गुरुवार, 12 फ़रवरी 2026

स्त्रियाँ क्या होती है?

सवाल यह है कि स्त्रियाँ क्या होती है? प्राकृतिक व्यवस्था में एक स्त्री क्या होती है? दूसरे स्तनपायी पशुओं एवं अन्य जीवों में इनकी क्या व्यवस्था होती है? स्त्रियाँ एक शरीर में होती है, जैसे पुरुष होते हैं। तो क्या स्त्रियाँ इस संसार में एक मौलिक स्वतंत्र इकाई है, या आधी इकाई है, या पूरक इकाई है? क्या पुरुष भी आधी इकाई ही हैं, या पूर्ण इकाई है, या पूरक इकाई है? ब्रह्माण्ड की हरेक इकाइयाँ या सममिति (सिमिट्र्री) में होती है, या एक दूसरे के अनुपूरक होती है। ये सभी प्रश्न बहुत गहरे हैं, क्योंकि ‘स्त्री’ को केवल ‘पुरुष के संदर्भ में’ परिभाषित करना अपने-आप में एक दार्शनिक, सामाजिक और वैज्ञानिक समस्या है। मैं आपको इस विमर्श में शामिल करना चाहता हूँ कि स्त्रियों को कैसे सम्यक रूप में समझा जाय?

जैविकीय (Biological) बनावट एवं कार्यात्मक संरचना में पुरुष के संदर्भ में स्त्री नव सृजन यानि  प्रजनन की सह-भागी इकाई है| शून्य (अंडाणु एवं शुक्राणु) से जीवन का सृजन तो दोनों मिलकर करते हैं, लेकिन उसे पूर्ण विकसित करने का प्राकृतिक भार स्त्री को मिला है| स्त्री और पुरुष एक दूसरे के ‘पूरक’ (complementary being) होते है| जैविक रूप से दोनों मिलकर जीवन की निरंतरता बनाते हैं| यह संबंध कार्यात्मक है, न कि अस्तित्वगत पहचान का आधार है। स्वतंत्र ‘अस्तित्वगत पहचान’ बनाने का यह प्रयास या नजरिया ही समाज के लिए घातक है| दोनों को अलग अलग समझा ही नहीं जाना चाहिए|

इस पृथ्वी पर अन्य पशु भी यौन सम्बन्ध बनाते हैं और जीवन का सृजन कर उसे निरंतरता भी देते हैं| लेकिन ये सब जीव अपना ‘झुण्ड’ तो बनाते हैं, लेकिन अपना संसार नहीं बना पाते हैं| ये पशु सामाजिक संस्थाओं का सृजन नहीं कर पाते है| मानव ने जब विवाह आदि सामाजिक संस्थाओं का निर्माण करना शुरू किया, तब इस संसार का निर्माण हुआ| सामाजिक संस्थाओं के जाल को समाज या संसार कहते हैं| सांस्कृतिक, आर्थिक एवं राजनीतिक संस्थाओं के विकास के साथ आज मानव इस स्थिति तक पहुँच सका है|

विवाह नामक सामाजिक संस्था में कुछ लोग एक साथ रहते हैं, और सभी शारीरिक एवं अपनी अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं| इस तरह विवाह में ‘यौन सम्बन्ध’ बनाना स्त्री एवं पुरुष का प्राथमिक एवं मौलिक कार्य नहीं रह जाता है, बल्कि सामाजिक संस्थाओं के द्वारा निर्धारित सामाजिक संबंधों का निर्वहन अनिवार्य हो जाता है| ‘विवाह’ की इस अवधारणा में सभी आधुनिक बदलाव भी समाहित हो जाते हैं| इस अवधारणा में यौन संबंधों की तथाकथित पवित्रता को कोई स्थान नहीं मिलता है| स्पष्ट है कि विवाह संस्था सिर्फ यौन संबंधों के लिए नहीं होता।

विवाह को संस्था के रुप में पुनर्परिभाषित करने की आवश्यकता आधुनिक समाजों में उभर रही बदलाव है, जो यौन निष्ठा से निरपेक्ष होता जा रहा है। समस्या तब होती है, जब इस जैवकीय पूरकता को पुरुष -निर्भरता बना दिया जाता है। स्त्रियों की विवादस्पद छवि का उदय एवं विकास मध्य युग में सामन्ती व्यवस्था के उदय एवं विकास के साथ हुआ| प्राचीन काल में ऐसी असामनता नहीं थी| आज जो भी असामनता स्त्रियों के लिए वर्णित मिलता है, वह सब कागजी ग्रंथों में ही लिखित हैं, जिसका उपलब्ध स्वरुप मध्य काल में संपादित किया गया है| साहित्य समाज का दर्पण होता है| यह साहित्य कागज पर ही उपलब्ध है, अर्थात यह सब भारत में कागज के प्रचलन में आने के बाद के समाज का प्रतिबिम्ब है| प्राचीन काल में यौन आधारित ‘लैंगिक’ (Gender, not Sexual) असामनता का कोई पुरातत्वीय साक्ष्य इतिहासकारों को उपलब्ध नहीं है|

इतिहास के आदि काल में, यानि प्राक इतिहास में स्पष्ट है कि गर्भधारित स्त्रियों ने अपने विराम काल में नदियों या झीलों के उतरते पानी में अनाजों के पौधों को उगते और उसके दानों को पशुओं एवं चिड़ियों द्वारा खाते देखा| इस तरह, स्त्रियों ने कृषि का प्रारंभ किया| स्त्रियों द्वारा घायल पशुओं की सेवा करने एवं उसके बहुविध उपयोग ने पशुपालन को विकसित किया| कृषि के विकास की आवश्यकता ने स्त्रियों को आवास को स्थायी (घर एवं बस्ती) बनाने को प्रेरित किया, भले ही इस प्रक्रिया में पुरुषों का सहयोग मिला| अपनी स्त्रियों के पास और अपने घर जाने के लिए पहली बार मानव को ‘दिशा’ (Direction) बोध की आवश्यकता हुई और ‘दिशाओं’ का निर्धारण किया जाने लगा| ‘आग’ (Fire) जलाये रखने की निरंतरता और उसके लिए आवश्यक ईंधन की व्यवस्था करने की बाध्यता से स्त्रियों  ने ‘समय’ (Time) की गणना प्रारम्भ की| ‘आग’ की देखभाल करना, यानि ठन्डे माहौल में आग को घेर कर समय व्यतीत करने से सबसे पहले स्त्रियों में ‘संवाद’ शुरू हुआ, जो भाषा एवं साहित्य के रूप में आज उपलब्ध है| यदि पुरुषों ने ‘सभ्यता’ का सृजन एवं विकास किया है, तो स्त्रियों ने ‘संस्कृति’ का सृजन और विकास किया है| एक व्यवस्था का ‘हार्डवेयर’ है, तो दूसरा व्यवस्था का ‘साफ्टवेयर’ है| अब आप ही बताइए कि कौन किस पर निर्भर है?

मध्य युगीन सामन्ती समाज में ‘यौन विभेद’ (Sex Discrimination) और ‘लैंगिक विभेद’ (Gender Discrimination) स्पष्ट होता गया| तथाकथित प्रगतिशील नारीवादियों में सिमोन द बोउआर (Simone de Beauvoir) का प्रसिद्ध कथन है – ‘स्त्रियाँ जन्म नहीं लेती है, बल्कि उसे बना दिया जाता है| हालाँकि इसे मानवता की प्राकृतिक व्यवस्था के सन्दर्भ में अतिशयोक्तिपूर्ण माना जा सकता है| नारीवादी अस्तित्ववाद में यह तर्क दिया कि चूँकि समाज को पुरुषों ने बनाया है, इसलिए स्त्रियों को पर्याप्त महत्ता नहीं दिया| इसका अर्थ यह हुआ कि स्त्री होना जैविक नहीं, सांस्कृतिक निर्माण है। यह प्रगतिशील दिखता अवधारणा सामन्ती युग के लिए सही व्याख्या हो सकती है, परन्तु इसे प्राकृतिक व्यवस्था नहीं समझना चाहिए|

