(Marriage and ‘Live –in –Relationship’)
मैं
‘बिहार लोक प्रशासन एवं ग्रामीण विकास संस्थान’ (BIPARD) में अधिकारियों के
शिक्षण –प्रशिक्षण में ‘Stress and Conflict
Manaement’ पढ़ा रहा था| प्रश्नोत्तरी में मुझसे ‘लिव
इन रिलेशनशिप’ के सम्बन्ध में मेरी ‘राय’ जानने की उत्सुकता उन लोगो में थी| सामान्य
जनों की तरह युवा अधिकारीयों में यह तनाव / दबाव (Stress)
और संघर्ष (Conflict) का कारण बन जाता है, जिसका ‘प्रबंधन’ करना उनके लिए अवश्यक
हो जाता है| दरअसल लोगो को ‘Stress’ and ‘Conflict’
की समस्या इन दो भिन्न शब्दों – ‘विवाह’ और ‘लिव इन
रिलेशनशिप’ की अवधारणाओं में
उतना नहीं है, जितना इसका सम्बन्ध उसके ‘ज्ञान (Knowledge), ‘बुद्धि’ (Intelligence)
और ‘प्रज्ञा’ (Wisdom) की समझ से है| इसीलिए आजकल के अतिव्यस्त जीवन
में ऐसे लोगों को परामर्श (Counselling) की आवश्यकता होती है|
सामान्यत:
लोग ‘ज्ञान’, ‘बुद्धि’ और ‘प्रज्ञा’ को एक ही अर्थ के पर्यायवाची समझ लेते
हैं, और इसी कारण जीवन में अनेकों तनाव /दबाव और संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो जाती
है| ‘ज्ञान’ किसी वस्तु, स्थिति और क्रियाविधि को यथास्थिति में सम्पूर्णता में
जानना होता है| यह ‘ज्ञान’ उनसे सभी सम्बन्धित सूचनाओं का क्रमबद्ध एवं व्यवस्थित समेकित
जानकारी होती है| यह ज्ञान ‘उचित –अनुचित’ और ‘अच्छा –बुरा’ से निरपेक्ष होता है| ‘विवाह’
और ‘लिव इन रिलेशनशिप’ के सम्बन्ध में ‘नैतिकता’ के सापेक्ष देखने –समझने की
प्रवृति ही Stress और Conflict पैदा करता है; जबकि इसे सबसे पहले किसी नैतिकता के
निरपेक्ष जानना -समझना चाहिए| यह ज्ञान किसी और के सापेक्षिक नहीं होता है| जब हम
किसी भी वस्तु, स्थिति और क्रियाविधि को यथास्थिति में जान लेते हैं, तब हमें समझदारी
और विवेकपूर्ण निर्णय लेने में, यानि कोई निष्कर्ष निकलने में सहजता होती है|
जब
हम प्राप्त किसी ज्ञान का उपयोग अपने लिए करते हैं, तब वह ‘ज्ञान’ हमारे लिए हमारी
‘बुद्धि’ बन जाती है| जब हम अपनी बुद्धि को सामने वाले के (भावनाओं के) अनुरूप
करते हैं, तब वह ‘भावनात्मक बुद्धि’ (Emotional Intelligence) कहलाती है| जब हम
अपनी बुद्धि को समाज के सन्दर्भ में करते हैं, तब वह बुद्धि ‘सामाजिक बुद्धि’ (Social
Intelligence) कहलाती है| और जब हम अपनी बुद्धि को मानवता और 'मानवता के भविष्य' के
सन्दर्भ में करते हैं, तब वह ‘प्रज्ञात्मक बुद्धि’ (Wisdom Intelligence) बन जाती
है| स्पष्ट है कि जब ज्ञान एवं बुद्धि का विवेकपूर्ण उपयोग 'मानवता के भविष्य' के
लिए करते हैं, वह ज्ञान ही ‘प्रज्ञा’ कहलाता है| इन तोनो को समझ लेने से ‘Stress
and Conflict Manaement’ कुशल हो जाता है|
एक
मानव एक ही साथ ‘Homo Sapience’ (पशु मानव), ‘Homo Socious’ (सामाजिक मानव) और ‘Homo Faber’(निर्माता मानव) है| एक मानव को एक
स्तनपायी पशु की ही तरह सभी जैवकीय आवश्यकतायों की पूर्ति होनी चाहिए| इन जैवकीय
आवश्यकताओं में श्वसन, भोजन, पानी, आवास, कपड़ा, आराम, स्वास्थ्य, और यौन संतुष्टि
शामिल होना सहज एवं स्वाभाविक है| इसके अतिरिक्त, मानव को दोस्ती, अपनापन, प्यार,
समाजिकता, सहयोग एवं सहानुभूति आदि मानवीय गुणों की तीव्र चाहत होती है| अन्य
प्राकृतिक व्यवस्था की तरह सभी पशुओं में विपरीत यौन -पूरकता’ से जीवन की निरंतरता,
यानि उसे अमरत्व’ की प्राप्ति होती है| यह सब दो विपरीत लिंगी युग्म में, यानि
पूरक लिंगी युवाओं के युग्म को ‘लिव इन रिलेशनशिप‘ में रहने से यह सब जैवकीय आवश्यकताएँ
आसानी से प्राप्त हो जाता है| यह सब तानव से भरे अति व्यस्त नागरीय जीवन की विवशताएँ
हैं| यह सम्बन्ध मात्र ‘यौन संतुष्टि’ का प्रबंधन नहीं है, बल्कि इससे बहुत ज्यादा
मानवीय सहज एवं स्वाभविक प्रवृतियों का प्रबंधन
का होता है| इसका सम्बन्ध विवाह से है, या नहीं; एक अलग विचारणीय और नैतिकता का विषय
है| ‘विवाह’ की सम्यक और पर्याप्त समझ से यह स्पष्ट हो सकता है|
सामान्यतया
लोग विवाह को ‘यौन संबंधों’ का पर्याय समझ लेते है| लोग यह समझते है कि एक विवाह
यौन संतुष्टि की सामाजिक स्वीकृत्त्यादेश (Sanctions) मात्र है, जबकि यह यौन
संतुष्टि की सामाजिक स्वीकृत्त्यादेश विवाह का सबसे प्रमुख और एकमात्र कारण नहीं है|
‘विवाह’ इस संसार का एक ऐसा मौलिक और आधारभूत नींव (Foundation) है, जिस पर ‘परिवार’,
समाज, राष्ट्र आदि सभी सामाजिक, सांस्कृतिक और अन्य व्यवस्थाएँ टिकी हुई है| विवाह
एक सामाजिक एवं सांस्कृतिक ‘संस्था’ (Institution)
है| सामान्यत: लोग एक ‘संस्था’ को एक ‘संस्थान’ (Institute) से भ्रमित हो जाते है|
प्रत्येक ‘संस्था’ का, इसीलिए प्रत्येक सामाजिक एवं सांस्कृतिक ‘संस्था’ का भी एक मौलिक
एवं मूल ‘दर्शन’ होता है, जो उन विशेष कर्तव्यों और उत्तरदायित्वों का निर्वहन को
स्पष्ट करते हैं| यहाँ ‘दर्शन’ से तात्पर्य उसके मूल एवं मौलिक निहित आदर्शों से
हैं, जिनके पूर्ति के लिए उस ख़ास 'संस्था' का गठन किया गया है| विवाह नामक संस्था का भी ऐसा ही
स्पष्ट और सुनिश्चित ‘दर्शन’ यानि निहित
आदर्श है|
विवाह
एक ऐसा सामाजिक एवं सांस्कृतिक ‘संस्था’ है, जो स्त्री एवं पुरुष के एक स्थायी युग्म
पर बहुत से विशेष पारिवारिक, सामाजिक,
आर्थिक, सांस्कृतिक एवं शैक्षणिक कर्तव्यों और उत्तरदायित्वों का निर्वहन करने के
लिए भारित करता है| इसमें अपने बच्चे को, चाहे उनसे उत्पन्न हो या उनके द्वारा गोद
लिया गया हो, को समुचित तरीके से पालन पोषण करें| इसके साथ अपने ‘विस्तारित परिवार’
(Extendended Family) के प्रति और अपने
समाज के प्रति अपने विशेष कर्तव्यों और उत्तरदायित्वों का निर्वहन करे| भारत में ‘विस्तारित
परिवार’ को नादानी वश ‘संयुक्त परिवार’ कह दिया जाता है|
विश्व में सिर्फ परिवार में ही ‘साम्यवाद’ (Communism) स्थापित और कार्यरत है, जहां सभी सदस्य अपनी क्षमता के अनुरुप योगदान करते हैं और अपनी आवयकता के अनुरुप पाते हैं| मानव शास्त्रियों ने बहुत से सरल एवं सहज समाजों (आदिवासी समाजों) में ‘दादा- पोती’ और ‘दादी –पोता’ में वैवाहिक सम्बन्ध पाए हैं| ध्यान रहे कि इसमें यौन सम्बन्ध प्रमुख नहीं हुआ| स्पष्ट है कि ये सम्बन्ध यौन आधारित नहीं होकर उनकी विशेष पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक एवं शैक्षणिक कर्तव्यों और उत्तरदायित्वों का निर्वहन से सम्बन्धित हैं| समस्या यह है कि हम भारतीय ‘पश्चिमीकरण’ यानि पश्चिम के नक़ल को ही ‘आधुनिकीकरण’ या ‘वैज्ञानिक मानसिकता’ का पर्याय समझ लेते हैं|
इस
तरह यह स्पष्ट है कि ‘यौन सम्बन्ध’ विवाह नामक संस्था का मूल, आधारभूत एवं
अनिवार्य तत्व नहीं है| फिर भी तथाकथित मानवता के हिमायती सामान्य बुद्धिजीवी समान
यौन के लोगों (समलिंगी) में विवाह को स्वीकृति देने के पक्षधर होते हैं| ऐसा इसलिए
होता है, ऐसे लोग विभिन्न विषयों के तो विद्वान् होते हैं, लेकिन उनमे ‘विवाह’ नमक
सामाजिक सांस्कृतिक संस्था की समझ नहीं होती है| पशु जगत में, खासकर स्तनपायी में,
यौन सम्बन्ध सर्वव्यापक तो होते हैं, लेकिन उनमे ‘विवाह’ नहीं होते हैं| इसीलिए
मानव को छोड़ कर कोई भी जीव अपनी विशिष्ट संसार की रचना नहीं कर सका| प्रकृति का हरेक जैवीय
उत्पाद या तो ‘सममिति’ (Symmetry) में होता है, या ‘पूरकता’ (Conplimentry) में
होता है| प्रकृति का हरेक स्तनपायी दो पूरक लिंगी से ही वंशवृद्धि का सृजन करता होता है| मानव
में यह पूरकता स्त्री और पुरुष में ही है, अन्यथा किसी और में यह व्यवस्था नहीं है|
विवाह ही मानव को निरंतरता और अमरत्व देता है और यह कार्य सिर्फ और सिर्फ विपरीत
लिंगी युग्म ही कर सकता है|
मानवशास्त्र
में मानव प्रजाति के सरल एवं साधारण समाजों में मानव के सरल, साधारण, सहज और
स्वाभाविक वृतियों (Instinct) का अध्ययन किया जाता है, ताकि प्राकृतिक व्यवस्था के
अनुसार मानव को अधिक उपयोगी और व्यवस्थित बनाया जा सके| कोई यौन आनन्द अपने तरीके
और आपसी सहमति से उठा सकता है, लेकिन वह विवाह नामक संस्था का पर्याय नहीं माना जा
सकता| इसे समझ लेने से आपके ‘Stress and Conflict’ का
प्रबंधन (Manaement) करना संभव है| ऐसे बहुत से प्रबंधन स्थिति विशेष के
सापेक्ष हमारे ‘नजरिये’ के बदल देनें से मात्र से सम्भव हो जाता है| प्रत्येक
स्थिति में सकारात्मकता और संभाव्यता की तलाश करने का दृष्टिकोण प्रत्येक ‘Stress and Conflict’ का समुचित प्रबंधन
कर देता है| इसी प्रबंधन में ‘ज्ञान’, ‘बुद्धि’ और ‘प्रज्ञा’
काम आता है| प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक विक्टर फ्रैकल इस प्रबंधन को ‘जीवन में
अर्थ’ खोजने में समझाते हैं|
इसलिए
‘विवाह’ और ‘लिव इन रिलेशनशिप’ को यथास्थिति में और स्पष्ट समझ कर तनाव एवं संघर्ष
मुक्त रहें|
आचार्य प्रवर निरंजनजी
शिक्षक, लेखक, प्रेरक
एवं दार्शनिक
अध्यक्ष, अन्तर्राष्ट्रीय अध्यात्म एवं
संस्कृति संवर्धन संस्थान
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