(Gestalt Theory of History)
अतीत के किसी भी काल एवं क्षेत्र के समुचित और
तथ्यपरक इतिहास को समझने के लिए ‘इतिहास का गेस्टाल्ट सिद्धान्त’ (Gestalt
Theory of History) समझना आवश्यक है| किसी वस्तु, या विचार, या घटना
को अलग अलग भागों में समझने की अपेक्षा उसे समग्रता में समझना ज्यादा उपयुक्त और
समुचित होता है| किसी भी चीज को टुकड़ों टुकड़ों में नहीं देख
कर उसे पूरे पैटर्न (Pattern) के हिस्से के रूप में, या उसके विस्तृत पृष्ठभूमि के सापेक्ष समझने, या
देखने में उसका अर्थ ज्यादा स्पष्ट और महत्वपूर्ण होता है| किसी भी चीज को समग्रता में समझना सदैव उसके अलग अलग हिस्सों को समझने या
देखने से अलग ही नहीं होता है, अपितु वह बड़ा, व्यापक और वैज्ञानिक होने
के साथ साथ एक अलग, स्पष्ट एवं विशिष्ट अर्थ देता हुआ होता है| ऐसा
इतिहास के हर काल और क्षेत्र के इतिहास की व्याख्या के लिए भी सही, सत्य और समुचित है| इसे विस्तार से समझते हैं|
‘गेस्टाल्ट’ (Gestalt) अवधारणा
सबसे पहले मनोविज्ञान के क्षेत्र में आया| इसे जर्मन
मनोवैज्ञानिको मैक्स वर्दिमर (Max Werthimer), कुर्त कोफ्का
(Kurt Kofka) और वोल्फगांग कोहलर (Wolfgang Kohler) ने शुरुआतो 20वीं शताब्दी में दिया था|
‘गेस्टाल्ट’ (Gestalt) एक जर्मन भाषा का एक
विशिष्ट शब्द है, जिसका अर्थ ‘समग्र
स्वरुप’, ‘पूर्ण आकार’ या ‘पूर्ण आकृति’ होता है|
यही अवधारणा इतिहास को सही और तथ्यपरक तरीके से
समझने में किया जा सकता है| इस अवधारणा के साथ उसका परिणाम सामान्य अर्थ से अलग,
विशिष्ट, व्यापक, विस्तृत और वैज्ञानिक हो जाता है|
इसे जीवन के प्रत्येक घटना या व्यवहार को समझने में भी किया जा सकता
है| जीवन की आज की प्रत्येक घटनाएँ ही कल अतीत का हिस्सा बन
कर इतिहास हो जाता है, जिसे समझ कर कोई व्यक्ति ‘और बुद्धिमान’ बनता है| ध्यान
रहे कि ‘इतिहास’ का उद्देश्य ही मानव
को ‘और बुद्धिमान’ बनाना होता है|
‘इतिहास का गेस्टाल्ट सिद्धान्त’ किसी भी क्षेत्र या काल के इतिहास को उसके सम्पूर्ण परिदृश्य में देखने और
समझने को कहता है| कहने का अर्थ यह है कि हम जो इतिहास देखते
–समझते होते हैं, वह अपने आप में
सम्पूर्ण सत्य नहीं देता हुआ होता है| सम्पूर्णता में देखने
के प्रयास में इतिहासकार की मंशा भी स्पष्ट दिखाई देने लगती है, जो अन्यथा ऐसे नहीं दिखती है| सम्पूर्णता इतिहासकार
की मंशा को भी स्पष्ट कर देता है और इतिहास का सत्य सतह (Surface) पर छलक जाता है| तब सारा इतिहास उलट जा सकता है|
इसी से किसी भी इतिहास के प्रतिरूप (Pattern) को
समझा जा सकता है और इसी आधार पर बहुत कुछ वह भी स्पष्ट हो जाता है, जो दृश्य की सीमाओं से बाहर रह जाता है|
संस्कृति इतिहास को निर्धारित करता है और इतिहास
भी संस्कृति को निर्धारित करता है| किसी समाज की गतिविधि उसकी
संस्कृति से निर्धारित और नियमित होता है| किसी समाज की
संस्कृति उसके निश्चित भूगोल और उनके इतिहास –बोध से तय होता
है| किसी स्थान का भूगोल उसके भूगर्भीय संरचना में परिवर्तन
से भी हो सकता है| इन परिवर्तनों में ‘प्लेट
विवर्तनिकी’ (Plate Tectonocs) सहित कई भौगोलिक कारक होते
हैं| आर्थिक साधनों और शक्तियों की संयुक्त प्रभाव में
वर्तमान जीवन बदलता या रुपान्तरित होता रहता है| इन्हीं को ‘समकालिक’ या ‘तात्कालिक’
साधन एवं शक्तियाँ कहा जाता है| इन्हीं ‘समकालिक’ या ‘तात्कालिक’
साधन एवं शक्तियों को इतिहास के काल में ‘ऐतिहासिक
शक्तियाँ’ कहते हैं, जो इतिहास को
रूपान्तरित करता रहता है| इसलिए इतिहास की वैज्ञानिक
व्याख्या में इसका ख्याल रखना इतिहास को सम्पूर्णता की ओर ले जाता है| लेकिन ‘इतिहास –बोध’ (Perception of History) और ‘इतिहास’ (History) की अवधारणा में
बहुत बड़ा अन्तर होता है| ‘इतिहास –बोध’
किसी इतिहास का वह समझ होता है, जिसे कोई
व्यक्ति या समाज उस काल में समझता होता है| यह ‘इतिहास –बोध’ उसकी शिक्षा और
वैचारिकी के स्तर से, उसके आलोचनात्मक चिन्तन, उसके नजरिए, उसके समक्ष इतिहास की प्रस्तुति के
स्वरुप, और तत्कालीन व्यवस्था की मंशा से निर्धारित हो सकता
है| तब किसी को किसी क्षेत्र या काल का तथ्यात्मक सत्य की ओर
अग्रसर हो सकता है| इस सम्पूर्णता को ही ‘इतिहास का गेस्टाल्ट सिद्धान्त’ कहते हैं|
सिन्धु नदी घाटी सभ्यता के पतन के इतिहास की
व्याख्या में उस क्षेत्र के भूगर्भीय संरचना का ध्यान नहीं रखने से उसका सम्यक
इतिहास उजागर नहीं हो सका है| ‘इतिहास का गेस्टाल्ट सिद्धान्त’ उसके इतिहास को समग्रता में समझने पर जोर देता है, जिसमे
उसके ‘प्लेट विवर्तनिकी’ के सिद्धांत
को भी समाहित करना अनिवार्य हो जाता है| इस नदी घाटी सभ्यता
की राजधानी तत्कालीन सिन्धु और सागर के मिलन केंद्र में अवस्थित था, जो ‘प्लेट विवर्तनिकी’के भूकंप
में सागर में जलमग्न हो गया| इस अचानक विपदा ने सारे
व्यवस्थित व्यवस्था को धराशायी कर दिया और उस सभ्यता का पतन होता गया|
'वैदिक संस्कृति' का 'हिन्दू संस्कृति' में रूपान्तरण
की अबूझ पहेली भी इसी ‘इतिहास के गेस्टाल्ट सिद्धान्त’ के साथ स्पष्ट होता है||’ वेद’ शब्द ‘वेदना’ से बना है,
जिसका साधारण अर्थ ‘अनुभूत’ करना, यानि ‘अनिभूति’ से है| प्राचीन भारत में इसी ‘अनुभूति’
(वेदना) के सहारे ‘ज्ञान’
(Knowledge), ‘बुद्धि’ (Intelligence) एवं ‘प्रज्ञा’ (Wisdom) का विशिष्ट, उच्चतर और अद्वितीय उदय हुआ| इसी कारण इस भौगोलिक
उपमहाद्वीप का नाम ‘आभा’ से ‘रत’ (Full of Aura) यानि ‘भारत’
पड़ा| लेकिन इस अद्वितीय भारत का परिवर्तन या
रूपान्तरण एक सामन्ती एवं जड़ व्यवस्था की प्रणाली में कैसे हुआ? यही सामन्ती एवं जड़ व्यवस्था की प्रणाली ही हिन्दू संस्कृति के रुप में आज
मौजूद है| यही सामन्ती एवं जड़ व्यवस्था की प्रणाली ने ही
इतिहास के प्राचीन काल का समापन किया और मध्य युग का प्रारंभ किया| इसे ‘इतिहास के गेस्टाल्ट सिद्धान्त’ ही समझा सकता है| इतिहास का यह गेस्टाल्ट सिद्धान्त
केंद्रीकृत रोमन साम्राज्य के पतन और अरबों के उदय को अपने ऐतिहासिक प्रतिरूप में
शामिल करने पर जोर देता है| यह सब आर्थिक साधनों और शक्तियों
की संयुक्त प्रभाव में सदैव होता रहा है और अब भी हो रहा है|
पुरातत्व और इतिहास बताता है कि प्राचीन काल में ‘पेशा’ (Profession) तो था, लेकिन ‘जाति’ (Jati) और ‘कास्ट’ (Caste) का उदय नहीं हुआ था| ‘पेशा’ किसी लाभ के लिए आर्थिक उपार्जन की व्यवस्था होती है| कोई भी आर्थिक उपार्जन अतिरेक या अतिरिक्त उत्पादन के साथ शुरु होता है| कृषि के उदय के साथ ही ‘पेशा’ का उदय संभव हो सका| इसके पहले सभी उपक्रम जीवन की निरंतरता बनाए रखने के लिए होता रहा, और उसमे कोई अतिरिक्त उत्पादन का कोई स्थान नहीं था| कृषि ने ही मानव जीवन में सबसे पहली बार अतिरिक्त उत्पादन संभव बनाया| अर्थव्यवस्था के सामन्ती एवं जड़ व्यवस्था –स्वरूप ने ‘पेशा’ के नाम एवं अन्य स्वरूप का क्षेत्रीयकरण कर दिया|इसी जड़ व्यवस्था ने ‘जाति’ की उत्पत्ति की| पुर्तगाली व्यापारियों ने भारतीय सामाजिक व्यवस्था को पश्चिम की दुनिया के समक्ष पुर्तगाली शब्द ‘कास्टा’ के अनुरूप ‘जाति’ को ‘कास्ट’ बना दिया| पुर्तगाली ‘कास्टा’ में पेशागत क्षैतिज विभाजन तो होता है, लेकिन ‘जाति’ की तरह ‘उर्घ्वाधर’ विभाजन नहीं होता है| इसीलिए 'कास्ट' (Caste) में भी ‘जाति’ की तरह ‘उर्घ्वाधर’ विभाजन होता है, ऐसा पश्चिमी लोग नहीं जानते हैं| फिर बुद्ध के जीवन इतिहास में ’जाति’ के प्रसंग के अनेक उदाहरण मिलते हैं| यदि बुद्ध के जीवन –इतिहास को समझने में ‘इतिहास का गेस्टाल्ट सिद्धान्त’ का ध्यान रखा जाय, तो यह स्पष्ट हो जायगा कि ये भ्रमात्मक त्रुटियाँ कहाँ से आयी? इतिहास का यह ‘गेस्टाल्ट सिद्धान्त’ इतिहास में ‘मिलवट’ को समझने में सहायक होता है|
‘इतिहास का गेस्टाल्ट सिद्धान्त’ इतिहास के स्पष्ट पहलुओं को उस क्षेत्र के भूगोल और संस्कृति के व्यापक
समकालीन साधनों एवं शक्तियों का भी सम्मिलित स्वरुप को समेटने कहता है| इस तरह, ‘इतिहास का गेस्टाल्ट सिद्धान्त’ अपने में भूगर्भीय और भौगोलिक संरचना, अर्थशास्त्रीय
शक्तियों, समाज शास्त्रीय अवधारणाओं एवं प्रतिमानों, विज्ञान एवं तकनीक का स्तर, कानून और धर्म, शासन पद्धतियाँ, शिक्षा का स्तर आदि को भी व्यापक
एवं विस्तृत झरोखे से देखने –समझने पर जोर देता है| तब कोई इतिहास का वैज्ञानिक पक्ष समझ पाएगा|
आचार्य प्रवर निरंजनजी
शिक्षक, लेखक, प्रेरक
एवं दार्शनिक
अध्यक्ष, अन्तर्राष्ट्रीय अध्यात्म एवं
संस्कृति संवर्धन संस्थान
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