सत्ता (Power) के सामन्तवादी होने के बाद पुरुष के संदर्भ में स्त्री एक नियंत्रण की वस्तु, उपभोग की वस्तु, नैतिकता का भार, ‘इज्ज़त’ का वाहक, परंपरा को बोझ ढोने वाली हो गयी| अगर स्त्री को पुरुष के संदर्भ में परिभाषित करें, तो ‘स्त्री’ बनायी जाती है| एक स्त्री की सच्ची परिभाषा पुरुष की पूरकता के संदर्भ में हो सकती है| अधिकतर लोगों का यही मानना है कि स्त्री और पुरुष दोनों ही एक स्वतंत्र मानव चेतना है| लेकिन यह धारणा समुचित भी नहीं है, जब प्रकृति ने एक दूसरे का पूरक बनाया है| एक ‘मानव’ (Man) है, तो दूसरा ‘गर्भाशय वाला मानव’ (Womb + Man = Woman) है| सामान्यत: सच्ची मुक्ति का अर्थ स्त्री और पुरुष की स्वयं में पूर्ण चेतना का बोध होना माना जाता है, जो गलत है| इन दोनों में संबंध सत्ता का नहीं, संवाद का है|

मनोवैज्ञानिक कार्ल जुंग अपने विश्लेषणात्मक मनोविज्ञान में समझाते हैं कि पुरुष के भीतर स्त्री-तत्व (Anima) और स्त्री के भीतर पुरुष तत्व (Animus) भी होता है| अर्थात पुरुष और स्त्री का स्वभाव विभिन्न मात्रा में दोनों में एक साथ मौजूद रहता है|

क्वांटम भौतिकी का क्वांटम उलझाव सिद्धांत (Quantum Entanglement Theory) समझाता है कि एक समूह में रहने वाले प्रत्येक कण (Particle) की क्वांटम अवस्था को अन्य कणों की अवस्था से स्वतंत्र रूप से वर्णित नहीं किया जा सकता, भले ही ये कण एक दूसरे से बहुत दूर हों जाएं| अर्थात एक समूह में एक साथ तक लम्बे समय तक रहने से भावनात्मक एकता बढ़ जाती है, जिसका आभास सभी सदस्यों को भिन्न भिन्न मात्रा में होता रहता है| यही सम्बन्ध स्त्री एवं पुरुष में और विवाह एवं परिवार में होता है| यह वैज्ञानिक तथ्य भी स्त्री एवं पुरुष के सम्बन्ध को नए तरीके से व्याख्यापित करता है|

इसलिए तथाकथित आधुनिक पश्चिमी नारीवादी और सामन्ती नजरिए से स्त्रियों का मूल्यांकन नहीं कीजिए| इसके लिए प्राकृतिक और आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोणों का सहारा लीजिए| आपके संसार में आपका सब कुछ बदल जाएगा, और आपकी दुनिया भी खुशनुमा हो जायेगी|

आचार्य प्रवर निरंजन जी

अध्यक्ष, भारतीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान|

बुधवार, 11 फ़रवरी 2026

सभी समस्यायों के मूल में धर्म और शिक्षा है|

यदि सभी समस्यायों के मूल में धर्म और शिक्षा है, तो सभी समस्यायों का समाधान भी धर्म और शिक्षा में है| शायद इसीलिए रुसी क्रान्ति की सफलता के तुरंत बाद लेनिन ने शिक्षा को धर्म (चर्च) से अलग कर दिया था| वर्ष 1940 तक हर सोवियत नागरिक शिक्षित था और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से युक्त हो गया| इसी शिक्षा के साथ आज भी 15 करोड़ का रूस 35 करोड़ के अमेरिका के समक्ष बराबरी पर है| माओ त्से तुंग ने भी अपनी महान सांस्कृतिक क्रान्ति (1960 से 1976 तक) के साथ चीन को बदल डाला| इसने ‘प्रचलित धर्मों’ को ‘मानव धर्म’ बना कर और विद्यालयी शिक्षा को गुणवत्तापूर्ण बना कर चीन को इस ऊँचाई को तक पहुँचा दिया| इस दिशा और दशा में आज भारत कहाँ हैं, गंभीरता से विचारणीय हैं|

हमें यहाँ धर्म को समझना चाहिए, जो अपने अर्थ में ही अतिव्यापक अर्थ रखता है| शिक्षा भी एक व्यापक अवधारणा है, जो हमें कई स्तर पर चेतना से युक्त बनाता है| भारत में धर्म एवं शिक्षा सम्बन्धित कई वैधानिक और संवैधानिक अधिकार भी जुड़े हुए हैं, जो भारत में कई समस्यायों को निरंतरता देते हैं|

वैसे धर्म का एक प्राचीन अर्थ है और एक अभी का प्रचलित अलग अर्थ है| ऋग्वेद में धर्म को विश्व का मूल आधार बताया गया है| बौद्ध दर्शन में धारणीय गुणों को ही धर्म बताया गया है| भारतीय मनीषियों ने धर्म को एक जीवन –पद्धति के रुप में बताया है, जिसके अनुसार वह जीवन व्यतीत करता है| यह धर्म सिर्फ कर्तव्य के पालन से सम्बन्धित होता है, जो उस व्यक्ति, उसके परिवार, समाज, मानवता और मानवता के भविष्य के लिए सार्थक होता है| यह धर्म समाज में ‘मानव धर्म’ के रुप में लिया जाता रहा| इस तरह यह धर्म सिर्फ ‘आस्था’ का विषय नहीं होकर विस्तृत कल्याण के लिए होता है| धर्म शब्द ‘धि’ नामक धातु से उत्पन्न है, जिसका अर्थ ‘धारण करना’ है| यदि यह ‘धर्म’ ही ‘मानव धर्म’ है, तो विश्व के सभी प्रचलित आधुनिक धर्म मात्र एक सम्प्रदाय हैं|

किसी भी प्रचलित आधुनिक धर्म में उसके अपने उपास्य विषय में अखंड आस्था और उसके प्रति पूर्ण प्रतिबद्धता अनिवार्य होता है| इसका उपास्य अलौकिक शक्ति से युक्त माना जाता है, जो अपने अनुयायियों पर कृपा भी करता है| हर धर्म में कोई कर्मकांड अवश्य होता है, जो सामाजिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं के निर्माण या संशोधन के लिए आवश्यक होता है| जब भी कोई कर्मकांड होगा, उसमे पाखंड, ढोंग एवं अतार्किक विश्वास अवश्य रहेगा, चाहे वह कितना भी वैज्ञानिक होने का दावा कर ले| धार्मिक अनुयायियों को अपने उपास्य विषय में आस्था अखंड रखना होता है, जिस आस्था पर कोई कार्य –कारण यानि तर्क का प्रभाव नहीं होता है| दरअसल ये धर्म नहीं होकर सम्प्रदाय हैं| खैर, हमें यहाँ धर्म एवं सम्प्रदाय की चर्चा नहीं करना है, क्योंकि यह प्रत्येक के लिए आस्था और निष्ठां का विषय होता है|

शिक्षा किसी भी वस्तु या स्थिति को यथास्थिति में समझने में सहायता करता है| शिक्षा से ‘ज्ञान’ उत्पन्न होता है, जिसके उपयोग से वह ‘बुद्धि’ बनता है| भारत में पर्याप्त और समुचित शिक्षा के अभाव में सामान्य जनों में मानवीय गुणों का अभाव है और इसके अभाव के कारण इससे सम्बन्धित कोई धार्मिक व्यक्ति कट्टर, अंधविश्वासी, पाखंडी, क्रूर, मुर्ख, या देशद्रोही दिखता है| यह सब पर्याप्त और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के अभाव में होता है|

आज हर ज्ञान को परम्परागत धर्म के सन्दर्भ में देखने का स्वभाव बन गया है| यही हममें घृणा, विद्वेष, ईर्ष्या,और संवेदनहीनता फैलता है| ऐसा कोई धर्म नहीं करता है, बल्कि ऐसा धर्म के आड़ में गलत और अनुचित शिक्षा करता है| सभी धर्मों के मूल ग्रंथो का यदि अवलोकन किया जाय, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि प्रचलित आधुनिक धर्मों में व्याप्त दिखती बुराइयों के लिए इनके मूल एवं मौलिक ग्रन्थ कतई जिम्मेवार नहीं है| इसके लिए मात्र शिक्षा की गुणवत्ता और इसका प्रसार उत्तरदायी है|

भारतीय संविधान में धर्म एवं उपासना से सम्बन्धित मूल अधिकार के बारे में मुझे कुछ अतिरिक्त नहीं कहना है| लेकिन धार्मिक शिक्षा (अनुच्छेद 28) और संस्कृति संरक्षण के लिए शैक्षणिक संस्थान (अनुच्छेद 30) में जो कुछ शैक्षणिक विशेषाधिकार दिए गये हैं, वह विचारणीय विषय अवश्य है| धर्म एवं संस्कृति संरक्षण के लिए स्थापित एवं संचालित संस्थान में भी विद्यालयी शिक्षा सभी के लिए एक समान और एक प्रकृति की अनिवार्य होना चाहिए| विद्यालयी शिक्षा में धर्म एवं संस्कृति संरक्षण के नाम पर विद्यालयों के लिए अधिकृत पाठ्यक्रम से व्यवस्था को कोई समझौता नहीं करना चाहिए| धार्मिक और सांस्कृतिक शिक्षा अधिकृत विद्यालयी पाठ्यक्रम के अतिरिक्त होनी चाहिए या विद्यालयी शिक्षा की समाप्ति के बाद उच्चतर अवस्था में होनी चाहिए| मैं धर्म एवं संस्कृति संरक्षण के उच्चतर एवं शोध संस्थानों के बारे में कोई आपत्ति नहीं कर रहा हूँ, लेकिन हर व्यक्ति को मानव बनने की मूल एवं वैज्ञानिक शिक्षा अवश्य मिलनी चाहिए| व्यवस्था इसका नियमन एवं नियंत्रण कड़ाई से करे|

यदि भारत को ‘एक भारत, श्रेष्ट भारत’ बनाना है, तो हर को गुणवत्तापूर्ण और वैज्ञानिक शिक्षा अवश्य ही सुनिश्चित करना होगा| यदि भारत को एक सशक्त और समृद्ध राष्ट्र बनना है, तो भारत को धर्म एवं संस्कृति -निरपेक्ष विद्यालयी शिक्षा को अनिवार्य करना होगा| धर्म एवं संस्कृति से सम्बन्धित विशेष शिक्षा को सामान्य एवं अनिवार्य शिक्षा से अलग करना होगा| यह संवैधानिक व्यवस्था को पुनर्व्यख्यापित करने या संवैधानिक संशोधन की आवश्यकता जताती है| इसी से सभी धार्मिक सहित अन्य समस्यायों का निदान संभव है| यह एक सशक्त और समृद्ध राष्ट्र निर्माण के लिए अनिवार्य है| इसके बिना सारा प्रयास राजनीति का हिस्सा हो जाता है| वही ‘राजनीति’, जिसकी ‘नीति’ (Policy) का ‘राज’ (Secret) कोई नहीं जानता है|

इसीलिए हर व्यक्ति को गुणवत्तापूर्ण और वैज्ञानिक शिक्षा उपलब्ध करने के लिए सभी संवैधानिक अपवादों से मुक्त व्यवस्था करनी ही होगी|

आचार्य प्रवर निरंजन जी

अध्यक्ष, भारतीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान|

मंगलवार, 3 फ़रवरी 2026

काल्पनिकताएँ भी वास्तविकताएँ होती है

यह एक विचित्र स्थिति है कि दो विपरीत अवस्थाओं को एक साथ सत्य और सही बताया जा रहा है| अक्सर लोग समझते हैं कि कोई कल्पनाएँ कभी भी वास्तविक नहीं हो सकती, या कोई वास्तविक प्रभाव एवं परिणाम पैदा नहीं करती है| लेकिन तथ्य यह है कि काल्पनिकता की वास्तविक और काल्पनिक, दोनों अवस्थाओं में एक साथ मौजूद रहती है| यह सब कुछ उसके ‘परिप्रेक्ष्य’ पर निर्भर करता है|

इसे दूसरी तरह से इस तरह व्यक्त किया जा सकता है कि क्या कल्पनाएँ भी वास्तविक होती है?” इसका उत्तर सीधा ‘हाँ’ या ‘नहीं’ में नहीं दिया जा सकता, क्योंकि यह इस पर निर्भर करता है कि हम वास्तविकसे क्या अर्थ लेते हैं? इसे हम भौतिक अर्थ (Physical Reality) में और मनोवैज्ञानिक अर्थ (Psychological Reality) में समझने के साथ साथ यह इस पर भी निर्भर करता है कि हमारी चेतना के लिए कल्पनाऔर वास्तविक अनुभवमें फर्क कितना है?

अगर वास्तविकसे हमारा मतलब है कि जो चीजें बाहर की दुनिया में भौतिक रूप से मौजूद हो, तो इस अर्थ में कल्पनाएँ वास्तविक नहीं होतीं। ऐसी चीजें हमारे मन एवं मस्तिष्क के भीतर बनने वाले मानसिक चित्र, विचार या संभावनाएँ होती हैं। ऐसी चीजों को छुआ, तौला या मापा नहीं जा सकता। प्रसंगवश यह भी जान लेना चाहिए कि क्वांटम भौतिकी के ‘कोपेनहेगन व्यक्तव्य’ में यह मान लिया गया है कि हमारी कल्पनाएँ ही भौतिकताओं को जन्म देती है| यह सही है कि हमारी कल्पनाएँ ही बाहय भौतिकताओं के अस्तित्व को आधार दे सकती है, लेकिन उन्हें जन्म नहीं देती है|

लेकिन अगर वास्तविकसे हमारा अभिप्राय यह है कि जो हमारे अनुभव, भावना और व्यवहार को प्रभावित करता है, तो इस अर्थ में कल्पनाएँ पूरी तरह वास्तविक होती हैं। हमारी डर की कल्पना से हमारे दिल की धड़कन तेज़ हो जाती है, भविष्य की कल्पना से प्रेरणा या चिंता पैदा होती है, प्रेम की कल्पना से वास्तविक भावनाएँ उत्पन्न होती हैं, आदि आदि अनेक उदहारण हमारी दुनिया मौजूद हैं| यहाँ कल्पना सिर्फ़ हवा में उड़ती चीज़ नहीं, बल्कि जैविक तंत्रिका विज्ञान की घटनाओं का रूप ले लेती है| इसे मनोविज्ञान में ‘मनो –शारीरिक प्रभाव’ (Psycho –Somatic Effect) कहते हैं| मानव मस्तिष्क में कल्पनाओं पर वैसे ही रासायनिक प्रक्रियायों के परिणाम मिलते हैं, जैसे वास्तविकताओं पर निकलते हैं|

बहुत सी चीज़ें जो आज पूरी तरह काल्पनिक लगती हैं, कल वास्तविक हो जाती है| जो आज सिर्फ़ कल्पनाएँ  मानी जाती हैं, वे कल्पनाएँ आज अवास्तविकनहीं होती, बल्कि ये संभावित वास्तविकताहोती हैं। मशीने, कम्प्यूटर,  इन्टरनेट, सामाजिक एवं सांस्कृतिक संस्थाएँ (समाज, विवाह, धर्म, आदि), राजनीतिक संस्थाएँ (लोकतंत्र, राज्य, राष्ट्र आदि), आर्थिक संस्थाएँ (मुद्रा) आदि इसी प्रकार की काल्पनिकता है| इस अर्थ में काल्पनिकता भविष्य की वास्तविकताओं का रूप होती हैं। कल्पनाएँ भौतिक रूप से वास्तविक नहीं होतीं, लेकिन मानसिक, भावनात्मक और ऐतिहासिक स्तर पर गहरी वास्तविकता रखती हैं। वे यथार्थ से कटे भ्रम नहीं, बल्कि यथार्थ के संभावित रूप होती हैं।

आधुनिक तंत्रिका विज्ञान (न्यूरोसाइंस) बताता है कि मस्तिष्क काल्पनिकता और वास्तविकता के अनुभव को पूरी तरह अलग नहीं करता। चिकित्सीय तकनीकों, जैसे fMRI और EEG के अध्ययनों से पता चलता है कि जब कोई व्यक्ति किसी खाद्य पदार्थ को वास्तव में काटने की कल्पना करता है और किसी खाद्य पदार्थ को वास्तव में काटता है, तो दोनों स्थितियों में एक सा परिणाम दिखता है| उसके मस्तिष्क के दृश्य क्षेत्र (Visual Cortex), भावना क्षेत्र (Insular Cortex) में, और शारीरिक संवेदना (Somatosensory Cortex) में बहुत मिलती-जुलती न्यूरल गतिविधि दिखती है। इनमे अंतर सिर्फ़ इतना होता है कि वास्तविक अनुभव में संकेत एवं सूचनाएँ ज़्यादा स्पष्ट, तेज़ और स्थिर होते हैं, जबकि कल्पना में वही नेटवर्क हल्के रूप में सक्रिय होते हैं और ज्यादा स्पष्ट एवं स्थिर नहीं होते हैं| स्पष्ट है कि न्यूरॉन के स्तर पर कल्पना भी एक वास्तविक जैविक घटना है।

