सोमवार, 3 अगस्त 2026

इतिहास की अनुकूलनशीलता

 (Conditioning of History)

हर ‘इतिहास’ को ‘अनुकूलन’ करना होता है| यह अनुकूलन भी दो प्रकार का और दो भिन्न प्रक्रियायों से होता है| एक अनुकूलनशीलता इतिहास की व्याख्या में होता है| इसमें एक इतिहासकार इतिहास की व्याख्या बदले हुए समाज की चेतना, मूल्य, आवश्यकताओं और विश्व दृष्टिकोण  के अनुसार करता है| दूसरे अनुकूलनशीलता में, वह इतिहास भी स्वयं नए काल के साधन एवं शक्तियों के प्रभाव में अनुकूलित होने लगता है| अर्थात उस इतिहास की “क्या”, “क्यों” और “कैसे” की भी व्याख्या बदले हुए परिस्थितियों की चेतना, मूल्य, आवश्यकताओं और विश्व दृष्टिकोण के अनुसार होने लगता है| इसमें संस्कृतियाँ नए समय के परिस्थितियों में ढलने लगती है| यानि यह अनुकूलित होने लगती है| तब इतिहास बहुत –कुछ बदल जाता है|

यदि किसी क्षेत्र में जन समुदाय की निरन्तरता बनी रहती है, उसकी सभ्यता और संस्कृति भी अनुकूलित होने लगती है| जन समुदाय के विस्थापन की अवस्था में उसकी सभ्यता (व्यवस्था का हार्डवेयर) भले ही छूट जाए, लेकिन उसकी संस्कृति (व्यवस्था का साफ्टवेयर एवं फ़िज़ावेयर) में अनुकूलन के साथ निरन्तरता बनी रहती है| इस अनुकूलनशीलता को समझे बिना इतिहास का हर समझ और ज्ञान आंशिक है, अधूरा है|

इतिहास की शुरुआत मानव के पहाड़ों पर से उतर कर नदियों और झीलों के कछारों में बसने से शुरु हुई| कृषि के आधार पर ही अर्थव्यस्थाओं के समस्त प्रक्षेत्र यानि पाँचों प्रक्षेत्रों (Sectors) का उद्भव और उद्विकास हो सका| जब समाज के आर्थिक उत्पादन, वितरण, विनिमय एवं उपभोग के साधन और शक्तियाँ बदली, तो इतिहास भी बदल कर नए साधन और शक्तियों में अनुकूलित होने लगी| इन्ही साधनों और शक्तियों के आधार पर इतिहास के प्राचीन काल में बौद्धिक युग का उदय हुआ| फिर यह बदल कर मध्य काल में सामन्ती युग हो गया| इसी के आधार पर, आधुनिक काल का साम्राज्यवादी और वैज्ञानिक युग का आगमन हुआ| वर्तमान काल में 'वित्तीय साम्राज्यवाद' और 'डाटा साम्राज्यवाद' भी इतिहास की इसी अनुकूलनशीलता का परिणाम है|  

इस अनुकूलनशीलता में 'इतिहास का बाह्य ढाँचा’ (Frame -works of History), यानि इतिहास के पात्र और घटनाएं तो स्थिर रहती है, लेकिन उनके पुराने मूल्य और सांस्कृतिक स्थापनाएँ नए युग के अनुसार अनुनुकूलित होने लगती है| भारत की वर्तमान सांस्कृतिक एवं सामाजिक ढाँचा और इसकी संरचना, विन्यास, आंतरिक बुनावट एवं गुणवत्ता भी, सभी प्राचीन भारत का ही मध्य काल में, यानि सामन्ती शक्तियों में अनुकूलित संस्करण है| इस समझ के बिना कोई भी भारत की संस्कृति को सम्यक ढंग से नहीं समझ सकता है; यह स्पष्ट रहना चाहिए|  

एक इतिहास किसी अतीत की वह विवरण होता है, जो हमारी बुद्धि को बढाता है| अर्थात किसी अतीत का विवरण यदि आपकी बुद्धि यानि आपकी समझदारी नहीं बढाता हुआ है, तो वह अवश्य ही इतिहास के नाम पर अन्य कोई साहित्य है, लेकिन वह इतिहास नहीं है| इतिहास के पात्र के नाम, स्थान या क्षेत्र के नाम एवं विवरण, शासन व्यवस्था और युद्ध का ब्यौरा स्वयं इतिहास नहीं होता है, अपितु ये सब इतिहास के उदाहरण होता है, जिसके द्वारा हम इतिहास को समझते होते हैं| यह सब विवरण या ब्यौरा ही किसी विशेष इतिहास का बाह्य ढाँचा होता है, जो उसे आकार और आकृति (पहचान) देता है| यह बाह्य ढाँचा तो लगभग स्थिर रहता दिखता रहता है, लेकिन इतिहास की आन्तरिक संरचना और विन्यास समय के अनुसार बदलता रहा है| ‘इतिहास की अनुकूलनशीलता’ की यह अवधारणा इतनी महत्वपूर्ण है कि इसको समझे बिना हर इतिहास को सही और सम्यक तरीके नहीं समझा जा सकता है|

सभी इतिहास समय और परिस्थितियों के संसर्ग में सदैव अनुकूलित होता रहता है| जैसे प्रकृति का हर वस्तु और जीवन अपने सन्दर्भ के बदलते समय और परिस्थितियों के संसर्ग में अपनी निरन्तरता, यानि अपनी जीवन्तता बनाये रखने के लिए समायोजित रहती है, उसी तरह इतिहास भी अपनी निरन्तरता बनाए रखने के लिए समय और परिस्थितियों में अनुकूलित होता रहता है| यदि कोई इतिहास बदलते समय और परिस्थितियों के अनुसार अनुकूलित नहीं होगा, तो उसे सन्दर्भ से बाहर होकर समाप्त हो जाना होगा| यह वैसे ही होता है, जैसे जीवों, वनस्पतियों और भू –आकृतिकी को समय और परिस्थितियों के अनुसार अनुकूलित नहीं होने से नष्ट हो जाना पड़ा| इस अनुकूलनशीलता में जीवों, वनस्पतियों और भू –आकृतिकी में अपेक्षित बदलाव् हो जाता है, और इसी आधार पर वह निरन्तरता बनाए रख पाता है| इस निरन्तरता में सारा स्वरुप बदला हुआ होता है| इस तरह इतिहास बदलता रहता है|

इतिहास को परिस्थितियों, विचारधाराओं, मान्यताओं, राजनतिक शक्तियों, सांस्कृतिक मूल्यों, या आर्थिक साधनों एवं शक्तियों के कारकों द्वारा प्रभावित, नियंत्रित और आकार दिया जाता है| सभी इतिहास के दो अनिवार्य घटक होते हैं – एक, ऐतिहासिक तथ्य या साक्ष्य और दूसरा, इतिहासकार| ऐतिहासिक तथ्य या साक्ष्य तो अतीत के होते हैं, लेकिन इतिहासकार वर्तमान का होता है| ऐतिहासिक तथ्य या साक्ष्य स्वयं अपने आप कुछ नहीं बताते या बोलते, बल्कि वह इतिहासकार ही उनके बहाने वह कहता है, जो वह इतिहासकार बताना चाहता है| बदलती हुई समय और परिस्थितियों के सापेक्ष इतिहासकार नया इतिहास प्रस्तुत करता है, जो पहले के इतिहास से भिन्न होता है|

इतिहास सिर्फ तथ्यों और साक्ष्यों का संग्रहण नहीं होता है, बल्कि उनके सहारे मानवता के उद्विकास की उत्कृष्ट यात्रा का व्याख्या होता है| यह इतिहास सिर्फ अतीत के ‘क्या’, ‘कहाँ  या ‘कब’ को ही नहीं बताता है, बल्कि उससे महत्वपूर्ण उस अतीत की “क्यों” और “कैसे” की व्याख्या भी करता है| यह “क्यों” और “कैसे” की व्याख्या ही हमारी बुद्धिमता को बढ़ाती है, जिससे मानव की सभ्यता एवं संस्कृति समृद्ध होता रहता है|

 इस तरह, एक इतिहास उस अतीत काल का उस इतिहासकार के परिप्रेक्ष्यों (नजरियों) की प्रस्तुति होती है| एक इतिहासकार अपने वर्तमान समाज और परिवेश में रहता है, इसलिए वह इतिहासकार अपने समाज, संस्कृति, अपनी बौद्धिकता, समझ और आवश्यकताओं के अनुसार ही व्याख्या करता है| इस तरह इतिहास का बाह्य ढाँचा को स्थिर रखते हुए सारी व्याख्या बदल जाती है| 'साम्राज्यवादी इतिहासकार', 'राष्ट्रवादी इतिहासकार', 'मार्क्सवादी इतिहासकार', 'नारीवादी इतिहासकार', 'दलित इतिहासकार', 'यथास्थितिवादी इतिहासकार' और 'वैज्ञानिक (मानवतावादी) इतिहासकार', सभी अपने अपने लक्ष्यों के अनुरुप इतिहास की व्याख्या करता है, यानि इतिहास लिखता है| इस तरह, इतिहास के पात्र एवं घटनाएँ वही रहती है, लेकिन उसका व्याख्या यानि ‘सब कुछ’ बदल जाता है|

इसलिए यदि भारत के सामाजिक और सांस्कृतिक इतिहास को सही और वैज्ञानिक तरीके से जानना और समझना चाहते हैं, तो अवश्य ही ‘इतिहास की अनुकूलनशीलता’ को समझने का यत्न करे, अन्यथा आप भी ‘यथास्थितिवादी मानसिकता’ से बेहतर नहीं हैं|

आचार्य प्रवर निरंजनजी

शिक्षक, लेखक, प्रेरक एवं दार्शनिक

अध्यक्ष, अन्तर्राष्ट्रीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान

Get solutions to your personal problems at  Ask Acharya Ji

गुरुवार, 30 जुलाई 2026

सिविल सेवाओं की परीक्षाओं में निबन्ध लिखने के लिए ...

सिविल सेवाओं में चयन के लिए होने वाली परीक्षाओं में आजकल निबन्ध लेखन का महत्व बढ़ गया है| निबन्ध -लेखन की कला, दर्शन एवं वैज्ञानिकता का उपयोग परीक्षाओं के अन्य प्रश्न –पत्रों में भी उपयोगी होता है| सिविल सेवाओं में जनता को बहुविध सेवा देना होता है| भारत की, और बहुसंख्यक राज्यों के लोगों की पृष्टभूमि भी बहुविध है| ऐसे में प्रशासन को किसी ख़ास विषय का विशेषज्ञ नहीं चाहिए होता है, बल्कि बहुविषयक सामान्य ज्ञाता होना चाहिए| एक प्रशासक को संविधान के अंतर्गत सरकार द्वारा सुनिश्चित मार्गदर्शन में समाज के कल्याण के लिए काम करना होता है| इसलिए उन्हें देश के सर्वोच्च अधिनियम – ‘संविधान’ के उद्देश्यों एवं भावनाओं के अनुरुप मानसिकता रखनी चाहिए|   

इन परीक्षाओं में अभ्यर्थियों से यह अपेक्षा की जाती है कि उनके निबन्ध लगभग 600 से 800 शब्दों में सीमित रहे| सामान्यत: दो या तीन निबन्ध को एक ही पाली (सत्र) में लिखना होता है| शीर्षक विविध विषयों के विविध मुद्दों पर होता है| इन दो –तीन निबन्धों से आपके ज्ञान स्तर के साथ साथ आपकी तार्किकता, रचनात्मकता, सकारात्मकता, मानवीयता, संवेदनशीलता, न्यायप्रियता और विवेकशीलता की मानसिकता एवं अभिवृति का सम्यक मूल्याङ्कन हो जाता है| इसलिए एक अभ्यर्थी ऐसी मानसिकता और अभिवृति (नजरिया) विकसित करने का प्रयास करे, ताकि इसका झलक आपके निबम्ध में अवश्य ही परिलक्षित हो जाए|

आपका निबन्ध आपके द्वारा चयनित शीर्षक के अनुरुप आपके भावों को, आपके ज्ञान को और आपके आलोचनात्मक चिन्तन को बखूबी रेखांकित करता हुआ हो| लेखन में स्पष्टता, क्रमबद्धता, व्यवस्था, तार्किकता और प्रभावशीलता होनी चाहिए| आपकी अवधारणा संक्षिप्त और स्पष्ट होनी चाहिए| शब्दों के चयन में उपयुक्तता और संक्षिप्तता अवश्य होनी चाहिए| ध्यान रहे कि इसमें विशेष विशेषज्ञता नहीं चाहिए होता है, क्योंकि आपकी टकराहट किसी विशेषज्ञ से नहीं होकर आपके ही जैसा अन्य अभ्यर्थियों से है, इसलिए ज्यादा तनाव भी नहीं लें|

प्रसंगवश आप  ‘आलोचनात्मक चिन्तन’, यानि आलोचनात्मक विश्लेषण, मूल्यांकन एवं समीक्षा को समझ लें| इसे आप अंग्रेजी वर्णमाला के पाँचों स्वर – A, E, I, O, U को क्रमानुसार याद रखें| ‘A’ से Analyse (विश्लेषण करना) अर्थात दिए गए शीर्षक को उसके मूल शब्दों की अवधारणा को, उसके सन्दर्भ और पृष्ठभूमि के सन्दर्भ में विश्लेषण करे; फिर, ‘E’ से Evaluate (मूल्यांकन करना) अर्थात दिए गये शीर्षक को वर्तमान या किसी सन्दर्भ में विश्लेषित कर मूल्याकन करे; फिर, ‘I’ से Interrogate (सवाल खड़ा करना) अर्थात अपने विश्लेषण और मूल्यांकन पर विभिन्न दृष्टिकोणों से प्रश्न करना है, ताकि आप पहले निकाले गये निष्कर्ष को सत्य के नजदीक ला सके; फिर, ‘O’ से Openness (खोलना यानि सामान्यीकृत करना) है, ताकि इन निष्कर्ष को सर्वसहमति यानि सर्वस्वीकृति मिल सके; और सबसे अन्त में, ‘U’ से Unite (मिला देना), यानि पूर्व के सभी प्रक्रियाओं को एक सूत्र में पिरो देना| यही प्रक्रिया ‘आलोचनात्मक चिन्तन’ है|

एक निबन्ध के तीन खंड होते हैं –पहला, परिचयात्मक भाग; दूसरा, मुख्य भाग, जिसमे उस शीर्षक -विषय का आलोचनात्मक विश्लेषण, मूल्यांकन एवं समीक्षा होता है, और अन्त में, आपका अन्तिम निष्कर्षात्मक भाग| निबन्ध का परिचयात्मक भाग और अंतिम भाग यानि निष्कर्षात्मक भाग कम शब्दों में वर्तमान के सन्दर्भ में रहे| अंतिम यानि निष्कर्षात्मक भाग में आपकी पूर्ण सहमति, या अस्वीकृति, या आंशिक सहमति, या अन्य कोई और बात स्पष्ट होना चाहिए| निबन्ध या आलेख को अपने निर्धारित शीर्षक के द्वारा निश्चित ढांचे के अन्तर्गत ही होना चाहिए| उस निबन्ध के मुख्य भाग को उस निश्चित शीर्षक के ढाँचे में ही उसका आलोचनात्मक विश्लेषण और मूल्यांकन के साथ उपयुक्त समीक्षा होना चाहिए|

निबन्ध के मुख्य भाग को काफी आकर्षक और उत्कृष्ट बनाने के लिए यानि, मुख्य भाग में आलोचनात्मक विश्लेषण, मूल्यांकन और समीक्षा के लिए यहाँ पाँच प्रकार के टूल्स दिया जा रहा है| सभी जैविक, भौतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक वस्तुओं एवं क्रियायों की वर्तमान अवस्था को समझने के लिए चार्ल्स डार्विन (Charles Darwin)  और हर्बर्ट स्पेंसर (Herbert Spencer) का उद्विकासवाद आवश्यक है| किसी भी व्यक्ति (नेता, दार्शनिक, लेखक, इतिहासकार आदि) के सभी व्यक्तव्यों, व्यवहारों और भावनाओं की वर्तमान समझ के गूढ़ एवं अदृश्य कारण को समझने के लिए सिगमण्ड फ्रायड (Sigmund Freud), कार्ल जुंग (Carl Jung), विक्टर फ्रैकल (Viktor Frankl), और अल्फ्रेड एडलर (Alfred Adler)  का मनोविज्ञानवाद  यानि मानसिक समझ को समझना आवश्यक है| किसी भी सामाजिक, सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक प्रक्रिया को वैज्ञानिक एवं तार्किक तरीके से समझने के लिए कार्ल मार्क्स (Karl Marx) और  एंटोनिया ग्राम्शी (Antonio Gramsci) का क्रमश: आर्थिकवाद और सांस्कृतिक वर्चस्ववाद  को जान लेना महत्वपूर्ण है| सभी जैविक, भौतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक व्यवहार या प्रक्रिया को वर्तमान में समझने के लिए गैलीलियो (Galileo Galilei) और अल्बर्ट आइन्स्टीन (Albert Einstein) का विभिन्न सापेक्षवाद का ध्यान रखना जरुरी है| अन्त में, किसी भी भाषा के शब्द, मुहावरे, वाक्य या अन्य प्रस्तुति को वास्तविक संदर्भ में समझने के लिए फर्डीनांड डी सौसुरे (Ferdinand de Saussure) और जाक देरिदा (Jacques Derrida) का क्रमश: संरचनावाद और विखंडनवाद  को समझ लेना चाहिए|

उपरोक्त को अच्छी तरह जान और समझ लेने मात्र से आपकी समझ में अभूतपूर्व बदलाव दिखेगा| यह बदलाव आपको सिविल सेवाओं की परीक्षाओं के निबन्ध, सामान्य अध्ययन, अन्य विषय एवं साक्षात्कार में मिले अंकों मे स्पष्ट दिखाई देगा

आप यू –ट्यूब (YouTube) के मेरे चैनल –  ‘Life Changer Niranjan’ पर भी और बहुत कुछ देख सकते हैं| (यह निबन्ध लगभग 800 शब्दों में, अग्रेजी शब्द अंग्रेजी भाषा के अभ्यर्थियों के लिए हैं)

आचार्य प्रवर निरंजनजी

शिक्षक, लेखक, प्रेरक एवं दार्शनिक

अध्यक्ष, अन्तर्राष्ट्रीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान

Get solutions to your personal problems at  Ask Acharya Ji

मंगलवार, 21 जुलाई 2026

बुद्ध और आम्बेडकर के नजरों से पुस्तके कैसे पढ़ें?

मैं अकसर देखता हूँ कि लोग सलाह देते रहते हैं कि आपको प्रति सप्ताह या प्रति माह कम से कम इतनी पुस्तके पढनी चाहिए| अपनी बातों को मजबूती देने के लिए किसी क्षेत्र विशेष में अति सफल लोगों का नाम भी जोड़ते रहते हैं| कहने का तात्पर्य यह है कि पता नहीं उन्होंने कहा तो क्या कहा, और किस संन्दर्भ में कहा और किन शब्दावली का उपयोग किया, वह वे ही जाने; लेकिन ये लोग आपको इन्ही नामों की आड़ में भारी भरकम सलाह दे देंगे| ऐसे लोग शायद पुस्तकों को देखने, पढने और उसे समझने में अन्तर समझते भी है, या नहीं, पता नहीं

पुस्तकें इसलिए पढ़ी जाती है कि कोई भी आदमी अपने सभी अनुभव अपने स्वयं कर नहीं सीख सकता है| पुस्तकों से हम दूसरों को प्राप्त सूचना, ज्ञान, बुद्धि और अनुभव को जानते एवं समझते होते हैं| जीवन के बहुत से घातक, खतरनाक और असंभव अनुभव हम दूसरों के माध्यम जानते हैं| इन दूसरों के अनुभव का माध्यम में पुस्तकों की भागीदारी बहुत अधिक होती है| पुस्तकों का भौगोलिक क्षेत्र व्यापक होता है, इनका समय काल भी अनन्त तक विस्तृत होता है, और उन लेखकों के समझ की विविधता के अनुसार वे अनुभव भी सूक्ष्म, गहन, तीक्ष्ण और गहरी हो सकती है|

जो लोग आपको यह बताते हैं कि आपको बहुत सी पुस्तके पढनी चाहिए, उन्हें शायद सूचना (Information), ज्ञान (Knowledge), बुद्धि (Intelligence), प्रज्ञा (Wisdom) और अनुभव (Experience) में अन्तर का समझ नहीं होता है| ‘सूचना’ व्यवस्थित और संसाधित ‘संकेत’ –समूह या डाटा होता है, जिससे कोई सार्थक अर्थ निकलता है| सूचनाओं के व्यवस्थित एवं संसाधित संग्रहण को ‘ज्ञान’ कहते हैं| जब इस ‘ज्ञान’ का प्रयोग या उपयोग अपने हित के लिए किया जाता है, तब वह ‘बुद्धि’ कहलाता है| ‘ज्ञान’ का प्रयोग या उपयोग जब मानवता और मानवता के भविष्य हित के लिए किया जाता है, ‘प्रज्ञा’ कहलाता है| इस ज्ञान, बुद्धि एवं प्रज्ञा का ‘आत्म –साक्षात्कार’ करना ही ‘अनुभव’ होता है| यहाँ सवाल यह है कि हम पुस्तके सूचनाओं या डाटा के संग्रहण के लिए पढ़ते हैं, या ज्ञान, बुद्धि (समझ), प्रज्ञा और अनुभव के लिए पढ़ते हैं? स्पष्ट है कि हम ज्ञान, बुद्धि (समझ), प्रज्ञा और अनुभव प्राप्त करने के लिए ही पढ़ते हैं| तब तो ठहर कर यानि समझ कर ही पढ़ना होगा, सिर्फ कहने के लिए पढने से कोई लाभ नहीं|

तथागत बुद्ध पढने यानि ज्ञान, बुद्धि, प्रज्ञा और अनुभव के सम्बन्ध में क्या कहते है? बुद्ध का सूत्र –वाक्य – बुद्धम, धम्मम, संघम गच्छामि है| इसका सरल और साधारण अर्थ यह हुआ कि बुद्धि के शरण में जाता हूँ| फिर उन बुद्धियों में से जो धारण करने योग्य होगा, उसे धारण करूंगा, यानि उसे अपना लूंगा| ‘धारेति ति धम्मो’ का अर्थ हुआ – जो धारण करने योग्य है, वही ‘धर्म’ है| उन बुद्धियों में से जो आपने ‘धारित’ किया है, क्या उसमे किसी संशोधन, परिमार्जन, सम्वर्धन, या परिष्करण की अनिवार्यता है; और इसी के लिए आपको किसी ‘संघ’ या संगठन में जाने की जरुरत है, ताकि समुचित विमर्श कर उस बुद्धि से शुद्ध बुद्धि प्राप्त किया जा सके|

डा० आम्बेडकर इसी सूत्र वाक्य को जुलाई 1942 में नागपुर के अखिल भारतीय ‘दबे हुए’ (Depressed) लोगों के सम्मलेन में अंग्रेजी में एक सूत्र –वाक्य – “Educate, Agitate, Organise’ दिया| ध्यान रहे कि डा० आम्बेडकर बुद्ध के अनुयायी थे| यह सूत्र –वाक्य बुद्ध के सूत्र –वाक्य का ही आधुनिक युग में अंग्रेजी रूपान्तर है|  ‘Educate’, यानि शिक्षित बनो- अर्थात ज्ञान एवं बुद्धि का अर्जन करो| फिर ‘Agitate’ शब्द आया है, जिसका अर्थ होता है – मंथन करो| अर्थात आपने जो शिक्षा से प्राप्त किया, उस  पर मनन -मन्थन कर जो धारण करने यानि अपनाने योय है, उसे अपना लो| फिर इस तरह प्राप्त ज्ञान को ‘Organise’ करो, यानि उसे व्यवस्थित करों| इसके लिए उसे विमर्श करने की भी आवश्यकता हो सकती है| बाद में कुछ तथाकथित बुद्धिमान लोगों ने तो डा० आम्बेडकर के सूत्र –वाक्य का क्रम भी बदल दिया और एक शब्द (Agitate) को भी बदल दिया है| पढने की इस प्रक्रिया से कोई पुस्तकों से कुछ प्राप्त कर सकता है||

पुस्तकों को पढने के सम्बन्ध में दो प्रसिद्ध भाषाविदो का ध्यान करना आवश्यक हो जाता है| इनमे पहला स्विट्जरलैंड के फर्डीनांड दी सौसुरे हैं, जिन्होंने “संरचनावाद” (Structuralism) का सिद्धान्त दिया| किसी भी  शब्द, या शब्द –समूह, या वाक्य का अर्थ उसके सन्दर्भ, पृष्ठभूमि, समय, क्षेत्र आदि के संरचना के अनुसार बदलता रहता है, जिसे एक पाठक को ध्यान रखना होता है|  भारत में ‘कम्युनल’ (Communal) शब्द ‘सांप्रदायिक’ माना जाता है, जबकि यही शब्द ब्रिटेन में ‘सामुदायिक’ होता है| दूसरे भाषाविद फ़्रांस के ज़ाक देरिदा हैं, जिन्होंने अपने “विखंडनवाद” (Deconstructionism) के सिद्धान्त में यह समझाया कि लेखक के शब्द लेखकों की समझ एवं स्तर के अनुसार होता है, लेकिन उन्ही शब्दों या वाक्यों का अर्थ पाठकों के समझ एवं स्तर के अनुसार भिन्न हो सकता है| भारत में सामाजिक विभाजन का शब्द ‘जाति’ अपनी भारतीय अंग्रेजी में ‘कास्ट’ (Caste) होता है, जबकि यूरोपीय अंग्रेजी में यह ‘भारतीय ‘Caste’ पुर्तगाली शब्द ‘Caasta’ के अनुरुप दूसरा अर्थ देता है, जिसमे उर्घ्वाकार विभाजन नहीं होता है|  

जब कोई पाठक किसी पुस्तक को पढता है, तो उसे लेखक के भाव और अर्थ को समझना होता है| इसके अलावे पाठक को उन पाठो का आलोचनात्मक विश्लेषण एवं मूल्यांकन भी करना होता है| चार्ल्स डार्विन ने आदमी का सम्बन्ध प्रकृति और अन्य जीवनों के साथ समझाया| हर्बर्ट स्पेंसर ने आदमी को समाज, संस्कार, संस्कृति, भाषा, परम्परा, मान्यता, या अन्य सामाजिक –संस्कृति अवधारणाओं के उद्विकास एवं वर्तमान अवस्था के सम्बन्ध को समझाया| सिगमंड फ्रायड ने आदमी का सम्बन्ध उसके मन को जैवकीय इच्छाओं और उनके समाजिक मूल्यों के साथ समझाया| कार्ल गुस्ताव जुंग ने आदमी का सम्बन्ध उसके समाज के अचेतन यानि उसके संस्कार एवं संस्कृति के साथ समझाया| विक्टर फ्रैकल ने आदमी का सम्बन्ध उसके जीवन –प्रेरणा यानि उसके जीवन –शक्ति से समझाया| कार्ल मार्क्स ने आदमी का सम्बन्ध आर्थिक साधनों एवं शक्तियों से, यानि बाजार के साधनों एवं शक्तियों के सम्बन्ध में समझाया| एंटोनिया ग्राम्शी ने आदमी का सम्बन्ध सत्ता और शासक वर्ग के गुप्त एजेंडा की क्रियाविधि से समझाया| गैलीलियो ने आदमी का सम्बन्ध उनकी स्थितियों के सापेक्ष बताया| अल्बर्ट आइन्स्टीन ने तो अपनी विशिष्ट एवं सामान्य सापेक्षिता के सिद्धान्तों के साथ समस्त ब्रह्माण्ड के पदार्थ, ऊर्जा,  समय एवं स्थान (आकाश) को सापेक्षिक बता दिया| एक पाठक को अपने पठन में इन सभी का, जहाँ तक व्यावहारिक हो, ध्यान रखना पढता है, ताकि वह उन बातों को समुचित तरीके से समझे|

इसीलिए कहा गया है कि पढ़िए कम और समझिये ज्यादा| जीवन में सफलता का यही मंत्र है| सिर्फ पुस्तकों के पृष्ठों को देखने और उलटने से कुछ नहीं होता है| पढने में अपनी भी बुद्धि लगाइए, अन्यथा बहुत ‘हांकने’ वाले बैठे हैं|

आचार्य प्रवर निरंजनजी

शिक्षक, लेखक, प्रेरक एवं दार्शनिक

अध्यक्ष, अन्तर्राष्ट्रीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान

Get solutions to your personal problems at  Ask Acharya Ji

सोमवार, 13 जुलाई 2026

‘अन्तिम –सत्य’ को कैसे जानें ?

‘अंतिम –सत्य’ एक अजीब शब्द -युग्म लग सकता है, लेकिन यह अपने ‘परिवेश’ को समझने का व्यावहारिक, साधारण एवं महत्वपूर्ण अवधारणा है| इसे अवश्य ही समझा जाना चाहिए, क्योंकि इसके नाम पर ठगी का एक व्यापक और विशाल कारोबार प्रचलन में है| इस ‘अंतिम –सत्य’ की विवेचना से आपके मन पर पड़े बहुत से भ्रम से या यों कहें कि उस पर पडा बहुत से धुन्ध और धूल छट जाएगा| यह विवेचना जटिल जीवन को स्पष्टता से समझने के लिए अनिवार्य है|  

यह समझ लेना आवश्यक है कि एक ‘तथ्य’ के एक ही ‘सत्य’ नहीं होता है| और यह भी हो सकता है कि एक ‘तथ्य’ का वह ‘सत्य’ भी ‘सही’ और ‘व्यवहारिक’ नहीं हो| ‘तथ्य’ के एक होते हुए भी उनका ‘सत्य’ अलग –अलग व्यक्तियों के लिए अलग –अलग हो जाता है| और वह अलग –अलग ‘सत्य’ भी उन व्यक्तियों के लिए एकदम ‘सही’ और ‘समुचित’ भी होता है| एक ही ‘तथ्य’ के अलग –अलग ‘सत्य’ भी उनके लिए व्यवहारिक और प्रभावी होता है; और वह ‘सत्य’ उनके लिए ‘सही’ भी होता है, जबकि वह दूसरों के लिए ग़लत है।

स्पष्ट है कि ‘सत्य’ ‘निरपेक्ष’ नहीं होकर भिन्न भिन्न संदर्भ के ‘सापेक्ष’ होता है| इस ‘सत्य’ का सुनिश्चियन उसकी ‘परिस्थितियों’, ‘सन्दर्भों’ और उनके ‘व्यक्तिगत समझ’ यानि उनकी ‘चेतना’ की स्तर से निर्धारित होता है| हम जानते हैं कि एक निर्जीव और सजीव में अन्तर उसके ‘चेतना’ के होने या नहीं होने का है, लेकिन एक स्तनपायी पशु या अन्य जीव और एक आदमी में ‘चेतना’ यानि ‘समझदारी’ का अन्तर ठीक से समझ पाना एक मुश्किल काम है|ध्यान रहे कि दो पैरों का व्यक्ति भी एक पशु ही है और अधिकांश की मानसिकता भी पशुवत है। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि एक ‘पशु’ या एक ‘आदमी’ में एक ही साथ ‘पशुओं की चेतनता’ और ‘आदमी की चेतनता’ का विभिन्न अनुपात ‘मिश्रित’ रुप में निश्चित होता है| ‘चेतनता’ के इस ‘मिश्रित रुप में निश्चित अनुपात’ को समझने के लिए ‘चेतना’ का विश्लेषण एवं मूल्यांकन आवशयक है|

मानव प्रजाति में ‘चेतना’ के पांच ‘कार्य –भाग’ (Functioning –Parts) तीन ‘स्तर’ (Layers) पर कार्यरत होता है| इसके पांच ‘कार्य –भाग’ क्रमश: ‘शरीर’ (Body) और ‘मस्तिष्क’ (Brain), ‘आत्म’ (Self) यानि ‘मन’ (Mind) और ‘चित्त’ (Spirit), एवं ‘अनन्त शक्ति -क्षेत्र’ (Infinite Force Field) होता है| किसी का शरीर उसके सभी स्वरुपों का भौतिक और दृश्य वास्तविक आधार होता है| यही शरीर चेतना के सभी अंगों यानि यंत्रों को अधिकांश ऊर्जा की आपूर्ति करता रहता रहता है| यही शरीर सभी भौतिक क्रियायों और व्यवहार का वास्तविक ढाँचा एवं अवयव देता है| चूँकि इसका निर्माण भौतिक पदार्थों से होता है, इसीलिए यह सभी को दृश्य भी होता है| सभी व्यक्ति को यह शरीर सामान्य ज्ञानेन्द्रियो से ज्ञात होता है| किसी का मस्तिष्क भौतिक रुप में शरीर का एक हिस्सा होते हुए भी उस व्यक्ति के शरीर, मन, चित्त एवं अनन्त शक्ति –क्षेत्र के मध्य एक ‘मोड्यूलेटर’ (Modulator) के रुप में कार्यरत होता है| उसके ‘आत्म’ में उसका ‘मन’ एवं उसका ‘चित्त’ होता है| कोई भी इस ‘आत्म’ (Self) को किसी ‘आत्मा’ (Soul) से भ्रमित नहीं करें| ‘मन’ विचारों का उत्पादन, संश्लेषण, संयोजन एवं भंडारण करता है| इसी तरह, ‘चित्त’ भावनाओं का उत्पादन, संश्लेषण, संयोजन एवं भंडारण करता है| ‘मन’ एवं ‘चित्त’ में ‘चित्त’ का स्थान उच्चतर होता है, और यही ‘चित्त’ सभी का संपर्क ‘अनन्त शक्ति –क्षेत्र’ के करता है| ‘अनन्त शक्ति –क्षेत्र’ ही ‘अंतर्ज्ञान’ (Intuition) यानि ‘आभास’ का उत्पादन करता है|

समाज के अधिकांश लोगों की चेतना उनकी ‘शारीरिक ज्ञानेन्द्रियों’ तक ही सीमित होती है| समाज के बहुत ही अत्यल्प लोगों की चेतना उसकी मानसिक एवं भावनात्मक के साथ साथ आध्यात्मिक स्तर तक पहुंचती है| मध्यवर्ती लोगों यानि माध्यम वर्गीय लोगों (Middle Class People) की चेतनता का स्तर इन्ही निम्नतर एवं उच्चतर ब्रैकेट –सीमा के मध्य होती है| अर्थात ये मध्य वर्ती लोग अपनी चेतना में शारीरिक ज्ञानेन्द्रियों के अतिरिक्त अपनी मानसिक दृष्टि का तो उपयोग कर पाते हैं, लेकिन अपनी आध्यात्मिक शक्तियों के उपयोग से अनजान रहते हैं| इसलिए एक व्यक्ति एक ही साथ चेतना के अपने –अपने स्तर की समझ से किसी ‘सत्य’ को उसके एक निश्चित परन्तु भिन्न भिन्न अंशों तक ही पहचानता और समझता है| कोई उसका सिर्फ ‘भौतिक -स्वरुप’ ही देख और समझ पाता है, तो कोई उसके ‘भौतिक -स्वरुप’ के साथ –साथ उसके ‘उर्जा –स्वरुप’ को भी देख समझ पाता है| इस ‘उर्जा –स्वरुप’ को ही ‘मानसिक और भावनात्मक स्वरुप’ कहते हैं| कुछ लोग यानि अत्यल्प लोग ही ‘अनन्त क्षेत्र –बल’ के स्वरुप तक ही पहुँच पाते हैं, और इसी स्वरुप को ‘आध्यात्मिक’ उपलब्धि कहते हैं| चूँकि अध्यात्म का पहुँच, अवधारणा और क्रिया विधि सामान्य जनों के लिए अत्यंत गूढ़ होती है, इसलिए ही इस ‘अध्यात्म’ के नाम पर बहुत से व्यवसायिक कारोबार चलते होते हैं| ‘चेतना’ की समझ के इसी भिन्न भिन्न स्तर के कारण ही कोई एक ही 'तथ्य' के भिन्न भिन्न ‘सत्य’ देख एवं समझ पाता है|

यदि किसी ‘अध्यात्म –क्रिया’ या किसी ‘वैचारिक –चिन्तन’ का विषय –वस्तु उस व्यक्ति या उसके आसपास तक ही सीमित रहता है, तो स्पष्ट समझिए कि वह ‘अध्यात्म –क्रिया’ या वह ‘वैचारिक –चिन्तन’ झूठी और भ्रामक है और सत्य से परे है| उदहारण के लिए समझने में मैं साधारणतया सिद्धार्थ गोतम, अल्बर्ट आइन्स्टीन और स्टीफन हौकिन्स का नाम लेता हूँ| ऐसे ही नवाचारी लोग ‘आध्यात्मिक’ होते हैं, बाकी तो उस ‘अध्यात्म’ के नाम पर क्या करते हैं, कोई भी समझ सकता है।

यदि किसी आध्यात्मिक ज्ञान या शक्ति से मानवता लाभान्वित नहीं हुआ, तो वह ज्ञान या शक्ति मात्र एक ढोंग है| किसी व्यक्ति को ‘एक आदमी’ उसके समाज ने बनाया है, अन्यथा वह व्यक्ति “मोगली” की तरह वन्य –जीवों के साथ रेगता हुआ होता या पेड़ों की जटाओं में एक पेड़ से दूसरे पेड़ तक छलांग लगाता हुआ होता, लेकिन वह ‘आदमी’ कहलाने लायक नहीं होता| और यदि वह आदमी अपने समाज को लाभान्वित  नहीं करता है, तो वह ‘अध्यात्म’ के नाम पर कुछ और खेल करता हुआ होता है, लेकिन वह ‘अध्यात्म’ तो  कदापि नहीं हो सकता|

यदि कोई मानता है या कहता है कि ‘अध्यात्म’ का विषय ‘आत्म –ज्ञान” या ‘आत्म –सुख’ है, और उससे मानवता का व्यापक कल्याण नहीं होता है, तो उस “आत्म –सुख” के लिए इतने प्रयास करने की कोई आवश्यकता नहीं है; उसके लिए तो ‘दो कश’ या ‘दो पेग’ ही पर्याप्त होता है| इस “आत्म –सुख” के लिए इतना तिकड़म करने की कोई आवश्यकता नहीं है| इसी तरह, वैसे “आत्म –ज्ञान” का क्या लाभ, जिससे समाज को कोई लाभ नहीं हो? ऐसे “आत्म –ज्ञानी” होने या नहीं होने का कोई ‘अर्थ’ नहीं होता है| यह कोई ‘सत्य’ हो ही नहीं सकता|

वैसे कोई भी ‘सत्य’ अन्तिम नहीं होता है, फिर भी किसी वर्तमान में यदि कोई ‘सत्य’ है, तो वह अवश्य ही  समाज और मानवता के सापेक्ष होगा| चूँकि समाज और मानवता की आवश्यकताएँ तत्क्षण बदलती रहती है, इसलिए कोई भी ‘सत्य’ उस क्षण के लिए ‘अन्तिम –सत्य’ होते भी ‘निरपेक्ष सत्य’ नहीं हो सकता है; वह तो सदैव ही सापेक्ष ही रहता है| यदि कोई ‘सत्य’ ‘अन्तिम –सत्य’ हो जाएगा, तो विज्ञान की प्रगति ही रुक जाएगी| सत्य की यही सापेक्ष स्थिति ही विज्ञान का आधार है| इसीलिए कोई भी किसी समय या सन्दर्भ के सापेक्ष ही ‘अन्तिम –सत्य’ तक पहुंचे| लेकिन इसके लिए उसे अवश्य ही अपनी चेतना को अपने सभी अवयवों के स्तर पर सक्रिय कर ‘उच्चतर’ करे| तभी वह किसी ‘सत्य’ के निकट पहुँचा हुआ माना जा सकता है| शुरुआत तो प्रयास से हो सकता है|

आचार्य प्रवर निरंजनजी

शिक्षक, लेखक, प्रेरक एवं दार्शनिक

अध्यक्ष, अन्तर्राष्ट्रीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान

Get solutions to your personal problems at  Ask Acharya Ji

बुधवार, 24 जून 2026

विचार एक जीवित प्राणी है

भारत में एक कथानक है – ‘महाभारत’| इसमें पूरे भारत के सेनाओं के शामिल होने के एक युद्ध –वर्णन है, और उसके माध्यम समाज को कई सन्देश देने का एक विशाल काव्य है| इसमें ‘पांडवों’ की एक छोटी सेना भारत के सबसे विशाल और भयंकर सेना को हराने में सफल हुई| इस सफलता का राज ‘सशक्त विचारों’ का प्रभाव और शक्ति थी| इन ‘सशक्त एवं संगठित विचारों’ का ही नाम ‘भगवान कृष्ण’ है| यह विचारों (Thoughts) की शक्ति थी, जिसे ‘भगवान कृष्ण’ ने उत्पन्न किया और उसे एक व्यक्ति – ‘अर्जुन’ के माध्यम से क्रियान्वित किया गया| इसीलिए हिंदी फिल्म – ‘जिंदगी और तूफ़ान’ के एक गाने में कहा गया है कि 

“आदमी चाहे तो तक़दीर बदल सकता है, 

वो पूरी दुनिया की तस्वीर बदल सकता है; 

आदमी ‘सोच’ (विचार) तो ले कि उसका इरादा क्या है?”

यह सही कहा गया है कि जब उपयुक्त समय आता है, तो एक ‘विचार’ दुनिया की समस्त सेनाओं की संयुक्त शक्ति को भी पराजित कर देता है| लेकिन शायद ऐसा कोई उपयुक्त समय कभी आता हो, या नहीं भी आ सकता है| कहने का तात्पर्य यह है कि कोई भी ‘उपयुक्त’ (Suitable) समय नहीं आता है, लेकिन ‘उपयुक्त’ और ‘समुचित’ (Appropriate) “विचार’” तो उत्पन्न किया ही जा सकता है, जो पूरी दुनिया को बदल सकता है| यह विचारों की शक्ति और प्रभाव है|इसीलिए एक "उपयुक्त और समुचित विचार" बनाना अनिवार्य होता है, जो उस काल और परिस्थितियों में कारगर हो। 'रटे' हुए (Rote) और पुरानी किताबों की "बासी" (Stale) विचार उतने कारगर नहीं होते हैं, जितने नए और कारगर की आवश्यकता होती है। आज़ इन्हीं बासी और किताबों की पुरानी बातों के कारण ही समाधान नहीं मिल रहा है और समस्याएं वैसे ही यथावत है।

 ‘विचार’ केवल ‘मन’ (Mind) का उत्पाद नहीं होता है, बल्कि यह ‘ऊर्जा’ (Energy) का एक स्वरूप होता है| या कहे कि यह ‘उर्जा’ का एक विशिष्ट संयोजन एवं विन्यास का ‘आव्यूह’ (Matrix) होता है| चूँकि ‘विचार’ ‘उर्जा’ का एक स्वरुप है, इसीलिए इसमें ‘कम्पन’ (Vibration) होता है| ज्ञात है कि ब्रह्माण्ड मौलिक स्वरुप में ही ‘क्षेत्र –बल’ (Field –Force) से निर्मित है और इसी ‘क्षेत्र –बल’ से ‘पदार्थ’, ‘ऊर्जा’, समय’ एवं ‘आकाश’ (Space) यानि ‘स्थान’ बना है| जैसे कोई प्राणी जन्म लेता है, विकसित होता है, प्रभाव डालता है और सन्दर्भ से बाहर होते ही मर भी जाता है| इसी तरह, ‘विचार’ भी जन्म लेता है, विकसित और समृद्ध होता है, अपनों एवं दूसरों पर प्रभाव डालता है और सन्दर्भ से बाहर होते ही धीरे धीरे मर भी जाता है|

