मंगलवार, 12 मई 2026

भाषा का उद्विकास शक्ति और आधिपत्य के लिए होता है

भाषा का उद्विकास (Evolution) एक बहुत ही जटिल और सतत प्रक्रिया है। यह किसी एक व्यक्ति या संस्था द्वारा निर्मित नहीं होती, बल्कि समाज, संस्कृति, भूगोल, इतिहास और मानवीय व्यवहार के साथ धीरे-धीरे विकसित होती है। इसका उद्विकास ही शक्ति और आधिपत्य करने के लिए होता है| मानव अपनी शुरुआती अवस्था में इसके द्वारा प्रकृति और पशुओं  पर आधिपत्य करना चाहा| फिर उसने इसका उपयोग क्रमश: दूसरे मानव पर, दूसरे समाज पर और दूसरी संस्कृतियों पर आधिपत्य करने के लिए किया| ‘अधिपत्य’ करने के लिए एक विशेष और विशिष्ट ‘शक्ति’ प्राप्त करना होता है, और यह सब भाषा के सहयोग से ही संभव होता है|

इस तरह यह स्पष्ट होता है कि भाषा केवल संचार का माध्यम नहीं है, बल्कि यह शक्ति (Power), अर्थ-निर्माण (Meaning-making), और सामाजिक नियंत्रण (Hegemony) का उपकरण हो जाती है। भाषा का उद्विकास एक प्राकृतिक, सामाजिक और ऐतिहासिक प्रक्रिया है, जिसमें समाज अपनी भाषा बनाता है, उसकी संस्कृति उस भाषा को आकार देती है और समय –काल उस विशिष्ट भाषा को अपने अनुकूल कर बदलता रहता है| भाषा के अनुकूलन में अब ‘राज्य –शक्ति’ भी शामिल हो गया है|

सबसे पहले हमें ‘ज्ञान’, ‘बुद्धि’ और ‘प्रज्ञा’ को स्पष्ट अन्तर के साथ समझ लेना चाहिए| भाषा की शुरुआत तत्कालीन परिस्थितियों में ऊर्जा के स्तर में एक 'बदलाव' से होती है, जो हमारी संवेदी अंगों द्वारा संग्रहीत एवं उनकी अंतर्क्रियाओं द्वारा प्रस्करित (Processed) होती है, जिसे ‘उत्तेजना’ (Excitation) कहते है| मानव जाति इस प्रक्रिया के लिए जैवकीय रुप में सक्षम है| यह विशेष एवं विशिष्ट ‘उत्तेजना’ एक खास 'इशारा' (Caveat) देता है। इन विशेष एवं विशिष्ट इशारों के समेकन से एक विशेष एवं विशिष्ट 'चिन्ह' (Symbol) बनता है। उन चिन्हों को 'संकेत' (Signal) कहा जाता है‌। इन्ही विशेष एवं विशिष्ट ‘संकेतों’ के व्यवस्थित और संगठित प्रेषण से एक निश्चित 'एलान' (Annunciation) होता है, जिसे 'सूचना' (Information) कहा जाता है। भाषा के सन्दर्भ में यह ‘संकेत’ ही ‘ध्वनि’ और यह ‘सूचना’ ही ‘शब्द एवं वाक्य’ होता हैं| इन्हीं समस्त ‘सूचनाओं’ के द्वारा किसी भी ‘चीज़’ या ‘क्रियाविधि’ को यथास्थिति में समझना संभव होता है|

किसी भी ‘चीज़’ या ‘क्रियाविधि’ को यथास्थिति में समझना ही 'ज्ञान' (Knowledge) है। सामान्यत: सामान्य लोगों की समझ किसी ‘चीज़’ या ‘क्रियाविधि’ को  ‘उसकी यथास्थिति’ से नहीं होकर उसके प्रति उसके ‘पूर्वाग्रहों’ से होती है| इसीलिए यह कहा जाता है कि किसी व्यक्ति का ‘सत्य’ निरपेक्ष नहीं होकर उसके ‘पूर्वाग्रहों’ का प्रतिविम्ब’ होता है| लोग इसी ज्ञान का उपयोग अपनी समझ के अनुसार करते हैं और तब यह ‘ज्ञान’ ही ‘बुद्धि’ (Intelligence) कहलाता है। जब इस ‘बुद्धि’ का उपयोग ‘मानवता’ और ‘मानवता के भविष्य’ के लिए करते हैं, तो वही ‘ज्ञान’ 'प्रज्ञा' (Wisdom) बन जाता है। ‘भाषा’ का उद्विकास इसी ‘ज्ञान’ के सम्प्रेषण के लिए होता है, जिसका मौलिक उद्देश्य ‘शक्ति’ प्राप्त करना होता है|

‘भाषा’ के उद्विकास को चार्ल्स डार्विन के ‘प्राकृतिक (जैवकीय) उद्विकास’ और हर्बर्ट स्पेंसर के ‘सामाजिक उद्विकास’ के बिना समझा ही नहीं जा सकता है| भाषा का उद्विकास एक ‘जीवित प्रणाली’ की तरह है, और यदि किसी ‘भाषा’ की उत्पत्ति की व्याख्या इससे ‘असहमति’ जताती है, उस ‘भाषा के उद्विकास’ की व्याख्या में एक गहरी एवं सुनियोजित साजिश छिपी हुई है|

भाषा का जन्म और विकास मनुष्यों के आपसी संचार से होता है। जब लोग एक साथ रहते हैं, तो वे अपने अनुभवों, आवश्यकताओं और भावनाओं को व्यक्त करने के लिए संकेत’ और ‘शब्द’ विकसित करते हैं। समय के साथ ये ‘संकेत’ और ‘शब्द’  व्यवस्थित ‘भाषा’ बन जाते हैं, जैसा कि ऊपर उद्विकास की वैज्ञानिक व्याख्या से स्पष्ट है| प्रारंभ में केवल ‘ध्वनियाँ’ थीं, फिर वे ‘ध्वनियाँ’ अर्थ से जुड़ने लगीं और ‘शब्द’ बने। इस अवस्था की भाषा को ‘प्राकृतिक अवस्था की भाषा’ अर्थात ‘प्राकृत’ कहते हैं| जैसा कि इस शब्द ‘प्रा’ (Pre) और ‘कृत’ (Creation) से स्पष्ट होता है कि यह पहले की अवस्था की भाषा है| ऐसी अवस्था की भाषा 'बोली' के नाम से जाना जाता है। 

जब किसी भाषा को अपने सम्प्रेषण में एक निश्चित अर्थ देना होता है, तब इसके लिए कुछ निश्चित नियम निर्धारित करना अनिवार्य हो जाता है| इन नियमों को ही व्याकरण (Grammar) कहा गया| इससे भाषा अधिक संगठित और स्पष्ट हुई। तब ‘प्राकृत’ भाषा संवर्धित होकर उस समाज, व्यवस्था (सरकार) और संस्कृति की ‘पालक’ यानि ‘पालने वाली’ भाषा बन गयी| इस ‘पालक’ यानि ‘पालने वाली’ भाषा को ही ‘पालि’ या ‘पाली’ भाषा कहा गया|भाषा के इस सफर में 'बोली' अब साहित्य और राजकीय भाषा बन जाता है। यह भाषा जब ‘और उन्नत एवं समृद्ध’ होकर ‘संस्कारित’ हो गयी, तब यह ‘भाषा’ ‘और सम्मानित’ होकर नए ‘नाम’ से नामित हो गयी| यह 'व्याख्या' विश्व के सभी भाषाओँ के लिए ‘प्राकृतिक उद्विकास’ और ‘सामाजिक उद्विकास’ के स्थापित सिद्धांतों के अनुरुप है, इसलिए यह व्याख्या वैज्ञानिक और विवेकपूर्ण है| यदि कोई भाषा किसी पूर्व से स्थापित एवं जटिल भाषा के विखंडन की प्रक्रिया से उदित हुआ है, तो प्रश्न यह भी है कि “उस पूर्व से स्थापित एवं जटिल भाषा” की उत्पति की व्याख्या ‘प्राकृतिक उद्विकास’ और ‘सामाजिक उद्विकास’ के स्थापित सिद्धांतों के अनुरूप है और वह क्या है? किसी भी ‘दैवीय उत्पत्ति’ की व्याख्या को वैश्विक जगत नहीं स्वीकार करता है|

किसी भी भाषा पर संस्कृति, धर्म, राजनीति, इतिहास, भूगोल, विज्ञान एवं तकनीक का गहरा प्रभाव पड़ता है। आक्रमणों, व्यापार और प्रवास के कारण नई शब्दावली जुड़ती गई| अन्य भाषाओं के संपर्क से शब्दों और संरचनाओं का आदान-प्रदान होता रहा है। नई तकनीक और जीवनशैली के साथ नए शब्द आते हैं| इन सभी से उच्चारण और प्रयोग भी बदलता रहा है| इससे पुराने शब्द अप्रचलित होते गए|

