गुरुवार, 26 फ़रवरी 2026

मानव क्या होता है?

प्रश्न यह है कि ‘मानव क्या होता है?’ इसके उत्तर में आप कह सकते हैं कि मानव एक स्तनपायी पशु है| चूँकि एक ही तथ्य के बदलते सन्दर्भ के अनुसार अनेक सत्य हो जाते हैं, इसिलिए यहाँ आप एक ही साथ सही भी हैं और गलत भी हैं| एक मानव एक सामान्य स्तनपायी पशु से भिन्न और अलग हैं| मानव की यह अवस्था उसकी चेतना के विकास और उसकी उत्कृष्टता की कहानी है| यह चेतना का विकास और इसकी उत्कृष्टता भी मानव द्वारा विभिन्न सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक एवं आर्थिक संस्थाओं (Institutions) एवं संस्थानों (Institutes) के निर्माण एवं उसके विकास पर आधारित है| इसी के बदौलत मानव ने अपना विस्तृत. व्यापक और जटिल संसार बना सका है| इसी के अभाव में कोई भी अन्य जीव इतना विस्तृत, व्यापक एवं जटिल संसार नहीं बना सका|

‘मानव क्या होता है?’ या ‘मानव क्या है?’ का यह भी अर्थ होता है कि एक मानव क्या क्या हो सकता है? अर्थात क्या एक मानव अपनी नियति को नियमित और नियंत्रित भी कर सकता है? क्या एक मानव जो चाहे, वह वैसा बन सकता है? क्या वह अपना स्वयं का जीवन रच सकता है और उसे जी भी सकता है? यदि इन सभी प्रश्नों का उत्तर “हाँ” में है, तो यह मानव जीवन का एक क्रान्तिकारी निर्णय है| इसी क्रान्तिकारी निर्णयों के कारण ही मानव को आजतक की सारी उपलब्धियाँ प्राप्त है और आगे इससे भी ज्यादा उपलब्धियाँ प्राप्त करनी है| स्पष्ट है कि मानव एक ‘प्रक्रिया’ (Process) का नाम है| यानि मानव अपनी क्रियाकलापों की प्रक्रिया है| इन प्रक्रियायों में विचारों, भावनाओं एवं व्यवहारों को उत्पन्न करने, उसे विकसित करने, उसे नियमित एवं नियंत्रित करने और लक्ष्य निर्धारण करना होता है|

चूँकि मानव निरन्तरता के साथ एक प्रक्रिया है, इसीलिए मानव को इन प्रक्रियायों पर अवश्य ही विचार विचार करनी चाहिए, तभी वह मानव है। इन प्रक्रियायों में विचार, भावना और व्यवहार की प्रक्रिया शामिल है| विचारों, भावनाओं और व्यवहारों को जन्म देने की प्रक्रिया, उसके उद्विकास की प्रक्रिया, उनको नियमित एवं नियंत्रित करने की प्रक्रिया, ताकि कोई इच्छित लक्ष्य पाया जा सके। ध्यान रहे कि ‘उद्विकास’ (Evolution ) शब्द एक गहन अर्थ रखता है, जिस प्रक्रिया में किसी अलौकिक यानि किसी दैवीय शक्ति की कोई भूमिका नहीं होती है| हम अभी क्या है और हम आगे क्या क्या हो सकते हैं, इन संभावनाओं पर विचार करना और संभावनाओं की तलाश करना मानव के लिए महत्वपूर्ण है। इसीलिए प्रसिद्ध दार्शनिक रे देकार्त कहते हैं कि मैं सोचता हूँ, इसलिए मैं हूँ।

‘मैं सोचता हूँ, इसलिए मैं हूँ|' लेकिन सोचना क्या है? यदि कोई सोचता है, और उसके सोचने का केन्द्र उसका स्वयं या उसका परिवार मात्र ही है, तो ऐसा सोचने का सामाजिक अर्थ क्या हो सकता है? कहने का तात्पर्य है कि किसी भी सोच, यानि चिन्तन का केन्द्र यदि समाज या मानवता का कल्याण नहीं है, तो वैसे सोच का कोई अर्थ नहीं है। तब एक पशु होने और एक मानव होने में कोई फर्क नहीं होगा| अर्थात समाज या मानवता के कल्याण के लिए बदलने की प्रक्रिया ही मानव होने का अर्थ है।

लेकिन ‘मानव क्या है?’, यह एक निरपेक्ष प्रश्न नही हो सकता है। यह प्रश्न अवश्य ही सापेक्ष है। इस प्रक्रिया  के अनिवार्य अवयव क्या क्या है, या हो सकते हैं? प्रसिद्ध क्रान्तिकारी दार्शनिक एन्टोनियो ग्राम्शी मानते हैं कि मानव को सक्रिय सम्बन्धों की एक अनिवार्य प्रक्रियाओं की श्रृंखला समझना जरुरी है। सामान्यत: एक व्यक्ति का जीवन निरपेक्ष माना जाता है, जबकि एक व्यक्ति का जीवन समाज और मानवता के सापेक्ष होता है। प्रत्येक मानव में मानवता के कई आयामों और कई प्रतिबिम्बों का समन्वय और सामंजस्य होता है। मानव की प्रक्रिया में समाज और मानवता का भविष्य शामिल रहता है। मानवता के भविष्य में प्रकृति भी समाहित रहता है। किसी भी मानव को मानवता और मानवता के भविष्य से निरपेक्ष नहीं माना जा सकता है|

एक मानव अवश्य ही अपने ‘आत्म’ (Self), अन्य मानव और पारिस्थितिकी तन्त्र के सापेक्ष होता है| यह भी स्पष्ट रहना चाहिए कि यह ‘अन्य मानव’ और ‘पारिस्थितिकी तन्त्र’ भी स्वयं में एक सक्रिय प्रक्रिया है, जो तत्क्षण बदलता रहता है| यह तीनों ही मिलकर समाज और मानवता के ‘फिजाओं को बनाता, बिगाड़ता  और बदलता रहता है| एक पारिस्थितिकी तन्त्र सिर्फ एक भौगोलिक ढाँचा या संरचना नहीं होता है, बल्कि वह अपने इतिहास की समझ (Perception) की सक्रिय भूमिका का परिणाम होता है| मैं इस पारिस्थितिकी तन्त्र को ‘व्यवस्था –तंत्र’ (Organizational System) का ‘फिज़ावेयर’ (Fizaware) कहता हूँ, जो ज़माने की फिजाओं को बदलने की समझ और सामर्थ्य रखता है|

जब पारिस्थितिकी तन्त्र में ‘इतिहास की समझ’ इतना महत्वपूर्ण है, तो इसकी मनमानी व्याख्या नहीं होनी चाहिए| अपने ‘इतिहास की समझ’ ही उस व्यक्ति या समाज ‘जड़े’ होती है, जो उसको मजबूती देता है, आधार देता है, और आवश्यक उर्जा के लिए पानी एवं आवश्यक खनिज आदि देता है| यह बहुत महत्वपूर्ण है, जिसे समझना जरुरी है| ‘मानव क्या है’ या ‘मानव क्या हो सकता है’, यह सब अपने इसी ‘इतिहास की समझ’ का अनिवार्य परिणाम है| यही वह ‘पारिस्थितिकी तन्त्र’ है, जो यह निर्धारित करता है कि एक मानव क्या क्या हो सकता है|

तब इस ‘इतिहास की समझ’ की व्याख्या को अवश्य ही वैज्ञानिक, तार्किक, तथ्यपरक और विवेकशील होना चाहिए| इतिहास के सारे प्रक्रम ‘प्राकृतिक उद्विकासवाद’ (चार्ल्स डार्विन) और ‘सामाजिक उद्विकासवाद’ (हर्बर्ट स्पेंसर) के अनुरूप होना चाहिए, अन्यथा वह ‘इतिहास की समझ’ की व्याख्या इतिहास के नाम पर पूरा ही बकवास कहानी मात्र है| भारत की सारी समस्यायों की जड़ में भारतीय इतिहास की अवैज्ञानिक व्याख्या ही है| भारत की सामन्ती काल में रचित सामग्रियों को ही भारतीय इतिहास की ‘जड़े’ मान लिया गया है|भारतीय विकास में यही सबसे बड़ा रोड़ा है| इस मूल समस्या पर ध्यान नहीं देना या इसे नहीं समझना ही भारत की बर्बादी है| इस मूल समस्या को यथावत छोड़ सभी भारतीय विद्वान्, नौकरशाह औए राजनीतिज्ञ सिर्फ सामाजिक एवं सांस्कृतिक यथास्थितिवाद को ही यथावत बनाए रखने के लिए प्रयत्नशील है| कोई भी  भारतीय विद्वान् और नौकरशाह इस मूल केंद्र पर सोचता नहीं है| इसीलिए भारत में मानव सम्पदा का समुचित विकास नहीं हो रहा है|

एक भारतीय मानव की क्षमता, जो वैश्विक इतिहास में प्रमाणित है, को सामन्त कालीन साहित्यों के भरोसे छोड़ दिया गया है| इसीलिए भारत में एक मानव क्या हो सकता है?, प्रश्न ही बेमानी हो जाता है| इसी कारण सामर्थ्यवान भारत आज भी लाचार बना हुआ है|

आचार्य प्रवर निरंजनजी

शिक्षक, लेखक, प्रेरक एवं दार्शनिक

अध्यक्ष, अन्तर्राष्ट्रीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान

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गुरुवार, 12 फ़रवरी 2026

स्त्रियाँ क्या होती है?

सवाल यह है कि स्त्रियाँ क्या होती है? प्राकृतिक व्यवस्था में एक स्त्री क्या होती है? दूसरे स्तनपायी पशुओं एवं अन्य जीवों में इनकी क्या व्यवस्था होती है? स्त्रियाँ एक शरीर में होती है, जैसे पुरुष होते हैं। तो क्या स्त्रियाँ इस संसार में एक मौलिक स्वतंत्र इकाई है, या आधी इकाई है, या पूरक इकाई है? क्या पुरुष भी आधी इकाई ही हैं, या पूर्ण इकाई है, या पूरक इकाई है? ब्रह्माण्ड की हरेक इकाइयाँ या सममिति (सिमिट्र्री) में होती है, या एक दूसरे के अनुपूरक होती है। ये सभी प्रश्न बहुत गहरे हैं, क्योंकि ‘स्त्री’ को केवल ‘पुरुष के संदर्भ में’ परिभाषित करना अपने-आप में एक दार्शनिक, सामाजिक और वैज्ञानिक समस्या है। मैं आपको इस विमर्श में शामिल करना चाहता हूँ कि स्त्रियों को कैसे सम्यक रूप में समझा जाय?

जैविकीय (Biological) बनावट एवं कार्यात्मक संरचना में पुरुष के संदर्भ में स्त्री नव सृजन यानि  प्रजनन की सह-भागी इकाई है| शून्य (अंडाणु एवं शुक्राणु) से जीवन का सृजन तो दोनों मिलकर करते हैं, लेकिन उसे पूर्ण विकसित करने का प्राकृतिक भार स्त्री को मिला है| स्त्री और पुरुष एक दूसरे के ‘पूरक’ (complementary being) होते है| जैविक रूप से दोनों मिलकर जीवन की निरंतरता बनाते हैं| यह संबंध कार्यात्मक है, न कि अस्तित्वगत पहचान का आधार है। स्वतंत्र ‘अस्तित्वगत पहचान’ बनाने का यह प्रयास या नजरिया ही समाज के लिए घातक है| दोनों को अलग अलग समझा ही नहीं जाना चाहिए|

इस पृथ्वी पर अन्य पशु भी यौन सम्बन्ध बनाते हैं और जीवन का सृजन कर उसे निरंतरता भी देते हैं| लेकिन ये सब जीव अपना ‘झुण्ड’ तो बनाते हैं, लेकिन अपना संसार नहीं बना पाते हैं| ये पशु सामाजिक संस्थाओं का सृजन नहीं कर पाते है| मानव ने जब विवाह आदि सामाजिक संस्थाओं का निर्माण करना शुरू किया, तब इस संसार का निर्माण हुआ| सामाजिक संस्थाओं के जाल को समाज या संसार कहते हैं| सांस्कृतिक, आर्थिक एवं राजनीतिक संस्थाओं के विकास के साथ आज मानव इस स्थिति तक पहुँच सका है|

विवाह नामक सामाजिक संस्था में कुछ लोग एक साथ रहते हैं, और सभी शारीरिक एवं अपनी अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं| इस तरह विवाह में ‘यौन सम्बन्ध’ बनाना स्त्री एवं पुरुष का प्राथमिक एवं मौलिक कार्य नहीं रह जाता है, बल्कि सामाजिक संस्थाओं के द्वारा निर्धारित सामाजिक संबंधों का निर्वहन अनिवार्य हो जाता है| ‘विवाह’ की इस अवधारणा में सभी आधुनिक बदलाव भी समाहित हो जाते हैं| इस अवधारणा में यौन संबंधों की तथाकथित पवित्रता को कोई स्थान नहीं मिलता है| स्पष्ट है कि विवाह संस्था सिर्फ यौन संबंधों के लिए नहीं होता।

विवाह को संस्था के रुप में पुनर्परिभाषित करने की आवश्यकता आधुनिक समाजों में उभर रही बदलाव है, जो यौन निष्ठा से निरपेक्ष होता जा रहा है। समस्या तब होती है, जब इस जैवकीय पूरकता को पुरुष -निर्भरता बना दिया जाता है। स्त्रियों की विवादस्पद छवि का उदय एवं विकास मध्य युग में सामन्ती व्यवस्था के उदय एवं विकास के साथ हुआ| प्राचीन काल में ऐसी असामनता नहीं थी| आज जो भी असामनता स्त्रियों के लिए वर्णित मिलता है, वह सब कागजी ग्रंथों में ही लिखित हैं, जिसका उपलब्ध स्वरुप मध्य काल में संपादित किया गया है| साहित्य समाज का दर्पण होता है| यह साहित्य कागज पर ही उपलब्ध है, अर्थात यह सब भारत में कागज के प्रचलन में आने के बाद के समाज का प्रतिबिम्ब है| प्राचीन काल में यौन आधारित ‘लैंगिक’ (Gender, not Sexual) असामनता का कोई पुरातत्वीय साक्ष्य इतिहासकारों को उपलब्ध नहीं है|