कल्पना ही मानव मस्तिष्क में ‘संभावनाओं को पैदा करने’ का प्रक्रम है| मस्तिष्क संभावित परिणामों को पूर्व-अनुभव करता है| हम कल्पना से लक्ष्य-निर्देशित बनाते हैं और कल्पना में भावनात्मक रंग भरते हैं| कल्पना कोई भ्रमनहीं है, बल्कि यह मस्तिष्क की एक उच्च स्तरीय संज्ञानात्मक क्षमता है। प्लेसिबो प्रभाव (Placebo Effect) में  कल्पना शरीर को बदल देती है| यह सबसे मज़बूत प्रमाण है, जो यह स्पष्ट करता है कि कल्पना वास्तविकअसर डालती है| कल्पना शरीर में वास्तविक रसायन छोड़ता है, और व्यक्ति पर वास्तविक शरिरिक, मानसिक एवं भावनात्मक प्रभाव होता है। यह सब दिखाता है कि एक कल्पना उसके शरीर की गतिविधियों को बदल सकती है|

जब व्यक्ति किसी पुराने अनुभव को फिर से कल्पना में लेता है, तब वह उसे दोबारा जीता है| ऐसे में उसका मस्तिष्क उसे अतीतनहीं मानता| वह उसे अभी घट रही घटनासमझ लेता है| सिर्फ़ कल्पना से ही उसके शरीर में वही रासायनिक तूफ़ान उठ जाता है, जो वास्तविकता में होता है। कल्पना से ‘दिमाग की संरचना’ (Neuroplasticity) तक बदल सकती है। जब वास्तविकता में कोई अभ्यास किया जाता है और जब उसी का काल्पनिकता में अभ्यास किया गया, तो कुछ समय बाद (सप्ताह या महीना में) दोनों के Motor Cortex में बदलाव दिखा| उनमे बदलाव का अन्तर सिर्फ मात्रा में हुआ|

आधुनिक तंत्रिका विज्ञान यह स्पष्ट करता है कि कल्पनाएँ बाहर की दुनिया में भौतिक रूप से मौजूद नहीं होतीं, लेकिन उसके मस्तिष्क और शरीर के भीतर वे पूरी तरह वास्तविक जैविक घटनाएँ होती हैं। वे वही न्यूरल नेटवर्क सक्रिय करती हैं, वही रसायन छोड़ती हैं, और वही संरचनात्मक बदलाव पैदा कर सकती हैं, जो वास्तविक अनुभवकरता है।

 “काल्पनिक वास्तविकताओं’ को व्यक्तिगत मस्तिष्क में, समाज में, और इतिहास में समझ सकते हैं| व्यक्तिगत स्तर पर ये ऐसी वास्तविकताएँहैं जो बाहर नहीं होतीं, लेकिन व्यक्ति के लिए पूरी तरह वास्तविक अनुभव बन जाती हैं। इस तरह कोई भी इन कल्पनाओं से अपने को तो बदल सकता है, लेकिन अपने अस्तित्व के बाहर को प्रभावित नहीं कर सकता है| अपनी कल्पनाओं से बाहय दुनिया को बदलने की तथ्यात्मक प्रक्रिया एवं परिणाम अभी तक बहुत स्पष्ट नहीं है|

काल्पनिक वास्तविकताओं का अस्तित्व सामाजिक स्तर पर भी होता है| ये वे चीज़ें हैं जो प्रकृति में नहीं पाई जातीं, लेकिन सामूहिक विश्वास से पूरी तरह वास्तविकबन जाती हैं। इनके उदाहरणों में मुद्रा (Currency), राष्ट्र (Nation), कानून (Law), जाति, नस्ल, वर्ग, लोकतंत्र. मानवाधिकार, आदि प्रमुख हैं| राष्ट्र का कथानक (Narrative) इतनी शक्तिशाली होता है कि लोग इसके लिए जान दे देते हैं। ये सब काल्पनिकताएँ प्रभावशाली वास्तविकताएँ होते हैं। मिथक भी इतिहास की तरह कार्य करता है| प्रकृति में अधिकारनाम की कोई चीज़ नहीं होती, लेकिन इसकी काल्पनिकताएँ आज संविधान, कानून और मानवाधिकार देती है|

 आज समाज, व्यापार, राजनीति, पहचान आदि सब इसी डिजिटल कल्पनापर टिका है। जो चीज़ें कल्पना में जन्म लेती हैं, वह व्यवहार, शरीर या इतिहास को बदल देती हैं| इसीलिए यह कहा जाता है कि कथानक शासन करता है| कल्पनाएँ कर दुनिया को बदल दीजिए| वैज्ञानिकों की कल्पनाएँ ‘वर्तमान मानवता’ और ‘मानवता के भविष्य’ को बदल रही है| वास्तविकता और काल्पनिकता की प्रक्रियायों को समझिए|

आचार्य प्रवर निरंजन जी

अध्यक्ष, भारतीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान|

 

  

शनिवार, 24 जनवरी 2026

बुद्ध ने कोई धर्म क्यों नहीं बनाया?

अधिकतर लोगों का मानना है कि बुद्ध ने एक धर्म बनाया। मुझे लगता है कि बुद्ध ने कोई धर्म नहीं बनाया। अर्थात बौद्ध धर्म किसी भी बुद्ध ने नहीं बनाया। चूंकि भारतीय इतिहास में कोई 28 लोगों को बुद्धत्व की उपाधि प्राप्त हुई, इसीलिए गोतम 28 वें और अन्तिम बुद्ध हुए। अब सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि यह धर्म क्या होता है? इस अवधारणा की स्पष्टता इस प्रश्न को समझा सकता है। 

साधारणतया धर्म से एक स्पष्ट मानसिक चित्रण उभर कर सामने आ जाता है। वर्तमान समय में विश्व में इतने सामान्य धर्म हैं कि इनकी कोई सर्वमान्य एवं सर्वव्यापक स्पष्ट परिभाषा नही बन पाता। लेकिन सभी परम्परागत धर्मों के कुछ विशेष चारित्रिक अभिव्यक्ति होता है, जिससेे उसके पहचान बनते हैं। इन अभिव्यक्त चारित्रियों के आधार पर एक सर्वमान्य एवं सर्वव्यापक चारित्रियों का निर्धारण किया जा सकता है। यही अभिव्यक्त चारित्रियां ही धर्म का दृश्य पक्ष हुआ। 

इन अभिव्यक्त चारित्रियों में विशेष उपासना स्थल, पवित्र ग्रंथ, प्रार्थना अथवा पूजा-पाठ संबंधित कोई कर्मकांड या विशेष रीति, तथा उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए याचना करना, इनमें प्रमुख है। धर्म का यही दृश्य पक्ष इसको अन्य विषयों, विचारों तथा सिद्धांतों से अलग कर देता है। धर्म में इन पक्षों की कोई उपेक्षा नहीं कर सकता और इससे इन्कार भी नहीं कर सकता है। इन्हीं आधारों पर विभिन्न धर्मों में विभाजन किया जाता है। बौद्ध धर्म में भी उपर्युक्त अभिव्यक्त चारित्रियां स्पष्ट है। इनमें विशिष्ट उपासना स्थल का निर्माण या भ्रमण; किसी एक को पवित्र ग्रंथ मानना, जिसका लेखन और सम्पादन उन व्यक्ति या सत्ता के गुजर जाने के बाद किया जाता है; किसी कृपा की आशा से प्रार्थना या याचना करना; और मामूली ही सही, कुछ कर्मकांड करना प्रमुख विशेषता होता है। इन अभिव्यक्त चारित्रियों का मूल भावना उस विशिष्ट शक्ति की कृपा पाना होता है, जो प्रचलित बौद्ध धर्म में भी स्पष्ट है। 

इन्हीं अभिव्यक्त चारित्रियों के आधार पर बौद्ध धर्मी अपने को अन्य धर्मों से अलग करते हैं और सबसे प्रगतिशील धर्म भी मानते हैं। यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि इनके अनुयायी इसे धर्म भी मानते हैं और इसे कर्मकांड, पाखंड अंधविश्वास और ढोंग से मुक्त भी मानते हैं। कर्मकांड, पाखंड अंधविश्वास और ढोंग  धर्म के आवश्यक आधार है और इससे मुक्त कोई भी धर्म नहीं हो सकता। वही धर्म, जिसकी तुलना वैज्ञानिक दार्शनिक कार्ल मार्क्स ने एक नशीली पदार्थ से किया था। यही सबसे बड़ा विरोधाभास है। विचित्र स्थिति यह है कि ऐसे धर्मिक बनने और दिखने वाले अपने को तार्किक और प्रगतिशील भी मानते हैं और अपने को बौद्धिक भी समझते हैं।

कहने का स्पष्ट तात्पर्य यह है कि यदि कोई धर्म है, तो वह अवश्य ही कर्मकांड, पाखंड अंधविश्वास और ढोंग  से युक्त रहेगा। तब ऐसे तथाकथित बुद्धिजीवियों को इसी आधार पर दूसरों पर नकारात्मक टिप्पणी करने का विचार उनकी विवेक हीनता है। आप किसी के कर्मकांड, पाखंड अंधविश्वास और ढोंग के गुणवत्ता की मात्रा पर विवाद तो कर सकते हैं, लेकिन स्वयं के धर्म में इनकी कोई मात्रा के नहीं होने से इंकार नहीं कर सकते है। तब तो इन अनुयायियों को दूसरों की आलोचना करने का और अपने को सर्वोपरि बताने और समझने का कोई नैतिक आधार नहीं रह जाता। 

इस परम्परागत धर्म में किसी अलौकिक या अतिमानवीय शक्ति या सत्ता में विश्वास करना सबसे प्रमुख होता है। बुद्ध ने स्वयं को दीपक बनने को कहा, लेकिन उनके धार्मिक अनुयायी उनसे ही कल्याण करने, यानि कृपा करने की अनुरोध करते हैं। ऐसे लोग बुद्धों के जीवन -दर्शन और जीवन जीने के विज्ञान पर ध्यान नही देते। दूसरों की अनावश्यक आलोचना कर आत्म मुग्धता पाना बुद्ध का दर्शन कदापि नहीं हो सकता। उस अलौकिक या अतिमानवीय शक्ति या सत्ता से अपने कष्टों और समस्याओं से निजात पाने की उम्मीद में ढेर सारे तामझाम करना धर्म का दूसरा महत्वपूर्ण हिस्सा है। 

धर्म मानव की एक विशेष मनोदशा या अभिवृत्ति है। इस अभिवृत्ति का मुख्य विषय उस पूजनीय व्यक्ति या सत्ता को मूल्यवान समझना होता है। धार्मिक व्यक्ति ऐसे संवेगों और भावनाओं से अभिभूत रहता है, और अपनी प्रतिक्रिया देने में मानवीय मूल्यों का महत्व नहीं समझता है। धर्म का यह भी एक अभिलक्षण है कि धर्मपरायण व्यक्ति की उस सत्ता या व्यक्ति में अखंड आस्था और उसके प्रति पूर्ण प्रतिबद्धता रखता है। आश्चर्य की बात है कि ऐसे अनुयायी अपने को वैज्ञानिक मानसिकता के बौद्धिक भी समझते होते हैं। 

दरअसल बुद्धों ने बुद्धि की बात की थी, जो व्यक्ति, परिवार, समाज, मानवता और मानवता के भविष्य के कल्याण को अपने में समाहित करता होता है। बुद्ध की बातों में यदि बुद्धि और कल्याण की बात नहीं है, तो वह बुद्ध की बात हो नहीं सकती। कुछ लोग मतदान कराकर बौद्धिकता के निर्धारण का प्रयास करते दिखते हैं। ऐसे हताश और निराश धार्मिक अनुयायियों की संस्कृति अभी भी मौजूद है। किसी भी बुद्धों ने ऐसा कुछ भी नहीं किया, जिसे आज के परम्परागत धर्म के खांचे में बैठाया जाय। 

कुछ लोगों की मानसिकता ऐसी है कि वे परम्परागत धर्म के ढांचे से बाहर नहीं जा सकते और वैज्ञानिक मानसिकता का खोल पहन कर प्रगतिशील भी दिखना चाहते हैं, ऐसे लोग ही महान वैज्ञानिक दार्शनिक बुद्धों को ढाल बना कर धर्म को आकार दे दिया है। वैसे धर्म आस्था का विषय है, प्रदर्शन करने का नहीं। सभी अपनी आस्था को बनाए रखें, लेकिन दूसरों पर अपनी बनाबटी वैज्ञानिकता का प्रदर्शन भी नहीं करें। किसी के ऐसे बनने और ढोंग करने से, यदि बुद्ध आज जीवित होते, तो अपने ऐसे तथाकथित अनुयायियों के ऐसे कृत्यों से लज्जित हो जाते। 

जब बुद्ध ने लोगों को स्वयं ज्ञान का प्रकाश बनने को कहा, और लोगों को स्वयं उस पथ पर चलने को कहा, तब वे अपनी उपासना, अराधना, पूजन आदि करने के लिए दूसरों को क्यों कहते? वे ऐसे धर्म क्यों बनाते

इस पर ठहरिए और विचार कीजिए। 

आचार्य प्रवर निरंजन जी

अध्यक्ष, भारतीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान| 

रविवार, 11 जनवरी 2026

बुद्धि की उत्पत्ति "स्थिरता" से होती है

 बुद्धि को केवल आंकड़ों या सूचनाओं से प्राप्त नहीं किया जा सकता। बुद्धि की उत्पत्ति एवं विकास सिर्फ चेतना की 'स्थिरता" की अवस्था में हो सकता है।

मन और चित्त अक्सर अतीत और भविष्य के बीच झूलता रहता है| मन और चित्त को चेतना कहते हैं। चेतना बीते हुए कामों पर पछतावा करता है या आगे की योजनाओं को लेकर चिंतित रहता है| चेतना को नियंत्रित करने की जितनी कोशिश की जाती है, उतना ही वह प्रयास थका देने वाला और व्यर्थ हो जाता है। यही कारण है कि ध्यान इतना आवश्यक है। ध्यान के माध्यम से चेतना स्वाभाविक रूप से शांत हो जाता है| यह  हमें अपनी सहज बुद्धि तक पहुँच प्रदान करता है। यही वह क्षण होता है, जब जागरूकता सूचनाओं को संसाधित करने के साथ अपने अंतर्ज्ञान को सुनने की ओर मुड़ जाता है। ध्यान एक विधि है, साधन है, यह कोई अंतिम लक्ष्य नहीं है| चूँकि यह साधन है, इसीलिए यह अवस्था ‘साधना’ कहलाता है|

ध्यान एक विधि मात्र है, जो उस बुद्धि तक पहुँचने का उपागम (Approach) देता है| बुद्धि चेतना का एक स्तर है| चेतना का प्राथमिक स्तर संवेदनशीलता है| यह संवेदनशीलता उर्जा के प्रवाह से, यानि उर्जा के स्थिति –परिवर्तन से प्रारम्भ होता है| यह चेतना का प्राथमिक और मूल स्तर हुआ| इस तरह, यह बुद्धि का प्रारम्भिक स्तर हुआ| इन संवेदनाओं से ‘संकेत’ (Signal) बनते हैं, जो ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा प्राप्त और संसाधित (Process) किए जाते है| ज्ञानेन्द्रियाँ या तो शारीरिक हो सकते हैं, या मानसिक, या आध्यात्मिक, या इनका एक निश्चित संयोजित स्वरुप| इन ‘संकेतों’ के व्यवस्थित एवं संगठित स्वरुप को ‘सूचना’ (Information) कहते हैं| इन ‘सूचनाओं’ के व्यवस्थित एवं संगठित स्वरुप को ‘ज्ञान’ (Knowledge) कहते हैं|

कोई भी ‘ज्ञान’ एक ऐसी अवस्था है, जो उसके किसी उपयोग और प्रयोग की दशा एवं दिशा से निरपेक्ष होता है| जब कोई अपनी आवश्यकता या मंशा के अनुरुप उस ज्ञान का उपयोग या प्रयोग करता है, तो वह ‘ज्ञान’ ही ‘बुद्धि’ (Intellect) कहलाता है| किसी ‘ज्ञान’ का किसी व्यक्ति के द्वारा किसी विशेष प्रयोजन के लिए किया गया उपयोग या प्रयोग ही ‘बुद्धि’ है| जब कोई ‘ज्ञान’ का उपयोग एवं प्रयोग सिर्फ ‘मानवता’ और ‘मानवता के भविष्य’ के लिए करता है, तो वह ‘ज्ञान’ ‘प्रज्ञा’ (Wisdom) कहलाता है| यदि कोई ‘ज्ञान’ किसी को अचानक प्रकट होता है, तो वह ‘ज्ञान’ उसका ‘अंतर्ज्ञान’ (Enlightenment) कहलाता है| इसे ‘अनन्त प्रज्ञा’ से उत्पन्न माना जाता है|

तो प्रश्न यह है कि इस ‘बुद्धि’ का उत्पादन या चेतना के स्तर के विकास में ‘स्थिरता’ क्यों आवश्यक है, और यह ‘स्थिरता’ कैसे काम करता है?  

