मंगलवार, 28 अप्रैल 2026

बिल्ली पालि या अंग्रेजी में क्या बोलती है?

एक बिल्ली हिंदी में बोले, या पालि, या संस्कृत में बोले, ‘म्याऊँ’ ही बोलती है| वह दूसरा कुछ बोलती ही नहीं है| यदि वह बिल्ली अंग्रेजी, या स्पेनिश, या जापानी भाषा में भी बोलेगी, तो भी वह ‘म्याऊँ’ ही बोलेगी| इससे उसे कोई अन्तर नहीं पड़ता है कि वह टाई और कोट पहने है, या लुंगी, या धोती, या कुछ और, वह बिल्ली ‘म्याऊँ’ ही बोलेगी| मतलब यह हुआ कि उसके क्षेत्र, भाषा, धर्म, राष्ट्रीयता, संस्कृति या ओहदे के बदलने से भी उसके ‘संस्कार’ की ‘बोली’ में कोई अन्तर नहीं पड़ता| उसके धनी हो जाने से भी उसकी ‘बोली’ नहीं बदलती है|

जरा ठहर कर विचार कीजिए| क्या ऐसा ही किसी ‘दो –पाया’ (Biped/ Two –legged) पशु के साथ भी होता है? हाँ, ऐसा ही ‘दो –पाया’ (मानव) पशु के साथ भी होता है| यदि उसकी ‘चेतना’ भी एक सामान्य पशु जैसा ही हो| यहाँ ‘दो –पाया’ पशु में वर्तमान सभी मानव प्रजाति भी शामिल हो जाता हैं| वर्तमान सभी मानव का जैवकीय नाम ‘होमो सेपियंस सेपियंस’ हैं, जो मूल रुप में एक ‘स्तनपायी’ (Mammal) पशु हैं| एक पशु और एक मानव में अन्तर सिर्फ इस बात का है, कि कोई चेतना की गुणवत्ता के साथ उसके किस स्तर पर है? एक स्तनपायी पशु में भी भिन्न भिन्न मात्रा की गुणवत्ता के साथ भिन्न भिन्न स्तर का ‘चेतना’ होता है|

‘चेतना’ को ही ‘समझदारी’ भी समझते हैं| इसी ‘चेतना’ के विकास के साथ ही वर्तमान मानव एक ‘होमो सेपियंस’ से एक ‘होमो सोसिअस’ (सामाजिक मानव) और एक ‘होमो फेबर’ (निर्माता मानव) बन सका| आज यह ‘होमो फेबर’ से बहुत आगे आ कर ‘होमो साईन्टिफिक' (वैज्ञानिक मानव) बन गया है| आज यह ‘वैज्ञानिक मानव’ भी बहुत आगे बढ़ गया है| यह ‘चेतना’ का गुणवत्ता और स्तर ही है, जो ‘होमो सेपियंस’ में विभिन्न गुणवत्ता और विभिन्न स्तर निर्धारित करता है| विश्व की सभी आबादी ‘होमो सेपियंस’ होते हुए भी एक गुणवत्ता और स्तर पर नहीं है, इसीलिए इनकी ‘समझ और  संस्कार की बोली’ भी एक नहीं है| सभी ‘बिल्लियाँ’ चेतना की गुणवत्ता और स्तर में समान होती हैं, इसीलिए सभी ‘बिल्लियाँ’ किसी भी क्षेत्र, भाषा, धर्म, राष्ट्रीयता, संस्कृति या ओहदे में भी एक ही ‘बोली’ – ‘म्याऊँ’ ही बोलती हैं|

चेतना की विभिन्न गुणवत्ता और स्तर ही मानव की प्रकृति, संस्कार, स्वभाव, अभिवृति, चरित्र, और समझदारी की ‘बोली’ को बदल सकता है| मात्र ‘शारीरिक क्रियाविधियों’ में समता हो जाने से ‘समझदारी की बोली’ नहीं बदल जाती है| कुछ लोग सभी ‘बिल्लियों’ और सभी ‘मानवों’ में अन्तर नहीं समझते और इसी कारण एक ही ‘स्तर’ की ‘नैतिकता’ का निर्माण और माँग करते हैं| ऐसे लोगों को ‘प्रतिष्ठा और अवसर’ की समता और ‘सामान्य समता’ में कोई अन्तर समझ में नहीं आता| भारतीय संविधान की उद्देशिका में ‘प्रतिष्ठा और अवसर’ की समता की चर्चा है, सिर्फ समता का नहीं। ऐसे लोग ‘समान स्तर’ की ‘नैतिकता’ के नाम पर अपना प्रकृति, संस्कार, स्वभाव, अभिवृति, चरित्र, और समझदारी को बदलने का प्रयास नहीं करते| ऐसे लोग अपनी और अपने लोगों की तमाम ‘उम्र’  ‘म्याऊँ’ ‘म्याऊँ’ करने में ही गुजार देते हैं, या उसे बरबाद ही कर देते हैं|  

कुछ लोग या अधिकतर लोग समझते हैं कि वे लोग अपनी और अपने लोगों की क्षेत्र, भाषा, धर्म, राष्ट्रीयता, और संस्कृति बदल कर अपनी और अपने लोगों की भविष्य बदलने वाले हैं, तो वे भ्रमों के स्वप्नों में गोते लगाते हुए होते हैं| ऐसे लोगों का कोई ‘भविष्य’ नहीं बदलता है, वैसे ‘खुशफहमी’ में रहने के लिए सभी स्वतंत्र हैं| ऐसे लोग पहले की तरह ‘म्याऊँ’ -‘म्याऊँ’ ही बोलते रहेंगे| यदि किसी को अपनी और अपने लोगों की ‘समझदारी और संस्कार की बोली’ बदलनी हो, तो वे अवश्य ही अपनी और अपने लोगों की प्रकृति, स्वभाव, संस्कार, अभिवृति, चरित्र, और समझदारी को बदल डालें| ऐसे लोग इसे समझें और किसी अन्य भ्रम –जाल में नहीं उलझें|

यदि किसी को क्षेत्र, भाषा, धर्म, राष्ट्रीयता, और संस्कृति बदलने से ‘संस्कार और समझदारी की बोली’ में कोई अन्तर दिखता है, या ऐसा होता समझ में आता है, तो यह स्पष्ट है कि वैसे लोगों को ‘संस्कृति की गत्यात्मकता’ (Dynamics of Culture) या ‘संस्कृति की क्रियाविधि’ (Mechanics of Culture) की समझ नहीं है| ऐसे लोगो की प्रकृति, संस्कार, स्वभाव, अभिवृति, चरित्र, और समझदारी को बदलने के लिए उन्हें सजग, सचेत, समर्पित और सुनियोजित प्रयास करने होते हैं| सिर्फ ‘नैतिकता की शक्ति’ या ‘समता की माँग के भरोसे कोई भविष्य नहीं बदलता है|’इसीलिए कहा गया है कि ‘कमजोर लोग नैतिक रुप में शक्तिशाली होना चाहते हैं|’

अधिकतर लोग ‘बाजार के साधनों और शक्तियों’ के प्रभाव से बदलते रहते हैं और वे समझते रहते हैं कि उनके क्षेत्र, भाषा, धर्म, राष्ट्रीयता, और संस्कृति बदलने के कारण ही उनकी स्थिति बदल रही है| ऐसे नासमझ ‘अंधभक्तों’ को समझाया भी नहीं जा सकता है, जब तक वे अपने को ‘पूर्ण एवं अन्तिम ज्ञानी’ होने का भ्रम नहीं छोड़ेगें| ऐसा ही समझ कुछ सामाजिक और सांस्कृतिक नेतृत्व भी रखते हैं| इसका यह अर्थ नहीं हुआ कि वे ऐसा सामाजिक और सांस्कृतिक बदलाव का कोई प्रयास करें ही नहीं| लेकिन वे अपनी सफलताओं के मूल्यांकन में बाजार की आर्थिक साधनों और शक्तियों के प्रभाव का ध्यान अवश्य ही ध्यान में रखें|

अन्यथा, वे भी सामान्य ‘बिल्लियों’ की तरह ‘म्याऊँ’ ‘म्याऊँ’ ही बोलते रहेंगे| ऐसे लोग ही अपनी और अपने लोगों का समय, संसाधन, ध्यान, समर्पण, वैचारिकी और ऊर्जा ‘गलत’ दिशा में बरबाद करवाते रहेंगे| इससे ‘बिल्ली को कोई अन्तर नहीं पड़ता है कि वह टाई और कोट पहने है, या लुंगी, या धोती, या कुछ और; वह’ बिल्ली’ ‘म्याऊँ’ ही बोलेगी| मतलब कि उसके क्षेत्र, भाषा, धर्म, राष्ट्रीयता, संस्कृति या ओहदे के बदलने जाने मात्र से भी उसे कोई अन्तर नहीं पड़ता| वह ‘बिल्ली’ ‘संस्कार और समझदारी’ की बोली नहीं बोल कर मात्र ‘म्याऊँ’ ‘म्याऊँ’ ही बोलती रहेगी|

