बुधवार, 13 मई 2026

भारतीय राष्ट्र –निर्माण में इतिहास की समस्याएँ

‘राष्ट्र’ के निर्माण में ‘इतिहास’ की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है| ‘राष्ट्र’ कोई ‘देश’ नहीं होता है| यह ‘राष्ट्र’ ‘ऐतिहासिक एकापन (Historical Oneness) की मनोदशा’ होता है, जो ऐतिहासिक काल में एक साथ रहने से तैयार होता है| यह ‘राष्ट्र’ सभी लोगों की भावना पर आधारित होता है, इसीलिए भारतीय संविधान की उद्देशिका में ‘राष्ट्र की एकता और अखंडता’ के सुनिश्चयन की बात की गयी है, किसी देश या राज्य या प्रान्त की बात नहीं की गयी है| किसी ‘राष्ट्र –निर्माण’ को उसका ‘भूगोल’ और ‘इतिहास’ आधार देता है, अर्थात उस निश्चित भूगोल पर इतिहास कार्य कर उसे ‘राष्ट्र’ बनाता है| भूगोल को सामान्यत: ‘प्रकृति’ आकार देता है, लेकिन इतिहास को समकालिक ‘आर्थिक साधन एवं शक्तियाँ’ बनाता है और उसे बदलता भी रहता है| ‘आर्थिक साधन एवं शक्तियों’ को ‘तकनीक’ और ‘बाजार’ निर्धारित करता है, जिन्हें ‘बाजार के साधन एवं शक्तियाँ’ कहते हैं|

‘इतिहास’ ही ‘संस्कार’ और ‘संस्कृति’ को आकार देता है| ‘इतिहास’ ही ‘वर्तमान और भविष्य’ को समझता और समझाता है, क्योंकि ‘इतिहास’ ही वर्तमान और भविष्य का ‘जड़’ (Root) या ‘नींव’ (Foundation) होता है| वर्तमान और भविष्य की समस्यायों को समझने और उसके समाधान पाने में ‘इतिहास’ का समझ बहुत महत्वपूर्ण है| भारत की सभी सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक समस्यायों का समाधान ‘इतिहास’ की वैज्ञानिक, तथ्यगत और तार्किक व्याख्या में है| इसीलिए सभी ‘शासक वर्ग’ इतिहास की ऐसी ‘वैज्ञानिक व्याख्या’ से बचते हैं| ‘सत्ता’ यानि ‘शासक वर्ग’ अपने वर्चस्व की निरन्तरता को बनाये रखने के लिए इतिहास का नकारात्मक उपयोग करता है, जबकि ‘राष्ट्र –निर्माण’ के लिए इतिहास की सकारात्मक व्याख्या होनी चाहिए| साम्राज्यवादियों का अपना निहित उद्देश्य था, यह समझ में आता है, लेकिन भारतीय बौद्धिक वर्ग को यह सब समझना चाहिए| भारतीय राष्ट्र के निर्माण में इसी समझ के अभाव में बाधित पडा हुआ है| इसके बिना भारत एक सशक्त और समृद्ध राष्ट्र बन ही नहीं सकता है|

‘इतिहास’ का अत्यधिक महिमामंडन करना भी ‘वर्तमान’ को कमजोर कर सकता है, जो ‘राष्ट्र’, ‘संस्कृति’ और ‘संस्कार’ को गलत दिशा दे सकता है| यह सदैव याद रखना चाहिए कि ‘स्वर्ण –युग’ सदैव ‘भविष्य काल’ में आता है, और यही ‘आशावादी’ दृष्टिकोण है| ‘स्वर्ण –युग’ किसी ‘पुरातन’ में कभी नहीं हो सकता है| किसी इतिहास में ‘स्वर्ण –युग’ मान लेना भी मानवता के भविष्य के लिए लिए घातक होता है| ‘सामूहिक भावनात्मक स्मृतियाँ’ को इतिहास नहीं माना जाना चाहिए| सभी इतिहास को अवश्य ही तथ्यों और वैज्ञानिक विधियों की तार्किकता और विवेकशीलता पर आधारित होना चाहिए| अधिकांश लोग इतिहास को समझने के बजाय ‘मान लेते’ हैं| ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि सामान्य जन गण में ‘आलोचनात्मक चिन्तन’ की समझ नहीं होती है| यदि ‘समझ’ होती है, तो इसके लिए आवश्यक ‘क्षमता’, ‘योग्यता’ और ‘स्तर’ नहीं होता है| चूँकि इसके लिए समय, वैचारिकी और क्षमता चाहिए होता है, इसीलिए सामान्य जन गण को ‘भावनात्मक कहानियो’ और ‘आख्यानों’ को इतिहास ‘मान लेने’ में ज्यादा आसानी होती है|

चूँकि इतिहास पुरातन होता है और पुरातनता की अवधि ही ‘इतिहास की गहराइयों’ को निर्धारित करता है, इसीलिए इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण काल ‘प्राचीन काल’ का होता है| ‘प्राचीन काल’ का इतिहास ही ‘संस्कृति’, ‘संस्कार’ और ‘राष्ट्र’ की सबसे गहरी ‘जड़े’ होती है| इसलिए भारतीय राष्ट्र के निर्माण में ‘प्राचीन इतिहास’ ही सबसे प्रमुख है, जिससे सम्बन्धित समस्यायों को समझना अनिवार्य है|

भारतीय राष्ट्र के निर्माण में इतिहास की सबसे प्रमुख समस्या यह है कि सामान्य जन गण सहित इतिहास के अधिकतर विद्वान् भी इतिहास के ‘समकालिक होने की अनिवार्यता’ और ‘समकालिक होने की प्रक्रिया’ को नहीं समझते हैं| ऐसे लोगों को इतिहास की क्रिया विधियों की समझ नहीं होती है, या वे सब कुछ जानते और समझते हुए भी अपने वर्गीय हितों में ‘नासमझ’ बने रहते हैं| ‘इतिहास के समकालिक होने’ की प्रक्रिया में जब भी इतिहास का कोई पुनर्लेखन होता है, तब पहले की उपलब्ध इतिहास को समकालिक आवश्यकताओं, परिस्थितियों और शक्तियों के अनुरुप अनुकूलित होना पड़ता है| इसी इतिहास के अनुरुप ही प्राचीन ‘संस्कारों’ और ‘संस्कृतियों’ को भी ‘समकालिक’ होना होता है| ‘संस्कार’ और ‘संस्कृति’ एक ही साथ ‘जड़’ भी होता है और ‘गतिशील’ भी होता है, जैसे एक पेड़ का जड़ और तना ‘जड़’ रहता है और ‘फुनगियाँ’ लहराती रहती है|

इतिहास, संस्कार और संस्कृति को अपने समय के ‘समकालिक’ होना हर काल की अनिवार्यता होती है| इसीलिए कोई भी इतिहासकार कोई ‘अन्तिम इतिहास’ नहीं लिख सकता है, लेकिन हर बार ‘उपलब्ध इतिहास’ को या तो रद्द कर सकता है या संशोधित करता रहता है| प्राचीन भारत का अधिकांश उपलब्ध इतिहास को मध्य कालीन सामन्ती आवश्यकताओं, परिस्थितियों, व्यवस्थाओं और शक्तियों के अनुरुप ‘समकालिक’ होना पड़ा| यह इतिहास लेखन कागज के आविष्कार होने और भारत में इसके अति प्रचालन में आने के बाद ही शुरु हुआ| भारत में कागज़ का बहु –प्रचालन मध्य युग के सामन्ती काल में ही हुआ, और इसीलिए भारत के प्राचीन इतिहास को मध्य युगीन सामन्ती शक्तियों, आवश्यकताओं, परिस्थितियों, और व्यवस्थाओं के अनुकूल होना पड़ा| इस तरह, भारत का प्राचीन इतिहास पूरी तरह ‘समकालिक’ होकर ‘सामन्ती चरित्र’ का हो गया|

आज भी प्राचीन भारत का यही इतिहास उपलब्ध है, जो मूल अवस्था में नहीं है| इन्हें समझने और उसमे यथा आवश्यक संशोधन और परिमार्जन करने की अनिवार्यता है| इस ‘संशोधन’ या ‘परिमार्जन’ के बिना भारत कभी भी एक सशक्त राष्ट्र नहीं बन सकता है| प्राचीन भारत के इतिहास को आज विकृत स्वरुप में उपलब्ध होना इसलिए कहना पड़ रहा है, क्योंकि इस इतिहास में कई तथ्यगत साक्ष्यों, सामान्य तार्किकताओं, और वैज्ञानिकताओं का स्पष्ट और प्रत्यक्ष अभाव है|

भारतीय राष्ट्र –निर्माण में इतिहास की यही समस्या सबसे बाधा बनी हुई है, जो भारत की सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक एवं राजनीतिक विकास में स्पष्ट बाधा के रुप में दिखती  है|  

आचार्य प्रवर निरंजन जी

अध्यक्ष, अन्तरराष्ट्रीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान|

मंगलवार, 12 मई 2026

भाषा का उद्विकास शक्ति और आधिपत्य के लिए होता है

भाषा का उद्विकास (Evolution) एक बहुत ही जटिल और सतत प्रक्रिया है। यह किसी एक व्यक्ति या संस्था द्वारा निर्मित नहीं होती, बल्कि समाज, संस्कृति, भूगोल, इतिहास और मानवीय व्यवहार के साथ धीरे-धीरे विकसित होती है। इसका उद्विकास ही शक्ति और आधिपत्य करने के लिए होता है| मानव अपनी शुरुआती अवस्था में इसके द्वारा प्रकृति और पशुओं  पर आधिपत्य करना चाहा| फिर उसने इसका उपयोग क्रमश: दूसरे मानव पर, दूसरे समाज पर और दूसरी संस्कृतियों पर आधिपत्य करने के लिए किया| ‘अधिपत्य’ करने के लिए एक विशेष और विशिष्ट ‘शक्ति’ प्राप्त करना होता है, और यह सब भाषा के सहयोग से ही संभव होता है|

इस तरह यह स्पष्ट होता है कि भाषा केवल संचार का माध्यम नहीं है, बल्कि यह शक्ति (Power), अर्थ-निर्माण (Meaning-making), और सामाजिक नियंत्रण (Hegemony) का उपकरण हो जाती है। भाषा का उद्विकास एक प्राकृतिक, सामाजिक और ऐतिहासिक प्रक्रिया है, जिसमें समाज अपनी भाषा बनाता है, उसकी संस्कृति उस भाषा को आकार देती है और समय –काल उस विशिष्ट भाषा को अपने अनुकूल कर बदलता रहता है| भाषा के अनुकूलन में अब ‘राज्य –शक्ति’ भी शामिल हो गया है|

सबसे पहले हमें ‘ज्ञान’, ‘बुद्धि’ और ‘प्रज्ञा’ को स्पष्ट अन्तर के साथ समझ लेना चाहिए| भाषा की शुरुआत तत्कालीन परिस्थितियों में ऊर्जा के स्तर में एक 'बदलाव' से होती है, जो हमारी संवेदी अंगों द्वारा संग्रहीत एवं उनकी अंतर्क्रियाओं द्वारा प्रस्करित (Processed) होती है, जिसे ‘उत्तेजना’ (Excitation) कहते है| मानव जाति इस प्रक्रिया के लिए जैवकीय रुप में सक्षम है| यह विशेष एवं विशिष्ट ‘उत्तेजना’ एक खास 'इशारा' (Caveat) देता है। इन विशेष एवं विशिष्ट इशारों के समेकन से एक विशेष एवं विशिष्ट 'चिन्ह' (Symbol) बनता है। उन चिन्हों को 'संकेत' (Signal) कहा जाता है‌। इन्ही विशेष एवं विशिष्ट ‘संकेतों’ के व्यवस्थित और संगठित प्रेषण से एक निश्चित 'एलान' (Annunciation) होता है, जिसे 'सूचना' (Information) कहा जाता है। भाषा के सन्दर्भ में यह ‘संकेत’ ही ‘ध्वनि’ और यह ‘सूचना’ ही ‘शब्द एवं वाक्य’ होता हैं| इन्हीं समस्त ‘सूचनाओं’ के द्वारा किसी भी ‘चीज़’ या ‘क्रियाविधि’ को यथास्थिति में समझना संभव होता है|

किसी भी ‘चीज़’ या ‘क्रियाविधि’ को यथास्थिति में समझना ही 'ज्ञान' (Knowledge) है। सामान्यत: सामान्य लोगों की समझ किसी ‘चीज़’ या ‘क्रियाविधि’ को  ‘उसकी यथास्थिति’ से नहीं होकर उसके प्रति उसके ‘पूर्वाग्रहों’ से होती है| इसीलिए यह कहा जाता है कि किसी व्यक्ति का ‘सत्य’ निरपेक्ष नहीं होकर उसके ‘पूर्वाग्रहों’ का प्रतिविम्ब’ होता है| लोग इसी ज्ञान का उपयोग अपनी समझ के अनुसार करते हैं और तब यह ‘ज्ञान’ ही ‘बुद्धि’ (Intelligence) कहलाता है। जब इस ‘बुद्धि’ का उपयोग ‘मानवता’ और ‘मानवता के भविष्य’ के लिए करते हैं, तो वही ‘ज्ञान’ 'प्रज्ञा' (Wisdom) बन जाता है। ‘भाषा’ का उद्विकास इसी ‘ज्ञान’ के सम्प्रेषण के लिए होता है, जिसका मौलिक उद्देश्य ‘शक्ति’ प्राप्त करना होता है|

‘भाषा’ के उद्विकास को चार्ल्स डार्विन के ‘प्राकृतिक (जैवकीय) उद्विकास’ और हर्बर्ट स्पेंसर के ‘सामाजिक उद्विकास’ के बिना समझा ही नहीं जा सकता है| भाषा का उद्विकास एक ‘जीवित प्रणाली’ की तरह है, और यदि किसी ‘भाषा’ की उत्पत्ति की व्याख्या इससे ‘असहमति’ जताती है, उस ‘भाषा के उद्विकास’ की व्याख्या में एक गहरी एवं सुनियोजित साजिश छिपी हुई है|

भाषा का जन्म और विकास मनुष्यों के आपसी संचार से होता है। जब लोग एक साथ रहते हैं, तो वे अपने अनुभवों, आवश्यकताओं और भावनाओं को व्यक्त करने के लिए संकेत’ और ‘शब्द’ विकसित करते हैं। समय के साथ ये ‘संकेत’ और ‘शब्द’  व्यवस्थित ‘भाषा’ बन जाते हैं, जैसा कि ऊपर उद्विकास की वैज्ञानिक व्याख्या से स्पष्ट है| प्रारंभ में केवल ‘ध्वनियाँ’ थीं, फिर वे ‘ध्वनियाँ’ अर्थ से जुड़ने लगीं और ‘शब्द’ बने। इस अवस्था की भाषा को ‘प्राकृतिक अवस्था की भाषा’ अर्थात ‘प्राकृत’ कहते हैं| जैसा कि इस शब्द ‘प्रा’ (Pre) और ‘कृत’ (Creation) से स्पष्ट होता है कि यह पहले की अवस्था की भाषा है| ऐसी अवस्था की भाषा 'बोली' के नाम से जाना जाता है। 

जब किसी भाषा को अपने सम्प्रेषण में एक निश्चित अर्थ देना होता है, तब इसके लिए कुछ निश्चित नियम निर्धारित करना अनिवार्य हो जाता है| इन नियमों को ही व्याकरण (Grammar) कहा गया| इससे भाषा अधिक संगठित और स्पष्ट हुई। तब ‘प्राकृत’ भाषा संवर्धित होकर उस समाज, व्यवस्था (सरकार) और संस्कृति की ‘पालक’ यानि ‘पालने वाली’ भाषा बन गयी| इस ‘पालक’ यानि ‘पालने वाली’ भाषा को ही ‘पालि’ या ‘पाली’ भाषा कहा गया|भाषा के इस सफर में 'बोली' अब साहित्य और राजकीय भाषा बन जाता है। यह भाषा जब ‘और उन्नत एवं समृद्ध’ होकर ‘संस्कारित’ हो गयी, तब यह ‘भाषा’ ‘और सम्मानित’ होकर नए ‘नाम’ से नामित हो गयी| यह 'व्याख्या' विश्व के सभी भाषाओँ के लिए ‘प्राकृतिक उद्विकास’ और ‘सामाजिक उद्विकास’ के स्थापित सिद्धांतों के अनुरुप है, इसलिए यह व्याख्या वैज्ञानिक और विवेकपूर्ण है| यदि कोई भाषा किसी पूर्व से स्थापित एवं जटिल भाषा के विखंडन की प्रक्रिया से उदित हुआ है, तो प्रश्न यह भी है कि “उस पूर्व से स्थापित एवं जटिल भाषा” की उत्पति की व्याख्या ‘प्राकृतिक उद्विकास’ और ‘सामाजिक उद्विकास’ के स्थापित सिद्धांतों के अनुरूप है और वह क्या है? किसी भी ‘दैवीय उत्पत्ति’ की व्याख्या को वैश्विक जगत नहीं स्वीकार करता है|

किसी भी भाषा पर संस्कृति, धर्म, राजनीति, इतिहास, भूगोल, विज्ञान एवं तकनीक का गहरा प्रभाव पड़ता है। आक्रमणों, व्यापार और प्रवास के कारण नई शब्दावली जुड़ती गई| अन्य भाषाओं के संपर्क से शब्दों और संरचनाओं का आदान-प्रदान होता रहा है। नई तकनीक और जीवनशैली के साथ नए शब्द आते हैं| इन सभी से उच्चारण और प्रयोग भी बदलता रहा है| इससे पुराने शब्द अप्रचलित होते गए|

भाषा का विकास सिर्फ सत्य की खोज के लिए नहीं होकर यह मानव की आवश्यकता और शक्ति प्राप्त करने की अभिव्यक्ति के लिए होता है। भाषा का विकास वास्तविकतासे नहीं, बल्कि मानव की कल्पना और उपयोगिता से होता है। मनुष्य अपनी शक्ति स्थापित करने के लिए उसका अर्थ गढ़ता है| भाषा उसी प्रक्रिया की अभिव्यक्ति का माध्यम है| जो समूह शक्तिशाली होता है, वह शब्दों के अर्थ अपनी हितो को ध्यान में रख कर तय करता है, जैसे ‘अच्छा’, ‘बुरा’, ‘नैतिक’, ‘अनैतिक’ जैसे शब्द उसी के अनुसार बदलते हैं। भाषा कमजोर और शक्तिशाली वर्गों के ऐतिहासिक संघर्ष से विकसित हुई और यहाँ यह भाषा ‘मूल्यों की राजनीति’ बन जाती है|

आप भाषा के उद्विकास को सीधे-सीधे सत्ता और समाज के नियंत्रण से जोड़ सकते हैं। समाज में जो ‘शासक वर्ग’ होता है, वह केवल ‘बल’ से नहीं, बल्कि भाषा और विचारों के माध्यम से भी शासन करता है| इस तरह ‘भाषा’ भी वर्चस्व (Hegemony) का उपकरण बन जाता है| तब भाषा का उद्विकास इस तरह कराया जाता है कि ताकि वह शासन करने वाला वर्ग अपनी विचारधारा को ‘सामान्य’ और ‘सहज’ बना सके| तब वह ‘भाषा’ ही सामान्य जन गण की सामान्य बुद्धि (Common Sense) बन जाती है| इस तरह ‘भाषा’ उस समाज के जन गण की ‘सामान्य संस्कृति’ हो जाती है| इस तरह. यह ‘प्राकृतिक उद्विकास’ नहीं होकर ‘सत्ता’ द्वारा नियमित उद्विकास’ हो जाता है| सामाजिक और सांस्कृतिक संस्थाएँ यथा ‘राष्ट्र’, ‘धर्म’, ‘विवाह’ आदि केवल शब्द नहीं हैं, बल्कि ये वैचारिक संरचनाएँ हैं, जो भाषा के माध्यम से स्थापित होती हैं| आप भाषा के माध्यम से ही समाज को दिशा दे सकते हैं| भाषा ही ‘मानव –मूल्य’ गढ़ते हैं|

स्पष्ट है कि भाषा सिर्फ ‘प्राकृतिक रुप से विकसित’ ही नहीं होती, बल्कि यह ‘शक्ति’ और ‘आधिपत्य’ के लिए भी विकसित की जाती है।

आचार्य प्रवर निरंजन  जी

अध्यक्ष, अन्तर्राष्ट्रीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान|

सोमवार, 4 मई 2026

कौन सा राजनीतिक दल जल्दी समाप्त हो जाता है?

भारत में राजनीतिक दलों के अस्तित्व और उसकी निरंतरता का विश्लेषण करना बहुत सहज और सरल नहीं है| इसीलिए इन राजनीतिक दलों के भविष्य के सम्बन्ध में कोई ठोस निष्कर्ष निकलना भी सरल और साधारण नहीं होता है| इसी कारण, भारत में बहुत से तथाकथित ‘चुनावी विशेषज्ञ’ (Psephologist) हवा –हवाई साबित होते हैं| इन तथाकथित ‘चुनावी विशेषज्ञों’ का इन राजनीतिक दलों के सम्बन्ध में सारे आकलन ध्वस्त हो जाते हैं| दरअसल ये ‘चुनावी विशेषज्ञ’ सांखियकी (Statistics), जनमत (Public Opinion Poll) के संग्रहण एवं सम्बन्धित ऐतिहासिक चुनावी आंकड़ों के नाम पर ‘आंकड़ों की बाजीगिरी’ कर सस्ती लोकप्रियता बटोरते रहते हैं|  

यदि भारतीय राजनीतिक दलों की कुछ मौलिक विशेषताओं का विश्लेषण और समसामयिक मूल्याङ्कन किया जाय, तो कई नए गंभीर पक्ष उभरते हैं| भारतीय राजनीतिक दलों का वर्गीकरण कुछ राजनीतिक दलों के ‘मूलभूत सिद्धांतों’ के आधार पर किया जा सकता है| इन ‘मूलभूत सिद्धांतों’ की नैतिकता पर आप विवाद तो कर सकते हैं, लेकिन इन ‘मूलभूत सिद्धांतों’ की वास्तविकता को नकार नहीं सकते हैं| इन ‘मूलभूत सिद्धांतों’ के आधार पर भारत में कुछ ही राजनीतिक दल अब अपने वजूद में हैं| कांग्रेस भारत की आजादी के लक्ष्य के लिए एक आन्दोलन के रुप में उभर कर आई, लेकिन आज इसमें कोई “स्पष्ट और स्थिर सिद्धान्त” नहीं दिखता होता है| समय के सापेक्ष सिद्धांतों का बदल जाना कोई “स्पष्ट और स्थिर सिद्धान्त” नहीं है| ‘वंशवाद’ कोई सिद्धान्त नहीं होता| कांग्रेस का वर्तमान मूल्याङ्कन उपरोक्त सभी के सापेक्ष किया जाना चाहिए|

