शनिवार, 19 सितंबर 2026

हम कितने नादान हैं

यह शीर्षक आपको थोड़ा अटपटा लग रहा होगा| बात यह है कि हमलोग अपने को बौद्धिक तो समझते हैं’ लेकिन बहुसंख्यक आबादी को ‘निरा मूर्ख’ समझते हैं| हमें अक्सर सामान्य जनों पर, यानि भारतीय बहुसंख्यकों की ‘तथाकथित अज्ञानता’ पर झुन्झुलाहट होती है| उनकी ‘तथाकथित अज्ञानता’ के लिए हम ‘कागजी बौद्धिक’ उन्हें मूर्ख समझते हैं| यहाँ समझने की बात यह है कि यदि ये बहुसंख्यक अज्ञानी, असहाय और नासमझ नहीं रहते , तो उनको समझाने और उठाने की कोई आवश्यकता ही नहीं होती और इसमें हमारी कोई भूमिका भी नहीं होती| और यदि हमारी इस मामले में हमारी आवश्यकता ही नहीं होती, तो हमलोग बौद्धिक कहलाते ही काहे के लिए हैं? चूँकि सामान्य जन अज्ञानी, असहाय और नासमझ है, इसीलिए तो उन्हें समझने और समझाने की आवश्यकता भी है, और इसीलिए हम बौद्धिक भी हैं|

वास्तव में हमारी मूर्खता, या हमारी नादानी हमारे ‘मानव स्वाभाव’ से जुड़ा हुआ है| हमलोग ‘बुद्धिमान मानव’ (होमो सेपियंस) होते हुए भी अक्सर मूर्खतापूर्ण व्यवहार करते हुए होते हैं| पिछले आलेख में मैंने ‘ज्ञान’, बुद्धि’ और ‘प्रज्ञा’ में अन्तर एवं सम्बन्ध बताया था| हमारी ‘बुद्धि’ केवल हमारे ‘ज्ञान’ पर ही निर्भर नहीं करता, बल्कि हमारी भावनाओं, आदतों, अहंकार, भय, पूर्वाग्रहों और सामाजिक –सांस्कृतिक प्रभाव से भी नियमित और संचालित होते हैं| अपनी धारणाओं को सत्य और सही समझ लेना और सामने वाली की परिस्थितियों पर ध्यान नहीं देने से हमारी नादानी स्थापित हो जाती है| अधिकतर ‘तथाकथित बौद्धिक’ लोग भी ‘कागजी बौद्धिकों’ की भीड़ में शामिल होकर ‘बौद्धिकता का बहुमत’ स्वीकार करवा लेना चाहते है| सीमित ज्ञान के लोग ही ‘हाथी के पैर’ को ‘पाया’ (Pillar) घोषित करते रहते हैं| अक्सर देखा जाता है कि कुछ लोग मात्र किसी पुराने शिलालेख पढ़ लेने से ही अपने को सर्वज्ञानी और उद्धारक समझने लगते हैं|

यही अज्ञानता, मूर्खता और बौद्धिकता को समझने में ‘मन’ (Mind) की भूमिका आती है, और इसके विज्ञान को ही ‘मनोविज्ञान’ कहां गया है| किसी का ‘मन’ ही उसके विचार, भावनाओं और व्यवहारों को नियमित, नियंत्रित, प्रभावित और संचालित करता हुआ होता है| यदि कोई किसी दूसरे के मन को समझने की कोशिश ही नहीं करता है, और सामने वाले के ‘मन’ के अनुकूल अपनी समझदारी को प्रस्तुत नहीं कर पाता है, तो वही उस समझाने वाले व्यक्ति की नादानी या मूर्खता है| जो ‘कागजी बौद्धिक’ सामान्य जनों को मूर्ख समझता है; दरअसल वह ऐसा कह कर अपनी ‘मूर्खता’ का झेंप मिटाता हुआ होता है|

हम चाहते हैं कि हमारी ‘कागजी बौद्धिकता’ के अनुरूप ही हमारे समाज के बहुसंख्यक लोगों की समझ यानि बौद्धिकता हो| हम यह भी चाहते हैं कि हमारे समाज की समस्याएँ या बीमारियाँ भी हमारी समझ के अनुरूप हो; जबकि यह होना चाहिए कि हमारी समझ ही उन समस्यायों या बीमारियों को यथास्थिति में समझने के लायक हो| हमें समाज की समस्यायों या किसी बिमारी की प्रकृति एवं स्वभाव को समझने की आवश्यकता होती है, तभी उस बिमारी या समस्या का निदान या समाधान संभव है| हर समस्या या बिमारी का स्वभाव या प्रकृति चिकित्सक या सुधारक के ज्ञान के स्तर के अनुसार या अनुरुप नहीं होता है| इसलिए हर चिकित्सक या समाज –सुधारक को बिमारी या समस्या के अनुरूप ज्ञान के स्तर को बदलना अनिवार्य होता है|

महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइन्स्टीन कहते हैं कि समस्या चेतना के जिस स्तर पर होता है, उसका समाधान उसके चेतना स्तर के उपरी स्तर पर आने से ही सम्भव हो सकता है| जब हम समस्या या बिमारी के स्तर की चेतना से ऊपर उठ पाते हैं, तो वे समस्याएँ या बिमारी अपने सम्पूर्ण परिदृश्य में दिख पाता है| इससे हम उन सम्पूर्ण परिस्थितियों, प्रभावकारी साधनों एवं शक्तियों के प्रभाव एवं क्रियाविधियों को समझ पाते हैं| जब हम समस्यायों की सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक एवं बौद्धिक जड़ों और स्वरुप को यथास्थिति में नहीं समझ पाते हैं, तब हम बहुसंख्यक जनों को ‘मूर्ख’ होने का प्रमाण पत्र बांटना शुरु कर देते हैं| दरअसल ऐसा कर समाज के ‘कागजी बौद्धिक अपनी अज्ञानता का झेंप मिटाते हुए होते हैं| ऐसा करने से ‘हवा –हवाई’ बोद्धिकों को ‘पूर्ण ज्ञानी’ होने का ‘आत्मसुख’ मिलता है| ऐसे ‘कागजी विद्वान्’ समाज में ‘टिटहरी’ की तरह ‘टे’ ‘टे’’ करते करते इस दुनिया से विदा हो जाते हैं, लेकिन इस दुनिया को कुछ भी नहीं बदल पाते हैं| बहुसंख्यक जन ‘टिटहरी’ की तरह ‘टे’ ‘टे’’करने वालों को सुनता ही नहीं है, और इसीलिए कोई अलग परिणाम नहीं दिखता है|

हार्वर्ड विश्वविद्यालय के भौतिकी और दर्शन के प्रसिद्ध विद्वान् थामस सैम्युल कुहन ने 1962 में क्रान्ति की संरचना पर एक पुस्तक – ‘The Structure of Scientific Revolution’ लिखी| उसने इस पुस्तक में बताया कि हर क्रान्ति (Revolution) के लिए विचारों, दर्शन,  तरीको, मान्यताओं, अवधारणाओं और व्यवहारों में “पैरेड़ाईम शिफ्ट” (Paradigm Shift) करने की अनिवार्यता होती है| यदि आप अपने द्वारा लगाये गए प्रयास यानि बल की दिशा में कोई ‘विस्थापन’ (Displecement) नहीं कर पा रहे हैं, तो आप कोई ‘कार्य’ (Work) नहीं कर रहे हैं; सिर्फ ‘बकवास’ कर रहे हैं| एक बार अल्बर्ट आइन्स्टीन ने ‘पागलपन’ को समझाते हुए कहा था कि एक काम को बार बार एक ही तरीके से करना और कुछ अलग एवं क्रान्तिकारी परिणाम की अपेक्षा करना ही ‘पागलपन’ है| समाज ये ‘कागजी बौद्धिक’ सिर्फ दूसरों, यानि बहुसंख्यक आबादी पर ‘कटाक्ष’ करते हुए समाज को बदल देने का प्रयास करते रहते हैं, और क्रान्तिकारी बदलाव की अपेक्षा करते रहते हैं| दरअसल ये ‘तथाकथित बौद्धिक’ लोग समाज के ‘कागजी बौद्धिक’ हैं| मैं इन्हें ‘मूर्ख’ नहीं कहना चाहता हूँ, लेकिन आप इन्हें क्या कहना कहते हैं; आप स्वयं ही निर्णय कर लें|

आचार्य प्रवर निरंजनजी

शिक्षक, लेखक, प्रेरक एवं दार्शनिक

अध्यक्ष, अन्तर्राष्ट्रीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान

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सोमवार, 7 सितंबर 2026

ज्ञान और बुद्धि क्या है?

