बुधवार, 24 जून 2026

विचार एक जीवित प्राणी है

भारत में एक कथानक है – ‘महाभारत’| इसमें पूरे भारत के शामिल होने के एक युद्ध –वर्णन है, और उसके माध्यम समाज को कई सन्देश देने का एक विशाल काव्य है| इसमें ‘पांडवों’ की एक छोटी सेना ने भारत के सबसे विशाल और भयंकर सेना को हराने में सफल हुए| इस सफलता का राज ‘सशक्त विचारों’ का प्रभाव और शक्ति थी| इन ‘सशक्त एवं संगठित विचारों’ का ही नाम ‘भगवान कृष्ण’ है| यह विचारों (Thoughts) की शक्ति थी, जिसे ‘भगवान कृष्ण’ने उत्पन्न किया और एक व्यक्ति – ‘अर्जुन’ के माध्यम उसे क्रियान्वित किया| इसीलिए हिंदी फिल्म – ‘जिंदगी और तूफ़ान’ के एक गाने में कहा गया है कि “आदमी चाहे तो तक़दीर बदल सकता है, वो पूरी दुनिया की तस्वीर बदल सकता है; आदमी ‘सोच’ (विचार) तो ले कि उसका इरादा क्या है?”

यह सही कहा गया है कि जब उपयुक्त समय आता है, तो एक ‘विचार’ दुनिया समस्त सेनाओं की संयुक्त शक्ति को भी पराजित कर देता है| लेकिन शायद ऐसा कोई उपयुक्त समय आता हो, या नहीं भी आ सकता है| कहने का तात्पर्य यह है कि कोई भी ‘उपयुक्त’ (Suitable) समय नहीं आता है, लेकिन ‘उपयुक्त’ और ‘समुचित’ (Appropriate) “विचार’”तो उत्पन्न किया ही जा सकता है, जो पूरी दुनिया को बदल सकता है| यह विचारों की शक्ति और प्रभाव है|

 ‘विचार’ केवल ‘मन’ (Mind) का उत्पाद नहीं होता है, बल्कि यह ‘ऊर्जा’ (Energy) का एक स्वरूप होता है| या कहे कि यह ‘उर्जा’ का एक विशिष्ट संयोजन एवं विन्यास का ‘आव्यूह’ (Matrix) होता है| चूँकि ‘विचार’ ‘उर्जा’ का एक स्वरुप है, इसीलिए इसमें ‘कम्पन’ (Vibration) होता है| ज्ञात है कि ब्रह्माण्ड मौलिक स्वरुप में ही ‘क्षेत्र –बल’ (Field –Force) से निर्मित है और इसी ‘क्षेत्र –बल’ से ‘पदार्थ’, ‘ऊर्जा’, समय’ एवं ‘आकाश’ (Space) यानि ‘स्थान’ बना है| जैसे कोई प्राणी जन्म लेता है, विकसित होता है, प्रभाव डालता है और सन्दर्भ से बाहर होते ही मर भी जाता है| इसी तरह, ‘विचार’ भी जन्म लेता है, विकसित और समृद्ध होता है, अपनों एवं दूसरों पर प्रभाव डालता है और सन्दर्भ से बाहर होते ही धीरे धीरे मर भी जाता है|

एक विचार किसी व्यक्ति के मन में जन्म लेता है| वह व्यक्ति अवश्य ही संवेदनशील और जिज्ञासु होगा| वह सिर्फ सूचनाओं से पूर्ण ‘ज्ञानी’ नहीं होगा, अपितु वह ‘कल्पनाओं’ (Imagination) की उड़ान भरने वाला व्यक्ति होगा| ‘ज्ञान’ (Knowledge) तो किसी सीमा तक सीमित होता है, उसकी कुछ निश्चित बाध्यताएँ हो सकती है, लेकिन “कल्पनाओं की उड़ान” में तो ब्रह्माण्ड भी बाधक नहीं बनती है| इसीलिए हर ‘संवेदनशील’ और ‘जिज्ञासु’ व्यक्ति ‘विचारक’ होने के कारण ‘आविष्कारक’ और ‘खोजी’ होता है| ‘संवेदना’ और ‘जिज्ञासा’ ही वह बीज है, जो ‘विचार’ और ‘उसके कर्म’ को जन्म देता है, विकसित और समृद्ध करता है, और पूरी दुनिया को बदल देने की क्षमता रखता है|

