शनिवार, 14 मार्च 2026

भारत का दुर्भाग्य ‘मरोड़े’ गए इतिहास -दर्शन में है

आप सही पढ़ रहे हैं, ‘भारत का दुर्भाग्य’ (Misfortune of India) ‘प्राचीन भारतीय इतिहास के दर्शन’ (Philosophy Ancient of Indian History) के मरोड़े जाने” (Twist/ Wrench) में फँसा’ (Entrapped/ Got Stuck) हुआ है| भारत का दुर्भाग्य यानि भारतीय लोगों का दुर्भाग्य, एक सत्य है| यह एक गंभीर विषय है|

दर्शन’ (Philosophy) किसी बात, विषय, या नीति का मूल सार’ (Essence/ Gist) होता है| कोई विषय पहले से सुनिश्चित एवं निर्धारित एक मूल सारके इर्द गर्द चक्कर लगाता रहता है| यह मूल सारपहले से सुनिश्चित एवं निर्धारित उद्देश्य” (Goal) को पाने के लिए होता है| किसी विषय के सारया उद्देश्यको जानना दर्शनका मूल विषय होता है| इसे समझने की जरुरत है, जो भारत को आजतक दयनीय अवस्था में जकड़े हुए है|

भारत की यह दयनीय अवस्था’ ‘प्राचीन भारतीय इतिहास के दर्शनको मरोड़े जानेसे निर्मित हुआ है| इसीलिए यहाँ भारतीय इतिहास के दर्शन के सार’, यानि  भारतीय इतिहास के दर्शन के मूल भावका आलोचनात्मक एवं विश्लेषणात्मक समीक्षा करना है| ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि किसी संस्कृति का आधार उसका प्राचीन इतिहास होता है| स्पष्ट है कि मध्भा काल में जब प्राचीन भारतीय इतिहास को सम्पादित किया जा रहा था, तब भारतीय संस्कृति को ही मरोड़ दिया गया है। और इस सम्पादित इतिहास को ही आज प्राचीन एवं सत्य बताया जा रहा है| भारत का भविष्य इसे सुधारने से ही सुधर सकता है| बाकी सब प्रयास महज एक तमाशा है, दिखावा है, जो चलता आ रहा है|

इतिहास’ ‘दर्शन का गतिशील रुपहोता है| एक इतिहासकार को इतिहास लेखन में अपनी अंतर्दृष्टि (Intuition) का उपयोग करना चाहिए, ताकि वह उपलब्ध ऐतिहासिक तथ्यों का प्राकृतिक उद्विकास की अवधारणा के अनुरूप तार्किक व्याख्या कर वर्तमान की समस्यायों का समाधान दे सके| इसलिए ‘इतिहासएक सक्रिय दर्शनहै| इस तरह, ‘दर्शन’ ऐतिहासिक चेतना के उद्विकास का स्वरुप है| ‘इतिहास’ अतीत का विज्ञान होता है, क्योंकि यह वैज्ञानिक विधियों के अनुरुप तार्किक, तथ्यात्मक और विवेकशील प्रस्तुति होता है| इतिहास भी विज्ञान की तरह वर्तमान की समस्यायों का समाधान देता हुआ भविष्य पर निगाहें रखता है|

इतिहास को किसी दैवीय या अतार्किकता के आधार पर व्याख्यापित नहीं किया जा सकता| दैवीय या अतार्किकता ही इतिहास को मिथक में मिला देता है| इतिहास वर्तमान और भविष्य को ‘और सुधार’ करने के उद्देश्य से अतीत और वर्तमान का संवाद होता हैइतिहास के तथ्य तो अतीत के होते हैं लेकिन इतिहासकार वर्तमान का होता है| ये ऐतिहासिक तथ्य भी वही बोलते हैं, जो उन तथ्यों के माध्यम वह इतिहासकार बोलवाना चाहता है| इसलिए ‘इतिहास सापेक्षिक होता है, जो हर काल एवं परिस्थिति के अनुसार गतिशील रहता है||  

