रविवार, 25 अक्टूबर 2026

अंग्रेज क्यों चले गए?

अंग्रेज भारत आए और भारत से चले भी गए|  क्यों?  अंग्रेज अपने ‘धन’ से ‘धन’ कमाने के लिए भारत आए और अन्य देशों में भी गए| इनके धन की कमाई का रफ़्तार अभी भी जारी है, या बढ़ ही गयी वे  है| ऐसी स्थिति में उनके यहाँ रहने का कोई ‘तुक’ (Logic') नहीं था| इसीलिए अंग्रेज भारत से अपना उपनिवेश समाप्त कर चले गये| वे ‘धन’ कमाने भारत आए थे और अभी भी भारत से ‘धन’ कमा रहे हैं, इसीलिए उनका यहाँ रहने की कोई जरुरत नहीं थी और चले गये| ऐसी स्थिति में, एक समझदार को यहाँ रह कर परेशान होने की कोई जरुरत नहीं थी| इस क्रियाविधि को विस्तार से और तार्किक आधार पर समझते हैं|

आर्थिक इतिहास में ‘धन’ कमाने का स्वरुप समय और तकनीक के साथ बदलता गया| धन कमाने का आधुनिक युग में प्रारम्भिक स्वरुप ‘व्यापार’ (Trading) होता है| यह धन कमाने का सबसे आद्य स्वरुप होता है, जो सबसे सरल, साधारण, सहज और प्राकृतिक होता है| विज्ञान और तकनीक के साथ नए मशीनों, भाफ (Steam) और विद्युत की शक्ति, एवं अन्य वैज्ञानिक विधियों ने ‘धन कमाने की प्रक्रिया’ को गति दिया| फिर उत्पादन नहीं, बल्कि बाजार में ‘धन’ (Wealth) को ‘पूँजी’ (Capital) के रूप ‘निवेश’ कर ‘धन’ कमाने का सबसे सुरक्षित तरीके का ईजाद हो गया|

अब ‘धन’ कमाने के लिए किसी के भौतिकी उपस्थिति अनिवार्य नहीं रह गया| व्यापार के नए स्वरुप – “वित्तीय साम्राज्यवाद” (Financial Imperialism) के साथ अंग्रेज भी भारत सहित अपने सभी उपनेवेशों से चले गया| अंग्रेज उन देशों से भी चले गए, जहाँ स्वतन्त्रता के लिए कोई आन्दोलन भी नहीं हुआ, जैसे श्रीलंका और वर्मा (वर्तमान म्यांमार) से| द्वितीय विश्व युद्ध के बाद सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया के तमाम उपनिवेशवादी देश ‘तथाकथित संप्रभुता’ के साथ साम्राज्यवादियों से भौतिक रुप में स्वतंत्र किए जाने लगे| इसकी संपुष्टि के लिए, एक अवलोकन आधुनिक विश्व इतिहास का किया जा सकता है|

एक बार आधुनिक आर्थिक इतिहास का अवलोकन किया जाना चाहिए| यूरोपीय पुनर्जागरण के साथ ‘सामन्तवाद’ का क्रमबद्ध समापन शुरू होने लगा और उसी जमीन पर ‘पूँजीवाद’ का उद्विकास होने लगा| ‘सामन्तवाद’ का समापन और ‘पूँजीवाद’ का उद्विकास ‘सामन्तवाद’ के कोख से हुआ| सामन्तो को अपने धन में वृद्धि चाहिए था, जो परम्परागत रूप में जमीन के विस्तार से ही संभव था, ताकि भू –लगान के राजस्व संग्रहण की मात्रा को बढाया जा सके| लेकिन जमीन का ‘और अनन्त विस्तार’ करना सहज और व्यावहारिक नहीं रह गया था|

‘धन’ बढ़ाने का दूसरा व्यावहारिक, सहज, सरल और वैधानिक तरीका ‘धन’ (Wealth) को ‘पूँजी’ (Capital) में बदलना होता है| ‘उत्पादक धन’ ही ‘’पूँजी’ कहलाता है| इस तरह से ‘पूँजीवाद’ का उत्पत्ति और उद्विकास पश्चिमी यूरोप में प्रारंभ हो गया| मध्य एशिया के राजनीतिक उथल पुथल और निरन्तर अनिश्चितता के कारण भारत सहित पूर्वी एशिया के साथ व्यापार करने के लिए सुविधाजनक और बाधारहित मार्ग की आवश्यकता थी| वैकल्पिक व्यापारिक मार्ग की तलाश में समुद्री मार्ग एक सस्ता और बेहतर विकल्प था| यूरोपीय पुनर्जागरण के साथ कई नयी वैज्ञानिक जानकारियाँ मानवता को उपलब्ध होती जा रही थी|

पश्चिम यूरोप के गर्म समुद्री जलधारा और विस्तृत समुद्री किनारा ने स्पेन और पुर्तगाल के उत्साही नाविकों को भारत और पूर्वी एशिया के लिए समुद्री मार्ग खोजने के लिए प्रेरित किया| वहां के शासको और सामन्तों के ‘धन –सहयोग’ के साथ इन उत्साही नाविकों ने समुद्री भ्रमण और व्यापारिक मार्ग तलाशने का कार्य शुरू किया| इस प्रयास ने दोनों अमेरिका एवं पश्चिम इंडीज सहित और आस्ट्रेलेशिया (अस्ट्रेलिया सहित अन्य द्वीप समूह) की खोज हो गयी| इसी के साथ भारत पहुचने का व्यापारिक मार्ग की जानकारी हुई| पश्चिम में कई व्यापारिक कम्पनियाँ बनी| ब्रिटेन की ‘इस्ट इंडिया कंपनी’ की स्थापना 31 दिसम्बर 1600 को हुई| यह भारत सहित पूर्वी  एशिया के देशों में व्यापार करने के लिए गठित हुई| व्यापार करना, यानि अपने ‘धन’ से ‘और धन’ कमाना हुआ|

मतलब इन कंपनियों का उद्देश्य अपने ‘धन’ से लाभ कमाना था| स्पष्ट है कि अंग्रेज अपने धन से लाभ कमाने के लिए आए थे| अंग्रेज अपने व्यापारिक उद्देश्य से पहली बार 1608 में सूरत आए| ये व्यापार करने की अनुमति के लिए 1615 में जहाँगीर के दरबार में पहुंचे| व्यापार में अपनी मजबूत पकड के लिए 1757 में प्लासी की लड़ाई लड़ी गयी| 1857 के विद्रोह के बाद अंग्रेजी कंपनी का शासन समाप्त कर ब्रिटिश सरकार का शासन प्रारंभ हो गया|

अपने शुरुआती काल में कम्पनी सिर्फ व्यापार तक सीमित रही, जिसमे कम्पनी की भौतिक उपस्थिति अनिवार्य थी| यह ‘उपनिवेशवाद’ की शुरुआत थी| यह लाभ कमाने का प्राथमिक अवस्था था, जिसे ‘वणिक साम्राज्यवाद’ (Mercantile Imperialism) कहा गया| यूरोप में ओद्योगिक क्रान्ति की शुरुआत हो चुकी थी| भारत में शासन भी कम्पनी से सरकार को हस्तगत हो चुका था| उद्योग के लिए कच्चा मॉल, इंधन के लिए कोयला और बाजार के ग्राहक चाहिए होता है, जो उपनिवेशों में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध था| अब ‘वणिक साम्राज्यवाद’ अपने नए स्वरुप ‘औद्योगिक साम्राज्यवाद’ (Industrial Imperialism) में बदल गया| अब शासन इन्ही सुविधाओं को उपलब्ध करने के लिए कार्यरत हो गया| इन्ही सुविधाओं और एकाधिकार को पाने के लिए विश्व को दो दो विश्व युद्ध झेलना पडा| इस युद्ध में यूरोप पस्त हो चुका था|

अब साम्राज्यवाद का स्वरुप फिर बदल कर “वित्तीय साम्राज्यवाद” (Financial Imperialism) हो गया| अब ‘धन’ कमाने का तरीका अपने धन को ‘पूँजी बाजार’ में निवेश करना हो गया| यह तरीका आज भी जारी है| इसके लिए किसी उपनिवेश, या भौतिक उपस्थिति की अनिवार्यता नहीं रह गयी| इसके साथ ‘सूचना साम्राज्यवाद’ यानि ‘डाटा साम्राज्यवाद’ उदित हो गया, जिसकी जानकारी अभी भी बहुत कम लोगों को है| जब ‘धन’ कमाने के लिए किसी उपनिवेश, या भौतिक उपस्थिति की अनिवार्यता ही नहीं रह गयी, तो अंग्रेज चले गए| वैसे भी अब सम्प्रभुता का तेजी से ‘विखण्डनीकरण’ और ‘विलोपीकरण’ होता जा रहा है|

अब विश्व को ‘बाजारवाद’ (Marketism) चला रहा है, आप माने या नहीं माने| लेकिन विचार अवश्य कीजिएगा|  

   आचार्य प्रवर निरंजनजी                       

शिक्षक, लेखक, प्रेरक एवं दार्शनिक

अध्यक्ष, अन्तर्राष्ट्रीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान

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शनिवार, 24 अक्टूबर 2026

शेर परेशान क्यों हो गया है?

यह कोई आम सभा नहीं थी, कुछ विशेष का नजदिकी बैठक था| आज जंगल में शेर अपने कुछ नजदीकी दरबारियों के साथ गपशप कर रहा था| कोई गंभीर विषय या नीतिगत विमर्श भी नहीं था| बहुत दिनों के बाद सब कोई फुर्सत में था, किसी को कोई जल्दबाजी भी नहीं है| कुछ चुहलबाजी भी हो जा रहा था|

उस जंगल में हिरणों की संख्या सबसे ज्यादा था, लेकिन जंगली भैसों की संख्या भी कमतर नहीं था| हिरणों को इस बात पर क्षोभ है कि इस आधुनिक लोकतंत्र और गणतंत्र के युग में भी व्यवस्था के प्रमुख शीर्षों पर उनकी उपस्थिति नगण्य है| लेकिन इस सम्बन्ध में यह सवाल भी पूछने की हिम्मत उनमे नहीं थी|

एक जंगली भैसा ने शेर से सवाल कर ही दिया – हुजुर! आधुनिक युग लोकतंत्र और गणतंत्र का है और हमलोग बहुत बड़ी संख्या में भी हैं, तो आपको चाहिए कि आप हमलोगों को सत्ता सौंप दे| शेर एक मिनट के लिए चुप रहा, फिर एक गहरी साँस लेकर बोला – तुम्हें क्या लगता है कि शासन चलाने के लिए सिर्फ बहुमत चाहिए? दरअसल शासन चलाने के लिए प्रखर बुद्धिमत्ता चाहिए होता है| हाँ, यह सही है कि आधुनिक लोकतंत्र और गणतंत्र में कार्यपालिका प्रधान का चेहरा भैंस या हिरण का ही होना चाहिए, लेकिन उसे परदे के पीछे से नियंत्रित और नियमित करने वाले बौद्धिक लोगों का समूह रहता है, जो वास्तविक शासन करता रहता है|

उस भैंसा ने आपत्ति जताया कि – महाराज, तो क्या भैंसा या हिरण जहाँ वास्तविक शासक दिखते हैं, वे सिर्फ मुखौटा मात्र हैं? शेर ने बात आगे बढाई, - जब बहुतों को चमड़ी और चेहरा ही देख पहचान कर अपना पराया समझ में आता है, तो ऐसा ही होता है| जब बहुसंख्यकों के प्रबुद्ध नेताओं को मानसिक और आध्यात्मिक विश्लेषण और मूल्याङ्कन की क्षमता और दक्षता नहीं होती है, तो ऐसा ही होता है| बहुसंख्यक अपनी बौद्धिकता के स्तर पर आसानी से बहाए ही नहीं, आसानी उडाये जा सकते हैं| ये लोग बौद्धिकता से नहीं, सिर्फ भावनाओं से सही गलत पहचानते हैं|

सियार इस विमर्श में सक्रियता के साथ बोला – ‘बहुसंख्यकों के साथ समस्या यह भी है कि सत्ता की नीतियों और योजनाओं का विरोध करने के अलावे इनकी अपनी कोई दीर्घ कार्य योजना ही नहीं होता है| बेचारे बहुसंख्यक नेतागण अपनी नेतागिरी करने के लिए सत्ता की नयी नीतियों के घोषणाओं के इन्तजार में रहते हैं, ताकि सड़कों पर उसका तीव्र विरोध कर अपनी नेतागिरी चमकाई जा सके| ये नेतागण चमड़ी और चेहरा के पहचान के आधार पर भावनात्मक बाते कर अपनी चैनलों की रेटिंग्स बढ़ाने के लिए तत्पर रहते हैं| यदि सत्ता उन मुद्दों को किसी कारणवश वापस ले लिया या संशोधित कर दिया, तो वे नेता फिर से बेरोजगार हो जाते हैं| ‘टिकट’ पा लेना उनका एकमात्र रणनीति होता है, तो वे कैसे शासक बनेंगे’?

लेकिन सवाल यह है कि शेर आजकल परेशान क्यों हो रहा है? शेर जंगल का राजा क्यों है, जबकि जंगल में हाथी सबसे शक्तिशाली है| जंगल का सबसे फुर्तीला और तेज चलने वाला चीता है, वह भी राजा नहीं है? सबसे धूर्त सियार है, लेकिन वह भी राजा नहीं है| यह बात हाथी ने ही पूछा| शेर ने स्प्पष्ट किया कि ‘एक राजा यानि एक कुशल और सफल शासक होने के लिए ‘शक्ति’ या ‘फुर्ती’ या ‘धूर्तता’ नहीं चाहिए होता है| एक शासक बनने के लिए शासक को ‘शासक का मनोबल’ होना चाहिए होता है| ‘शासक का मनोबल’ यानि ‘शासक का इच्छा –शक्ति’ सबसे महत्वपूर्ण होता है| दार्शनिक नीत्शे ने भी यही समझाया था| मैं अपने को इस काबिल समझता हूँ, इसलिए मैं यहाँ हूँ| तुम भी ऐसा विश्वास कर यहाँ आ सकते हो|’

एक शासक को अपने अतिरिक्त जनकल्याण भी सोचना चाहिए| आम जनता के मनोभावों के बीच और अन्य के मध्य संतुलन भी बनाना होता है| आम जन के मनोभावों के स्तर पर भी आना होता है| शेर ने आगे कहा कि ‘यह सब विवरणात्मक बहुत सी बातें हैं, लेकिन जंगल असली राजा मैं नहीं हूँ| जंगल का असली का राजा एक दूसरा जानवर है, जो दिखता कही नहीं है और इसीलिए तुम लोगों को यह नहीं समझ में आता है’| ‘असली शासक’ के लिए किसी का ध्यान धन्ना –सेठों की ओर गया, किसी ने विदेशी साम्राज्यवादियों की ओर ध्यान लगाया, और बहुतों को यह समझ में ही नहीं आया|

सवाल यह था कि जंगल का असली राजा शेर नहीं, तो असली राजा कौन जानवर है? अब राजा की परेशानी के साथ अन्य लोग भी परेशान हो रहे थे| इसे स्पष्ट करने का अनुरोध सभी दरबारियों ने राजा से की, क्योंकि यह बात पहली बार सुना जा रहा था| शेर स्पष्ट किया कि ‘असली राजा संख्या, या बल, या धन से नहीं होता है, बल्कि बुद्धि वाला होता है| आधुनिक ज़माने में सामान्य लोग मुखौटों को ही यानि चमड़ी और चेहरा देख कर ही शासक को समझते हैं, जो वास्तविक शासक नहीं होता है’| शेर भी अपने को जंगल का असली शासक मानने को तैयार नहीं था| सभी जानवर और परेशान होने लगे|

सवाल यह है कि यदि शासक सबसे ज्यादा बुद्धि वाला ही होता है, ती इस धरती पर सबसे ज्यादा बुद्धि वाला कौन जानवर है? किसी का ध्यान ‘दो पाए जानवर – आदमी’ की ओर जा ही नहीं रहा था, क्योंकि वह जंगल की राजधानी या उसके आसपास रहता भी नहीं था| तो क्या जंगल के शेर और शहर के बुद्धिमान आदमी के मध्य कोई अनुबंध तो नहीं है कि शेर इस जंगल में उसकी मर्जी के शर्तों पर रह रहा है, जिसे सब कोई राजा समझ रहा है? एक बुद्धिमान आदमी तो एक शेर को मार भी सकता है या इस धरती पर से उसका वंश भी मिटा सकता; वह आदमी बहुत कुछ कर सकता है| शेर के चेहरे से ‘बेचारगी’ का भाव झलक कर बाहर स्पष्ट रुप से अभिव्यक्ति हो रहा था|

लेकिन इसके ही साथ शेर ने सभी बंधुओ और दरबारी मित्रों से विनम्र अनुरोध भी किया कि यह बात सभी कोई अपने तक ही सीमित रखे| शेर की भावना में अपनी पीड़ा अभिव्यक्त कर देने का ‘अपराध –बोध’ भी स्पष्ट हो रहा था| मैं तो यह बात अपने तक ही सीमित रखूंगा और आप भी  इसका ध्यान रखिएगा|

लेकिन यह बात पहली बार हमलोगों के शरीर और दिमाग को झकझोर रहा था कि असली शासक कहाँ का और कौन आदमी है? या आदमियों का कोई विशेष समूह है? इस धरती पर आदमी भी तो 750 करोड़ की संख्या में है, आदमी तो अपने देश के बाहर भी रहता है, चीता ने सोचा| सभी अपनी अपनी बौद्धिकता के स्तर से असली शासक को पहचाने की कोशिश करने लगे| मुझे तो समझ में नहीं आ रहा है| आप भी कोशिश कर सकते हैं?

