रविवार, 31 मई 2026

डॉ० मोहन भागवत का ‘राष्ट्रवाद’

डॉ० मोहन भागवत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वर्तमान सरसंघचालक है| इनका पूरा नाम डॉ० मोहन मधुकर राव भागवत है| इनकी शैक्षणिक योग्यता ‘पशु चिकित्सा एवं पशुपालन’ (Veterinary Science and Animal Husbandry) में स्नातक की है| इन्ही के कार्यकाल में वर्तमान केंद्र सरकार निरंतरता बनाए हुए है| इसलिए इनकी दृष्टि, विचार और आदर्श को आम बौद्धिकों के लिए जानना समझना महत्वपूर्ण हो जाता है, कि हमारा राष्ट्र कहाँ जा रहा है? मैं यहाँ सिर्फ इनके ‘राष्ट्रवाद’ की अवधारणा की विवेचना करना चाहता हूँ, जो संघ की अवधारणा भी है| मैं चूँकि ‘अराजनीतिक’ व्यक्ति हूँ, इसलिए आपको किसी भी ‘राजनीतिक’ या ‘भावनात्मक’ विषयों में उलझाना नहीं चाहता हूँ|

डॉ० मोहन भागवत वर्तमान भारत को एक अखंड भारत, एक सशक्त सांस्कृतिक राष्ट्र, और इस हिन्द -भूमि  को वैज्ञानिक एवं आधुनिक राष्ट्र बनाना चाहते हैं, ताकि इस अखंड भारतीय उपमहाद्वीप में समृद्धि, शांति, विकास स्थापित हो सके| जब भारत आधुनिक, वैज्ञानिक और सशक्त होगा, तभी भारत समस्त मानवता के कल्याण के लिए विश्व का मार्गदर्शन कर सकेगा|

ये मानते हैं कि ‘विचार’ और ‘आदर्श’ जीवन्त होते हैं, इसलिए ‘राष्ट्र’ को भी ‘समकालिक’ (Contemporary/ Synchronize) होना होता है|  वे विचार ही उत्कृष्ट होते हैं, जो मानवता और ‘मानवता के भविष्य’ के विकास एवं संवर्धन में सहायक होते हैं| मैं पुन: दुहराता हूँ - विचार जीवन्त होते हैं| परिस्थितियाँ बदलती रहती है| सम्यक विचार को भी समय और परिस्थितियों के बदलने के साथ अनुकूलन, समायोजन, और संतुलन बनाना पड़ता है| अन्यथा वह विचार सन्दर्भ से बाहर होकर अप्रसांगिक हो जाता है| आज विश्व तेजी से बदल रहा है|

वर्ष 2021 के माह नवम्बर में, इसने ‘भारत विभाजन’ का सार्वजानिक रूप से विरोध किया और भारतीय उपमहाद्वीप के पुनर्मिलन के लिए अपना समर्थन व्यक्त किया|  उन्होंने कहा, ‘विभाजन के दर्द का एकमात्र समाधान इसे ‘पूर्ववत स्थिति’ में करने में निहित है’| इस प्रकार इन्होने 1947 में भारत के क्षेत्रीय विभाजन को उलटने की वकालत की| यह इनके ‘अखंड भारत’ की परिकल्पना  का निश्चित दृष्टि है| यह इनकी ‘जम्बूद्वीप -राष्ट्र’ की अवधारणा है| इसमें भारतीय उपमहाद्वीप के सभी भौगोलिक भू –भाग समाहित हो जाते हैं| इसका आधार इस ‘अखंड भारत’ के निवासियों की ‘सांस्कृतिक समझ’ है, जो समय समय पर उद्घाटित होता रहता है| यह कोई अधिग्रहण या अतिक्रमण की अवधारणा नहीं है| जैसे वियतनाम या जर्मनी का एकीकरण वहाँ के जन गण के ‘सांस्कृतिक एकापन’ के कारण हुई, वैसे इस ‘अखंड भारत’ का एकीकरण होना निश्चित है| यह ‘सांस्कृतिक चेतना’ अब मुखर होने लगी है|

इस ‘राष्ट्र’ को इस ‘हिन्द स्थान’ की ‘ऐतिहासिक सांस्कृतिक आधार’ (Historical Cultural Foudation) या ‘ऐतिहासिक सांस्कृतिक सार’ के रुप में देखा समझा जाना चाहिए| यही ‘ऐतिहासिक सांस्कृतिक सार” ही ‘सनातन’ है, और यही इस अखंड भारत –भूमि की ‘सांस्कृतिक विशेषता’ है| चूँकि ‘संस्कार’ और ‘संस्कृति’ भी ‘समकालिक’ होता रहता है, लेकिन यह अपनी मूल भावना में स्थिरता लिए होता है, इसीलिए इस ‘हिन्द स्थान’ के ‘संस्कार’ और ‘संस्कृति’ ‘सनातन’ हैं| अभी ‘भारत’ एक राजनीतिक ‘राज्य’ है, लेकिन ‘हिन्द’ इस ‘अखंड भारत’ का पर्याय है|

डॉ० मोहन भागवत ने पिछले वर्ष के शताब्दी वर्ष के संबोधन में कहा - दुनिया को धर्म (धम्म) का मार्ग अपनाना होगा| यह ‘धर्म’ पूजा –पंथ और कर्मकांड से परे है| यह धर्म और सम्प्रदाय अलग अलग चीज है| संघ का कार्य शुद्ध सात्विक प्रेम और निष्ठा पर आधारित है| भारत की परम्परा इसे ‘मध्यम मार्ग’ कहती है, और यही आज दुनिया की सबसे बड़ी आवश्यकता है|  सभी प्रकार के ‘रिलीजन’ से ऊपर ‘धर्म’ है| धर्म हमें संतुलन सिखाता है| हमें भी जीना है, समाज को भी जीना है और प्रकृति को भी जीना है| धर्म ही मध्यम मार्ग है, जो अतिवाद से बचाता है| धर्म का अर्थ मर्यादा और संतुलन के साथ जीना है| इसी दृष्टिकोण से ही विश्व में शांति स्थापित हो सकता है| ‘धर्म वह है जो हमें संतुलित जीवन की ओर ले जाए, जहां विविधता को स्वीकार किया जाता है और सभी के अस्तित्व को सम्मान दिया जाता है|

डॉ० मोहन भागवत के वैचारिक दृष्टिकोण में वैज्ञानिकता, तार्किकता, विवेकशीलता, वैश्विकता, एवं वैश्विक मानवता स्पष्ट और मजबूती से दिखती है| वर्ष 2017 के माह फरवरी में मध्य प्रदेश के एक रैली में डॉ० मोहन भागवत ने दवाब देकर कहा, “इस भारत देश में पैदा हुआ हर एक व्यक्ति हिन्दू है – इनमे से कुछ मूर्तिपूजक है और कुछ नहीं है| यहाँ तक कि मुसलमान भी राष्ट्रीयता से हिन्दू हैं, वे केवल विश्वास एवं आस्था से मुसलमान हैं| यहाँ ‘हिन्दू’ शब्द ‘हिन्द की मूल संस्कार और संस्कृति’ है| भारत माता के लिए उसके गोद में उत्पन्न सभी बच्चे एक समान हैं|

डॉ० भागवत के अनुसार संघ ‘किसी को ‘कान्विंस’ (सहमत) करने में नहीं, बल्कि अपने कार्य को मनोयोग से करने में विश्वास रखता है| इसे अपनी बातों से किसी को 'कन्विंस' करने यानि 'मनवा' लेने में विश्वास नहीं है| संघ का लक्ष्य है कि ‘भारत विश्व में अग्रणी स्थान पाए| यह अग्रणी स्थान वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए नहीं, बल्कि मानवता में योगदान देने के लिए है|

डॉ० भागवत मानते हैं कि आज दुनिया एक –दूसरे के बहुत करीब आ गया है, इसलिए अब वैश्विक स्तर पर सोचना जरुरी हो गया है| आज से सौ साल पहले वैश्विक जगत में ‘राष्ट्रीयता’ सबसे प्रमुख था| आज से सौ साल पहले भारत ब्रिटिश साम्राज्यवाद का एक मुख्य उपनिवेश रहा| आज भारत विश्व का सबसे प्रमुख उभरता राष्ट्र है| आज मानवता के एक होते हुए भी उसके अनेक रुप और रंग है और इन्हीं विविधताओं से विश्व की सुन्दरता बढती है| भारत जब विश्व गुरु बनेगा, तभी वह अपना वास्तविक योगदान मानवता को दे सकेगा| और अब उसका समय आ गया है|

‘हिन्दू’ शब्द बाहरी पहचान का प्रतीक नहीं, बल्कि यह ‘हिन्द की संस्कृति’ का प्रतीक है| यह एक व्यापक मानवशास्त्रीय दृष्टिकोण है| भारत की परम्परा व्यक्ति, समाज और सृष्टि को एक –दूसरे से जुड़ा और प्रभावित मानती है| ‘हिन्दू’ इस ‘हिन्द की संस्कृति’ का प्रचलित एवं परम्परागत नाम है| 

डॉ० भागवत मानते हैं कि - स्वतन्त्रता मिलने के बाद समाज को जिस प्रकार से प्रबोधित करना चाहिए था, वैसा नहीं हुआ| यह स्पष्ट है कि ‘राष्ट्र –निर्माण’ के लिए केवल आन्दोलन, संगठन या नेता ही पर्याप्त नहीं है| समाज में रुढ़ियाँ, कुरीतियाँ, अंधविश्वास व्याप्त है और शिक्षा का अभाव बना रहा| समाज की कुरीतियों और दोष को दूर किये बिना स्वतंत्रता स्थायी नहीं हो सकती| डॉ० हेडगेवार ‘राजनीतिक स्वतन्त्रता’ का अर्थ समझते थे, इसीलिए ‘नागरिक स्वतन्त्रता’ के लिए इस ‘नागरिक संगठन’ ‘संघ’ की स्थापना की|  समाज की गुणात्मक उन्नति ही राष्ट्र निर्माण का मूल है| हर नागरिक की भागीदारी और हिस्सेदारी के बिना कोई भी सशक्त और समृद्ध राष्ट्र नहीं बन सकता है| संघ की स्थापना समाज को गुणात्मक रुप से बदलने और राष्ट्र को सशक्त बनाने का एक उपाय था| भारतीय परम्परा का मूल विचार ही है – ‘वसुधैव कुटुम्बकम’|