इतिहास के आदि काल में, यानि प्राक इतिहास में स्पष्ट है कि गर्भधारित स्त्रियों ने अपने विराम काल में नदियों या झीलों के उतरते पानी में अनाजों के पौधों को उगते और उसके दानों को पशुओं एवं चिड़ियों द्वारा खाते देखा| इस तरह, स्त्रियों ने कृषि का प्रारंभ किया| स्त्रियों द्वारा घायल पशुओं की सेवा करने एवं उसके बहुविध उपयोग ने पशुपालन को विकसित किया| कृषि के विकास की आवश्यकता ने स्त्रियों को आवास को स्थायी (घर एवं बस्ती) बनाने को प्रेरित किया, भले ही इस प्रक्रिया में पुरुषों का सहयोग मिला| अपनी स्त्रियों के पास और अपने घर जाने के लिए पहली बार मानव को ‘दिशा’ (Direction) बोध की आवश्यकता हुई और ‘दिशाओं’ का निर्धारण किया जाने लगा| ‘आग’ (Fire) जलाये रखने की निरंतरता और उसके लिए आवश्यक ईंधन की व्यवस्था करने की बाध्यता से स्त्रियों  ने ‘समय’ (Time) की गणना प्रारम्भ की| ‘आग’ की देखभाल करना, यानि ठन्डे माहौल में आग को घेर कर समय व्यतीत करने से सबसे पहले स्त्रियों में ‘संवाद’ शुरू हुआ, जो भाषा एवं साहित्य के रूप में आज उपलब्ध है| यदि पुरुषों ने ‘सभ्यता’ का सृजन एवं विकास किया है, तो स्त्रियों ने ‘संस्कृति’ का सृजन और विकास किया है| एक व्यवस्था का ‘हार्डवेयर’ है, तो दूसरा व्यवस्था का ‘साफ्टवेयर’ है| अब आप ही बताइए कि कौन किस पर निर्भर है?

मध्य युगीन सामन्ती समाज में ‘यौन विभेद’ (Sex Discrimination) और ‘लैंगिक विभेद’ (Gender Discrimination) स्पष्ट होता गया| तथाकथित प्रगतिशील नारीवादियों में सिमोन द बोउआर (Simone de Beauvoir) का प्रसिद्ध कथन है – ‘स्त्रियाँ जन्म नहीं लेती है, बल्कि उसे बना दिया जाता है| हालाँकि इसे मानवता की प्राकृतिक व्यवस्था के सन्दर्भ में अतिशयोक्तिपूर्ण माना जा सकता है| नारीवादी अस्तित्ववाद में यह तर्क दिया कि चूँकि समाज को पुरुषों ने बनाया है, इसलिए स्त्रियों को पर्याप्त महत्ता नहीं दिया| इसका अर्थ यह हुआ कि स्त्री होना जैविक नहीं, सांस्कृतिक निर्माण है। यह प्रगतिशील दिखता अवधारणा सामन्ती युग के लिए सही व्याख्या हो सकती है, परन्तु इसे प्राकृतिक व्यवस्था नहीं समझना चाहिए|

सत्ता (Power) के सामन्तवादी होने के बाद पुरुष के संदर्भ में स्त्री एक नियंत्रण की वस्तु, उपभोग की वस्तु, नैतिकता का भार, ‘इज्ज़त’ का वाहक, परंपरा को बोझ ढोने वाली हो गयी| अगर स्त्री को पुरुष के संदर्भ में परिभाषित करें, तो ‘स्त्री’ बनायी जाती है| एक स्त्री की सच्ची परिभाषा पुरुष की पूरकता के संदर्भ में हो सकती है| अधिकतर लोगों का यही मानना है कि स्त्री और पुरुष दोनों ही एक स्वतंत्र मानव चेतना है| लेकिन यह धारणा समुचित भी नहीं है, जब प्रकृति ने एक दूसरे का पूरक बनाया है| एक ‘मानव’ (Man) है, तो दूसरा ‘गर्भाशय वाला मानव’ (Womb + Man = Woman) है| सामान्यत: सच्ची मुक्ति का अर्थ स्त्री और पुरुष की स्वयं में पूर्ण चेतना का बोध होना माना जाता है, जो गलत है| इन दोनों में संबंध सत्ता का नहीं, संवाद का है|

मनोवैज्ञानिक कार्ल जुंग अपने विश्लेषणात्मक मनोविज्ञान में समझाते हैं कि पुरुष के भीतर स्त्री-तत्व (Anima) और स्त्री के भीतर पुरुष तत्व (Animus) भी होता है| अर्थात पुरुष और स्त्री का स्वभाव विभिन्न मात्रा में दोनों में एक साथ मौजूद रहता है|

क्वांटम भौतिकी का क्वांटम उलझाव सिद्धांत (Quantum Entanglement Theory) समझाता है कि एक समूह में रहने वाले प्रत्येक कण (Particle) की क्वांटम अवस्था को अन्य कणों की अवस्था से स्वतंत्र रूप से वर्णित नहीं किया जा सकता, भले ही ये कण एक दूसरे से बहुत दूर हों जाएं| अर्थात एक समूह में एक साथ तक लम्बे समय तक रहने से भावनात्मक एकता बढ़ जाती है, जिसका आभास सभी सदस्यों को भिन्न भिन्न मात्रा में होता रहता है| यही सम्बन्ध स्त्री एवं पुरुष में और विवाह एवं परिवार में होता है| यह वैज्ञानिक तथ्य भी स्त्री एवं पुरुष के सम्बन्ध को नए तरीके से व्याख्यापित करता है|

इसलिए तथाकथित आधुनिक पश्चिमी नारीवादी और सामन्ती नजरिए से स्त्रियों का मूल्यांकन नहीं कीजिए| इसके लिए प्राकृतिक और आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोणों का सहारा लीजिए| आपके संसार में आपका सब कुछ बदल जाएगा, और आपकी दुनिया भी खुशनुमा हो जायेगी|

आचार्य प्रवर निरंजनजी

शिक्षक, लेखक, प्रेरक एवं दार्शनिक

अध्यक्ष, अन्तर्राष्ट्रीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान

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बुधवार, 11 फ़रवरी 2026

सभी समस्यायों के मूल में धर्म और शिक्षा है|

यदि सभी समस्यायों के मूल में धर्म और शिक्षा है, तो सभी समस्यायों का समाधान भी धर्म और शिक्षा में है| शायद इसीलिए रुसी क्रान्ति की सफलता के तुरंत बाद लेनिन ने शिक्षा को धर्म (चर्च) से अलग कर दिया था| वर्ष 1940 तक हर सोवियत नागरिक शिक्षित था और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से युक्त हो गया| इसी शिक्षा के साथ आज भी 15 करोड़ का रूस 35 करोड़ के अमेरिका के समक्ष बराबरी पर है| माओ त्से तुंग ने भी अपनी महान सांस्कृतिक क्रान्ति (1960 से 1976 तक) के साथ चीन को बदल डाला| इसने ‘प्रचलित धर्मों’ को ‘मानव धर्म’ बना कर और विद्यालयी शिक्षा को गुणवत्तापूर्ण बना कर चीन को इस ऊँचाई को तक पहुँचा दिया| इस दिशा और दशा में आज भारत कहाँ हैं, गंभीरता से विचारणीय हैं|

हमें यहाँ धर्म को समझना चाहिए, जो अपने अर्थ में ही अतिव्यापक अर्थ रखता है| शिक्षा भी एक व्यापक अवधारणा है, जो हमें कई स्तर पर चेतना से युक्त बनाता है| भारत में धर्म एवं शिक्षा सम्बन्धित कई वैधानिक और संवैधानिक अधिकार भी जुड़े हुए हैं, जो भारत में कई समस्यायों को निरंतरता देते हैं|

वैसे धर्म का एक प्राचीन अर्थ है और एक अभी का प्रचलित अलग अर्थ है| ऋग्वेद में धर्म को विश्व का मूल आधार बताया गया है| बौद्ध दर्शन में धारणीय गुणों को ही धर्म बताया गया है| भारतीय मनीषियों ने धर्म को एक जीवन –पद्धति के रुप में बताया है, जिसके अनुसार वह जीवन व्यतीत करता है| यह धर्म सिर्फ कर्तव्य के पालन से सम्बन्धित होता है, जो उस व्यक्ति, उसके परिवार, समाज, मानवता और मानवता के भविष्य के लिए सार्थक होता है| यह धर्म समाज में ‘मानव धर्म’ के रुप में लिया जाता रहा| इस तरह यह धर्म सिर्फ ‘आस्था’ का विषय नहीं होकर विस्तृत कल्याण के लिए होता है| धर्म शब्द ‘धि’ नामक धातु से उत्पन्न है, जिसका अर्थ ‘धारण करना’ है| यदि यह ‘धर्म’ ही ‘मानव धर्म’ है, तो विश्व के सभी प्रचलित आधुनिक धर्म मात्र एक सम्प्रदाय हैं|

किसी भी प्रचलित आधुनिक धर्म में उसके अपने उपास्य विषय में अखंड आस्था और उसके प्रति पूर्ण प्रतिबद्धता अनिवार्य होता है| इसका उपास्य अलौकिक शक्ति से युक्त माना जाता है, जो अपने अनुयायियों पर कृपा भी करता है| हर धर्म में कोई कर्मकांड अवश्य होता है, जो सामाजिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं के निर्माण या संशोधन के लिए आवश्यक होता है| जब भी कोई कर्मकांड होगा, उसमे पाखंड, ढोंग एवं अतार्किक विश्वास अवश्य रहेगा, चाहे वह कितना भी वैज्ञानिक होने का दावा कर ले| धार्मिक अनुयायियों को अपने उपास्य विषय में आस्था अखंड रखना होता है, जिस आस्था पर कोई कार्य –कारण यानि तर्क का प्रभाव नहीं होता है| दरअसल ये धर्म नहीं होकर सम्प्रदाय हैं| खैर, हमें यहाँ धर्म एवं सम्प्रदाय की चर्चा नहीं करना है, क्योंकि यह प्रत्येक के लिए आस्था और निष्ठां का विषय होता है|

शिक्षा किसी भी वस्तु या स्थिति को यथास्थिति में समझने में सहायता करता है| शिक्षा से ‘ज्ञान’ उत्पन्न होता है, जिसके उपयोग से वह ‘बुद्धि’ बनता है| भारत में पर्याप्त और समुचित शिक्षा के अभाव में सामान्य जनों में मानवीय गुणों का अभाव है और इसके अभाव के कारण इससे सम्बन्धित कोई धार्मिक व्यक्ति कट्टर, अंधविश्वासी, पाखंडी, क्रूर, मुर्ख, या देशद्रोही दिखता है| यह सब पर्याप्त और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के अभाव में होता है|

