सवाल
यह है कि स्त्रियाँ क्या होती है? प्राकृतिक व्यवस्था
में एक स्त्री क्या होती है? दूसरे स्तनपायी पशुओं एवं अन्य जीवों में इनकी क्या व्यवस्था
होती है? स्त्रियाँ एक शरीर में होती है, जैसे पुरुष होते
हैं। तो क्या स्त्रियाँ इस संसार में एक मौलिक स्वतंत्र इकाई है, या आधी इकाई है, या पूरक इकाई है? क्या पुरुष भी आधी इकाई ही हैं, या पूर्ण इकाई है,
या पूरक इकाई है? ब्रह्माण्ड की हरेक इकाइयाँ या सममिति
(सिमिट्र्री) में होती है, या एक दूसरे के अनुपूरक होती है। ये
सभी प्रश्न बहुत गहरे हैं, क्योंकि ‘स्त्री’ को केवल ‘पुरुष के संदर्भ में’ परिभाषित
करना अपने-आप में एक दार्शनिक, सामाजिक और वैज्ञानिक समस्या
है। मैं आपको इस विमर्श में शामिल करना चाहता हूँ कि स्त्रियों को कैसे सम्यक रूप
में समझा जाय?
जैविकीय
(Biological)
बनावट एवं कार्यात्मक संरचना में पुरुष के संदर्भ में स्त्री नव
सृजन यानि प्रजनन की सह-भागी इकाई है| शून्य
(अंडा एवं शुक्राणु) से जीवन का सृजन तो दोनों मिलकर करते हैं, लेकिन उसे पूर्ण
विकसित करने का प्राकृतिक भार स्त्री को मिला है| स्त्री और पुरुष एक दूसरे के ‘पूरक’
(complementary being) होते है| जैविक रूप से दोनों मिलकर जीवन की
निरंतरता बनाते हैं| यह संबंध कार्यात्मक है, न कि
अस्तित्वगत पहचान का आधार है| ‘अस्तित्वगत पहचान’ बनाने यह प्रयास या नजरिया ही
समाज के लिए घातक है| दोनों को अलग अलग समझा ही नहीं जाना चाहिए|
इस
पृथ्वी पर अन्य पशु भी यौन सम्बन्ध बनाते हैं और जीवन का सृजन कर उसे निरंतरता भी
देते हैं| लेकिन ये सब जीव अपना ‘झुण्ड’ तो बनाते हैं, लेकिन अपना संसार नहीं बना
पाते हैं| ये पशु सामाजिक संस्थाओं का सृजन नहीं कर पाते है| मानव ने जब विवाह आदि
सामाजिक संस्थाओं का निर्माण करना शुरू किया, तब इस संसार का निर्माण हुआ| सामाजिक
संस्थाओं के जाल को समाज या संसार कहते हैं| सांस्कृतिक, आर्थिक एवं राजनीतिक
संस्थाओं के विकास के साथ आज मानव इस स्थिति तक पहुँच सका है|
विवाह
नामक सामाजिक संस्था में कुछ लोग एक साथ रहते हैं, और सभी शारीरिक एवं अपनी अन्य आवश्यकताओं की
पूर्ति करते हैं| इस तरह विवाह में ‘यौन सम्बन्ध’ बनाना स्त्री एवं पुरुष का प्राथमिक
एवं मौलिक कार्य नहीं रह जाता है, बल्कि सामाजिक संस्थाओं के द्वारा निर्धारित
सामाजिक संबंधों का निर्वहन अनिवार्य हो जाता है| ‘विवाह’ की इस अवधारणा में सभी
आधुनिक बदलाव भी समाहित हो जाते हैं| इस अवधारणा में यौन संबंधों की तथाकथित पवित्रता
को कोई स्थान नहीं मिलता है| स्पष्ट है कि विवाह संस्था सिर्फ यौन संबंधों के लिए
नहीं होता।
विवाह
को संस्था के रुप में पुनर्परिभाषित करने की आवश्यकता आधुनिक समाजों में उभर रही बदलाव
है,
जो यौन निष्ठा से निरपेक्ष होता जा रहा है। समस्या तब होती है, जब
इस जैवकीय पूरकता को पुरुष -निर्भरता बना दिया जाता है। स्त्रियों की विवादस्पद
छवि का उदय एवं विकास मध्य युग में सामन्ती व्यवस्था के उदय एवं विकास के साथ हुआ|
प्राचीन काल में ऐसी असामनता नहीं थी| आज जो भी असामनता स्त्रियों के लिए वर्णित मिलता है, वह सब कागजी ग्रंथों में ही लिखित हैं, जिसका उपलब्ध स्वरुप मध्य काल में संपादित किया
गया है| साहित्य समाज का दर्पण होता है| यह साहित्य कागज पर ही उपलब्ध है, अर्थात यह
सब भारत में कागज के प्रचलन में आने के बाद के समाज का प्रतिबिम्ब है| प्राचीन काल
में यौन आधारित ‘लैंगिक’ (Gender, not Sexual) असामनता का कोई पुरातत्वीय साक्ष्य
इतिहासकारों को उपलब्ध नहीं है|
इतिहास के आदि काल में, यानि प्राक इतिहास में स्पष्ट है कि गर्भधारित स्त्रियों ने अपने विराम काल में नदियों या झीलों के उतरते पानी में अनाजों के पौधों को उगते और उसके दानों को पशुओं एवं चिड़ियों द्वारा खाते देखा| इस तरह, स्त्रियों ने कृषि का प्रारंभ किया| स्त्रियों द्वारा घायल पशुओं की सेवा करने एवं उसके बहुविध उपयोग ने पशुपालन को विकसित किया| कृषि के विकास की आवश्यकता ने स्त्रियों को आवास को स्थायी (घर एवं बस्ती) बनाने को प्रेरित किया, भले ही इस प्रक्रिया में पुरुषों का सहयोग मिला| अपनी स्त्रियों के पास और अपने घर जाने के लिए पहली बार मानव को ‘दिशा’ (Direction) बोध की आवश्यकता हुई और ‘दिशाओं’ का निर्धारण किया जाने लगा| ‘आग’ (Fire) जलाये रखने की निरंतरता और उसके लिए आवश्यक ईंधन की व्यवस्था करने की बाध्यता से स्त्रियों ने ‘समय’ (Time) की गणना प्रारम्भ की| ‘आग’ की देखभाल करना, यानि ठन्डे माहौल में आग को घेर कर समय व्यतीत करने से सबसे पहले स्त्रियों में ‘संवाद’ शुरू हुआ, जो भाषा एवं साहित्य के रूप में आज उपलब्ध है| यदि पुरुषों ने ‘सभ्यता’ का सृजन एवं विकास किया है, तो स्त्रियों ने ‘संस्कृति’ का सृजन और विकास किया है| एक व्यवस्था का ‘हार्डवेयर’ है, तो दूसरा व्यवस्था का ‘साफ्टवेयर’ है| अब आप ही बताइए कि कौन किस पर निर्भर है?
मध्य
युगीन सामन्ती समाज में ‘यौन विभेद’ (Sex Discrimination) और ‘लैंगिक विभेद’
(Gender Discrimination) स्पष्ट होता गया| तथाकथित प्रगतिशील नारीवादियों में सिमोन
द बोउआर (Simone de Beauvoir) का प्रसिद्ध कथन है
– ‘स्त्रियाँ जन्म नहीं लेती है, बल्कि उसे बना दिया जाता है| हालाँकि इसे मानवता की
प्राकृतिक व्यवस्था के सन्दर्भ में अतिशयोक्तिपूर्ण माना जा सकता है| नारीवादी
अस्तित्ववाद में यह तर्क दिया कि चूँकि समाज को पुरुषों ने बनाया है, इसलिए
स्त्रियों को पर्याप्त महत्ता नहीं दिया| इसका अर्थ यह हुआ कि स्त्री होना जैविक
नहीं, सांस्कृतिक निर्माण है। यह प्रगतिशील दिखता अवधारणा सामन्ती
युग के लिए सही व्हैयाख्या हो सकता है, परन्तु इसे प्राकृतिक व्यवस्था नहीं समझना चाहिए|
सत्ता
(Power)
के सामन्तवादी होने के बाद पुरुष के संदर्भ में स्त्री एक नियंत्रण
की वस्तु, उपभोग की वस्तु, नैतिकता का भार, ‘इज्ज़त’ का वाहक, परंपरा को बोझ ढोने
वाली हो गयी| अगर स्त्री को पुरुष के संदर्भ में परिभाषित करें, तो ‘स्त्री’ बनायी जाती है| एक स्त्री की सच्ची परिभाषा पुरुष की पूरकता के
संदर्भ में हो सकती है| अधिकतर लोगों का यही मानना है कि स्त्री और
पुरुष दोनों ही एक स्वतंत्र मानव चेतना है| लेकिन यह धारणा समुचित भी नहीं है, जब
प्रकृति ने एक दूसरे का पूरक बनाया है| एक ‘मानव’ (Man) है,
तो दूसरा ‘गर्भाशय वाला मानव’ (Womb + Man = Woman) है| सामान्यत:
सच्ची मुक्ति का अर्थ स्त्री और पुरुष की स्वयं में पूर्ण चेतना का बोध होना माना
जाता है, जो गलत है| इन दोनों में संबंध सत्ता का नहीं, संवाद
का है|
मनोवैज्ञानिक
कार्ल जुंग अपने विश्लेषणात्मक मनोविज्ञान में समझाते हैं कि पुरुष के भीतर
स्त्री-तत्व (Anima) और स्त्री के भीतर पुरुष तत्व (Animus) भी होता है| अर्थात पुरुष और स्त्री का सवभाव विभिन्न मात्रा में दोनों में एक साथ
मौजूद रहता है|
क्वांटम
भौतिकी का क्वांटम उलझाव सिद्धांत (Quantum Entanglement Theory) समझाता है कि एक
समूह में रहने वाले प्रत्येक कण (Particle) की क्वांटम अवस्था को अन्य कणों की अवस्था
से स्वतंत्र रूप से वर्णित नहीं किया जा सकता, भले ही ये कण एक दूसरे से बहुत दूर
हों| अर्थात एक समूह में एक साथ तक लम्बे समय तक रहने से भावनात्मक एकता बढ़ जाती है, जिसका आभास सभी सदस्यों को भिन्न भिन्न मात्रा में होता रहता है| यही सम्बन्ध
स्त्री एवं पुरुष में और विवाह एवं परिवार में होता है| यह वैज्ञानिक तथ्य भी
स्त्री एवं पुरुष के सम्बन्ध को नए तरीके से व्याख्यापित करता है|
इसलिए
तथाकथित आधुनिक पश्चिमी नारीवादी और सामन्ती नजरिए से स्त्रियों का मूल्यांकन नहीं
कीजिए| इसके लिए प्राकृतिक और आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोणों का सहारा लीजिए| आपके
संसार में आपका सब कुछ बदल जाएगा, और आपकी दुनिया भी खुशनुमा हो जायेगी|
आचार्य
प्रवर निरंजन जी
अध्यक्ष,
भारतीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान|
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