद्धि’, ‘भावनात्मक बुद्धि’, ‘सामाजिक बुद्धि’ एवं ‘प्रज्ञावान (Wisdom) बुद्धि’ में वर्गीकृत किया जाता है| जब मानव के ‘ज्ञान’ और ‘बुद्धि’ में ‘वर्तमान मानवता, और ‘मानवता का भविष्य’ का हित समाहित हो जाता है, तब वह ‘ज्ञान’ ही ‘प्रज्ञा’ (Wisdom) बन जाता है| ‘प्रज्ञा’ वह विशिष्ट एवं उच्चतर ‘ज्ञान’ या ‘बुद्धि’ है, जिसमे ‘प्रकृति’ और समस्त ‘पारिस्थितिकी’ (Eco System) शामिल हो जाता है| संयुक्त राष्ट्र का विकास कार्यक्रम (UNDP) के सभी सत्रह ‘धारणीय विकासत्मक लक्ष्य’ (SDGs) ही मानव के ‘प्रज्ञा’ को रेखांकित करता है| ‘प्रज्ञा’ में मानव का ‘मैं’ (I) उसके ‘हम’ (We, The People) को समाहित करते हुए उसके भी ऊपर जाकर अवस्थित हो जाता है, जो उसके “अहम्” (Aham) की स्थिति कहलाती है| यह “अहम्”  उसके ‘मैं’ और उसके ‘हम’ से परे यानि ‘पार’ की स्थिति होती है, जिसमे उसका ‘प्रकृति’ और उसका ‘पारिस्थितिकी’ समाहित हो जाता है|

आपने देखा होगा, कि बिहार, जो बुद्धि के विहारों (बौद्धिक –मनन केंद्र) के नाम पर बना क्षेत्र माना जाता है, की संस्कृति में वहां के लोग  सामान्यत: “मैं” के स्थान पर “हम” या “अहम्” शब्द का प्रयोग करते हैं| यही प्रज्ञा का उत्कर्ष है| यहाँ ‘अहम्’ (अधि + हम, हम से ऊपर) यानि “हम से परे” का अंग्रेजी शब्द संदर्भवश ‘Ego’ नहीं है| “हम” शब्द व्यापक शब्द है, जो किसी “मैं” से बहुत उच्चतर अवस्था का भाव रखता है और 'अहम्' उस हम से भी परे है।

आपने संकेत, सिगनल, सूचना, ज्ञान, बुद्धि एवं प्रज्ञा को समझ लिया होगा|

आचार्य प्रवर निरंजनजी

अध्यक्ष, अन्तर्राष्ट्रीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान|

विवाह और ‘लिव इन रिलेशनशिप’

(Marriage and ‘Live –in –Relationship’) मैं ‘बिहार लोक प्रशासन एवं ग्रामीण विकास संस्थान’ (BIPARD ) में अधिकारियों के शिक्षण –प्रशिक्षण में ...