‘संघ कार्य’ का आधार किसी का विरोध नहीं है, और किसी के प्रति प्रतिक्रिया नहीं है| ‘संघ कार्य’ का आधार शुद्ध सात्विक प्रेम और करुणा है| इसी भाव से विविधता में एकता देखी जाती है| संघ केवल हिन्दू समाज के चिन्ह पर नहीं, बल्कि ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ के सिद्धान्त पर चलता है| स्वयंसेवक परिवार से लेकर गाँव, देश और विश्व तक अपनेपन की भावना का विस्तार करता है| संघ का यह भाव प्रत्येक स्वयंसेवक रोज जीता है, जिसे कोई भी प्रत्येक दिन संघ की शाखाओं में देख सकता है| उनका विश्वास है कि सब अपने हैं| यही जीवन और विश्व विकास का क्रम है|

डॉ० मोहन भागवत स्पष्ट रुप से कहते हैं कि भारत: एक ‘राज्य –राष्ट्र’ (State –Nation) है, नहीं कि एक ‘राष्ट्र –राज्य’ (Nation –State) हैं| हम सभी ‘हिन्दू राष्ट्र’ के अंग हैं| ‘भारत का राष्ट्र’ सत्ता या राज्य से नहीं, बल्कि ‘सांस्कृतिक और सामाजिक एकता’ से जुड़ा है| भारतीय राष्ट्र का आधार राज्य या कानून नहीं है, बल्कि यह भारतीय ऐतिहासिक सांस्कृतिक विरासत है| भारतीय राष्ट्र एक उपमहाद्वीपीय भौगोलिक क्षेत्र में ऐतिहासिक रुप में एक साथ रहने का परिणाम है| यह एक भूगोल और एक इतिहास की ‘सांस्कृतिक एकापन’ के प्रति निष्ठा का परिणाम है| यह भौगोलिक आधार प्राकृतिक है| इसकी जलवायु ‘मानसूनी’ है, जो एक अलग विशिष्टता रखती है| यह ‘मानसूनी जलवायु’ ही इसकी ‘आर्थिक एकापन’ को आधार देती है| आधुनिक विज्ञान और तकनीक ने इसे और व्यवस्थित कर दिया है| भारत या इस ‘हिन्द’ का राष्ट्र प्राकृतिक है, ऐतिहासिक है, भौगोलिक है, आर्थिक है और मानवीय प्रगति का आधार भी है| कोई भी प्रकृति के स्वभाव के विरुद्ध लम्बे समय तक प्रगतिशील और समृद्ध नहीं रह सकता है| डॉ० मोहन भागवत की इस अवधारणा को अच्छी तरह समझने के लिए  मैं इस ‘राज्य –राष्ट्र’ (State –Nation) का विस्तार से विश्लेषण एवं विवेचना कर रहा हूँ| 

हिन्दू राष्ट्र की अवधारणा पश्चिमी ‘राष्ट्र –राज्य’ (Nation –State) से भिन्न है| भारत एक ‘राज्य –राष्ट्र’ (State –Nation) है, लेकिन ‘राष्ट्र –राज्य’ (Nation –State) नहीं है| पश्चिमी ‘राष्ट्र –राज्य’ की स्थापना में एकल ‘राष्ट्रीयता’ प्रमुख होती है और वही उस राज्य का राजनीतिक आधार होता है| भारत में विविध संस्कृतियाँ एक साथ मिल कर सामासिक रुप में भारतीय संस्कृति को अभिव्यक्त करता है| भारत इन विविध समृद्ध संस्कृतियों के एकल पहचान के कारण एक राजनीतिक राज्य की आवश्यकता है| इसिलिर भारत एक ‘राज्य –राष्ट्र’ है|

"राष्ट्र-राज्य (Nation-State)" और "राज्य-राष्ट्र (State-Nation)" को समझने के लिए इस विश्लेषण को समझा जाय| भारत को एक "राष्ट्र-राज्य (Nation-State)" बनना चाहिए, या एक "राज्य-राष्ट्र (State-Nation)"? यह  "राष्ट्र-राज्य " और "राज्य-राष्ट्र" दो अलग-अलग राजनीतिक और सामाजिक - सांस्कृतिक अवधारणाएं हैं। लेकिन इसे समझने से पहले हमें देश, राज्य और राष्ट्र की अवधारणा को समझ लेना चाहिए, और इसके साथ ही इसकी बदलती गत्यात्मकता (Dynamism) की क्रियाविधि (Mechanism) को भी समझा जाना चाहिए। 

एक देश (Country) वह निश्चित भौगोलिक क्षेत्र होता है, जो अपनी आबादी की एक निश्चित सामाजिक एवं सांस्कृतिक विन्यास (बनाबट/ Matrix) या पहचान का बोध कराता है। अतः एक देश एक राज्य भी हो सकता है, और साथ ही एक राष्ट्र भी हो सकता है, यानि तीनों स्वरूप एक साथ भी हो सकता है, या नहीं भी हो सकता है। एक राज्य (State) एक निश्चित भौगोलिक क्षेत्र में एक स्थिर आबादी का एक निश्चित सरकार होती है और वह संप्रभु भी होता है। एक राष्ट्र (Nation) ऐतिहासिक रूप से गठित, लोगों का एक स्थिर समुदाय है, जो एक क्षेत्र, एक आर्थिक जीवन और एक आम एवं विशिष्ट संस्कृति में प्रकट मनोवैज्ञानिक संरचना के आधार पर बनता है। 

भारत 1947 से पहले भी एक देश था और आज भी एक देश है। लेकिन भारत 1947 से पहले एक राज्य नहीं था, क्योंकि भारत देश में सम्प्रभुता का अभाव था, जो राज्य के लिए एक अनिवार्य तत्व है। ज्ञातव्य है कि एक राज्य के आवश्यक तत्व में भौगोलिक क्षेत्र, स्थिर आबादी, सरकार और सम्प्रभुता शामिल होता है। भारत एक राष्ट्र के रूप में ब्रिटिश काल में उभरना शुरू हुआ था, और यह प्रक्रिया अभी भी चल रही है, मतलब इसके पहले भारत एक देश तो था, लेकिन एक राज्य भी नहीं था, और एक राष्ट्र भी नहीं था। स्पष्ट है कि उपरोक्त तीनों अवधारणाएँ अलग अलग तो हैं, परन्तु इनकी अवस्थाएँ एक दूसरे में रुपांतरित होने के लिए गतिशील भी रहती है। यह भी स्पष्ट है कि कोई एक देश वर्तमान में एक साथ सिर्फ एक देश ही हो सकता है, या तीनों अवस्था देश, राज्य और राष्ट्र का संयुक्त स्वरूप भी हो सकता है। सभी देश कालान्तर में राज्य तो बनना ही चाहते हैं, परन्तु कोई ‘राष्ट्र- राज्य’ ही बनता है, तो कोई ‘राज्य – राष्ट्र’। 

डॉ० मोहन भागवत की इस अवधारणा के सन्दर्भ में हमें यह जान लेना चाहिए कि उन्होंने ऐसा क्यों कहा? "राष्ट्र-राज्य " या "राज्य-राष्ट्र"? आपने देश और राज्य की अवधारणा को स्पष्टतया समझ लिया, क्योंकि यह दोनों ही एक तथ्यात्मक अवधारणा है। राष्ट्र की अवधारणा को स्पष्टतया समझ लेना थोड़ा कठिनतर होता है, क्योंकि यह अवधारणा मूलतः मानवीय भावनाओं पर आधारित एक ‘अमूर्त स्वरुप’ में होता है और इसीलिए इन भावनाओं के आधार कईं कारकों को अपने में समेटे हुए होता है। इन कारकों में सम्प्रदाय (जिसे अधिकतर लोग धर्म समझ लेते हैं), भाषा, संस्कृति, इतिहास बोध, क्षेत्र, आर्थिक और राजनीतिक एकता सबसे प्रमुख है। अब हम "राष्ट्र-राज्य " और "राज्य-राष्ट्र" को भी उदाहरण के साथ समझते हैं। 

जहाँ "राष्ट्र-राज्य" (Nation-State) में पहले एक राष्ट्र होता है और तब एक राज्य, वहीं "राज्य-राष्ट्र" (State-Nation) में पहले एक राज्य होता है और तब राष्ट्रों को महत्त्व होता है| "राष्ट्र-राज्य" (Nation-State) एक राष्ट्रीय राजनीतिक इकाई है, जो एक समान सांस्कृतिक, भाषा, इतिहास और जातीयता के साझा तत्वों वाले समूह से निर्मित होता है। और इसके साथ ही, यह  स्वतंत्र सम्प्रभुता की सरकार और भौगोलिक क्षेत्र से निर्मित एक ही इकाई के रुप में एक राज्य भी होता हैं। इसके स्पष्ट उदाहरण जापान, जर्मनी, इजरायल और फ्रांस हैं। ये सभी "राष्ट्र-राज्य" हैं, क्योंकि वहां के लोग समान सांस्कृतिक, भाषाई और ऐतिहासिक पहचान के साथ एकजुट हैं, और उनके पास अपनी स्वतंत्र सरकार है। इसकी मुख्य विशेषताओं में एकल राष्ट्रीय पहचान और एकल सरकार होती है।

एक "राज्य-राष्ट्र" (State-Nation) की अवधारणा "राष्ट्र-राज्य" से अलग हो जाता है। यह एक ऐसा राज्य है, जिसमें कई राष्ट्र या सांस्कृतिक समूह एक साथ शामिल होते हैं और वे एकसाथ एक राज्य की रूप में कार्य करते हैं। एक "राज्य -राष्ट्र" (State-Nation) में सम्पूर्ण अखंड भारत यानि समस्त जम्बूद्वीप  समाहित हो जाता है, या हो सकता है| इस 'जम्बुद्वीप -राष्ट्र' में कई सांस्कृतिक विविधता है, इसीलिए यह "राज्य-राष्ट्र" के लिए ही उपयुक्त होगा| ‘राज्य-राष्ट्र’ के स्पष्ट उदाहरण में भारत, संयुक्त राज्य अमेरिका, स्विट्जरलैंड आदि हैं, जहां विभिन्न सांस्कृतिक, भाषाई और जातीय समूह एक ही राज्य के अंतर्गत आते हैं। इसकी मुख्य विशेषताओं में विभिन्न राष्ट्रीय पहचान होते हुए भी एकल सरकार होती है, जो अपनी विशिष्ट विविधताओं को स्वीकार करते हुए एकता बनाए रखती है। इसकी अवधारणा राष्ट्रीयता की परिभाषा के साथ ही गत्यात्मक रहती है। 

