(Conditioning of History)
हर ‘इतिहास’
को ‘अनुकूलन’ करना होता है| यह अनुकूलन भी दो प्रकार का और दो भिन्न प्रक्रियायों
से होता है| एक अनुकूलनशीलता इतिहास की व्याख्या में होता है| इसमें एक इतिहासकार इतिहास
की व्याख्या बदले हुए समाज की चेतना, मूल्य, आवश्यकताओं और विश्व दृष्टिकोण के अनुसार करता है| दूसरे अनुकूलनशीलता में, वह
इतिहास भी स्वयं नए काल के साधन एवं शक्तियों के प्रभाव में अनुकूलित होने लगता
है| अर्थात उस इतिहास की “क्या”, “क्यों” और “कैसे” की भी व्याख्या बदले हुए परिस्थितियों
की चेतना, मूल्य, आवश्यकताओं और विश्व दृष्टिकोण के अनुसार होने लगता है| इसमें
संस्कृतियाँ नए समय के परिस्थितियों में ढलने लगती है| यानि यह अनुकूलित होने लगती
है| तब इतिहास बहुत –कुछ बदल जाता है|
यदि
किसी क्षेत्र में जन समुदाय की निरन्तरता बनी रहती है, उसकी सभ्यता और संस्कृति भी
अनुकूलित होने लगती है| जन समुदाय के विस्थापन की अवस्था में उसकी सभ्यता (व्यवस्था
का हार्डवेयर) भले ही छूट जाए, लेकिन उसकी संस्कृति (व्यवस्था का साफ्टवेयर एवं
फ़िज़ावेयर) में अनुकूलन के साथ निरन्तरता बनी रहती है| इस अनुकूलनशीलता को समझे
बिना इतिहास का हर समझ और ज्ञान आंशिक है, अधूरा है|
इतिहास
की शुरुआत मानव के पहाड़ों पर से उतर कर नदियों और झीलों के कछारों में बसने से शुरु
हुई| कृषि के आधार पर ही अर्थव्यस्थाओं के समस्त प्रक्षेत्र यानि पाँचों
प्रक्षेत्रों (Sectors) का उद्भव और उद्विकास हो सका| जब समाज के आर्थिक उत्पादन, वितरण,
विनिमय एवं उपभोग के साधन और शक्तियाँ बदली, तो इतिहास भी बदल कर नए साधन और
शक्तियों में अनुकूलित होने लगी| इन्ही साधनों और शक्तियों के आधार पर इतिहास के प्राचीन
काल में बौद्धिक युग का उदय हुआ| फिर यह बदल कर मध्य काल में सामन्ती युग हो गया|
इसी के आधार पर, आधुनिक काल का साम्राज्यवादी और वैज्ञानिक युग का आगमन हुआ|
वर्तमान काल में 'वित्तीय साम्राज्यवाद' और 'डाटा साम्राज्यवाद' भी इतिहास की इसी अनुकूलनशीलता
का परिणाम है|
इस अनुकूलनशीलता
में 'इतिहास का बाह्य ढाँचा’ (Frame -works of History), यानि इतिहास के पात्र और घटनाएं तो स्थिर रहती है,
लेकिन उनके पुराने मूल्य और सांस्कृतिक स्थापनाएँ नए युग के अनुसार अनुनुकूलित
होने लगती है| भारत की वर्तमान सांस्कृतिक एवं सामाजिक ढाँचा और इसकी संरचना,
विन्यास, आंतरिक बुनावट एवं गुणवत्ता भी, सभी प्राचीन भारत का ही मध्य काल में,
यानि सामन्ती शक्तियों में अनुकूलित संस्करण है| इस समझ के बिना कोई भी भारत की
संस्कृति को सम्यक ढंग से नहीं समझ सकता है; यह स्पष्ट रहना चाहिए|
एक इतिहास
किसी अतीत की वह विवरण होता है, जो हमारी बुद्धि को बढाता है| अर्थात किसी अतीत का
विवरण यदि आपकी बुद्धि यानि आपकी समझदारी नहीं बढाता हुआ है, तो वह अवश्य ही
इतिहास के नाम पर अन्य कोई साहित्य है, लेकिन वह इतिहास नहीं है| इतिहास के पात्र
के नाम, स्थान या क्षेत्र के नाम एवं विवरण, शासन व्यवस्था और युद्ध का ब्यौरा
स्वयं इतिहास नहीं होता है, अपितु ये सब इतिहास के उदाहरण होता है, जिसके द्वारा हम
इतिहास को समझते होते हैं| यह सब विवरण या ब्यौरा ही किसी विशेष इतिहास का बाह्य
ढाँचा होता है, जो उसे आकार और आकृति (पहचान) देता है| यह बाह्य ढाँचा तो लगभग स्थिर
रहता दिखता रहता है, लेकिन इतिहास की आन्तरिक संरचना और विन्यास समय के अनुसार
बदलता रहा है| ‘इतिहास की अनुकूलनशीलता’ की यह अवधारणा इतनी महत्वपूर्ण है कि इसको
समझे बिना हर इतिहास को सही और सम्यक तरीके नहीं समझा जा सकता है|
सभी
इतिहास समय और परिस्थितियों के संसर्ग में सदैव अनुकूलित होता रहता है| जैसे
प्रकृति का हर वस्तु और जीवन अपने सन्दर्भ के बदलते समय और परिस्थितियों के संसर्ग
में अपनी निरन्तरता, यानि अपनी जीवन्तता बनाये रखने के लिए समायोजित रहती है, उसी
तरह इतिहास भी अपनी निरन्तरता बनाए रखने के लिए समय और परिस्थितियों में अनुकूलित
होता रहता है| यदि कोई इतिहास बदलते समय और परिस्थितियों के अनुसार अनुकूलित नहीं होगा,
तो उसे सन्दर्भ से बाहर होकर समाप्त हो जाना होगा| यह वैसे ही होता है, जैसे जीवों,
वनस्पतियों और भू –आकृतिकी को समय और परिस्थितियों के अनुसार अनुकूलित नहीं होने
से नष्ट हो जाना पड़ा| इस अनुकूलनशीलता में जीवों, वनस्पतियों और भू –आकृतिकी में
अपेक्षित बदलाव् हो जाता है, और इसी आधार पर वह निरन्तरता बनाए रख पाता है| इस
निरन्तरता में सारा स्वरुप बदला हुआ होता है| इस तरह इतिहास बदलता रहता है|
इतिहास
को परिस्थितियों, विचारधाराओं, मान्यताओं, राजनतिक शक्तियों, सांस्कृतिक मूल्यों,
या आर्थिक साधनों एवं शक्तियों के कारकों द्वारा प्रभावित, नियंत्रित और आकार दिया
जाता है| सभी इतिहास के दो अनिवार्य घटक होते हैं – एक, ऐतिहासिक तथ्य या साक्ष्य
और दूसरा, इतिहासकार| ऐतिहासिक तथ्य या साक्ष्य तो अतीत के होते हैं, लेकिन
इतिहासकार वर्तमान का होता है| ऐतिहासिक तथ्य या साक्ष्य स्वयं अपने आप कुछ नहीं
बताते या बोलते, बल्कि वह इतिहासकार ही उनके बहाने वह कहता है, जो वह इतिहासकार
बताना चाहता है| बदलती हुई समय और परिस्थितियों के सापेक्ष इतिहासकार नया इतिहास
प्रस्तुत करता है, जो पहले के इतिहास से भिन्न होता है|
इतिहास
सिर्फ तथ्यों और साक्ष्यों का संग्रहण नहीं होता है, बल्कि उनके सहारे मानवता के उद्विकास
की उत्कृष्ट यात्रा का व्याख्या होता है| यह इतिहास सिर्फ अतीत के ‘क्या’, ‘कहाँ या ‘कब’ को ही नहीं बताता है, बल्कि उससे
महत्वपूर्ण उस अतीत की “क्यों” और “कैसे” की व्याख्या भी करता है| यह “क्यों” और “कैसे”
की व्याख्या ही हमारी बुद्धिमता को बढ़ाती है, जिससे मानव की सभ्यता एवं संस्कृति
समृद्ध होता रहता है|
इस तरह, एक इतिहास उस अतीत काल का उस इतिहासकार
के परिप्रेक्ष्यों (नजरियों) की प्रस्तुति होती है| एक इतिहासकार अपने वर्तमान
समाज और परिवेश में रहता है, इसलिए वह इतिहासकार अपने समाज, संस्कृति, अपनी
बौद्धिकता, समझ और आवश्यकताओं के अनुसार ही व्याख्या करता है| इस तरह इतिहास का
बाह्य ढाँचा को स्थिर रखते हुए सारी व्याख्या बदल जाती है| 'साम्राज्यवादी
इतिहासकार', 'राष्ट्रवादी इतिहासकार', 'मार्क्सवादी इतिहासकार', 'नारीवादी इतिहासकार', 'दलित
इतिहासकार', 'यथास्थितिवादी इतिहासकार' और 'वैज्ञानिक (मानवतावादी) इतिहासकार', सभी अपने
अपने लक्ष्यों के अनुरुप इतिहास की व्याख्या करता है, यानि इतिहास लिखता है| इस
तरह, इतिहास के पात्र एवं घटनाएँ वही रहती है, लेकिन उसका व्याख्या यानि ‘सब कुछ’
बदल जाता है|
इसलिए
यदि भारत के सामाजिक और सांस्कृतिक इतिहास को सही और वैज्ञानिक तरीके से जानना और
समझना चाहते हैं, तो अवश्य ही ‘इतिहास की अनुकूलनशीलता’ को समझने का यत्न करे,
अन्यथा आप भी ‘यथास्थितिवादी मानसिकता’ से बेहतर नहीं हैं|
आचार्य प्रवर निरंजनजी
शिक्षक,
लेखक, प्रेरक एवं दार्शनिक
अध्यक्ष,
अन्तर्राष्ट्रीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान
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