एक विचार किसी व्यक्ति के मन में जन्म लेता है| वह व्यक्ति अवश्य ही संवेदनशील और जिज्ञासु होगा| वह सिर्फ सूचनाओं से पूर्ण ‘ज्ञानी’ नहीं होगा, अपितु वह ‘कल्पनाओं’ (Imagination) की उड़ान भरने वाला व्यक्ति होगा| ‘ज्ञान’ (Knowledge) तो किसी सीमा तक सीमित होता है, उसकी कुछ निश्चित बाध्यताएँ हो सकती है, लेकिन “कल्पनाओं की उड़ान” में तो ब्रह्माण्ड भी बाधक नहीं बनती है| इसीलिए हर ‘संवेदनशील’ और ‘जिज्ञासु’ व्यक्ति ‘विचारक’ होने के कारण ‘आविष्कारक’ और ‘खोजी’ होता है| ‘संवेदना’ और ‘जिज्ञासा’ ही वह बीज है, जो ‘विचार’ और ‘उसके कर्म’ को जन्म देता है, विकसित और समृद्ध करता है, और पूरी दुनिया को बदल देने की क्षमता रखता है|

व्यक्ति का ‘आत्म’ (Self, आत्मा नहीं) उसके ‘मन’ (Mind) और ‘चित्त’ (Spirit) से बना होता है, और इसकी सम्पूर्ण संरचना  ऊर्जा से निर्मित होती है| ‘मन’ ही ‘विचारों’ का उत्पादन, संयोजन, संश्लेषण एवं भण्डारण करता है| ‘विचार’ मन की ऊर्जा की उत्पन्न लहरों का प्रवाह है, जो ‘चित्त’ और ‘मोद्युलेटर’ (Modulator) ‘मस्तिष्क’ (Brain) एवं ‘शरीर’ (Body) को प्रभावित करता रहता है| ‘चित्त’ ही ‘भावनाओं’ (Emotions) का उत्पादन, संयोजन, संश्लेषण एवं भण्डारण करता है, और यही ‘अनन्त प्रज्ञा’ (Infinite Intelligence) के अनन्त ‘क्षेत्र –बल’ (Infinite Field –force) से संपर्क करा कर उस व्यक्ति को ‘अंतर्ज्ञान’ (Intuition) उपलब्ध कराता रहता है| मन और चित्त को ‘आवश्यक ऊर्जा’ उस व्यक्ति के शरीर के प्रत्येक कोशिकाओं के क्रोमोजोम्स उपलब्ध कराता रहता है|

आधुनिक न्यूरो -विज्ञान बताता है कि हर ‘विचार’ के साथ ‘न्यूरान्स’ (Nurones) के बीच ‘विद्युत एवं रासायनिक संकेत’ (Electro –Chemical Signals) उत्पन्न होता है| स्पष्ट है कि हर ‘विचार’ उर्जात्मक घटना है, जो ‘ऊर्जा’ से उत्पन्न होकर ‘ऊर्जा’ में ही समाप्त हो जाती है| इस तरह यह विचार उत्पन्न होती है, विकसित होती है, समय एवं सन्दर्भ के साथ अनुकूलित होती है, गमन (यात्रा) करती है, प्रभाव डालती है, समाप्त (मृत्यु प्राप्त करना) भी हो जाती है और ‘जीवितता’ (जीवित प्राणी) की तरह व्यवहार करती होती है|

‘मन’ कोई अभौतकीय (Non –Materialistic) ‘उड़नखटोला’ ही नहीं होता है| यह भौतिक जगत की ‘वास्तविकता’ होती है; और ‘विचार’ उसका प्रतिविम्ब (Reflection) होता है| इसीलिए “आर्थिक साधन और शक्तियाँ” ही समकालिक शक्तियाँ होती है, जो ‘इतिहास’ के पन्नों में “ऐतिहासिक शक्तियाँ’ कहलाती  है और इतिहास को बदलता रहता है| इन्हीं ‘विचारों’ का ‘द्वन्द’ (Conflict) ही ‘विचारों’ का संश्लेषण, सम्वर्धन और विकासपरक बनाता है| ‘समय’, ‘समाज’ और ‘प्रकृति’ तत्क्षण बदलता रहता है और ‘समायोजन’ एवं ‘अनुकूलन’ में हर विचार को संशोधित और परिमार्जित होना होता है, या समाप्त हो जाना होता है| ‘समय’, ‘समाज’ और ‘प्रकृति’ के तत्क्षण बदलने के क्रम में ‘विचारों’ के समायोजन एवं अनुकूलन होना ही ‘संघर्ष’ के रुप में दृश्य होता है, या अनुभव किया जाता है|

इसीलिए ‘विचार’ एक जीवित प्राणी होता है| आप भी इसको विकसित कीजिए, इसे पालिए – पोशिए और अपनी दुनिया को बदल डालिए|

आचार्य प्रवर निरंजनजी

शिक्षक, लेखक, प्रेरक एवं दार्शनिक

अध्यक्ष, अन्तर्राष्ट्रीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान

Get solutions to your personal problems at  Ask Acharya Ji

बुधवार, 17 जून 2026

बुद्ध बुद्धि में हैं, धर्म में नहीं

अकसर लोग बुद्ध के धर्म अर्थात बौद्ध –धर्म की बात करते हैं, जबकि इस बौद्ध –धर्म को तथागत बुद्ध के नाम पर मध्य काल के कुछ लोगों के समूह ने बनाया है| बुद्ध ने वैज्ञानिक जीवन दर्शन यानि जीवन जीने का वैज्ञानिक एवं मानवतावादी सिद्धान्त दिया है, कोई धर्म नहीं दिया है| यह जीवन का विज्ञान भी है और  दर्शन भी है| हर धर्म में, कुछ या अधिक, ढोंग, पाखण्ड, अंधविश्वास और कर्मकांड अवश्य होगा, और इसके बिना कोई धर्म हो ही नहीं सकता है| कोई भी ऐतिहासिक व्यक्ति सामाजिक, सांस्कृतिक और चेतना की समझ और विकास का क्रान्तिकारी अग्रदूत होता है| ऐसे लोग विचारक और आध्यात्मिक होने के कारण ज्ञानी और मार्गदर्शक अवश्य होता है, अन्यथा वह ऐतिहासिक होगा ही नहीं| मध्य काल में इन्हीं ऐतिहासिक अग्रदूतों के नाम पर उनके जीवन दर्शन यानि जीवन जीने का वैज्ञानिक एवं मानवतावादी सिद्धान्तों को “समकालिक” (Contemporary) बनाया गया| यह “समकालिक” होने की प्रक्रिया आगे भी होती रही और आज भी हो रही है| अधिकतर लोग किसी भी चीज को अपनी चेतना के समझ के स्तर के चश्मे से ही देख पाते हैं| 

हर ऐतिहासिक व्यक्ति सामाजिक, सांस्कृतिक और चेतना की समझ और विकास का एक निश्चित, वैज्ञानिक, प्रगतिशील और स्पष्ट जीवन दर्शन रखता है| यह जीवन दर्शन उस क्षेत्र और उस काल के लोगों को सरल, सामान्य, सहज, और प्रगतिशील जीवन जीने के लिए एक स्पष्ट प्रारुप देता है| इस प्रगतिशील दर्शन को सभी अपनी अपनी समझ के अनुरुप समझता और अनुपालन करता है| स्पष्ट है कि यह सब जीवन दर्शन उस स्थान के भूगोल, उसके इतिहास एवं संस्कृति, लोगों की समझ और उन परिस्थितियों के सापेक्ष होता है, यानि उसके सन्दर्भ में होता है||

भारत में विशिष्ट, भिन्न और उच्चतर ज्ञान एवं बुद्धि की परम्परा रही है, और प्राचीन भारत के इस परम्पराओं (स्कूलों) की संख्या कोई सौ से अधिक बताई जाती है| विभिन्न विषयों से सम्बन्धित सूचनाओं के संग्रहण को 'ज्ञान' कहते हैं और उस 'ज्ञान' के उपयोग को 'बुद्धि' कहते हैं| भारत में बुद्धि की मुख्य धारा में कोई 28 लोगों को “बुद्धत्व” की उपाधि प्राप्त हुई, जिन्हें ‘बुद्ध’ कहा जाता रहा| सिद्धार्थ गोतम उनमे अंतिम और 28वे ‘बुद्ध’ बताए जाते हैं| ध्यान रहे कि गोतम को बोधगया में एक लम्बी साधना के बाद “बुद्धत्व” की प्राप्ति हुई थी| स्पष्ट है कि यह “बुद्धत्व” पहले से ही ‘बुद्धि’ की एक विशिष्ट और उच्चतर अवस्था की उपाधि रही होगी| दुनिया के तमाम मार्गदर्शकों की तरह बुद्धों ने भी यहाँ के लोगों को जीवन जीने के लिए और मानवता की स्वस्थ निरन्तरता की व्यवस्था के लिए वैज्ञानिक जीवन –दर्शन दिए| लेकिन उसने आज के सन्दर्भ का कोई धर्म को स्थापित नहीं किया|

भारत में ज्ञात ऐतिहासिक व्यक्तियों की परम्परा में बुद्धों की परम्परा सबसे पुरानी है, जो सभ्यता और संस्कृति के प्रारम्भिक काल से शुरु होना स्थापित है| बुद्ध ने “धम्म” का दर्शन दिया, जो सभी वैश्विक मानवों का प्रगतिशील वैज्ञानिक जीवन -दर्शन है| इस ‘जीवन –दर्शन’ या ‘वैज्ञानिक जीवन –सिद्धांतों’ में उस समय का वर्तमान, प्राचीन काल के अनुभव और मानवता का भविष्य समाहित किये हुए था| इसमें मानव, परिवार, समाज, प्रकृति और मानवता सहित भविष्य की निरन्तरता की व्यवस्था सुनिश्चित है|

वर्तमान प्रचलित सभी ‘धर्म’ इसी प्राचीन “धम्म” की ‘स्थानीय’ और ‘समकालिक’ (Contemporary) व्याख्या है|वर्तमान प्रचलित किसी भी ‘धर्म’ का प्राथमिक प्रमाणिक साक्ष्य मध्य काल से पहले का मिलना संभव नहीं है और ये सभी साक्ष्य कागजों पर ही उपलब्ध हैं| सभी धर्मों के मूल में मानवता और मानवता का भविष्य समाहित होता है, लेकिन वह 'स्थानीयता' से अनुकूलित किया हुआ होता है| ‘स्थानीयता’’ से तात्पर्य स्थानिक भौगोलिक आवश्धयकताएँ, भौगोलिक उच्चावच  एवं जलवायु, वहाँ के संस्कार एवं संस्कृति, आर्थिक परिस्थितियाँ आदि आदि शामिल होता है| इसी तरह, 'इतिहास का समकालिक संरचना प्राप्त होना’ किसी भी इतिहास को वर्तमान में समझने का एक महत्वपूर्ण उपकरण (Tool) है| इस ‘अवधारणा’ को समझे बिना किसी भी इतिहास को समुचित एवं वैज्ञानिक ढंग से नहीं समझा जा सकता है| इतिहास के सारे सम्बन्धित भ्रम इसी ‘अवधारणा’ की समझ के अभाव में उत्पन्न होते हैं|

बुद्ध के ‘धम्म’ के इसी’ प्रकाश’ यानि इन्हीं ‘ज्ञान’ के कारण इस भौगोलिक उपमहाद्वीपीय भू –भाग को ‘आभा’ (Aura’ Light) से ‘रत’ (Full) माना जाता रहा| इस भौगोलोक उपमहाद्वीपीय क्षेत्र का नाम “भारत” इसी ‘आभा’ एवं ‘रत’ शब्दों से बना है| इसी प्रभाव से इस क्षेत्र के समस्त भौगोलिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और भाषाई पहचान स्थापित हुआ है| मैं सिर्फ इतिहास की बात कर रहा हूँ और किसी भी मिथकों का प्रसंग नहीं लिया है|

चूँकि सभी इतिहास की समुचित एवं वैज्ञानिक व्याख्या ‘इतिहास का समकालिक संरचना प्राप्त करने' की अवधारणा से होती है, और वर्तमान सभी धर्मों का आधार भी एक ‘इतिहास’ ही है, इसीलिए वर्तमान सभी धर्मों की उत्पत्ति और उद्विकास की व्याख्या भी यही ‘‘इतिहास का समकालिक संरचना प्राप्त करने' की अवधारणा से होता है| वर्तमान के सभी धर्मों के ग्रन्थ, जिसमे उनके प्राचीनतम प्रमाणिक ग्रथ भी शामिल हैं, सिर्फ कागज पर ही उपलब्ध हैं| अर्थात इन सभी का वर्तमान स्वरुप में सम्पादन एवं व्याख्या कागज के आविष्कार होने और उनके उन क्षेत्रों में प्रचालन में आने के बाद का ही मानना वैज्ञानिक, तर्कसंगत और व्यवहारिक है| कागज का आविष्कार चीन में प्राचीन काल के अंतिम काल में बताया जाता है और उसका वैश्विक प्रचलन मध्य काल में बताया जाता है| मतलब कागज पर सभी उपलब्ध धार्मिक ग्रन्थ मध्य काल में ही सम्पादित है| अर्थात सभी उपलब्ध धार्मिक ग्रन्थ अपने सम्पादन काल के “‘इतिहास का समकालिक प्राप्त संरचना” हैं|

ज्ञात है कि मध्य काल की दुनिया वर्तमान एशिया और यूरोप तक ही सीमित थी; उस समय का अफ्रीका भूमध्य सागरीय तट के प्रदेशों तक ही सीमित था और अफ्रिका का भीतरी भाग, अमेरिका (दोनों), आस्ट्रेलेशिया आदि कई भू भाग व्यवस्थित संसार से बाहर यानि अज्ञात थी| इतिहास का पूरा मध्य काल “सामन्तवाद के साधनों एवं शक्तियों” से नियमित, निदेशित एवं संचालित था|, इसलिए ये सभी क्षेत्र भी “सामन्तवाद की शक्तियों” के सञ्चालन -प्रभाव में था| यदि कोई व्यक्ति इन “ऐतिहासिक साधनों एवं शक्तियों और उनकी क्रियाविधियों” को नहीं समझता है. तो ‘इतिहास’ की उसकी ‘समझ’ अधूरी. अवैज्ञानिक और अपूर्ण है; इसे स्थिर होकर समझ लें|

मध्य काल में उदित और विकसित इन ‘ऐतिहासिक सामन्ती शक्तियों’ ने तत्कालीन सम्पूर्ण वैश्विक व्यवस्था को ‘जड़’ यानि ‘गतिहीन’ कर दिया| इसका वैश्विक प्रभाव उस समय के सामाजिक. सांस्कृतिक, आर्थिक, धार्मिक, राजनीतिक सहित सम्पूर्ण व्यवस्था और मानसिकता पर पडा और प्रभावित हुआ| इन ‘ऐतिहासिक सामन्ती शक्तियों’ के प्रभाव में वैश्विक सामाजिक. सांस्कृतिक, आर्थिक, धार्मिक, राजनीतिक सहित सम्पूर्ण व्यवस्था और मानसिकता का स्थिरीकरण यानि क्षेत्रीयकरण होता गया और स्थानीय स्वरूपों का उभार होता गया| इन ‘ऐतिहासिक सामन्ती प्रभाव’ में मानव का ‘धम्म’ यानि ‘धर्म’ को भी ‘जड़’ यानि ‘गतिहीन’ हो जाना पडा, जिसका स्वरुप आज भी विकासशील और अविकसित संस्कृतियों में सहज परिलक्षित होता है| यही कारण ही 'धम्म' भी विभिन्न स्थानीय धर्मों का स्वरुप लेता गया| विकसित अर्थव्यवस्था के राष्ट्रों ने अपनी सहज बुद्धि पर से अपने  धार्मिक संस्कारों, संस्कृतियों एवं मानसिकताओं से उन ऐतिहासिक सामन्ती प्रभावों को हटाने या न्यून करने में सफल रहा|   

जिन लोगों की समझ और मानसिकता इतनी उच्चतर स्तर पर विकसित नहीं हुई है कि वे किसी भी ‘धर्म के अफीम’ (कार्ल मार्क्स) के बिना अपना सामान्य सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन नहीं जी सकते हैं, वैसे लोग किसी भी वैज्ञानिक और व्यवहारिक जीवन पद्धतियों एवं सिद्धान्तों को ही धर्म के स्वरुप में मानने को विवश होते हैं| ‘बौद्ध –धर्म’ के साथ भी यही व्याख्या मानी जा सकती है, लेकिन बुद्ध तो बौद्धिकता के प्रकाश –स्तम्भ थे, मार्गदर्शक थे| यही इतिहास है, यही तथ्य है और यही सत्य है|

आचार्य प्रवर निरंजनजी

शिक्षक, लेखक, प्रेरक एवं दार्शनिक

अध्यक्ष, अन्तर्राष्ट्रीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान

Get solutions to your personal problems at  Ask Acharya Ji

सोमवार, 15 जून 2026

उच्चतर बौद्धिकता की चिन्तन -कला

उच्चतर बौद्धिकता को प्राप्त करने का अवश्य ही कोई निश्चित एवं प्राकृतिक 'विज्ञान', या 'कला', या इन दोनों का समन्वित स्वरुप होगा| उच्चतर बौद्धिकता को प्राप्त करने का एक निश्चित आधार होगा, जो एक तरीका, विधि या प्रक्रिया होगा| कोई भी वर्तमान मानव इन्ही तरीकों, विधियों यानि प्रक्रियायों को जान कर, समझ कर और अपना कर उच्चतर बौद्धिकता को प्राप्त कर सकटा है| यहाँ हमलोग उन्हीं का सूक्षमता से विश्लेषण एवं मूल्यांकन करेंगे|

