यह
शीर्षक आपको थोड़ा अटपटा लग रहा होगा| बात यह है कि हमलोग अपने को बौद्धिक तो समझते
हैं’ लेकिन बहुसंख्यक आबादी को ‘निरा मूर्ख’ समझते हैं| हमें अक्सर सामान्य जनों
पर, यानि भारतीय बहुसंख्यकों की ‘तथाकथित अज्ञानता’ पर झुन्झुलाहट होती है| उनकी ‘तथाकथित
अज्ञानता’ के लिए हम ‘कागजी बौद्धिक’ उन्हें मूर्ख समझते हैं| यहाँ समझने की
बात यह है कि यदि ये बहुसंख्यक अज्ञानी, असहाय और नासमझ नहीं रहते , तो उनको समझाने
और उठाने की कोई आवश्यकता ही नहीं होती और इसमें हमारी कोई भूमिका भी नहीं होती|
और यदि हमारी इस मामले में हमारी आवश्यकता ही नहीं होती, तो हमलोग बौद्धिक कहलाते ही
काहे के लिए हैं? चूँकि सामान्य जन अज्ञानी, असहाय और नासमझ है, इसीलिए तो उन्हें
समझने और समझाने की आवश्यकता भी है, और इसीलिए हम बौद्धिक भी हैं|
वास्तव
में हमारी मूर्खता, या हमारी नादानी हमारे ‘मानव स्वाभाव’ से जुड़ा हुआ है| हमलोग ‘बुद्धिमान
मानव’ (होमो सेपियंस) होते हुए भी अक्सर मूर्खतापूर्ण व्यवहार करते हुए होते हैं|
पिछले आलेख में मैंने ‘ज्ञान’, बुद्धि’ और ‘प्रज्ञा’ में अन्तर एवं सम्बन्ध बताया
था| हमारी ‘बुद्धि’ केवल हमारे ‘ज्ञान’ पर ही निर्भर नहीं करता, बल्कि हमारी
भावनाओं, आदतों, अहंकार, भय, पूर्वाग्रहों और सामाजिक –सांस्कृतिक प्रभाव से भी
नियमित और संचालित होते हैं| अपनी धारणाओं को सत्य और सही समझ लेना और सामने वाली
की परिस्थितियों पर ध्यान नहीं देने से हमारी नादानी स्थापित हो जाती है| अधिकतर ‘तथाकथित
बौद्धिक’ लोग भी ‘कागजी बौद्धिकों’ की भीड़ में शामिल होकर ‘बौद्धिकता का बहुमत’ स्वीकार
करवा लेना चाहते है| सीमित ज्ञान के लोग ही ‘हाथी के पैर’ को ‘पाया’ (Pillar)
घोषित करते रहते हैं| अक्सर देखा जाता है कि कुछ लोग मात्र किसी पुराने शिलालेख पढ़
लेने से ही अपने को सर्वज्ञानी और उद्धारक समझने लगते हैं|
यही
अज्ञानता, मूर्खता और बौद्धिकता को समझने में ‘मन’ (Mind) की भूमिका आती है, और इसके विज्ञान
को ही ‘मनोविज्ञान’ कहां गया है| किसी का ‘मन’ ही उसके विचार, भावनाओं और
व्यवहारों को नियमित, नियंत्रित, प्रभावित और संचालित करता हुआ होता है| यदि कोई
किसी दूसरे के मन को समझने की कोशिश ही नहीं करता है, और सामने वाले के ‘मन’ के
अनुकूल अपनी समझदारी को प्रस्तुत नहीं कर पाता है, तो वही उस समझाने वाले व्यक्ति की
नादानी या मूर्खता है| जो ‘कागजी बौद्धिक’ सामान्य जनों को मूर्ख समझता है; दरअसल
वह ऐसा कह कर अपनी ‘मूर्खता’ का झेंप मिटाता हुआ होता है|
हम
चाहते हैं कि हमारी ‘कागजी बौद्धिकता’ के अनुरूप ही हमारे समाज के बहुसंख्यक लोगों
की समझ यानि बौद्धिकता हो| हम यह भी चाहते हैं कि हमारे समाज की समस्याएँ या
बीमारियाँ भी हमारी समझ के अनुरूप हो; जबकि यह होना चाहिए कि हमारी समझ ही उन
समस्यायों या बीमारियों को यथास्थिति में समझने के लायक हो| हमें समाज की
समस्यायों या किसी बिमारी की प्रकृति एवं स्वभाव को समझने की आवश्यकता होती है,
