उच्चतर
बौद्धिकता को प्राप्त करने का अवश्य ही कोई निश्चित एवं प्राकृतिक 'विज्ञान', या 'कला',
या इन दोनों का समन्वित स्वरुप होगा| उच्चतर बौद्धिकता को प्राप्त करने का एक
निश्चित आधार होगा, जो एक तरीका, विधि या प्रक्रिया होगा| कोई भी वर्तमान मानव इन्ही
तरीकों, विधियों यानि प्रक्रियायों को जान कर, समझ कर और अपना कर उच्चतर बौद्धिकता
को प्राप्त कर सकटा है| यहाँ हमलोग उन्हीं का सूक्षमता से विश्लेषण एवं मूल्यांकन करेंगे|
किसी
को उच्चतर बौद्धिकता किसी दैवीय कृपा, या कोई प्राकृतिक संयोग, या किसी आनुवंशिक धरोहर
के रुप में नहीं मिलता है| ऐसा कहने का मेरा क्या आधार है, पहले इसे समझते हैं| चूँकि
इस धरती के सभी वर्तमान मानव एक ही मानव झुण्ड या समूह की संतान हैं इसीलिए इन सभी
की जैवकीय क्षमता एक समान है| हम जानते हैं कि एक मानव और एक चिम्पाजी में जीनीय
गुणों में समानता लगभग 99.99% की है, इसी कारण इस धरती पर मौजूद सभी मानवों में
जीनीय आधार पर कोई भिन्नता हो ही नहीं सकती| लेकिन सभी मानवों में बहुत कुछ भिन्नता
दिखती होती है| हम यह भी जानते होते हैं कि जीनीय आधार के दो स्वरुप होते हैं – एक, 'फीनोटाइप' और दूसरा, 'जीनोटाइप'| सभी मानवों में जो बहुत कुछ भिन्नता दिखती होती है, वह 'फीनोटाइप' जीनों के कारण होती है, जो
ऐतिहासिक काल में भौगोलिक अनुकूलन के परिणाम हैं| लेकिन सभी मानवों में जो समानता यानि
एकरुपता होती है, वह 'जीनोटाइप' होता है| और इसी समानता के कारण विश्व के सभी मानव
एक दूसरे विपरीत लिंगी के साथ प्रजनन कर सकते हैं और अपना वंश वृद्धि कर सकते
हैं| कहने का तात्पर्य है कि किसी को उच्चतर बौद्धिकता किसी दैवीय प्रभाव, या किसी
संयोग, या किसी आनुवंशिक धरोहर के रुप में नहीं मिलता है, बल्कि कोई भी इस विधा को
सीख कर उसे विकसित कर सकता है|
यह उच्चतर
बौद्धिकता किसी परम्परागत एवं ‘रटन्त सीखने’ (Rote Learning) की प्रक्रिया का
परिणाम नहीं होता है| यह सदैव ही एक ख़ास, अलग, भिन्न और विशिष्ट चिन्तन की
प्रक्रिया (Process) या प्रतिरुप (Pattern) का परिणाम होता है| इन प्रक्रियायों का
‘आधार –तत्व’ (Foundation -Elements) भी अलग और नया हो सकता है, जिसका प्रयोग या
उपयोग इन मामलों में आज तक किसी ने नहीं किया हो| अल्बर्ट आइन्स्टीन ने एक बार ‘पागलपन’ की
अवधारणा को इस तरह स्पष्ट किया – "किसी काम को एक ही तरीके से बार बार करना और उसका
एक अलग परिणाम की आशा करना है"| इसीलिए किसी भी अलग और भिन्न परिणाम के लिए ‘आधारभूत’
तत्वों को बदलना अनिवार्य हो जाता है|
यदि
आज तक किसी समस्या का समाधान नहीं हो पाया है, इसका स्पष्ट अर्थ यह है कि आज तक किसी
ने उन समस्यायों के मूलभूत तत्वों को सही तरीके से और सही यथास्थिति में नहीं समझा
है, चाहे आप उन समस्यायों के सम्बन्ध में किन्ही का नाम ले लें| कोई भी समस्याएँ
आज इसीलिए बनी हुई हैं, क्योंकि आज तक कोई भी उसका वास्तविक, व्यवहारिक और सटीक
समाधान नहीं खोजा है| उन समस्यायों का वास्तविक, व्यवहारिक और सटीक समाधान नहीं
होने के कारणों में कुछ लोग किसी की नैतिकता, या एकजुटता, या संसाधन, या समर्पण,
या योग्यता के अभाव की बातें करते हैं, जो बचकानी होती है| दरअसल ये उन सिद्धान्तों की मूलभूत कमी होती है| उन स्थापित
महापुरुषों ने अपनी योग्यता, क्षमता, और समर्पण तो किया था, लेकिन वे भी उन समस्यायों