किसी को उच्चतर बौद्धिकता किसी दैवीय कृपा, या कोई प्राकृतिक संयोग, या किसी आनुवंशिक धरोहर के रुप में नहीं मिलता है| ऐसा कहने का मेरा क्या आधार है, पहले इसे समझते हैं| चूँकि इस धरती के सभी वर्तमान मानव एक ही मानव झुण्ड या समूह की संतान हैं इसीलिए इन सभी की जैवकीय क्षमता एक समान है| हम जानते हैं कि एक मानव और एक चिम्पाजी में जीनीय गुणों में समानता लगभग 99.99% की है, इसी कारण इस धरती पर मौजूद सभी मानवों में जीनीय आधार पर कोई भिन्नता हो ही नहीं सकती| लेकिन सभी मानवों में बहुत कुछ भिन्नता दिखती होती है| हम यह भी जानते होते हैं कि जीनीय आधार के दो स्वरुप होते हैं – एक, 'फीनोटाइप' और दूसरा, 'जीनोटाइप'| सभी मानवों में जो बहुत कुछ भिन्नता दिखती होती है, वह 'फीनोटाइप' जीनों के कारण होती है, जो ऐतिहासिक काल में भौगोलिक अनुकूलन के परिणाम हैं| लेकिन सभी मानवों में जो समानता यानि एकरुपता होती है, वह 'जीनोटाइप' होता है| और इसी समानता के कारण विश्व के सभी मानव एक दूसरे विपरीत लिंगी के साथ प्रजनन कर सकते हैं और अपना वंश वृद्धि कर सकते हैं| कहने का तात्पर्य है कि किसी को उच्चतर बौद्धिकता किसी दैवीय प्रभाव, या किसी संयोग, या किसी आनुवंशिक धरोहर के रुप में नहीं मिलता है, बल्कि कोई भी इस विधा को सीख कर उसे विकसित कर सकता है|

यह उच्चतर बौद्धिकता किसी परम्परागत एवं ‘रटन्त सीखने’ (Rote Learning) की प्रक्रिया का परिणाम नहीं होता है| यह सदैव ही एक ख़ास, अलग, भिन्न और विशिष्ट चिन्तन की प्रक्रिया (Process) या प्रतिरुप (Pattern) का परिणाम होता है| इन प्रक्रियायों का ‘आधार –तत्व’ (Foundation -Elements) भी अलग और नया हो सकता है, जिसका प्रयोग या उपयोग इन मामलों में आज तक किसी ने नहीं किया हो| अल्बर्ट आइन्स्टीन ने एक बार ‘पागलपन’ की अवधारणा को इस तरह स्पष्ट किया – "किसी काम को एक ही तरीके से बार बार करना और उसका एक अलग परिणाम की आशा करना है"| इसीलिए किसी भी अलग और भिन्न परिणाम के लिए ‘आधारभूत’ तत्वों को बदलना अनिवार्य हो जाता है|  

यदि आज तक किसी समस्या का समाधान नहीं हो पाया है, इसका स्पष्ट अर्थ यह है कि आज तक किसी ने उन समस्यायों के मूलभूत तत्वों को सही तरीके से और सही यथास्थिति में नहीं समझा है, चाहे आप उन समस्यायों के सम्बन्ध में किन्ही का नाम ले लें| कोई भी समस्याएँ आज इसीलिए बनी हुई हैं, क्योंकि आज तक कोई भी उसका वास्तविक, व्यवहारिक और सटीक समाधान नहीं खोजा है| उन समस्यायों का वास्तविक, व्यवहारिक और सटीक समाधान नहीं होने के कारणों में कुछ लोग किसी की नैतिकता, या एकजुटता, या संसाधन, या समर्पण, या योग्यता के अभाव की बातें करते हैं, जो बचकानी होती है| दरअसल ये उन सिद्धान्तों की मूलभूत कमी होती है| उन स्थापित महापुरुषों ने अपनी योग्यता, क्षमता, और समर्पण तो किया था, लेकिन वे भी उन समस्यायों की वास्तविक और सम्पूर्ण 'जड़ों' तक  नहीं पहुँच सके, और इसीलिए उसका समाधान उन्हें नहीं मिल सका|

इतिहास में किसी भी विषय -क्षेत्र के महान व्यक्ति सदैव किसी समस्या को 'शून्यता' (Nil) की अवस्था से समझना शुरु किया, और तभी वे सफल हो पाए| इसे मौलिक तरीके देखना और सोचना कहते हैं| इसे ही “आउट-आफ- बॉक्स चिन्तन” (Out -of –Box Thinking) कहते हैं| पुरानी ‘मान्यताओं’ (Assumptions) और ‘आधारों’ (Basics) को बदल देना ही “पैरेड़ाईम शिफ्ट” (Paradigm Shift)  कहलाता है| यही ‘बदलावों’ के क्रान्तिकारी परिणामों का आधार होता है| किसी भी चीज को ‘शून्यता’ से देखना और उसके ‘मूलभूत सिद्धांतों’ (Fundamental Principles) को समझना अनसुलझे समस्यायों का समाधान दे सकता है, लेकिन परम्परागत आधार और तरीके तो निश्चितया आपको वहीं पहुँचाएँगे, जहाँ वे आपको पहले भी पहुँचाते रहे हैं|

किसी चीज या विषय –वस्तु को यथास्थिति में समझने के लिए उस चीज या विषय –वस्तु पर ठहर जाना होता है, इससे वह उस विषय –वस्तु की गहराइयों में उतर पाता है| उसकी गहराइयों में उतरने से उनकी ‘जड़ों’ को यथास्थिति में स्पष्टता से देख और समझ पाता है| हर ‘घटना’ के पीछे ‘कारण’ होता है, और हर ‘कारण’ के पीछे एक ‘गहरा कारण’ (Root Cause) होता है| तब वह उन समस्यायों को ‘जड़’ से नष्ट करने में सक्षम हो  सकता है| यह स्थिति उस विषय पर ‘ध्यान’ करने यानि उस चीज या विषय –वस्तु पर अपने चिन्तन को स्थिर करने से आता है|

सभी विषय या स्थिति पर ‘संशय’ करना ही बौद्धिकता को उच्चतर अवस्था में ले जाता है| ‘संशय’ करना यानि ‘प्रश्न’ खड़ा करना ही उच्चतर बौद्धिकता का आधार है| साधारण व्यक्ति उत्तर खोजता है और उच्चतर बौद्धिकता वाले ‘विशिष्ट प्रश्न’ खोजते हैं कि इसके पीछे कौन से ‘शक्तियाँ’ (Forces) कार्यरत हैं? किसी विषय या समस्या को कई दृष्टिकोणों से विश्लेषण एवं मूल्याकन आवश्यक हो जाता है, ताकि उसके मूल तत्वों, इसकी उत्पत्ति और उसके उद्विकास को समझा जा सके|

किसी को किसी ‘ज्ञान’ की निश्चिन्तता या सम्पूर्णता को बोध या विश्वास उसे उस काल में रख देता है, जिस काल में वह ज्ञान विकसित या स्थापित हुआ था; और वह ज्ञान ‘ठहरे हुए पानी’ की तरह आज के सन्दर्भ में ‘सड़ गया’ (Rotten) होता है| वह ‘ज्ञान’ अवश्य ही आज से दशक या शतक या शतकों पुराना होगा| किसी भी समस्या, चाहे वह वैज्ञानिक हो, या सामाजिक हो. या सांस्कृतिक हो, या आर्थिक हो, या राजनीतिक हो, या मनोवैज्ञानिक हो, आज से दशक या शतक या शतकों पुराना ‘ज्ञान’ उसे पूर्ण समाधान या स्पष्ट समाधान नहीं दे सकता है| इसलिए यदि कोई उच्चतर बौद्धिकता चाहते हैं, तो उन्हें गैर परम्परागत आधार से, यानि शून्य से शुरु करना होगा|

अल्बर्ट आइन्स्टीन के अनुसार ‘ज्ञान’ और ‘विज्ञान’ केवल सूचनाओं का संग्रहण नहीं होता है| इनके अनुसार “सिद्धान्त” मानव बुद्धि की कल्पनाओं की रचनात्मक उड़ान से निकलती है, जिसे बाद में ‘तर्क’ और ‘तथ्य’ से जाँचे –परखे जाते हैं| बुद्धि का विकास इन्ही कल्पनाओं के आधारों पर हुआ है|

इसीलिए कोई भी उच्चतर बौद्धिकता का स्तर पाने के लिए और अभी तक के उनसुलझे समस्यायों के निश्चित समाधान पाने के लिए उपरोक्त आधारों और बातों पर गंभीरता से विचार करे|  

आचार्य प्रवर निरंजनजी

शिक्षक, लेखक, प्रेरक एवं दार्शनिक

अध्यक्ष, अन्तर्राष्ट्रीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान

Get solutions to your personal problems at  Ask Acharya Ji

इतिहास की अनुकूलनशीलता

  (Con di tioning of History) हर ‘इतिहास’ को ‘अनुकूलन’ करना होता है| यह अनुकूलन भी दो प्रकार का और दो भिन्न प्रक्रियायों से होता है| एक अन...