तभी उस बिमारी या समस्या का निदान या समाधान संभव है| हर समस्या या बिमारी का
स्वभाव या प्रकृति चिकित्सक या सुधारक के ज्ञान के स्तर के अनुसार या अनुरुप नहीं
होता है| इसलिए हर चिकित्सक या समाज –सुधारक को बिमारी या समस्या के अनुरूप ज्ञान के स्तर को बदलना अनिवार्य होता है|
महान
वैज्ञानिक अल्बर्ट आइन्स्टीन कहते हैं कि समस्या चेतना के जिस स्तर पर होता है,
उसका समाधान उसके चेतना स्तर के उपरी स्तर पर आने से ही सम्भव हो सकता है| जब हम समस्या
या बिमारी के स्तर की चेतना से ऊपर उठ पाते हैं, तो वे समस्याएँ या बिमारी अपने
सम्पूर्ण परिदृश्य में दिख पाता है| इससे हम उन सम्पूर्ण परिस्थितियों, प्रभावकारी
साधनों एवं शक्तियों के प्रभाव एवं क्रियाविधियों को समझ पाते हैं| जब हम समस्यायों
की सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक एवं बौद्धिक जड़ों और स्वरुप को यथास्थिति में नहीं
समझ पाते हैं, तब हम बहुसंख्यक जनों को ‘मूर्ख’ होने का प्रमाण पत्र बांटना शुरु कर
देते हैं| दरअसल ऐसा कर समाज के ‘कागजी बौद्धिक अपनी अज्ञानता का झेंप मिटाते हुए
होते हैं| ऐसा करने से ‘हवा –हवाई’ बोद्धिकों को ‘पूर्ण ज्ञानी’ होने का ‘आत्मसुख’
मिलता है| ऐसे ‘कागजी विद्वान्’ समाज में ‘टिटहरी’ की तरह ‘टे’ ‘टे’’ करते करते इस
दुनिया से विदा हो जाते हैं, लेकिन इस दुनिया को कुछ भी नहीं बदल पाते हैं|
बहुसंख्यक जन ‘टिटहरी’ की तरह ‘टे’ ‘टे’’करने वालों को सुनता ही नहीं है, और
इसीलिए कोई अलग परिणाम नहीं दिखता है|
हार्वर्ड
विश्वविद्यालय के भौतिकी और दर्शन के प्रसिद्ध विद्वान् थामस सैम्युल कुहन ने 1962
में क्रान्ति की संरचना पर एक पुस्तक – ‘The Structure of Scientific Revolution’ लिखी|
उसने इस पुस्तक में बताया कि हर क्रान्ति (Revolution) के लिए विचारों, दर्शन, तरीको, मान्यताओं, अवधारणाओं और व्यवहारों में
“पैरेड़ाईम शिफ्ट” (Paradigm Shift) करने की अनिवार्यता होती है| यदि आप अपने
द्वारा लगाये गए प्रयास यानि बल की दिशा में कोई ‘विस्थापन’ (Displecement) नहीं कर पा
रहे हैं, तो आप कोई ‘कार्य’ (Work) नहीं कर रहे हैं; सिर्फ ‘बकवास’ कर रहे हैं| एक
बार अल्बर्ट आइन्स्टीन ने ‘पागलपन’ को समझाते हुए कहा था कि एक काम को बार बार एक
ही तरीके से करना और कुछ अलग एवं क्रान्तिकारी परिणाम की अपेक्षा करना ही ‘पागलपन’
है| समाज ये ‘कागजी बौद्धिक’ सिर्फ दूसरों, यानि बहुसंख्यक आबादी पर ‘कटाक्ष’ करते
हुए समाज को बदल देने का प्रयास करते रहते हैं, और क्रान्तिकारी बदलाव की अपेक्षा
करते रहते हैं| दरअसल ये ‘तथाकथित बौद्धिक’ लोग समाज के ‘कागजी बौद्धिक’ हैं| मैं
इन्हें ‘मूर्ख’ नहीं कहना चाहता हूँ, लेकिन आप इन्हें क्या कहना कहते हैं; आप
स्वयं ही निर्णय कर लें|
आचार्य प्रवर निरंजनजी
शिक्षक, लेखक, प्रेरक एवं दार्शनिक
अध्यक्ष, अन्तर्राष्ट्रीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन
संस्थान
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