आचार्य प्रवर निरंजन  जी

अध्यक्ष, अन्तर्राष्ट्रीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान|

शनिवार, 25 अप्रैल 2026

सत्य हमारे पूर्वाग्रहों का प्रतिबिम्ब होता है

हमारा प्रत्येक सत्य हमारे पूर्वाग्रहों और मान्यताओं का प्रतिबिम्ब होता है| हमें उस अपने पूर्वाग्रहों के प्रतिबिम्ब में वही सत्य दिखता है, जिसे हम सत्य मानते होते हैं| किसी तथ्य के प्रति जैसा हमारा मानना होता है, वैसा ही हमारा सत्य होता है| इस तथ्य के सत्य के घेरे में लगभग हम सभी लोग आ जाते हैं| इस सत्य का आधार हमारा ज्ञान और हमारी समझदारी होता है, जिसे हम अन्तिम रुप में जानते और मानते होते हैं| हमारे ज्ञान और समझ का जो स्तर हमारा है, वही ज्ञान और समझ मेरे लिए अन्तिम सत्य होता है| यह ज्ञान और समझ समय के साथ सुधरता रहता है या बदलता रहता है, यदि हम बदलने को सगज हो| हमारा अन्तिम ज्ञान और हमारी अन्तिम समझ हमारे किए अन्तिम सत्य होता है, क्योंकि यही मेरा पूर्वाग्रह मुझे समझाता है| कोई भी व्यक्ति पढ़ा लिखा है, या अशिक्षित है, उनके सत्य के निर्धारण में उनकी पूर्वाग्रहों और मान्यताओं की ही भूमिका प्रमुख होती है|

इसे एक उदाहरण से समझें| मैंने एक बार बुद्ध की एक बात लिखी, जिस पर एक तथाकथित ज्ञानी ने आपत्ति किया|| आपत्ति कर्ता ज्ञानी ने तुरन्त यह सवाल किया कि यह बात यदि बुद्ध की है, तो यह त्रिपिटिक के किस भाग और किस सूक्त में लिखित है? वह ज्ञानी त्रिपिटिक को ऐसे बता रहे थे, मानों स्वयं किसी बुद्ध ने उस पुस्तक को लिखा हो, और उस त्रिपिटिक के बाहर की कोई बात बुद्ध की हो ही नहीं सकती| वह  ज्ञानी भाषा और साहित्य के ‘विखंडनवाद’ (Deconstructionism) की समझ नहीं दिखा रहा था| उन्हें इसका भी ज्ञान नहीं था, कि ‘हर इतिहास समकालिक होता है’| बीते हुए काल का कोई विवरण या ब्यौरा ‘इतिहास’ की सामग्री हो जाती है| इतिहास की हर सामग्री का जब लेखन या संपादन होता है, तब उन सभी सामग्रियों को समकालिक स्थितियों और शक्तियों के अनुरप हो जाना होता है| ऐसे हर लेखन में उसका लेखक ‘विखंडनवाद’ के प्रभाव में भी होता है| तब वह हर तथ्य, जो उस पुराने पुस्तक में दर्ज था, उस लेखक के पूर्वाग्रहों और मान्यताओं’ के अनुकूल हो जाता है|

बुद्धि की यह बात भी मेरे पूर्वाग्रहों के प्रतिबिम्ब में ‘सत्य’ था| बुद्धि की इस बात को मैंने बुद्ध की बात क्यों बतायी? वैसे डा आम्बेडकर अपनी पुस्तक – ‘बुद्ध और उसका धम्म’ की भूमिका में लिखते हैं, कि जो बात बुद्धि की नहीं है, वह बात बुद्ध की हो ही नहीं सकती| अर्थात उस समकालिक दुनिया में हरेक बुद्धि की बात ‘बुद्ध’ की बात थी| यहाँ यह भी स्पष्ट हो जाना चाहिए कि हर बुद्धिवादी ‘बौद्ध’ है|

यहाँ यह भी स्पष्ट हो जाना चाहिए कि ‘बुद्ध’ एक व्यक्ति भी रहे और बुद्ध एक संस्था भी थे| सिद्धार्थ गोतम ‘बुद्ध’ की संस्था की परम्परा के अंतिम और 28 वें 'बुद्ध'' माने गए| सिद्धार्थ गोतम को अपने 35वें वर्ष में ‘बुद्धत्व’ की उपाधि प्राप्त हुई थी| ‘बुद्धत्व’ एक उच्चस्थ, उत्कृष्ट एवं विशिष्ट बुद्धि –प्राप्ति की उपाधि थी| अन्तिम बुद्ध के मृत्यु (महापरिनिर्वाण) के एक सौ साल बाद सभी बुद्धों के वचनों का संग्रहण करने के लिए प्रथम संघ बुलाने का दावा किया गया| इस संघ के बाद ही बुद्ध –वचनों के संग्रहण का कार्य शुरु हुआ होगा| बताया गया कि सभी बुद्धों के वचनों का संग्रहण त्रिपिटक में किया गया है|

वैसे सभी सत्य सापेक्षिक होता है, क्योंकि संदर्भ बदलने से सत्य बदल जाता है| लेकिन यह बात पूर्वाग्रह के प्रतिबिम्ब की बात से एक अलग विषय है| बुद्ध ने बताया कि इस ब्रह्माण्ड में एक ही सत्य है, कि ‘कुछ भी सत्य नहीं है|’ हर चीज, यानि हर तथ्य हर क्षण बदलता रहता है, जिसे ‘क्षणिकवाद’ कहा गया| अल्बर्ट आइन्स्टीन ने समय को भी सापेक्ष बता दिया| वैसे आज तक ब्रह्माण्ड के हर चीज को चार विमाओं (Dimensions) के सापेक्ष ही समझा जाता रहा है, लेकिन गणितीय संगणनाओं में कुल ‘12’ विमाओं के अस्तित्व का पता चलता है| इन सभी के या इनके कुछ अवयवों के सापेक्ष तो ‘सत्य’ और फिसलता रहेगा| स्पष्ट है कि एक ही तथ्य बदलते व्यक्तियों के सापेक्ष बदल जाता है|

‘ईश्वर’ है, या नहीं है? यह भी तथ्य से सम्बन्धित ‘सत्य’ का प्रश्न है| दोनों तरह के उत्तर सही है, या दोनों तरह के उत्तर गलत है| लेकिन ‘सत्य’ के ये पक्षधर भी ‘ईश्वर’ की अवधारणा को स्पष्ट परिभाषित किये बिना ‘गलत’ और ‘सही’ करते रहते हैं| हालाँकि दोनों के सत्य दोनों के लिए सही है| दोनों ‘सत्य’ के प्रभाव सकारात्मक मिलते हैं| दोनों ही अपनी मान्यताओं में सही होते हैं, सत्य में भी सही होते हैं और प्रभाव में भी सही होते हैं| यह सब उनके पूर्वाग्रहों का प्रतिबिम्ब मात्र हैं|

इसलिए प्रत्येक का सत्य (Truth) अलग अलग होता है| प्रत्येक का सत्य उनके लिए सही (Correct) भी होता है और उनके लिए प्रभाव भी डालता है| चिकित्सा विज्ञान की भाषा में ‘प्लेसीबो प्रभाव’ (Placebo Effect) यही है, जिसका प्रभाव वैज्ञानिक ढंग से स्थापित है| मैं अकसर कहता हूँ कि एक ही तथ्य के अनेक सत्य होते हैं और सभी सही भी होते हैं| इस विवाद का कोई मतलब नहीं होता है कि हमारा सत्य सही है और तुम्हारा सत्य मूर्खतापूर्ण है| कुछ ‘मूर्ख’ लोग इसीलिए दूसरो को ‘मूर्खता’ का प्रमाण पत्र बाँटते रहते हैं| ऐसे लोग ‘टिटहरी’ की तरह अपने पैरो पर आसमान को टिकाये हुए होते हैं|

आचार्य प्रवर निरंजन  जी

अध्यक्ष, अन्तर्राष्ट्रीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान|

सोमवार, 13 अप्रैल 2026

डॉ हेडगेवार और एन्टोनियो ग्राम्शी में सम्बन्ध

डॉ हेडगेवार एक भारतीय नायक रहे हैं, जिन्होंने भारत में ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ की स्थापना की| यह संगठन आज विश्व का सबसे बड़ा ‘नागरिक समाज’ का संस्था है| यह संगठन स्वयंसेवकों द्वारा भारतीय राष्ट्र के निर्माण के लिए गठित हुआ| लेकिन इनके बारे में कतिपय भारतीय बौद्धिकों में बहुत भ्रम बना हुआ है| मैं किन्हीं के भ्रम का निवारण भी नहीं करना चाहता हूँ, क्योंकि सभी को एक विचार पर सहमत नहीं किया जा सकता| मैं इनके बारे में एक ऐसा ‘तथ्य’ का प्रस्तुतीकरण करना चाहता हूँ, जिसके बारे मैंने आज तक कहीं नहीं सुना या पढा|