की वास्तविक और सम्पूर्ण 'जड़ों' तक नहीं पहुँच सके, और इसीलिए
उसका समाधान उन्हें नहीं मिल सका|
इतिहास में किसी भी विषय -क्षेत्र के महान व्यक्ति सदैव किसी समस्या को 'शून्यता' (Nil) की अवस्था से समझना शुरु किया, और तभी वे सफल हो पाए| इसे मौलिक तरीके देखना और सोचना कहते हैं| इसे ही “आउट-आफ- बॉक्स चिन्तन” (Out -of –Box Thinking) कहते हैं| पुरानी ‘मान्यताओं’ (Assumptions) और ‘आधारों’ (Basics) को बदल देना ही “पैरेड़ाईम शिफ्ट” (Paradigm Shift) कहलाता है| यही ‘बदलावों’ के क्रान्तिकारी परिणामों का आधार होता है| किसी भी चीज को ‘शून्यता’ से देखना और उसके ‘मूलभूत सिद्धांतों’ (Fundamental Principles) को समझना अनसुलझे समस्यायों का समाधान दे सकता है, लेकिन परम्परागत आधार और तरीके तो निश्चितया आपको वहीं पहुँचाएँगे, जहाँ वे आपको पहले भी पहुँचाते रहे हैं|
किसी
चीज या विषय –वस्तु को यथास्थिति में समझने के लिए उस चीज या विषय –वस्तु पर ठहर
जाना होता है, इससे वह उस विषय –वस्तु की गहराइयों में उतर पाता है| उसकी गहराइयों
में उतरने से उनकी ‘जड़ों’ को यथास्थिति में स्पष्टता से देख और समझ पाता है| हर ‘घटना’ के पीछे
‘कारण’ होता है, और हर ‘कारण’ के पीछे एक ‘गहरा कारण’ (Root Cause) होता है| तब वह
उन समस्यायों को ‘जड़’ से नष्ट करने में सक्षम हो सकता है| यह स्थिति उस विषय पर ‘ध्यान’ करने यानि
उस चीज या विषय –वस्तु पर अपने चिन्तन को स्थिर करने से आता है|
सभी
विषय या स्थिति पर ‘संशय’ करना ही बौद्धिकता को उच्चतर अवस्था में ले जाता है| ‘संशय’
करना यानि ‘प्रश्न’ खड़ा करना ही उच्चतर बौद्धिकता का आधार है| साधारण व्यक्ति
उत्तर खोजता है और उच्चतर बौद्धिकता वाले ‘विशिष्ट प्रश्न’ खोजते हैं कि इसके पीछे
कौन से ‘शक्तियाँ’ (Forces) कार्यरत हैं? किसी विषय या समस्या को कई दृष्टिकोणों
से विश्लेषण एवं मूल्याकन आवश्यक हो जाता है, ताकि उसके मूल तत्वों, इसकी उत्पत्ति
और उसके उद्विकास को समझा जा सके|
किसी
को किसी ‘ज्ञान’ की निश्चिन्तता या सम्पूर्णता को बोध या विश्वास उसे उस काल में
रख देता है, जिस काल में वह ज्ञान विकसित या स्थापित हुआ था; और वह ज्ञान ‘ठहरे
हुए पानी’ की तरह आज के सन्दर्भ में ‘सड़ गया’ (Rotten) होता है| वह ‘ज्ञान’ अवश्य
ही आज से दशक या शतक या शतकों पुराना होगा| किसी भी समस्या, चाहे वह वैज्ञानिक हो,
या सामाजिक हो. या सांस्कृतिक हो, या आर्थिक हो, या राजनीतिक हो, या मनोवैज्ञानिक
हो, आज से दशक या शतक या शतकों पुराना ‘ज्ञान’ उसे पूर्ण समाधान या स्पष्ट समाधान नहीं
दे सकता है| इसलिए यदि कोई उच्चतर बौद्धिकता चाहते हैं, तो उन्हें गैर परम्परागत
आधार से, यानि शून्य से शुरु करना होगा|
अल्बर्ट
आइन्स्टीन के अनुसार ‘ज्ञान’ और ‘विज्ञान’ केवल सूचनाओं का संग्रहण नहीं होता है| इनके
अनुसार “सिद्धान्त” मानव बुद्धि की कल्पनाओं की रचनात्मक उड़ान से निकलती है, जिसे
बाद में ‘तर्क’ और ‘तथ्य’ से जाँचे –परखे जाते हैं| बुद्धि का विकास इन्ही कल्पनाओं
के आधारों पर हुआ है|
इसीलिए
कोई भी उच्चतर बौद्धिकता का स्तर पाने के लिए और अभी तक के उनसुलझे समस्यायों के
निश्चित समाधान पाने के लिए उपरोक्त आधारों और बातों पर गंभीरता से विचार करे|
आचार्य प्रवर निरंजन जी
अध्यक्ष, अन्तर्राष्ट्रीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन
संस्थान|
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें