जी, यहाँ आदमियों की मौतों के बारे में बात हो रही
है| शारीरिक मौतों के बारे तो सब कोई बहुत कुछ जानते हैं, लेकिन आज हमलोग सामाजिक
मौतों और ऐतिहासिक मौतों के बारे में विश्लेषण करेंगे| शारीरिक मौतों, सामाजिक
मौतों, और ऐतिहासिक मौतों के अतिरिक्त और भी कई प्रकार मौतें हो सकती है| लेकिन ‘कुत्तों
की मौत’ मरने वाले आदमियों को प्रसंग में लाये बिना यह प्रसंग अधूरी रहेगी|
वैसे तो हर सामान्य स्तनपायी पशुओं के जीवन की तरह
आदमी भी एक सामान्य ‘स्तनपायी –जीव’ (Mammal) है; इसलिए यह भी जन्म लेता है,
विकसित होता है, प्रजनन करता है, अपने द्वारा प्रजनित को पालता पोषता है, और उसको
देखते हुए मर भी जाता है| ऐसी विशेषता वाले हर स्तनपायी “पशु” ही कहलाते हैं, चाहे
वह ‘आदमी’ भी दिखता है| सभी स्तनपायी ‘पशु’ सिर्फ और सिर्फ अपने जैवकीय आवश्यकताओं
से नियमित एवं संचालित होता है| पशु अपना व्यवहार सिर्फ जैवकीय आवश्यकताओं के
लिए अपनी प्रतिक्रिया मात्र करता है| इन्ही प्रतिक्रियायों को “प्रतिवर्त क्रिया”
(Reflex Action) कहते हैं और इसमें किसी चिन्तन की आवश्यकता नहीं होती है| वैसे ‘चिन्तन
करने की कला’ सिर्फ और सिर्फ आदमी ही कर सकता है| इसीलिए ‘चिन्तन विहीन’
आदमी “पशु –मानव” (Animal –Man) कहलाता है|
जब कोई आदमी अपने ‘चिन्तन’ की प्रक्रिया में अपनी
जैवकीय आवश्यकताओं से उपर उठ जाता है, तब वह “बौद्धिक –मानव” (Intellect –Man)
कहलाने योग्य हो जाता है| जिनका भी शारीरिक जन्म होता है, उन सभी की शारीरिक मौतें भी होती है, चाहे वह ‘चिन्तनशील’ हो या वह ‘चिन्तनशील’ नहीं हो| जब कोई आदमी अपने
‘चिन्तन’ की प्रक्रिया में अपने परिवार के अलावे समाज को शामिल का लेता है, तो वह ‘महान
–मानव’ (The Great Man) बन जाता है| जब कोई आदमी अपने ‘चिन्तन’ की प्रक्रिया में अपने परिवार और
समाज के अलावे सम्पूर्ण ‘मानवता’ और ‘मानवता के भविष्य’ को भी समाहित कर लेता है,
तो वह “बुद्ध” कहलाता है| लेकिन समाज में ‘झन्डा’ ढोने वाले, या ‘डंडा’
उठाने वाले, या ‘दरी’ बिछाने वाले कभी भी ‘महान –मानव’ नहीं बन
पाते हैं|
‘सामाजिक मौतें’ वे मौतें होती है, जिनमें आदमियों
के शारीरिक मौतों की तनिक भी परवाह तत्कालीन समाज नहीं करता है| ‘सामाजिक मौतों’ को
समझने के लिए हमें ब्रह्माण्ड का एक सार्वभौमिक सिद्धांत को समझना होगा|
ब्रह्माण्ड का हर वस्तु सदैव ब्रह्माण्ड से ऊर्जा प्राप्त (Receive) करता रहता है
और ऊर्जा उत्सर्जित/ छोड़ता (Radiate) रहता है| यह सिद्धांत सभी निर्जीव और सजीव – दोनों
पर सामान रूप से लागू होता है| जब कोई वस्तु प्राप्त किए गए ऊर्जा से अधिक ऊर्जा
उत्सर्जित करता है, तब वह ‘ठंडा’ होने लगता है; और इसके विपरीत अवस्था में वह ‘गर्म’
होने लगता है| इसी तरह, उर्जा –प्राप्ति और उर्जा -उत्सर्जन का संतुलन ही ‘जीवन’ है|
यही सिद्धान्त ‘’सामाजिक जीवितता/ जीवन्तता’’ और
‘‘सामाजिक मौतों’’ पर लागू होता है| जब कोई आदमी अपने सामज से धन, सम्मान,
प्यार और ऊर्जा आदि कमाता है या प्राप्त करता है, और समाज को कुछ भी वापस (उत्सर्जित)
नहीं करता है, तब वह मानसिक रुप से बीमार
हो जाता है, या ‘सामाजिक रुप से मर’ जाता है| ऐसी अवस्था को ‘सामाजिक
मौत’ कहा गया है| ऐसे आदमियों की परवाह समाज नहीं करता है|
‘ऐतिहासिक मौतें’ वे मौतें होती है, जिनको इतिहास
की पन्नों में कोई स्थान नहीं मिलता है| ऐसी मौतों को समझने के
लिए हमें अर्थव्यवस्था के ‘पाँचों प्रक्षेत्रों’ (Five Sectors) के कार्यों को
समझना पडेगा| आदमी के जीवन को ‘अर्थ’ देने के लिए जो व्यवस्था किया जाता
है, उसे ही ‘अर्थ की व्यवस्था, या 'अर्थव्यवस्था’ कहते हैं| जो
आदमी सिर्फ अर्थव्यवस्था के प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय – तीनों प्रक्षेत्रों में
योगदान देता है, उसे इतिहास के पन्नों में कोई भी स्थान नहीं मिलता है| इन तीन
प्रक्षेत्रों में सफल आदमी समृद्ध हो सकता
है, ताकतवर हो सकता है, संतुष्ट हो सकता है,, लेकिन उन्हें ‘इतिहास’ याद नहीं करता है| इसी तरह, समाज में ‘झन्डा’ ढोने
वाले, या ‘डंडा’ उठाने वाले, या ‘दरी’ बिछाने वाले कभी भी
इतिहास के पन्नों में नहीं आते हैं|
इन तीन प्रथम प्रक्षेत्रों में योगदान करने वालों
की ‘ऐतिहासिक मौतें’ निश्चित होती है| जो आदमी अर्थव्यवस्था के उपरी अन्तिम
दोनों प्रक्षेत्रों – चतुर्थ प्रक्षेत्र (Quarternary Sector) और पंचक प्रक्षेत्र (Quinary Sector) में
योगदान करते हैं, सिर्फ उनको ही इतिहास के पन्नों में स्थान मिलता है; और ऐसे
लोग ऐतिहासिक रुप में जीवित होते हैं| यहाँ यह स्पष्ट रहना चाहिए कि ‘सामाजिक
जीवित’ व्यक्तियों की भी ‘ऐतिहासिक मौतें’ हो जाती है|
‘कुत्तों की मौत’ मरने वाले व्यक्तियों
में वे ‘ऐतिहासिक व्यक्ति’ शामिल माने जाते हैं, जिनका समाज में योगदान को नकारात्मक
या विध्वंसात्मक रहता है| ऐसे ऐतिहासिक व्यक्तियों की मौतों को ‘कुत्तों’ की ‘मौत’ की उपमा
दी जाती है| ऐसे व्यक्तियों में ‘क्रूर शासक’, ‘संवेदनहीन शासक’, ‘लुटेरा शासक’, ‘कठपुतली शासक’, ‘नस्लवादी या जातिवादी’ शासक, ‘आतंकवादी शासक’ आदि इन सूचियों में शामिल
होते हैं| इनमे इनके सलाहकार ‘नीति –नियन्ता’ भी शामिल माने जाते हैं| ये आदमी ‘ऐतिहासिक’
तो होते हैं, लेकिन ‘सामाजिक’ नहीं होते हैं| तानाशाहों, नाजीवादी, संवेदनहीन
शासकों की मौतों को ‘कुत्तों’ की मौत’ मरना कहा जाता है|
‘सामाजिक जीवन्तता’ तो तात्कालिक समाज के
सन्दर्भ में होता है, लेकिन ‘ऐतिहासिक जीवन्तता’ इतिहास के काल के लिए होता
है| दार्शनिक बुद्ध का ‘सामाजिक और ऐतिहासिक मौत नहीं हुआ| वैज्ञानिक गैलीलियो
का ‘सामाजिक मौत’ तो हुआ होगा, लेकिन उनका ‘ऐतिहासिक मौत’ नहीं हुआ| अब आप यह
निर्णय ले सकते हैं, कि कौन आदमी कैसी मौत
मरा?
आचार्य
प्रवर निरंजनजी
शिक्षक, लेखक, प्रेरक एवं दार्शनिक
अध्यक्ष, अन्तर्राष्ट्रीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन
संस्थान
Get solutions to your
personal problems at Ask Acharya Ji