   आचार्य प्रवर निरंजनजी                       

शिक्षक, लेखक, प्रेरक एवं दार्शनिक

अध्यक्ष, अन्तर्राष्ट्रीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान

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शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2026

सम्प्रभुता का विखण्डनीकरण या विलोपीकरण

‘सम्प्रभुता’ ही ‘राज्य’ की पहचान है, अन्यथा वह ‘देश’ या ‘राष्ट्र’ हो सकता है, लेकिन ‘स्वतंत्र  सत्ता’ या ‘स्वतंत्र राज्य’ नहीं हो सकता| आधुनिक वर्तमान युग में, विश्व के लगभग सभी’ राज्यों’ की ‘सम्प्रभुता’ (Sovereignity) का ‘विलोपीकरण’ हो रहा है| अब इसकी गति तीव्रतर हो गयी है| विश्व के लगभग तमाम देश के राष्ट्रपति, या प्रधानमंत्री, या राजा, या अन्य कार्यपालिका प्रधान शासक अपने अपने राज्यों की भौगोलिक सीमाओं में मात्र ‘प्रबंधक’ (Manager) ही रह गए हैं; भले ही कोई अपने को कितना भी सम्प्रभु समझ ले, या घोषित करता रहे|

वैसे मध्य काल में ‘सामन्तवाद’ के उदय के साथ ही, ‘सम्प्रभुता’ का ‘विखण्डनीकरण’ प्रारम्भ हो गया था| फिर आधुनिक काल में यूरोपियन आगमानों के साथ ‘सम्प्रभुता’ का ‘विखण्डनीकरण’ का प्रवाह   पूंजी’ (Capital) के हित में नए सिरे से प्रारम्भ हुआ| लेकिन इस वर्तमान युग में तो ‘सम्प्रभुता’ के ‘विखण्डनीकरण’ के स्थान पर ‘विलोपीकरण’ होना शुरु हो गया है| इसके उद्विकास को इतिहास की यात्रा में समझते हैं|

‘राज्य’ के चार अनिवार्य तत्व होते हैं, भौगोलिक ‘भू भाग’, उसमे निवासित स्थायी ‘आबादी’ और उसे व्यवस्थित रखने के लिए एक ‘सरकार’ के अलावे उसकी ‘सम्प्रभुता’ होती है| भारत को सम्प्रभुता 15 अगस्त 1947 को मिली, जिसे भारतीय संविधान में स्पष्ट उल्लेखित किया गया है| भारतीय सम्प्रभुता भारत के लोगों में निहित है| लेकिन क्या सम्प्रभुता का भी विखण्डन या विलोपन किया जा सकता है?  

प्राचीन काल में सभी राज्यों की सम्प्रभुता अखंड रहता था, संरक्षित राज्यों को छोड़ कर| वैसे ‘संरक्षित राज्य’ की सम्प्रभुता कुछ शर्तों एवं नियमों के अधीन रहती थी, लेकिन उन्हें ‘सम्प्रभु’ राज्य माना भी नहीं जाता था| सम्प्रभुता का विखण्डनीकरण मध्य काल में प्रारम्भ हुआ| यह सामन्तवाद की कार्य –प्रकृति का सहज, स्वाभाविक और प्राकृतिक उत्पाद रही| मध्य काल के सामन्तवाद में सम्प्रभुता का पहले ‘उर्घ्वाकार विखण्डनीकरण’ हुआ| बाद में, ‘क्षैतिजाकार विखण्डनीकरण  भी हुआ| सम्प्रभुता के ‘उर्घ्वाकार विखण्डनीकरण’ का अर्थ सम्प्रभुता एक पदानुक्रम (Hierarchy) में खण्डित हो जाना है| पहले राज्य ने स्थानीय प्रभावशाली शक्ति को ‘राज्य कर की उगाही’ का अधिकार दिया, बाद में उसे ‘राज्य कर’ को भण्डारित करने और निदेशानुसार वितरित करने का भी अधिकार देना पड़ा|

प्राचीन काल में भी, राजस्व संग्रहण मुख्यत: कृषि उत्पाद के रुप में होता था, लेकिन उसका मुद्रा में नगदीकरण कर उसे राज्य का अधिकारी ही केन्द्रीय कोषागार में भेजता रहा| प्राचीन काल में सम्प्रभुता के किसी भी प्रकार के विखण्डनीकरण की आवश्यकता नहीं थी| लेकिन मध्य काल में सामन्तवाद के युग में प्रचलित मुद्राओं का पतन हो रहा था, या पतन हो गया था| पहले भी राज्य के हिस्से का राजस्व संग्रहण कृषकों और शिल्पियों से वस्तुओं में प्राप्त होता था, लेकिन मध्य काल में संग्रहण के बाद की स्थितियाँ बहुत बदल गयी| इन पदार्थों का संग्रहण करना, उसका भण्डारण करना और उसे फिर निदेशानुसाय एवं आवश्यकतानुसार वितरित करना एक अलग दायित्व बन गया|

कृषकों और शिल्पियों से प्राप्त वस्तओं का राजस्व संग्रहण तो आसान था| लेकिन उन वस्तुओं को केन्द्रीय या उपकेन्द्रीय राजधानी में भण्डारण के लिए भेजना और उसे एक समय के बाद सुदूर के क्षेत्रों में भुगतान के लिए वस्तुओं के रुप में ही भेजना व्यावहारिक नहीं था| सामन्तवाद में स्थानीय सामन्तो को प्रशासनिक कर्मचारियों एवं सेनाओं को रखना पड़ा, जिनका वेतन भुगतान इन्ही को करना था| इसी क्रम में, पहले सम्प्रभुता और सत्ता का उर्घ्वाकार विखण्डनीकरण एवं स्तरीकरण (Stratification) हुआ| लेकिन कमजोर पड़ता केद्रीय सम्प्रभुता एवं सत्ता और मजबूत होता स्थानीय सम्प्रभुता और सत्ता के कारण सम्प्रभुता और सत्ता का क्षैतिजाकर विखण्डनीकरण भी हो गया| ये स्थानीय सामन्त स्वतंत्र राज्य बनने लगे|

सामन्तवाद का पतन ‘पूंजीवाद’ के आगमन के साथ प्रारंभ हुआ| यूरोपियनों के आगमन के साथ पहले ‘वणिक साम्राज्यवाद’ स्थपित हुआ| इसी के साथ उन सम्बन्धित राज्यों के सम्प्रभुता का विखण्डनीकरण और विलोपीकरण, एक साथ प्रारम्भ हो गया| यूरोपीय पुनर्जागरण प्रारम्भ हो चुका था| यूरोपीय सामन्तों को ‘धन –शक्ति’ में वृद्धि के लिए अपने ‘धन’ (Wealth) को ‘पूँजी’ (Capital) में बदलना अनिवार्य हो गया था| उत्पादक ‘धन’ ही ‘पूँजी’ कहलाता है| इसी अनिवार्यता का परिणाम ‘वणिक साम्राज्यवाद’ है|

यूरोपीय पुनर्जागरण के साथ विज्ञान और तकनीक ने छलांग लगायी| उद्योगों की स्थापना के साथ, ‘वणिक साम्राज्यवाद’ के स्थान पर ‘औद्योगिक साम्राज्यवाद’ का उदय हुआ| पूरी राजनीति इसी ‘औद्योगिक साम्राज्यवाद’ के इर्द –गिर्द घूमने लगी| ‘औद्योगिक साम्राज्यवाद’ भूमि विस्तार चाहता था, और इसी विस्तार के लिए विश्व को दो दो विश्व युद्ध झेलने पड़े| अब भौगोलिक क्षेत्रों का और विस्तार करना संभव नहीं था| साम्राज्यवाद का मूल मकसद ‘पूँजी’ का हित संवर्द्धन करना होता है| द्वितीय विश्व युद्ध की भारी तबाही के बाद यूरोपीय शक्तियों को ‘पूँजी’ के हित संवर्द्धन के लिए साम्राज्यवाद को अपना प्रकृति और स्वरुप को बदल देना पड़ा|

तब ‘औद्योगिक साम्राज्यवाद’ ही अपने नए और प्रभावशाली स्वरुप ‘वित्तीय साम्राज्यवाद’ में बदल गया| अब साम्राज्यवादियों को अपने उपनिवेशों में भौतिक रुप में उपस्थिति अनिवार्य नहीं रही, इसलिए द्वितीय विश्व युद्ध के बाद विश्व के तमाम उपनिवेशों को ‘भौतिक  स्वतन्त्रता’ दे दी गयी| जहाँ स्वतन्त्रता के लिए आन्दोलन नहीं हुए, वे भी स्वतंत्र कर दिए, क्योंकि ‘वित्तीय साम्राज्यवाद’ के लिए साम्राज्यवादियों की भौतिकी उपस्थिति आवश्यक नहीं रह गयी थी|

संयुक्त राष्ट्र संघ के लिए कई तमाम संगठन गठित हुए, कई संधियाँ और बाध्यकारी समझौते हुए| राज्यों की तथाकथित सम्प्रभुता खंडित और विलोपित होने लगी| इस ‘वित्तीय साम्राज्यवाद’ को अब ‘डाटा साम्राज्यवाद’ का तकनीकी समर्थन भी मिलने लगा| इस ‘डाटा साम्राज्यवाद’ का आभास अभी तक  बहुत से राज्यों को भी नहीं है| ‘डाटा’ अर्थात सूचनाओं का संग्रहण, विश्लेषण, मूल्याङ्कन और उसका वित्तीय आवश्यकताओं के अनुरुप उपयोग होने लगा|

अब विश्व मानवता के लिए ‘एकल राष्ट्र’ के निर्माण की ओर तेजी से अग्रसर है| हम इस दिशा में सोचे, या नहीं सोचे,; यह अबाध गति से आगे बढ़ रहा है| आज सभी राज्यों के शासनध्यक्ष अपने अपने भौगोलिक सीमाओं में अपने देश के प्रबंधक मात्र रह गए| स्पष्ट है कि इन राज्यों की सम्प्रभुता  का विलीनीकरण तेजी से हो रहा है| ठहरिए और सोचिए|

   आचार्य प्रवर निरंजनजी

शिक्षक, लेखक, प्रेरक एवं दार्शनिक

अध्यक्ष, अन्तर्राष्ट्रीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान

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गुरुवार, 15 अक्टूबर 2026

मौतें सामाजिक और ऐतिहासिक भी होती है

जी, यहाँ आदमियों की मौतों के बारे में बात हो रही है| शारीरिक मौतों के बारे तो सब कोई बहुत कुछ जानते हैं, लेकिन आज हमलोग सामाजिक मौतों और ऐतिहासिक मौतों के बारे में विश्लेषण करेंगे| शारीरिक मौतों, सामाजिक मौतों, और ऐतिहासिक मौतों के अतिरिक्त और भी कई प्रकार मौतें हो सकती है| लेकिन ‘कुत्तों की मौत’ मरने वाले आदमियों को प्रसंग में लाये बिना यह प्रसंग अधूरी रहेगी|

वैसे तो हर सामान्य स्तनपायी पशुओं के जीवन की तरह आदमी भी एक सामान्य ‘स्तनपायी –जीव’ (Mammal) है; इसलिए यह भी जन्म लेता है, विकसित होता है, प्रजनन करता है, अपने द्वारा प्रजनित को पालता पोषता है, और उसको देखते हुए मर भी जाता है| ऐसी विशेषता वाले हर स्तनपायी “पशु” ही कहलाते हैं, चाहे वह ‘आदमी’ भी दिखता है| सभी स्तनपायी ‘पशु’ सिर्फ और सिर्फ अपने जैवकीय आवश्यकताओं से नियमित एवं संचालित होता है| पशु अपना व्यवहार सिर्फ जैवकीय आवश्यकताओं के लिए अपनी प्रतिक्रिया मात्र करता है| इन्ही प्रतिक्रियायों को “प्रतिवर्त क्रिया” (Reflex Action) कहते हैं और इसमें किसी चिन्तन की आवश्यकता नहीं होती है| वैसे ‘चिन्तन करने की कला’ सिर्फ और सिर्फ आदमी ही कर सकता है| इसीलिए ‘चिन्तन विहीन’ आदमी “पशु –मानव” (Animal –Man) कहलाता है|

जब कोई आदमी अपने ‘चिन्तन’ की प्रक्रिया में अपनी जैवकीय आवश्यकताओं से उपर उठ जाता है, तब वह “बौद्धिक –मानव” (Intellect –Man) कहलाने योग्य हो जाता है| जिनका भी शारीरिक जन्म होता है, उन सभी की शारीरिक मौतें भी होती है, चाहे वह ‘चिन्तनशील’ हो या वह ‘चिन्तनशील’ नहीं हो| जब कोई आदमी अपने ‘चिन्तन’ की प्रक्रिया में अपने परिवार के अलावे समाज को शामिल का लेता है, तो वह ‘महान –मानव’ (The Great Man) बन जाता है| जब कोई आदमी  अपने ‘चिन्तन’ की प्रक्रिया में अपने परिवार और समाज के अलावे सम्पूर्ण ‘मानवता’ और ‘मानवता के भविष्य’ को भी समाहित कर लेता है, तो वह “बुद्ध” कहलाता है| लेकिन समाज में ‘झन्डा’ ढोने वाले, या ‘डंडा’ उठाने वाले, या ‘दरी’ बिछाने वाले कभी भी ‘महान –मानव’ नहीं बन पाते हैं|

‘सामाजिक मौतें’ वे मौतें होती है, जिनमें आदमियों के शारीरिक मौतों की तनिक भी परवाह तत्कालीन समाज नहीं करता है| ‘सामाजिक मौतों’ को समझने के लिए हमें ब्रह्माण्ड का एक सार्वभौमिक सिद्धांत को समझना होगा| ब्रह्माण्ड का हर वस्तु सदैव ब्रह्माण्ड से ऊर्जा प्राप्त (Receive) करता रहता है और ऊर्जा उत्सर्जित/ छोड़ता (Radiate) रहता है| यह सिद्धांत सभी निर्जीव और सजीव – दोनों पर सामान रूप से लागू होता है| जब कोई वस्तु प्राप्त किए गए ऊर्जा से अधिक ऊर्जा उत्सर्जित करता है, तब वह ‘ठंडा’ होने लगता है; और इसके विपरीत अवस्था में वह ‘गर्म’ होने लगता है| इसी तरह, उर्जा –प्राप्ति और उर्जा -उत्सर्जन का संतुलन ही ‘जीवन’ है|

यही सिद्धान्त ‘’सामाजिक जीवितता/ जीवन्तता’’ और ‘‘सामाजिक मौतों’’ पर लागू होता है| जब कोई आदमी अपने सामज से धन, सम्मान, प्यार और ऊर्जा आदि कमाता है या प्राप्त करता है, और समाज को कुछ भी वापस (उत्सर्जित) नहीं करता है,  तब वह मानसिक रुप से बीमार हो जाता है, या ‘सामाजिक रुप से मर’ जाता है| ऐसी अवस्था को ‘सामाजिक मौत’ कहा गया है| ऐसे आदमियों की परवाह समाज नहीं करता है|

‘ऐतिहासिक मौतें’ वे मौतें होती है, जिनको इतिहास की पन्नों में कोई स्थान नहीं मिलता है| ऐसी मौतों को समझने के लिए हमें अर्थव्यवस्था के ‘पाँचों प्रक्षेत्रों’ (Five Sectors) के कार्यों को समझना पडेगा| आदमी के जीवन को ‘अर्थ’ देने के लिए जो व्यवस्था किया जाता है, उसे ही ‘अर्थ की व्यवस्था, या 'अर्थव्यवस्था’ कहते हैं| जो आदमी सिर्फ अर्थव्यवस्था के प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय – तीनों प्रक्षेत्रों में योगदान देता है, उसे इतिहास के पन्नों में कोई भी स्थान नहीं मिलता है| इन तीन प्रक्षेत्रों में सफल आदमी  समृद्ध हो सकता है, ताकतवर हो सकता है, संतुष्ट हो सकता है,, लेकिन उन्हें ‘इतिहास’ याद नहीं करता है| इसी तरह, समाज में ‘झन्डा’ ढोने वाले, या ‘डंडा’ उठाने वाले, या ‘दरी’ बिछाने वाले कभी भी इतिहास के पन्नों में नहीं आते हैं|

इन तीन प्रथम प्रक्षेत्रों में योगदान करने वालों की ‘ऐतिहासिक मौतें’ निश्चित होती है| जो आदमी अर्थव्यवस्था के उपरी अन्तिम दोनों प्रक्षेत्रों – चतुर्थ प्रक्षेत्र (Quarternary Sector) और पंचक प्रक्षेत्र (Quinary Sector) में योगदान करते हैं, सिर्फ उनको ही इतिहास के पन्नों में स्थान मिलता है; और ऐसे लोग ऐतिहासिक रुप में जीवित होते हैं| यहाँ यह स्पष्ट रहना चाहिए कि ‘सामाजिक जीवित’ व्यक्तियों की भी ‘ऐतिहासिक मौतें’ हो जाती है|

‘कुत्तों की मौत’ मरने वाले व्यक्तियों में वे ‘ऐतिहासिक व्यक्ति’ शामिल माने जाते हैं, जिनका समाज में योगदान को नकारात्मक या विध्वंसात्मक रहता है| ऐसे ऐतिहासिक व्यक्तियों की मौतों को ‘कुत्तों’ की ‘मौत’ की उपमा दी जाती है| ऐसे व्यक्तियों में ‘क्रूर शासक’, ‘संवेदनहीन शासक’, ‘लुटेरा शासक’, ‘कठपुतली शासक’, ‘नस्लवादी या जातिवादी’ शासक, ‘आतंकवादी शासक’ आदि इन सूचियों में शामिल होते हैं| इनमे इनके सलाहकार ‘नीति –नियन्ता’ भी शामिल माने जाते हैं| ये आदमी ‘ऐतिहासिक’ तो होते हैं, लेकिन ‘सामाजिक’ नहीं होते हैं| तानाशाहों, नाजीवादी, संवेदनहीन शासकों की मौतों को ‘कुत्तों’ की मौत’ मरना कहा जाता है|

‘सामाजिक जीवन्तता’ तो तात्कालिक समाज के सन्दर्भ में होता है, लेकिन ‘ऐतिहासिक जीवन्तता’ इतिहास के काल के लिए होता है| दार्शनिक बुद्ध का ‘सामाजिक और ऐतिहासिक मौत नहीं हुआ| वैज्ञानिक गैलीलियो का ‘सामाजिक मौत’ तो हुआ होगा, लेकिन उनका ‘ऐतिहासिक मौत’ नहीं हुआ| अब आप यह निर्णय ले सकते हैं, कि कौन आदमी  कैसी मौत मरा?

   आचार्य प्रवर निरंजनजी

शिक्षक, लेखक, प्रेरक एवं दार्शनिक

अध्यक्ष, अन्तर्राष्ट्रीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान

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गुरुवार, 1 अक्टूबर 2026

फिज़ाएँ कैसे बदली जाती है ?

 (How can the Ambience be changed)

हम समाज की फ़िज़ाओं को बदलने की बात कर रहे हैं| समाज की फिजाओं को बदलना, अर्थात समाज के सामाजिक और सांस्कृतिक माहौल को सकारात्मक, सृजनात्मक और मानवतावादी बनाना होता है| किसी भी समाज या राष्ट्र को संचालित, नियंत्रित और नियमित करने के लिए व्यवस्था तीन स्तर – ‘संरचनात्मक सुविधाएँ’ (हार्डवेयर), सामाजिक एवं सांस्कृतिक ‘बाहय माहौल’ (साफ्टवेयर) और स्वत:स्फूर्त माहौल (फ़िज़ावेयर) पर कार्यरत होता है| फिजाएँ दृश्य नहीं होती है, लेकिन इसका प्रभाव एवं परिणाम स्पष्ट दिखता होता है|

समाज या राष्ट्र एक जीवन्त तंत्र होता है, जिसे उसके सदस्यों के विचार, विश्वास, मूल्य, व्यवहार, परम्पराएँ, मान्यताएँ, पारस्परिक सम्बन्ध और संस्थाएँ निरन्तर एक दूसरे को प्रभावित और स्वरुप देती रहती है| इसी सामूहिक चिन्तन प्रक्रिया यानि मानसिकता से समाज या राष्ट्र की फिजाएँ काम करती है| किसी विकसित और उन्नत राष्ट्र या निम्नतर और बदतर राष्ट्र की वर्तमान अवस्था उसकी फिज़ाओं का सुनिश्चित परिणाम होता है| किसी बदतर और निम्नतर समाज और राष्ट्र की दयनीय अवस्था में बदलाव इनकी फिजाओं को ही बदल कर किया जा सकता है| यदि किसी समाज में स्वतन्त्रता, समता और समानता, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, सहिष्णुता, सहयोग, समन्वय एवं समरसता की भावना होती है, तो वह समाज सकारात्मक और सृजनात्मक होता है| यदि समाज में भय, भेदभाव, अंधविश्वास, हिंसा और असहिष्णुता का प्रभाव व्याप्त होता है, तो इसके परिणाम नकारात्मक होता है| यूरोपीय पुनर्जागरण में संस्था, विधि (Law), शिक्षा, मीडिया और धर्म अपनी भूमिका में यथावत स्थिर बनी हुई थी, लेकिन इसके बावजूद भी उनकी ‘फिजाओं’ ने कमाल कर दिया| यह ‘फिजाओं’ का प्रत्यक्ष प्रभाव है|

समाज की संस्कृति मुख्यत: आर्थिक साधनों और शक्तियों से संचालित और नियमित होती है, लेकिन इसमें संस्था, विधि (Law), शिक्षा, मीडिया और धर्म की भी भूमिका महत्वपूर्ण होती है| तकनीक में बदलाव सदैव सामाजिक मानसिकता को बदलता रहा है| इन्हें आर्थिक या बाजार की शक्तियाँ समझी जाती है| लोगों की मानसिकता बदलने के लिए लोगों के विचार और उनके जीवन मूल्यों को बदलना होता है| संस्थाओं को बदलने के लिए ‘फिजाओं’ को ही बदलना होता है, क्योंकि संस्थाएँ ‘काल्पनिक’ मानसिकता पर आधारित ‘वास्तविकताएँ’ होती है| यह प्रबल और प्रभावशाली होती है| यह उन लोगों के मानसिक विश्वास पर आधारित होते हैं| अर्थात फिजाएँ ही संस्थाओं को खंडित या सशक्त कर सकती है|

फिजाओं को पैदा करने और उसे विकसित कर सशक्त करने की क्षमता और शक्ति सिर्फ ‘दर्शन’ में होती है| ‘एक ‘दर्शन’ और कुछ नहीं है, सिर्फ किसी भी चीज को बढ़िया से देखने -समझने की समझ बढाता है| अर्थात उन्नत और कुशल दर्शन आपके वर्तमान वास्तविक जीवन की समस्यायों या उलझन को सुलझाता है| यदि कोई दर्शन है, और वह मरने के बाद की स्थिति में सांत्वना देता है, तो वह दर्शन सामन्ती दर्शन है और वह अवैज्ञानिक है| चार्ल्स डार्विन का वैज्ञानिक दर्शन – ‘जैवकीय उद्विकासवाद’ एक ही साथ कई स्थपित संस्थाओं को ध्वस्त कर दिया| इसके ही साथ, आदमी किसी अप्राकृतिक एजेंसी से उत्पन्न नहीं किया गया है, स्थपित हो गया| कार्ल मार्क्स का वैज्ञानिक दर्शन आज भी विश्व को प्रभावित कर रहा है| इस दर्शन ने स्थापित फिज़ाओं को बदलने के लिए मजबूर कर दिया|

यदि कोई किसी समाज, या राष्ट्र, या सम्पूर्ण मानवता के भविष्य को बदल कर बेहतर भविष्य स्थापित करना चाहता है, तो उसे वहाँ की फिज़ाओं को ही बदल कर ऐसा कर सकता हैं| यदि व्यक्ति या समाज किसी को लाभान्वित करना चाहता है, तो वह अपने संसाधन से ऐसा कर सकता है, लेकिन उन लाभार्थियों की संख्या अति न्यून ही रहेगी| यदि लाभार्थियों की संख्या कुछ बड़ी करनी है, तब उसे सत्ता का सहारा लेना होगा या सत्ता में आना होगा| लेकिन यदि लाभार्थियों की संख्या करोडो या अरबों में है, तो आप सिर्फ और सिर्फ किसी नए ‘दर्शन’ के सहारे ही ऐसा संभव कर सकते हैं|