भारत की साम्यवादी (कम्युनिस्ट) पार्टियों को ‘मूलभूत सिद्धांतों’ के आधार पर स्थापित माना जाता रहा है| आज ये सभी साम्यवादी दल अपने अस्तित्व के लिए जूझने लायक भी नहीं रह गये हैं| विश्व में आज तक कोई भी राष्ट्र ‘साम्यवादी’ (Communist) नहीं बन सका, सभी ऐसे राष्ट्र ‘समाजवादी’ (Socialist) बन कर ही आगे बढ़ सके| वैसे आज विश्व में कोई भी राष्ट्र पूर्णत: समाजवादी या पूँजीवादी नहीं है| सभी राष्ट्र मिश्रित स्वरुप में हैं| वे ‘समाजवादी राष्ट्र’ ही आज सफल हुए, जिन्होंने ‘संस्कृति की क्रियाविधि और उसकी गत्यात्मकता’ को समझा और उसके अनुसार क्रियान्वयन किया| भारत की सभी साम्यवादी नेतृत्व इसी मौलिक समझ के अभाव में भारत –भूमि पर स्थायी रुप से पनप नहीं सके| ये नेतृत्व आज तक दार्शनिक एन्टोनियो ग्राम्शी, लेनिन और माओ त्से तुंग की ‘संस्कृति की क्रियाविधि और उसकी गत्यात्मकता’ को नहीं समझ सके| इसी कारण भारत की सभी साम्यवादी दल व्यावहारिकता में असफल हो गये|

भारत में कुछ ‘और राजनीतिक दल’ अपने तथाकथित सैद्धांतिक मुद्दों पर स्थापित तो हुए, लेकिन वे सभी दल वर्तमान में धन एवं अन्य दबाव में पारिवारिक जागीर बन कर ‘सिद्धांतविहीन’ हो गये| ऐसे राजनीतिक दल आज इतिहास का विषय हो चुके हैं या होने वाले हैं| इसी तरह, कुछ व्यक्तियों ने अपने राजनीतिक विशेष दल बनाए, जिनका वजूद ही किसी ‘स्थापित सिद्धांतों’ पर आधारित या अन्य आधार पर स्थापित राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया पर हुआ| ऐसे व्यक्तियों के ‘पाकेटी’ (अपनी पाकेट में रखे जाने योग्य) राजनीतिक दल अपनी विरुद्ध दल (जिनकी प्रतिक्रिया में वे वजूद में आए थे) के वजूद समाप्त होते ही ऐसे दलों को विलुप्त हो जाने की विवशता हो गयी| ये सभी राजनीतिक दल समसामयिक मुद्दों को ही उभार कर अपना अस्तित्व बचाने को प्रयासरत होते दिखते रहे हैं| स्पष्ट है कि ऐसे राजनीतिक दलों का अपना कोई मूल एवं स्थापित सिद्धांत नहीं होता है| ऐसे सभी राजनीतिक दल अपने मुद्दों के लिए किसी मुख्य सत्ताधारी दलों की “तथाकथित त्रुटियों” पर आधारित होते हैं| ऐसे सभी राजनीतिक दल सिर्फ प्रतिक्रिया देना जानते हैं, क्योंकि इनके पास अपना कोई मुद्दा, योजना और सिद्धान्त ही नहीं होता है| यदि मुख्य सत्ताधारी दल इन्हें कोई मुद्दा नहीं दे, तो ये राजनीतिक दल और उनके कार्यकर्ता बेरोजगार हो जाते हैं|

यह याद रहे कि कोई भी ‘व्यक्ति या परिवार आधारित राजनीतिक दल’ कुछ वर्षों या दशकों की राजनीति कर सकते हैं, या करते हैं, लेकिन वे उससे ज्यादा दूर नहीं चल सकते हैं| आप भारत की सभी व्यक्ति या परिवार आधारित राजनीतिक दलों’ का विश्लेषण और मूल्यांकन कर सकते हैं| सिर्फ छाती पीटने से गुजर गया समय वापस नहीं आ सकता है| लेकिन जो राजनीतिक दल ‘विचारों, सिद्धांतो, और मूल्यों’ पर आधारित होते हैं, वे लम्बी दूरी की राजनीति करते हैं| ‘विचारों, सिद्धांतो, और मूल्यों’ के समेकित एवं व्यवस्थित प्रतिरुप (Pattern) को ही ‘संस्कृति’ कहते हैं| इसीलिए कहा गया है कि जो राजनीतिक दल ‘संस्कृति’ की राजनीति करते हैं, वे सदियों और सहस्त्राब्दियों की राजनीति करते हैं| ठहरिए, इसे दुबारा पढ़िए| और इस कथन की व्यापकता को समझने की कोशिश करें|

भारतीय जन गण अपनी बौद्धिकता के स्तर और पेट भरने के निश्चिन्त उपाय के बाद ही राजनीतिक हो पाता है| ऐसे भारतीय जन गण को कोई भी राजनीतिक दल उसके धर्म और जाति एवं नैतिकता के नाम पर हवा में उड़ा सकता है| ऐसे भारतीय जन गण अपनी बौद्धिकता की अपेक्षा अपनी भावनात्मकता से ज्यादा संचालित और नियंत्रित होते हैं| आप हर राजनीतिक दलों के उम्मीदवारों के चयन में और दृश्य उद्देश्यों की प्रस्तुति में धर्म, जाति एवं नैतिकता के तत्व ही प्रमुख होते हैं| यह लोगों की मनोदशा के अनुरुप अनिवार्य भी हो जाता है|

कोई भी उपरोक्त सैद्धान्तिक विश्लेषण एवं मूल्यांकन के आधार पर भारतीय राजनीतिक दलों के भविष्य को समझ सकता है|

आचार्य प्रवर निरंजन  जी

अध्यक्ष, अन्तर्राष्ट्रीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान|

शुक्रवार, 1 मई 2026

इतिहास गतिशील क्यों होता है?

अधिकतर लोग यही जानते और मानते हैं कि इतिहास कोई स्थिर विषय –वस्तु है| वास्तव में इतिहास भी गतिशील होता है, जबकि इतिहास में ‘जड़ता’ का गुण भी होता है| दरअसल ऐसे लोग इतिहास को सिर्फ बीते हुए काल का विवरण समझते होते हैं, जबकि इतिहास जीवित लोगों के लिए होता है| इतिहास प्रेरणा देता है और मार्गदर्शन भी करता है| इतिहास को अवश्य ही वर्तमान लोगों का हितवर्धक होना होता है| इसीलिए यह कहा जाता है कि इतिहास वह ‘अतीत का विषय’ है, जो मानवीय बुद्धि का विकास करता है| कुछ लोग इतिहास को मानवीय स्वतंत्रता को ‘और संवर्धित’ करने वाला विषय बताते हैं| वास्तव में इतिहास का मूल और मुख्य उद्देश्य वर्तमान ‘मानवता को वैज्ञानिक बनाना’ होता है| ‘मानवता को वैज्ञानिक बनाने’ का अर्थ ‘मानवता को ‘प्राकृतिक न्याय’ दिलाना’ हुआ| ‘प्राकृतिक न्याय’ में स्वतन्त्रता, समता (Equality), समानता (Equity), बन्धुत्व और विकास शामिल होता है| यदि बीते हुए काल के आधार पर वर्णित सामग्री उपरोक्त उद्देश्य नहीं रखता है, तो वह इतिहास नहीं है; इतिहास के नाम ‘कुछ और’ है|

चूँकि ‘हर इतिहास समकालिक होता है, इसीलिए हर प्राचीन इतिहास को नए सन्दर्भ में लिखा जाता रहा है| भारत में तो प्राचीन इतिहास को जला देने और नष्ट कर देने की मध्ययुगीन परम्परा भी रही| भारत के शुरुआती मध्य काल में उसी प्राचीन सामग्री को जलाने और नष्ट करने से पहले उसे नए स्वरुप में संपादित कर दिया गया| सांस्कृतिक क्रांतियों के देश में कुछ ऐतिहासिक तत्वों को मिटाने एवं हटाने का प्रयास भी ‘इतिहास को ‘समकालिक’ बनाने’ की परम्परा का ही हिस्सा है| शुरुआती मध्ययुगीन भारतीय काल में प्राचीन इतिहास को नए उभरते हुए सामन्तवाद की आवश्यकताओं के अनुकूल समकालिक बनाया गया| ‘समकालिक बनाने’ की इस भारतीय पद्धति में प्राचीन काल की लकड़ी, पत्ता, चमड़ा, धातु –पत्तर और कपड़ा पर उपलब्ध एवं संरक्षित लिखित सामग्रियों को कागज़ पर नए संवर्धित भाषा में अनुवादित कर और संपादित कर दिया गया| फिर उन प्राचीन लिखित सामग्रियों को नष्ट भी कर दिया गया| इस तरह, ‘इतिहास को समकालिक’ होने की प्रक्रिया में ‘इतिहास’ को पुराने ऐतिहासिक आधार पर नयी आवश्यकताओं के अनुरुप बदल दिया गया| ऐसा सदैव होता रहा है और आगे भी होता रहेगा| इसीलिए यह कहा गया है कि आप किसी पुराने इतिहास को रद्द तो कर सकते हैं, लेकिन आप कोई अंतिम इतिहास नहीं लिख सकते हैं|

दरअसल इतिहास में दो तत्व होते हैं| पहला, ‘तथाकथित ऐतिहासिक तथ्य’, जिसका उपयोग कर एक ‘इतिहासकार’ कोई ‘इतिहास’ लिखता है| दूसरा, वह ‘इतिहासकार’, जो उन तथ्यों के आधार पर अपनी व्याख्या देता है| वह ‘तथाकथित ऐतिहासिक तथ्य’ तो ऐतिहासिक काल का होता है, जबकि वह ‘इतिहासकार’ वर्तमान का होता है| वह ‘तथाकथित ऐतिहासिक तथ्य’ भी स्वयं कुछ नहीं कहता है, बल्कि वह ‘इतिहासकार’ ही उन ऐतिहासिक तथ्यों के बहाने ‘सबकुछ’ बोलता है, जो वह कहना चाहता है| अर्थात वह ‘तथाकथित ऐतिहासिक तथ्य’ भी निर्जीव होते हुए भी सापेक्षिक हो जाता है| एक ‘इतिहासकार’ अपने ‘मन’ (Mind) का स्वामी होता है, जो अपनी इच्छाओं, आवश्यकताओं, सांस्कृतिक जड़ताओं, बौद्धिकता और बाजार की शक्तियों के अनुकूल ‘ढला’ (Casted) हुआ होता है| इस तरह, एक इतिहासकार भी समय के सापेक्षिक होता है| वह इतिहासकार जो भी इतिहास लिखेगा, वह इन्ही सीमाओं और आवश्यकताओं के ढाँचे में लिखेगा|

समय सदैव परिवर्तनशील है| परिस्थितियों और सन्दर्भों को बाजार के साधनों और शक्तियों के अनुरुप अनुकूलित होना पड़ता है| आधुनिक युग में बाजार के साधनों और शक्तियों को आर्थिक साधन एवं शक्ति कहते हैं| बदलते विज्ञान और तकनीक ही बाजार के साधनों और शक्तियों को नियंत्रित, संचालित और नियमित करता रहता है| वर्तमान के बाजार के साधनों और शक्तियों को ही इतिहास के काल में ‘ऐतिहासिक शक्तियाँ’ (Historical Forces) कहा जाता है| यही ऐतिहासिक शक्तियाँ ही ‘इतिहास’ और ‘इतिहास के काल’ को बदलता रहता है| इसीलिए सभी इतिहास को गतिशील रहना पड़ता है| हर इतिहास की वैज्ञानिक व्याख्या होनी चाहिए, जो आर्थिक साधनों और शक्तियों की क्रियाविधियों (Mechanism) पर आधारित होगी| इस आधार पर प्राचीन भारत का हर इतिहास ‘उलट –पलट’ हो जाता है| भारत की सभी सांस्कृतिक समस्यायों का यही समाधान है| इसके अलावा, परोसा गया अन्य सभी सभी प्राचीन इतिहास बनावटी है, काल्पनिक है|  

अब, समय आ गया है कि इतिहास को सभी जीवित व्यक्तियों के अनुकूल बनाया जाय| इसके लिए आधुनिक वैज्ञानिक विधियाँ ही पर्याप्त और सक्षम है| इस पर आधरित हर ऐतिहासिक व्याख्या चार्ल्स डार्विन के ‘प्राकृतिक उद्विकासवाद’ और हर्बर्ट स्पेंसर के ‘सामाजिक उद्विकासवाद’ के वैज्ञानिक सिद्धांत से समर्थित होगा| ऐसा ही ‘इतिहास’ (व्याख्या)  भारत की सभी सांस्कृतिक समस्यायों को समाधान देगा|

आचार्य प्रवर निरंजन  जी

अध्यक्ष, अन्तर्राष्ट्रीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान|

भारतीय राष्ट्र –निर्माण में इतिहास की समस्याएँ

‘राष्ट्र’ के निर्माण में ‘इतिहास’ की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है| ‘राष्ट्र’ कोई ‘देश’ नहीं होता है| यह ‘राष्ट्र’ ‘ऐतिहासिक एकापन (Historical O...