ज्ञान और बुद्धि क्या है? सामान्यत: लोग ‘सूचना’ (Information), ‘ज्ञान’ (Knowledge), बुद्धि’ (Intelligence), और ‘प्रज्ञा’ (Wisdom) को सही तरीके से ‘सत्य’ के निकट नहीं समझते हैं| हमें इसे इसके प्रारंभ प्रारम्भ बिंदु से उदविकासीय क्रम में समझना चाहिए, ताकि हम एक ‘सत्य’ की निकटता में विश्वास कर सके|

 ‘ज्ञान’ का प्रारम्भ अनन्त ‘बल क्षेत्र’ (Force Field) में परिवर्तन (Change) से प्रारम्भ होता है| स्थिति में सापेक्षिक परिवर्तन को ही ‘गति’ (Motion) कहते हैं| ध्यान रहे कि इस ब्रह्माण्ड में पदार्थ (Matter), ऊर्जा (Energy), स्थान/ आकाश (Space) और समय (Time), सभी की उत्पात्ति इसी ‘बल क्षेत्र’ से हुई है| अर्थात ज्ञान का प्रारम्भ इस ब्रह्माण्ड में पदार्थ, ऊर्जा, स्थान एवं समय में सापेक्षिक परिवर्तन से होती है| इनमे में से किसी एक के भी स्तर या मात्रा में परिवर्तन से ‘संकेत’ (Sign / Indication) पैदा होता है, जिसे स्थिर और स्वाभाविक ‘प्रतीक’ या ‘लक्षण’ माना जाता है| इन्ही ‘संकेतो’ के अर्थपूर्ण गतिशील प्रेषण ‘सिगनल’ (Signal) कहलाते हैं, यानि इन ‘संकेतों’ के गतिशील समुच्चय को ‘सिगनल’ कहते हैं| हर ‘सिगनल’ ‘संकेत’ होता है, लेकिन हर ‘संकेत’ ‘सिगनल’ नहीं है| ‘संकेत’ एक ‘सूचना’ का प्रारम्भ माना जाता है, लेकिन एक ‘सूचना’ उन्नत अवस्था है| एक स्थिर ‘संकेत’ ही  गतिशील होकर, यानि स्थान –परिवर्तन करने में  ‘सिगनल’ बन जाता है| एक ‘संकेत’ उसी समय ‘सिगनल’ बन पाता है, जब उस ‘सिगनल’ को कोई ग्रहण करने वाला होता है|

इन ‘सिगनलों’ के अर्थपूर्ण ‘समुच्चय’ (Set) या ‘मैट्रिक्स’ (Matrix) को ‘सूचना’ (Information) कहते हैं| ये ‘समुच्चय’ और ‘मैट्रिक्स’, दोनों ही किसी ‘सिगनल को ‘व्यवस्थित’ करने के दो भिन्न तरीके हैं|  यह ‘सिगनल’ ‘ऊर्जा का प्रवाह’ के रुप में होता है, जबकि एक ‘सूचना’ एक अर्थपूर्ण एवं मूर्त अर्थ देता हुआ होता है| ‘सिगनलों’ के मोड्यूलेशन (Modulation) से किसी ‘सूचना’ का निर्माण होता है| यह ‘सूचना’ ही ‘ज्ञान’ की व्यावहारिक इकाई है, जो ‘ज्ञान’ को व्यवहारिक आधार देता है|

ज्ञान –प्राप्ति के तीन अनिवार्य तत्व या अवयव होते हैं – ‘ज्ञान का स्रोत’. ‘ज्ञान प्राप्ति के साधन’, और ‘ज्ञान प्राप्त करने वाला व्यक्ति, तंत्र या व्यवस्था’| ‘ज्ञान का स्रोत’ ‘ज्ञान का सृजन’ ऊर्जा के प्रवाह या स्थिति या मात्रा में परिवर्तन कर करता है| यह ऊर्जा या तो यांत्रिक ऊर्जा (ध्वनि) के रुप में होगा, या इलेक्ट्रो –मैग्नेटिक तरंग के स्वरुप में होता है, जिसे मानव कई ज्ञानेन्द्रियाँ से ग्रहण कर सकता है| ‘ज्ञान प्राप्ति के साधन’ के लिए पांच ज्ञानेन्द्रियाँ, मानसिक साधन एवं आध्यात्मिक साधन हैं| पांचों ज्ञानेन्द्रियाँ से प्राप्त ‘सिगनल’ या ‘सूचना’ इलेक्ट्रो –मैग्नेटिक तरंग के स्वरुप में होता है, जो शरीर में जैवकीय रसायन में बदल कर अपने प्रभाव उत्पन्न करता है| ‘मन’ (Mind) एवं ‘चित्त’ (Spirit) की शक्तियां ‘मानसिक’ (Mental) यानी ‘विचारों’ एवं ‘भावनाओं’ का उत्पादन, संश्लेषण, संयोजन एवं नियंत्रण कर ‘ज्ञान’ का सृजन करती है| ‘ज्ञान’ का उत्कृष्ट सृजन ‘अंतर्ज्ञान’ (intuition) से उत्पन्न माना जाता है, जो ‘आध्यात्मिक’ चेतना से उत्पन्न होता है| सभी महान वैज्ञानिक, विचारक, समाज सुधारक, उद्यमी आदि इसी स्रोत से ज्ञान प्राप्त करते हैं| ज्ञान प्राप्त करने वाला व्यक्ति, तंत्र या व्यवस्था की क्षमता, योग्यता, ज्ञान प्राप्त करने वाला ‘परास’ (Range), गुणवता और उसकी आलोचनात्मक चिन्तन स्तर या उसके ‘अल्गोरिथम’ की स्थिति पर निर्भार करता है|

प्राप्त ज्ञान भी दो स्तर पर पाया जाता है| सभी पशुओं में, जिसमे सभी स्तनपायी (मानव भी स्तनपायी है) शामिल हैं, ज्ञान ‘प्रतिवर्ती क्रिया’ (Reflex Action) से करता होता है, जिसमे उसका मस्तिष्क सामान्यत: शामिल नहीं होता है| इसमें प्रत्येक सूचना (क्रिया भी) के लिए तत्काल ही प्रतिक्रिया दे दिया जाता है, जिसे पशुवत (Animaliका ज्ञान stic) प्रतिक्रिया कहते हैं| उत्कृष्ट मानसिक स्तर या आध्यात्मिक स्तर सिर्फ उच्चतर चेतना के व्यक्तियों को ही उपलब्ध होता है|

‘ज्ञान’ (Knowledge) किसी वस्तु (Objects) या किसी क्रियाविधि को उसकी ‘यथास्थिति’ की अवस्था, या स्थिति, या सन्दर्भ के सापेक्ष में ‘सम्यक रूप से जान लेना’ होता है| यह ‘ज्ञान’ नैतिकता (गलत –सही एवं उचित –अनुचित) और उपयोग के निरपेक्ष होता है| हालाँकि ‘सम्यक रूप से जान लेना’ भी एक सापेक्षिक स्थिति है और इस रुप में ‘ज्ञान’ को पूर्ण नहीं बताया जा सकता है| इसीलिए यह कहा जाता है एक ही ‘तथ्य’ (Fact) के कई ‘सत्य’ (Truth) होते हैं, और सभी ‘सत्य’ अपने सापेक्षिक स्थिति के अनुसार ‘सही’ (Correct) भी होता है| ‘ज्ञान’ के सापेक्षिक स्थिति के कारण ही ‘विज्ञान’ विकसित होता है, यानि एक ही ‘तथ्य’ के ‘ज्ञान’ के सम्बन्ध में ‘असहमति’ ही विज्ञान का आधार बनता है| इसीलिए किसी ‘ज्ञान’ को पूर्ण ‘सत्य’ और ‘स्थायी’ मानना भी ‘ज्ञान की अपूर्णता’ है| ‘क्षणिकवाद’ यानि ‘अनित्यवाद’ किसी ‘पूर्ण ज्ञान’’ को ‘अपूर्ण’ बना देता है| अर्थात सभी ‘सत्य’ ज्ञान ‘अपूर्ण ज्ञान’ हो जाता है| इस ब्रह्माण्ड में एक ही सत्य और स्थायी है, कि कुछ भी ‘सत्य और स्थायी’ नहीं है|

जब मानव अपने ‘प्राप्त ज्ञान’ का उपयोग अपने हित में करता है, तब वह ‘ज्ञान’ उसकी ‘बुद्धि’ (Intelligence) कहलाती है| ‘बुद्धि’ भी ‘सामान्य बुद्धि’, ‘भावनात्मक बुद्धि’, ‘सामाजिक बुद्धि’ एवं ‘प्रज्ञावान (Wisdom) बुद्धि’ में वर्गीकृत किया जाता है| जब मानव के ‘ज्ञान’ और ‘बुद्धि’ में ‘वर्तमान मानवता, और ‘मानवता का भविष्य’ का हित समाहित हो जाता है, तब वह ‘ज्ञान’ ही ‘प्रज्ञा’ (Wisdom) बन जाता है| ‘प्रज्ञा’ वह विशिष्ट एवं उच्चतर ‘ज्ञान’ या ‘बुद्धि’ है, जिसमे ‘प्रकृति’ और समस्त ‘पारिस्थितिकी’ (Eco System) शामिल हो जाता है| संयुक्त राष्ट्र का विकास कार्यक्रम (UNDP) के सभी सत्रह ‘धारणीय विकासत्मक लक्ष्य’ (SDGs) ही मानव के ‘प्रज्ञा’ को रेखांकित करता है| ‘प्रज्ञा’ में मानव का ‘मैं’ (I) उसके ‘हम’ (We, The People) को समाहित करते हुए उसके भी ऊपर जाकर अवस्थित हो जाता है, जो उसके “अहम्” (Aham) की स्थिति कहलाती है| यह “अहम्”  उसके ‘मैं’ और उसके ‘हम’ से परे यानि ‘पार’ की स्थिति होती है, जिसमे उसका ‘प्रकृति’ और उसका ‘पारिस्थितिकी’ समाहित हो जाता है|

आपने देखा होगा, कि बिहार, जो बुद्धि के विहारों (बौद्धिक –मनन केंद्र) के नाम पर बना क्षेत्र माना जाता है, की संस्कृति में वहां के लोग  सामान्यत: “मैं” के स्थान पर “हम” या “अहम्” शब्द का प्रयोग करते हैं| यही प्रज्ञा का उत्कर्ष है| यहाँ ‘अहम्’ (अधि + हम, हम से ऊपर) यानि “हम से परे” का अंग्रेजी शब्द संदर्भवश ‘Ego’ नहीं है| “हम” शब्द व्यापक शब्द है, जो किसी “मैं” से बहुत उच्चतर अवस्था का भाव रखता है और 'अहम्' उस हम से भी परे है।

आपने संकेत, सिगनल, सूचना, ज्ञान, बुद्धि एवं प्रज्ञा को समझ लिया होगा|

आचार्य प्रवर निरंजनजी

अध्यक्ष, अन्तर्राष्ट्रीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान|

गुरुवार, 20 अगस्त 2026

बहुजनों की समस्याएँ बढती ही जा रही है, क्यों?

भारत में बहुसंख्यको की समस्याएँ बढती ही जा रही है, जबकि उनलोगों की उम्मीद इसके घटने की है| ‘बहुजन’, अर्थात बहुसंख्यक जन| लोग अपनी सुविधा और समझ के स्तर पर वर्गीकरण करते हैं, जैसे जाति, उपजाति, पंथ, सम्प्रदाय, भाषा, क्षेत्रीयता या अन्य कोई कल्पित आधार हो सकता है| इस वर्गीकरण की एक विशिष्ट और स्पष्ट विशेषता होती है| इस वर्गीकरण में किसी दूसरे ख़ास समूह को इस वर्गीकरण से बाहर कर दिया जाता है, और यह माना जाता है कि उनकी सारी समस्यायों के जड़ (कारण) वही सापेक्षिक समहू है| अर्थात इस प्रक्रिया में एक सापेक्षिक ‘दुश्मन’ वर्ग की कल्पना कर ली जाती है, और उसे ही अपनी सभी समस्यायों के लिए उत्तरदायी बना दिया जाता है| इस तरह, ये बहुसंख्यक समाधान के लिए अपने कर्तव्यों और उत्तरदायित्वों से मुक्त हो जाते है|

इन आधारों पर जब से उनकी तथाकथित जागृति बढ़ी है, दिनों दिन उनकी समस्याएँ विकराल होती जा रही है| इस जागृति के साथ, ये सभी बहुसंख्यक अपनी समस्त ऊर्जा, संसाधन, धन, वैचारिकी और जवानी उन समस्यायों को खोजने में लगाये हुए हैं, लेकिन इसके बाद उन्हें अपनी समस्यायों के समाधान और आगे बढ़ने लिए उनके पास कोई ऊर्जा, संसाधन, धन, वैचारिकी और जवानी ही नहीं बचती है| इतना ही नहीं, ये लोग अपनी न्यूरान्स के 'वर्किंग सेट -अप' (Working set up) की प्लास्टीसिटी (Plasticity) को इन्हीं समस्याओं को खोजने के लिए ही पैटर्न (Pattern/ प्रतिरुप) बना दिया है; नतीजा, इनको समाधान ही नहीं दिखता है। ये सभी उन्हीं समस्यायों के बृहद या विशद वर्णन में लगे हुए रहते हैं, जिससे उन्हें बुद्धिजीवी होने की संतुष्टि मिलती दिखती है| इसी बौद्धिकता के भ्रम में वे कोई समाधान देखने का कोई प्रयास नहीं करते हैं|

उनको आगे बढ़ाने की पूरा उत्तरदायित्व व्यवस्था पर और उस दुश्मन समूह पर डाल दिया जाता है| इनकी बौद्धिकता भी बड़ी विचित्र किस्म की होती है| ये लोग चार साल ग्यारह महीने और उनतीस दिन जिसकी पूरी आलोचना करते रहेंगे, लेकिन चुनाव में मतदान के दिन अपनी जाति और धर्म को देख कर उसी को या उसी के गठबधन को मतदान करेंगे| और फिर उसी दिन से अपनी तथाकथित बौद्धिकता उसके विरुद्ध दिखाने की होड़ में शामिल रहेगें| कुछ तो बौद्धिक अपनी भिन्न वैचारिकी के कारण दूसरों को ‘मूर्खता’ का प्रमाण –पत्र बाँटते दिखेंगे| उनका यह दोहरा चरित्र किसी को नहीं दिखता होता है|

भारत के सभी वर्ग समूहों के आधार में, सभी कुछ हो सकता है, लेकिन उसमे ‘राष्ट्र’ कहीं नहीं दिखता हुआ होगा| यह स्थिति सर्व जनों की है| अपवाद हर जगह होते हैं, इसलिए अपवाद को मान कर चलना होता है| सभी वर्ग, या यह कह सकते हैं कि भारत का प्रत्येक सामाजिक वर्ग राष्ट्र की प्राथमिकता के विरुद्ध अपना अपना ‘सामाजिक पूंजी’ {Social Capital} बनाने में लगा हुआ है| इसका आधार उसकी जाति, उपजाति, पंथ, सम्प्रदाय, भाषा, क्षेत्रीयता या अन्य कोई कल्पित अवधारणा हो सकता है| ‘मूल निवासी’ और ‘विदेशी’ की अवधारणा भी एक कल्पित अवैज्ञानिक अवधारणा ही है|

बहुजनों की समस्याएँ इसलिए बढती जा रही हैं, क्योंकि इन वर्गों के अधिकाँश लोगों का जीवन –नजरिया ‘समस्यायों’ को देखने की ओर उन्मुख हो गया है| इनके मानसिक दृष्टिकोण का नजरिया समस्यायों को ढूंढने और खोज करने मात्र की हो गयी है| अब तो ऐसी स्थिति हो गयी है कि जहां समस्याएँ नहीं दिखती है, तो वे बेचैन हो उठते हैं| उस अवस्था को भी खतरनाक मान लिया जाता है| इनका ‘अल्गोरिथम’ समस्यायों को खोजने के लिए ‘प्रोग्राम’ किया जा चुका है| ये समाधान को खोज ही नहीं सकते| इनको समाधान व्यक्ति के विस्थापन में दिख सकता है, लेकिन व्यवस्था या विचारों में नहीं दिख सकता है| इसीलिए इनके डिजीटल ‘सोशल समूहों’ में जो मैसेज डाले जाते हैं, उनमे सभी के सभी समस्यायों के विवरण से भरे होते हैं| ऐसे किसी भी मैसेज में समाधान देता हुआ कुछ भी नहीं मिलेगा| स्पष्ट है कि ऐसे लोगों को समस्या ही मिलना इनकी नियति हो गयी है| चूँकि अधिकाँश भारतियों की आलोचनात्मक विश्लेषण की क्षमता और स्तर निम्नतर होता है, इसीलिए बहुसंख्यक लोग ऐसे ही लेखों या अग्रसारण को पसंद करते होते हैं| यदि किसी ने समाधान –परक कोई सुझाव या कार्य योजना डाल दिया, तो सभी बुद्धिजीवियों को ‘साँप सूंघ जाता है’| स्तरहीन सस्ती लोकप्रियता पाने की होड़ में कार्यरत कर्मी, सामाजिक कार्यकर्ता और अवकाश प्राप्त कर्मी की बहुलता होती है| इसीलिए समस्यायों पर चीखते –चिल्लाते लोग उनके लोकप्रिय सामाजिक नेता बन जाते हैं| तब, समाधान नहीं, समस्यायों की गणना और विवरण ही बौद्धिकता का आधार बन जाता है|

जिनको वैचारिक सृजन या विचारण की क्षमता नहीं होती है, ऐसे लोग सिर्फ भौतिक वस्तुओ को ही देख और समझ पाते हैं, और ऐसे में व्यक्ति का नाम पहचानने के लिए सबसे ऊपर होता है| ऐसे लोग सारी समस्यायों का दोषारोपण किसी व्यक्ति या व्यक्ति –समूह को ही देते हैं| ऐसे लोगों को या सभी बौद्धिक लोगों को यह समझ ही नहीं है कि भारतीय इतिहास में ऐसे वर्ग समूहों की उत्पत्ति और उद्विकास कैसे हुआ? ये लोग इसके लिए शताब्दियों पुरानी स्थापित मान्यताओं पर ही अडिग हैं, जबकि नयी वैज्ञानिक व्याख्या में सब कुछ भिन्न हो जाता है| ये सभी अपने को अंतिम ज्ञान से परिपूर्ण मानते हैं| उनको अपने ज्ञान में अब किसी संवर्धन की जरुरत नहीं होती है| इनको क्रान्ति के लिए एक ही कमी दिखती है कि उनके पास धन और जन समर्थन की कमी है| उन्हें लगता है कि उनकी हर बात को सब मान ले, तो वे क्रान्ति कर सकते हैं|

ऐसे ही भ्रमों में उनके बुद्धिजीवी जीवित रहते हैं और बहुसंख्यक को भी भ्रमित रखे हुए हैं| ऐसे ही चलता रहेगा|

आचार्य प्रवर निरंजनजी

शिक्षक, लेखक, प्रेरक एवं दार्शनिक

अध्यक्ष, अन्तर्राष्ट्रीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान

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शनिवार, 15 अगस्त 2026

भारतीय राष्ट्र की समस्याएँ और समाधान

‘भारतीय राष्ट्र’ (Nation) की अनेको समस्याएँ हैं| ध्यान रहे कि ‘भारतीय देश’ (Country) की या ‘भारतीय राज्य’ (State, not Province) की अनेकों समस्याएँ हो सकती है, लेकिन ये सभी समस्याएँ ‘भारतीय राष्ट्र’ की मूल समस्यायों की तरह प्राथमिक नहीं हैं| ‘भारतीय राष्ट्र’ की समस्या भारतीय देश एवं राज्य के लिए आधार  (Base) से जुड़ी हुई है| शायद इसीलिए भारतीय संविधान की उद्देशिका (Preamble) में ‘राष्ट्र’ की एकता और अखंडता सुनिश्चित करने की बात की गयी है, ‘देश’ या ‘राज्य’ की एकता और अखंडता सुनिश्चित करने की बात नहीं है|

राष्ट्र से सम्बन्धित समस्याएँ इसलिए भी ‘नाजुक’ समझी जाती है, क्योंकि ‘राष्ट्र’ एक भावनात्मक और अमूर्त अवधारणा है| यह देश या राज्य की तरह स्पष्ट और मूर्त नहीं होता है| एक ‘राष्ट्र’ का निर्माण एक निश्चित भूगोल पर एक लम्बे ऐतिहासिक काल में एक साथ रहने से उत्पन्न ‘ऐतिहासिक एकापन’ (Historical Oneness) की भावना से होता है| स्पष्ट है कि राष्ट्र एक होने की एक भावना मात्र है और इसीलिए एक ‘राष्ट्र’ एक ‘काल्पनिक वास्तविकता’ (Imaginary Reality) ही है| यह एक सामाजिक एवं सांस्कृतिक ‘संस्था’ (Institution) है, कोई संस्थान (Institute) नहीं है|

‘भारतीय राष्ट्र’ एक निश्चित भूगोल पर निर्मित एवं विकसित है| इस भूभाग को ‘भारतीय उपमहाद्वीप’ कहा जाता है, जिसमे वर्तमान में कई देश या राज्य समाहित हो जाते हैं| ‘भारतीय राष्ट्र’ में भारतीय गणराज्य, पकिस्तान, अफगानिस्तान, नेपाल, भूटान, बंगलादेश जैसे राज्य शामिल हैं| एक निश्चित भौगोलिक संरचना से आवृत और एक विशिष्ट मानसूनी जलवायु से संचालित पूरे उपमहाद्वीप को एक आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं राजनीतिक समरूपता से बांधता हुआ होता है| एक निश्चित भौगोलिक भू –संरचना और भू –आकृति ने आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं राजनीतिक एकीकरण के लिए कई कारक उपलब्ध कराए हैं, जैसे रेलों, सडको के परिवहन और संचार साधनों के जाल को फैलाने में कोई बाधा उत्पन्न नहीं कर रहा है| आज भारतीय राष्ट्र एक प्रमुख बाजार के रुप में विश्व में महत्वपूर्ण स्थान रखता है| एक राष्ट्र के लिए इतिहास से ज्यादा महत्वपूर्ण उसका निश्चित भूगोल होता है|

इसीलिए ‘भारतीय राष्ट्र’की अधिकतर समस्याएँ इसके भूगोल से सम्बन्धित नहीं होकर, इसके ‘इतिहास’ और इसके ‘इतिहास की समझ’ से सम्बन्धित है| इसीलिए प्राचीन एवं मध्य काल के भारतीय इतिहास की वैज्ञानिक व्याख्या भी भारतीय राष्ट्र की अधिकतर समस्यायों को सुलझा देगी, लेकिन यह भारतीय दुर्भाग्य है कि सभी इतिहासकार परम्परागत पैटर्न से अलग हट ही नहीं पा रहे हैं| ‘भारतीय राष्ट्र’ अनेक भाषाओं, सम्प्रदायों एवं पन्थो, जातियों और परम्पराओं का देश है, जिसे ऐतिहासिक शक्तियों ने ऐतिहासिक काल में जन्म दिया है और विकसित किया है। सांस्कृतिक विविधता बनाम एकरूपता की चुनौती एक समान राष्ट्रीय पहचानगढ़ने के प्रयास में कभी-कभी स्थानीय पहचान से टकरा जाता है। समस्या यह है कि राष्ट्रवाद ‘समावेशी’ हो या ‘सांस्कृतिक रूप से एकरूप’?  सांस्कृतिक विविधता जड़ें तो है, लेकिन  ‘आर्थिक पर्यावरण’ राष्ट्र को एकीकृत करने वाला प्रभावशाली शक्तियाँ हैं| इसे ही बाजार की शक्तियाँ कहते हैं, और इन्ही शक्तियों को ही एकीकरण के प्रमुख कारक के रुप में स्वीकार कर लिया जाना चाहिए| इसे ध्यान से समझना चाहिए|

आर्थिक शक्तियों के बदलते प्रभाव में कभी कभी अर्थव्यवस्था जड़ होने लगती है, जैसे प्राचीन काल के समापन के बाद मध्य काल में हुआ| तब ‘भौगोलिक दूरियाँ’ ही भूगोल में विविधता देने लगता है|  अर्थव्यवस्था यानि बाजार के साधन एवं शक्तियाँ भूगोल को एकरूपता की ओर ले जाने को सदैव तत्पर रहता है, लेकिन ‘जड़’ हो गयी अर्थव्यवस्था गतिहीन हो जाती है| इतिहास की समझ और अवबोध (Perception) ही संस्कृति को स्वरुप प्रदान करता है, जो पूरे समाज को अदृश्य रह कर संचालित करता रहता है| इस तरह, इतिहास का समन्वय और सामंजस्य ही जीवन को गति प्रदान करता है और गति ही साइकिल की तरह जीवन और राष्ट्र को संतुलित बनाए रखता है।

धर्म और राष्ट्र के संबंध में भारतीय राष्ट्रवाद के भीतर दो प्रवृत्तियाँ रही है, जो ‘नागरिक राष्ट्रवाद’ और ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ या ‘धार्मिक राष्ट्रवाद’ के रुप में अभिव्यक्त है| ‘नागरिक राष्ट्रवाद’ भारतीय संविधान के उद्देश्यों, नागरिकता और मौलिक अधिकारों पर आधारित है| जब सम्प्रदायों एवं पन्थो और राष्ट्र की सीमाएँ धुंधली होती हैं, तो अल्पसंख्यकों में असुरक्षा की भावना उत्पन्न हो सकती है। बाजार की शक्तियाँ, शिक्षा का स्तर, और लोगों का उच्चतर आलोचनात्मक चिन्तन सभी को मानवता के कल्याण के लिए अग्रसर करता है| राष्ट्र को मानवता के कल्याण करने के साधन के रुप में लिया जाना चाहिए, उसमे बाधक नहीं बनना चाहिए|

भारतीय जाति-व्यवस्था विश्व में एक अनूठी सामाजिक व्यवस्था है| यह जन्म पर आधारित और सम्पूर्ण जीवन में कभी भी नहीं बदलने वाली सामाजिक असमानता है| प्राचीन भारत की पेशाओं (Professionals) की व्यवस्था ही मध्य काल की गतिहीन अर्थव्यवस्था में जाति-व्यवस्था के रुप में स्वरुप ग्रहण कर लिया|  समस्या यह है कि राष्ट्रवाद समानता की बात करता है, परंतु जाति-आधारित असमानताएँ अभी भी गहरी हैं| इससे राष्ट्रकी अवधारणा में सामाजिक न्याय का प्रश्न जुड़ जाता है। इसी तरह,  क्षेत्रीयता और उप-राष्ट्रवाद की समस्या कई राज्यों में क्षेत्रीय दलों के बढ़ते प्रभाव में उत्पन्न हुआ है। तमिल राष्ट्रवाद, कश्मीरी पहचान और पंजाबी/सिख अस्मिता इसी प्रकार के उदाहरण हैं| तब यह प्रश्न उठता है कि क्या भारतीय राष्ट्रवाद इन सभी उप-राष्ट्रीय पहचानों को समाहित कर सकता है?

आर्थिक असमानता एवं आर्थिक विषमता भी राष्ट्रवाद की चुनौती है, जैसे अमीर-गरीब की खाई एवं ग्रामीण-शहरी विभाजन आदि| यदि विकास असमान हो, तो राष्ट्रवाद केवल भावनात्मक नारा बन सकता है। इसमें  औपनिवेशिक विरासत का भी महती योगदान है| भारतीय राष्ट्रवाद का उद्भव ब्रिटिश शासन के प्रतिरोध से हुआ, परन्तु प्रशासनिक, कानूनी और शैक्षिक ढाँचे अभी भी औपनिवेशिक मानसिकता से पूरी तरह बाहर नहीं आ पाया है| इससे स्वदेशीऔर आधुनिकके बीच द्वंद्व बना रहता है।

नैतिक-आध्यात्मिक राष्ट्रवाद; धार्मिक राष्ट्रवाद; सांस्कृतिक/हिंदू राष्ट्रवाद और अति –राष्ट्रवाद से अलग आधुनिक एवं वैज्ञानिक राष्ट्रवाद को समझना चाहिए, जो समय की मांग है| इन भिन्न दृष्टियों के कारण एक सर्वमान्य राष्ट्रवादी परिभाषा बना पाना कठिन रहा, लेकिन एक सर्वमान्य अवधारणा को स्वीकार करना होगा|।

 वैश्वीकरण के प्रभाव के कारण आज राष्ट्रवाद केवल सीमाओं के भीतर सीमित नहीं है। वैश्विक बाज़ार, डिजिटल संस्कृति, और प्रवासी भारतीयों की भूमिका राष्ट्रवाद को वैश्विक मानवता की ओर अग्रसर करता हुआ है| इससे राष्ट्रीय संप्रभुता और वैश्विक जुड़ाव के बीच संतुलन का प्रश्न उठता है। भारतीय राष्ट्रवाद की मूल समस्या एकता में विविधताके आदर्श को व्यवहार में लागू करने की है।

राष्ट्र एक सांस्कृतिक चेतना भी है, यह एक एक संवैधानिक-राजनीतिक समझौता भी है और यह एक ऐतिहासिक विकास की एक स्वाभाविक परिणति भी है| इसे समझ कर हमें किसी को प्रोत्साहित करना है और किसी को हतोत्साहित करना है, ताकि राष्ट्र की एकता एवं अखण्डता सुनिश्चित रहे|

आचार्य प्रवर निरंजनजी

शिक्षक, लेखक, प्रेरक एवं दार्शनिक

अध्यक्ष, अन्तर्राष्ट्रीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान

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शुक्रवार, 14 अगस्त 2026

विकास में '’संस्कृति/ इतिहास में आस्था’' की भूमिका

 (Role of Cultural/ Historical Faith in Development)

‘विकास’ (Development) एक वैश्विक विषय है, जिस पर ढेर सारे विमर्श होते रहते हैं। विमर्श के मुद्दे में प्रमुख यह होते हैं कि ‘विकास’ स्वयं क्या है? ‘विकास’ की संकल्पना क्या है और इसके आधारभूत तत्व क्या हैं, अर्थात ‘विकास’ का तात्पर्य क्या है? इसे अवधारित करने के बाद लक्ष्य निर्धारित किया जाता है। तब उन लक्ष्यों को पाने के लिए प्रक्रियाओं और विधियों का सुनिश्चयन किया जा सकता है। ‘विकास’ के साथ यह अजीब दुर्भाग्य भी जुडा हुआ है कि विश्व में एक से बढ़ कर अनेक प्रसिद्ध अर्थशास्त्री हुए हैं, लेकिन कोई भी ऐसा व्यावहारिक एवं सरल समाधन नहीं दे पाए हैं, जिससे विश्व के महत्तम लोगों को ‘न्यूनतम विकास’ भी नसीब हो सके| यह अर्थशास्त्रियों की विद्वता पर एक बड़ा प्रश्न है| क्या ‘मानवता का कल्याण’ अर्थशास्त्रियों का विषय –वस्तु नहीं है?

इस व्यापक विकास में ‘संस्कृति’ की भूमिका आधारभूत और निर्णायक होती है। टिकाऊ विकास और संस्कृति में गहरा संबंध है। हमारा ‘इतिहास – बोध’ (Perception of History)  ही हमारी संस्कृति को एक ख़ास स्वरूप प्राप्त करता है। हमारी ‘संस्कृति’ हमारे ‘इतिहास में आस्था’ से निश्चित होता है| इतिहास की वैज्ञानिक व्याख्या ही हमारी ऐतिहासिक ‘जड़ों’ के सारे भ्रमों का निवारण कर सकता है।  इसीलिए विकास में उनकी ‘संस्कृति’, यानि उनके ‘इतिहास के बोध की आस्था’ ही निर्णायक भूमिका में होती है| भारतीय संविधान की उद्देशिका (Preamble) में अंग्रेजी के “Faith” को ही हिंदी में “धर्म” कहा गया है| यह ‘धर्म’ कोई सम्प्रदाय नहीं है, बल्कि यह भारतीय लोगों के द्वारा ‘धारित’ किए जाने वाले गुण/ चरित्र हैं|

‘विकास’ (Development) की संकल्पना के निर्धारण में ‘वृद्धि’ (Growth) की संकल्पना को निर्धारित करना और इन दोनों में संबंध को समझना महत्वपूर्ण है। साधारणतया लोग और प्रशासनिक अधिकारी गण “वृद्धि” को ही ‘विकास’ समझ लेते हैं, भारत में ऐसा ही हो रहा है। ‘विकास’ केवल ‘आर्थिक वृद्धि’ (GDP) तक सीमित नहीं होता, बल्कि यह ‘विकास’ मानवीय क्षमताओं, सामाजिक संबंधों, मूल्यों और जीवन-गुणवत्ता का समग्र विस्तार है। ‘विकास’ ‘मानवीय क्षमताओं’ के विस्तार और गहनता के साथ साथ ‘मानवीय अभिवृति’ (Human Attitude) में सकारात्मक बदलाव अवश्य सुनिश्चित करता है|

प्रोफेसर अमर्त्य सेन ने ‘विकास’ की एक सर्वमान्य और व्यापक संकल्पना दिया है। इसे संयुक्त राष्ट्र संघ के विकास कार्यक्रम में भी अपनाया गया है। इसी स्पष्ट अवधारणा के लिए उन्हें 1998 में अर्थ शास्त्र के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित भी किया गया है। ‘विकास’ का पैमाना व्यक्ति के महत्तम उत्पादकता के अनुसार महत्तम योगदान करने के लिए उपलब्ध “स्वतंत्रता” (Development as Freedom) होता है। उस स्वतंत्रता को पाने के लिए उसकी सक्षमता क्या होती है? इस सक्षमता की मात्रा और गुणवत्ता ही ‘विकास’ को निर्धारित करता है। यही 'उपागम सक्षमता' (Capability Approach) हुआ। मानव विकास सूचकांक में इसीलिए ‘शिक्षा’, ‘स्वास्थ्य’ और आपकी ‘आय’ को शामिल किया गया है। अमर्त्य सेन के अनुसार ‘विकास’ का उद्देश्य लोगों की क्षमताओं (Capabilities) का विस्तार करना होता है। ‘संस्कृति’ यह तय करती है कि लोग किन क्षमताओं को मूल्यवान मानते हैं‌ और उन्हें उपयोग करने की ‘सामाजिक स्वतंत्रता’ कितनी है।

 ‘संस्कृति’ यह निर्धारित करती है कि कोई समाज विकास को कैसे समझता है, जैसे क्या विकास केवल भौतिक समृद्धि है, या न्याय, गरिमा, समानता, स्वतंत्रता और सामूहिक कल्याण भी उसका हिस्सा हैं। सामान्यतः लोग ही नहीं, अधिकांश विद्वान् गण भी ‘संस्कृति की अभिव्यक्ति’ (Expression of Culture) को ही ‘संस्कृति’ (Cuulture) समझ लेते हैं, जबकि यह दोनों संकल्पना स्पष्टतया अलग अलग है। यहीं सामान्य विद्वान् जन और अर्थशास्त्री भी ‘फिसल’ जा रहे हैं, यह ध्यान रखने की आवश्यकता है| ये लोग नृत्य, स्थापत्य, मूर्तियों, संगीत, पोशाक आदि आदि को ही ‘संस्कृति’ समझ रहे हैं, जबकि यह सब स्वयं ‘संस्कृति’ नहीं है, बल्कि यह सब ‘संस्कृति की अभिव्यक्तियाँ’ हैं| ‘संस्कृति’ समाज का ‘साफ्टवेयर’ और ‘फिजावेयर’ होता है, जो अदृश्य रहकर व्यवस्था का सब कुछ संचालित और निर्धारित करता रहता है। यह संस्कृति ही मनोवैज्ञानिक कार्ल गुस्ताव जुंग का ‘सामूहिक अचेतन’ (Collective Un Consciousness) है।

‘मानव शरीर’ को ‘उत्पादक पूँजी’ के निर्माण में ‘संस्कृति’ प्रमुख है। संस्कृति सीधे तौर शिक्षा के प्रति दृष्टिकोण, श्रम-नैतिकता (Work Ethics) और अनुशासन, समयबोध और सहयोग को प्रभावित करती है। जिन समाजों में ज्ञान; मानसिक, शारीरिक एवं अध्यात्मिक परिश्रम; और ‘नवाचार’ (Innovation) को सांस्कृतिक सम्मान मिला है, वहाँ ‘विकास’ अपेक्षाकृत तीव्र हुआ, जैसे जापान, जर्मनी, चीन, संयुक्त राज्य अमेरिका, कोरिया, ताइवान आदि आदि देशों में।

सामाजिक पूँजी और विश्वास संस्कृति से उत्पन्न होती है। इसके लिए आपसी विश्वास, सामाजिक एकजुटता और संस्थागत नैतिकता की आवश्यकता होती है। इसके लिए संस्कृति के इस तत्व को ध्यान में रखना होता है। उच्चतर सामाजिक विश्वास वाले समाजों में भ्रष्टाचार कम और लेन-देन की लागत कम होती है। इसीलिए ऐसे समाजों में विकास योजनाएँ अधिक सफल होती हैं

यह भी स्पष्ट है कि ‘समावेशन’ (Inclusion) या ‘बहिष्करण’ (Exclusion) में ‘संस्कृति’ की भूमिका होती है। ‘संस्कृति’ विकास को ‘समावेशी’ भी बना सकती है और ‘बहिष्करणकारी’ भी। जाति, लिंग, भाषा, सम्प्रदाय  या समुदाय आधारित भेदभाव विकास को बाधित करता है, जबकि समानता और सम्मान पर आधारित संस्कृति विकास को व्यापक बनाती है। इसलिए सुधारात्मक विकास के लिए सांस्कृतिक आत्मालोचना एवं आवश्यक परिष्करण (Refinement) आवश्यक होती है। ‘इतिहास की वैज्ञानिक व्याख्या’ ही हमारी ऐतिहासिक ‘जड़ों’ के सारे भ्रमों का निवारण करता है। ऐसी ही व्याख्या से संस्कृति यानि इतिहास में आस्था संशोधित होती है|

स्थानीय सांस्कृतिक संदर्भ विकास की सफलता को निश्चित करतीं हैं। जो विकास मॉडल स्थानीय संस्कृति के अनुरूप नहीं होते, वे अक्सर असफल होते हैं। इसीलिए ऊपर से थोपे गए मॉडल अर्थात जिसमें ‌परंपरागत मान्यताओं की उपेक्षा होती है, विकास सम्यक नहीं हो पाता है। इसके विपरीत स्थानीय संस्कृति और आधुनिक तकनीक का मिश्रण ही टिकाऊ विकास दे पाता है।

टिकाऊ विकास और संस्कृति में गहरा संबंध है। पर्यावरण संरक्षण, संयम और पीढ़ीगत उत्तरदायित्व, ये सभी सांस्कृतिक मूल्य हैं। बिना सांस्कृतिक आधार के ‘धारणीय विकास’ (Sustainable Development) संभव नहीं। इतना नहीं, चूँकि संस्कृति किसी समाज का अदृश्य रहने वाला महत्वपूर्ण ‘साफ्टवेयर’ और ‘फिज़ावेयर’ है, इसलिए ‘संस्कृति’ पर बहुत ज्यादा ध्यान देने की आवश्यकता है| ‘इतिहास का उद्देश्य’ (Purpose of History) एक ही होता है कि वह मानव और समाज के बुद्धि का संवर्धन करे| इसलिए किसी भी समाज के इतिहास की वैज्ञानिक व्याख्या की आवश्यकता होती है| ऐसी व्याख्या ही संस्कृति का संवर्धन (Improvement) करता है| सामान्यत: लोग ‘इतिहास के बाह्य ढाँचा’ (External Framework of History) को ही अंतिम इतिहास समझ लेते हैं, जबकि ‘इतिहास की वैज्ञानिक व्याख्या’ ही ‘वास्तविक इतिहास’ होता है| और इसीलिए ऐसे लोग संस्कृति को समुचित रूप में समझ नहीं पाते हैं| 

‘संस्कृति’ ‘विकास’ में बाधा नहीं, बल्कि उसका ‘आधारशिला’ (Foundation –Stone) होता है। ‘विकास’ ‘संस्कृति’ के बिना ‘यांत्रिक’ हो जाता है और ‘संस्कृति’ ‘विकास’ के बिना ‘जड़’ (Fix) हो जाता है। इसीलिए ‘सार्थक विकास’ वही है, जो सांस्कृतिक मूल्यों को आधुनिक आवश्यकताओं और तकनीकों से जोड़ सके। स्पष्ट है कि विकास में इतिहास की स्पष्ट और प्रत्यक्ष भूमिका होती है|

आचार्य प्रवर निरंजनजी

शिक्षक, लेखक, प्रेरक एवं दार्शनिक

अध्यक्ष, अन्तर्राष्ट्रीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान

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गुरुवार, 13 अगस्त 2026

इतिहास का गेस्टाल्ट सिद्धान्त

 (Gestalt Theory of History)

अतीत के किसी भी काल एवं क्षेत्र के समुचित और तथ्यपरक इतिहास को समझने के लिए इतिहास का गेस्टाल्ट सिद्धान्त’ (Gestalt Theory of History) समझना आवश्यक है| किसी वस्तु, या विचार, या घटना को अलग अलग भागों में समझने की अपेक्षा उसे समग्रता में समझना ज्यादा उपयुक्त और समुचित होता है| किसी भी चीज को टुकड़ों टुकड़ों में नहीं देख कर उसे पूरे पैटर्न (Pattern) के हिस्से के रूप में, या उसके विस्तृत पृष्ठभूमि के सापेक्ष समझने, या  देखने में उसका अर्थ ज्यादा स्पष्ट और महत्वपूर्ण होता है| किसी भी चीज को समग्रता में समझना सदैव उसके अलग अलग हिस्सों को समझने या देखने से अलग ही नहीं होता है, अपितु वह बड़ा, व्यापक और वैज्ञानिक होने के साथ साथ एक अलग, स्पष्ट एवं विशिष्ट अर्थ देता हुआ होता है| ऐसा इतिहास के हर काल और क्षेत्र के इतिहास की व्याख्या के लिए भी सही, सत्य और समुचित है| इसे विस्तार से समझते हैं|

 ‘गेस्टाल्ट’ (Gestalt) अवधारणा सबसे पहले मनोविज्ञान के क्षेत्र में आया| इसे जर्मन मनोवैज्ञानिको मैक्स वर्दिमर (Max Werthimer), कुर्त कोफ्का (Kurt Kofka) और वोल्फगांग कोहलर (Wolfgang Kohler) ने शुरुआतो 20वीं शताब्दी में  दिया था| ‘गेस्टाल्ट’ (Gestalt) एक जर्मन भाषा का एक विशिष्ट शब्द है, जिसका अर्थ समग्र स्वरुप’, ‘पूर्ण आकारया पूर्ण आकृतिहोता है|

यही अवधारणा इतिहास को सही और तथ्यपरक तरीके से समझने में किया जा सकता है| इस अवधारणा के साथ उसका परिणाम सामान्य अर्थ से अलग, विशिष्ट, व्यापक, विस्तृत और वैज्ञानिक हो जाता है| इसे जीवन के प्रत्येक घटना या व्यवहार को समझने में भी किया जा सकता है| जीवन की आज की प्रत्येक घटनाएँ ही कल अतीत का हिस्सा बन कर इतिहास हो जाता है, जिसे समझ कर कोई व्यक्ति और बुद्धिमानबनता है| ध्यान रहे कि इतिहासका उद्देश्य ही मानव को और बुद्धिमानबनाना होता है|

इतिहास का गेस्टाल्ट सिद्धान्तकिसी भी क्षेत्र या काल के इतिहास को उसके सम्पूर्ण परिदृश्य में देखने और समझने को कहता है| कहने का अर्थ यह है कि हम जो इतिहास देखते समझते होते हैं, वह अपने आप में सम्पूर्ण सत्य नहीं देता हुआ होता है| सम्पूर्णता में देखने के प्रयास में इतिहासकार की मंशा भी स्पष्ट दिखाई देने लगती है, जो अन्यथा ऐसे नहीं दिखती है| सम्पूर्णता इतिहासकार की मंशा को भी स्पष्ट कर देता है और इतिहास का सत्य सतह (Surface) पर छलक जाता है| तब सारा इतिहास उलट जा सकता है| इसी से किसी भी इतिहास के प्रतिरूप (Pattern) को समझा जा सकता है और इसी आधार पर बहुत कुछ वह भी स्पष्ट हो जाता है, जो दृश्य की सीमाओं से बाहर रह जाता है|

संस्कृति इतिहास को निर्धारित करता है और इतिहास भी संस्कृति को निर्धारित करता है| किसी समाज की गतिविधि उसकी संस्कृति से निर्धारित और नियमित होता है| किसी समाज की संस्कृति उसके निश्चित भूगोल और उनके इतिहास बोध से तय होता है| किसी स्थान का भूगोल उसके भूगर्भीय संरचना में परिवर्तन से भी हो सकता है| इन परिवर्तनों में प्लेट विवर्तनिकी’ (Plate Tectonocs) सहित कई भौगोलिक कारक होते हैं| आर्थिक साधनों और शक्तियों की संयुक्त प्रभाव में वर्तमान जीवन बदलता या रुपान्तरित होता रहता है| इन्हीं को समकालिकया तात्कालिकसाधन एवं शक्तियाँ कहा जाता है| इन्हीं समकालिकया तात्कालिकसाधन एवं शक्तियों को इतिहास के काल में ऐतिहासिक शक्तियाँकहते हैं, जो इतिहास को रूपान्तरित करता रहता है| इसलिए इतिहास की वैज्ञानिक व्याख्या में इसका ख्याल रखना इतिहास को सम्पूर्णता की ओर ले जाता है| लेकिन इतिहास बोध’ (Perception of History) और इतिहास’ (History) की अवधारणा में बहुत बड़ा अन्तर होता है| ‘इतिहास बोधकिसी इतिहास का वह समझ होता है, जिसे कोई व्यक्ति या समाज उस काल में समझता होता है| यह इतिहास बोधउसकी शिक्षा और वैचारिकी के स्तर से, उसके आलोचनात्मक चिन्तन, उसके नजरिए, उसके समक्ष इतिहास की प्रस्तुति के स्वरुप, और तत्कालीन व्यवस्था की मंशा से निर्धारित हो सकता है| तब किसी को किसी क्षेत्र या काल का तथ्यात्मक सत्य की ओर अग्रसर हो सकता है| इस सम्पूर्णता को ही इतिहास का गेस्टाल्ट सिद्धान्तकहते हैं|

सिन्धु नदी घाटी सभ्यता के पतन के इतिहास की व्याख्या में उस क्षेत्र के भूगर्भीय संरचना का ध्यान नहीं रखने से उसका सम्यक इतिहास उजागर नहीं हो सका है| ‘इतिहास का गेस्टाल्ट सिद्धान्तउसके इतिहास को समग्रता में समझने पर जोर देता है, जिसमे उसके प्लेट विवर्तनिकीके सिद्धांत को भी समाहित करना अनिवार्य हो जाता है| इस नदी घाटी सभ्यता की राजधानी तत्कालीन सिन्धु और सागर के मिलन केंद्र में अवस्थित था, जो प्लेट विवर्तनिकीके भूकंप में सागर में जलमग्न हो गया| इस अचानक विपदा ने सारे  व्यवस्थित व्यवस्था को धराशायी कर दिया और उस सभ्यता का पतन होता गया|

'वैदिक संस्कृति' का 'हिन्दू संस्कृति' में रूपान्तरण की अबूझ पहेली भी इसी इतिहास के गेस्टाल्ट सिद्धान्तके साथ स्पष्ट होता है||’ वेदशब्द वेदनासे बना है, जिसका साधारण अर्थ अनुभूतकरना, यानि अनिभूतिसे है| प्राचीन भारत में इसी अनुभूति’ (वेदना)  के सहारे ज्ञान’ (Knowledge), ‘बुद्धि’ (Intelligence) एवं प्रज्ञा’ (Wisdom) का विशिष्ट, उच्चतर और अद्वितीय उदय हुआ| इसी कारण इस भौगोलिक उपमहाद्वीप का नाम आभासे रत’ (Full of Aura) यानि भारतपड़ा| लेकिन इस अद्वितीय भारत का परिवर्तन या रूपान्तरण एक सामन्ती एवं जड़ व्यवस्था की प्रणाली में कैसे हुआ? यही सामन्ती एवं जड़ व्यवस्था की प्रणाली ही हिन्दू संस्कृति के रुप में आज मौजूद है| यही सामन्ती एवं जड़ व्यवस्था की प्रणाली ने ही इतिहास के प्राचीन काल का समापन किया और मध्य युग का प्रारंभ किया| इसे इतिहास के गेस्टाल्ट सिद्धान्तही समझा सकता है| इतिहास का यह गेस्टाल्ट सिद्धान्त केंद्रीकृत रोमन साम्राज्य के पतन और अरबों के उदय को अपने ऐतिहासिक प्रतिरूप में शामिल करने पर जोर देता है| यह सब आर्थिक साधनों और शक्तियों की संयुक्त प्रभाव में सदैव होता रहा है और अब भी हो रहा है|

पुरातत्व और इतिहास बताता है कि प्राचीन काल में पेशा’ (Profession) तो था, लेकिन जाति’ (Jati) और कास्ट’ (Caste) का उदय नहीं हुआ था| ‘पेशाकिसी लाभ के लिए आर्थिक उपार्जन की व्यवस्था होती है| कोई भी आर्थिक उपार्जन अतिरेक या अतिरिक्त उत्पादन के साथ शुरु होता है| कृषि के उदय के साथ ही पेशाका उदय संभव हो सका| इसके पहले सभी उपक्रम जीवन की निरंतरता बनाए रखने के लिए होता रहा, और उसमे कोई अतिरिक्त उत्पादन का कोई स्थान नहीं था| कृषि ने ही मानव जीवन में सबसे पहली बार अतिरिक्त उत्पादन संभव बनाया| अर्थव्यवस्था के सामन्ती एवं जड़ व्यवस्था स्वरूप ने पेशाके नाम एवं अन्य स्वरूप का क्षेत्रीयकरण कर दिया|इसी जड़ व्यवस्था ने जातिकी उत्पत्ति की| पुर्तगाली व्यापारियों ने भारतीय सामाजिक व्यवस्था को पश्चिम की दुनिया के समक्ष पुर्तगाली शब्द कास्टाके अनुरूप जातिको कास्टबना दिया| पुर्तगाली ‘कास्टा’ में पेशागत क्षैतिज विभाजन तो होता है, लेकिन जातिकी तरह उर्घ्वाधरविभाजन नहीं होता है| इसीलिए 'कास्ट' (Caste) में भी जातिकी तरह उर्घ्वाधरविभाजन होता है, ऐसा पश्चिमी लोग नहीं जानते हैं| फिर बुद्ध के जीवन इतिहास में जातिके प्रसंग के अनेक उदाहरण मिलते हैं| यदि बुद्ध के जीवन इतिहास को समझने में इतिहास का गेस्टाल्ट सिद्धान्तका ध्यान रखा जाय, तो यह स्पष्ट हो जायगा कि ये भ्रमात्मक त्रुटियाँ कहाँ से आयी? इतिहास का यह गेस्टाल्ट सिद्धान्तइतिहास में मिलवटको समझने में सहायक होता है|

इतिहास का गेस्टाल्ट सिद्धान्तइतिहास के स्पष्ट पहलुओं को उस क्षेत्र के भूगोल और संस्कृति के व्यापक समकालीन साधनों एवं शक्तियों का भी सम्मिलित स्वरुप को समेटने कहता है| इस तरह, ‘इतिहास का गेस्टाल्ट सिद्धान्तअपने में भूगर्भीय और भौगोलिक संरचना, अर्थशास्त्रीय शक्तियों, समाज शास्त्रीय अवधारणाओं एवं प्रतिमानों, विज्ञान एवं तकनीक का स्तर, कानून और धर्म, शासन पद्धतियाँ, शिक्षा का स्तर आदि को भी व्यापक एवं विस्तृत झरोखे से देखने समझने पर जोर देता है| तब कोई इतिहास का वैज्ञानिक पक्ष समझ पाएगा

आचार्य प्रवर निरंजनजी

शिक्षक, लेखक, प्रेरक एवं दार्शनिक

अध्यक्ष, अन्तर्राष्ट्रीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान

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सोमवार, 3 अगस्त 2026

इतिहास की अनुकूलनशीलता

 (Conditioning of History)

हर ‘इतिहास’ को ‘अनुकूलन’ करना होता है| यह अनुकूलन भी दो प्रकार का और दो भिन्न प्रक्रियायों से होता है| एक अनुकूलनशीलता इतिहास की व्याख्या में होता है| इसमें एक इतिहासकार इतिहास की व्याख्या बदले हुए समाज की चेतना, मूल्य, आवश्यकताओं और विश्व दृष्टिकोण  के अनुसार करता है| दूसरे अनुकूलनशीलता में, वह इतिहास भी स्वयं नए काल के साधन एवं शक्तियों के प्रभाव में अनुकूलित होने लगता है| अर्थात उस इतिहास की “क्या”, “क्यों” और “कैसे” की भी व्याख्या बदले हुए परिस्थितियों की चेतना, मूल्य, आवश्यकताओं और विश्व दृष्टिकोण के अनुसार होने लगता है| इसमें संस्कृतियाँ नए समय के परिस्थितियों में ढलने लगती है| यानि यह अनुकूलित होने लगती है| तब इतिहास बहुत –कुछ बदल जाता है|

यदि किसी क्षेत्र में जन समुदाय की निरन्तरता बनी रहती है, उसकी सभ्यता और संस्कृति भी अनुकूलित होने लगती है| जन समुदाय के विस्थापन की अवस्था में उसकी सभ्यता (व्यवस्था का हार्डवेयर) भले ही छूट जाए, लेकिन उसकी संस्कृति (व्यवस्था का साफ्टवेयर एवं फ़िज़ावेयर) में अनुकूलन के साथ निरन्तरता बनी रहती है| इस अनुकूलनशीलता को समझे बिना इतिहास का हर समझ और ज्ञान आंशिक है, अधूरा है|

इतिहास की शुरुआत मानव के पहाड़ों पर से उतर कर नदियों और झीलों के कछारों में बसने से शुरु हुई| कृषि के आधार पर ही अर्थव्यस्थाओं के समस्त प्रक्षेत्र यानि पाँचों प्रक्षेत्रों (Sectors) का उद्भव और उद्विकास हो सका| जब समाज के आर्थिक उत्पादन, वितरण, विनिमय एवं उपभोग के साधन और शक्तियाँ बदली, तो इतिहास भी बदल कर नए साधन और शक्तियों में अनुकूलित होने लगी| इन्ही साधनों और शक्तियों के आधार पर इतिहास के प्राचीन काल में बौद्धिक युग का उदय हुआ| फिर यह बदल कर मध्य काल में सामन्ती युग हो गया| इसी के आधार पर, आधुनिक काल का साम्राज्यवादी और वैज्ञानिक युग का आगमन हुआ| वर्तमान काल में 'वित्तीय साम्राज्यवाद' और 'डाटा साम्राज्यवाद' भी इतिहास की इसी अनुकूलनशीलता का परिणाम है|  

इस अनुकूलनशीलता में 'इतिहास का बाह्य ढाँचा’ (Frame -works of History), यानि इतिहास के पात्र और घटनाएं तो स्थिर रहती है, लेकिन उनके पुराने मूल्य और सांस्कृतिक स्थापनाएँ नए युग के अनुसार अनुनुकूलित होने लगती है| भारत की वर्तमान सांस्कृतिक एवं सामाजिक ढाँचा और इसकी संरचना, विन्यास, आंतरिक बुनावट एवं गुणवत्ता भी, सभी प्राचीन भारत का ही मध्य काल में, यानि सामन्ती शक्तियों में अनुकूलित संस्करण है| इस समझ के बिना कोई भी भारत की संस्कृति को सम्यक ढंग से नहीं समझ सकता है; यह स्पष्ट रहना चाहिए|  

एक इतिहास किसी अतीत की वह विवरण होता है, जो हमारी बुद्धि को बढाता है| अर्थात किसी अतीत का विवरण यदि आपकी बुद्धि यानि आपकी समझदारी नहीं बढाता हुआ है, तो वह अवश्य ही इतिहास के नाम पर अन्य कोई साहित्य है, लेकिन वह इतिहास नहीं है| इतिहास के पात्र के नाम, स्थान या क्षेत्र के नाम एवं विवरण, शासन व्यवस्था और युद्ध का ब्यौरा स्वयं इतिहास नहीं होता है, अपितु ये सब इतिहास के उदाहरण होता है, जिसके द्वारा हम इतिहास को समझते होते हैं| यह सब विवरण या ब्यौरा ही किसी विशेष इतिहास का बाह्य ढाँचा होता है, जो उसे आकार और आकृति (पहचान) देता है| यह बाह्य ढाँचा तो लगभग स्थिर रहता दिखता रहता है, लेकिन इतिहास की आन्तरिक संरचना और विन्यास समय के अनुसार बदलता रहा है| ‘इतिहास की अनुकूलनशीलता’ की यह अवधारणा इतनी महत्वपूर्ण है कि इसको समझे बिना हर इतिहास को सही और सम्यक तरीके नहीं समझा जा सकता है|

सभी इतिहास समय और परिस्थितियों के संसर्ग में सदैव अनुकूलित होता रहता है| जैसे प्रकृति का हर वस्तु और जीवन अपने सन्दर्भ के बदलते समय और परिस्थितियों के संसर्ग में अपनी निरन्तरता, यानि अपनी जीवन्तता बनाये रखने के लिए समायोजित रहती है, उसी तरह इतिहास भी अपनी निरन्तरता बनाए रखने के लिए समय और परिस्थितियों में अनुकूलित होता रहता है| यदि कोई इतिहास बदलते समय और परिस्थितियों के अनुसार अनुकूलित नहीं होगा, तो उसे सन्दर्भ से बाहर होकर समाप्त हो जाना होगा| यह वैसे ही होता है, जैसे जीवों, वनस्पतियों और भू –आकृतिकी को समय और परिस्थितियों के अनुसार अनुकूलित नहीं होने से नष्ट हो जाना पड़ा| इस अनुकूलनशीलता में जीवों, वनस्पतियों और भू –आकृतिकी में अपेक्षित बदलाव् हो जाता है, और इसी आधार पर वह निरन्तरता बनाए रख पाता है| इस निरन्तरता में सारा स्वरुप बदला हुआ होता है| इस तरह इतिहास बदलता रहता है|

इतिहास को परिस्थितियों, विचारधाराओं, मान्यताओं, राजनतिक शक्तियों, सांस्कृतिक मूल्यों, या आर्थिक साधनों एवं शक्तियों के कारकों द्वारा प्रभावित, नियंत्रित और आकार दिया जाता है| सभी इतिहास के दो अनिवार्य घटक होते हैं – एक, ऐतिहासिक तथ्य या साक्ष्य और दूसरा, इतिहासकार| ऐतिहासिक तथ्य या साक्ष्य तो अतीत के होते हैं, लेकिन इतिहासकार वर्तमान का होता है| ऐतिहासिक तथ्य या साक्ष्य स्वयं अपने आप कुछ नहीं बताते या बोलते, बल्कि वह इतिहासकार ही उनके बहाने वह कहता है, जो वह इतिहासकार बताना चाहता है| बदलती हुई समय और परिस्थितियों के सापेक्ष इतिहासकार नया इतिहास प्रस्तुत करता है, जो पहले के इतिहास से भिन्न होता है|

इतिहास सिर्फ तथ्यों और साक्ष्यों का संग्रहण नहीं होता है, बल्कि उनके सहारे मानवता के उद्विकास की उत्कृष्ट यात्रा का व्याख्या होता है| यह इतिहास सिर्फ अतीत के ‘क्या’, ‘कहाँ  या ‘कब’ को ही नहीं बताता है, बल्कि उससे महत्वपूर्ण उस अतीत की “क्यों” और “कैसे” की व्याख्या भी करता है| यह “क्यों” और “कैसे” की व्याख्या ही हमारी बुद्धिमता को बढ़ाती है, जिससे मानव की सभ्यता एवं संस्कृति समृद्ध होता रहता है|

 इस तरह, एक इतिहास उस अतीत काल का उस इतिहासकार के परिप्रेक्ष्यों (नजरियों) की प्रस्तुति होती है| एक इतिहासकार अपने वर्तमान समाज और परिवेश में रहता है, इसलिए वह इतिहासकार अपने समाज, संस्कृति, अपनी बौद्धिकता, समझ और आवश्यकताओं के अनुसार ही व्याख्या करता है| इस तरह इतिहास का बाह्य ढाँचा को स्थिर रखते हुए सारी व्याख्या बदल जाती है| 'साम्राज्यवादी इतिहासकार', 'राष्ट्रवादी इतिहासकार', 'मार्क्सवादी इतिहासकार', 'नारीवादी इतिहासकार', 'दलित इतिहासकार', 'यथास्थितिवादी इतिहासकार' और 'वैज्ञानिक (मानवतावादी) इतिहासकार', सभी अपने अपने लक्ष्यों के अनुरुप इतिहास की व्याख्या करता है, यानि इतिहास लिखता है| इस तरह, इतिहास के पात्र एवं घटनाएँ वही रहती है, लेकिन उसका व्याख्या यानि ‘सब कुछ’ बदल जाता है|

इसलिए यदि भारत के सामाजिक और सांस्कृतिक इतिहास को सही और वैज्ञानिक तरीके से जानना और समझना चाहते हैं, तो अवश्य ही ‘इतिहास की अनुकूलनशीलता’ को समझने का यत्न करे, अन्यथा आप भी ‘यथास्थितिवादी मानसिकता’ से बेहतर नहीं हैं|

आचार्य प्रवर निरंजनजी

शिक्षक, लेखक, प्रेरक एवं दार्शनिक

अध्यक्ष, अन्तर्राष्ट्रीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान

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हम कितने नादान हैं

यह शीर्षक आपको थोड़ा अटपटा लग रहा होगा| बात यह है कि हमलोग अपने को बौद्धिक तो समझते हैं’ लेकिन बहुसंख्यक आबादी को ‘निरा मूर्ख’ समझते हैं| हमे...