इस प्रकार, "राष्ट्र-राज्य" में एक राष्ट्र और एक राज्य का संयोजन होता है, यानि दोनों एक ही होता है। वहीं "राज्य-राष्ट्र" में विभिन्न राष्ट्रीयता यानि विभिन्न सांस्कृतिक आधार को एक राज्य में संगठित होना शामिल होता है, और ऐसा एक निश्चित भूगोल पर ऐतिहासिक प्रक्रियाओं के द्वारा होता हुआ रहता है। हालांकि दोनों अवधारणा गलत नहीं है, परन्तु "राज्य - राष्ट्र" की अवधारणा आज वर्तमान वैज्ञानिक युग में ज्यादा सफल, समुचित और व्यवहारिक माना जाता है। अपनी विशिष्ट शर्तों के कारण राष्ट्र - राज्यएक छोटे भौगोलिक क्षेत्र, छोटी आबादी, और एक निश्चित संस्कार में सीमित होते हैं| वहीं राज्य राष्ट्रका भौगोलिक क्षेत्र विस्तृत होता है, अपने में विविध आबादी को समाहित किए होती है, उसमे सांस्कृतिक विविधताएँ होती है, और इसका मूल एवं प्राथमिक आधार मानवीयताही होता है| यूरोप के कई "राष्ट्र-राज्यों" में ‘यूरोपीय संघ’ की स्थापना इसी ‘राज्य-राष्ट्र’ की अवधारणा को मजबूत करती है| ऐसे ही राज्य वैश्विक शक्तियाँ बनती है, या बन सकती है|

आज की बाजार की शक्तियां, यानि आर्थिक शक्तियां, यानि ऐतिहासिक शक्तियां "राज्य- राष्ट्र" के पक्ष में जा रही है, क्योंकि यह "मानवता" को उभार रही है और अन्य सांस्कृतिक पहचान को उपेक्षित कर रही है। इस पर ध्यान दिया जाना चाहिए। यह एक गम्भीर ऐतिहासिक प्रक्रिया है, जिस पर भारत में अभी तक विमर्श शुरु नहीं हुआ है।लेकिन इस मुद्दे पर 'संघ' का मत स्पष्ट है, जिसे डॉ० मोहन भागवत 'राज्य -राष्ट्र' की अवधारणा में व्यक्त करते हैं|

यदि कोई इस "राज्य- राष्ट्र" अवधारणा के विरोधी हैं, तो इसका अर्थ यह हुआ कि वह 'राष्ट्र- राज्य' की अवधारणा के समर्थक हैं। इसके साथ ही यह भी स्पष्ट अर्थ निकलता है कि वह व्यक्ति विभिन्न राष्ट्रीयताओं के सह - अस्तित्व के विरोधी हैं। लेकिन इनमें बहुत सी राष्ट्रीयताएँ वैश्विक स्तर की हैं, सशक्त भी है, संपन्न भी है, बौद्धिकता के स्तर में उच्चतर भी है, और बहुलता में भी है, और इसीलिए आप इसके अस्तित्व एवं सह- अस्तित्व से इंकार नहीं कर सकते। सह - अस्तित्व के विरोध की किसी की ऐसी भावना भारत के न्यायिक चरित्र को नुकसान भी पहुंचाती है, और भारतीय गरिमामयी पौराणिक विरासत की छवि को भी दागदार बनाती है। 

अब आप इस आलेख में डॉ० मोहन भागवत के राष्ट्र की अवधारणा को समझ गए होंगे|

आचार्य प्रवर निरंजन जी

अध्यक्ष, अन्तर्राष्ट्रीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान| 

बुधवार, 13 मई 2026

भारतीय राष्ट्र –निर्माण में इतिहास की समस्याएँ

‘राष्ट्र’ के निर्माण में ‘इतिहास’ की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है| ‘राष्ट्र’ कोई ‘देश’ नहीं होता है| यह ‘राष्ट्र’ ‘ऐतिहासिक एकापन (Historical Oneness) की मनोदशा’ होता है, जो ऐतिहासिक काल में एक साथ रहने से तैयार होता है| यह ‘राष्ट्र’ सभी लोगों की भावना पर आधारित होता है, इसीलिए भारतीय संविधान की उद्देशिका में ‘राष्ट्र की एकता और अखंडता’ के सुनिश्चयन की बात की गयी है, किसी देश या राज्य या प्रान्त की बात नहीं की गयी है| किसी ‘राष्ट्र –निर्माण’ को उसका ‘भूगोल’ और ‘इतिहास’ आधार देता है, अर्थात उस निश्चित भूगोल पर इतिहास कार्य कर उसे ‘राष्ट्र’ बनाता है| भूगोल को सामान्यत: ‘प्रकृति’ आकार देता है, लेकिन इतिहास को समकालिक ‘आर्थिक साधन एवं शक्तियाँ’ बनाता है और उसे बदलता भी रहता है| ‘आर्थिक साधन एवं शक्तियों’ को ‘तकनीक’ और ‘बाजार’ निर्धारित करता है, जिन्हें ‘बाजार के साधन एवं शक्तियाँ’ कहते हैं|

‘इतिहास’ ही ‘संस्कार’ और ‘संस्कृति’ को आकार देता है| ‘इतिहास’ ही ‘वर्तमान और भविष्य’ को समझता और समझाता है, क्योंकि ‘इतिहास’ ही वर्तमान और भविष्य का ‘जड़’ (Root) या ‘नींव’ (Foundation) होता है| वर्तमान और भविष्य की समस्यायों को समझने और उसके समाधान पाने में ‘इतिहास’ का समझ बहुत महत्वपूर्ण है| भारत की सभी सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक समस्यायों का समाधान ‘इतिहास’ की वैज्ञानिक, तथ्यगत और तार्किक व्याख्या में है| इसीलिए सभी ‘शासक वर्ग’ इतिहास की ऐसी ‘वैज्ञानिक व्याख्या’ से बचते हैं| ‘सत्ता’ यानि ‘शासक वर्ग’ अपने वर्चस्व की निरन्तरता को बनाये रखने के लिए इतिहास का नकारात्मक उपयोग करता है, जबकि ‘राष्ट्र –निर्माण’ के लिए इतिहास की सकारात्मक व्याख्या होनी चाहिए| साम्राज्यवादियों का अपना निहित उद्देश्य था, यह समझ में आता है, लेकिन भारतीय बौद्धिक वर्ग को यह सब समझना चाहिए| भारतीय राष्ट्र के निर्माण में इसी समझ के अभाव में बाधित पडा हुआ है| इसके बिना भारत एक सशक्त और समृद्ध राष्ट्र बन ही नहीं सकता है|

‘इतिहास’ का अत्यधिक महिमामंडन करना भी ‘वर्तमान’ को कमजोर कर सकता है, जो ‘राष्ट्र’, ‘संस्कृति’ और ‘संस्कार’ को गलत दिशा दे सकता है| यह सदैव याद रखना चाहिए कि ‘स्वर्ण –युग’ सदैव ‘भविष्य काल’ में आता है, और यही ‘आशावादी’ दृष्टिकोण है| ‘स्वर्ण –युग’ किसी ‘पुरातन’ में कभी नहीं हो सकता है| किसी इतिहास में ‘स्वर्ण –युग’ मान लेना भी मानवता के भविष्य के लिए लिए घातक होता है| ‘सामूहिक भावनात्मक स्मृतियाँ’ को इतिहास नहीं माना जाना चाहिए| सभी इतिहास को अवश्य ही तथ्यों और वैज्ञानिक विधियों की तार्किकता और विवेकशीलता पर आधारित होना चाहिए| अधिकांश लोग इतिहास को समझने के बजाय ‘मान लेते’ हैं| ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि सामान्य जन गण में ‘आलोचनात्मक चिन्तन’ की समझ नहीं होती है| यदि ‘समझ’ होती है, तो इसके लिए आवश्यक ‘क्षमता’, ‘योग्यता’ और ‘स्तर’ नहीं होता है| चूँकि इसके लिए समय, वैचारिकी और क्षमता चाहिए होता है, इसीलिए सामान्य जन गण को ‘भावनात्मक कहानियो’ और ‘आख्यानों’ को इतिहास ‘मान लेने’ में ज्यादा आसानी होती है|

चूँकि इतिहास पुरातन होता है और पुरातनता की अवधि ही ‘इतिहास की गहराइयों’ को निर्धारित करता है, इसीलिए इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण काल ‘प्राचीन काल’ का होता है| ‘प्राचीन काल’ का इतिहास ही ‘संस्कृति’, ‘संस्कार’ और ‘राष्ट्र’ की सबसे गहरी ‘जड़े’ होती है| इसलिए भारतीय राष्ट्र के निर्माण में ‘प्राचीन इतिहास’ ही सबसे प्रमुख है, जिससे सम्बन्धित समस्यायों को समझना अनिवार्य है|

भारतीय राष्ट्र के निर्माण में इतिहास की सबसे प्रमुख समस्या यह है कि सामान्य जन गण सहित इतिहास के अधिकतर विद्वान् भी इतिहास के ‘समकालिक होने की अनिवार्यता’ और ‘समकालिक होने की प्रक्रिया’ को नहीं समझते हैं| ऐसे लोगों को इतिहास की क्रिया विधियों की समझ नहीं होती है, या वे सब कुछ जानते और समझते हुए भी अपने वर्गीय हितों में ‘नासमझ’ बने रहते हैं| ‘इतिहास के समकालिक होने’ की प्रक्रिया में जब भी इतिहास का कोई पुनर्लेखन होता है, तब पहले की उपलब्ध इतिहास को समकालिक आवश्यकताओं, परिस्थितियों और शक्तियों के अनुरुप अनुकूलित होना पड़ता है| इसी इतिहास के अनुरुप ही प्राचीन ‘संस्कारों’ और ‘संस्कृतियों’ को भी ‘समकालिक’ होना होता है| ‘संस्कार’ और ‘संस्कृति’ एक ही साथ ‘जड़’ भी होता है और ‘गतिशील’ भी होता है, जैसे एक पेड़ का जड़ और तना ‘जड़’ रहता है और ‘फुनगियाँ’ लहराती रहती है|

इतिहास, संस्कार और संस्कृति को अपने समय के ‘समकालिक’ होना हर काल की अनिवार्यता होती है| इसीलिए कोई भी इतिहासकार कोई ‘अन्तिम इतिहास’ नहीं लिख सकता है, लेकिन हर बार ‘उपलब्ध इतिहास’ को या तो रद्द कर सकता है या संशोधित करता रहता है| प्राचीन भारत का अधिकांश उपलब्ध इतिहास को मध्य कालीन सामन्ती आवश्यकताओं, परिस्थितियों, व्यवस्थाओं और शक्तियों के अनुरुप ‘समकालिक’ होना पड़ा| यह इतिहास लेखन कागज के आविष्कार होने और भारत में इसके अति प्रचालन में आने के बाद ही शुरु हुआ| भारत में कागज़ का बहु –प्रचालन मध्य युग के सामन्ती काल में ही हुआ, और इसीलिए भारत के प्राचीन इतिहास को मध्य युगीन सामन्ती शक्तियों, आवश्यकताओं, परिस्थितियों, और व्यवस्थाओं के अनुकूल होना पड़ा| इस तरह, भारत का प्राचीन इतिहास पूरी तरह ‘समकालिक’ होकर ‘सामन्ती चरित्र’ का हो गया|

आज भी प्राचीन भारत का यही इतिहास उपलब्ध है, जो मूल अवस्था में नहीं है| इन्हें समझने और उसमे यथा आवश्यक संशोधन और परिमार्जन करने की अनिवार्यता है| इस ‘संशोधन’ या ‘परिमार्जन’ के बिना भारत कभी भी एक सशक्त राष्ट्र नहीं बन सकता है| प्राचीन भारत के इतिहास को आज विकृत स्वरुप में उपलब्ध होना इसलिए कहना पड़ रहा है, क्योंकि इस इतिहास में कई तथ्यगत साक्ष्यों, सामान्य तार्किकताओं, और वैज्ञानिकताओं का स्पष्ट और प्रत्यक्ष अभाव है|

भारतीय राष्ट्र –निर्माण में इतिहास की यही समस्या सबसे बाधा बनी हुई है, जो भारत की सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक एवं राजनीतिक विकास में स्पष्ट बाधा के रुप में दिखती  है|  

आचार्य प्रवर निरंजन जी

अध्यक्ष, अन्तरराष्ट्रीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान|

मंगलवार, 12 मई 2026

भाषा का उद्विकास शक्ति और आधिपत्य के लिए होता है

भाषा का उद्विकास (Evolution) एक बहुत ही जटिल और सतत प्रक्रिया है। यह किसी एक व्यक्ति या संस्था द्वारा निर्मित नहीं होती, बल्कि समाज, संस्कृति, भूगोल, इतिहास और मानवीय व्यवहार के साथ धीरे-धीरे विकसित होती है। इसका उद्विकास ही शक्ति और आधिपत्य करने के लिए होता है| मानव अपनी शुरुआती अवस्था में इसके द्वारा प्रकृति और पशुओं  पर आधिपत्य करना चाहा| फिर उसने इसका उपयोग क्रमश: दूसरे मानव पर, दूसरे समाज पर और दूसरी संस्कृतियों पर आधिपत्य करने के लिए किया| ‘अधिपत्य’ करने के लिए एक विशेष और विशिष्ट ‘शक्ति’ प्राप्त करना होता है, और यह सब भाषा के सहयोग से ही संभव होता है|

इस तरह यह स्पष्ट होता है कि भाषा केवल संचार का माध्यम नहीं है, बल्कि यह शक्ति (Power), अर्थ-निर्माण (Meaning-making), और सामाजिक नियंत्रण (Hegemony) का उपकरण हो जाती है। भाषा का उद्विकास एक प्राकृतिक, सामाजिक और ऐतिहासिक प्रक्रिया है, जिसमें समाज अपनी भाषा बनाता है, उसकी संस्कृति उस भाषा को आकार देती है और समय –काल उस विशिष्ट भाषा को अपने अनुकूल कर बदलता रहता है| भाषा के अनुकूलन में अब ‘राज्य –शक्ति’ भी शामिल हो गया है|

सबसे पहले हमें ‘ज्ञान’, ‘बुद्धि’ और ‘प्रज्ञा’ को स्पष्ट अन्तर के साथ समझ लेना चाहिए| भाषा की शुरुआत तत्कालीन परिस्थितियों में ऊर्जा के स्तर में एक 'बदलाव' से होती है, जो हमारी संवेदी अंगों द्वारा संग्रहीत एवं उनकी अंतर्क्रियाओं द्वारा प्रस्करित (Processed) होती है, जिसे ‘उत्तेजना’ (Excitation) कहते है| मानव जाति इस प्रक्रिया के लिए जैवकीय रुप में सक्षम है| यह विशेष एवं विशिष्ट ‘उत्तेजना’ एक खास 'इशारा' (Caveat) देता है। इन विशेष एवं विशिष्ट इशारों के समेकन से एक विशेष एवं विशिष्ट 'चिन्ह' (Symbol) बनता है। उन चिन्हों को 'संकेत' (Signal) कहा जाता है‌। इन्ही विशेष एवं विशिष्ट ‘संकेतों’ के व्यवस्थित और संगठित प्रेषण से एक निश्चित 'एलान' (Annunciation) होता है, जिसे 'सूचना' (Information) कहा जाता है। भाषा के सन्दर्भ में यह ‘संकेत’ ही ‘ध्वनि’ और यह ‘सूचना’ ही ‘शब्द एवं वाक्य’ होता हैं| इन्हीं समस्त ‘सूचनाओं’ के द्वारा किसी भी ‘चीज़’ या ‘क्रियाविधि’ को यथास्थिति में समझना संभव होता है|

किसी भी ‘चीज़’ या ‘क्रियाविधि’ को यथास्थिति में समझना ही 'ज्ञान' (Knowledge) है। सामान्यत: सामान्य लोगों की समझ किसी ‘चीज़’ या ‘क्रियाविधि’ को  ‘उसकी यथास्थिति’ से नहीं होकर उसके प्रति उसके ‘पूर्वाग्रहों’ से होती है| इसीलिए यह कहा जाता है कि किसी व्यक्ति का ‘सत्य’ निरपेक्ष नहीं होकर उसके ‘पूर्वाग्रहों’ का प्रतिविम्ब’ होता है| लोग इसी ज्ञान का उपयोग अपनी समझ के अनुसार करते हैं और तब यह ‘ज्ञान’ ही ‘बुद्धि’ (Intelligence) कहलाता है। जब इस ‘बुद्धि’ का उपयोग ‘मानवता’ और ‘मानवता के भविष्य’ के लिए करते हैं, तो वही ‘ज्ञान’ 'प्रज्ञा' (Wisdom) बन जाता है। ‘भाषा’ का उद्विकास इसी ‘ज्ञान’ के सम्प्रेषण के लिए होता है, जिसका मौलिक उद्देश्य ‘शक्ति’ प्राप्त करना होता है|

‘भाषा’ के उद्विकास को चार्ल्स डार्विन के ‘प्राकृतिक (जैवकीय) उद्विकास’ और हर्बर्ट स्पेंसर के ‘सामाजिक उद्विकास’ के बिना समझा ही नहीं जा सकता है| भाषा का उद्विकास एक ‘जीवित प्रणाली’ की तरह है, और यदि किसी ‘भाषा’ की उत्पत्ति की व्याख्या इससे ‘असहमति’ जताती है, उस ‘भाषा के उद्विकास’ की व्याख्या में एक गहरी एवं सुनियोजित साजिश छिपी हुई है|

भाषा का जन्म और विकास मनुष्यों के आपसी संचार से होता है। जब लोग एक साथ रहते हैं, तो वे अपने अनुभवों, आवश्यकताओं और भावनाओं को व्यक्त करने के लिए संकेत’ और ‘शब्द’ विकसित करते हैं। समय के साथ ये ‘संकेत’ और ‘शब्द’  व्यवस्थित ‘भाषा’ बन जाते हैं, जैसा कि ऊपर उद्विकास की वैज्ञानिक व्याख्या से स्पष्ट है| प्रारंभ में केवल ‘ध्वनियाँ’ थीं, फिर वे ‘ध्वनियाँ’ अर्थ से जुड़ने लगीं और ‘शब्द’ बने। इस अवस्था की भाषा को ‘प्राकृतिक अवस्था की भाषा’ अर्थात ‘प्राकृत’ कहते हैं| जैसा कि इस शब्द ‘प्रा’ (Pre) और ‘कृत’ (Creation) से स्पष्ट होता है कि यह पहले की अवस्था की भाषा है| ऐसी अवस्था की भाषा 'बोली' के नाम से जाना जाता है। 

जब किसी भाषा को अपने सम्प्रेषण में एक निश्चित अर्थ देना होता है, तब इसके लिए कुछ निश्चित नियम निर्धारित करना अनिवार्य हो जाता है| इन नियमों को ही व्याकरण (Grammar) कहा गया| इससे भाषा अधिक संगठित और स्पष्ट हुई। तब ‘प्राकृत’ भाषा संवर्धित होकर उस समाज, व्यवस्था (सरकार) और संस्कृति की ‘पालक’ यानि ‘पालने वाली’ भाषा बन गयी| इस ‘पालक’ यानि ‘पालने वाली’ भाषा को ही ‘पालि’ या ‘पाली’ भाषा कहा गया|भाषा के इस सफर में 'बोली' अब साहित्य और राजकीय भाषा बन जाता है। यह भाषा जब ‘और उन्नत एवं समृद्ध’ होकर ‘संस्कारित’ हो गयी, तब यह ‘भाषा’ ‘और सम्मानित’ होकर नए ‘नाम’ से नामित हो गयी| यह 'व्याख्या' विश्व के सभी भाषाओँ के लिए ‘प्राकृतिक उद्विकास’ और ‘सामाजिक उद्विकास’ के स्थापित सिद्धांतों के अनुरुप है, इसलिए यह व्याख्या वैज्ञानिक और विवेकपूर्ण है| यदि कोई भाषा किसी पूर्व से स्थापित एवं जटिल भाषा के विखंडन की प्रक्रिया से उदित हुआ है, तो प्रश्न यह भी है कि “उस पूर्व से स्थापित एवं जटिल भाषा” की उत्पति की व्याख्या ‘प्राकृतिक उद्विकास’ और ‘सामाजिक उद्विकास’ के स्थापित सिद्धांतों के अनुरूप है और वह क्या है? किसी भी ‘दैवीय उत्पत्ति’ की व्याख्या को वैश्विक जगत नहीं स्वीकार करता है|

किसी भी भाषा पर संस्कृति, धर्म, राजनीति, इतिहास, भूगोल, विज्ञान एवं तकनीक का गहरा प्रभाव पड़ता है। आक्रमणों, व्यापार और प्रवास के कारण नई शब्दावली जुड़ती गई| अन्य भाषाओं के संपर्क से शब्दों और संरचनाओं का आदान-प्रदान होता रहा है। नई तकनीक और जीवनशैली के साथ नए शब्द आते हैं| इन सभी से उच्चारण और प्रयोग भी बदलता रहा है| इससे पुराने शब्द अप्रचलित होते गए|

भाषा का विकास सिर्फ सत्य की खोज के लिए नहीं होकर यह मानव की आवश्यकता और शक्ति प्राप्त करने की अभिव्यक्ति के लिए होता है। भाषा का विकास वास्तविकतासे नहीं, बल्कि मानव की कल्पना और उपयोगिता से होता है। मनुष्य अपनी शक्ति स्थापित करने के लिए उसका अर्थ गढ़ता है| भाषा उसी प्रक्रिया की अभिव्यक्ति का माध्यम है| जो समूह शक्तिशाली होता है, वह शब्दों के अर्थ अपनी हितो को ध्यान में रख कर तय करता है, जैसे ‘अच्छा’, ‘बुरा’, ‘नैतिक’, ‘अनैतिक’ जैसे शब्द उसी के अनुसार बदलते हैं। भाषा कमजोर और शक्तिशाली वर्गों के ऐतिहासिक संघर्ष से विकसित हुई और यहाँ यह भाषा ‘मूल्यों की राजनीति’ बन जाती है|

आप भाषा के उद्विकास को सीधे-सीधे सत्ता और समाज के नियंत्रण से जोड़ सकते हैं। समाज में जो ‘शासक वर्ग’ होता है, वह केवल ‘बल’ से नहीं, बल्कि भाषा और विचारों के माध्यम से भी शासन करता है| इस तरह ‘भाषा’ भी वर्चस्व (Hegemony) का उपकरण बन जाता है| तब भाषा का उद्विकास इस तरह कराया जाता है कि ताकि वह शासन करने वाला वर्ग अपनी विचारधारा को ‘सामान्य’ और ‘सहज’ बना सके| तब वह ‘भाषा’ ही सामान्य जन गण की सामान्य बुद्धि (Common Sense) बन जाती है| इस तरह ‘भाषा’ उस समाज के जन गण की ‘सामान्य संस्कृति’ हो जाती है| इस तरह. यह ‘प्राकृतिक उद्विकास’ नहीं होकर ‘सत्ता’ द्वारा नियमित उद्विकास’ हो जाता है| सामाजिक और सांस्कृतिक संस्थाएँ यथा ‘राष्ट्र’, ‘धर्म’, ‘विवाह’ आदि केवल शब्द नहीं हैं, बल्कि ये वैचारिक संरचनाएँ हैं, जो भाषा के माध्यम से स्थापित होती हैं| आप भाषा के माध्यम से ही समाज को दिशा दे सकते हैं| भाषा ही ‘मानव –मूल्य’ गढ़ते हैं|

स्पष्ट है कि भाषा सिर्फ ‘प्राकृतिक रुप से विकसित’ ही नहीं होती, बल्कि यह ‘शक्ति’ और ‘आधिपत्य’ के लिए भी विकसित की जाती है।

आचार्य प्रवर निरंजन  जी

अध्यक्ष, अन्तर्राष्ट्रीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान|

सोमवार, 4 मई 2026

कौन सा राजनीतिक दल जल्दी समाप्त हो जाता है?

भारत में राजनीतिक दलों के अस्तित्व और उसकी निरंतरता का विश्लेषण करना बहुत सहज और सरल नहीं है| इसीलिए इन राजनीतिक दलों के भविष्य के सम्बन्ध में कोई ठोस निष्कर्ष निकलना भी सरल और साधारण नहीं होता है| इसी कारण, भारत में बहुत से तथाकथित ‘चुनावी विशेषज्ञ’ (Psephologist) हवा –हवाई साबित होते हैं| इन तथाकथित ‘चुनावी विशेषज्ञों’ का इन राजनीतिक दलों के सम्बन्ध में सारे आकलन ध्वस्त हो जाते हैं| दरअसल ये ‘चुनावी विशेषज्ञ’ सांखियकी (Statistics), जनमत (Public Opinion Poll) के संग्रहण एवं सम्बन्धित ऐतिहासिक चुनावी आंकड़ों के नाम पर ‘आंकड़ों की बाजीगिरी’ कर सस्ती लोकप्रियता बटोरते रहते हैं|  

यदि भारतीय राजनीतिक दलों की कुछ मौलिक विशेषताओं का विश्लेषण और समसामयिक मूल्याङ्कन किया जाय, तो कई नए गंभीर पक्ष उभरते हैं| भारतीय राजनीतिक दलों का वर्गीकरण कुछ राजनीतिक दलों के ‘मूलभूत सिद्धांतों’ के आधार पर किया जा सकता है| इन ‘मूलभूत सिद्धांतों’ की नैतिकता पर आप विवाद तो कर सकते हैं, लेकिन इन ‘मूलभूत सिद्धांतों’ की वास्तविकता को नकार नहीं सकते हैं| इन ‘मूलभूत सिद्धांतों’ के आधार पर भारत में कुछ ही राजनीतिक दल अब अपने वजूद में हैं| कांग्रेस भारत की आजादी के लक्ष्य के लिए एक आन्दोलन के रुप में उभर कर आई, लेकिन आज इसमें कोई “स्पष्ट और स्थिर सिद्धान्त” नहीं दिखता होता है| समय के सापेक्ष सिद्धांतों का बदल जाना कोई “स्पष्ट और स्थिर सिद्धान्त” नहीं है| ‘वंशवाद’ कोई सिद्धान्त नहीं होता| कांग्रेस का वर्तमान मूल्याङ्कन उपरोक्त सभी के सापेक्ष किया जाना चाहिए|

भारत की साम्यवादी (कम्युनिस्ट) पार्टियों को ‘मूलभूत सिद्धांतों’ के आधार पर स्थापित माना जाता रहा है| आज ये सभी साम्यवादी दल अपने अस्तित्व के लिए जूझने लायक भी नहीं रह गये हैं| विश्व में आज तक कोई भी राष्ट्र ‘साम्यवादी’ (Communist) नहीं बन सका, सभी ऐसे राष्ट्र ‘समाजवादी’ (Socialist) बन कर ही आगे बढ़ सके| वैसे आज विश्व में कोई भी राष्ट्र पूर्णत: समाजवादी या पूँजीवादी नहीं है| सभी राष्ट्र मिश्रित स्वरुप में हैं| वे ‘समाजवादी राष्ट्र’ ही आज सफल हुए, जिन्होंने ‘संस्कृति की क्रियाविधि और उसकी गत्यात्मकता’ को समझा और उसके अनुसार क्रियान्वयन किया| भारत की सभी साम्यवादी नेतृत्व इसी मौलिक समझ के अभाव में भारत –भूमि पर स्थायी रुप से पनप नहीं सके| ये नेतृत्व आज तक दार्शनिक एन्टोनियो ग्राम्शी, लेनिन और माओ त्से तुंग की ‘संस्कृति की क्रियाविधि और उसकी गत्यात्मकता’ को नहीं समझ सके| इसी कारण भारत की सभी साम्यवादी दल व्यावहारिकता में असफल हो गये|

भारत में कुछ ‘और राजनीतिक दल’ अपने तथाकथित सैद्धांतिक मुद्दों पर स्थापित तो हुए, लेकिन वे सभी दल वर्तमान में धन एवं अन्य दबाव में पारिवारिक जागीर बन कर ‘सिद्धांतविहीन’ हो गये| ऐसे राजनीतिक दल आज इतिहास का विषय हो चुके हैं या होने वाले हैं| इसी तरह, कुछ व्यक्तियों ने अपने राजनीतिक विशेष दल बनाए, जिनका वजूद ही किसी ‘स्थापित सिद्धांतों’ पर आधारित या अन्य आधार पर स्थापित राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया पर हुआ| ऐसे व्यक्तियों के ‘पाकेटी’ (अपनी पाकेट में रखे जाने योग्य) राजनीतिक दल अपनी विरुद्ध दल (जिनकी प्रतिक्रिया में वे वजूद में आए थे) के वजूद समाप्त होते ही ऐसे दलों को विलुप्त हो जाने की विवशता हो गयी| ये सभी राजनीतिक दल समसामयिक मुद्दों को ही उभार कर अपना अस्तित्व बचाने को प्रयासरत होते दिखते रहे हैं| स्पष्ट है कि ऐसे राजनीतिक दलों का अपना कोई मूल एवं स्थापित सिद्धांत नहीं होता है| ऐसे सभी राजनीतिक दल अपने मुद्दों के लिए किसी मुख्य सत्ताधारी दलों की “तथाकथित त्रुटियों” पर आधारित होते हैं| ऐसे सभी राजनीतिक दल सिर्फ प्रतिक्रिया देना जानते हैं, क्योंकि इनके पास अपना कोई मुद्दा, योजना और सिद्धान्त ही नहीं होता है| यदि मुख्य सत्ताधारी दल इन्हें कोई मुद्दा नहीं दे, तो ये राजनीतिक दल और उनके कार्यकर्ता बेरोजगार हो जाते हैं|

यह याद रहे कि कोई भी ‘व्यक्ति या परिवार आधारित राजनीतिक दल’ कुछ वर्षों या दशकों की राजनीति कर सकते हैं, या करते हैं, लेकिन वे उससे ज्यादा दूर नहीं चल सकते हैं| आप भारत की सभी व्यक्ति या परिवार आधारित राजनीतिक दलों’ का विश्लेषण और मूल्यांकन कर सकते हैं| सिर्फ छाती पीटने से गुजर गया समय वापस नहीं आ सकता है| लेकिन जो राजनीतिक दल ‘विचारों, सिद्धांतो, और मूल्यों’ पर आधारित होते हैं, वे लम्बी दूरी की राजनीति करते हैं| ‘विचारों, सिद्धांतो, और मूल्यों’ के समेकित एवं व्यवस्थित प्रतिरुप (Pattern) को ही ‘संस्कृति’ कहते हैं| इसीलिए कहा गया है कि जो राजनीतिक दल ‘संस्कृति’ की राजनीति करते हैं, वे सदियों और सहस्त्राब्दियों की राजनीति करते हैं| ठहरिए, इसे दुबारा पढ़िए| और इस कथन की व्यापकता को समझने की कोशिश करें|

भारतीय जन गण अपनी बौद्धिकता के स्तर और पेट भरने के निश्चिन्त उपाय के बाद ही राजनीतिक हो पाता है| ऐसे भारतीय जन गण को कोई भी राजनीतिक दल उसके धर्म और जाति एवं नैतिकता के नाम पर हवा में उड़ा सकता है| ऐसे भारतीय जन गण अपनी बौद्धिकता की अपेक्षा अपनी भावनात्मकता से ज्यादा संचालित और नियंत्रित होते हैं| आप हर राजनीतिक दलों के उम्मीदवारों के चयन में और दृश्य उद्देश्यों की प्रस्तुति में धर्म, जाति एवं नैतिकता के तत्व ही प्रमुख होते हैं| यह लोगों की मनोदशा के अनुरुप अनिवार्य भी हो जाता है|

कोई भी उपरोक्त सैद्धान्तिक विश्लेषण एवं मूल्यांकन के आधार पर भारतीय राजनीतिक दलों के भविष्य को समझ सकता है|

आचार्य प्रवर निरंजन  जी

अध्यक्ष, अन्तर्राष्ट्रीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान|

शुक्रवार, 1 मई 2026

इतिहास गतिशील क्यों होता है?

अधिकतर लोग यही जानते और मानते हैं कि इतिहास कोई स्थिर विषय –वस्तु है| वास्तव में इतिहास भी गतिशील होता है, जबकि इतिहास में ‘जड़ता’ का गुण भी होता है| दरअसल ऐसे लोग इतिहास को सिर्फ बीते हुए काल का विवरण समझते होते हैं, जबकि इतिहास जीवित लोगों के लिए होता है| इतिहास प्रेरणा देता है और मार्गदर्शन भी करता है| इतिहास को अवश्य ही वर्तमान लोगों का हितवर्धक होना होता है| इसीलिए यह कहा जाता है कि इतिहास वह ‘अतीत का विषय’ है, जो मानवीय बुद्धि का विकास करता है| कुछ लोग इतिहास को मानवीय स्वतंत्रता को ‘और संवर्धित’ करने वाला विषय बताते हैं| वास्तव में इतिहास का मूल और मुख्य उद्देश्य वर्तमान ‘मानवता को वैज्ञानिक बनाना’ होता है| ‘मानवता को वैज्ञानिक बनाने’ का अर्थ ‘मानवता को ‘प्राकृतिक न्याय’ दिलाना’ हुआ| ‘प्राकृतिक न्याय’ में स्वतन्त्रता, समता (Equality), समानता (Equity), बन्धुत्व और विकास शामिल होता है| यदि बीते हुए काल के आधार पर वर्णित सामग्री उपरोक्त उद्देश्य नहीं रखता है, तो वह इतिहास नहीं है; इतिहास के नाम ‘कुछ और’ है|

चूँकि ‘हर इतिहास समकालिक होता है, इसीलिए हर प्राचीन इतिहास को नए सन्दर्भ में लिखा जाता रहा है| भारत में तो प्राचीन इतिहास को जला देने और नष्ट कर देने की मध्ययुगीन परम्परा भी रही| भारत के शुरुआती मध्य काल में उसी प्राचीन सामग्री को जलाने और नष्ट करने से पहले उसे नए स्वरुप में संपादित कर दिया गया| सांस्कृतिक क्रांतियों के देश में कुछ ऐतिहासिक तत्वों को मिटाने एवं हटाने का प्रयास भी ‘इतिहास को ‘समकालिक’ बनाने’ की परम्परा का ही हिस्सा है| शुरुआती मध्ययुगीन भारतीय काल में प्राचीन इतिहास को नए उभरते हुए सामन्तवाद की आवश्यकताओं के अनुकूल समकालिक बनाया गया| ‘समकालिक बनाने’ की इस भारतीय पद्धति में प्राचीन काल की लकड़ी, पत्ता, चमड़ा, धातु –पत्तर और कपड़ा पर उपलब्ध एवं संरक्षित लिखित सामग्रियों को कागज़ पर नए संवर्धित भाषा में अनुवादित कर और संपादित कर दिया गया| फिर उन प्राचीन लिखित सामग्रियों को नष्ट भी कर दिया गया| इस तरह, ‘इतिहास को समकालिक’ होने की प्रक्रिया में ‘इतिहास’ को पुराने ऐतिहासिक आधार पर नयी आवश्यकताओं के अनुरुप बदल दिया गया| ऐसा सदैव होता रहा है और आगे भी होता रहेगा| इसीलिए यह कहा गया है कि आप किसी पुराने इतिहास को रद्द तो कर सकते हैं, लेकिन आप कोई अंतिम इतिहास नहीं लिख सकते हैं|

दरअसल इतिहास में दो तत्व होते हैं| पहला, ‘तथाकथित ऐतिहासिक तथ्य’, जिसका उपयोग कर एक ‘इतिहासकार’ कोई ‘इतिहास’ लिखता है| दूसरा, वह ‘इतिहासकार’, जो उन तथ्यों के आधार पर अपनी व्याख्या देता है| वह ‘तथाकथित ऐतिहासिक तथ्य’ तो ऐतिहासिक काल का होता है, जबकि वह ‘इतिहासकार’ वर्तमान का होता है| वह ‘तथाकथित ऐतिहासिक तथ्य’ भी स्वयं कुछ नहीं कहता है, बल्कि वह ‘इतिहासकार’ ही उन ऐतिहासिक तथ्यों के बहाने ‘सबकुछ’ बोलता है, जो वह कहना चाहता है| अर्थात वह ‘तथाकथित ऐतिहासिक तथ्य’ भी निर्जीव होते हुए भी सापेक्षिक हो जाता है| एक ‘इतिहासकार’ अपने ‘मन’ (Mind) का स्वामी होता है, जो अपनी इच्छाओं, आवश्यकताओं, सांस्कृतिक जड़ताओं, बौद्धिकता और बाजार की शक्तियों के अनुकूल ‘ढला’ (Casted) हुआ होता है| इस तरह, एक इतिहासकार भी समय के सापेक्षिक होता है| वह इतिहासकार जो भी इतिहास लिखेगा, वह इन्ही सीमाओं और आवश्यकताओं के ढाँचे में लिखेगा|

समय सदैव परिवर्तनशील है| परिस्थितियों और सन्दर्भों को बाजार के साधनों और शक्तियों के अनुरुप अनुकूलित होना पड़ता है| आधुनिक युग में बाजार के साधनों और शक्तियों को आर्थिक साधन एवं शक्ति कहते हैं| बदलते विज्ञान और तकनीक ही बाजार के साधनों और शक्तियों को नियंत्रित, संचालित और नियमित करता रहता है| वर्तमान के बाजार के साधनों और शक्तियों को ही इतिहास के काल में ‘ऐतिहासिक शक्तियाँ’ (Historical Forces) कहा जाता है| यही ऐतिहासिक शक्तियाँ ही ‘इतिहास’ और ‘इतिहास के काल’ को बदलता रहता है| इसीलिए सभी इतिहास को गतिशील रहना पड़ता है| हर इतिहास की वैज्ञानिक व्याख्या होनी चाहिए, जो आर्थिक साधनों और शक्तियों की क्रियाविधियों (Mechanism) पर आधारित होगी| इस आधार पर प्राचीन भारत का हर इतिहास ‘उलट –पलट’ हो जाता है| भारत की सभी सांस्कृतिक समस्यायों का यही समाधान है| इसके अलावा, परोसा गया अन्य सभी सभी प्राचीन इतिहास बनावटी है, काल्पनिक है|  

अब, समय आ गया है कि इतिहास को सभी जीवित व्यक्तियों के अनुकूल बनाया जाय| इसके लिए आधुनिक वैज्ञानिक विधियाँ ही पर्याप्त और सक्षम है| इस पर आधरित हर ऐतिहासिक व्याख्या चार्ल्स डार्विन के ‘प्राकृतिक उद्विकासवाद’ और हर्बर्ट स्पेंसर के ‘सामाजिक उद्विकासवाद’ के वैज्ञानिक सिद्धांत से समर्थित होगा| ऐसा ही ‘इतिहास’ (व्याख्या)  भारत की सभी सांस्कृतिक समस्यायों को समाधान देगा|

आचार्य प्रवर निरंजन  जी

अध्यक्ष, अन्तर्राष्ट्रीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान|

बुधवार, 29 अप्रैल 2026

कमजोर लोग नैतिक रुप से शक्तिशाली होना चाहते हैं

यह एक तथ्य है कि ‘कमजोर लोग’ नैतिक रुप से शक्तिशाली होना चाहते हैं| यह केवल एक सामाजिक तथ्य नहीं है, बल्कि एक गहरी मनोवैज्ञानिक और ऐतिहासिक प्रक्रिया है। ‘कमजोर लोग’ अपनी असमर्थता को ‘नैतिकता’ में बदलकर अपने अस्तित्व को अर्थ देता है, और उस अर्थ को उस सत्ता की शक्ति के विरुद्ध एक वैकल्पिक सत्ता खड़ी कर ‘आत्मुग्ध’ होता है| लेकिन यह भी ध्यान रहे कि हर नैतिकता महान नहीं होती है| अक्सर यह यह केवल कमजोरी की परिष्कृत अभिव्यक्ति होती है।

