रविवार, 8 मार्च 2026

क्या धन –प्रदर्शन मानवीय स्वभाव है?

एक छोटी –सी बौद्धिक बैठक हो रही थी| इसमें समाज के कई विधाओं के जानकार एवं विशेषज्ञ शामिल थे| मुद्दा सामाजिक और सांस्कृतिक अवसरों पर धन के प्रदर्शन था| आप कह सकते हैं कि यह ‘सामाजिक और सांस्कृतिक अवसरों पर धन का प्रदर्शन’ नहीं होकर, यह ऐसे सामाजिक और सांस्कृतिक अवसरों पर धन के “अत्यधिक और जरुरत एवं क्षमता से ज्यादा का“ प्रदर्शन का विषय था| हालाँकि यहाँ  “अत्यधिक और जरुरत एवं क्षमता से ज्यादा” का शब्द –समूह एक सापेक्षिक दार्शनिक भाव के साथ अर्थ देता हुआ है| यहाँ भी सापेक्षिता के कारण इसका स्पष्ट अर्थ नहीं दिया जा सकता है| लेकिन इसी बिन्दु पर हमलोग का ठहर जाना भी बौद्धिकता नहीं हो सकता, इसलिए बात बढ़ाना आवश्यक है|

सासाराम के राहुल जी ने बौद्धिक –मंडली से प्रश्न किया कि क्या सामाजिक सांस्कृतिक अवसरों पर खर्च को नियंत्रित या कम किया जा सकता है? राहुल जी ‘भारतीय प्रोद्योगिकी संस्थान, रुडकी’ से शिक्षित अभियन्ता हैं और ग्रामीण विकास के लिए ‘ग्रामीण संघ’ नामक एक संस्था भी चलाते हैं| इसके ही साथ वे प्राचीन भारतीय सांस्कृतिक गौरव को पुनर्स्थापित करने के महती अभियान के बौद्धिक संयोजक और सामाजिक कार्यकर्ता भी है| इनका सवाल आप से भी है, विचार कीजिएगा|

इनके सवाल का उत्तर देने लिए दमोह. मध्यप्रदेश के आचार्य रज्जन जी आगे आए| आचार्य रज्जन जी ज्योतिष विज्ञान में परा –स्नातक (एम० ए०) हो कर ‘वास्तु –विज्ञान’ में अपना पीएच० डी० जमा कर चुके हैं और मध्य प्रदेश के लोकप्रिय एवं विद्वान् संस्कारक एवं पुरोहित के रुप में सर्व ज्ञात हैं| ये विदेशों में अपने यजमानों के लिए ‘आन लाइन पूजा एवं संस्कार’ करने के लिए अनुभवी एवं प्रतिष्टित हैं| कहने का तात्पर्य यह है कि वे इस क्षेत्र में काफी अनुभवी हैं| और इनके अनुभव जानना बहुत महत्वपूर्ण था| ये बता रहे थे कि सामाजिक एवं सांस्कृतिक मंचों से ‘सामाजिक और सांस्कृतिक अवसरों पर धन का प्रदर्शन’ के सख्त विरोधी भी अपने पारिवारिक मामलों में ऐसा प्रदर्शन नहीं कर पाते हैं, औए अपनी ही आदर्शों के विरोध करते हुए दिखते हैं| इसीलिए इनका  मानना है कि यह ‘सामाजिक और सांस्कृतिक अवसरों पर धन का प्रदर्शन’ एक “मानवीय स्वाभाव” है|

उत्तर प्रदेश के आम्बेडकरनगर जनपद के प्रोफसर चौधरी जी भी आचार्य रज्जन की ही बातों से सहमति जताते हुए बातों को आगे बढाया| चौधरी सर मनोविज्ञान के प्रोफ़ेसर रह चुके हैं| इन्होने प्रसिद्ध अमेरिकी मनोवैज्ञानिक प्रो० अब्राहम मैसलो के ‘आवश्यकता का पदानुक्रमण सिद्धांत’ के “सम्मान की आवश्यकता” (Esteem Needs) को उधृत करते हुए बताया कि यह सामाजिक सम्मान पाना एक मानवीय स्वभाव है| उन्होंने इसे कई उदाहरणों से समझाया| इन बौद्धिक वार्ता से मैं भी लाभान्वित हुआ| स्पष्ट हुआ कि “प्रदर्शन करना” यानि ‘दिखावा करना’ एक मानवीय स्वभाव है|

लेकिन यहाँ यह सवाल उठ रहा है कि “प्रदर्शन करना” यानि ‘दिखावा करना’ एक ‘मानवीय स्वभाव’ है?, या धन का अत्यधिक प्रदर्शन करना ‘सामाजिक स्वाभाव’ है? वैसे, उपरोक्त दोनों स्वभावों को ‘मानवीय स्वभाव’ या ‘मानवीय “सहज” (Instinct) स्वाभाव’ मान लेना जल्दीबाजी कहा जाना चाहिए| उपरोक्त दोनों बातें एक समान नहीं है| वैसे ई० राहुल जी का सवाल ऐसे अवसरों पर धन के अनुत्पादक खर्चो के प्रदर्शन को कम करने के बारे में हैं| इसलिए ऐसे गंभीर सवाल का एक सम्यक अकादमिक विश्लेषण होना ही चाहिए|

