सोमवार, 7 सितंबर 2026

ज्ञान और बुद्धि क्या है?

ज्ञान और बुद्धि क्या है? सामान्यत: लोग ‘सूचना’ (Information), ‘ज्ञान’ (Knowledge), बुद्धि’ (Intelligence), और ‘प्रज्ञा’ (Wisdom) को सही तरीके से ‘सत्य’ के निकट नहीं समझते हैं| हमें इसे इसके प्रारंभ प्रारम्भ बिंदु से उदविकासीय क्रम में समझना चाहिए, ताकि हम एक ‘सत्य’ की निकटता में विश्वास कर सके|

 ‘ज्ञान’ का प्रारम्भ अनन्त ‘बल क्षेत्र’ (Force Field) में परिवर्तन (Change) से प्रारम्भ होता है| स्थिति में सापेक्षिक परिवर्तन को ही ‘गति’ (Motion) कहते हैं| ध्यान रहे कि इस ब्रह्माण्ड में पदार्थ (Matter), ऊर्जा (Energy), स्थान/ आकाश (Space) और समय (Time), सभी की उत्पात्ति इसी ‘बल क्षेत्र’ से हुई है| अर्थात ज्ञान का प्रारम्भ इस ब्रह्माण्ड में पदार्थ, ऊर्जा, स्थान एवं समय में सापेक्षिक परिवर्तन से होती है| इनमे में से किसी एक के भी स्तर या मात्रा में परिवर्तन से ‘संकेत’ (Sign / Indication) पैदा होता है, जिसे स्थिर और स्वाभाविक ‘प्रतीक’ या ‘लक्षण’ माना जाता है| इन्ही ‘संकेतो’ के अर्थपूर्ण गतिशील प्रेषण ‘सिगनल’ (Signal) कहलाते हैं, यानि इन ‘संकेतों’ के गतिशील समुच्चय को ‘सिगनल’ कहते हैं| हर ‘सिगनल’ ‘संकेत’ होता है, लेकिन हर ‘संकेत’ ‘सिगनल’ नहीं है| ‘संकेत’ एक ‘सूचना’ का प्रारम्भ माना जाता है, लेकिन एक ‘सूचना’ उन्नत अवस्था है| एक स्थिर ‘संकेत’ ही  गतिशील होकर, यानि स्थान –परिवर्तन करने में  ‘सिगनल’ बन जाता है| एक ‘संकेत’ उसी समय ‘सिगनल’ बन पाता है, जब उस ‘सिगनल’ को कोई ग्रहण करने वाला होता है|

इन ‘सिगनलों’ के अर्थपूर्ण ‘समुच्चय’ (Set) या ‘मैट्रिक्स’ (Matrix) को ‘सूचना’ (Information) कहते हैं| ये ‘समुच्चय’ और ‘मैट्रिक्स’, दोनों ही किसी ‘सिगनल को ‘व्यवस्थित’ करने के दो भिन्न तरीके हैं|  यह ‘सिगनल’ ‘ऊर्जा का प्रवाह’ के रुप में होता है, जबकि एक ‘सूचना’ एक अर्थपूर्ण एवं मूर्त अर्थ देता हुआ होता है| ‘सिगनलों’ के मोड्यूलेशन (Modulation) से किसी ‘सूचना’ का निर्माण होता है| यह ‘सूचना’ ही ‘ज्ञान’ की व्यावहारिक इकाई है, जो ‘ज्ञान’ को व्यवहारिक आधार देता है|

ज्ञान –प्राप्ति के तीन अनिवार्य तत्व या अवयव होते हैं – ‘ज्ञान का स्रोत’. ‘ज्ञान प्राप्ति के साधन’, और ‘ज्ञान प्राप्त करने वाला व्यक्ति, तंत्र या व्यवस्था’| ‘ज्ञान का स्रोत’ ‘ज्ञान का सृजन’ ऊर्जा के प्रवाह या स्थिति या मात्रा में परिवर्तन कर करता है| यह ऊर्जा या तो यांत्रिक ऊर्जा (ध्वनि) के रुप में होगा, या इलेक्ट्रो –मैग्नेटिक तरंग के स्वरुप में होता है, जिसे मानव कई ज्ञानेन्द्रियाँ से ग्रहण कर सकता है| ‘ज्ञान प्राप्ति के साधन’ के लिए पांच ज्ञानेन्द्रियाँ, मानसिक साधन एवं आध्यात्मिक साधन हैं| पांचों ज्ञानेन्द्रियाँ से प्राप्त ‘सिगनल’ या ‘सूचना’ इलेक्ट्रो –मैग्नेटिक तरंग के स्वरुप में होता है, जो शरीर में जैवकीय रसायन में बदल कर अपने प्रभाव उत्पन्न करता है| ‘मन’ (Mind) एवं ‘चित्त’ (Spirit) की शक्तियां ‘मानसिक’ (Mental) यानी ‘विचारों’ एवं ‘भावनाओं’ का उत्पादन, संश्लेषण, संयोजन एवं नियंत्रण कर ‘ज्ञान’ का सृजन करती है| ‘ज्ञान’ का उत्कृष्ट सृजन ‘अंतर्ज्ञान’ (intuition) से उत्पन्न माना जाता है, जो ‘आध्यात्मिक’ चेतना से उत्पन्न होता है| सभी महान वैज्ञानिक, विचारक, समाज सुधारक, उद्यमी आदि इसी स्रोत से ज्ञान प्राप्त करते हैं| ज्ञान प्राप्त करने वाला व्यक्ति, तंत्र या व्यवस्था की क्षमता, योग्यता, ज्ञान प्राप्त करने वाला ‘परास’ (Range), गुणवता और उसकी आलोचनात्मक चिन्तन स्तर या उसके ‘अल्गोरिथम’ की स्थिति पर निर्भार करता है|

प्राप्त ज्ञान भी दो स्तर पर पाया जाता है| सभी पशुओं में, जिसमे सभी स्तनपायी (मानव भी स्तनपायी है) शामिल हैं, ज्ञान ‘प्रतिवर्ती क्रिया’ (Reflex Action) से करता होता है, जिसमे उसका मस्तिष्क सामान्यत: शामिल नहीं होता है| इसमें प्रत्येक सूचना (क्रिया भी) के लिए तत्काल ही प्रतिक्रिया दे दिया जाता है, जिसे पशुवत (Animaliका ज्ञान stic) प्रतिक्रिया कहते हैं| उत्कृष्ट मानसिक स्तर या आध्यात्मिक स्तर सिर्फ उच्चतर चेतना के व्यक्तियों को ही उपलब्ध होता है|

‘ज्ञान’ (Knowledge) किसी वस्तु (Objects) या किसी क्रियाविधि को उसकी ‘यथास्थिति’ की अवस्था, या स्थिति, या सन्दर्भ के सापेक्ष में ‘सम्यक रूप से जान लेना’ होता है| यह ‘ज्ञान’ नैतिकता (गलत –सही एवं उचित –अनुचित) और उपयोग के निरपेक्ष होता है| हालाँकि ‘सम्यक रूप से जान लेना’ भी एक सापेक्षिक स्थिति है और इस रुप में ‘ज्ञान’ को पूर्ण नहीं बताया जा सकता है| इसीलिए यह कहा जाता है एक ही ‘तथ्य’ (Fact) के कई ‘सत्य’ (Truth) होते हैं, और सभी ‘सत्य’ अपने सापेक्षिक स्थिति के अनुसार ‘सही’ (Correct) भी होता है| ‘ज्ञान’ के सापेक्षिक स्थिति के कारण ही ‘विज्ञान’ विकसित होता है, यानि एक ही ‘तथ्य’ के ‘ज्ञान’ के सम्बन्ध में ‘असहमति’ ही विज्ञान का आधार बनता है| इसीलिए किसी ‘ज्ञान’ को पूर्ण ‘सत्य’ और ‘स्थायी’ मानना भी ‘ज्ञान की अपूर्णता’ है| ‘क्षणिकवाद’ यानि ‘अनित्यवाद’ किसी ‘पूर्ण ज्ञान’’ को ‘अपूर्ण’ बना देता है| अर्थात सभी ‘सत्य’ ज्ञान ‘अपूर्ण ज्ञान’ हो जाता है| इस ब्रह्माण्ड में एक ही सत्य और स्थायी है, कि कुछ भी ‘सत्य और स्थायी’ नहीं है|

जब मानव अपने ‘प्राप्त ज्ञान’ का उपयोग अपने हित में करता है, तब वह ‘ज्ञान’ उसकी ‘बुद्धि’ (Intelligence) कहलाती है| ‘बुद्धि’ भी ‘सामान्य बुद्धि’, ‘भावनात्मक बुद्धि’, ‘सामाजिक बुद्धि’ एवं ‘प्रज्ञावान (Wisdom) बुद्धि’ में वर्गीकृत किया जाता है| जब मानव के ‘ज्ञान’ और ‘बुद्धि’ में ‘वर्तमान मानवता, और ‘मानवता का भविष्य’ का हित समाहित हो जाता है, तब वह ‘ज्ञान’ ही ‘प्रज्ञा’ (Wisdom) बन जाता है| ‘प्रज्ञा’ वह विशिष्ट एवं उच्चतर ‘ज्ञान’ या ‘बुद्धि’ है, जिसमे ‘प्रकृति’ और समस्त ‘पारिस्थितिकी’ (Eco System) शामिल हो जाता है| संयुक्त राष्ट्र का विकास कार्यक्रम (UNDP) के सभी सत्रह ‘धारणीय विकासत्मक लक्ष्य’ (SDGs) ही मानव के ‘प्रज्ञा’ को रेखांकित करता है| ‘प्रज्ञा’ में मानव का ‘मैं’ (I) उसके ‘हम’ (We, The People) को समाहित करते हुए उसके भी ऊपर जाकर अवस्थित हो जाता है, जो उसके “अहम्” (Aham) की स्थिति कहलाती है| यह “अहम्”  उसके ‘मैं’ और उसके ‘हम’ से परे यानि ‘पार’ की स्थिति होती है, जिसमे उसका ‘प्रकृति’ और उसका ‘पारिस्थितिकी’ समाहित हो जाता है|

आपने देखा होगा, कि बिहार, जो बुद्धि के विहारों (बौद्धिक –मनन केंद्र) के नाम पर बना क्षेत्र माना जाता है, की संस्कृति में वहां के लोग  सामान्यत: “मैं” के स्थान पर “हम” या “अहम्” शब्द का प्रयोग करते हैं| यही प्रज्ञा का उत्कर्ष है| यहाँ ‘अहम्’ यानि “हम से परे” का अंग्रेजी शब्द संदर्भवश ‘Ego’ नहीं है| “हम” शब्द व्यापक शब्द है, जो किसी “मैं” से बहुत उच्चतर अवस्था का भाव रखता है|

आपने संकेत, सिगनल, सुचना, ज्ञान, बुद्धि एवं प्रज्ञा को समझ लिया होगा|

आचार्य प्रवर निरंजनजी

अध्यक्ष, अन्तर्राष्ट्रीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान|

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

ज्ञान और बुद्धि क्या है?

ज्ञान और बुद्धि क्या है? सामान्यत: लोग ‘सूचना’ (Information), ‘ज्ञान’ (Knowledge), बुद्धि’ (Intelligence), और ‘प्रज्ञा’ (Wisdom) को सही तरीक...