यहाँ यह समझ लेना महत्वपूर्ण है कि ये ‘कमजोर लोग’ कौन होते हैं? चूँकि ‘कमजोरी’ एक आन्तरिक मामला होता है, इसीलिए इसे एक सामान्य परिभाषा में डाल कर सामान्य जन को नहीं समझाया जा सकता है| फिर भी, यदि हम भारत में इसकी पहचान करना चाहें, तो हमें भारतीय संविधान का सहारा लेना होगा| भारतीय संविधान ‘कमजोर लोगो’ की पहचान का आधार ऐतिहासिक पिछड़ेपन, ऐतिहासिक विलगाव, वंचित रखे जाने, सामाजिक एवं शैक्षणिक पिछड़ेपन, और आर्थिक पिछड़ेपन को इसका आधार बनाया है| मूलत: ‘कमजोरी’ भौतिक संसाधनों के पर्याप्त उपयोग नहीं करने के अधिकार के रुप में अभिव्यक्त होती है| इसे कुछ लोग ‘व्यावहारिक सत्ता’ में कमजोर हिस्सेदारी से भी जोड़कर देखते हैं|

और यह ‘नैतिकता’ क्या होती है? यह नैतिकता (Morality) सही और गलत, उचित-अनुचित तथा अच्छे-बुरे व्यवहार के बीच अंतर करने वाले सिद्धांतों और मूल्यों का एक समुच्चय है। यह मानवीय आचरण के रुप में समाज में स्वीकृत मानदंडों के अनुसार निर्देशित करती है| ‘नैतिकता (Morality) के समुच्चय’ को ‘नीतिशास्त्र (Ethics) कहते हैं| इन स्वीकृत मानदंडों में प्रेम, ईमानदारी, करुणा, सत्य और अहिंसा आदि को शामिल किया गया हैं। इसे स्वैच्छिक माना गया है, लेकिन यही मनुष्य में मनुष्यत्व को स्थापित कर इसे एक पशु से अलग करती है।

हालाँकि नैतिकता को सामाजिक स्वीकृति मिली रहती है, लेकिन यह समय, काल और परिस्थिति के अनुसार बदलती (गतिशील) भी रहती है| इस नैतिकता में ‘जड़ता का प्रभाव’ (Inertial Effect) भी होता है, जो यह निर्धारित करता है कि किसी व्यक्ति को कैसा आचरण या व्यवहार करना चाहिए। यही नैतिकता मानवीय मूल्यों की जननी होती है| नैतिकता में ईमानदारी, करुणा, साहस, सम्मान, सहयोग और सहानुभूति जैसे मानवीय मूल्य शामिल हैं। यह व्यक्तिगत मूल्य और अंतरात्मा की आवाज बन जाती है, जो स्व-अनुशासन भी सिखाती है। इस नैतिकता से समाज में विश्वास, न्याय और सौहार्दपूर्ण संबंध बनता है। इस तरह, यह नैतिकता न केवल चरित्र का निर्माण करती है, बल्कि यह वह मार्ग प्रशस्त करता है,  जो लोगों को सुख की ओर ले जाता है और मानसिक शांति प्रदान करती है।‘ शक्तिशाली वर्ग’ नैतिकता के इन्ही गुणों का उपयोग अपने हितों में करता है|

लेकिन कमजोर लोग ऐसी नैतिकता बनाते हैं कि उनकी कमजोरियाँ ही उनके गुण बन जाए। ऐसे कमजोर लोग नैतिक रूप से शक्तिशाली होना चाहते हैं| कमजोर लोग भी इन्हीं कमजोरियों पर गौरान्वित होते हैं| इसीलिए ऐसे प्रचारों को ‘शक्तिशाली वर्ग’ का जबरदस्त समर्थन और सहयोग भी मिलता रहता है| मानव समाज में “शक्ति” (Power) ‘भौतिक शक्ति’, ‘आर्थिक शक्ति’, ‘बौद्धिक शक्ति’ और ‘नैतिक शक्ति’ के रुप में उपलब्ध रहती है| इनमें ‘नैतिक शक्ति’ को सबसे उच्च माना जाता है, क्योंकि यह ‘बाहरी बल’ के बजाय ‘आंतरिक दृढ़ता’ और सिद्धांतों पर आधारित होती है। यह भी विचारणीय है कि अक्सर जो लोग भौतिक या वास्तविक शक्ति में कमजोर होते हैं, वे स्वयं को नैतिक रूप से शक्तिशाली सिद्ध करने का प्रयास करते हैं|

यह प्रवृत्ति सिर्फ सामाजिक व्यवहार का नहीं है, बल्कि यह एक गहरे मनोवैज्ञानिक और ऐतिहासिक कारणों से जुड़ी हुई है| जब किसी व्यक्ति या समूह के पास भौतिक या संसाधन आधारित शक्ति नहीं होती, तब वह अपनी मानसिक स्थिति को संतुलित करने के लिए नैतिकता की शक्ति का सहारा लेता है। यह एक प्रकार का ‘बचाव तंत्र’ (Defence Mechanism) की तरह होता है| इस ‘बचाव तंत्र’ में अपनी किसी कमी को किसी अन्य गुण से पूरा करने की कोशिश की जाती है। तब नैतिकता केवल आदर्श नहीं रह जाती है, बल्कि यह शक्ति प्राप्त करने का एक साधन बन जाती है।

इतिहास में ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं, जब कोई समूह शोषित या वंचित होता है, तब वे अपनी पीड़ा को नैतिक ऊँचाई में बदल देना चाहता है| वे वह यह मानने लगता है कि उनकी कष्ट-सहिष्णुता उन्हें दूसरों से अधिक नैतिक बनाता है| वे इसलिए ‘गरीब’ हैं, क्योंकि ‘अमीर’ शोषक और पापी होते हैं| वे सत्ता से बाहर इसलिए हैं, क्योंकि इससे उन्हें कई तथाकथित ‘पाप’ करने से मुक्ति मिलती है| इन्हें मरने के बाद ‘स्वर्ग’ का ऐशो –आराम मिलता है और अमीरों को प्रताड़ना भरी ‘नरक’ भोगना होता है| यह सत्ता या शक्ति नहीं प्राप्त करने के अपराध-बोध (guilt) से मुक्ति दिलाता है| यह नैतिकता का प्रभाव होता है| इससे उन्हें सामान्य समकक्षीय जन गण से सामाजिक स्वीकृति और सहानुभूति मिलती दिखती है|

जो व्यक्ति सीधे शक्ति या सता का प्रयोग नहीं कर सकता, वह नैतिकता के माध्यम से दूसरों को नियंत्रित करने की ‘काल्पनिक कोशिश’ करता है| यह कमजोर लोगों का सता या शक्ति -नियंत्रण की अप्रत्यक्ष रणनीति होती है| वह दूसरों के व्यवहार को सहीऔर गलतके पैमाने पर कसता है| यह तंत्र (Mechanism) दूसरों को दोष देने पर केंद्रित होती है| इस आधार पर वह सामाजिक दबाव बनाता है| यह समझ या अवबोध (Concept) उन्हें भविष्य में अप्रत्यक्ष सत्ता (soft power) प्राप्ति का विकल्प देता है| लेकिन यह सब एक व्यक्ति को अपनी कमजोरी छिपाने का बहाना मात्र होता है|

कमजोर लोगों का नैतिक शक्ति की ओर आकर्षित होना स्वाभाविक है, क्योंकि यह उन्हें आत्मसम्मान और सामाजिक स्थान प्रदान करता है| कमजोर लोगों का यही प्राकृतिक स्वभाव ‘शक्तिशाली वर्ग’ (Power Group) और वर्चस्व (Hegemony) का भी एक महत्वपूर्ण उपकरण बन जाता है| समाज में सत्ता केवल भौतिक शक्ति से नहीं चलती, बल्कि सामान्य जन गण की सहज सहमति (consent) से चलती है| यह सहमति संस्कृति, विचार और नैतिकता के माध्यम से निर्मित किया जाता है| इसीलिए जो वर्ग या समूह भौतिक शक्ति में कमजोर होता है, वह नैतिक क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश करता है|

इस प्रकार नैतिकता ‘सत्ता और शक्ति’ का एक वैचारिक हथियार बन जाता है| कमजोर वर्ग इसी नैतिकता के सहारे शक्तिशाली वर्ग की वैधता (Legitimacy) को चुनौती देता है| कमजोर वर्ग अपने बुद्धिजीवियों के माध्यम से अपनी पीड़ा को नैतिक भाषा में व्यक्त करता है, अपने संघर्ष को न्यायसंगत बनाता है, और समाज में नैतिक सहानुभूति अर्जित करता है| इस तरह, यह नैतिकता केवल व्यक्तिगत सदाचार नहीं, बल्कि ‘सत्ता एवं शक्ति’ का सामूहिक रणनीति बन जाती है| इतिहास ‘अन्याय के खिलाफ नैतिक अपील’ से भरी हुई है|

नैतिकता अक्सर केवल ‘शक्ति’ प्राप्त करने की एक प्रक्रिया होती है, क्योंकि यह कल सत्ता में आने के बाद बदल सकता है| कमजोर लोगों का नैतिक शक्ति की ओर झुकाव एक स्वाभाविक और आवश्यक प्रक्रिया है, क्योंकि यही उनके पास उपलब्ध सबसे प्रभावी साधन है| यह भी समझना जरूरी है कि नैतिकता स्वयं सत्ता के खेल से अलग नहीं है| कमजोर की नैतिकताको केवल आदर्श नहीं, बल्कि यह नैतिकता संघर्ष का हथियार भी है और भविष्य की सत्ता का आधार भी| वास्तव में और व्यावहारिक रुप में, सता और सामान्य जन गण की नैतिकता अलग अलग होती है, लेकिन सभी को एक ही दिखती है|

कमजोर लोगों के भीतर ‘बदला लेने’ (Resentment) की एक गहरी भावना होती है| चूँकि वे सीधे ‘शक्तिशाली वर्ग’ का सामना नहीं कर सकते, इसलिए वे उसकी शक्ति को बुराघोषित कर देते हैं और अपनी कमजोरी को अच्छाबना देते हैं| नैतिकता के इसी मनोवैज्ञानिक प्रतिशोध (Psychological Revenge) का उपयोग सत्ता अपने पक्ष में करता है| कमजोर की नैतिकता दरअसल आत्म-सुरक्षा की रणनीति है| ऐसी नैतिकता सामान्य जन गण की सृजनात्मकता को दबाती है, और समाज को औसतपन (Mediocrity) की ओर ले जाती है|

भारतीयों की औसतपन का यही मूल आधार है| आप भी विचार कीजिए|

आचार्य प्रवर निरंजन  जी

अध्यक्ष, अन्तर्राष्ट्रीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान|

मंगलवार, 28 अप्रैल 2026

बिल्ली पालि या अंग्रेजी में क्या बोलती है?