ऐसे सवालों का सम्यक उत्तर ‘सिर्फ’ एक अनुभवी, या मनोवैज्ञानिक, या सामाजिक, या आर्थिक, या एक राजनीति का अध्येता पर्याप्त तरीके से नहीं दे सकता है, ऐसा मुझे लग रहा है| ‘मानव विज्ञान’ (Anthropology) मानव का सरल एवं साधारण समाजों का अध्ययन कर मानव का ‘सहज एवं स्वाभाविक’ (Basic Instinct and Natural) प्रवृतियों एवं उनकी क्रियाविधियों की पहचान करता है| क्या सभी वैश्विक सरल एवं साधारण समाजों में ऐसे सामाजिक और सांस्कृतिक अवसरों पर धन के “अत्यधिक और जरुरत एवं क्षमता से ज्यादा का“ प्रदर्शन होता है? कहने का तात्पर्य यह है कि ऐसे अवसरों पर “अत्यधिक और जरुरत एवं क्षमता से ज्यादा का“ प्रदर्शन मानवीय सहज प्रवृति नहीं है|

यहाँ यह ध्यान रखना चाहिए कि ऐसा सामाजिक और सांस्कृतिक अवसर समाज में नए ‘सामाजिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं’ (Institution, not Institute) के निर्माण या पुनर्गठन का अवसर होता है| इन संस्थाओं का गठन मानव जीवन में इतना महत्वपूर्ण है कि ये संस्थाएँ ही एक पशु – होमो सेपियंस को एक ‘सांसारिक मानव’ (होमो सोसिअस) बना दिया| ‘विवाह’ एक संस्था का निर्माण है और घर के बुजुर्ग के मरणोपरांत उत्तराधिकार मिलने की प्रक्रिया संस्था एक पुनर्गठन है| ‘यौन व्यवहार’ पशु भी करते हैं, लेकिन वे झुण्ड बनाते हैं, ‘समाज’ नामक संस्था का निर्माण नहीं करते हैं| मानव अपने ‘यौन व्यवहार’ को ‘विवाह’ नामक संस्था के साथ लाता है, और इसी के साथ वह संसार बना पाता है, जो एक पशु नहीं कर पाता है| इसलिए एक सामाजिक सांस्कृतिक संस्था का निर्माण या पुनर्गठन पारिवारिक एवं सामाजिक सदस्यों की उपस्थिति (या सामाजिक गवाही) में सम्पन्न होता है| संस्था का निर्माण या पुनर्गठन एक सामाजिक सांस्कृतिक कर्तव्यों और उत्तरदायित्वों का घोषणा का अवसर होता है| समस्या मानव विशेष के सोच में हैं, और समस्या- लेबल सामाजिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं के निर्माण को दिया जाता है| इस पर ध्यान देने की आवश्यकता है|

प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक अल्फेड एडलर अपने ‘व्यक्तित्व सिद्धान्त’ में बताते हैं कि मानव जन्म से ही ‘हीनता का बोध’ रखता है और इसीलिए वह ‘श्रेष्टता’ दिखाना चाहता है| ‘श्रेष्ट’ दिखना मूल प्रवृति हो सकती है, या है, लेकिन सिर्फ धन के प्रदर्शन के द्वारा ही ‘श्रेष्ट’ दिखना एक अलग बात है| यह श्रेष्टता का प्रदर्शन ‘धन’ के अतिरिक्त कई ‘और’ स्वरुपों में हो सकता है, जिस पर भी विद्वानों का ध्यान जाना चाहिए| ‘धन का प्रदर्शन’ करना सबसे से सस्ता, सरल और साधारण उपलब्ध तरीका होता है| लेकिन यह व्याख्या भी ई० राहुल को पर्याप्त संतुष्टि नहीं दे पाया|

लेकिन प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक कार्ल जुंग बताते हैं कि एक मानव का व्यक्तित्व उसके ‘सामूहिक अचेतन’ (Collective UnConsciousness) से निर्धारित एवं नियमित होता है| यह ‘सामूहिक अचेतन’ उस समाज के अचेतन का सामूहिक समझदारी है, जिसे सामान्य भाषा में उसकी ‘संस्कृति’ कहते हैं| यहाँ यह स्पष्ट किया जा रहा है कि सारी बात समाज तय करता है, मानव स्वयं में बहुत कुछ या सब कुछ नहीं है, बल्कि समाज बहुत कुछ है| समाज ही व्यक्ति का कार्य प्रतिरुप यानि पैटर्न (Pattern) तय करता है| जब बात संस्कार और संस्कृति की आती है, तब एक संस्कारक एवं पुरोहित की भूमिका लाल रंगों से रेखांकित हो जाती है|

अत: सामाजिक और सांस्कृतिक अवसरों पर धन के “अत्यधिक और जरुरत एवं क्षमता से ज्यादा का“ प्रदर्शन मानव का स्वाभाविक गुण नहीं है, बल्कि यह सामाजिक प्रतिरूप का मांग या दबाब है| इस अन्तर से यह स्पष्ट हो जाता है कि यदि समाज चाहे तो विशेष एवं सजग प्रयास कर इसे बदल सकता है, या इसे दूर कर सकता है| चूँकि सामाजिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं में और उसके प्रतिरुपों में एक ‘जड़ता’ (Inertia) होता है और इसीलिए वह अपनी यथावस्था की अवस्था बनाए रखना चाहती है, जिसे बदलने के लिए एक विशेष, समर्पित और सजग प्रयास चाहता है| इस सामाजिक एवं सांस्कृतिक ‘जड़ता’ को एक संस्कारक और पुरोहित ही हटा कर समाज और संस्कृति को गतिशील बना सकता है,

इसलिए संस्कारक और पुरोहित बनिए|

नजरिया बदलिए और सब कुछ बदलेगा|

आचार्य प्रवर निरंजन जी

अध्यक्ष, भारतीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान| 

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