‘स्थिरता’ को ‘ठहर जाना’ भी समझा जाना चाहिए| यह शांत चित्त की अवस्था होता है| इसे एकाग्रता की अवस्था माना जाना चाहिए| यह मन एवं चित्त का स्थिर संतुलन है| यह प्रज्ञा की पूर्वशर्त है। बुद्ध के अनुसार, समाधि से प्रज्ञा उत्पन्न होती है| चेतना की स्थिरता से ही विवेकशील बुद्धि जन्म लेती है। चंचल चेतना सत्य को ग्रहण नहीं कर सकता। यह पहले ही स्पष्ट किया जा चुका है कि बुद्धि केवल जानकारी नहीं, बल्कि विवेकपूर्ण समझ है।

आधुनिक मनोविज्ञान इस कथन की पुष्टि करता है कि जब चेतना तनाव, भय या आवेग में होता है, तब निर्णय क्षमता घट जाती है। चेतना की शान्ति यानि भावनात्मक स्थिरता और संज्ञानात्मक नियंत्रण से बेहतर तर्क, गहन विश्लेषण और दीर्घकालिक सोच संभव है। स्थिर मानसिक अवस्था में मस्तिष्क उच्च स्तर पर कार्य करता है।

सामान्य समाज में प्रतिक्रियाएँ अधिक होती हैं, समझ कम। स्थिर परिस्थितियों में व्यक्ति अनुभवों को आत्मसात करता है, उनसे सीखता है और यहीं से बुद्धि विकसित होता है। ‘स्थिरता’ का अर्थ कोई ‘जड़ता’ नहीं होता है, बल्कि यह ‘गति’ की दिशा को क्षैतिज अवस्था से उर्घ्वाकार अवस्था में ले जाना होता है| इससे कोई उसकी गहराइयों में उतरता है| यह दिशाओं की अवस्था में एक आवश्यक संतुलन बनाना होता है| यह भी स्पष्ट समझना आवश्यक है कि पूर्ण निष्क्रियता बुद्धि नहीं, बल्कि सजग स्थिरता बुद्धि को जन्म देती है। यह चेतनाओं की संवेदनशीलता का स्थिरीकरण हुआ| यही ‘मन’ एवं ‘चित्त’ का स्थिरीकरण है| स्थिरता ही बुद्धि की गहराई, परिपक्वता और विवेकशीलता देता है| यह सब मन की स्थिरता से ही संभव है| चंचलता जानकारी दे सकती है, लेकिन बुद्धि नहीं|

आधुनिक न्यूरोसाइंस यह मानती है कि बुद्धि सिर्फ मस्तिष्क या इसके किसी एक निश्चित भाग में स्थित नहीं होना माना जा सकता| यह ऊर्जा की या संकेतों या सूचनाओं के नेटवर्क (Network) की स्थिर एवं संतुलित गतिविधि से उभरती है। यही नेटवर्क आत्मचिंतन, अर्थ-निर्माण, तर्क, योजना, समस्या समाधान और ‘क्या महत्वपूर्ण है’, यह तय करता है| इन तीनों नेटवर्कों के बीच संतुलन (Switching) करना ही स्थिरता है| स्थिर मन में तीनों नेटवर्क ‘समरसता के समन्वय’ (Coherent Rhythm) में काम करते हैं| यहीं से ज्ञान और बुद्धि निकलती होती है

यदि कोई अपने मन एवं चित्त को स्थिर नहीं करता होता है, तो उसके तंत्रिका तंत्र में और उसके इस नेटवर्क में ‘संकेतों’ का स्वाभाविक शोर (Neural Noise) होता रहता है| यह संकेतों और सूचनाओं के अत्यधिक एवं अनियंत्रित बौछारों से उत्पन्न होती है| संकेतों और सूचनाओं के अत्यधिक एवं अनियंत्रित बौछारों से सूचना स्पष्ट नहीं रहती, प्राथमिकता निश्चित नहीं होती, और इसीलिए सम्बन्धित निर्णय भ्रमित होते हैं| स्थिर अवस्था में न्यूरॉन्स समुचित, लेकिन सटीक सम्प्रेषण करते हैं, जिससे संकेत एवं सूचनाएँ सामान्य शोर की अपेक्षा बेहतर शांत अनुपात के माहौल में होते हैं| इसी से गहरी समझ, सूक्ष्म अंतर पहचानने की क्षमता और रचनात्मकता उत्पन्न एवं विकसित होता है| स्पष्ट है कि बुद्धि का जन्म कम शोर (Low Noise) वाली अवस्था में होता है।

स्थिरता व्यक्ति में कुछ निश्चित हार्मोन्स छोडती है, जो बिना नाली –प्रणाली के पूरे शरीर में फ़ैल कर स्थिरता पैदा करता है| स्थिरता में डोपामिन (Dopamine) का स्राव समुचित मात्रा में होता है, जो सीखने की प्रेरणा देती है। सेरोटिनीन (Serotonin) का स्राव भावनात्मक संतुलन बना कर दीर्घकालीन निर्णय लेने की सक्षम देता है| कोर्टोसिल (Cortisol) हार्मोन स्मृति और सीखने की प्रक्रिया को मजबूत बनाता है| बुद्धि तब उभरती है, जब इन हार्मोन्स में समुचित संतुलन (Neurochemical balance) होता है| उत्तेजना की अवस्था में यह संतुलन अनियंत्रित और उग्र हो जाता है|

स्थिरता ही सीखने की शर्त है| स्थिरता ही सीखने का माहौल बनाता है| स्थिरता जड़ता नहीं है, बल्कि स्थिरता ही ‘मन’ एवं ‘चित्त’ को ‘लचीलापन’ (Plasticity) देता है| न्यूरोप्लास्टीसिटी (Neuroplasticity) के लिए सुरक्षित और भयमुक्त वातावरण चाहिए, जो स्थिरता लाने का माहौल दे सके| तनाव की अवस्था में मस्तिष्क अपनी उत्तरजीविता (Survival) बनाए रखना चाहती है और इसीलिए यह जड़ हो जाती है| इससे नए सीखने के लिए लचीलापन कम हो जाता है| इसलिए गहरी बुद्धि संघर्ष की तीव्रता से नहीं, बल्कि स्थिर अभ्यास से बनती है।

अल्बर्ट आइन्स्टीन ‘समय’ के ‘पतले होने’ या फ़ैल जाने (Dilation) के सम्बन्ध में बताते हैं| यह ‘समय’ का ‘कम होना’ या ‘बढ जाना’ नहीं होता है| यह ‘समय’ का सिकुड़ जाना’ या ‘फ़ैल जाना’ होता है| न्यूरोसाइंस बताता है कि अस्थिर चेतना में समय सिकुड़ जाता है और स्थिर चेतना में समय फैल जाता है| जब समय की अनुभूति विस्तृत हो जाती है, तब व्यक्ति दूरगामी परिणाम देख पाता है। उसे यह कारणकार्य के संबंध से स्पष्ट होता है| इसी क्षमता को विवेक (Wisdom) कहते हैं। यह स्थिरता ही समय –बोध को बढ़ा कर बुद्धि को विकसित और संवर्धित करने का अवसर देता है| ध्यान (Meditation) पर आधुनिक शोध बताते है कि ध्यान से Alpha–Theta brain waves बढ़ती हैं| ये तरंगें रचनात्मकता, गहन समझ और अंतर्दृष्टि से जुड़ी हैं। यही स्थिरता से प्रज्ञाहै|

इसीलिए अल्बर्ट आइन्स्टीन कहते हैं कि मैं कोई तीक्ष्ण बुद्धि का व्यक्ति नहीं हूँ| जिसे लोग तीक्ष्ण बुद्धिमता का प्रमाण समझते हैं, वह मात्र स्थिरता से चिन्तन होता है| यह मात्र गहनता से एक स्थिर विषय पर चिन्तन –मनन है| बुद्धि कोई तेज़ मस्तिष्क नहीं है, बल्कि संतुलित, स्थिर और लचीला मस्तिष्क है। बुद्धि उसी अवस्था में उत्पन्न एवं विकसित होती है, जब मन एवं चित्त, यानि चेतना की तरंगे एक निश्चित विन्यास और नेटवर्क में व्यवस्थित रुप से सक्रिय होती है|

इसीलिए स्थिर होना सीखिए और बुद्धिमान बनिए|

आचार्य प्रवर निरंजन जी

अध्यक्ष, भारतीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान| 

शुक्रवार, 9 जनवरी 2026

बौद्धिकों के चोंचले

बौद्धिकों के चोंचलेएक व्यंग्यात्मक एवं आलोचनात्मक मुहावरा तो है, लेकिन कुछ लोगों के लिए सबसे उपयुक्त भी है। चोंचले शब्द उनके दिखावटी, आडंबरपूर्ण या आत्ममुग्ध व्यवहार के लिए है, जो कुछ लोग अपनी बौद्धिकता को दिखाने के लिए करते हैं। लेकिन ऐसी बौद्धिकता का जमीनी सच्चाई, व्यवहारिक समाधान या सामाजिक उपयोगिता से बहुत कम संबंध होता है, या नहीं होता है। ऐसे लोग अपनी कुछ रटे हुए पुस्तकों पर या अधिकतर पुरातन स्थापित विचारों एवं आदर्शों की दृढ़ता पर आधारित होते हैं। ऐसे चोंचलों का बदलते वैश्विक सन्दर्भ एवं सबंधित अन्य विषयों का अद्यतन आधुनिक विज्ञान से कोई संबंध नहीं होता।