एक बिल्ली हिंदी में बोले, या पालि, या संस्कृत में बोले, ‘म्याऊँ’ ही बोलती है| वह दूसरा कुछ बोलती ही नहीं है| यदि वह बिल्ली अंग्रेजी, या स्पेनिश, या जापानी भाषा में भी बोलेगी, तो भी वह ‘म्याऊँ’ ही बोलेगी| इससे उसे कोई अन्तर नहीं पड़ता है कि वह टाई और कोट पहने है, या लुंगी, या धोती, या कुछ और, वह बिल्ली ‘म्याऊँ’ ही बोलेगी| मतलब यह हुआ कि उसके क्षेत्र, भाषा, धर्म, राष्ट्रीयता, संस्कृति या ओहदे के बदलने से भी उसके ‘संस्कार’ की ‘बोली’ में कोई अन्तर नहीं पड़ता| उसके धनी हो जाने से भी उसकी ‘बोली’ नहीं बदलती है|

जरा ठहर कर विचार कीजिए| क्या ऐसा ही किसी ‘दो –पाया’ (Biped/ Two –legged) पशु के साथ भी होता है? हाँ, ऐसा ही ‘दो –पाया’ (मानव) पशु के साथ भी होता है| यदि उसकी ‘चेतना’ भी एक सामान्य पशु जैसा ही हो| यहाँ ‘दो –पाया’ पशु में वर्तमान सभी मानव प्रजाति भी शामिल हो जाता हैं| वर्तमान सभी मानव का जैवकीय नाम ‘होमो सेपियंस सेपियंस’ हैं, जो मूल रुप में एक ‘स्तनपायी’ (Mammal) पशु हैं| एक पशु और एक मानव में अन्तर सिर्फ इस बात का है, कि कोई चेतना की गुणवत्ता के साथ उसके किस स्तर पर है? एक स्तनपायी पशु में भी भिन्न भिन्न मात्रा की गुणवत्ता के साथ भिन्न भिन्न स्तर का ‘चेतना’ होता है|

‘चेतना’ को ही ‘समझदारी’ भी समझते हैं| इसी ‘चेतना’ के विकास के साथ ही वर्तमान मानव एक ‘होमो सेपियंस’ से एक ‘होमो सोसिअस’ (सामाजिक मानव) और एक ‘होमो फेबर’ (निर्माता मानव) बन सका| आज यह ‘होमो फेबर’ से बहुत आगे आ कर ‘होमो साईन्टिफिक' (वैज्ञानिक मानव) बन गया है| आज यह ‘वैज्ञानिक मानव’ भी बहुत आगे बढ़ गया है| यह ‘चेतना’ का गुणवत्ता और स्तर ही है, जो ‘होमो सेपियंस’ में विभिन्न गुणवत्ता और विभिन्न स्तर निर्धारित करता है| विश्व की सभी आबादी ‘होमो सेपियंस’ होते हुए भी एक गुणवत्ता और स्तर पर नहीं है, इसीलिए इनकी ‘समझ और  संस्कार की बोली’ भी एक नहीं है| सभी ‘बिल्लियाँ’ चेतना की गुणवत्ता और स्तर में समान होती हैं, इसीलिए सभी ‘बिल्लियाँ’ किसी भी क्षेत्र, भाषा, धर्म, राष्ट्रीयता, संस्कृति या ओहदे में भी एक ही ‘बोली’ – ‘म्याऊँ’ ही बोलती हैं|

चेतना की विभिन्न गुणवत्ता और स्तर ही मानव की प्रकृति, संस्कार, स्वभाव, अभिवृति, चरित्र, और समझदारी की ‘बोली’ को बदल सकता है| मात्र ‘शारीरिक क्रियाविधियों’ में समता हो जाने से ‘समझदारी की बोली’ नहीं बदल जाती है| कुछ लोग सभी ‘बिल्लियों’ और सभी ‘मानवों’ में अन्तर नहीं समझते और इसी कारण एक ही ‘स्तर’ की ‘नैतिकता’ का निर्माण और माँग करते हैं| ऐसे लोगों को ‘प्रतिष्ठा और अवसर’ की समता और ‘सामान्य समता’ में कोई अन्तर समझ में नहीं आता| भारतीय संविधान की उद्देशिका में ‘प्रतिष्ठा और अवसर’ की समता की चर्चा है, सिर्फ समता का नहीं। ऐसे लोग ‘समान स्तर’ की ‘नैतिकता’ के नाम पर अपना प्रकृति, संस्कार, स्वभाव, अभिवृति, चरित्र, और समझदारी को बदलने का प्रयास नहीं करते| ऐसे लोग अपनी और अपने लोगों की तमाम ‘उम्र’  ‘म्याऊँ’ ‘म्याऊँ’ करने में ही गुजार देते हैं, या उसे बरबाद ही कर देते हैं|  

कुछ लोग या अधिकतर लोग समझते हैं कि वे लोग अपनी और अपने लोगों की क्षेत्र, भाषा, धर्म, राष्ट्रीयता, और संस्कृति बदल कर अपनी और अपने लोगों की भविष्य बदलने वाले हैं, तो वे भ्रमों के स्वप्नों में गोते लगाते हुए होते हैं| ऐसे लोगों का कोई ‘भविष्य’ नहीं बदलता है, वैसे ‘खुशफहमी’ में रहने के लिए सभी स्वतंत्र हैं| ऐसे लोग पहले की तरह ‘म्याऊँ’ -‘म्याऊँ’ ही बोलते रहेंगे| यदि किसी को अपनी और अपने लोगों की ‘समझदारी और संस्कार की बोली’ बदलनी हो, तो वे अवश्य ही अपनी और अपने लोगों की प्रकृति, स्वभाव, संस्कार, अभिवृति, चरित्र, और समझदारी को बदल डालें| ऐसे लोग इसे समझें और किसी अन्य भ्रम –जाल में नहीं उलझें|

यदि किसी को क्षेत्र, भाषा, धर्म, राष्ट्रीयता, और संस्कृति बदलने से ‘संस्कार और समझदारी की बोली’ में कोई अन्तर दिखता है, या ऐसा होता समझ में आता है, तो यह स्पष्ट है कि वैसे लोगों को ‘संस्कृति की गत्यात्मकता’ (Dynamics of Culture) या ‘संस्कृति की क्रियाविधि’ (Mechanics of Culture) की समझ नहीं है| ऐसे लोगो की प्रकृति, संस्कार, स्वभाव, अभिवृति, चरित्र, और समझदारी को बदलने के लिए उन्हें सजग, सचेत, समर्पित और सुनियोजित प्रयास करने होते हैं| सिर्फ ‘नैतिकता की शक्ति’ या ‘समता की माँग के भरोसे कोई भविष्य नहीं बदलता है|’इसीलिए कहा गया है कि ‘कमजोर लोग नैतिक रुप में शक्तिशाली होना चाहते हैं|’

अधिकतर लोग ‘बाजार के साधनों और शक्तियों’ के प्रभाव से बदलते रहते हैं और वे समझते रहते हैं कि उनके क्षेत्र, भाषा, धर्म, राष्ट्रीयता, और संस्कृति बदलने के कारण ही उनकी स्थिति बदल रही है| ऐसे नासमझ ‘अंधभक्तों’ को समझाया भी नहीं जा सकता है, जब तक वे अपने को ‘पूर्ण एवं अन्तिम ज्ञानी’ होने का भ्रम नहीं छोड़ेगें| ऐसा ही समझ कुछ सामाजिक और सांस्कृतिक नेतृत्व भी रखते हैं| इसका यह अर्थ नहीं हुआ कि वे ऐसा सामाजिक और सांस्कृतिक बदलाव का कोई प्रयास करें ही नहीं| लेकिन वे अपनी सफलताओं के मूल्यांकन में बाजार की आर्थिक साधनों और शक्तियों के प्रभाव का ध्यान अवश्य ही ध्यान में रखें|

अन्यथा, वे भी सामान्य ‘बिल्लियों’ की तरह ‘म्याऊँ’ ‘म्याऊँ’ ही बोलते रहेंगे| ऐसे लोग ही अपनी और अपने लोगों का समय, संसाधन, ध्यान, समर्पण, वैचारिकी और ऊर्जा ‘गलत’ दिशा में बरबाद करवाते रहेंगे| इससे ‘बिल्ली को कोई अन्तर नहीं पड़ता है कि वह टाई और कोट पहने है, या लुंगी, या धोती, या कुछ और; वह’ बिल्ली’ ‘म्याऊँ’ ही बोलेगी| मतलब कि उसके क्षेत्र, भाषा, धर्म, राष्ट्रीयता, संस्कृति या ओहदे के बदलने जाने मात्र से भी उसे कोई अन्तर नहीं पड़ता| वह ‘बिल्ली’ ‘संस्कार और समझदारी’ की बोली नहीं बोल कर मात्र ‘म्याऊँ’ ‘म्याऊँ’ ही बोलती रहेगी|

आचार्य प्रवर निरंजन  जी

अध्यक्ष, अन्तर्राष्ट्रीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान|

डॉ० मोहन भागवत का ‘राष्ट्रवाद’

डॉ० मोहन भागवत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वर्तमान सरसंघचालक है| इनका पूरा नाम डॉ० मोहन मधुकर राव भागवत है| इनकी शैक्षणिक योग्यता ‘पशु चिकित्...