दरअसल एक ‘सत्य’ भी सभी के अपने पूर्वाग्रहों का दर्पण होता है| इतना ही नहीं, किताबों में जो लिखा होता है, उसका सदैव वही अर्थ नहीं समझा जाता, जो उस किताब के लेखक का होता है| किताबों में लेखक अपनी समझ के अनुसार लिखता है, लेकिन उसका पाठक उसका वही अर्थ समझता है, जो वह समझना चाहता है| भारत में डॉ हेडगेवार के सम्बन्ध में भी यही हुआ है| सब कोई सस्ता और साधारण अर्थ निकलना चाहता है, क्योंकि गहन अर्थ के लिए अतिरिक्त समय और ‘आलोचनात्मक चिन्तन’ का बौद्धिक श्रम की आवश्यकता होती है| उनके ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ और ‘हिन्दवी राज्य’ की अवधारणा भी ऐसा ही श्रम –साध्य अवधारणा है| लोगों ने ‘संस्कृति’, ‘राष्ट्र’ और ‘हिन्दवी’ को नहीं समझा, ‘राष्ट्र’ को ‘देश’ समझा और सम्राट शिवाजी के ‘हिन्दवी’ को एक ‘धर्म’ समझा|  इनकी ‘राष्ट्र’ की अवधारणा वही है, जिसे जोसेफ स्टालिन ने 1813 में रचित अपनी किताब – ‘मार्क्सवाद एवं उनकी राष्ट्रीय समस्याएँ’ में दिया था|  

ऐसा माना जाता है कि डॉ हेडगेवार पर किसी विदेशी दार्शनिको एवं क्रांतिकारियों का प्रभाव नहीं पड़ा| ऐसे विद्वान् यह भूल जाते हैं कि डॉ हेडगेवार अपने छात्र जीवन में बंगाल के ‘अनुशीलन समिति’ के सक्रिय सदस्य रहे|  बगाल का ‘अनुशीलन समिति’ अपने समय का भारत के सबसे बड़े और सशक्त क्रान्तिकारी संगठन था| इस संगठन की सक्रियता के कारण भारत की राजधानी कलकत्ता को दिल्ली विस्थापित करना पड़ा| क्या ऐसा संभव था कि उस संगठन का एक सक्रिय सदस्य अपने दर्शन और विचारधारा में क्रान्तिकारी नहीं होगा? भारत और मेक्सिको के कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापक मानवेन्द्र नाथ राय भी उस संगठन के सदस्य थे| एम एन राय एक क्रान्तिकारी और मानवतावादी भी थे, जो कम्युनिस्ट विचारधारा के आलोचक भी रहे| डॉ हेडगेवार और राय हम उम्र भी थे| श्री अरबिन्दो भी उसी संगठन के सक्रिय सदस्य थे|

इटली के एक प्रसिद्ध क्रान्तिकारी दार्शनिक एन्टोनियो ग्राम्शी थे| डॉ० हेडगेवार के ग्राम्शी के समकालीन एवं हमउम्र थे, और इसीलिए इन दोनों में वैचारिक एवं भावनात्मक लगाव रहा| एन्टोनियो ग्राम्शी ने मार्क्सवाद का गहन अध्ययन किया और कार्ल मार्क्स के दर्शन को अव्यवहारिक बताया| वे अपने कारावास अवधि में अपने विचारों को लिखते रहे, जो एक पुस्तक - ‘जेल नोटबुक’ (Prison Notebooks) के नाम से प्रसिद्ध हुआ| जब हम एन्टोनियो ग्राम्शी के सभी मूल दार्शनिक तत्वों का गहनता से अवलोकन करते हैं, तब ये सभी तत्व डॉ० हेडगेवार के सभी दर्शन में प्रमुखता से स्पष्ट होता है| इस पर ध्यान देना बहुत महत्वपूर्ण है| मैंने डॉ० हेडगेवार को प्रभावित करने वाले व्यक्तित्वों में सबसे पहले एन्टोनियो ग्राम्शी को रखा है|

एन्टोनियो ग्राम्शी के दर्शन में ‘सांस्कृतिक वर्चस्ववाद’ (Cultural Hegemony), ‘प्रतिगामी वर्चस्व’ (Counter Hegemony), ‘निष्क्रिय क्रान्ति’ (Passive Revolution), ‘राजनीतिक समाज’ (Political Society) एवं ‘नागरिक समाज’ (Civil Society), ‘राजनीतिक स्वतन्त्रता’ (Political Freedom) एवं ‘नागरिक स्वतन्त्रता’ (Civil Freedom), ‘स्थितियों का युद्ध’ (War of Position) और ‘सजीव बौद्धिक’ (Organic Intellectual) प्रमुख अवधारणा है| इन अवधारणाओं को अच्छी तरह समझ कर कोई डॉ० हेडगेवार के ‘कार्य –दर्शन’ को समझ सकता है| डॉ हेडगेवार और एन्टोनियो ग्राम्शी के मूल एवं मौलिक कार्य -दर्शन में आश्चर्यजनक समानता स्पष्ट है| हालाँकि मैं आश्चर्यचकित नहीं हूँ, मैं इसे स्वाभाविक समानता मानता हूँ|

ग्राम्शी ने ‘सांस्कृतिक वर्चस्ववाद’ में यह समझाया है कि शासक वर्ग अपनी विचारधारा को समाज में इस तरह प्रस्तुत करता है और नियमित करता है, ताकि उस विचारधारा को वह समाज अपना समझ कर उसे अपना मान ले| किसी भी वर्ग की सत्ता सिर्फ राजनीतिक, या आर्थिक, या सशस्त्र बल के सहारे नहीं टिक सकती, अपितु उसकी संस्कृति, जीवन –मूल्य, नैतिकता, शिक्षा, मीडिया और धर्म के सहारे टिकी रहती है| सत्ता इन साधनों के सहारे समाज के विचारों, मूल्यों एवं नैतिकता पर नियंत्रण कर निरंतरता बनाए रखती है| शासक वर्ग अपने हित की विचारधारा को सामान्य जन गण का ‘सामान्य समझ’ (Common Sense) बना कर प्रस्तुत करती है|

सामान्य जन गण इन्हें अपने हित का सामाजिक एवं धार्मिक मूल्य समझती है| इसे अपना सामान्य नैतिकता समझती है| सामान्य जन गण इन्हें अपना ‘सांस्कृतिक दायित्व’ समझ कर इसका स्वयं पालन करती रहती है| इसी ‘सांस्कृतिक दायित्व’ की समझ को ही सत्ता का ‘सांस्कृतिक वर्चस्ववाद’ कहा गया है| इसके लिए राज्य को किसी अतिरिक्त शक्ति की आवश्यकता नहीं होती है| सामान्य जनता की सामान्य समझ को समाज के स्तर पर समझाया जा सकता है, और उसे सुधारा जा सकता है| इसी सुधारने की प्रक्रिया को ‘प्रतिगामी वर्चस्व’ (Counter Hegemony) कहते हैं| इसी को ‘निष्क्रिय क्रान्ति’ (Passive Revolution) समझा जाता हैं|

ग्राम्शी ने अपने ‘राजनीतिक समाज’ की अवधारणा में यह समझाया कि बिना सामाजिक एवं सांस्कृतिक बदलाव के ‘राजनीतिक स्वतन्त्रता’ (Political Freedom) का कोई अर्थ नहीं होता है| ‘राजनीतिक समाज’ वह समाज होता है, जिनकी राजनीति, प्रशासन, पुलिस, सेना, शिक्षा, धर्म, न्याय, एवं अर्थव्यवस्था पर नियंत्रण होता है| ‘राजनीतिक स्वतन्त्रता’ मिलने से उस देश का मात्र ‘राजनीतिक समाज’ ही लाभान्वित होता है| तत्कालीन भारतीय कांग्रेस का भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन भी एक ‘राजनीतिक स्वतन्त्रता’ की प्राप्ति के लिए था, जिसका लाभ भारतीय ‘नागरिक समाज’ को नहीं मिलने वाला था, बल्कि इसका लाभ भारतीय  ‘राजनीतिक समाज’ को मिलने वाला था| बाद में, भारत में यही हुआ|

इसी तरह, ग्राम्शी ने समझाया कि ‘राजनीतिक समाज’ के अलावे एक ‘नागरिक समाज’ होता है| यह ‘नागरिक समाज’ बौद्धिक रुप में पिछड़ा हुआ होता है| इस समाज मे सामाजिक एवं सांस्कृतिक क्रान्ति के बिना किसी भी स्वतंत्रता का कोई अर्थ नहीं होता है| आज भी भारतीय नागरिक समाज अपनी गरीबी, बीमारी और अशिक्षा से जूझ रहा है| शायद इसी ‘आध्यात्मिक दृष्टि’ ने डॉ हेडगेवार को इन स्वतन्त्रता आन्दोलन से विमुख रकहा|

डॉ० हेडगेवार समझते थे कि सिर्फ ‘राजनीतिक समाज’ के सहारे किसी सशक्त राष्ट्र का निर्माण नहीं किया जा सकता है| भारत में सामाजिक और सांस्कृतिक असमानता धार्मिकता का आवरण ओढ़े हुए अस्तित्व में मौजूद है| भारत के राष्ट्र –निर्माण में यही असमानता आज भी बाधा बनी हुई है| एक सशक्त और समृद्ध राष्ट्र के निर्माण के लिए ‘राजनीतिक समाज’ के साथ साथ ‘नागरिक समाज’ को भी प्रमुखता से शामिल किये जाने की अनिवार्यता होती है| यह सब डॉ० हेडगेवार के दर्शन और कार्यों में स्पष्ट है|

‘स्थितियों के युद्ध’ में ग्राम्शी समझाते हैं कि युद्ध सिर्फ सीधे टकराव से नहीं किया जाना चाहिए| इनका मानना है कि वर्तमान शासक वर्ग अपना शासन अपने विचारधारा को प्रसारित कर करता है| ऐसे शासकों के विरुद्ध युद्ध करने के लिए उस समाज में जाकर उनकी विचारधाराओं के सापेक्ष अपनी अवधारणाओं और मान्यताओं के आधार पर अपनी विचारधारा बना कर प्रसारित करना होता है| सामान्य जन गण को वही विचारधारा स्वीकार्य होती है, जो उन्हें समझने में सरल और साधारण होती है| ‘हिन्दवी’ पर आधारित विचारधारा भी एक ऐसी ही सरल विचारधारा है| किसी विचारधारा का खंडन करना या उस पर प्रतिक्रिया देना उन विरोधियों की विचारधारा का ही प्रसारण करना होता है| डॉ० हेडगेवार भी ग्राम्शी की समझ की मान्यताओं पर कार्य कर रहे थे| यह युद्ध समाज में सांस्कृतिक बदलाव का होता है| यही ‘निष्क्रिय क्रान्ति’ हुआ|

ग्राम्शी ने ‘सजीव बौद्धिक’ की अवधारणा में इस बात पर जोर दिया कि प्रत्येक वर्ग को अपने स्वयं के बौद्धिक तैयार करने चाहिए| ये ‘सजीव बौद्धिक’ बुद्धिजीवियों का ऐसा वर्ग होगा, जो सम्बन्धित वर्ग अर्थात सामान्य जन गण से जुड़कर उसकी चेतना को बौद्धिकता और दिशा देगा| वह ‘सजीव बौद्धिक’ (Organic Intellectual) वर्ग उस समाज की चेतना को उच्चतर अवस्था में ले जाए| उसे ‘नागरिक समाज’ को उस ‘सांस्कृतिक वर्चस्व’ के विरुद्ध ‘पैरेड़ाईम शिफ्ट’ करके ‘नई वैचारिक ढाँचा’ बनाना चाहिए| सामान्यत: परम्परागत बौद्धिक नेतृत्व भी उन्ही सांस्कृतिक वर्चस्ववाद के घेरे में ही, उन्ही के द्वारा रचित की गई किताबों में ही समाधान खोजते रहते हैं| इसी समझ के अभाव में सामान्य जनगण और उनके नेतृत्व को दशको एवं शतकों के बीत जाने के बाद भी समाधान नहीं दिखता है| ये बौद्धिक नेतृत्व उन्ही ‘सांस्कृतिक वर्चस्व’ की उलझनों में उलझे रहते हैं| इन्हें ‘निर्जीव बौद्धिक’ कहा जा सकता है|

डॉ० हेडगेवार के दर्शन में ग्राम्शी की यही अवधारणा स्पष्ट रुप से दिखते और चिखते हुए मिलते हैं| डॉ० हेडगेवार का संगठन संस्कृति और चेतना के स्तर पर बदलाव की बात कर राष्ट्र का निर्माण करना चाहता है|

आचार्य प्रवर निरंजन जी 

अध्यक्ष, अन्तर्राष्ट्रीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान|

मंगलवार, 31 मार्च 2026

इतिहास जीवित व्यक्तियों के लिए होता है

इतिहास जीवित व्यक्तियों के लिए होता है, अन्यथा वह इतिहास है ही नहीं| इतिहास यदि जीवित व्यक्तियों के लिए ही होता है, तो यह स्पष्ट है कि इतिहास सापेक्षिक होता है| इसका अर्थ यह हुआ कि इतिहास को समय के सापेक्ष बदलता रहना पड़ता है| इसी कारण इतिहास का समय समय पर पुनर्लेखन होता है| इसके लिए यह आवश्यक नहीं है कि कोई नया ऐतिहासिक तथ्य ही सामने आए| स्पष्ट है कि इतिहास को सामाजिक आवश्यकताओं के अनुरूप अनुकूलित, समायोजित और संतुलित होना पड़ता है|

समाज गतिशील होता है| समाज का सदैव उद्विकास होता रहता है| समाज की आवश्यकताएँ भी बदलती रहती है| इसीलिए उस समाज की संस्कृति भी गतिमान होती है| चूँकि इतिहास मानव, समाज, राष्ट्र एवं मानवता के सापेक्ष होता है, इसलिए इतिहास को सदैव ही बदलना होगा| इसी सन्दर्भ में प्रसिद्ध इतिहासकार लार्ड एक्टन ने कहा था कि आप कोई अन्तिम इतिहास नहीं लिख सकते हैं, लेकिन आप पहले से चले आ रहे इतिहास को रद्द कर सकते हैं|

यदि आप कोई भी कार्य मानव, समाज, राष्ट्र एवं मानवता के हित वर्धन के सन्दर्भ में नहीं करते हैं, आप मानव नहीं है| आपका विषय या कार्यक्षेत्र चाहे इतिहास का हो, या विज्ञान का हो, या कला का हो, या आध्यात्म का हो, या  अन्य कोई भी विषय हो, उसे अवश्य ही मानव, समाज, राष्ट्र एवं मानवता के लाभ के लिए होना ही चाहिए| कुछ लोग तथाकथित ‘तथ्य’ या ‘सत्य’ के नाम पर, या आत्म संतुष्टि के लिए, या तथाकथित ज्ञान के लिए कार्य करते हुए अपनी ‘चिन्तन की अवस्था’ को न्यायोचित बताते हैं| मैं यहाँ कोई आपत्ति भी दर्ज नहीं करना चाहता हूँ, लेकिन मैं उन्हें इस तथ्य एवं सत्य पर विमर्श में शामिल करना चाहता हूँ कि मानव की उत्पत्ति कैसे हुई?          

यहाँ हमें मानव जाति की उत्पत्ति एवं उद्विकास को समझना होगा| मानव मूलत: एक स्तनपायी पशु है, लेकिन वह अन्य सामान्य पशुओं से चेतना के स्तर पर भिन्न एवं उच्चतर है| चेतना की यही वर्तमान उच्च स्तरीय अवस्था ही इसे अन्य पशुओं से अलग करता है| जब मानव चालीस लाख साल पहले पेड़ों से उतरा था, उसी समय से उसे खड़े होकर अपने खतरों भापना होता था, ताकि वह संभावित खतरों से अपने को बचा सके| इसी क्रम में एक वानर (Ape) सीधा खड़ा होते हुए ‘होमो इरेक्टस’ और ‘होमो सेपियन्स’ बन सका| इसी क्रम में मादा मानव के गर्भाशय का मुँह सकरा (Narrow) होता गया| चार पैरों के पशुओं का गर्भाशय का मुँह इतना पर्याप्त बड़ा (Wider) होता है कि उसके शिशु –जनन में कोई परेशानी नहीं होती है| इसीलिए पशुओं का शिशु उसके गर्भ में ही पर्याप्त परिपक्व हो जाता है| इससे पशुओं के शिशु अपने जन्म के समय से ही अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करने में सक्षम हो जाता है|

लेकिन एक मानव का शिशु और उसकी माता शिशु -जनन के समय असहाय होते है| उसे अन्य मानव के सहयोग और सहायता की अनिवार्यता होती है| ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि मानव के खड़े होने के क्रम में उसके गर्भाशय का मुँह छोटा (Narrow) होता गया| इससे मानव –शिशु को अपरिपक्व अवस्था में ही प्रजनित होना पड़ गया| उसकी माता को भी इसीलिए असहनीय वेदना होती है, जो दूसरे पशु –माताओं को नहीं होता है| शिशु के जनन में शिशु एवं उसकी माता को ‘अन्य मानव’ के सहयोग, समर्थन और सहायता की अनिवार्यता होती है| यही से मानव में भावनात्मक लगाव पैदा हुआ| इसी के साथ ही परिवार, समाज आदि अन्य सामाजिक संस्थाओं के उदय होना शुरू हुआ| इन्ही आवश्यकताओं और उससे जनित सामाजिक संस्थाओं के साथ मानव अपना संसार बना सका|

जब वर्तमान मानव और उसके संसार की उत्पत्ति ही इन्ही मानवीय आवश्यकताओं के कारण हुई है, तब किसी भी अवस्था में समकालीन वर्तमान मानव और वर्तमान संसार के हित वर्धान को ध्यान में नहीं रखना, कतई मानवीय गुण नहीं होगा| इसीलिए आपका हर विषय या कार्यक्षेत्र, चाहे वह इतिहास का हो, या विज्ञान का हो, या कला का हो, या आध्यात्म का हो, या  अन्य कोई भी विषय हो, उसे अवश्य ही मानव, समाज, राष्ट्र एवं मानवता के लाभ के लिए होना ही चाहिए| जब हम इतिहास का लेखन करते हैं, तो उसका स्पष्ट उद्देश्य मानवता के हितों का संवर्धन करना होगा| इसीलिए हर इतिहास अपने समय के लिए समकालिक या समकालीन होता है| इसका अर्थ हुआ कि कोई भी इतिहास लेखन वर्तमान समाज के हित के लिए होता है| यह अलग बात है कि भारत में समाज का अर्थ क्षेत्रीयता से, या जाति से, या सम्प्रदाय से, या भाषागत से लिया जाता है, जबकि समाज का अर्थ राष्ट्रीयता और मानवता के सन्दर्भ में होना चाहिए|

किसी भी इतिहास का लेखन किसी राजनीतिक या किसी वर्गीय सत्ता के हितों के लिए या किसी वर्ग विशेष के हितों के लिए नहीं होना चाहिए| अभी भारत में इतिहास लेखन का आधार तथाकथित ‘स्थानीय मूल निवासी’ और ‘विदेशी मूल’ के आधार को न्यायोचित ठहराने के लिए हो रहा है, जो पूरी तरह गलत है| जब वर्तमान सभी मानव एक ही मानव –समूह के वंशज है और एक ही स्थान से उत्पन्न हुए, तब वह अपने उत्पत्ति –स्थल - अफ्रिका के वोत्सवाना मैदान के बाहर के सभी लोग उस उत्पत्ति –स्थल के सापेक्ष विदेशी ही हुए| इस रुप में हर भारतीय भारत के सापेक्ष में विदेशी ही है, क्योंकि भारत में वर्तमान होमो सेपियंस का जन्म नहीं हुआ है| भारत के कुछ वर्ग -समूहों को लगता है कि वह किसी शासक के वंशज हैं, तो उन्हें यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि तब शासित लोग किसके वंशज रहे? प्राचीन विश्व इतिहास में कुछ नगर –शासन व्यवस्था के अतिरिक्त, कहीं भी वर्ग –समूह के शासन के प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं| भारत में लिखित या वर्णित वर्ग –समूह के शासन के कोई प्रमाणिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं| ऐसा सब व्याख्या इतिहास की तर्कहीन, तथ्यहीन और अविवेकपूर्ण मनमानी है, जो भारतीय समाज को अनावश्यक उलझाए हुए है| सभी भारतीय एक हैं, और उन्ही सामान्य जन –समूह से शासक एवं शासित होते रहे हैं| भारत के मध्य काल में भारतीय जाति और वर्ण व्यवस्था का जन्म हुआ, जो ऐतिहासिक साधनों एवं शक्तियों का आवश्यक परिणाम था| भारतीय जाति और वर्ण व्यवस्था का कोई भी प्राथमिक प्रमाणिक प्रमाण प्राचीन भारत के इतिहास में उपलब्ध नहीं रहा है|

ठहरिए, विचार कीजिए और भारत को सशक्त राष्ट्र बनाते हुए इसे विश्व –मार्गदर्शन के लिए तैयार होने दीजिए|

 (आप मेरे अन्य आलेख niranjan2020.blogspot.com पर देख सकते हैं।)

आचार्य प्रवर निरंजन जी

अध्यक्ष, भारतीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान|

रविवार, 22 मार्च 2026

अमेरिका 'दादागिरी' क्यों करता है?

आजकल फिर अमेरिका ‘दादागिरी’ कर रहा है| सवाल यह है कि अमेरिका ‘दादागिरी’ क्यों करता है? ‘दादागिरी’ करने के लिए क्या क्या गुण या क्या क्या क्षमताएँ होने चाहिए? क्या कोई भी ‘दादागिरी’ कर सकता है? क्या भारत भी ‘दादागिरी’ कर सकता है? क्या ‘दादागिरी’ भी सापेक्षिक होता है? तो ‘दादागिरी’ क्या है?

'दादागिरी' (Bullying) एक अनुचित प्रक्रिया माना जाता है, जिसमें बलप्रयोग कर या धमकाकर किसी अन्य पर अपना प्रभुत्व जमाने का प्रयास किया जाता हैं। ‘दादागिरी’ सदैव अपने से छोटे और कमजोर देश या समाज पर दिखाया जाता है| लेकिन यह ‘कमजोर’ क्या होता है? क्या कोई ‘कमजोर’ या ‘शक्तिशाली’ सिर्फ संख्या के आधार पर हो सकता है, या शारीरिक ताकत के आधार पर, या अपने ‘बौद्धिक’ क्षमता के आधार पर होता है? तो ‘बौद्धिक’ क्षमता क्या होता है?

आधुनिक युग में कुछ वैश्विक ‘दादा’ हुए हैं, जिनके अध्ययन करने के पश्चात इस सम्बन्ध में कुछ सार्थक निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं| आधुनिक युग में, सबसे पहले स्पेन और पुर्तगाल ‘दादा –देश’ हुए। उसके बाद इस कड़ी में कई यूरोपीय देश जुडते रहे। फिर ग्रेट ब्रिटेन (UK) एक ऐसा ‘दादा’ हुआ, जिसके साम्राज्य में कभी सूरज का अस्त नहीं होता था| द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ‘विश्व व्यवस्था’ (World Order) में संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) का स्थान प्रथम हो गया| अर्थात अमेरिका ‘दादा’ बन गया| आज उसके लिए कोई वैश्विक नियम –कानून काम के नहीं है| वह जो चाहता है, कर लेता है या कर लेना चाहता है|

लेकिन ऐसा क्यों होता है? आधुनिक युग के सभी ‘दादाओं’ के अध्ययन के बाद इन सभी में एक समान प्रवृत्ति पाया जाता है। इन सभी ‘दादाओं’ में ‘बौद्धिक शक्ति’ सबसे महत्वपूर्ण होता है। इस ‘बौद्धिक शक्ति’ का आधार ‘ज्ञान’ और ‘विज्ञान’ होता है। इन सभी ‘बौद्धिक’ देशों या समाजों में ‘धर्म –सत्ता’ का महत्त्व गौण रहता है| ‘ज्ञान’ (Knowledge) ‘सूचनाओं’ का व्यवस्थित और संगठित स्वरुप होता है। ‘ज्ञान’ को निरपेक्ष माना जाता है| यह यथास्थिति में सब कुछ जानना है| इस ‘यथास्थित’ (निष्पक्ष) ‘ज्ञान’ का उपयोग या प्रयोग ‘बुद्धि’ (Intellect) कहलाता है। किसी भी ‘दादागिरी’ का आधार अवश्य ही ‘विज्ञान’ (Science) होता है|

‘विज्ञान’ का उपयोग कर किसी ‘समस्या’ का समाधान खोजना ही ‘इंजीनियरिंग’ (Engineering/ अभियंत्रण) होता है। ‘अभियंत्रण’ वैज्ञानिक सिद्धांतों का उपयोग करके व्यावहारिक समस्याओं को हल करने की एक विधा है। किसी कार्य को सुव्यवस्थित, प्रभावी और जल्दी करने के लिए वैज्ञानिक एवं अभियंत्रण सिद्धांतों का व्यावहारिक समाधान 'तकनीक' कहलाता है। यदि किसी समस्या का समाधान करना ‘इंजीनियरिंग’ है, तो उस समाधान में मशीन, यन्त्र, औजार, उपकरण, उपस्कर, आदि बनाना एवं उपयोग करना ही तकनीक (Technology) है।

अर्थात शक्ति का स्रोत ‘विज्ञान’ (वैज्ञानिकता) से होता है, किसी दैवीय आस्था से नहीं| ‘विज्ञान’ में निरन्तर शोध एवं अनुसंधान से मौलिक नियमों एवं सिद्धांतों का परिमार्जन होना वहाँ की सामान्य संस्कृति बन जाती है| इसीलिए वहाँ नित आविष्कार होता रहता है| विज्ञान प्रकृति और भौतिक दुनिया के व्यवस्थित अध्ययन से प्राप्त ज्ञान है। यह अवलोकन (Observation), प्रयोग (Experimentation) और जांच के माध्यम से तथ्यों को समझने की एक विधि है, जो सटीक परिणाम देती है। यह जिज्ञासा से शुरू होता है, अर्थात यह सवाल पूछने से शुरु होता है| ‘दैवीय आस्था’ विज्ञान –विरोधी होता है| ज्ञान की पुनः तलाश एक परम्परा बन जाती है।

इस तरह, ‘विज्ञान’ एक ‘विषय’ (Subject) ही नहीं है, यह  एक ‘क्रियाविधि’ (Method/ Methodology) भी है। सभी इंजीनियरिंग और तकनीक इसी विज्ञान पर आधारित है| जो समाज विज्ञान में मौलिक शोध एवं अनुसंधान करता रहता है, वही सभी क्षेत्रों में सबसे आगे रहता है| इसी आधार पर आज चीन, अमेरिका, जापान, रुस, जर्मनी, फ़्रांस, ब्रिटेन आगे हैं| आजकल यही देश एक दूसरे की दादागिरी को संतुलित कर रहे हैं, या संतुलित कर सकते हैं, बाकियों की कोई औकात नहीं है| वे सभी देश और समाज, जिनके लिए ‘विज्ञान’ के सापेक्ष ‘आस्था’ या ‘धर्म’ प्रमुख है, इन वैज्ञानिक शक्तियों के समक्ष सदैव नतमस्तक रहते हैं|

 ‘आस्था’ (Faith) का विषय किसी ‘ज्ञान’ या ‘बुद्धि’ पर आधारित नहीं होता है। यही ‘आस्था’ सभी धर्मों का आधार होता है| अर्थात सभी धार्मिक बातें आस्था की बात है, इनमे कोई ज्ञान और विज्ञान नहीं होता है| अक्सर ‘आस्था’ का आधार ‘दैवीय’ होता है। यदि ऐसे धर्म में आस्था रखने वाले देशों का कुछ महत्त्व वैश्विक व्यवस्था में है, तो वह आधार उनके ‘उपभोग’ (Consume) करने की क्षमता (खाने एवं पचाने वाले पेटो की संख्या) होगी| इन आस्था के आधार पर मूर्खो पर दादागिरी दिखाई जा सकती है, लेकिन किसी बौद्धिक शक्ति के देशों या समाजों पर ‘दादागिरी’ नहीं दिखाई जा सकती| ध्यान रहे कि सभी आधुनिक हथियार आधुनिक ‘सूचना =तकनीक’ युग में उनके ‘उत्पादक’ देशों के नियंत्रण में सदैव रहती है| अर्थात कोई भी ख़रीदा गया हथियार उनके उत्पादक देशों के मर्जी के विरुद्ध प्रयोग नहीं किया जा सकता है| अर्थात कोई भी देश ख़रीदे गए हथियारों के भरोसे ‘दादागिरी’ नहीं कर सकता|

जिन बौद्धिक शक्तियों के पास ‘न्यायिक चरित्र’ (Judicious Character) होता है और उनमे यदि ‘अखंडता’ (Integrity) का चरित्र भी होता है, तो ऐसे सभी ‘बौद्धिक शक्तियाँ’ भविष्य के ‘दादा’ बन सकते हैं| ‘अखंडता’ का सिद्धांत वह होता है, जिनके बातों, नीतियों एवं व्यवहारों में समानता रहता है| अमेरिका इस सिद्धान्त पर विश्वसनीय नहीं माना जाता है| चीन विज्ञान एवं तकनीक के साथ साथ अपने ‘न्यायिक चरित्र’ और अपनी ‘अखंडता’ के नीतियों के कारण निकट -भविष्य में विश्व के व्यवस्था में ‘प्रथम’ स्थान पर आ रहा है| चीन की इसी उभरती अवस्था के कारण अमेरिका अब बौखलाया हुआ है, जिसकी परिणति आज विश्व में दिख रहा है|

यदि आपको भी ‘दादा’ बनना है, तो अपनी बौद्धिकता बढाइए| बौद्धिकता बढ़ाने के लिए अपने ‘वैश्विक दृष्टिकोण’ में विज्ञान और वैज्ञानिक विधियों का उपयोग कीजिए| कोई और विकल्प कारगर नहीं है| आधुनिक युग में, कोई दैवीय या धार्मिक सत्ता किसी को ‘दादा’ नहीं बना सकता है| यदि किसी को  दैवीय या धार्मिक सत्ता स्थापित करना है, तो अपने विरोधियों की बौद्धिकता को कमतर कीजिए|

आचार्य प्रवर निरंजन जी

अध्यक्ष, भारतीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान|

शनिवार, 14 मार्च 2026

भारत का दुर्भाग्य ‘मरोड़े’ गए इतिहास -दर्शन में है

आप सही पढ़ रहे हैं, ‘भारत का दुर्भाग्य’ (Misfortune of India) ‘प्राचीन भारतीय इतिहास के दर्शन’ (Philosophy Ancient of Indian History) के मरोड़े जाने” (Twist/ Wrench) में फँसा’ (Entrapped/ Got Stuck) हुआ है| भारत का दुर्भाग्य यानि भारतीय लोगों का दुर्भाग्य, एक सत्य है| यह एक गंभीर विषय है|

दर्शन’ (Philosophy) किसी बात, विषय, या नीति का मूल सार’ (Essence/ Gist) होता है| कोई विषय पहले से सुनिश्चित एवं निर्धारित एक मूल सारके इर्द गर्द चक्कर लगाता रहता है| यह मूल सारपहले से सुनिश्चित एवं निर्धारित उद्देश्य” (Goal) को पाने के लिए होता है| किसी विषय के सारया उद्देश्यको जानना दर्शनका मूल विषय होता है| इसे समझने की जरुरत है, जो भारत को आजतक दयनीय अवस्था में जकड़े हुए है|

भारत की यह दयनीय अवस्था’ ‘प्राचीन भारतीय इतिहास के दर्शनको मरोड़े जानेसे निर्मित हुआ है| इसीलिए यहाँ भारतीय इतिहास के दर्शन के सार’, यानि  भारतीय इतिहास के दर्शन के मूल भावका आलोचनात्मक एवं विश्लेषणात्मक समीक्षा करना है| ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि किसी संस्कृति का आधार उसका प्राचीन इतिहास होता है| स्पष्ट है कि मध्भा काल में जब प्राचीन भारतीय इतिहास को सम्पादित किया जा रहा था, तब भारतीय संस्कृति को ही मरोड़ दिया गया है। और इस सम्पादित इतिहास को ही आज प्राचीन एवं सत्य बताया जा रहा है| भारत का भविष्य इसे सुधारने से ही सुधर सकता है| बाकी सब प्रयास महज एक तमाशा है, दिखावा है, जो चलता आ रहा है|

इतिहास’ ‘दर्शन का गतिशील रुपहोता है| एक इतिहासकार को इतिहास लेखन में अपनी अंतर्दृष्टि (Intuition) का उपयोग करना चाहिए, ताकि वह उपलब्ध ऐतिहासिक तथ्यों का प्राकृतिक उद्विकास की अवधारणा के अनुरूप तार्किक व्याख्या कर वर्तमान की समस्यायों का समाधान दे सके| इसलिए ‘इतिहासएक सक्रिय दर्शनहै| इस तरह, ‘दर्शन’ ऐतिहासिक चेतना के उद्विकास का स्वरुप है| ‘इतिहास’ अतीत का विज्ञान होता है, क्योंकि यह वैज्ञानिक विधियों के अनुरुप तार्किक, तथ्यात्मक और विवेकशील प्रस्तुति होता है| इतिहास भी विज्ञान की तरह वर्तमान की समस्यायों का समाधान देता हुआ भविष्य पर निगाहें रखता है|

इतिहास को किसी दैवीय या अतार्किकता के आधार पर व्याख्यापित नहीं किया जा सकता| दैवीय या अतार्किकता ही इतिहास को मिथक में मिला देता है| इतिहास वर्तमान और भविष्य को ‘और सुधार’ करने के उद्देश्य से अतीत और वर्तमान का संवाद होता हैइतिहास के तथ्य तो अतीत के होते हैं लेकिन इतिहासकार वर्तमान का होता है| ये ऐतिहासिक तथ्य भी वही बोलते हैं, जो उन तथ्यों के माध्यम वह इतिहासकार बोलवाना चाहता है| इसलिए ‘इतिहास सापेक्षिक होता है, जो हर काल एवं परिस्थिति के अनुसार गतिशील रहता है||  

इतिहास हमें अपनी जड़ो तक पहुचाता है, जिसे हम लोकप्रिय शब्दावली में संस्कृति का मूल स्रोतकहते हैं| यही संस्कृति यानि हमारे इतिहास बोध’ (Perception of History) ही हमारे संस्कारको निश्चित, नियमित एवं नियंत्रित करता हैं ये संस्कार, संस्कृति और हमारे इतिहास बोधही हमारी मानसिकता और हमारा विश्वदृष्टिकोण को निश्चित, नियमित एवं नियंत्रित करता रहता है| ‘इतिहास का उद्देश्य मानव की मुक्तिको सुनिश्चित कराना होता है’| इसी ‘मानव की मुक्ति’ को अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन  'विकास' (Development as Freedom) कहते हैंस्पष्ट है कि किसी भी इतिहास के दर्शनके मूल में न्याय’, ‘समता’, ‘स्वतंत्रताऔर बंधुत्वअवश्य रहना चाहिए, जो विश्व को शांतिमय, सुखमय एवं विकाशशील माहौल दे सके| प्राचीन भारतीय इतिहास को मरोड़ कर इन्ही तत्वों की ह्त्या कर दिया गया है| यदि किसी इतिहास का दर्शन अभी भी मानवीयता का सन्देश नहीं दे रहा है, तो वह इतिहास के नाम पर साजिश है, धोखा है, षड़यंत्र है|

भारत के प्राचीन काल का लगभग समस्त इतिहास, जो आज उपलब्ध है, वह सक्ष्यात्मक रुप से कागज पर ही लिखित रहा है| अर्थात ऐसा लिखित इतिहास कागज के चीन में आविष्कार होने और अरब क्षेत्र के माध्यम भारत आने और भारत में इसके प्रयोग के प्रचलित होने के बाद का है| यह काल भारत में दसवी शताब्दी के बाद का होता है| इसके पहले भारत का इतिहास ख़ास पेड़ के छालों, चमड़ों, और ख़ास पत्तों पर लिखित रहा है| इसके अतिरिक्त ये विवरण पत्थरों, धातुओं, लकड़ियों एवं मिट्टियों के पट्टियों पर लिखित हुए| ये विवरण इतिहास के नव सम्पादन के बाद सुनियोजित तरीके से तत्कालीन इतिहासकारों के वर्ग, जो शासक वर्ग होता है, ने नष्ट कर दिया|

स्पष्ट है कि जो इतिहास मध्य काल में लिखा जा रहा था, वह मध्य काल का समकालीन इतिहास रहा| उस समय प्राचीन भारत का जो इतिहास लिखा गया, या संपादित किया गया, उसे तत्कालीन आवश्यकताओं के अनुरुप इस काल में पूरा मरोड़ दिया गया| तत्कालीन सामन्तवादी आवश्यकताओं के अनुरुप सामग्रियों को प्राचीन काल के इतिहास में समाहित एवं समायोजित कर दिया गया| तब इन सामन्तवादी आवश्यकताओं को प्राचीन इतिहास की सामग्री की तरह स्थापित कर दिया गया| तब यही संपादित एवं संशोधित इतिहास हमारी सांस्कृतिक जड़े हो गयी| यह आज भी मजबूती से जमी हुई है| इसिहास का मध्य काल वैश्विक सामन्तवाद का काल रहा, और इसीलिए उस काल में सम्पादित सभी इतिहास समकालीन सामन्तवाद की आवश्यकताओं के अनुकूलन एवं समायोजन का पर्याय रहा|,  यही समकालीन इतिहासहो गया|

इतिहास का कोई भी तथ्य एवं सत्य श्रवण एवं वाचन’ (Listening n Speaking) के माध्यम से कई पीढ़ियों के लोगों से गुजर जाने के बाद भी वही तथ्य एवं सत्य बना रहेगा, ऐसा आधुनिक मनोविज्ञान के सन्दर्भ में उचित नहीं माना जा सकता| श्रोता और वाचक भी हर स्तर पर अपनी समझ के अनुसार उन तथ्यों को संपादित करता रहा| हुआ यह है कि प्राचीन भारत का इतिहास, जो ख़ास पेड़ के छालों, चमड़ों, एवं ख़ास पत्तों और पत्थरों, धातुओं, लकड़ियों एवं मिट्टियों के पट्टियों पर उपलब्ध था, उन्हें नए स्वरुप एवं नयी भाषा में तत्कालीन आवश्यकताओं के अनुकूल एवं अनुरुप सम्पादित कर दिया गया| इन नए स्वरुपों में सम्पादन के बाद इन सामग्रियों को यथासम्भव नष्ट कर दिया गया|

मध्य युग वैश्विक सामन्तवादी युग था, तो उनके अनुकूल प्राचीन इतिहास के दर्शन को ध्यान में रख कर तत्कालीन नए इतिहास के स्वरुप को तैयार किया गया| लेकिन वह सम्पादित इतिहास आज भी वर्तमान युग में मौजूद है| अब हमारे प्राचीन काल के इतिहास को वर्तमान वैश्विक आवश्यकताओं के अनुकूल एवं अनुरुप प्रस्तुत किया जाना अनिवार्य है| यही व्याख्या भारत को दुर्भाग्य से बाहर निकलेगा, बाकी सब प्रयास मौलिक नहीं है|

वर्तमान भारत के बहुसंख्यक या लगभग सभी इतिहासकार संस्कृति या इतिहास के वर्चस्ववादको नहीं समझते होते हैं| ये सभी इतिहासकार, चाहे वे अपने को प्रगतिशीलकहें या इतिहास का संशोधककहें, इसी ऐतिहासिक वर्चस्ववादयानि सांस्कृतिक वर्चस्ववादके चक्रव्यूह में उलझे हुए हैं| ‘सांस्कृतिक वर्चस्ववाद’ (Cultural Hegemony) एक ऐसी अवधारणा है, जिसे अलग से, गहनता से और विस्तार से समझे जाने की आवश्यकता है| इसे समझे बिना भारत कभी वैश्विक नेतृत्व नहीं दे सकता है, कोई भी चाहे जो प्रयास कर ले| आज प्राचीन भारत का जो इतिहास उपलब्ध है और हमारी महान संस्कृति का मूल आधार है, वह मध्य काल में सामन्ती आवश्यकताओं के अनुरुप संपादित है| इस प्राचीन काल के इतिहास दर्शन को मरोड़दिया गया, जो भारत में संस्कृति को भ्रमात्मक बना देता है|

इतिहास कोई स्थिर सत्य नहीं होता है, बल्कि इसे शासक वर्ग अपनी आवश्यकता अनुसार बदलता रहता है’| शासक वर्ग, जिसे ‘राजनीतिक समाज’ भी कहा जाता है, इतिहास को नियंत्रित कर वह वर्तमान एवं भविष्य को नियंत्रित रखता है’| इसीलिए सत्ता वर्ग इतिहास को बदल कर वर्तमान संस्कार और संस्कृति को अपनी आवश्यकताओं के अनुरुप बनाता  रहता है| इसीलिए प्रत्येक इतिहास’ ‘समकालीन इतिहास’ (Contemporary History) हो जाता है’| इसका अर्थ यह हुआ कि  इतिहास केवल अतीत की घटनाओं का विवरण नहीं होता है, बल्कि इसका वर्तमान की आवश्यकतायों के अनुसार पुनर्सृजन होता हैइसी कारण इतिहास को शासक वर्ग के हितों के अनुरुप बदलना पड़ता है| इतिहास वर्तमान के दृष्टिकोण से अतीत का मूल्याङ्कन करता है’| इसीलिए ‘आप वर्तमान इतिहास को अस्वीकृत कर सकते हैं, लेकिन आप कोई अन्तिम इतिहासनहीं लिख सकते हैं’| यह इतिहास भविष्य में बदलता रहेगा| आज भी अपने प्राचीन इतिहास को तार्किक, तथ्यात्मक और वैज्ञानिक बनाने की आवश्यकता है|

आचार्य प्रवर निरंजन जी

अध्यक्ष, भारतीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान|

रविवार, 8 मार्च 2026

क्या धन –प्रदर्शन मानवीय स्वभाव है?

एक छोटी –सी बौद्धिक बैठक हो रही थी| इसमें समाज के कई विधाओं के जानकार एवं विशेषज्ञ शामिल थे| मुद्दा सामाजिक और सांस्कृतिक अवसरों पर धन के प्रदर्शन था| प्रश्न यंह है कि सभी लोग बुद्धिमत्ता यानि समझदारी के किसी न किसी स्तर पर होने के बावजूद खर्च क्यों कर रहे हैं? वैसे यह कहा जा सकता है कि बुद्धिमत्ता यानि समझदारी के समान स्तर के  बावजूद इसके कई स्वरूप और गुणवत्ता हो सकते हैं। आप भी कह सकते हैं कि यह ‘सामाजिक और सांस्कृतिक अवसरों पर धन का प्रदर्शन’ नहीं होकर, यह ऐसे सामाजिक और सांस्कृतिक अवसरों पर धन के “अत्यधिक और जरुरत एवं क्षमता से ज्यादा का“ प्रदर्शन का विषय था| हालाँकि यहाँ  “अत्यधिक और जरुरत एवं क्षमता से ज्यादा” का शब्द –समूह एक सापेक्षिक दार्शनिक भाव के साथ अर्थ देता हुआ है| यहाँ भी सापेक्षिता के कारण इसका स्पष्ट अर्थ नहीं दिया जा सकता है| लेकिन इसी बिन्दु पर हमलोग का ठहर जाना भी बौद्धिकता नहीं हो सकता, इसलिए बात बढ़ाना आवश्यक है|

सासाराम के राहुल जी ने बौद्धिक –मंडली से आगे प्रश्न किया कि क्या सामाजिक सांस्कृतिक अवसरों पर खर्च को नियंत्रित या कम किया जा सकता है? इनका सवाल आप से भी है, विचार कीजिएगा|

इनके सवाल का उत्तर देने लिए दमोह. मध्यप्रदेश के आचार्य रज्जन जी आगे आए| आचार्य रज्जन जी ज्योतिष विज्ञान में परा –स्नातक (एम० ए०) हो कर ‘वास्तु –विज्ञान’ में अपना पीएच० डी० जमा कर चुके हैं और मध्य प्रदेश के लोकप्रिय एवं विद्वान् संस्कारक एवं पुरोहित के रुप में सर्व ज्ञात हैं| ये विदेशों में अपने यजमानों के लिए ‘आन लाइन पूजा एवं संस्कार’ करने के लिए अनुभवी एवं प्रतिष्टित हैं| कहने का तात्पर्य यह है कि वे इस क्षेत्र में काफी अनुभवी हैं| और इनके अनुभव जानना बहुत महत्वपूर्ण था| ये बता रहे थे कि सामाजिक एवं सांस्कृतिक मंचों से ‘सामाजिक और सांस्कृतिक अवसरों पर धन का प्रदर्शन’ के सख्त विरोधी भी अपने पारिवारिक मामलों में ऐसा प्रदर्शन नहीं कर पाते हैं, औए अपनी ही आदर्शों के विरोध करते हुए दिखते हैं| इसीलिए इनका  मानना है कि यह ‘सामाजिक और सांस्कृतिक अवसरों पर धन का प्रदर्शन’ एक “मानवीय स्वाभाव” है|

उत्तर प्रदेश के आम्बेडकरनगर जनपद के प्रोफसर चौधरी जी भी आचार्य रज्जन की ही बातों से सहमति जताते हुए बातों को आगे बढाया| चौधरी सर मनोविज्ञान के प्रोफ़ेसर रह चुके हैं| इन्होने प्रसिद्ध अमेरिकी मनोवैज्ञानिक प्रो० अब्राहम मैसलो के ‘आवश्यकता का पदानुक्रमण सिद्धांत’ के “सम्मान की आवश्यकता” (Esteem Needs) को उधृत करते हुए बताया कि यह सामाजिक सम्मान पाना एक मानवीय स्वभाव है| उन्होंने इसे कई उदाहरणों से समझाया| इन बौद्धिक वार्ता से मैं भी लाभान्वित हुआ| स्पष्ट हुआ कि “प्रदर्शन करना” यानि ‘दिखावा करना’ एक मानवीय स्वभाव है|

लेकिन यहाँ यह सवाल उठ रहा है कि “प्रदर्शन करना” यानि ‘दिखावा करना’ एक ‘मानवीय स्वभाव’ है?, या धन का अत्यधिक प्रदर्शन करना ‘सामाजिक स्वाभाव’ है? वैसे, उपरोक्त दोनों स्वभावों को ‘मानवीय स्वभाव’ या ‘मानवीय “सहज” (Instinct) स्वाभाव’ मान लेना जल्दीबाजी कहा जाना चाहिए| उपरोक्त दोनों बातें एक समान नहीं है| वैसे ई० राहुल जी का सवाल ऐसे अवसरों पर धन के अनुत्पादक खर्चो के प्रदर्शन को कम करने के बारे में हैं| इसलिए ऐसे गंभीर सवाल का एक सम्यक अकादमिक विश्लेषण होना ही चाहिए|

ऐसे सवालों का सम्यक उत्तर ‘सिर्फ’ एक अनुभवी, या मनोवैज्ञानिक, या सामाजिक, या आर्थिक, या एक राजनीति का अध्येता पर्याप्त तरीके से नहीं दे सकता है, ऐसा मुझे लग रहा है| ‘मानव विज्ञान’ (Anthropology) मानव का सरल एवं साधारण समाजों का अध्ययन कर मानव का ‘सहज एवं स्वाभाविक’ (Basic Instinct and Natural) प्रवृतियों एवं उनकी क्रियाविधियों की पहचान करता है| क्या सभी वैश्विक सरल एवं साधारण समाजों में ऐसे सामाजिक और सांस्कृतिक अवसरों पर धन के “अत्यधिक और जरुरत एवं क्षमता से ज्यादा का“ प्रदर्शन होता है? कहने का तात्पर्य यह है कि ऐसे अवसरों पर “अत्यधिक और जरुरत एवं क्षमता से ज्यादा का“ प्रदर्शन मानवीय सहज प्रवृति नहीं है|

यहाँ यह ध्यान रखना चाहिए कि ऐसा सामाजिक और सांस्कृतिक अवसर समाज में नए ‘सामाजिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं’ (Institution, not Institute) के निर्माण या पुनर्गठन का अवसर होता है| इन संस्थाओं का गठन मानव जीवन में इतना महत्वपूर्ण है कि ये संस्थाएँ ही एक पशु – होमो सेपियंस को एक ‘सांसारिक मानव’ (होमो सोसिअस) बना दिया| ‘विवाह’ एक संस्था का निर्माण है और घर के बुजुर्ग के मरणोपरांत उत्तराधिकार मिलने की प्रक्रिया संस्था एक पुनर्गठन है| ‘यौन व्यवहार’ पशु भी करते हैं, लेकिन वे झुण्ड बनाते हैं, ‘समाज’ नामक संस्था का निर्माण नहीं करते हैं| मानव अपने ‘यौन व्यवहार’ को ‘विवाह’ नामक संस्था के साथ लाता है, और इसी के साथ वह संसार बना पाता है, जो एक पशु नहीं कर पाता है| इसलिए एक सामाजिक सांस्कृतिक संस्था का निर्माण या पुनर्गठन पारिवारिक एवं सामाजिक सदस्यों की उपस्थिति (या सामाजिक गवाही) में सम्पन्न होता है| संस्था का निर्माण या पुनर्गठन एक सामाजिक सांस्कृतिक कर्तव्यों और उत्तरदायित्वों का घोषणा का अवसर होता है| समस्या मानव विशेष के सोच में हैं, और समस्या- लेबल सामाजिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं के निर्माण को दिया जाता है| इस पर ध्यान देने की आवश्यकता है|

प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक अल्फेड एडलर अपने ‘व्यक्तित्व सिद्धान्त’ में बताते हैं कि मानव जन्म से ही ‘हीनता का बोध’ रखता है और इसीलिए वह ‘श्रेष्टता’ दिखाना चाहता है| ‘श्रेष्ट’ दिखना मूल प्रवृति हो सकती है, या है, लेकिन सिर्फ धन के प्रदर्शन के द्वारा ही ‘श्रेष्ट’ दिखना एक अलग बात है| यह श्रेष्टता का प्रदर्शन ‘धन’ के अतिरिक्त कई ‘और’ स्वरुपों में हो सकता है, जिस पर भी विद्वानों का ध्यान जाना चाहिए| ‘धन का प्रदर्शन’ करना सबसे से सस्ता, सरल और साधारण उपलब्ध तरीका होता है| लेकिन यह व्याख्या भी ई० राहुल को पर्याप्त संतुष्टि नहीं दे पाया|

लेकिन प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक कार्ल जुंग बताते हैं कि एक मानव का व्यक्तित्व उसके ‘सामूहिक अचेतन’ (Collective UnConsciousness) से निर्धारित एवं नियमित होता है| यह ‘सामूहिक अचेतन’ उस समाज के अचेतन का सामूहिक समझदारी है, जिसे सामान्य भाषा में उसकी ‘संस्कृति’ कहते हैं| यहाँ यह स्पष्ट किया जा रहा है कि सारी बात समाज तय करता है, मानव स्वयं में बहुत कुछ या सब कुछ नहीं है, बल्कि समाज बहुत कुछ है| समाज ही व्यक्ति का कार्य प्रतिरुप यानि पैटर्न (Pattern) तय करता है| जब बात संस्कार और संस्कृति की आती है, तब एक संस्कारक एवं पुरोहित की भूमिका लाल रंगों से रेखांकित हो जाती है|

अत: सामाजिक और सांस्कृतिक अवसरों पर धन के “अत्यधिक और जरुरत एवं क्षमता से ज्यादा का“ प्रदर्शन मानव का स्वाभाविक गुण नहीं है, बल्कि यह सामाजिक प्रतिरूप का मांग या दबाब है| इस अन्तर से यह स्पष्ट हो जाता है कि यदि समाज चाहे तो विशेष एवं सजग प्रयास कर इसे बदल सकता है, या इसे दूर कर सकता है| चूँकि सामाजिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं में और उसके प्रतिरुपों में एक ‘जड़ता’ (Inertia) होता है और इसीलिए वह अपनी यथावस्था की अवस्था बनाए रखना चाहती है, जिसे बदलने के लिए एक विशेष, समर्पित और सजग प्रयास चाहता है| इस सामाजिक एवं सांस्कृतिक ‘जड़ता’ को एक संस्कारक और पुरोहित ही हटा कर समाज और संस्कृति को गतिशील बना सकता है,

इसलिए संस्कारक और पुरोहित बनिए|

नजरिया बदलिए और सब कुछ बदलेगा|

आचार्य प्रवर निरंजन जी

अध्यक्ष, भारतीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान| 

बिल्ली पालि या अंग्रेजी में क्या बोलती है?

एक बिल्ली हिंदी में बोले, या पालि, या संस्कृत में बोले, ‘म्याऊँ’ ही बोलती है| वह दूसरा कुछ बोलती ही नहीं है| यदि वह बिल्ली अंग्रेजी, या स्पे...