ऐसे चोंचले अद्यतन एवं जटिल लगने वाले मानवीय मनोविज्ञान सम्बन्धित विषयों पर ध्यान नहीं देते होते है| वे इस दिशा में कभी चिन्तन के लिए उत्सुक भी नहीं होते| ऐसे लोग आत्म मुघ होते हैं और असहमति दिखाने वालों को सदैव मूर्ख होने का मौखिक प्रमाण पत्र बाँटते होते हैं| ऐसे ‘जकड़े’ हुए और ‘जड़’ बौद्धिक व्यक्तिगत मनोविज्ञान एवं सामाजिक मनोविज्ञान की जटिल प्रक्रियायों के समझ के अभाव में मानव जीवन में बदलाव की भूमिकाओं को नहीं समझते होते हैं| इन चोंचलो के द्वारा कही गई बातों पर जब तथ्यात्मक संकट दिखाई देता है या इनकी तार्किक असंगतता स्पष्ट हो जाती हैं, तब ऐसे चोंचले अपनी प्रतिक्रियायों में सामाजिक मूल्यों की सीमाओं को ध्वस्त कर देता है| ऐसे ‘तड़पते हुए चोंचले’ अपने विरोधी पक्ष के व्यक्तिगत बातों पर उतर जाता है, उनकी पत्नी और बच्चों पर व्यक्तिगत टिप्पणी देंगे, मानो वे न्यायाधीश है।  इन ‘तड़पते हुए चोंचलों’ की तब बेचैनी बहुत बढ़ जाती है|

वे अक्सर बुद्ध, नानक, कबीर, आम्बेडकर आदि के नाम ले कर ऐसे अड़ते हैं, मानों उन महान व्यक्तियों ने उन्हें अपने पास बैठाकर उन्हें लिखवा दिया था। ये बौद्धिकता के चोंचले उनके प्रामाणिक वक्ता बनते हुए होते हैं। ऐसे चोंचले उन स्थापित विद्वानों को मात्र ढाल बनाते हैं, जबकि उन चोचलों की बातों का इन संदर्भित विद्वानों की बातों और उनके सन्दर्भों से कोई लेना –देना नहीं होता है|

कुछ तो ऐसे चोंचले मिलते हैं, जो यह भी कहते मिलेंगे ऐसा किस पालि ग्रंथों में लिखा है? ऐसे चोंचले दुनिया की हर बात को पालि से ही जोड़ते होते हैं| ऐसे चोंचले एक ‘अनुवादक’ होने के कारण अपने को सर्वज्ञाता समझते हैं| ऐसे चोंचले ‘अनुवादक’ होना और ‘इतिहासकार’ होना एक समझते हैं, जबकि यह दोनों एक –दुसरे से सम्बन्धित होते हुए भी अलग अलग क्षेत्र होता है|

ऐसे चोंचले ऐसा भी मानते हैं कि भारतीय बुद्धत्व की परम्परा के स्थापित बुद्धों ने स्वयं उन त्रिपितकों को लिखा है| यह स्थापित तथ्य है कि बुद्धों की परम्परा सदियों की एक लम्बी अवधि की रही और अंतिम 28वें  बुद्ध के महापरिनिर्वाण के एक सदी के बाद प्रथम संगीति होने की चर्चा मिलती हैं| यह भी एक तथ्य है कि कागजी प्रमाण कागज के आविष्कार के बाद ही कागज पर उतारे या लिखे गए होगे| ऐसी स्थिति में शब्दों के ‘सतही अर्थ’ की अपेक्षा उनके ‘निहित अर्थ’ महत्वपूर्ण हो जाता है।  ऐसे अनुवादकों को ‘संरचनावाद’ की समझ होनी चाहिए| तब किसी वाचन को किसी व्यक्ति का प्रमाणिक वकतव्य मान कर बहुत उछाल कूद करने वाले चोचले ऐसा कैसे कह सकते हैं कि शब्द के शब्द उन्ही विद्वानों के द्वारा और ऐसे ही क्रम में अंकित कराये गये थे| ऐसे चोंचलों को भाषा के ‘संरचनावाद’ और ‘विखंडनवाद’ के दर्शन की कोई समझ नहीं होती| वे सिर्फ अपने घायल अहम् को ठीक करने के उद्देश्य से उछाल कूद करते होते हैं|   

ऐसे चोचले अंग्रेजी, पालि और संस्कृत के जटिल शब्दों का अनावश्यक प्रदर्शन करते दिख सकते हैं| ऐसे लोग वास्तविक सामाजिक एवं सांस्कृतिक समस्याओं से जमीनी आधार पर कटे हुए होते हैं| यह इनके अकादमिक या वैचारिक नखरे का एक प्रतिरुप माना जा सकता है| ये चोंचले विमर्श की समझ बढ़ाने के बजाय अहं-प्रदर्शन का बहस बना देते हैं| मैं अन्तिम सत्य जानता हूँका भाव उनके पूरे व्यक्तित्व पर छाया रहता है|

ऐसे चोंचले जमीनी सवालों पर समाधान देने के बजाय केवल संदर्भ और उद्धरण गिनाते रहते हैं| ऐसे चोंचलों का अपनी कोई जमीनी कार्य –योजना या कोई कार्य –अभियान नहीं होता है| ऐसे चोंचले असहमति दिखाने वालों को सिर्फ मूर्खता का प्रमाण –पत्र और स्वयं को बौद्धिकता का प्रमाण लेते हुए कहीं भी उपलब्ध होते हैं| ऐसे चोंचले हर विषय को सैद्धांतिक शुद्धताके नाम पर व्यावहारिकता से काट देते हैं| इन चोचलों के शब्द बौद्धिकता के विरोध में नहीं होते हैं, बल्कि खोखली बौद्धिकता और दिखावटी प्रज्ञा की आत्म –संतुष्टि के लिए होता है।

बौद्धिकों के चोंचलेसमकालीन समाज में अधिकतर टीवी बहसों, सोशल मीडिया, अकादमिक मंचों और वैचारिक आंदोलनों में दिखता होता है| ऐसे बौद्धिक चोंचले टीवी डिबेट की संस्कृति में दिखते हैं, जहाँ विचार विमर्श के नाम पर, प्रदर्शन के लिए बहस मात्र होता है| आज के न्यूज़ चैनलों पर तथाकथित बौद्धिक अक्सर मुद्दे को समझाने के बजाय शब्दों का जादू दिखाते होते हैं| बौद्धिक विमर्श को ज्ञान के उपयोग की नहीं, बल्कि नैतिक श्रेष्ठता की लड़ाई बना देते हैं| यह बौद्धिकता समझाने का माध्यम नहीं  होकर सिर्फ चौंकाने का औज़ार बन जाती है।

अधिकतर बौद्धिक चोंचलों का रवैया अगर आप सहमत नहीं हैं तो आप अज्ञानी या मूर्ख हैंका होता है| ऐसे चोंचले समाधान से अधिक तथाकथित शुद्धता पर अड़े या जड़े हुए होते हैं| ये व्यावहारिक सुधारों को आदर्श से विचलनबताकर खारिज कर देते हैं| ऐसे चोंचले जमीनी सीमाओं को स्वीकार करने के बजाय सैद्धांतिक शुद्धता के नाम पर जमीनी स्तर पर कुछ नहीं करते होते हैं| यह पूरी तरह सही नहीं हैकहकर आंशिक समाधान भी रोक देते हैं| परिणामत: समस्या बनी रहती है, और बौद्धिकता का प्रदर्शन जारी रहता  है।

ऐसे चोंचले वृहत समाज को ढोंगी, पाखण्डी और कर्मकाण्डी बता कर अपने को विशिष्ट बौद्धिक मात्र साबित करता है| ऐसे चोंचले समाज को कोई वैकल्पिक समुचित समाधान नहीं देता है| ऐसे चोंचले समाज से संवाद की कड़ी को भी खण्डित कर सिर्फ अपनी बौद्धिकता का प्रदर्शन करते दिखते है|