आज हर ज्ञान को परम्परागत धर्म के सन्दर्भ में देखने का स्वभाव बन गया है| यही हममें घृणा, विद्वेष, ईर्ष्या,और संवेदनहीनता फैलता है| ऐसा कोई धर्म नहीं करता है, बल्कि ऐसा धर्म के आड़ में गलत और अनुचित शिक्षा करता है| सभी धर्मों के मूल ग्रंथो का यदि अवलोकन किया जाय, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि प्रचलित आधुनिक धर्मों में व्याप्त दिखती बुराइयों के लिए इनके मूल एवं मौलिक ग्रन्थ कतई जिम्मेवार नहीं है| इसके लिए मात्र शिक्षा की गुणवत्ता और इसका प्रसार उत्तरदायी है|

भारतीय संविधान में धर्म एवं उपासना से सम्बन्धित मूल अधिकार के बारे में मुझे कुछ अतिरिक्त नहीं कहना है| लेकिन धार्मिक शिक्षा (अनुच्छेद 28) और संस्कृति संरक्षण के लिए शैक्षणिक संस्थान (अनुच्छेद 30) में जो कुछ शैक्षणिक विशेषाधिकार दिए गये हैं, वह विचारणीय विषय अवश्य है| धर्म एवं संस्कृति संरक्षण के लिए स्थापित एवं संचालित संस्थान में भी विद्यालयी शिक्षा सभी के लिए एक समान और एक प्रकृति की अनिवार्य होना चाहिए| विद्यालयी शिक्षा में धर्म एवं संस्कृति संरक्षण के नाम पर विद्यालयों के लिए अधिकृत पाठ्यक्रम से व्यवस्था को कोई समझौता नहीं करना चाहिए| धार्मिक और सांस्कृतिक शिक्षा अधिकृत विद्यालयी पाठ्यक्रम के अतिरिक्त होनी चाहिए या विद्यालयी शिक्षा की समाप्ति के बाद उच्चतर अवस्था में होनी चाहिए| मैं धर्म एवं संस्कृति संरक्षण के उच्चतर एवं शोध संस्थानों के बारे में कोई आपत्ति नहीं कर रहा हूँ, लेकिन हर व्यक्ति को मानव बनने की मूल एवं वैज्ञानिक शिक्षा अवश्य मिलनी चाहिए| व्यवस्था इसका नियमन एवं नियंत्रण कड़ाई से करे|

यदि भारत को ‘एक भारत, श्रेष्ट भारत’ बनाना है, तो हर को गुणवत्तापूर्ण और वैज्ञानिक शिक्षा अवश्य ही सुनिश्चित करना होगा| यदि भारत को एक सशक्त और समृद्ध राष्ट्र बनना है, तो भारत को धर्म एवं संस्कृति -निरपेक्ष विद्यालयी शिक्षा को अनिवार्य करना होगा| धर्म एवं संस्कृति से सम्बन्धित विशेष शिक्षा को सामान्य एवं अनिवार्य शिक्षा से अलग करना होगा| यह संवैधानिक व्यवस्था को पुनर्व्यख्यापित करने या संवैधानिक संशोधन की आवश्यकता जताती है| इसी से सभी धार्मिक सहित अन्य समस्यायों का निदान संभव है| यह एक सशक्त और समृद्ध राष्ट्र निर्माण के लिए अनिवार्य है| इसके बिना सारा प्रयास राजनीति का हिस्सा हो जाता है| वही ‘राजनीति’, जिसकी ‘नीति’ (Policy) का ‘राज’ (Secret) कोई नहीं जानता है|

इसीलिए हर व्यक्ति को गुणवत्तापूर्ण और वैज्ञानिक शिक्षा उपलब्ध करने के लिए सभी संवैधानिक अपवादों से मुक्त व्यवस्था करनी ही होगी|

आचार्य प्रवर निरंजनजी

शिक्षक, लेखक, प्रेरक एवं दार्शनिक

अध्यक्ष, अन्तर्राष्ट्रीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान

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मंगलवार, 3 फ़रवरी 2026

काल्पनिकताएँ भी वास्तविकताएँ होती है

यह एक विचित्र स्थिति है कि दो विपरीत अवस्थाओं को एक साथ सत्य और सही बताया जा रहा है| अक्सर लोग समझते हैं कि कोई कल्पनाएँ कभी भी वास्तविक नहीं हो सकती, या कोई वास्तविक प्रभाव एवं परिणाम पैदा नहीं करती है| लेकिन तथ्य यह है कि काल्पनिकता की वास्तविक और काल्पनिक, दोनों अवस्थाओं में एक साथ मौजूद रहती है| यह सब कुछ उसके ‘परिप्रेक्ष्य’ पर निर्भर करता है|

इसे दूसरी तरह से इस तरह व्यक्त किया जा सकता है कि क्या कल्पनाएँ भी वास्तविक होती है?” इसका उत्तर सीधा ‘हाँ’ या ‘नहीं’ में नहीं दिया जा सकता, क्योंकि यह इस पर निर्भर करता है कि हम वास्तविकसे क्या अर्थ लेते हैं? इसे हम भौतिक अर्थ (Physical Reality) में और मनोवैज्ञानिक अर्थ (Psychological Reality) में समझने के साथ साथ यह इस पर भी निर्भर करता है कि हमारी चेतना के लिए कल्पनाऔर वास्तविक अनुभवमें फर्क कितना है?