भाषा का विकास सिर्फ सत्य की खोज के लिए नहीं होकर यह मानव की आवश्यकता और शक्ति प्राप्त करने की अभिव्यक्ति के लिए होता है। भाषा का विकास वास्तविकतासे नहीं, बल्कि मानव की कल्पना और उपयोगिता से होता है। मनुष्य अपनी शक्ति स्थापित करने के लिए उसका अर्थ गढ़ता है| भाषा उसी प्रक्रिया की अभिव्यक्ति का माध्यम है| जो समूह शक्तिशाली होता है, वह शब्दों के अर्थ अपनी हितो को ध्यान में रख कर तय करता है, जैसे ‘अच्छा’, ‘बुरा’, ‘नैतिक’, ‘अनैतिक’ जैसे शब्द उसी के अनुसार बदलते हैं। भाषा कमजोर और शक्तिशाली वर्गों के ऐतिहासिक संघर्ष से विकसित हुई और यहाँ यह भाषा ‘मूल्यों की राजनीति’ बन जाती है|

आप भाषा के उद्विकास को सीधे-सीधे सत्ता और समाज के नियंत्रण से जोड़ सकते हैं। समाज में जो ‘शासक वर्ग’ होता है, वह केवल ‘बल’ से नहीं, बल्कि भाषा और विचारों के माध्यम से भी शासन करता है| इस तरह ‘भाषा’ भी वर्चस्व (Hegemony) का उपकरण बन जाता है| तब भाषा का उद्विकास इस तरह कराया जाता है कि ताकि वह शासन करने वाला वर्ग अपनी विचारधारा को ‘सामान्य’ और ‘सहज’ बना सके| तब वह ‘भाषा’ ही सामान्य जन गण की सामान्य बुद्धि (Common Sense) बन जाती है| इस तरह ‘भाषा’ उस समाज के जन गण की ‘सामान्य संस्कृति’ हो जाती है| इस तरह. यह ‘प्राकृतिक उद्विकास’ नहीं होकर ‘सत्ता’ द्वारा नियमित उद्विकास’ हो जाता है| सामाजिक और सांस्कृतिक संस्थाएँ यथा ‘राष्ट्र’, ‘धर्म’, ‘विवाह’ आदि केवल शब्द नहीं हैं, बल्कि ये वैचारिक संरचनाएँ हैं, जो भाषा के माध्यम से स्थापित होती हैं| आप भाषा के माध्यम से ही समाज को दिशा दे सकते हैं| भाषा ही ‘मानव –मूल्य’ गढ़ते हैं|

स्पष्ट है कि भाषा सिर्फ ‘प्राकृतिक रुप से विकसित’ ही नहीं होती, बल्कि यह ‘शक्ति’ और ‘आधिपत्य’ के लिए भी विकसित की जाती है।

आचार्य प्रवर निरंजन  जी

अध्यक्ष, अन्तर्राष्ट्रीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान|

सोमवार, 4 मई 2026

कौन सा राजनीतिक दल जल्दी समाप्त हो जाता है?

भारत में राजनीतिक दलों के अस्तित्व और उसकी निरंतरता का विश्लेषण करना बहुत सहज और सरल नहीं है| इसीलिए इन राजनीतिक दलों के भविष्य के सम्बन्ध में कोई ठोस निष्कर्ष निकलना भी सरल और साधारण नहीं होता है| इसी कारण, भारत में बहुत से तथाकथित ‘चुनावी विशेषज्ञ’ (Psephologist) हवा –हवाई साबित होते हैं| इन तथाकथित ‘चुनावी विशेषज्ञों’ का इन राजनीतिक दलों के सम्बन्ध में सारे आकलन ध्वस्त हो जाते हैं| दरअसल ये ‘चुनावी विशेषज्ञ’ सांखियकी (Statistics), जनमत (Public Opinion Poll) के संग्रहण एवं सम्बन्धित ऐतिहासिक चुनावी आंकड़ों के नाम पर ‘आंकड़ों की बाजीगिरी’ कर सस्ती लोकप्रियता बटोरते रहते हैं|  

यदि भारतीय राजनीतिक दलों की कुछ मौलिक विशेषताओं का विश्लेषण और समसामयिक मूल्याङ्कन किया जाय, तो कई नए गंभीर पक्ष उभरते हैं| भारतीय राजनीतिक दलों का वर्गीकरण कुछ राजनीतिक दलों के ‘मूलभूत सिद्धांतों’ के आधार पर किया जा सकता है| इन ‘मूलभूत सिद्धांतों’ की नैतिकता पर आप विवाद तो कर सकते हैं, लेकिन इन ‘मूलभूत सिद्धांतों’ की वास्तविकता को नकार नहीं सकते हैं| इन ‘मूलभूत सिद्धांतों’ के आधार पर भारत में कुछ ही राजनीतिक दल अब अपने वजूद में हैं| कांग्रेस भारत की आजादी के लक्ष्य के लिए एक आन्दोलन के रुप में उभर कर आई, लेकिन आज इसमें कोई “स्पष्ट और स्थिर सिद्धान्त” नहीं दिखता होता है| समय के सापेक्ष सिद्धांतों का बदल जाना कोई “स्पष्ट और स्थिर सिद्धान्त” नहीं है| ‘वंशवाद’ कोई सिद्धान्त नहीं होता| कांग्रेस का वर्तमान मूल्याङ्कन उपरोक्त सभी के सापेक्ष किया जाना चाहिए|

भारत की साम्यवादी (कम्युनिस्ट) पार्टियों को ‘मूलभूत सिद्धांतों’ के आधार पर स्थापित माना जाता रहा है| आज ये सभी साम्यवादी दल अपने अस्तित्व के लिए जूझने लायक भी नहीं रह गये हैं| विश्व में आज तक कोई भी राष्ट्र ‘साम्यवादी’ (Communist) नहीं बन सका, सभी ऐसे राष्ट्र ‘समाजवादी’ (Socialist) बन कर ही आगे बढ़ सके| वैसे आज विश्व में कोई भी राष्ट्र पूर्णत: समाजवादी या पूँजीवादी नहीं है| सभी राष्ट्र मिश्रित स्वरुप में हैं| वे ‘समाजवादी राष्ट्र’ ही आज सफल हुए, जिन्होंने ‘संस्कृति की क्रियाविधि और उसकी गत्यात्मकता’ को समझा और उसके अनुसार क्रियान्वयन किया| भारत की सभी साम्यवादी नेतृत्व इसी मौलिक समझ के अभाव में भारत –भूमि पर स्थायी रुप से पनप नहीं सके| ये नेतृत्व आज तक दार्शनिक एन्टोनियो ग्राम्शी, लेनिन और माओ त्से तुंग की ‘संस्कृति की क्रियाविधि और उसकी गत्यात्मकता’ को नहीं समझ सके| इसी कारण भारत की सभी साम्यवादी दल व्यावहारिकता में असफल हो गये|

भारत में कुछ ‘और राजनीतिक दल’ अपने तथाकथित सैद्धांतिक मुद्दों पर स्थापित तो हुए, लेकिन वे सभी दल वर्तमान में धन एवं अन्य दबाव में पारिवारिक जागीर बन कर ‘सिद्धांतविहीन’ हो गये| ऐसे राजनीतिक दल आज इतिहास का विषय हो चुके हैं या होने वाले हैं| इसी तरह, कुछ व्यक्तियों ने अपने राजनीतिक विशेष दल बनाए, जिनका वजूद ही किसी ‘स्थापित सिद्धांतों’ पर आधारित या अन्य आधार पर स्थापित राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया पर हुआ| ऐसे व्यक्तियों के ‘पाकेटी’ (अपनी पाकेट में रखे जाने योग्य) राजनीतिक दल अपनी विरुद्ध दल (जिनकी प्रतिक्रिया में वे वजूद में आए थे) के वजूद समाप्त होते ही ऐसे दलों को विलुप्त हो जाने की विवशता हो गयी| ये सभी राजनीतिक दल समसामयिक मुद्दों को ही उभार कर अपना अस्तित्व बचाने को प्रयासरत होते दिखते रहे हैं| स्पष्ट है कि ऐसे राजनीतिक दलों का अपना कोई मूल एवं स्थापित सिद्धांत नहीं होता है| ऐसे सभी राजनीतिक दल अपने मुद्दों के लिए किसी मुख्य सत्ताधारी दलों की “तथाकथित त्रुटियों” पर आधारित होते हैं| ऐसे सभी राजनीतिक दल सिर्फ प्रतिक्रिया देना जानते हैं, क्योंकि इनके पास अपना कोई मुद्दा, योजना और सिद्धान्त ही नहीं होता है| यदि मुख्य सत्ताधारी दल इन्हें कोई मुद्दा नहीं दे, तो ये राजनीतिक दल और उनके कार्यकर्ता बेरोजगार हो जाते हैं|

यह याद रहे कि कोई भी ‘व्यक्ति या परिवार आधारित राजनीतिक दल’ कुछ वर्षों या दशकों की राजनीति कर सकते हैं, या करते हैं, लेकिन वे उससे ज्यादा दूर नहीं चल सकते हैं| आप भारत की सभी व्यक्ति या परिवार आधारित राजनीतिक दलों’ का विश्लेषण और मूल्यांकन कर सकते हैं| सिर्फ छाती पीटने से गुजर गया समय वापस नहीं आ सकता है| लेकिन जो राजनीतिक दल ‘विचारों, सिद्धांतो, और मूल्यों’ पर आधारित होते हैं, वे लम्बी दूरी की राजनीति करते हैं| ‘विचारों, सिद्धांतो, और मूल्यों’ के समेकित एवं व्यवस्थित प्रतिरुप (Pattern) को ही ‘संस्कृति’ कहते हैं| इसीलिए कहा गया है कि जो राजनीतिक दल ‘संस्कृति’ की राजनीति करते हैं, वे सदियों और सहस्त्राब्दियों की राजनीति करते हैं| ठहरिए, इसे दुबारा पढ़िए| और इस कथन की व्यापकता को समझने की कोशिश करें|

भारतीय जन गण अपनी बौद्धिकता के स्तर और पेट भरने के निश्चिन्त उपाय के बाद ही राजनीतिक हो पाता है| ऐसे भारतीय जन गण को कोई भी राजनीतिक दल उसके धर्म और जाति एवं नैतिकता के नाम पर हवा में उड़ा सकता है| ऐसे भारतीय जन गण अपनी बौद्धिकता की अपेक्षा अपनी भावनात्मकता से ज्यादा संचालित और नियंत्रित होते हैं| आप हर राजनीतिक दलों के उम्मीदवारों के चयन में और दृश्य उद्देश्यों की प्रस्तुति में धर्म, जाति एवं नैतिकता के तत्व ही प्रमुख होते हैं| यह लोगों की मनोदशा के अनुरुप अनिवार्य भी हो जाता है|

कोई भी उपरोक्त सैद्धान्तिक विश्लेषण एवं मूल्यांकन के आधार पर भारतीय राजनीतिक दलों के भविष्य को समझ सकता है|

आचार्य प्रवर निरंजन  जी

अध्यक्ष, अन्तर्राष्ट्रीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान|

शुक्रवार, 1 मई 2026

इतिहास गतिशील क्यों होता है?

अधिकतर लोग यही जानते और मानते हैं कि इतिहास कोई स्थिर विषय –वस्तु है| वास्तव में इतिहास भी गतिशील होता है, जबकि इतिहास में ‘जड़ता’ का गुण भी होता है| दरअसल ऐसे लोग इतिहास को सिर्फ बीते हुए काल का विवरण समझते होते हैं, जबकि इतिहास जीवित लोगों के लिए होता है| इतिहास प्रेरणा देता है और मार्गदर्शन भी करता है| इतिहास को अवश्य ही वर्तमान लोगों का हितवर्धक होना होता है| इसीलिए यह कहा जाता है कि इतिहास वह ‘अतीत का विषय’ है, जो मानवीय बुद्धि का विकास करता है| कुछ लोग इतिहास को मानवीय स्वतंत्रता को ‘और संवर्धित’ करने वाला विषय बताते हैं| वास्तव में इतिहास का मूल और मुख्य उद्देश्य वर्तमान ‘मानवता को वैज्ञानिक बनाना’ होता है| ‘मानवता को वैज्ञानिक बनाने’ का अर्थ ‘मानवता को ‘प्राकृतिक न्याय’ दिलाना’ हुआ| ‘प्राकृतिक न्याय’ में स्वतन्त्रता, समता (Equality), समानता (Equity), बन्धुत्व और विकास शामिल होता है| यदि बीते हुए काल के आधार पर वर्णित सामग्री उपरोक्त उद्देश्य नहीं रखता है, तो वह इतिहास नहीं है; इतिहास के नाम ‘कुछ और’ है|

चूँकि ‘हर इतिहास समकालिक होता है, इसीलिए हर प्राचीन इतिहास को नए सन्दर्भ में लिखा जाता रहा है| भारत में तो प्राचीन इतिहास को जला देने और नष्ट कर देने की मध्ययुगीन परम्परा भी रही| भारत के शुरुआती मध्य काल में उसी प्राचीन सामग्री को जलाने और नष्ट करने से पहले उसे नए स्वरुप में संपादित कर दिया गया| सांस्कृतिक क्रांतियों के देश में कुछ ऐतिहासिक तत्वों को मिटाने एवं हटाने का प्रयास भी ‘इतिहास को ‘समकालिक’ बनाने’ की परम्परा का ही हिस्सा है| शुरुआती मध्ययुगीन भारतीय काल में प्राचीन इतिहास को नए उभरते हुए सामन्तवाद की आवश्यकताओं के अनुकूल समकालिक बनाया गया| ‘समकालिक बनाने’ की इस भारतीय पद्धति में प्राचीन काल की लकड़ी, पत्ता, चमड़ा, धातु –पत्तर और कपड़ा पर उपलब्ध एवं संरक्षित लिखित सामग्रियों को कागज़ पर नए संवर्धित भाषा में अनुवादित कर और संपादित कर दिया गया| फिर उन प्राचीन लिखित सामग्रियों को नष्ट भी कर दिया गया| इस तरह, ‘इतिहास को समकालिक’ होने की प्रक्रिया में ‘इतिहास’ को पुराने ऐतिहासिक आधार पर नयी आवश्यकताओं के अनुरुप बदल दिया गया| ऐसा सदैव होता रहा है और आगे भी होता रहेगा| इसीलिए यह कहा गया है कि आप किसी पुराने इतिहास को रद्द तो कर सकते हैं, लेकिन आप कोई अंतिम इतिहास नहीं लिख सकते हैं|

दरअसल इतिहास में दो तत्व होते हैं| पहला, ‘तथाकथित ऐतिहासिक तथ्य’, जिसका उपयोग कर एक ‘इतिहासकार’ कोई ‘इतिहास’ लिखता है| दूसरा, वह ‘इतिहासकार’, जो उन तथ्यों के आधार पर अपनी व्याख्या देता है| वह ‘तथाकथित ऐतिहासिक तथ्य’ तो ऐतिहासिक काल का होता है, जबकि वह ‘इतिहासकार’ वर्तमान का होता है| वह ‘तथाकथित ऐतिहासिक तथ्य’ भी स्वयं कुछ नहीं कहता है, बल्कि वह ‘इतिहासकार’ ही उन ऐतिहासिक तथ्यों के बहाने ‘सबकुछ’ बोलता है, जो वह कहना चाहता है| अर्थात वह ‘तथाकथित ऐतिहासिक तथ्य’ भी निर्जीव होते हुए भी सापेक्षिक हो जाता है| एक ‘इतिहासकार’ अपने ‘मन’ (Mind) का स्वामी होता है, जो अपनी इच्छाओं, आवश्यकताओं, सांस्कृतिक जड़ताओं, बौद्धिकता और बाजार की शक्तियों के अनुकूल ‘ढला’ (Casted) हुआ होता है| इस तरह, एक इतिहासकार भी समय के सापेक्षिक होता है| वह इतिहासकार जो भी इतिहास लिखेगा, वह इन्ही सीमाओं और आवश्यकताओं के ढाँचे में लिखेगा|

समय सदैव परिवर्तनशील है| परिस्थितियों और सन्दर्भों को बाजार के साधनों और शक्तियों के अनुरुप अनुकूलित होना पड़ता है| आधुनिक युग में बाजार के साधनों और शक्तियों को आर्थिक साधन एवं शक्ति कहते हैं| बदलते विज्ञान और तकनीक ही बाजार के साधनों और शक्तियों को नियंत्रित, संचालित और नियमित करता रहता है| वर्तमान के बाजार के साधनों और शक्तियों को ही इतिहास के काल में ‘ऐतिहासिक शक्तियाँ’ (Historical Forces) कहा जाता है| यही ऐतिहासिक शक्तियाँ ही ‘इतिहास’ और ‘इतिहास के काल’ को बदलता रहता है| इसीलिए सभी इतिहास को गतिशील रहना पड़ता है| हर इतिहास की वैज्ञानिक व्याख्या होनी चाहिए, जो आर्थिक साधनों और शक्तियों की क्रियाविधियों (Mechanism) पर आधारित होगी| इस आधार पर प्राचीन भारत का हर इतिहास ‘उलट –पलट’ हो जाता है| भारत की सभी सांस्कृतिक समस्यायों का यही समाधान है| इसके अलावा, परोसा गया अन्य सभी सभी प्राचीन इतिहास बनावटी है, काल्पनिक है|  