व्यक्ति का ‘आत्म’ (Self, आत्मा नहीं) उसके ‘मन’ (Mind) और ‘चित्त’ (Spirit) से बना होता है, और इसकी सम्पूर्ण संरचना  ऊर्जा से निर्मित होती है| ‘मन’ ही ‘विचारों’ का उत्पादन, संयोजन, संश्लेषण एवं भण्डारण करता है| ‘विचार’ मन की ऊर्जा की उत्पन्न लहरों का प्रवाह है, जो ‘चित्त’ और ‘मोद्युलेटर’ (Modulator) ‘मस्तिष्क’ (Brain) एवं ‘शरीर’ (Body) को प्रभावित करता रहता है| ‘चित्त’ ही ‘भावनाओं’ (Emotions) का उत्पादन, संयोजन, संश्लेषण एवं भण्डारण करता है, और यही ‘अनन्त प्रज्ञा’ (Infinite Intelligence) के अनन्त ‘क्षेत्र –बल’ (Infinite Field –force) से संपर्क करा कर उस व्यक्ति को ‘अंतर्ज्ञान’ (Intuition) उपलब्ध कराता रहता है| मन और चित्त को ‘आवश्यक ऊर्जा’ उस व्यक्ति के शरीर के प्रत्येक कोशिकाओं के क्रोमोजोम्स उपलब्ध कराता रहता है|

आधुनिक न्यूरो -विज्ञान बताता है कि हर ‘विचार’ के साथ ‘न्यूरान्स’ (Nurones) के बीच ‘विद्युत एवं रासायनिक संकेत’ (Electro –Chemical Signals) उत्पन्न होता है| स्पष्ट है कि हर ‘विचार’ उर्जात्मक घटना है, जो ‘ऊर्जा’ से उत्पन्न होकर ‘ऊर्जा’ में ही समाप्त हो जाती है| इस तरह यह विचार उत्पन्न होती है, विकसित होती है, समय एवं सन्दर्भ के साथ अनुकूलित होती है, गमन (यात्रा) करती है, प्रभाव डालती है, समाप्त (मृत्यु प्राप्त करना) भी हो जाती है और ‘जीवितता’ (जीवित प्राणी) की तरह व्यवहार करती होती है|

‘मन’ कोई अभौतकीय (Non –Materialistic) ‘उड़नखटोला’ ही नहीं होता है| यह भौतिक जगत की ‘वास्तविकता’ होती है; और ‘विचार’ उसका प्रतिविम्ब (Reflection) होता है| इसीलिए “आर्थिक साधन और शक्तियाँ” ही समकालिक शक्तियाँ होती है, जो ‘इतिहास’ के पन्नों में “ऐतिहासिक शक्तियाँ’ कहलाती  है और इतिहास को बदलता रहता है| इन्हीं ‘विचारों’ का ‘द्वन्द’ (Conflict) ही ‘विचारों’ का संश्लेषण, सम्वर्धन और विकासपरक बनाता है| ‘समय’, ‘समाज’ और ‘प्रकृति’ तत्क्षण बदलता रहता है और ‘समायोजन’ एवं ‘अनुकूलन’ में हर विचार को संशोधित और परिमार्जित होना होता है, या समाप्त हो जाना होता है| ‘समय’, ‘समाज’ और ‘प्रकृति’ के तत्क्षण बदलने के क्रम में ‘विचारों’ के समायोजन एवं अनुकूलन होना ही ‘संघर्ष’ के रुप में दृश्य होता है, या अनुभव किया जाता है|

इसीलिए ‘विचार’ एक जीवित प्राणी होता है| आप भी इसको विकसित कीजिए, इसे पालिए – पोशिए और अपनी दुनिया को बदल डालिए|

आचार्य प्रवर निरंजन जी

अध्यक्ष, अन्तर्राष्ट्रीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान|

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विचार एक जीवित प्राणी है

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