प्रश्न यह है कि ‘मानव क्या होता है?’ इसके उत्तर
में आप कह सकते हैं कि मानव एक स्तनपायी पशु है| चूँकि एक ही तथ्य के बदलते सन्दर्भ
के अनुसार अनेक सत्य हो जाते हैं, इसिलिए यहाँ आप एक ही साथ सही भी हैं और गलत भी
हैं| एक मानव एक सामान्य स्तनपायी पशु से भिन्न और अलग हैं| मानव की यह अवस्था
उसकी चेतना के विकास और उसकी उत्कृष्टता की कहानी है| यह चेतना का विकास और इसकी
उत्कृष्टता भी मानव द्वारा विभिन्न सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक एवं आर्थिक
संस्थाओं (Institutions) एवं संस्थानों (Institutes) के निर्माण एवं उसके विकास
पर आधारित है| इसी के बदौलत मानव ने अपना विस्तृत. व्यापक और जटिल संसार बना सका
है| इसी के अभाव में कोई भी अन्य जीव इतना विस्तृत, व्यापक एवं जटिल संसार नहीं
बना सका|
‘मानव क्या होता है?’ या ‘मानव क्या है?’ का यह भी
अर्थ होता है कि एक मानव क्या क्या हो सकता है? अर्थात क्या एक मानव अपनी नियति को
नियमित और नियंत्रित भी कर सकता है? क्या एक मानव जो चाहे, वह वैसा बन सकता है?
क्या वह अपना स्वयं का जीवन रच सकता है और उसे जी भी सकता है? यदि इन सभी प्रश्नों
का उत्तर “हाँ” में है, तो यह मानव जीवन का एक क्रान्तिकारी निर्णय है| इसी क्रान्तिकारी
निर्णयों के कारण ही मानव को आजतक की सारी उपलब्धियाँ प्राप्त है और आगे इससे भी
ज्यादा उपलब्धियाँ प्राप्त करनी है| स्पष्ट है कि मानव एक ‘प्रक्रिया’ (Process)
का नाम है| यानि मानव अपनी क्रियाकलापों की प्रक्रिया है| इन प्रक्रियायों में
विचारों, भावनाओं एवं व्यवहारों को उत्पन्न करने, उसे विकसित करने, उसे नियमित एवं
नियंत्रित करने और लक्ष्य निर्धारण करना होता है|
चूँकि मानव निरन्तरता के साथ एक प्रक्रिया है,
इसीलिए मानव को इन प्रक्रियायों पर अवश्य ही विचार विचार करनी चाहिए, तभी वह मानव
है। इन प्रक्रियायों में विचार, भावना और व्यवहार की प्रक्रिया शामिल है| विचारों,
भावनाओं और व्यवहारों को जन्म देने की प्रक्रिया, उसके उद्विकास की प्रक्रिया, उनको नियमित एवं
नियंत्रित करने की प्रक्रिया, ताकि कोई इच्छित लक्ष्य पाया
जा सके। ध्यान रहे कि ‘उद्विकास’ (Evolution ) शब्द एक गहन अर्थ रखता है, जिस
प्रक्रिया में किसी अलौकिक यानि किसी दैवीय शक्ति की कोई भूमिका नहीं होती है| हम
अभी क्या है और हम आगे क्या क्या हो सकते हैं, इन संभावनाओं
पर विचार करना और संभावनाओं की तलाश करना मानव के लिए महत्वपूर्ण है। इसीलिए प्रसिद्ध
दार्शनिक रे देकार्त कहते हैं कि मैं सोचता हूँ, इसलिए मैं
हूँ।
‘मैं सोचता हूँ, इसलिए मैं हूँ|' लेकिन सोचना क्या है? यदि कोई सोचता है, और उसके सोचने का केन्द्र उसका स्वयं या उसका परिवार मात्र ही है, तो ऐसा सोचने का सामाजिक अर्थ क्या हो सकता है? कहने
का तात्पर्य है कि किसी भी सोच, यानि चिन्तन का केन्द्र यदि
समाज या मानवता का कल्याण नहीं है, तो वैसे सोच का कोई अर्थ
नहीं है। तब एक पशु होने और एक मानव होने में कोई फर्क नहीं होगा| अर्थात समाज या
मानवता के कल्याण के लिए बदलने की प्रक्रिया ही मानव होने का अर्थ है।
लेकिन ‘मानव क्या है?’, यह एक निरपेक्ष प्रश्न नही
हो सकता है। यह प्रश्न अवश्य ही सापेक्ष है। इस प्रक्रिया के अनिवार्य अवयव क्या क्या है, या हो
सकते हैं? प्रसिद्ध क्रान्तिकारी दार्शनिक एन्टोनियो
ग्राम्शी मानते हैं कि मानव को सक्रिय सम्बन्धों की एक अनिवार्य प्रक्रियाओं की
श्रृंखला समझना जरुरी है। सामान्यत: एक व्यक्ति का जीवन निरपेक्ष माना जाता है,
जबकि एक व्यक्ति का जीवन समाज और मानवता के सापेक्ष होता है।
प्रत्येक मानव में मानवता के कई आयामों और कई प्रतिबिम्बों का समन्वय और सामंजस्य
होता है। मानव की प्रक्रिया में समाज और मानवता का भविष्य शामिल रहता है। मानवता
के भविष्य में प्रकृति भी समाहित रहता है। किसी भी मानव को मानवता और मानवता के
भविष्य से निरपेक्ष नहीं माना जा सकता है|
एक मानव अवश्य ही अपने ‘आत्म’ (Self), अन्य मानव
और पारिस्थितिकी तन्त्र के सापेक्ष होता है| यह भी स्पष्ट रहना चाहिए कि यह ‘अन्य
मानव’ और ‘पारिस्थितिकी तन्त्र’ भी स्वयं में एक सक्रिय प्रक्रिया है, जो तत्क्षण
बदलता रहता है| यह तीनों ही मिलकर समाज और मानवता के ‘फिजाओं को बनाता, बिगाड़ता और बदलता रहता है| एक पारिस्थितिकी तन्त्र सिर्फ
एक भौगोलिक ढाँचा या संरचना नहीं होता है, बल्कि वह अपने इतिहास की समझ (Perception)
की सक्रिय भूमिका का परिणाम होता है| मैं इस पारिस्थितिकी तन्त्र को ‘व्यवस्था –तंत्र’
(Organizational System) का ‘फिज़ावेयर’ (Fizaware) कहता हूँ, जो ज़माने की फिजाओं
को बदलने की समझ और सामर्थ्य रखता है|
जब पारिस्थितिकी तन्त्र में ‘इतिहास की समझ’ इतना
महत्वपूर्ण है, तो इसकी मनमानी व्याख्या नहीं होनी चाहिए| अपने ‘इतिहास की समझ’ ही
उस व्यक्ति या समाज ‘जड़े’ होती है, जो उसको मजबूती देता है, आधार देता है, और
आवश्यक उर्जा के लिए पानी एवं आवश्यक खनिज आदि देता है| यह बहुत महत्वपूर्ण है,
जिसे समझना जरुरी है| ‘मानव क्या है’ या ‘मानव क्या हो सकता है’, यह सब अपने इसी ‘इतिहास
की समझ’ का अनिवार्य परिणाम है| यही वह ‘पारिस्थितिकी तन्त्र’ है, जो यह निर्धारित
करता है कि एक मानव क्या क्या हो सकता है|
तब इस ‘इतिहास की समझ’ की व्याख्या को अवश्य ही
वैज्ञानिक, तार्किक, तथ्यपरक और विवेकशील होना चाहिए| इतिहास के सारे प्रक्रम ‘प्राकृतिक
उद्विकासवाद’ (चार्ल्स डार्विन) और ‘सामाजिक उद्विकासवाद’ (हर्बर्ट स्पेंसर) के
अनुरूप होना चाहिए, अन्यथा वह ‘इतिहास की समझ’ की व्याख्या इतिहास के नाम पर पूरा
ही बकवास कहानी मात्र है| भारत की सारी समस्यायों की जड़ में भारतीय इतिहास की
अवैज्ञानिक व्याख्या ही है| भारत की सामन्ती काल में रचित सामग्रियों को ही भारतीय
इतिहास की ‘जड़े’ मान लिया गया है|भारतीय विकास में यही सबसे बड़ा रोड़ा है| इस मूल
समस्या पर ध्यान नहीं देना या इसे नहीं समझना ही भारत की बर्बादी है| इस मूल
समस्या को यथावत छोड़ सभी भारतीय विद्वान्, नौकरशाह औए राजनीतिज्ञ सिर्फ सामाजिक
एवं सांस्कृतिक यथास्थितिवाद को ही यथावत बनाए रखने के लिए प्रयत्नशील है| कोई भी भारतीय विद्वान् और नौकरशाह इस मूल केंद्र पर
सोचता नहीं है| इसीलिए भारत में मानव सम्पदा का समुचित विकास नहीं हो रहा है|
एक भारतीय मानव की क्षमता, जो वैश्विक इतिहास में
प्रमाणित है, को सामन्त कालीन साहित्यों के भरोसे छोड़ दिया गया है| इसीलिए भारत
में एक मानव क्या हो सकता है?, प्रश्न ही बेमानी हो जाता है| इसी कारण सामर्थ्यवान
भारत आज भी लाचार बना हुआ है|
आचार्य प्रवर निरंजन जी
अध्यक्ष,
भारतीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान|
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