अब, समय आ गया है कि इतिहास को सभी जीवित व्यक्तियों के अनुकूल बनाया जाय| इसके लिए आधुनिक वैज्ञानिक विधियाँ ही पर्याप्त और सक्षम है| इस पर आधरित हर ऐतिहासिक व्याख्या चार्ल्स डार्विन के ‘प्राकृतिक उद्विकासवाद’ और हर्बर्ट स्पेंसर के ‘सामाजिक उद्विकासवाद’ के वैज्ञानिक सिद्धांत से समर्थित होगा| ऐसा ही ‘इतिहास’ (व्याख्या)  भारत की सभी सांस्कृतिक समस्यायों को समाधान देगा|

आचार्य प्रवर निरंजन  जी

अध्यक्ष, अन्तर्राष्ट्रीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान|

बुधवार, 29 अप्रैल 2026

कमजोर लोग नैतिक रुप से शक्तिशाली होना चाहते हैं

यह एक तथ्य है कि ‘कमजोर लोग’ नैतिक रुप से शक्तिशाली होना चाहते हैं| यह केवल एक सामाजिक तथ्य नहीं है, बल्कि एक गहरी मनोवैज्ञानिक और ऐतिहासिक प्रक्रिया है। ‘कमजोर लोग’ अपनी असमर्थता को ‘नैतिकता’ में बदलकर अपने अस्तित्व को अर्थ देता है, और उस अर्थ को उस सत्ता की शक्ति के विरुद्ध एक वैकल्पिक सत्ता खड़ी कर ‘आत्मुग्ध’ होता है| लेकिन यह भी ध्यान रहे कि हर नैतिकता महान नहीं होती है| अक्सर यह यह केवल कमजोरी की परिष्कृत अभिव्यक्ति होती है।

यहाँ यह समझ लेना महत्वपूर्ण है कि ये ‘कमजोर लोग’ कौन होते हैं? चूँकि ‘कमजोरी’ एक आन्तरिक मामला होता है, इसीलिए इसे एक सामान्य परिभाषा में डाल कर सामान्य जन को नहीं समझाया जा सकता है| फिर भी, यदि हम भारत में इसकी पहचान करना चाहें, तो हमें भारतीय संविधान का सहारा लेना होगा| भारतीय संविधान ‘कमजोर लोगो’ की पहचान का आधार ऐतिहासिक पिछड़ेपन, ऐतिहासिक विलगाव, वंचित रखे जाने, सामाजिक एवं शैक्षणिक पिछड़ेपन, और आर्थिक पिछड़ेपन को इसका आधार बनाया है| मूलत: ‘कमजोरी’ भौतिक संसाधनों के पर्याप्त उपयोग नहीं करने के अधिकार के रुप में अभिव्यक्त होती है| इसे कुछ लोग ‘व्यावहारिक सत्ता’ में कमजोर हिस्सेदारी से भी जोड़कर देखते हैं|

और यह ‘नैतिकता’ क्या होती है? यह नैतिकता (Morality) सही और गलत, उचित-अनुचित तथा अच्छे-बुरे व्यवहार के बीच अंतर करने वाले सिद्धांतों और मूल्यों का एक समुच्चय है। यह मानवीय आचरण के रुप में समाज में स्वीकृत मानदंडों के अनुसार निर्देशित करती है| ‘नैतिकता (Morality) के समुच्चय’ को ‘नीतिशास्त्र (Ethics) कहते हैं| इन स्वीकृत मानदंडों में प्रेम, ईमानदारी, करुणा, सत्य और अहिंसा आदि को शामिल किया गया हैं। इसे स्वैच्छिक माना गया है, लेकिन यही मनुष्य में मनुष्यत्व को स्थापित कर इसे एक पशु से अलग करती है।

हालाँकि नैतिकता को सामाजिक स्वीकृति मिली रहती है, लेकिन यह समय, काल और परिस्थिति के अनुसार बदलती (गतिशील) भी रहती है| इस नैतिकता में ‘जड़ता का प्रभाव’ (Inertial Effect) भी होता है, जो यह निर्धारित करता है कि किसी व्यक्ति को कैसा आचरण या व्यवहार करना चाहिए। यही नैतिकता मानवीय मूल्यों की जननी होती है| नैतिकता में ईमानदारी, करुणा, साहस, सम्मान, सहयोग और सहानुभूति जैसे मानवीय मूल्य शामिल हैं। यह व्यक्तिगत मूल्य और अंतरात्मा की आवाज बन जाती है, जो स्व-अनुशासन भी सिखाती है। इस नैतिकता से समाज में विश्वास, न्याय और सौहार्दपूर्ण संबंध बनता है। इस तरह, यह नैतिकता न केवल चरित्र का निर्माण करती है, बल्कि यह वह मार्ग प्रशस्त करता है,  जो लोगों को सुख की ओर ले जाता है और मानसिक शांति प्रदान करती है।‘ शक्तिशाली वर्ग’ नैतिकता के इन्ही गुणों का उपयोग अपने हितों में करता है|

लेकिन कमजोर लोग ऐसी नैतिकता बनाते हैं कि उनकी कमजोरियाँ ही उनके गुण बन जाए। ऐसे कमजोर लोग नैतिक रूप से शक्तिशाली होना चाहते हैं| कमजोर लोग भी इन्हीं कमजोरियों पर गौरान्वित होते हैं| इसीलिए ऐसे प्रचारों को ‘शक्तिशाली वर्ग’ का जबरदस्त समर्थन और सहयोग भी मिलता रहता है| मानव समाज में “शक्ति” (Power) ‘भौतिक शक्ति’, ‘आर्थिक शक्ति’, ‘बौद्धिक शक्ति’ और ‘नैतिक शक्ति’ के रुप में उपलब्ध रहती है| इनमें ‘नैतिक शक्ति’ को सबसे उच्च माना जाता है, क्योंकि यह ‘बाहरी बल’ के बजाय ‘आंतरिक दृढ़ता’ और सिद्धांतों पर आधारित होती है। यह भी विचारणीय है कि अक्सर जो लोग भौतिक या वास्तविक शक्ति में कमजोर होते हैं, वे स्वयं को नैतिक रूप से शक्तिशाली सिद्ध करने का प्रयास करते हैं|

यह प्रवृत्ति सिर्फ सामाजिक व्यवहार का नहीं है, बल्कि यह एक गहरे मनोवैज्ञानिक और ऐतिहासिक कारणों से जुड़ी हुई है| जब किसी व्यक्ति या समूह के पास भौतिक या संसाधन आधारित शक्ति नहीं होती, तब वह अपनी मानसिक स्थिति को संतुलित करने के लिए नैतिकता की शक्ति का सहारा लेता है। यह एक प्रकार का ‘बचाव तंत्र’ (Defence Mechanism) की तरह होता है| इस ‘बचाव तंत्र’ में अपनी किसी कमी को किसी अन्य गुण से पूरा करने की कोशिश की जाती है। तब नैतिकता केवल आदर्श नहीं रह जाती है, बल्कि यह शक्ति प्राप्त करने का एक साधन बन जाती है।

इतिहास में ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं, जब कोई समूह शोषित या वंचित होता है, तब वे अपनी पीड़ा को नैतिक ऊँचाई में बदल देना चाहता है| वे वह यह मानने लगता है कि उनकी कष्ट-सहिष्णुता उन्हें दूसरों से अधिक नैतिक बनाता है| वे इसलिए ‘गरीब’ हैं, क्योंकि ‘अमीर’ शोषक और पापी होते हैं| वे सत्ता से बाहर इसलिए हैं, क्योंकि इससे उन्हें कई तथाकथित ‘पाप’ करने से मुक्ति मिलती है| इन्हें मरने के बाद ‘स्वर्ग’ का ऐशो –आराम मिलता है और अमीरों को प्रताड़ना भरी ‘नरक’ भोगना होता है| यह सत्ता या शक्ति नहीं प्राप्त करने के अपराध-बोध (guilt) से मुक्ति दिलाता है| यह नैतिकता का प्रभाव होता है| इससे उन्हें सामान्य समकक्षीय जन गण से सामाजिक स्वीकृति और सहानुभूति मिलती दिखती है|

जो व्यक्ति सीधे शक्ति या सता का प्रयोग नहीं कर सकता, वह नैतिकता के माध्यम से दूसरों को नियंत्रित करने की ‘काल्पनिक कोशिश’ करता है| यह कमजोर लोगों का सता या शक्ति -नियंत्रण की अप्रत्यक्ष रणनीति होती है| वह दूसरों के व्यवहार को सहीऔर गलतके पैमाने पर कसता है| यह तंत्र (Mechanism) दूसरों को दोष देने पर केंद्रित होती है| इस आधार पर वह सामाजिक दबाव बनाता है| यह समझ या अवबोध (Concept) उन्हें भविष्य में अप्रत्यक्ष सत्ता (soft power) प्राप्ति का विकल्प देता है| लेकिन यह सब एक व्यक्ति को अपनी कमजोरी छिपाने का बहाना मात्र होता है|

कमजोर लोगों का नैतिक शक्ति की ओर आकर्षित होना स्वाभाविक है, क्योंकि यह उन्हें आत्मसम्मान और सामाजिक स्थान प्रदान करता है| कमजोर लोगों का यही प्राकृतिक स्वभाव ‘शक्तिशाली वर्ग’ (Power Group) और वर्चस्व (Hegemony) का भी एक महत्वपूर्ण उपकरण बन जाता है| समाज में सत्ता केवल भौतिक शक्ति से नहीं चलती, बल्कि सामान्य जन गण की सहज सहमति (consent) से चलती है| यह सहमति संस्कृति, विचार और नैतिकता के माध्यम से निर्मित किया जाता है| इसीलिए जो वर्ग या समूह भौतिक शक्ति में कमजोर होता है, वह नैतिक क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश करता है|

इस प्रकार नैतिकता ‘सत्ता और शक्ति’ का एक वैचारिक हथियार बन जाता है| कमजोर वर्ग इसी नैतिकता के सहारे शक्तिशाली वर्ग की वैधता (Legitimacy) को चुनौती देता है| कमजोर वर्ग अपने बुद्धिजीवियों के माध्यम से अपनी पीड़ा को नैतिक भाषा में व्यक्त करता है, अपने संघर्ष को न्यायसंगत बनाता है, और समाज में नैतिक सहानुभूति अर्जित करता है| इस तरह, यह नैतिकता केवल व्यक्तिगत सदाचार नहीं, बल्कि ‘सत्ता एवं शक्ति’ का सामूहिक रणनीति बन जाती है| इतिहास ‘अन्याय के खिलाफ नैतिक अपील’ से भरी हुई है|

नैतिकता अक्सर केवल ‘शक्ति’ प्राप्त करने की एक प्रक्रिया होती है, क्योंकि यह कल सत्ता में आने के बाद बदल सकता है| कमजोर लोगों का नैतिक शक्ति की ओर झुकाव एक स्वाभाविक और आवश्यक प्रक्रिया है, क्योंकि यही उनके पास उपलब्ध सबसे प्रभावी साधन है| यह भी समझना जरूरी है कि नैतिकता स्वयं सत्ता के खेल से अलग नहीं है| कमजोर की नैतिकताको केवल आदर्श नहीं, बल्कि यह नैतिकता संघर्ष का हथियार भी है और भविष्य की सत्ता का आधार भी| वास्तव में और व्यावहारिक रुप में, सता और सामान्य जन गण की नैतिकता अलग अलग होती है, लेकिन सभी को एक ही दिखती है|

कमजोर लोगों के भीतर ‘बदला लेने’ (Resentment) की एक गहरी भावना होती है| चूँकि वे सीधे ‘शक्तिशाली वर्ग’ का सामना नहीं कर सकते, इसलिए वे उसकी शक्ति को बुराघोषित कर देते हैं और अपनी कमजोरी को अच्छाबना देते हैं| नैतिकता के इसी मनोवैज्ञानिक प्रतिशोध (Psychological Revenge) का उपयोग सत्ता अपने पक्ष में करता है| कमजोर की नैतिकता दरअसल आत्म-सुरक्षा की रणनीति है| ऐसी नैतिकता सामान्य जन गण की सृजनात्मकता को दबाती है, और समाज को औसतपन (Mediocrity) की ओर ले जाती है|

भारतीयों की औसतपन का यही मूल आधार है| आप भी विचार कीजिए|

आचार्य प्रवर निरंजन  जी

अध्यक्ष, अन्तर्राष्ट्रीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान|

मंगलवार, 28 अप्रैल 2026

बिल्ली पालि या अंग्रेजी में क्या बोलती है?

एक बिल्ली हिंदी में बोले, या पालि, या संस्कृत में बोले, ‘म्याऊँ’ ही बोलती है| वह दूसरा कुछ बोलती ही नहीं है| यदि वह बिल्ली अंग्रेजी, या स्पेनिश, या जापानी भाषा में भी बोलेगी, तो भी वह ‘म्याऊँ’ ही बोलेगी| इससे उसे कोई अन्तर नहीं पड़ता है कि वह टाई और कोट पहने है, या लुंगी, या धोती, या कुछ और, वह बिल्ली ‘म्याऊँ’ ही बोलेगी| मतलब यह हुआ कि उसके क्षेत्र, भाषा, धर्म, राष्ट्रीयता, संस्कृति या ओहदे के बदलने से भी उसके ‘संस्कार’ की ‘बोली’ में कोई अन्तर नहीं पड़ता| उसके धनी हो जाने से भी उसकी ‘बोली’ नहीं बदलती है|

जरा ठहर कर विचार कीजिए| क्या ऐसा ही किसी ‘दो –पाया’ (Biped/ Two –legged) पशु के साथ भी होता है? हाँ, ऐसा ही ‘दो –पाया’ (मानव) पशु के साथ भी होता है| यदि उसकी ‘चेतना’ भी एक सामान्य पशु जैसा ही हो| यहाँ ‘दो –पाया’ पशु में वर्तमान सभी मानव प्रजाति भी शामिल हो जाता हैं| वर्तमान सभी मानव का जैवकीय नाम ‘होमो सेपियंस सेपियंस’ हैं, जो मूल रुप में एक ‘स्तनपायी’ (Mammal) पशु हैं| एक पशु और एक मानव में अन्तर सिर्फ इस बात का है, कि कोई चेतना की गुणवत्ता के साथ उसके किस स्तर पर है? एक स्तनपायी पशु में भी भिन्न भिन्न मात्रा की गुणवत्ता के साथ भिन्न भिन्न स्तर का ‘चेतना’ होता है|

‘चेतना’ को ही ‘समझदारी’ भी समझते हैं| इसी ‘चेतना’ के विकास के साथ ही वर्तमान मानव एक ‘होमो सेपियंस’ से एक ‘होमो सोसिअस’ (सामाजिक मानव) और एक ‘होमो फेबर’ (निर्माता मानव) बन सका| आज यह ‘होमो फेबर’ से बहुत आगे आ कर ‘होमो साईन्टिफिक' (वैज्ञानिक मानव) बन गया है| आज यह ‘वैज्ञानिक मानव’ भी बहुत आगे बढ़ गया है| यह ‘चेतना’ का गुणवत्ता और स्तर ही है, जो ‘होमो सेपियंस’ में विभिन्न गुणवत्ता और विभिन्न स्तर निर्धारित करता है| विश्व की सभी आबादी ‘होमो सेपियंस’ होते हुए भी एक गुणवत्ता और स्तर पर नहीं है, इसीलिए इनकी ‘समझ और  संस्कार की बोली’ भी एक नहीं है| सभी ‘बिल्लियाँ’ चेतना की गुणवत्ता और स्तर में समान होती हैं, इसीलिए सभी ‘बिल्लियाँ’ किसी भी क्षेत्र, भाषा, धर्म, राष्ट्रीयता, संस्कृति या ओहदे में भी एक ही ‘बोली’ – ‘म्याऊँ’ ही बोलती हैं|

चेतना की विभिन्न गुणवत्ता और स्तर ही मानव की प्रकृति, संस्कार, स्वभाव, अभिवृति, चरित्र, और समझदारी की ‘बोली’ को बदल सकता है| मात्र ‘शारीरिक क्रियाविधियों’ में समता हो जाने से ‘समझदारी की बोली’ नहीं बदल जाती है| कुछ लोग सभी ‘बिल्लियों’ और सभी ‘मानवों’ में अन्तर नहीं समझते और इसी कारण एक ही ‘स्तर’ की ‘नैतिकता’ का निर्माण और माँग करते हैं| ऐसे लोगों को ‘प्रतिष्ठा और अवसर’ की समता और ‘सामान्य समता’ में कोई अन्तर समझ में नहीं आता| भारतीय संविधान की उद्देशिका में ‘प्रतिष्ठा और अवसर’ की समता की चर्चा है, सिर्फ समता का नहीं। ऐसे लोग ‘समान स्तर’ की ‘नैतिकता’ के नाम पर अपना प्रकृति, संस्कार, स्वभाव, अभिवृति, चरित्र, और समझदारी को बदलने का प्रयास नहीं करते| ऐसे लोग अपनी और अपने लोगों की तमाम ‘उम्र’  ‘म्याऊँ’ ‘म्याऊँ’ करने में ही गुजार देते हैं, या उसे बरबाद ही कर देते हैं|  

कुछ लोग या अधिकतर लोग समझते हैं कि वे लोग अपनी और अपने लोगों की क्षेत्र, भाषा, धर्म, राष्ट्रीयता, और संस्कृति बदल कर अपनी और अपने लोगों की भविष्य बदलने वाले हैं, तो वे भ्रमों के स्वप्नों में गोते लगाते हुए होते हैं| ऐसे लोगों का कोई ‘भविष्य’ नहीं बदलता है, वैसे ‘खुशफहमी’ में रहने के लिए सभी स्वतंत्र हैं| ऐसे लोग पहले की तरह ‘म्याऊँ’ -‘म्याऊँ’ ही बोलते रहेंगे| यदि किसी को अपनी और अपने लोगों की ‘समझदारी और संस्कार की बोली’ बदलनी हो, तो वे अवश्य ही अपनी और अपने लोगों की प्रकृति, स्वभाव, संस्कार, अभिवृति, चरित्र, और समझदारी को बदल डालें| ऐसे लोग इसे समझें और किसी अन्य भ्रम –जाल में नहीं उलझें|

यदि किसी को क्षेत्र, भाषा, धर्म, राष्ट्रीयता, और संस्कृति बदलने से ‘संस्कार और समझदारी की बोली’ में कोई अन्तर दिखता है, या ऐसा होता समझ में आता है, तो यह स्पष्ट है कि वैसे लोगों को ‘संस्कृति की गत्यात्मकता’ (Dynamics of Culture) या ‘संस्कृति की क्रियाविधि’ (Mechanics of Culture) की समझ नहीं है| ऐसे लोगो की प्रकृति, संस्कार, स्वभाव, अभिवृति, चरित्र, और समझदारी को बदलने के लिए उन्हें सजग, सचेत, समर्पित और सुनियोजित प्रयास करने होते हैं| सिर्फ ‘नैतिकता की शक्ति’ या ‘समता की माँग के भरोसे कोई भविष्य नहीं बदलता है|’इसीलिए कहा गया है कि ‘कमजोर लोग नैतिक रुप में शक्तिशाली होना चाहते हैं|’

अधिकतर लोग ‘बाजार के साधनों और शक्तियों’ के प्रभाव से बदलते रहते हैं और वे समझते रहते हैं कि उनके क्षेत्र, भाषा, धर्म, राष्ट्रीयता, और संस्कृति बदलने के कारण ही उनकी स्थिति बदल रही है| ऐसे नासमझ ‘अंधभक्तों’ को समझाया भी नहीं जा सकता है, जब तक वे अपने को ‘पूर्ण एवं अन्तिम ज्ञानी’ होने का भ्रम नहीं छोड़ेगें| ऐसा ही समझ कुछ सामाजिक और सांस्कृतिक नेतृत्व भी रखते हैं| इसका यह अर्थ नहीं हुआ कि वे ऐसा सामाजिक और सांस्कृतिक बदलाव का कोई प्रयास करें ही नहीं| लेकिन वे अपनी सफलताओं के मूल्यांकन में बाजार की आर्थिक साधनों और शक्तियों के प्रभाव का ध्यान अवश्य ही ध्यान में रखें|

अन्यथा, वे भी सामान्य ‘बिल्लियों’ की तरह ‘म्याऊँ’ ‘म्याऊँ’ ही बोलते रहेंगे| ऐसे लोग ही अपनी और अपने लोगों का समय, संसाधन, ध्यान, समर्पण, वैचारिकी और ऊर्जा ‘गलत’ दिशा में बरबाद करवाते रहेंगे| इससे ‘बिल्ली को कोई अन्तर नहीं पड़ता है कि वह टाई और कोट पहने है, या लुंगी, या धोती, या कुछ और; वह’ बिल्ली’ ‘म्याऊँ’ ही बोलेगी| मतलब कि उसके क्षेत्र, भाषा, धर्म, राष्ट्रीयता, संस्कृति या ओहदे के बदलने जाने मात्र से भी उसे कोई अन्तर नहीं पड़ता| वह ‘बिल्ली’ ‘संस्कार और समझदारी’ की बोली नहीं बोल कर मात्र ‘म्याऊँ’ ‘म्याऊँ’ ही बोलती रहेगी|

आचार्य प्रवर निरंजन  जी

अध्यक्ष, अन्तर्राष्ट्रीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान|

शनिवार, 25 अप्रैल 2026

सत्य हमारे पूर्वाग्रहों का प्रतिबिम्ब होता है

हमारा प्रत्येक सत्य हमारे पूर्वाग्रहों और मान्यताओं का प्रतिबिम्ब होता है| हमें उस अपने पूर्वाग्रहों के प्रतिबिम्ब में वही सत्य दिखता है, जिसे हम सत्य मानते होते हैं| किसी तथ्य के प्रति जैसा हमारा मानना होता है, वैसा ही हमारा सत्य होता है| इस तथ्य के सत्य के घेरे में लगभग हम सभी लोग आ जाते हैं| इस सत्य का आधार हमारा ज्ञान और हमारी समझदारी होता है, जिसे हम अन्तिम रुप में जानते और मानते होते हैं| हमारे ज्ञान और समझ का जो स्तर हमारा है, वही ज्ञान और समझ मेरे लिए अन्तिम सत्य होता है| यह ज्ञान और समझ समय के साथ सुधरता रहता है या बदलता रहता है, यदि हम बदलने को सगज हो| हमारा अन्तिम ज्ञान और हमारी अन्तिम समझ हमारे किए अन्तिम सत्य होता है, क्योंकि यही मेरा पूर्वाग्रह मुझे समझाता है| कोई भी व्यक्ति पढ़ा लिखा है, या अशिक्षित है, उनके सत्य के निर्धारण में उनकी पूर्वाग्रहों और मान्यताओं की ही भूमिका प्रमुख होती है|

इसे एक उदाहरण से समझें| मैंने एक बार बुद्ध की एक बात लिखी, जिस पर एक तथाकथित ज्ञानी ने आपत्ति किया|| आपत्ति कर्ता ज्ञानी ने तुरन्त यह सवाल किया कि यह बात यदि बुद्ध की है, तो यह त्रिपिटिक के किस भाग और किस सूक्त में लिखित है? वह ज्ञानी त्रिपिटिक को ऐसे बता रहे थे, मानों स्वयं किसी बुद्ध ने उस पुस्तक को लिखा हो, और उस त्रिपिटिक के बाहर की कोई बात बुद्ध की हो ही नहीं सकती| वह  ज्ञानी भाषा और साहित्य के ‘विखंडनवाद’ (Deconstructionism) की समझ नहीं दिखा रहा था| उन्हें इसका भी ज्ञान नहीं था, कि ‘हर इतिहास समकालिक होता है’| बीते हुए काल का कोई विवरण या ब्यौरा ‘इतिहास’ की सामग्री हो जाती है| इतिहास की हर सामग्री का जब लेखन या संपादन होता है, तब उन सभी सामग्रियों को समकालिक स्थितियों और शक्तियों के अनुरप हो जाना होता है| ऐसे हर लेखन में उसका लेखक ‘विखंडनवाद’ के प्रभाव में भी होता है| तब वह हर तथ्य, जो उस पुराने पुस्तक में दर्ज था, उस लेखक के पूर्वाग्रहों और मान्यताओं’ के अनुकूल हो जाता है|

बुद्धि की यह बात भी मेरे पूर्वाग्रहों के प्रतिबिम्ब में ‘सत्य’ था| बुद्धि की इस बात को मैंने बुद्ध की बात क्यों बतायी? वैसे डा आम्बेडकर अपनी पुस्तक – ‘बुद्ध और उसका धम्म’ की भूमिका में लिखते हैं, कि जो बात बुद्धि की नहीं है, वह बात बुद्ध की हो ही नहीं सकती| अर्थात उस समकालिक दुनिया में हरेक बुद्धि की बात ‘बुद्ध’ की बात थी| यहाँ यह भी स्पष्ट हो जाना चाहिए कि हर बुद्धिवादी ‘बौद्ध’ है|

यहाँ यह भी स्पष्ट हो जाना चाहिए कि ‘बुद्ध’ एक व्यक्ति भी रहे और बुद्ध एक संस्था भी थे| सिद्धार्थ गोतम ‘बुद्ध’ की संस्था की परम्परा के अंतिम और 28 वें 'बुद्ध'' माने गए| सिद्धार्थ गोतम को अपने 35वें वर्ष में ‘बुद्धत्व’ की उपाधि प्राप्त हुई थी| ‘बुद्धत्व’ एक उच्चस्थ, उत्कृष्ट एवं विशिष्ट बुद्धि –प्राप्ति की उपाधि थी| अन्तिम बुद्ध के मृत्यु (महापरिनिर्वाण) के एक सौ साल बाद सभी बुद्धों के वचनों का संग्रहण करने के लिए प्रथम संघ बुलाने का दावा किया गया| इस संघ के बाद ही बुद्ध –वचनों के संग्रहण का कार्य शुरु हुआ होगा| बताया गया कि सभी बुद्धों के वचनों का संग्रहण त्रिपिटक में किया गया है|

वैसे सभी सत्य सापेक्षिक होता है, क्योंकि संदर्भ बदलने से सत्य बदल जाता है| लेकिन यह बात पूर्वाग्रह के प्रतिबिम्ब की बात से एक अलग विषय है| बुद्ध ने बताया कि इस ब्रह्माण्ड में एक ही सत्य है, कि ‘कुछ भी सत्य नहीं है|’ हर चीज, यानि हर तथ्य हर क्षण बदलता रहता है, जिसे ‘क्षणिकवाद’ कहा गया| अल्बर्ट आइन्स्टीन ने समय को भी सापेक्ष बता दिया| वैसे आज तक ब्रह्माण्ड के हर चीज को चार विमाओं (Dimensions) के सापेक्ष ही समझा जाता रहा है, लेकिन गणितीय संगणनाओं में कुल ‘12’ विमाओं के अस्तित्व का पता चलता है| इन सभी के या इनके कुछ अवयवों के सापेक्ष तो ‘सत्य’ और फिसलता रहेगा| स्पष्ट है कि एक ही तथ्य बदलते व्यक्तियों के सापेक्ष बदल जाता है|

‘ईश्वर’ है, या नहीं है? यह भी तथ्य से सम्बन्धित ‘सत्य’ का प्रश्न है| दोनों तरह के उत्तर सही है, या दोनों तरह के उत्तर गलत है| लेकिन ‘सत्य’ के ये पक्षधर भी ‘ईश्वर’ की अवधारणा को स्पष्ट परिभाषित किये बिना ‘गलत’ और ‘सही’ करते रहते हैं| हालाँकि दोनों के सत्य दोनों के लिए सही है| दोनों ‘सत्य’ के प्रभाव सकारात्मक मिलते हैं| दोनों ही अपनी मान्यताओं में सही होते हैं, सत्य में भी सही होते हैं और प्रभाव में भी सही होते हैं| यह सब उनके पूर्वाग्रहों का प्रतिबिम्ब मात्र हैं|

इसलिए प्रत्येक का सत्य (Truth) अलग अलग होता है| प्रत्येक का सत्य उनके लिए सही (Correct) भी होता है और उनके लिए प्रभाव भी डालता है| चिकित्सा विज्ञान की भाषा में ‘प्लेसीबो प्रभाव’ (Placebo Effect) यही है, जिसका प्रभाव वैज्ञानिक ढंग से स्थापित है| मैं अकसर कहता हूँ कि एक ही तथ्य के अनेक सत्य होते हैं और सभी सही भी होते हैं| इस विवाद का कोई मतलब नहीं होता है कि हमारा सत्य सही है और तुम्हारा सत्य मूर्खतापूर्ण है| कुछ ‘मूर्ख’ लोग इसीलिए दूसरो को ‘मूर्खता’ का प्रमाण पत्र बाँटते रहते हैं| ऐसे लोग ‘टिटहरी’ की तरह अपने पैरो पर आसमान को टिकाये हुए होते हैं|

आचार्य प्रवर निरंजन  जी

अध्यक्ष, अन्तर्राष्ट्रीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान|

सोमवार, 13 अप्रैल 2026

डॉ हेडगेवार और एन्टोनियो ग्राम्शी में सम्बन्ध

डॉ हेडगेवार एक भारतीय नायक रहे हैं, जिन्होंने भारत में ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ की स्थापना की| यह संगठन आज विश्व का सबसे बड़ा ‘नागरिक समाज’ का संस्था है| यह संगठन स्वयंसेवकों द्वारा भारतीय राष्ट्र के निर्माण के लिए गठित हुआ| लेकिन इनके बारे में कतिपय भारतीय बौद्धिकों में बहुत भ्रम बना हुआ है| मैं किन्हीं के भ्रम का निवारण भी नहीं करना चाहता हूँ, क्योंकि सभी को एक विचार पर सहमत नहीं किया जा सकता| मैं इनके बारे में एक ऐसा ‘तथ्य’ का प्रस्तुतीकरण करना चाहता हूँ, जिसके बारे मैंने आज तक कहीं नहीं सुना या पढा|

दरअसल एक ‘सत्य’ भी सभी के अपने पूर्वाग्रहों का दर्पण होता है| इतना ही नहीं, किताबों में जो लिखा होता है, उसका सदैव वही अर्थ नहीं समझा जाता, जो उस किताब के लेखक का होता है| किताबों में लेखक अपनी समझ के अनुसार लिखता है, लेकिन उसका पाठक उसका वही अर्थ समझता है, जो वह समझना चाहता है| भारत में डॉ हेडगेवार के सम्बन्ध में भी यही हुआ है| सब कोई सस्ता और साधारण अर्थ निकलना चाहता है, क्योंकि गहन अर्थ के लिए अतिरिक्त समय और ‘आलोचनात्मक चिन्तन’ का बौद्धिक श्रम की आवश्यकता होती है| उनके ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ और ‘हिन्दवी राज्य’ की अवधारणा भी ऐसा ही श्रम –साध्य अवधारणा है| लोगों ने ‘संस्कृति’, ‘राष्ट्र’ और ‘हिन्दवी’ को नहीं समझा, ‘राष्ट्र’ को ‘देश’ समझा और सम्राट शिवाजी के ‘हिन्दवी’ को एक ‘धर्म’ समझा|  इनकी ‘राष्ट्र’ की अवधारणा वही है, जिसे जोसेफ स्टालिन ने 1813 में रचित अपनी किताब – ‘मार्क्सवाद एवं उनकी राष्ट्रीय समस्याएँ’ में दिया था|  

ऐसा माना जाता है कि डॉ हेडगेवार पर किसी विदेशी दार्शनिको एवं क्रांतिकारियों का प्रभाव नहीं पड़ा| ऐसे विद्वान् यह भूल जाते हैं कि डॉ हेडगेवार अपने छात्र जीवन में बंगाल के ‘अनुशीलन समिति’ के सक्रिय सदस्य रहे|  बगाल का ‘अनुशीलन समिति’ अपने समय का भारत के सबसे बड़े और सशक्त क्रान्तिकारी संगठन था| इस संगठन की सक्रियता के कारण भारत की राजधानी कलकत्ता को दिल्ली विस्थापित करना पड़ा| क्या ऐसा संभव था कि उस संगठन का एक सक्रिय सदस्य अपने दर्शन और विचारधारा में क्रान्तिकारी नहीं होगा? भारत और मेक्सिको के कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापक मानवेन्द्र नाथ राय भी उस संगठन के सदस्य थे| एम एन राय एक क्रान्तिकारी और मानवतावादी भी थे, जो कम्युनिस्ट विचारधारा के आलोचक भी रहे| डॉ हेडगेवार और राय हम उम्र भी थे| श्री अरबिन्दो भी उसी संगठन के सक्रिय सदस्य थे|

इटली के एक प्रसिद्ध क्रान्तिकारी दार्शनिक एन्टोनियो ग्राम्शी थे| डॉ० हेडगेवार के ग्राम्शी के समकालीन एवं हमउम्र थे, और इसीलिए इन दोनों में वैचारिक एवं भावनात्मक लगाव रहा| एन्टोनियो ग्राम्शी ने मार्क्सवाद का गहन अध्ययन किया और कार्ल मार्क्स के दर्शन को अव्यवहारिक बताया| वे अपने कारावास अवधि में अपने विचारों को लिखते रहे, जो एक पुस्तक - ‘जेल नोटबुक’ (Prison Notebooks) के नाम से प्रसिद्ध हुआ| जब हम एन्टोनियो ग्राम्शी के सभी मूल दार्शनिक तत्वों का गहनता से अवलोकन करते हैं, तब ये सभी तत्व डॉ० हेडगेवार के सभी दर्शन में प्रमुखता से स्पष्ट होता है| इस पर ध्यान देना बहुत महत्वपूर्ण है| मैंने डॉ० हेडगेवार को प्रभावित करने वाले व्यक्तित्वों में सबसे पहले एन्टोनियो ग्राम्शी को रखा है|

एन्टोनियो ग्राम्शी के दर्शन में ‘सांस्कृतिक वर्चस्ववाद’ (Cultural Hegemony), ‘प्रतिगामी वर्चस्व’ (Counter Hegemony), ‘निष्क्रिय क्रान्ति’ (Passive Revolution), ‘राजनीतिक समाज’ (Political Society) एवं ‘नागरिक समाज’ (Civil Society), ‘राजनीतिक स्वतन्त्रता’ (Political Freedom) एवं ‘नागरिक स्वतन्त्रता’ (Civil Freedom), ‘स्थितियों का युद्ध’ (War of Position) और ‘सजीव बौद्धिक’ (Organic Intellectual) प्रमुख अवधारणा है| इन अवधारणाओं को अच्छी तरह समझ कर कोई डॉ० हेडगेवार के ‘कार्य –दर्शन’ को समझ सकता है| डॉ हेडगेवार और एन्टोनियो ग्राम्शी के मूल एवं मौलिक कार्य -दर्शन में आश्चर्यजनक समानता स्पष्ट है| हालाँकि मैं आश्चर्यचकित नहीं हूँ, मैं इसे स्वाभाविक समानता मानता हूँ|

ग्राम्शी ने ‘सांस्कृतिक वर्चस्ववाद’ में यह समझाया है कि शासक वर्ग अपनी विचारधारा को समाज में इस तरह प्रस्तुत करता है और नियमित करता है, ताकि उस विचारधारा को वह समाज अपना समझ कर उसे अपना मान ले| किसी भी वर्ग की सत्ता सिर्फ राजनीतिक, या आर्थिक, या सशस्त्र बल के सहारे नहीं टिक सकती, अपितु उसकी संस्कृति, जीवन –मूल्य, नैतिकता, शिक्षा, मीडिया और धर्म के सहारे टिकी रहती है| सत्ता इन साधनों के सहारे समाज के विचारों, मूल्यों एवं नैतिकता पर नियंत्रण कर निरंतरता बनाए रखती है| शासक वर्ग अपने हित की विचारधारा को सामान्य जन गण का ‘सामान्य समझ’ (Common Sense) बना कर प्रस्तुत करती है|

सामान्य जन गण इन्हें अपने हित का सामाजिक एवं धार्मिक मूल्य समझती है| इसे अपना सामान्य नैतिकता समझती है| सामान्य जन गण इन्हें अपना ‘सांस्कृतिक दायित्व’ समझ कर इसका स्वयं पालन करती रहती है| इसी ‘सांस्कृतिक दायित्व’ की समझ को ही सत्ता का ‘सांस्कृतिक वर्चस्ववाद’ कहा गया है| इसके लिए राज्य को किसी अतिरिक्त शक्ति की आवश्यकता नहीं होती है| सामान्य जनता की सामान्य समझ को समाज के स्तर पर समझाया जा सकता है, और उसे सुधारा जा सकता है| इसी सुधारने की प्रक्रिया को ‘प्रतिगामी वर्चस्व’ (Counter Hegemony) कहते हैं| इसी को ‘निष्क्रिय क्रान्ति’ (Passive Revolution) समझा जाता हैं|

ग्राम्शी ने अपने ‘राजनीतिक समाज’ की अवधारणा में यह समझाया कि बिना सामाजिक एवं सांस्कृतिक बदलाव के ‘राजनीतिक स्वतन्त्रता’ (Political Freedom) का कोई अर्थ नहीं होता है| ‘राजनीतिक समाज’ वह समाज होता है, जिनकी राजनीति, प्रशासन, पुलिस, सेना, शिक्षा, धर्म, न्याय, एवं अर्थव्यवस्था पर नियंत्रण होता है| ‘राजनीतिक स्वतन्त्रता’ मिलने से उस देश का मात्र ‘राजनीतिक समाज’ ही लाभान्वित होता है| तत्कालीन भारतीय कांग्रेस का भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन भी एक ‘राजनीतिक स्वतन्त्रता’ की प्राप्ति के लिए था, जिसका लाभ भारतीय ‘नागरिक समाज’ को नहीं मिलने वाला था, बल्कि इसका लाभ भारतीय  ‘राजनीतिक समाज’ को मिलने वाला था| बाद में, भारत में यही हुआ|

इसी तरह, ग्राम्शी ने समझाया कि ‘राजनीतिक समाज’ के अलावे एक ‘नागरिक समाज’ होता है| यह ‘नागरिक समाज’ बौद्धिक रुप में पिछड़ा हुआ होता है| इस समाज मे सामाजिक एवं सांस्कृतिक क्रान्ति के बिना किसी भी स्वतंत्रता का कोई अर्थ नहीं होता है| आज भी भारतीय नागरिक समाज अपनी गरीबी, बीमारी और अशिक्षा से जूझ रहा है| शायद इसी ‘आध्यात्मिक दृष्टि’ ने डॉ हेडगेवार को इन स्वतन्त्रता आन्दोलन से विमुख रकहा|

डॉ० हेडगेवार समझते थे कि सिर्फ ‘राजनीतिक समाज’ के सहारे किसी सशक्त राष्ट्र का निर्माण नहीं किया जा सकता है| भारत में सामाजिक और सांस्कृतिक असमानता धार्मिकता का आवरण ओढ़े हुए अस्तित्व में मौजूद है| भारत के राष्ट्र –निर्माण में यही असमानता आज भी बाधा बनी हुई है| एक सशक्त और समृद्ध राष्ट्र के निर्माण के लिए ‘राजनीतिक समाज’ के साथ साथ ‘नागरिक समाज’ को भी प्रमुखता से शामिल किये जाने की अनिवार्यता होती है| यह सब डॉ० हेडगेवार के दर्शन और कार्यों में स्पष्ट है|

‘स्थितियों के युद्ध’ में ग्राम्शी समझाते हैं कि युद्ध सिर्फ सीधे टकराव से नहीं किया जाना चाहिए| इनका मानना है कि वर्तमान शासक वर्ग अपना शासन अपने विचारधारा को प्रसारित कर करता है| ऐसे शासकों के विरुद्ध युद्ध करने के लिए उस समाज में जाकर उनकी विचारधाराओं के सापेक्ष अपनी अवधारणाओं और मान्यताओं के आधार पर अपनी विचारधारा बना कर प्रसारित करना होता है| सामान्य जन गण को वही विचारधारा स्वीकार्य होती है, जो उन्हें समझने में सरल और साधारण होती है| ‘हिन्दवी’ पर आधारित विचारधारा भी एक ऐसी ही सरल विचारधारा है| किसी विचारधारा का खंडन करना या उस पर प्रतिक्रिया देना उन विरोधियों की विचारधारा का ही प्रसारण करना होता है| डॉ० हेडगेवार भी ग्राम्शी की समझ की मान्यताओं पर कार्य कर रहे थे| यह युद्ध समाज में सांस्कृतिक बदलाव का होता है| यही ‘निष्क्रिय क्रान्ति’ हुआ|

ग्राम्शी ने ‘सजीव बौद्धिक’ की अवधारणा में इस बात पर जोर दिया कि प्रत्येक वर्ग को अपने स्वयं के बौद्धिक तैयार करने चाहिए| ये ‘सजीव बौद्धिक’ बुद्धिजीवियों का ऐसा वर्ग होगा, जो सम्बन्धित वर्ग अर्थात सामान्य जन गण से जुड़कर उसकी चेतना को बौद्धिकता और दिशा देगा| वह ‘सजीव बौद्धिक’ (Organic Intellectual) वर्ग उस समाज की चेतना को उच्चतर अवस्था में ले जाए| उसे ‘नागरिक समाज’ को उस ‘सांस्कृतिक वर्चस्व’ के विरुद्ध ‘पैरेड़ाईम शिफ्ट’ करके ‘नई वैचारिक ढाँचा’ बनाना चाहिए| सामान्यत: परम्परागत बौद्धिक नेतृत्व भी उन्ही सांस्कृतिक वर्चस्ववाद के घेरे में ही, उन्ही के द्वारा रचित की गई किताबों में ही समाधान खोजते रहते हैं| इसी समझ के अभाव में सामान्य जनगण और उनके नेतृत्व को दशको एवं शतकों के बीत जाने के बाद भी समाधान नहीं दिखता है| ये बौद्धिक नेतृत्व उन्ही ‘सांस्कृतिक वर्चस्व’ की उलझनों में उलझे रहते हैं| इन्हें ‘निर्जीव बौद्धिक’ कहा जा सकता है|

डॉ० हेडगेवार के दर्शन में ग्राम्शी की यही अवधारणा स्पष्ट रुप से दिखते और चिखते हुए मिलते हैं| डॉ० हेडगेवार का संगठन संस्कृति और चेतना के स्तर पर बदलाव की बात कर राष्ट्र का निर्माण करना चाहता है|

आचार्य प्रवर निरंजन जी 

अध्यक्ष, अन्तर्राष्ट्रीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान|

भाषा का उद्विकास शक्ति और आधिपत्य के लिए होता है

भाषा का उद्विकास (E volution) एक बहुत ही जटिल और सतत प्रक्रिया है। यह किसी एक व्यक्ति या संस्था द्वारा निर्मित नहीं होती , बल्कि समाज , संस्...