भारत
में बहुसंख्यको की समस्याएँ बढती ही जा रही है, जबकि उनलोगों की उम्मीद इसके घटने की
है| ‘बहुजन’, अर्थात बहुसंख्यक जन| लोग अपनी सुविधा और समझ के स्तर पर वर्गीकरण
करते हैं, जैसे जाति, उपजाति, पंथ, सम्प्रदाय, भाषा, क्षेत्रीयता या अन्य कोई
कल्पित आधार हो सकता है| इस वर्गीकरण की एक विशिष्ट और स्पष्ट विशेषता होती है| इस
वर्गीकरण में किसी दूसरे ख़ास समूह को इस वर्गीकरण से बाहर कर दिया जाता है, और यह
माना जाता है कि उनकी सारी समस्यायों के जड़ (कारण) वही सापेक्षिक समहू है| अर्थात
इस प्रक्रिया में एक सापेक्षिक ‘दुश्मन’ वर्ग की कल्पना कर ली जाती है, और उसे ही अपनी सभी समस्यायों के लिए उत्तरदायी बना दिया जाता है| इस तरह, ये बहुसंख्यक समाधान
के लिए अपने कर्तव्यों और उत्तरदायित्वों से मुक्त हो जाते है|
इन
आधारों पर जब से उनकी तथाकथित जागृति बढ़ी है, दिनों दिन उनकी समस्याएँ विकराल होती
जा रही है| इस जागृति के साथ, ये सभी बहुसंख्यक अपनी समस्त ऊर्जा, संसाधन, धन,
वैचारिकी और जवानी उन समस्यायों को खोजने में लगाये हुए हैं, लेकिन इसके बाद उन्हें अपनी
समस्यायों के समाधान और आगे बढ़ने लिए उनके पास कोई ऊर्जा, संसाधन, धन, वैचारिकी और
जवानी ही नहीं बचती है| ये सभी उन्हीं समस्यायों के बृहद या विशद वर्णन में लगे
हुए रहते हैं, जिससे उन्हें बुद्धिजीवी होने की संतुष्हुटि मिलती दिखती है| इसी
बौद्धिकता के भ्रम में वे कोई समाधान देखने का कोई प्रयास नहीं करते हैं|
उनको
आगे बढ़ाने की पूरा उत्तरदायित्व व्यवस्था पर और उस दुश्मन समूह पर डाल दिया जाता
है| इनकी बौद्धिकता भी बड़ी विचित्र किस्म की होती है| ये लोग चार साल ग्यारह महीने
और उनतीस दिन जिसकी पूरी आलोचना करते रहेंगे, लेकिन चुनाव में मतदान के दिन अपनी
जाति और धर्म को देख कर उसी को या उसी के गठबधन को मतदान करेंगे| और फिर उसी दिन
से अपनी तथाकथित बौद्धिकता उसके विरुद्ध दिखाने की होड़ में शामिल रहेगें| कुछ तो
बौद्धिक अपनी भिन्न वैचारिकी के कारण दूसरों को ‘मूर्खता’ का प्रमाण –पत्र बाँटते
दिखेंगे| उनका यह दोहरा चरित्र किसी को नहीं दिखता होता है|
भारत
के सभी वर्ग समूहों के आधार में, सभी कुछ हो सकता है, लेकिन उसमे ‘राष्ट्र’ कहीं
नहीं दिखता हुआ होगा| यह स्थिति सर्व जनों की है| अपवाद हर जगह होते हैं, इसलिए
अपवाद को मान कर चलना होता है| सभी वर्ग, या यह कह सकते हैं कि भारत का प्रत्येक
सामाजिक वर्ग राष्ट्र की प्राथमिकता के विरुद्ध अपना अपना ‘सामाजिक पूंजी’ {Social
Capital} बनाने में लगा हुआ है| इसका आधार उसकी जाति, उपजाति, पंथ, सम्प्रदाय,
भाषा, क्षेत्रीयता या अन्य कोई कल्पित अवधारणा हो सकता है| ‘मूल निवासी’ और ‘विदेशी’
की अवधारणा भी एक कल्पित अवैज्ञानिक अवधारणा ही है|
बहुजनों
की समस्याएँ इसलिए बढती जा रही हैं, क्योंकि इन वर्गों के अधिकाँश लोगों का जीवन –नजरिया
‘समस्यायों’ को देखने की ओर उन्मुख हो गया है| इनके मानसिक दृष्टिकोण का नजरिया समस्यायों
को ढूंढने और खोज करने मात्र की हो गयी है| अब तो ऐसी स्थिति हो गयी है कि जहां
समस्याएँ नहीं दिखती है, तो वे बेचैन हो उठते हैं| उस अवस्था को भी खतरनाक मान
लिया जाता है| इनका ‘अल्गोरिथम’ समस्यायों को खोजने के लिए ‘प्रोग्राम’ किया जा
चुका है| ये समाधान को खोज ही नहीं सकते| इनको समाधान व्यक्ति के विस्थापन में दिख
सकता है, लेकिन व्यवस्था या विचारों में नहीं दिख सकता है| इसीलिए इनके डिजीटल ‘सोशल
समूहों’ में जो मैसेज डाले जाते हैं, उनमे सभी के सभी समस्यायों के विवरण से भरे
होते हैं| ऐसे किसी भी मैसेज में समाधान देता हुआ कुछ भी नहीं मिलेगा| स्पष्ट है
कि ऐसे लोगों को समस्या ही मिलना इनकी नियति हो गयी है| चूँकि अधिकाँश भारतियों की
आलोचनात्मक विश्लेषण की क्षमता और स्तर निम्नतर होता है, इसीलिए बहुसंख्यक लोग ऐसे
ही लेखों या अग्रसारण को पसंद करते होते हैं| यदि किसी ने समाधान –परक कोई सुझाव
या कार्य योजना डाल दिया, तो सभी बुद्धिजीवियों को ‘साँप सूंघ जाता है’| स्तरहीन
सस्ती लोकप्रियता पाने की होड़ में कार्यरत कर्मी, सामाजिक कार्यकर्ता और अवकाश
प्राप्त कर्मी की बहुलता होती है| इसीलिए समस्यायों पर चीखते –चिल्लाते लोग उनके लोकप्रिय
सामाजिक नेता बन जाते हैं| तब, समाधान नहीं, समस्यायों की गणना और विवरण ही
बौद्धिकता का आधार बन जाता है|
जिनको
वैचारिक सृजन या विचारण की क्षमता नहीं होती है, ऐसे लोग सिर्फ भौतिक वस्तुओ को ही
देख और समझ पाते हैं, और ऐसे में व्यक्ति का नाम पहचानने के लिए सबसे ऊपर होता है|
ऐसे लोग सारी समस्यायों का दोषारोपण किसी व्यक्ति या व्यक्ति –समूह को ही देते
हैं| ऐसे लोगों को या सभी बौद्धिक लोगों को यह समझ ही नहीं है कि भारतीय इतिहास
में ऐसे वर्ग समूहों की उत्पत्ति और उद्विकास कैसे हुआ? ये लोग इसके लिए
शताब्दियों पुरानी स्थापित मान्यताओं पर ही अडिग हैं, जबकि नयी वैज्ञानिक व्याख्या
में सब कुछ भिन्न हो जाता है| ये सभी अपने को अंतिम ज्ञान से परिपूर्ण मानते हैं| उनको
अपने ज्ञान में अब किसी संवर्धन की जरुरत नहीं होती है| इनको क्रान्ति के लिए एक
ही कमी दिखती है कि उनके पास धन और जन समर्थन की कमी है| उन्हें लगता है कि उनकी
हर बात को सब मान ले, तो वे क्रान्ति कर सकते हैं|
ऐसे
ही भ्रमों में उनके बुद्धिजीवी जीवित रहते हैं और बहुसंख्यक को भी भ्रमित रखे हुए
हैं| ऐसे ही चलता रहेगा|
आचार्य प्रवर निरंजनजी
शिक्षक, लेखक, प्रेरक एवं दार्शनिक
अध्यक्ष, अन्तर्राष्ट्रीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन
संस्थान
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