बुधवार, 17 जून 2026

बुद्ध बुद्धि में हैं, धर्म में नहीं

अकसर लोग बुद्ध के धर्म अर्थात बौद्ध –धर्म की बात करते हैं, जबकि यह बुद्ध के नाम पर माध्य काल के कुछ लोगों ने इसे बनाया है| बुद्ध ने जीवन दर्शन यानि जीवन जीने का वैज्ञानिक एवं मानवतावादी सिद्धान्त दिया है, कोई धर्म नहीं दिया है| हर धर्म में, कुछ या अधिक, ढोंग, पाखण्ड, अंधविश्वास और कर्मकांड अवश्य होगा, और इसके बिना कोई धर्म हो ही नहीं सकता है| कोई भी ऐतिहासिक व्यक्ति सामाजिक, सांस्कृतिक और चेतना की समझ और विकास का क्रान्तिकारी अग्रदूत होता है| ऐसे लोग विचारक और आध्यात्मिक होने के कारण ज्ञानी और मार्गदर्शक अवश्य होता है, अन्यथा वह ऐतिहासिक होगा ही नहीं| मध्य काल में इन्हीं ऐतिहासिक अग्रदूतों के नाम पर उनके जीवन दर्शन यानि जीवन जीने का वैज्ञानिक एवं मानवतावादी सिद्धान्तों को “समकालिक” (Contemporary) बनाया गया| यह “समकालिक” होने की प्रक्रिया आगे भी होती रही और आज भी हो रही है|

हर ऐतिहासिक व्यक्ति सामाजिक, सांस्कृतिक और चेतना की समझ और विकास का एक निश्चित, प्रगतिशील और स्पष्ट जीवन दर्शन रखता है| यह जीवन दर्शन उस क्षेत्र और उस काल के लोगों को सरल, सामान्य, सहज, और प्रगतिशील जीवन जीने के लिए एक स्पष्ट प्रारुप देता है| इस प्रगतिशील दर्शन को सभी अपनी अपनी समझ के अनुरुप समझता और अनुपालन करता है| स्पष्ट है कि यह सब जीवन दर्शन उस स्थान के भूगोल, उसके इतिहास एवं संस्कृति, लोगों की समझ और उन परिस्थितियों के सापेक्ष होता है|

भारत में विशिष्ट, भिन्न और उच्चतर बुद्धि की परम्परा रही है, और प्राचीन भारत के इस परम्परा (स्कूल) में कोई सौ से अधिक परम्परा बताई जाती है| भारत में बुद्धि की मुख्य धाराओं में कोई 28 लोगों को “बुद्धत्व” की उपाधि प्राप्त हुई, जिन्हें ‘बुद्ध’ कहा जाता रहा| सिद्धार्थ गोतम उनमे अंतिम और 28वे ‘बुद्ध’ बताए जाते हैं| ध्यान रहे कि गोतम को बोधगया में एक लम्बी साधना के बाद “बुद्धत्व” की प्राप्ति हुई थी| स्पष्ट है कि यह “बुद्धत्व” पहले से ही ‘बुद्धि’ की एक विशिष्ट और उच्चतर अवस्था की उपाधि रही होगी| दुनिया के तमाम मार्गदर्शकों की तरह बुद्धों ने भी यहाँ के लोगों को जीवन जीने के लिए और मानवता की निरन्तरता की व्यवस्था के लिए जीवन –दर्शन दिए| लेकिन उसने किसी ने कोई धर्म को स्थापित नहीं किया|

भारत में ज्ञात ऐतिहासिक व्यक्तियों में बुद्धों की परम्परा सबसे पुरानी है, जो सभ्यता और संस्कृति के प्रारम्भिक काल से शुरु होना स्थापित है| बुद्ध ने “धम्म” का दर्शन दिया, जो सभी मानवों का प्रगतिशील जीवन दर्शन है| इस ‘जीवन –दर्शन’ या ‘वैज्ञानिक जीवन –सिद्धांतों’ में उस समय का वर्तमान, प्राचीन काल के अनुभव और मानवता का भविष्य समाहित किये हुए था| इसमें मानव, परिवार, समाज, प्रकृति और मानवता सहित भविष्य की निरन्तरता की व्यवस्था सुनिश्चित है|

वर्तमान सभी ‘धर्म’ इसी “धम्म” की ‘स्थानीय’ और ‘समकालिक’ (Contemporary) व्याख्या है| सभी धर्मों में मानवता और मानवता का भविष्य समाहित होता है| ‘स्थानीय’’ से तात्पर्य स्थानिक भौगोलिक धरातल, उसकी जलवायु, वहाँ की संस्कार एवं संस्कृति आदि आदि शामिल होता है| इसी तरह, ‘समकालिक होना’ किसी भी इतिहास को वर्तमान में समझने का एक महत्वपूर्ण उपकरण (Tool) है| इस ‘अवधारणा’ के बिना किसी भी इतिहास को समुचित एवं वैज्ञानिक ढंग से नहीं समझा जा सकता है| इतिहास के सारे भ्रम इसी ‘अवधारणा’ की समझ के अभाव में उत्पन्न होते हैं|

‘धम्म’ के इसी’ प्रकाश’ यानि इन्हीं ‘ज्ञान’ के कारण इस भौगोलिक भू –भाग को ‘आभा’ (Aura’ Light) से ‘रत’ (Full) माना जाता रहा| इस क्षेत्र का नाम “भारत” इसी ‘आभा’ एवं ‘रत’ शब्दों से बना है| इसी प्रभाव से इस क्षेत्र के समस्त भौगोलिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और भाषाई पहचान स्थापित हुआ है| मैं सिर्फ इतिहास की बात कर रहा हूँ और किसी भी मिथकों का प्रसंग नहीं लिया है|

चूँकि सभी इतिहास की समुचित एवं वैज्ञानिक व्याख्या ‘समकालिक होने’ की अवधारणा से होती है, और वर्तमान सभी धर्मों का भी एक ‘इतिहास’ है, इसीलिए वर्तमान सभी धर्मों की उत्पत्ति और उद्विकास की व्याख्या भी यही ‘समकालिक होने’ की अवधारणा करता है| वर्तमान सभी धर्मों का ग्रन्थ, जिसमे उनके प्राचीनतम प्रमाणिक ग्रथ भी शामिल हैं, सिर्फ कागज पर ही उपलब्ध हैं| अर्थात इन सभी का वर्तमान स्वरुप में सम्पादन एवं व्याख्या कागज के आविष्कार होने और उनके उन क्षेत्रों में प्रचालन में आने के बाद का ही मानना वैग्यमिक, तर्कसंगत और व्यवहारिक है| कागज का आविष्कार चीन में प्राचीन काल के अंतिम काल में बताया जाता है और उसका वैश्विक प्रचलन मध्य काल में बताया जाता है| मतलब कागज पर सभी उपलब्ध धार्मिक ग्रन्थ मध्य काल में सम्पादित है| अर्थात सभी उपलब्ध धार्मिक ग्रन्थ अपने सम्पादन काल के “समकालिक” हैं|

ज्ञात है कि मध्य काल की दुनिया वर्तमान एशिया और यूरोप तक ही सीमित थी; उस समय का अफ्रीका भूमध्य सागरीय तट तक सीमित था और अफ्रिका का भीतरी भाग, अमेरिका (दोनों), आस्ट्रेलेशिया आदि कई भू भाग व्यवस्थित व्यवस्था से बाहर यानि अज्ञात थी| पूरा मध्य काल “सामन्तवाद की शक्तियों” से नियमित, निदेशित एवं संचालित था|, इसलिए ये सभी क्षेत्र भी “सामन्तवाद की शक्तियों” के सञ्चालन में था| यदि कोई व्यक्ति इन “ऐतिहासिक शक्तियों और उनकी क्रियाविधियों” को नहीं समझता है. तो ‘इतिहास’ की उसकी ‘समझ’ अधूरी. अवैज्ञानिक और अपूर्ण है; इसे स्थिर होकर समझ लें|

मध्य काल में उदित और विकसित इन ‘ऐतिहासिक सामन्ती शक्तियों’ ने तत्कालीन सम्पूर्ण वैश्विक व्यवस्था को ‘जड़’ यानि ‘गतिहीन’ कर दिया| इसका वैश्विक प्रभाव उस समय के सामाजिक. सांस्कृतिक, आर्थिक, धार्मिक, राजनीतिक सहित सम्पूर्ण व्यवस्था और मानसिकता पर पडा और प्रभावित हुआ| इन ‘ऐतिहासिक सामन्ती प्रभाव’ में मानव का ‘धाम’ यानि ‘धर्म’ को भी ‘जड़’ यानि ‘गतिहीन’ हो जाना पडा, जिसका स्वरुप आज भी विकासशील और अविकसित संस्कृतियों में सहज परिलक्षित होता है| विकसित अर्थव्यवस्था के राष्ट्रों ने अपने संस्कारों, संस्कृतियों एवं मानसिकताओं से उन ऐतिहासिक सामन्ती प्रभावों को हटाने या न्यून करने में सफल रहा|   

जिन लोगों की समझ और मानसिकता इतनी उच्चतर स्तर पर विकसित नहीं हुई है कि वे किसी भी ‘धर्म के अफीम’ (कार्ल मार्क्स) के बिना अपना सामान्य सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन नहीं जी सकते हैं, वैसे लोग किसी भी वैज्ञानिक और व्यवहारिक जीवन पद्धतियों एवं सिद्धान्तों को ही धर्म के स्वरुप में मानने को विवश होते हैं| ‘बौद्ध –धर्म’ के साथ भी यही व्याख्या मानी जा सकती है, लेकिन बुद्ध तो बौद्धिकता के प्रकाश –स्तम्भ थे, मार्गदर्शक थे| यही इतिहास है, यही तथ्य है और यही सत्य है|

आचार्य प्रवर निरंजन जी

अध्यक्ष, अन्तर्राष्ट्रीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान|

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