(Role of ‘Cultural/ Historical Faith in Development)
‘विकास’
(Development) एक वैश्विक विषय है,
जिस पर ढेर सारे विमर्श होते रहते हैं। विमर्श के मुद्दे में प्रमुख
यह होते हैं कि ‘विकास’ स्वयं क्या है? ‘विकास’ की संकल्पना
क्या है और इसके आधारभूत तत्व क्या हैं, अर्थात ‘विकास’ का
तात्पर्य क्या है? इसे अवधारित करने के बाद लक्ष्य निर्धारित
किया जाता है। तब उन लक्ष्यों को पाने के लिए प्रक्रियाओं और विधियों का सुनिश्चयन
किया जा सकता है। ‘विकास’ के साथ यह अजीब दुर्भाग्य भी जुडा हुआ है कि विश्व में
एक से बढ़ कर अनेक प्रसिद्ध अर्थशास्त्री हुए हैं, लेकिन कोई भी ऐसा व्यावहारिक एवं
सरल समाधन नहीं दे पाए हैं, जिससे विश्व के महत्तम लोगों को ‘न्यूनतम विकास’
भी नसीब हो सके| यह अर्थशास्त्रियों की विद्वता पर एक बड़ा प्रश्न है| क्या ‘मानवता
का कल्याण’ अर्थशास्त्रियों का विषय –वस्तु नहीं है?
इस
व्यापक विकास में ‘संस्कृति’ की भूमिका आधारभूत और निर्णायक होती है। टिकाऊ विकास
और संस्कृति में गहरा संबंध है। हमारा ‘इतिहास – बोध’ (Perception of History) ही हमारी संस्कृति को एक ख़ास स्वरूप प्राप्त
करता है। हमारी ‘संस्कृति’ हमारे ‘इतिहास में आस्था’ से निश्चित होता है| इतिहास
की वैज्ञानिक व्याख्या ही हमारी ऐतिहासिक ‘जड़ों’ के सारे भ्रमों का निवारण कर सकता
है। इसीलिए विकास में उनकी ‘संस्कृति’,
यानि उनके ‘इतिहास के बोध की आस्था’ ही निर्णायक भूमिका में होती है| भारतीय
संविधान की उद्देशिका (Preamble) में अंग्रेजी के “Faith” को ही
हिंदी में “धर्म” कहा गया है| यह ‘धर्म’ कोई सम्प्रदाय नहीं है, बल्कि यह
भारतीय लोगों के द्वारा ‘धारित’ किए जाने वाले गुण/ चरित्र हैं|
‘विकास’
(Development) की संकल्पना के निर्धारण में ‘वृद्धि’
(Growth) की संकल्पना को निर्धारित करना और इन दोनों में संबंध को समझना
महत्वपूर्ण है। साधारणतया लोग और प्रशासनिक अधिकारी गण “वृद्धि” को ही ‘विकास’ समझ
लेते हैं, भारत में ऐसा ही हो रहा है। ‘विकास’ केवल ‘आर्थिक वृद्धि’ (GDP)
तक सीमित नहीं होता, बल्कि यह ‘विकास’ मानवीय
क्षमताओं, सामाजिक संबंधों, मूल्यों और
जीवन-गुणवत्ता का समग्र विस्तार है। ‘विकास’ ‘मानवीय क्षमताओं’ के विस्तार और
गहनता के साथ साथ ‘मानवीय अभिवृति’ (Human Attitude) में सकारात्मक बदलाव अवश्य
सुनिश्चित करता है|
प्रोफेसर
अमर्त्य सेन ने ‘विकास’ की एक सर्वमान्य और व्यापक
संकल्पना दिया है। इसे संयुक्त राष्ट्र संघ के विकास कार्यक्रम में भी अपनाया गया
है। इसी स्पष्ट अवधारणा के लिए उन्हें 1998 में अर्थ शास्त्र के लिए नोबेल पुरस्कार
से सम्मानित भी किया गया है। ‘विकास’ का पैमाना व्यक्ति के महत्तम उत्पादकता के
अनुसार महत्तम योगदान करने के लिए उपलब्ध “स्वतंत्रता” (Development as
Freedom) होता है। उस स्वतंत्रता को पाने के लिए उसकी सक्षमता क्या होती है?
इस सक्षमता की मात्रा और गुणवत्ता ही ‘विकास’ को निर्धारित करता है।
यही 'उपागम सक्षमता' (Capability
Approach) हुआ। मानव विकास सूचकांक में इसीलिए ‘शिक्षा’,
‘स्वास्थ्य’ और आपकी ‘आय’ को शामिल किया गया है। अमर्त्य सेन के
अनुसार ‘विकास’ का उद्देश्य लोगों की क्षमताओं (Capabilities) का विस्तार करना होता है। ‘संस्कृति’ यह तय करती है कि लोग किन क्षमताओं
को मूल्यवान मानते हैं और उन्हें उपयोग करने की ‘सामाजिक स्वतंत्रता’ कितनी है।
‘संस्कृति’ यह निर्धारित करती है कि कोई समाज
विकास को कैसे समझता है, जैसे क्या विकास केवल
भौतिक समृद्धि है, या न्याय, गरिमा,
समानता, स्वतंत्रता और सामूहिक कल्याण भी उसका
हिस्सा हैं। सामान्यतः लोग ही नहीं, अधिकांश विद्वान् गण भी ‘संस्कृति की
अभिव्यक्ति’ (Expression of Culture) को ही ‘संस्कृति’ (Cuulture) समझ
लेते हैं, जबकि यह दोनों संकल्पना स्पष्टतया अलग अलग है। यहीं सामान्य विद्वान् जन
और अर्थशास्त्री भी ‘फिसल’ जा रहे हैं, यह ध्यान रखने की आवश्यकता है| ये
लोग नृत्य, स्थापत्य, मूर्तियों, संगीत, पोशाक आदि आदि को ही ‘संस्कृति’ समझ रहे
हैं, जबकि यह सब स्वयं ‘संस्कृति’ नहीं है, बल्कि यह सब ‘संस्कृति की
अभिव्यक्तियाँ’ हैं| ‘संस्कृति’ समाज का ‘साफ्टवेयर’ और ‘फिजावेयर’ होता है,
जो अदृश्य रहकर व्यवस्था का सब कुछ संचालित और निर्धारित करता रहता
है। यह संस्कृति ही मनोवैज्ञानिक कार्ल गुस्ताव जुंग का ‘सामूहिक अचेतन’
(Collective Un Consciousness) है।
‘मानव
शरीर’ को ‘उत्पादक पूँजी’ के निर्माण में ‘संस्कृति’ प्रमुख है। संस्कृति
सीधे तौर शिक्षा के प्रति दृष्टिकोण, श्रम-नैतिकता
(Work Ethics) और अनुशासन, समयबोध और
सहयोग को प्रभावित करती है। जिन समाजों में ज्ञान; मानसिक, शारीरिक एवं अध्यात्मिक
परिश्रम; और ‘नवाचार’ (Innovation) को सांस्कृतिक सम्मान मिला है, वहाँ ‘विकास’ अपेक्षाकृत तीव्र हुआ, जैसे जापान, जर्मनी,
चीन, संयुक्त राज्य अमेरिका, कोरिया, ताइवान आदि आदि देशों में।
सामाजिक
पूँजी और विश्वास संस्कृति से उत्पन्न होती है। इसके लिए आपसी विश्वास,
सामाजिक एकजुटता और संस्थागत नैतिकता की आवश्यकता होती है। इसके लिए
संस्कृति के इस तत्व को ध्यान में रखना होता है। उच्चतर सामाजिक विश्वास वाले
समाजों में भ्रष्टाचार कम और लेन-देन की लागत कम होती है। इसीलिए ऐसे समाजों में
विकास योजनाएँ अधिक सफल होती हैं
यह
भी स्पष्ट है कि ‘समावेशन’ (Inclusion) या ‘बहिष्करण’ (Exclusion) में
‘संस्कृति’ की भूमिका होती है। ‘संस्कृति’ विकास को ‘समावेशी’ भी बना सकती है और ‘बहिष्करणकारी’
भी। जाति,
लिंग, भाषा, सम्प्रदाय या समुदाय आधारित भेदभाव विकास को बाधित करता है,
जबकि समानता और सम्मान पर आधारित संस्कृति विकास को व्यापक बनाती
है। इसलिए सुधारात्मक विकास के लिए सांस्कृतिक आत्मालोचना एवं आवश्यक परिष्करण
(Refinement) आवश्यक होती है। ‘इतिहास की वैज्ञानिक व्याख्या’ ही हमारी ऐतिहासिक
‘जड़ों’ के सारे भ्रमों का निवारण करता है। ऐसी ही व्याख्या से संस्कृति यानि
इतिहास में आस्था संशोधित होती है|
स्थानीय
सांस्कृतिक संदर्भ विकास की सफलता को निश्चित करतीं हैं। जो विकास मॉडल स्थानीय
संस्कृति के अनुरूप नहीं होते, वे अक्सर असफल होते
हैं। इसीलिए ऊपर से थोपे गए मॉडल अर्थात जिसमें परंपरागत मान्यताओं की उपेक्षा
होती है, विकास सम्यक नहीं हो पाता है। इसके विपरीत स्थानीय
संस्कृति और आधुनिक तकनीक का मिश्रण ही टिकाऊ विकास दे पाता है।
टिकाऊ
विकास और संस्कृति में गहरा संबंध है। पर्यावरण संरक्षण,
संयम और पीढ़ीगत उत्तरदायित्व, ये सभी
सांस्कृतिक मूल्य हैं। बिना सांस्कृतिक आधार के ‘धारणीय विकास’ (Sustainable
Development) संभव नहीं। इतना नहीं, चूँकि
संस्कृति किसी समाज का अदृश्य रहने वाला महत्वपूर्ण ‘साफ्टवेयर’ और ‘फिज़ावेयर’ है,
इसलिए ‘संस्कृति’ पर बहुत ज्यादा ध्यान देने की आवश्यकता है| ‘इतिहास का उद्देश्य’
(Purpose of History) एक ही होता है कि वह मानव और समाज के बुद्धि का संवर्धन
करे| इसलिए किसी भी समाज के इतिहास की वैज्ञानिक व्याख्या की आवश्यकता होती है|
ऐसी व्याख्या ही संस्कृति का संवर्धन (Improvement) करता है| सामान्यत: लोग ‘इतिहास
के बाह्य ढाँचा’ (External Framework of History) को ही अंतिम इतिहास समझ लेते
हैं, जबकि ‘इतिहास की वैज्ञानिक व्याख्या’ ही ‘वास्तविक इतिहास’ होता है| और
इसीलिए ऐसे लोग संस्कृति को समुचित रूप में समझ नहीं पाते हैं|
‘संस्कृति’
‘विकास’ में बाधा नहीं, बल्कि उसका ‘आधारशिला’ (Foundation
–Stone) होता है। ‘विकास’ ‘संस्कृति’ के बिना ‘यांत्रिक’ हो जाता है और ‘संस्कृति’
‘विकास’ के बिना ‘जड़’ (Fix) हो जाता है। इसीलिए ‘सार्थक विकास’ वही है, जो सांस्कृतिक मूल्यों को आधुनिक आवश्यकताओं और तकनीकों से जोड़ सके। स्पष्ट
है कि विकास में इतिहास की स्पष्ट और प्रत्यक्ष भूमिका होती है|
आचार्य प्रवर निरंजनजी
शिक्षक, लेखक, प्रेरक
एवं दार्शनिक
अध्यक्ष, अन्तर्राष्ट्रीय अध्यात्म एवं
संस्कृति संवर्धन संस्थान
Get solutions to your
personal problems at Ask Acharya Ji
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें