शनिवार, 15 अगस्त 2026

भारतीय राष्ट्र की समस्याएँ और समाधान

‘भारतीय राष्ट्र’ (Nation) की अनेको समस्याएँ हैं| ध्यान रहे कि ‘भारतीय देश’ (Country) की या ‘भारतीय राज्य’ (State, not Province) की अनेकों समस्याएँ हो सकती है, लेकिन ये सभी समस्याएँ ‘भारतीय राष्ट्र’ की मूल समस्यायों की तरह प्राथमिक नहीं हैं| ‘भारतीय राष्ट्र’ की समस्या भारतीय देश एवं राज्य के लिए आधार  (Base) से जुड़ी हुई है| शायद इसीलिए भारतीय संविधान की उद्देशिका (Preamble) में ‘राष्ट्र’ की एकता और अखंडता सुनिश्चित करने की बात की गयी है, ‘देश’ या ‘राज्य’ की एकता और अखंडता सुनिश्चित करने की बात नहीं है|

राष्ट्र से सम्बन्धित समस्याएँ इसलिए भी ‘नाजुक’ समझी जाती है, क्योंकि ‘राष्ट्र’ एक भावनात्मक और अमूर्त अवधारणा है| यह देश या राज्य की तरह स्पष्ट और मूर्त नहीं होता है| एक ‘राष्ट्र’ का निर्माण एक निश्चित भूगोल पर एक लम्बे ऐतिहासिक काल में एक साथ रहने से उत्पन्न ‘ऐतिहासिक एकापन’ (Historical Oneness) की भावना से होता है| स्पष्ट है कि राष्ट्र एक होने की एक भावना मात्र है और इसीलिए एक ‘राष्ट्र’ एक ‘काल्पनिक वास्तविकता’ (Imaginary Reality) ही है| यह एक सामाजिक एवं सांस्कृतिक ‘संस्था’ (Institution) है, कोई संस्थान (Institute) नहीं है|

‘भारतीय राष्ट्र’ एक निश्चित भूगोल पर निर्मित एवं विकसित है| इस भूभाग को ‘भारतीय उपमहाद्वीप’ कहा जाता है, जिसमे वर्तमान में कई देश या राज्य समाहित हो जाते हैं| ‘भारतीय राष्ट्र’ में भारतीय गणराज्य, पकिस्तान, अफगानिस्तान, नेपाल, भूटान, बंगलादेश जैसे राज्य शामिल हैं| एक निश्चित भौगोलिक संरचना से आवृत और एक विशिष्ट मानसूनी जलवायु से संचालित पूरे उपमहाद्वीप को एक आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं राजनीतिक समरूपता से बांधता हुआ होता है| एक निश्चित भौगोलिक भू –संरचना और भू –आकृति ने आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं राजनीतिक एकीकरण के लिए कई कारक उपलब्ध कराए हैं, जैसे रेलों, सडको के परिवहन और संचार साधनों के जाल को फैलाने में कोई बाधा उत्पन्न नहीं कर रहा है| आज भारतीय राष्ट्र एक प्रमुख बाजार के रुप में विश्व में महत्वपूर्ण स्थान रखता है| एक राष्ट्र के लिए इतिहास से ज्यादा महत्वपूर्ण उसका निश्चित भूगोल होता है|

इसीलिए ‘भारतीय राष्ट्र’की अधिकतर समस्याएँ इसके भूगोल से सम्बन्धित नहीं होकर, इसके ‘इतिहास’ और इसके ‘इतिहास की समझ’ से सम्बन्धित है| इसीलिए प्राचीन एवं मध्य काल के भारतीय इतिहास की वैज्ञानिक व्याख्या भी भारतीय राष्ट्र की अधिकतर समस्यायों को सुलझा देगी, लेकिन यह भारतीय दुर्भाग्य है कि सभी इतिहासकार परम्परागत पैटर्न से अलग हट ही नहीं पा रहे हैं| ‘भारतीय राष्ट्र’ अनेक भाषाओं, सम्प्रदायों एवं पन्थो, जातियों और परम्पराओं का देश है, जिसे ऐतिहासिक शक्तियों ने ऐतिहासिक काल में जन्म दिया है और विकसित किया है। सांस्कृतिक विविधता बनाम एकरूपता की चुनौती एक समान राष्ट्रीय पहचानगढ़ने के प्रयास में कभी-कभी स्थानीय पहचान से टकरा जाता है। समस्या यह है कि राष्ट्रवाद ‘समावेशी’ हो या ‘सांस्कृतिक रूप से एकरूप’?  सांस्कृतिक विविधता जड़ें तो है, लेकिन  ‘आर्थिक पर्यावरण’ राष्ट्र को एकीकृत करने वाला प्रभावशाली शक्तियाँ हैं| इसे ही बाजार की शक्तियाँ कहते हैं, और इन्ही शक्तियों को ही एकीकरण के प्रमुख कारक के रुप में स्वीकार कर लिया जाना चाहिए| इसे ध्यान से समझना चाहिए|

आर्थिक शक्तियों के बदलते प्रभाव में कभी कभी अर्थव्यवस्था जड़ होने लगती है, जैसे प्राचीन काल के समापन के बाद मध्य काल में हुआ| तब ‘भौगोलिक दूरियाँ’ ही भूगोल में विविधता देने लगता है|  अर्थव्यवस्था यानि बाजार के साधन एवं शक्तियाँ भूगोल को एकरूपता की ओर ले जाने को सदैव तत्पर रहता है, लेकिन ‘जड़’ हो गयी अर्थव्यवस्था गतिहीन हो जाती है| इतिहास की समझ और अवबोध (Perception) ही संस्कृति को स्वरुप प्रदान करता है, जो पूरे समाज को अदृश्य रह कर संचालित करता रहता है| इस तरह, इतिहास का समन्वय और सामंजस्य ही जीवन को गति प्रदान करता है और गति ही साइकिल की तरह जीवन और राष्ट्र को संतुलित बनाए रखता है।

धर्म और राष्ट्र के संबंध में भारतीय राष्ट्रवाद के भीतर दो प्रवृत्तियाँ रही है, जो ‘नागरिक राष्ट्रवाद’ और ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ या ‘धार्मिक राष्ट्रवाद’ के रुप में अभिव्यक्त है| ‘नागरिक राष्ट्रवाद’ भारतीय संविधान के उद्देश्यों, नागरिकता और मौलिक अधिकारों पर आधारित है| जब सम्प्रदायों एवं पन्थो और राष्ट्र की सीमाएँ धुंधली होती हैं, तो अल्पसंख्यकों में असुरक्षा की भावना उत्पन्न हो सकती है। बाजार की शक्तियाँ, शिक्षा का स्तर, और लोगों का उच्चतर आलोचनात्मक चिन्तन सभी को मानवता के कल्याण के लिए अग्रसर करता है| राष्ट्र को मानवता के कल्याण करने के साधन के रुप में लिया जाना चाहिए, उसमे बाधक नहीं बनना चाहिए|

भारतीय जाति-व्यवस्था विश्व में एक अनूठी सामाजिक व्यवस्था है| यह जन्म पर आधारित और सम्पूर्ण जीवन में कभी भी नहीं बदलने वाली सामाजिक असमानता है| प्राचीन भारत की पेशाओं (Professionals) की व्यवस्था ही मध्य काल की गतिहीन अर्थव्यवस्था में जाति-व्यवस्था के रुप में स्वरुप ग्रहण कर लिया|  समस्या यह है कि राष्ट्रवाद समानता की बात करता है, परंतु जाति-आधारित असमानताएँ अभी भी गहरी हैं| इससे राष्ट्रकी अवधारणा में सामाजिक न्याय का प्रश्न जुड़ जाता है। इसी तरह,  क्षेत्रीयता और उप-राष्ट्रवाद की समस्या कई राज्यों में क्षेत्रीय दलों के बढ़ते प्रभाव में उत्पन्न हुआ है। तमिल राष्ट्रवाद, कश्मीरी पहचान और पंजाबी/सिख अस्मिता इसी प्रकार के उदाहरण हैं| तब यह प्रश्न उठता है कि क्या भारतीय राष्ट्रवाद इन सभी उप-राष्ट्रीय पहचानों को समाहित कर सकता है?

आर्थिक असमानता एवं आर्थिक विषमता भी राष्ट्रवाद की चुनौती है, जैसे अमीर-गरीब की खाई एवं ग्रामीण-शहरी विभाजन आदि| यदि विकास असमान हो, तो राष्ट्रवाद केवल भावनात्मक नारा बन सकता है। इसमें  औपनिवेशिक विरासत का भी महती योगदान है| भारतीय राष्ट्रवाद का उद्भव ब्रिटिश शासन के प्रतिरोध से हुआ, परन्तु प्रशासनिक, कानूनी और शैक्षिक ढाँचे अभी भी औपनिवेशिक मानसिकता से पूरी तरह बाहर नहीं आ पाया है| इससे स्वदेशीऔर आधुनिकके बीच द्वंद्व बना रहता है।

नैतिक-आध्यात्मिक राष्ट्रवाद; धार्मिक राष्ट्रवाद; सांस्कृतिक/हिंदू राष्ट्रवाद और अति –राष्ट्रवाद से अलग आधुनिक एवं वैज्ञानिक राष्ट्रवाद को समझना चाहिए, जो समय की मांग है| इन भिन्न दृष्टियों के कारण एक सर्वमान्य राष्ट्रवादी परिभाषा बना पाना कठिन रहा, लेकिन एक सर्वमान्य अवधारणा को स्वीकार करना होगा|।

 वैश्वीकरण के प्रभाव के कारण आज राष्ट्रवाद केवल सीमाओं के भीतर सीमित नहीं है। वैश्विक बाज़ार, डिजिटल संस्कृति, और प्रवासी भारतीयों की भूमिका राष्ट्रवाद को वैश्विक मानवता की ओर अग्रसर करता हुआ है| इससे राष्ट्रीय संप्रभुता और वैश्विक जुड़ाव के बीच संतुलन का प्रश्न उठता है। भारतीय राष्ट्रवाद की मूल समस्या एकता में विविधताके आदर्श को व्यवहार में लागू करने की है।

राष्ट्र एक सांस्कृतिक चेतना भी है, यह एक एक संवैधानिक-राजनीतिक समझौता भी है और यह एक ऐतिहासिक विकास की एक स्वाभाविक परिणति भी है| इसे समझ कर हमें किसी को प्रोत्साहित करना है और किसी को हतोत्साहित करना है, ताकि राष्ट्र की एकता एवं अखण्डता सुनिश्चित रहे|

आचार्य प्रवर निरंजनजी

शिक्षक, लेखक, प्रेरक एवं दार्शनिक

अध्यक्ष, अन्तर्राष्ट्रीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान

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