अगर वास्तविकसे हमारा मतलब है कि जो चीजें बाहर की दुनिया में भौतिक रूप से मौजूद हो, तो इस अर्थ में कल्पनाएँ वास्तविक नहीं होतीं। ऐसी चीजें हमारे मन एवं मस्तिष्क के भीतर बनने वाले मानसिक चित्र, विचार या संभावनाएँ होती हैं। ऐसी चीजों को छुआ, तौला या मापा नहीं जा सकता। प्रसंगवश यह भी जान लेना चाहिए कि क्वांटम भौतिकी के ‘कोपेनहेगन व्यक्तव्य’ में यह मान लिया गया है कि हमारी कल्पनाएँ ही भौतिकताओं को जन्म देती है| यह सही है कि हमारी कल्पनाएँ ही बाहय भौतिकताओं के अस्तित्व को आधार दे सकती है, लेकिन उन्हें जन्म नहीं देती है|

लेकिन अगर वास्तविकसे हमारा अभिप्राय यह है कि जो हमारे अनुभव, भावना और व्यवहार को प्रभावित करता है, तो इस अर्थ में कल्पनाएँ पूरी तरह वास्तविक होती हैं। हमारी डर की कल्पना से हमारे दिल की धड़कन तेज़ हो जाती है, भविष्य की कल्पना से प्रेरणा या चिंता पैदा होती है, प्रेम की कल्पना से वास्तविक भावनाएँ उत्पन्न होती हैं, आदि आदि अनेक उदहारण हमारी दुनिया मौजूद हैं| यहाँ कल्पना सिर्फ़ हवा में उड़ती चीज़ नहीं, बल्कि जैविक तंत्रिका विज्ञान की घटनाओं का रूप ले लेती है| इसे मनोविज्ञान में ‘मनो –शारीरिक प्रभाव’ (Psycho –Somatic Effect) कहते हैं| मानव मस्तिष्क में कल्पनाओं पर वैसे ही रासायनिक प्रक्रियायों के परिणाम मिलते हैं, जैसे वास्तविकताओं पर निकलते हैं|

बहुत सी चीज़ें जो आज पूरी तरह काल्पनिक लगती हैं, कल वास्तविक हो जाती है| जो आज सिर्फ़ कल्पनाएँ  मानी जाती हैं, वे कल्पनाएँ आज अवास्तविकनहीं होती, बल्कि ये संभावित वास्तविकताहोती हैं। मशीने, कम्प्यूटर,  इन्टरनेट, सामाजिक एवं सांस्कृतिक संस्थाएँ (समाज, विवाह, धर्म, आदि), राजनीतिक संस्थाएँ (लोकतंत्र, राज्य, राष्ट्र आदि), आर्थिक संस्थाएँ (मुद्रा) आदि इसी प्रकार की काल्पनिकता है| इस अर्थ में काल्पनिकता भविष्य की वास्तविकताओं का रूप होती हैं। कल्पनाएँ भौतिक रूप से वास्तविक नहीं होतीं, लेकिन मानसिक, भावनात्मक और ऐतिहासिक स्तर पर गहरी वास्तविकता रखती हैं। वे यथार्थ से कटे भ्रम नहीं, बल्कि यथार्थ के संभावित रूप होती हैं।

आधुनिक तंत्रिका विज्ञान (न्यूरोसाइंस) बताता है कि मस्तिष्क काल्पनिकता और वास्तविकता के अनुभव को पूरी तरह अलग नहीं करता। चिकित्सीय तकनीकों, जैसे fMRI और EEG के अध्ययनों से पता चलता है कि जब कोई व्यक्ति किसी खाद्य पदार्थ को वास्तव में काटने की कल्पना करता है और किसी खाद्य पदार्थ को वास्तव में काटता है, तो दोनों स्थितियों में एक सा परिणाम दिखता है| उसके मस्तिष्क के दृश्य क्षेत्र (Visual Cortex), भावना क्षेत्र (Insular Cortex) में, और शारीरिक संवेदना (Somatosensory Cortex) में बहुत मिलती-जुलती न्यूरल गतिविधि दिखती है। इनमे अंतर सिर्फ़ इतना होता है कि वास्तविक अनुभव में संकेत एवं सूचनाएँ ज़्यादा स्पष्ट, तेज़ और स्थिर होते हैं, जबकि कल्पना में वही नेटवर्क हल्के रूप में सक्रिय होते हैं और ज्यादा स्पष्ट एवं स्थिर नहीं होते हैं| स्पष्ट है कि न्यूरॉन के स्तर पर कल्पना भी एक वास्तविक जैविक घटना है।