आचार्य प्रवर निरंजन जी

अध्यक्ष, भारतीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान| 

शुक्रवार, 2 जनवरी 2026

मानव चेतना की अनन्ता

‘चेतना’ (Consciousness) किसी ‘जीवन’ में होता है| ‘चेत’ (Alert) जाना ही ‘चेतना’ है| ‘चेतना’ ही ‘जागरुकता’ है| ‘जानने की क्षमता’ ही ‘चेतना’ है| ‘चेतना का अहसास’ उर्जा के प्रवाह और उसके रूपान्तरण से होता है| उर्जा के प्रवाह और उसके रूपान्तरण से ‘संकेत’ (Signal) बनते हैं| उन संकेतों के विशिष्ट आव्यूह (Matrix) से ‘सूचना’ (Information) का निर्माण होता है| सूचनाओं के व्यवस्थित और संगठित स्वरुप को ‘ज्ञान’ (Knowledge) कहते हैं| किसी चीज को यथास्थिति में जानना ‘ज्ञान’ है| ‘ज्ञान’ के सकारात्मक या नकारात्मक उपयोग एवं प्रयोग को ‘बुद्धि’ (Intellect) कहते हैं| ‘ज्ञान’ का उपयोग या प्रयोग अपने लिए करना ‘बुद्धि’ कहलाता है| ‘ज्ञान’ का प्रयोग या उपयोग ‘मानवता’ या ‘मानवता के भविष्य’ के लिए करना ‘प्रज्ञा’ (Wisdom) कहलाता है| यह सब चेतना के विभिन्न ‘स्तर’ (Level) हैं| इसे कोई चेतना के विभिन्न ‘स्वरुप’ (Form) और ‘प्रतिरुप’ (Pattern) कह सकते हैं| एक आदमी का चेतना एक सामान्य जानवर से लेकर प्रज्ञावान तक हो सकता है|

चेतना की अवस्था में कोई अपने भीतर या अपने से बाहर की दुनिया के प्रति सजग और सतर्क होता है| इस चेतना में विचार, भावनाएँ, और प्रत्यक्ष ज्ञान शामिल रहता है| जीवन दो तरह का होता है, एक पादप –जीवन (Plant –Life) होता है, और दूसरा जन्तु –जीवन (Animal –Life) होता है| पादप स्वयं चलायमान नहीं होता है, इसीलिए इसकी चेतना सीमित मात्रा में कार्यरत होती है| हमलोग जन्तु की श्रेणी में आते हैं| जन्तु चलायमान होता है| जंतुओं में स्तनपायी (Mammal) सबसे ज्यादा चेतनशील होते हैं| मानव भी एक स्तनपायी जीव है| मानव का चेतना स्तर और इसका प्रतिरुप सर्वोत्कृष्ट और उच्चस्थ होता है|

मानव अपनी चेतना के विस्तार से ‘होमो सेपियंस’ (पशु मानव) से ‘होमो फेबर’ (निर्माता मानव), होमो सोशिअस’ (सामाजिक मानव), ‘होमो साइन्टिफिक’ (वैज्ञानिक मानव) और ‘होमो स्पिरिचुअल’ (आध्यात्मिक मानव) बन गया है| मानव चेतना का विस्तार अनन्त तक हो सकता है| मानव चेतना की विस्तार की कोई निश्चित सीमा नहीं हो सकती| मानव चेतना का स्तर अब ज्ञान, बुद्धि और प्रज्ञा तक पहुँचा हुआ है| अब इसके विस्तार करने और गहराइयों में उतरने की जरुरत है| लेकिन यह कैसे सम्भव हो सकता है?

मानव चेतना का विस्तार ‘तर्क’ और ‘कल्पना’ के आधार पर हो सकता है| जहाँ तर्क हमें यथार्थ के धरातल पर खड़ा रखता है, वहीं कल्पना हमें अनन्त आकाश में उड़ान भरने की प्रेरणा देती है। आईन्स्टीन ने कल्पना को तर्क और परिश्रम से बहुत महत्वपूर्ण माना| ये ‘तर्क’ और ‘कल्पना’ मानव विकास के आधार स्तंभ हैं| परंतु इन दोनों की अपनी-अपनी सीमाएँ और संभावनाएँ हैं। तर्क की अपनी सीमाएँ होती है और इसके सहारे आप कुछ सीमित दूरी तक जा सकते हैं| कल्पना सीमाविहीन होती है और कोई कल्पना के सहारे अनन्त तक पहुँच सकता है|

आईन्स्टीन अपने बारे में कहते हैं कि मैं विलक्षण बौद्धिकता का व्यक्ति नहीं हूँ| मेरी कल्पनाशीलता मुझे विशिष्ट और भिन्न बनाती है| वे कहते हैं कि अपनी चिन्तनशीलता के कारण वे विशिष्टता और भिन्नता की स्थिति पाते हैं| चिन्तनशीलता ही कल्पनाशीलता है| यह चिन्तनशीलता विचारों पर ठहराता है और गहराइयों में उतारता है। अल्बर्ट आइंस्टीन कहते हैं कि आप तर्क से अ (A) से ज्ञ (Z) तक जा सकते हैं| लेकिन आपकी कल्पनाशीलता आपको कहीं भी ले जा सकता है। मानवता में अद्वितीय योगदान तार्किक और कल्पनाशीलता से मिली है| इन दोनों में कल्पनाशीलता का स्थान तार्किकता से अलग, उच्चतर, विशिष्ट और सर्वोच्च है|

तर्क का कार्य वस्तुओं, घटनाओं और विचारों को प्रमाणों और कारणों के आधार पर समझना है। यह मनुष्य को भ्रामक विश्वासों और अंधविश्वासों से मुक्त करता है। परंतु तर्क की सबसे बड़ी सीमा यह है कि वह केवल उस क्षेत्र में कार्य कर सकता है, जिसे इन्द्रियाँ अनुभव कर सकती हैं या जिसे बुद्धि प्रमाणित कर सकती है। तर्क अदृश्य, अमूर्त या भावनात्मक सत्य को नहीं पकड़ सकता। प्रेम, सौन्दर्य, श्रद्धा या ईश्वर जैसे अनुभव तर्क की सीमा से बाहर हैं। तर्क यदि अति-प्रबल हो जाए, तो वह जीवन को यांत्रिक और भावना शून्य बना देता है।

कल्पना वह शक्ति है जो हमें दृश्य से अदृश्य, ज्ञात से अज्ञात और सीमित से असीम की ओर ले जाती है। विज्ञान की हर खोज और कला की हर रचना कल्पना की ही देन है। कल्पना वह सेतु है जो मानव को सृजनशील बनाती है। इसका कोई निश्चित क्षेत्र नहीं है| यह विचार, भाव, और स्वप्न के संसार में असीमित रूप से विचरण करती है। यही कल्पना की अनन्ता है| यहीं से धर्म, दर्शन और कला का उद्भव हुआ। चेतना के असीमित विस्तार का यही मुख्य आधार है| आप तर्क के सहारे सदैव आगे नहीं बढ़ सकते, लेकिन आप कल्पनाशीलता के साथ कहीं से और कभी भी आगे बढ़ सकते हैं|

मनुष्य के समग्र विकास के लिए तर्क और कल्पना दोनों का संतुलन आवश्यक है। केवल तर्क पर आधारित जीवन सूखा और सीमित होता है| केवल कल्पना पर आधारित जीवन भ्रम और अस्थिरता में डूब सकता है। जब तर्क दिशा देता है और कल्पना उसमें ऊर्जा भरती है, तब सृजन का चमत्कार घटित होता है।

तर्क हमें यह सिखाता है कि क्या है? कल्पना हमें यह दिखाती है कि क्या हो सकता है? तर्क की अपनी सीमाएँ हैं| कल्पना की कोई सीमा नहीं। इसी कारण मानव सभ्यता एवं संस्कृति  का विकास तर्क की ठोस भूमि और कल्पना के अनन्त आकाश दोनों के सम्मिलन से संभव हुआ है|

आप मानव चेतना का अनन्त विस्तार अपनी ‘तर्कशीलता’ और ‘कल्पनाशीलता’ के साथ कर सकते हैं| इसलिए आप अपनी ‘तर्कशीलता’ और ‘कल्पनाशीलता’ की क्षमता का विस्तार करते रहिए| यही आपको विशिष्ट, उच्चतर और लाभकारी बनाएगी|

आचार्य प्रवर निरंजन जी

अध्यक्ष, भारतीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान|

स्त्रियाँ क्या होती है?

सवाल यह है कि स्त्रियाँ क्या होती है ? प्राकृतिक व्यवस्था में एक स्त्री क्या होती है? दूसरे स्तनपायी पशुओं एवं अन्य जीवों में इनकी क्या व्यव...