अल्बर्ट आइन्स्टीन कहते हैं कि समस्या चेतना के जिस स्तर पर खड़ा है, उसका समाधान उसके ऊपर के स्तर पर आने से ही संभव है| ‘चेतना के स्तर’ को ऊपर करना ही ‘नव –दर्शन’ है| थामस सैम्युल कुहन ने क्रान्ति करने के लिए अनिवार्य तत्व के रुप में ‘पैरेड़ाईम शिफ्ट’ (Paradigm Shift) को गहराई से रेखांकित किया| क्रान्ति का आधार - ‘पैरेड़ाईम शिफ्ट’ भी एक ‘नव –दर्शन’ है| आप विश्व में सभी सामाजिक और सांस्कृतिक बदलाव, जिसने मानवता का महान कल्याण किया, के पीछे कार्यरत शक्ति ‘नव –दर्शन’ ही है| आप अपने समाज, या राष्ट्र, या समस्त मानवता को बेहतर भविष्य देना सुनिश्चित करना चाहते हैं, तो आप भी ‘नव –दर्शन’ तैयार करे|

तब सवाल यह है कि यह ‘नव –दर्शन’ क्या करेगा? इस ‘नव –दर्शन’ का लक्ष्य क्या होगा, जिसे कोई स्पष्टतया देख, समझ और तैयार कर सके| जब तक कोई बेहतर भविष्य बनाने के रास्ते में आने वाली बाधाओं की पहचान नहीं करेगा, तो उसे उस ‘दर्शन’ का ‘दर्शन’ ही समझ में नहीं आएगा| नदी के जल -प्रवाह में बाधा बनी चट्टान को 'दर्शन' के डायनामाईट से ही उड़ा कर जल -प्रवाह को सुगम बनाया जा सकता है|  विश्व को बेहतर भविष्य देने में आने वाली अधिकतर बाधाएँ अपनी सांस्कृतिक आवरण में छिपी हुई होती है| संस्कृति किसी भी समाज, या राष्ट्र का ‘सम्मानजनक विरासत’ होता है| चूँकि एक संस्कृति को ‘सम्मानजनक विरासत’ मान लिया जाता है, इसलिए इसका ‘आवरण’ बहुत कठोर भी होता है और संवेदनशील भी होता है| ऐसी स्थिति में, उस ‘सम्मानजनक विरासत’ के अन्दर मौजूद ‘भेड़िया’ की पहचान भी नहीं की जा सकती है| अधिकतर मामलों में, उस समाज या राष्ट्र की मूल और मौलिक संस्कृति को मध्य काल की सामन्ती संस्कृति ने विस्थापित कर दिया है| इस विस्थापन या रूपांतरण की प्रक्रियायों को समझने की आवश्यकता है| इस समझ पर आधारित ‘नव- दर्शन’ सांस्कृतिक विरासत के खोल में छिपे ‘भेड़िया’ को समाप्त कर देगा| यह ‘भेड़िया’ उस समाज या राष्ट्र की ऊर्जा. उत्साह, संसाधन और वैचारिकी को चुप चाप खाए जा रहा है, या नष्ट करता जा रहा है| इसीलिए अपेक्षित परिणाम बहुत दूर हैं|

इन बाधाओं को दूर करने के लिए आवश्यक ‘नव –दर्शन’ को तैयार कीजिए| इस ‘नव –दर्शन’ के बिना ‘विकास का नाटक’ तो किया जा सकता, लेकिन कोई क्रान्तिकारी प्रगति नहीं पाया जा सकता है| विकास के लिए बाकी खेल –तमाशा जारी रहेगा| व्यवस्था और लोग भी विज्ञान और तकनीक से उत्पन्न सुविधाओं और सम्पन्नता को अपने ‘विकास’ के खाते डालते रहते हैं, और लोग वास्तविकता को समझ नहीं पाते हैं| ‘नव –दर्शन’ ही किसी समाज और राष्ट्र की फिज़ाओं को बदलने की एकमात्र क्षमता रखता है|

आप भी अपने समाज और राष्ट्र के प्रति थोडा गंभीर होइए|

आचार्य प्रवर निरंजनजी

शिक्षक, लेखक, प्रेरक एवं दार्शनिक

अध्यक्ष, अन्तर्राष्ट्रीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान

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मंगलवार, 22 सितंबर 2026

विवाह और ‘लिव इन रिलेशनशिप’

(Marriage and ‘Live –in –Relationship’)

मैं ‘बिहार लोक प्रशासन एवं ग्रामीण विकास संस्थान’ (BIPARD) में अधिकारियों के शिक्षण –प्रशिक्षण में ‘Stress and Conflict Manaement’ पढ़ा रहा था| प्रश्नोत्तरी में मुझसे ‘लिव इन रिलेशनशिप’ के सम्बन्ध में मेरी ‘राय’ जानने की उत्सुकता उन लोगो में थी| सामान्य जनों की तरह युवा अधिकारीयों में यह तनाव / दबाव (Stress) और संघर्ष (Conflict) का कारण बन जाता है, जिसका ‘प्रबंधन’ करना उनके लिए अवश्यक हो जाता है| दरअसल लोगो को ‘Stress’ and ‘Conflict’ की समस्या इन दो भिन्न शब्दों – ‘विवाह’ और ‘लिव इन रिलेशनशिप’ की अवधारणाओं में उतना नहीं है, जितना इसका सम्बन्ध उसके ‘ज्ञान (Knowledge), ‘बुद्धि’ (Intelligence) और ‘प्रज्ञा’ (Wisdom) की समझ से है| इसीलिए आजकल के अतिव्यस्त जीवन में ऐसे लोगों को परामर्श (Counselling) की आवश्यकता होती है|

सामान्यत: लोग ‘ज्ञान’, ‘बुद्धि’ और ‘प्रज्ञा’ को एक ही अर्थ के पर्यायवाची समझ लेते हैं, और इसी कारण जीवन में अनेकों तनाव /दबाव और संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो जाती है| ‘ज्ञान’ किसी वस्तु, स्थिति और क्रियाविधि को यथास्थिति में सम्पूर्णता में जानना होता है| यह ‘ज्ञान’ उनसे सभी सम्बन्धित सूचनाओं का क्रमबद्ध एवं व्यवस्थित समेकित जानकारी होती है| यह ज्ञान ‘उचित –अनुचित’ और ‘अच्छा –बुरा’ से निरपेक्ष होता है| ‘विवाह’ और ‘लिव इन रिलेशनशिप’ के सम्बन्ध में ‘नैतिकता’ के सापेक्ष देखने –समझने की प्रवृति ही Stress और Conflict पैदा करता है; जबकि इसे सबसे पहले किसी नैतिकता के निरपेक्ष जानना -समझना चाहिए| यह ज्ञान किसी और के सापेक्षिक नहीं होता है| जब हम किसी भी वस्तु, स्थिति और क्रियाविधि को यथास्थिति में जान लेते हैं, तब हमें समझदारी और विवेकपूर्ण निर्णय लेने में, यानि कोई निष्कर्ष निकलने में सहजता होती है|  

जब हम प्राप्त किसी ज्ञान का उपयोग अपने लिए करते हैं, तब वह ‘ज्ञान’ हमारे लिए हमारी ‘बुद्धि’ बन जाती है| जब हम अपनी बुद्धि को सामने वाले के (भावनाओं के) अनुरूप करते हैं, तब वह ‘भावनात्मक बुद्धि’ (Emotional Intelligence) कहलाती है| जब हम अपनी बुद्धि को समाज के सन्दर्भ में करते हैं, तब वह बुद्धि ‘सामाजिक बुद्धि’ (Social Intelligence) कहलाती है| और जब हम अपनी बुद्धि को मानवता और 'मानवता के भविष्य' के सन्दर्भ में करते हैं, तब वह ‘प्रज्ञात्मक बुद्धि’ (Wisdom Intelligence) बन जाती है| स्पष्ट है कि जब ज्ञान एवं बुद्धि का विवेकपूर्ण उपयोग 'मानवता के भविष्य' के लिए करते हैं, वह ज्ञान ही ‘प्रज्ञा’ कहलाता है| इन तोनो को समझ लेने से ‘Stress and Conflict Manaement’ कुशल हो जाता है|

एक मानव एक ही साथ ‘Homo Sapience’ (पशु मानव), ‘Homo Socious’ (सामाजिक मानव) और  ‘Homo Faber’(निर्माता मानव) है| एक मानव को एक स्तनपायी पशु की ही तरह सभी जैवकीय आवश्यकतायों की पूर्ति होनी चाहिए| इन जैवकीय आवश्यकताओं में श्वसन, भोजन, पानी, आवास, कपड़ा, आराम, स्वास्थ्य, और यौन संतुष्टि शामिल होना सहज एवं स्वाभाविक है| इसके अतिरिक्त, मानव को दोस्ती, अपनापन, प्यार, समाजिकता, सहयोग एवं सहानुभूति आदि मानवीय गुणों की तीव्र चाहत होती है| अन्य प्राकृतिक व्यवस्था की तरह सभी पशुओं में विपरीत यौन -पूरकता’ से जीवन की निरंतरता, यानि उसे अमरत्व’ की प्राप्ति होती है| यह सब दो विपरीत लिंगी युग्म में, यानि पूरक लिंगी युवाओं के युग्म को ‘लिव इन रिलेशनशिप‘ में रहने से यह सब जैवकीय आवश्यकताएँ आसानी से प्राप्त हो जाता है| यह सब तानव से भरे अति व्यस्त नागरीय जीवन की विवशताएँ हैं| यह सम्बन्ध मात्र ‘यौन संतुष्टि’ का प्रबंधन नहीं है, बल्कि इससे बहुत ज्यादा मानवीय सहज एवं स्वाभविक प्रवृतियों का  प्रबंधन का होता है| इसका सम्बन्ध विवाह से है, या नहीं; एक अलग विचारणीय और नैतिकता का विषय है| ‘विवाह’ की सम्यक और पर्याप्त समझ से यह स्पष्ट हो सकता है|

सामान्यतया लोग विवाह को ‘यौन संबंधों’ का पर्याय समझ लेते है| लोग यह समझते है कि एक विवाह यौन संतुष्टि की सामाजिक स्वीकृत्त्यादेश (Sanctions) मात्र है, जबकि यह यौन संतुष्टि की सामाजिक स्वीकृत्त्यादेश विवाह का सबसे प्रमुख और एकमात्र कारण नहीं है| ‘विवाह’ इस संसार का एक ऐसा मौलिक और आधारभूत नींव (Foundation) है, जिस पर ‘परिवार’, समाज, राष्ट्र आदि सभी सामाजिक, सांस्कृतिक और अन्य व्यवस्थाएँ टिकी हुई है| विवाह एक सामाजिक एवं सांस्कृतिक ‘संस्था’ (Institution) है| सामान्यत: लोग एक ‘संस्था’ को एक ‘संस्थान’ (Institute) से भ्रमित हो जाते है| प्रत्येक ‘संस्था’ का, इसीलिए प्रत्येक सामाजिक एवं सांस्कृतिक ‘संस्था’ का भी एक मौलिक एवं मूल ‘दर्शन’ होता है, जो उन विशेष कर्तव्यों और उत्तरदायित्वों का निर्वहन को स्पष्ट करते हैं| यहाँ ‘दर्शन’ से तात्पर्य उसके मूल एवं मौलिक निहित आदर्शों से हैं, जिनके पूर्ति के लिए उस ख़ास 'संस्था' का गठन किया गया है| विवाह नामक संस्था का भी ऐसा ही स्पष्ट और सुनिश्चित  ‘दर्शन’ यानि निहित आदर्श है|

विवाह एक ऐसा सामाजिक एवं सांस्कृतिक ‘संस्था’ है, जो स्त्री एवं पुरुष के एक स्थायी युग्म पर बहुत से  विशेष पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक एवं शैक्षणिक कर्तव्यों और उत्तरदायित्वों का निर्वहन करने के लिए भारित करता है| इसमें अपने बच्चे को, चाहे उनसे उत्पन्न हो या उनके द्वारा गोद लिया गया हो, को समुचित तरीके से पालन पोषण करें| इसके साथ अपने ‘विस्तारित परिवार’ (Extendended Family)  के प्रति और अपने समाज के प्रति अपने विशेष कर्तव्यों और उत्तरदायित्वों का निर्वहन करे| भारत में ‘विस्तारित परिवार’ को नादानी वश ‘संयुक्त परिवार’ कह दिया जाता है|

विश्व में सिर्फ परिवार में ही ‘साम्यवाद’ (Communism) स्थापित और कार्यरत है, जहां सभी सदस्य अपनी क्षमता के अनुरुप योगदान करते हैं और अपनी आवयकता के अनुरुप पाते हैं| मानव शास्त्रियों ने बहुत से सरल एवं सहज समाजों (आदिवासी समाजों)  में ‘दादा- पोती’ और ‘दादी –पोता’ में वैवाहिक सम्बन्ध पाए हैं| ध्यान रहे कि इसमें यौन सम्बन्ध प्रमुख नहीं हुआ| स्पष्ट है कि ये सम्बन्ध यौन आधारित नहीं होकर उनकी विशेष पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक एवं शैक्षणिक कर्तव्यों और उत्तरदायित्वों का निर्वहन से सम्बन्धित हैं| समस्या यह है कि हम भारतीय ‘पश्चिमीकरण’ यानि पश्चिम के नक़ल को ही ‘आधुनिकीकरण’ या ‘वैज्ञानिक मानसिकता’ का पर्याय समझ लेते हैं|

इस तरह यह स्पष्ट है कि ‘यौन सम्बन्ध’ विवाह नामक संस्था का मूल, आधारभूत एवं अनिवार्य तत्व नहीं है| फिर भी तथाकथित मानवता के हिमायती सामान्य बुद्धिजीवी समान यौन के लोगों (समलिंगी) में विवाह को स्वीकृति देने के पक्षधर होते हैं| ऐसा इसलिए होता है, ऐसे लोग विभिन्न विषयों के तो विद्वान् होते हैं, लेकिन उनमे ‘विवाह’ नमक सामाजिक सांस्कृतिक संस्था की समझ नहीं होती है| पशु जगत में, खासकर स्तनपायी में, यौन सम्बन्ध सर्वव्यापक तो होते हैं, लेकिन उनमे ‘विवाह’ नहीं होते हैं| इसीलिए मानव को छोड़ कर कोई भी जीव अपनी विशिष्ट संसार  की रचना नहीं कर सका| प्रकृति का हरेक जैवीय उत्पाद या तो ‘सममिति’ (Symmetry) में होता है, या ‘पूरकता’ (Conplimentry) में होता है| प्रकृति का हरेक स्तनपायी दो पूरक लिंगी से ही वंशवृद्धि का सृजन करता होता है| मानव में यह पूरकता स्त्री और पुरुष में ही है, अन्यथा किसी और में यह व्यवस्था नहीं है| विवाह ही मानव को निरंतरता और अमरत्व देता है और यह कार्य सिर्फ और सिर्फ विपरीत लिंगी युग्म ही कर सकता है|

मानवशास्त्र में मानव प्रजाति के सरल एवं साधारण समाजों में मानव के सरल, साधारण, सहज और स्वाभाविक वृतियों (Instinct) का अध्ययन किया जाता है, ताकि प्राकृतिक व्यवस्था के अनुसार मानव को अधिक उपयोगी और व्यवस्थित बनाया जा सके| कोई यौन आनन्द अपने तरीके और आपसी सहमति से उठा सकता है, लेकिन वह विवाह नामक संस्था का पर्याय नहीं माना जा सकता| इसे समझ लेने से आपके ‘Stress and Conflict’ का प्रबंधन (Manaement) करना संभव है| ऐसे बहुत से प्रबंधन स्थिति विशेष के सापेक्ष हमारे ‘नजरिये’ के बदल देनें से मात्र से सम्भव हो जाता है| प्रत्येक स्थिति में सकारात्मकता और संभाव्यता की तलाश करने का दृष्टिकोण प्रत्येक  ‘Stress and Conflict’ का समुचित प्रबंधन कर देता है| इसी प्रबंधन में ‘ज्ञान’, ‘बुद्धि’ और ‘प्रज्ञा’ काम आता है| प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक विक्टर फ्रैकल इस प्रबंधन को ‘जीवन में अर्थ’ खोजने में समझाते हैं|

इसलिए ‘विवाह’ और ‘लिव इन रिलेशनशिप’ को यथास्थिति में और स्पष्ट समझ कर तनाव एवं संघर्ष मुक्त रहें|

आचार्य प्रवर निरंजनजी

शिक्षक, लेखक, प्रेरक एवं दार्शनिक

अध्यक्ष, अन्तर्राष्ट्रीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान

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शनिवार, 19 सितंबर 2026

हम कितने नादान हैं

यह शीर्षक आपको थोड़ा अटपटा लग रहा होगा| बात यह है कि हमलोग अपने को बौद्धिक तो समझते हैं’ लेकिन बहुसंख्यक आबादी को ‘निरा मूर्ख’ समझते हैं| हमें अक्सर सामान्य जनों पर, यानि भारतीय बहुसंख्यकों की ‘तथाकथित अज्ञानता’ पर झुन्झुलाहट होती है| उनकी ‘तथाकथित अज्ञानता’ के लिए हम ‘कागजी बौद्धिक’ उन्हें मूर्ख समझते हैं| यहाँ समझने की बात यह है कि यदि ये बहुसंख्यक अज्ञानी, असहाय और नासमझ नहीं रहते , तो उनको समझाने और उठाने की कोई आवश्यकता ही नहीं होती और इसमें हमारी कोई भूमिका भी नहीं होती| और यदि हमारी इस मामले में हमारी आवश्यकता ही नहीं होती, तो हमलोग बौद्धिक कहलाते ही काहे के लिए हैं? चूँकि सामान्य जन अज्ञानी, असहाय और नासमझ है, इसीलिए तो उन्हें समझने और समझाने की आवश्यकता भी है, और इसीलिए हम बौद्धिक भी हैं|

वास्तव में हमारी मूर्खता, या हमारी नादानी हमारे ‘मानव स्वाभाव’ से जुड़ा हुआ है| हमलोग ‘बुद्धिमान मानव’ (होमो सेपियंस) होते हुए भी अक्सर मूर्खतापूर्ण व्यवहार करते हुए होते हैं| पिछले आलेख में मैंने ‘ज्ञान’, बुद्धि’ और ‘प्रज्ञा’ में अन्तर एवं सम्बन्ध बताया था| हमारी ‘बुद्धि’ केवल हमारे ‘ज्ञान’ पर ही निर्भर नहीं करता, बल्कि हमारी भावनाओं, आदतों, अहंकार, भय, पूर्वाग्रहों और सामाजिक –सांस्कृतिक प्रभाव से भी नियमित और संचालित होते हैं| अपनी धारणाओं को सत्य और सही समझ लेना और सामने वाली की परिस्थितियों पर ध्यान नहीं देने से हमारी नादानी स्थापित हो जाती है| अधिकतर ‘तथाकथित बौद्धिक’ लोग भी ‘कागजी बौद्धिकों’ की भीड़ में शामिल होकर ‘बौद्धिकता का बहुमत’ स्वीकार करवा लेना चाहते है| सीमित ज्ञान के लोग ही ‘हाथी के पैर’ को ‘पाया’ (Pillar) घोषित करते रहते हैं| अक्सर देखा जाता है कि कुछ लोग मात्र किसी पुराने शिलालेख पढ़ लेने से ही अपने को सर्वज्ञानी और उद्धारक समझने लगते हैं|

यही अज्ञानता, मूर्खता और बौद्धिकता को समझने में ‘मन’ (Mind) की भूमिका आती है, और इसके विज्ञान को ही ‘मनोविज्ञान’ कहां गया है| किसी का ‘मन’ ही उसके विचार, भावनाओं और व्यवहारों को नियमित, नियंत्रित, प्रभावित और संचालित करता हुआ होता है| यदि कोई किसी दूसरे के मन को समझने की कोशिश ही नहीं करता है, और सामने वाले के ‘मन’ के अनुकूल अपनी समझदारी को प्रस्तुत नहीं कर पाता है, तो वही उस समझाने वाले व्यक्ति की नादानी या मूर्खता है| जो ‘कागजी बौद्धिक’ सामान्य जनों को मूर्ख समझता है; दरअसल वह ऐसा कह कर अपनी ‘मूर्खता’ का झेंप मिटाता हुआ होता है|

हम चाहते हैं कि हमारी ‘कागजी बौद्धिकता’ के अनुरूप ही हमारे समाज के बहुसंख्यक लोगों की समझ यानि बौद्धिकता हो| हम यह भी चाहते हैं कि हमारे समाज की समस्याएँ या बीमारियाँ भी हमारी समझ के अनुरूप हो; जबकि यह होना चाहिए कि हमारी समझ ही उन समस्यायों या बीमारियों को यथास्थिति में समझने के लायक हो| हमें समाज की समस्यायों या किसी बिमारी की प्रकृति एवं स्वभाव को समझने की आवश्यकता होती है, तभी उस बिमारी या समस्या का निदान या समाधान संभव है| हर समस्या या बिमारी का स्वभाव या प्रकृति चिकित्सक या सुधारक के ज्ञान के स्तर के अनुसार या अनुरुप नहीं होता है| इसलिए हर चिकित्सक या समाज –सुधारक को बिमारी या समस्या के अनुरूप ज्ञान के स्तर को बदलना अनिवार्य होता है|

महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइन्स्टीन कहते हैं कि समस्या चेतना के जिस स्तर पर होता है, उसका समाधान उसके चेतना स्तर के उपरी स्तर पर आने से ही सम्भव हो सकता है| जब हम समस्या या बिमारी के स्तर की चेतना से ऊपर उठ पाते हैं, तो वे समस्याएँ या बिमारी अपने सम्पूर्ण परिदृश्य में दिख पाता है| इससे हम उन सम्पूर्ण परिस्थितियों, प्रभावकारी साधनों एवं शक्तियों के प्रभाव एवं क्रियाविधियों को समझ पाते हैं| जब हम समस्यायों की सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक एवं बौद्धिक जड़ों और स्वरुप को यथास्थिति में नहीं समझ पाते हैं, तब हम बहुसंख्यक जनों को ‘मूर्ख’ होने का प्रमाण पत्र बांटना शुरु कर देते हैं| दरअसल ऐसा कर समाज के ‘कागजी बौद्धिक अपनी अज्ञानता का झेंप मिटाते हुए होते हैं| ऐसा करने से ‘हवा –हवाई’ बोद्धिकों को ‘पूर्ण ज्ञानी’ होने का ‘आत्मसुख’ मिलता है| ऐसे ‘कागजी विद्वान्’ समाज में ‘टिटहरी’ की तरह ‘टे’ ‘टे’’ करते करते इस दुनिया से विदा हो जाते हैं, लेकिन इस दुनिया को कुछ भी नहीं बदल पाते हैं| बहुसंख्यक जन ‘टिटहरी’ की तरह ‘टे’ ‘टे’’करने वालों को सुनता ही नहीं है, और इसीलिए कोई अलग परिणाम नहीं दिखता है|

हार्वर्ड विश्वविद्यालय के भौतिकी और दर्शन के प्रसिद्ध विद्वान् थामस सैम्युल कुहन ने 1962 में क्रान्ति की संरचना पर एक पुस्तक – ‘The Structure of Scientific Revolution’ लिखी| उसने इस पुस्तक में बताया कि हर क्रान्ति (Revolution) के लिए विचारों, दर्शन,  तरीको, मान्यताओं, अवधारणाओं और व्यवहारों में “पैरेड़ाईम शिफ्ट” (Paradigm Shift) करने की अनिवार्यता होती है| यदि आप अपने द्वारा लगाये गए प्रयास यानि बल की दिशा में कोई ‘विस्थापन’ (Displecement) नहीं कर पा रहे हैं, तो आप कोई ‘कार्य’ (Work) नहीं कर रहे हैं; सिर्फ ‘बकवास’ कर रहे हैं| एक बार अल्बर्ट आइन्स्टीन ने ‘पागलपन’ को समझाते हुए कहा था कि एक काम को बार बार एक ही तरीके से करना और कुछ अलग एवं क्रान्तिकारी परिणाम की अपेक्षा करना ही ‘पागलपन’ है| समाज ये ‘कागजी बौद्धिक’ सिर्फ दूसरों, यानि बहुसंख्यक आबादी पर ‘कटाक्ष’ करते हुए समाज को बदल देने का प्रयास करते रहते हैं, और क्रान्तिकारी बदलाव की अपेक्षा करते रहते हैं| दरअसल ये ‘तथाकथित बौद्धिक’ लोग समाज के ‘कागजी बौद्धिक’ हैं| मैं इन्हें ‘मूर्ख’ नहीं कहना चाहता हूँ, लेकिन आप इन्हें क्या कहना कहते हैं; आप स्वयं ही निर्णय कर लें|

आचार्य प्रवर निरंजनजी

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अंग्रेज क्यों चले गए?

अंग्रेज भारत आए और भारत से चले भी गए|   क्यों?   अंग्रेज अपने ‘धन’ से ‘धन’ कमाने के लिए भारत आए और अन्य देशों में भी गए| इनके धन की कमाई क...