कल्पना ही मानव मस्तिष्क में ‘संभावनाओं को पैदा करने’ का प्रक्रम है| मस्तिष्क संभावित परिणामों को पूर्व-अनुभव करता है| हम कल्पना से लक्ष्य-निर्देशित बनाते हैं और कल्पना में भावनात्मक रंग भरते हैं| कल्पना कोई भ्रमनहीं है, बल्कि यह मस्तिष्क की एक उच्च स्तरीय संज्ञानात्मक क्षमता है। प्लेसिबो प्रभाव (Placebo Effect) में  कल्पना शरीर को बदल देती है| यह सबसे मज़बूत प्रमाण है, जो यह स्पष्ट करता है कि कल्पना वास्तविकअसर डालती है| कल्पना शरीर में वास्तविक रसायन छोड़ता है, और व्यक्ति पर वास्तविक शरिरिक, मानसिक एवं भावनात्मक प्रभाव होता है। यह सब दिखाता है कि एक कल्पना उसके शरीर की गतिविधियों को बदल सकती है|

जब व्यक्ति किसी पुराने अनुभव को फिर से कल्पना में लेता है, तब वह उसे दोबारा जीता है| ऐसे में उसका मस्तिष्क उसे अतीतनहीं मानता| वह उसे अभी घट रही घटनासमझ लेता है| सिर्फ़ कल्पना से ही उसके शरीर में वही रासायनिक तूफ़ान उठ जाता है, जो वास्तविकता में होता है। कल्पना से ‘दिमाग की संरचना’ (Neuroplasticity) तक बदल सकती है। जब वास्तविकता में कोई अभ्यास किया जाता है और जब उसी का काल्पनिकता में अभ्यास किया गया, तो कुछ समय बाद (सप्ताह या महीना में) दोनों के Motor Cortex में बदलाव दिखा| उनमे बदलाव का अन्तर सिर्फ मात्रा में हुआ|

आधुनिक तंत्रिका विज्ञान यह स्पष्ट करता है कि कल्पनाएँ बाहर की दुनिया में भौतिक रूप से मौजूद नहीं होतीं, लेकिन उसके मस्तिष्क और शरीर के भीतर वे पूरी तरह वास्तविक जैविक घटनाएँ होती हैं। वे वही न्यूरल नेटवर्क सक्रिय करती हैं, वही रसायन छोड़ती हैं, और वही संरचनात्मक बदलाव पैदा कर सकती हैं, जो वास्तविक अनुभवकरता है।

 “काल्पनिक वास्तविकताओं’ को व्यक्तिगत मस्तिष्क में, समाज में, और इतिहास में समझ सकते हैं| व्यक्तिगत स्तर पर ये ऐसी वास्तविकताएँहैं जो बाहर नहीं होतीं, लेकिन व्यक्ति के लिए पूरी तरह वास्तविक अनुभव बन जाती हैं। इस तरह कोई भी इन कल्पनाओं से अपने को तो बदल सकता है, लेकिन अपने अस्तित्व के बाहर को प्रभावित नहीं कर सकता है| अपनी कल्पनाओं से बाहय दुनिया को बदलने की तथ्यात्मक प्रक्रिया एवं परिणाम अभी तक बहुत स्पष्ट नहीं है|

काल्पनिक वास्तविकताओं का अस्तित्व सामाजिक स्तर पर भी होता है| ये वे चीज़ें हैं जो प्रकृति में नहीं पाई जातीं, लेकिन सामूहिक विश्वास से पूरी तरह वास्तविकबन जाती हैं। इनके उदाहरणों में मुद्रा (Currency), राष्ट्र (Nation), कानून (Law), जाति, नस्ल, वर्ग, लोकतंत्र. मानवाधिकार, आदि प्रमुख हैं| राष्ट्र का कथानक (Narrative) इतनी शक्तिशाली होता है कि लोग इसके लिए जान दे देते हैं। ये सब काल्पनिकताएँ प्रभावशाली वास्तविकताएँ होते हैं। मिथक भी इतिहास की तरह कार्य करता है| प्रकृति में अधिकारनाम की कोई चीज़ नहीं होती, लेकिन इसकी काल्पनिकताएँ आज संविधान, कानून और मानवाधिकार देती है|

 आज समाज, व्यापार, राजनीति, पहचान आदि सब इसी डिजिटल कल्पनापर टिका है। जो चीज़ें कल्पना में जन्म लेती हैं, वह व्यवहार, शरीर या इतिहास को बदल देती हैं| इसीलिए यह कहा जाता है कि कथानक शासन करता है| कल्पनाएँ कर दुनिया को बदल दीजिए| वैज्ञानिकों की कल्पनाएँ ‘वर्तमान मानवता’ और ‘मानवता के भविष्य’ को बदल रही है| वास्तविकता और काल्पनिकता की प्रक्रियायों को समझिए|

आचार्य प्रवर निरंजनजी

शिक्षक, लेखक, प्रेरक एवं दार्शनिक

अध्यक्ष, अन्तर्राष्ट्रीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान

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