इतिहास हमें अपनी जड़ो तक पहुचाता है, जिसे हम लोकप्रिय शब्दावली में संस्कृति का मूल स्रोतकहते हैं| यही संस्कृति यानि हमारे इतिहास बोध’ (Perception of History) ही हमारे संस्कारको निश्चित, नियमित एवं नियंत्रित करता हैं ये संस्कार, संस्कृति और हमारे इतिहास बोधही हमारी मानसिकता और हमारा विश्वदृष्टिकोण को निश्चित, नियमित एवं नियंत्रित करता रहता है| ‘इतिहास का उद्देश्य मानव की मुक्तिको सुनिश्चित कराना होता है’| इसी ‘मानव की मुक्ति’ को अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन  'विकास' (Development as Freedom) कहते हैंस्पष्ट है कि किसी भी इतिहास के दर्शनके मूल में न्याय’, ‘समता’, ‘स्वतंत्रताऔर बंधुत्वअवश्य रहना चाहिए, जो विश्व को शांतिमय, सुखमय एवं विकाशशील माहौल दे सके| प्राचीन भारतीय इतिहास को मरोड़ कर इन्ही तत्वों की ह्त्या कर दिया गया है| यदि किसी इतिहास का दर्शन अभी भी मानवीयता का सन्देश नहीं दे रहा है, तो वह इतिहास के नाम पर साजिश है, धोखा है, षड़यंत्र है|

भारत के प्राचीन काल का लगभग समस्त इतिहास, जो आज उपलब्ध है, वह सक्ष्यात्मक रुप से कागज पर ही लिखित रहा है| अर्थात ऐसा लिखित इतिहास कागज के चीन में आविष्कार होने और अरब क्षेत्र के माध्यम भारत आने और भारत में इसके प्रयोग के प्रचलित होने के बाद का है| यह काल भारत में दसवी शताब्दी के बाद का होता है| इसके पहले भारत का इतिहास ख़ास पेड़ के छालों, चमड़ों, और ख़ास पत्तों पर लिखित रहा है| इसके अतिरिक्त ये विवरण पत्थरों, धातुओं, लकड़ियों एवं मिट्टियों के पट्टियों पर लिखित हुए| ये विवरण इतिहास के नव सम्पादन के बाद सुनियोजित तरीके से तत्कालीन इतिहासकारों के वर्ग, जो शासक वर्ग होता है, ने नष्ट कर दिया|

स्पष्ट है कि जो इतिहास मध्य काल में लिखा जा रहा था, वह मध्य काल का समकालीन इतिहास रहा| उस समय प्राचीन भारत का जो इतिहास लिखा गया, या संपादित किया गया, उसे तत्कालीन आवश्यकताओं के अनुरुप इस काल में पूरा मरोड़ दिया गया| तत्कालीन सामन्तवादी आवश्यकताओं के अनुरुप सामग्रियों को प्राचीन काल के इतिहास में समाहित एवं समायोजित कर दिया गया| तब इन सामन्तवादी आवश्यकताओं को प्राचीन इतिहास की सामग्री की तरह स्थापित कर दिया गया| तब यही संपादित एवं संशोधित इतिहास हमारी सांस्कृतिक जड़े हो गयी| यह आज भी मजबूती से जमी हुई है| इसिहास का मध्य काल वैश्विक सामन्तवाद का काल रहा, और इसीलिए उस काल में सम्पादित सभी इतिहास समकालीन सामन्तवाद की आवश्यकताओं के अनुकूलन एवं समायोजन का पर्याय रहा|,  यही समकालीन इतिहासहो गया|

इतिहास का कोई भी तथ्य एवं सत्य श्रवण एवं वाचन’ (Listening n Speaking) के माध्यम से कई पीढ़ियों के लोगों से गुजर जाने के बाद भी वही तथ्य एवं सत्य बना रहेगा, ऐसा आधुनिक मनोविज्ञान के सन्दर्भ में उचित नहीं माना जा सकता| श्रोता और वाचक भी हर स्तर पर अपनी समझ के अनुसार उन तथ्यों को संपादित करता रहा| हुआ यह है कि प्राचीन भारत का इतिहास, जो ख़ास पेड़ के छालों, चमड़ों, एवं ख़ास पत्तों और पत्थरों, धातुओं, लकड़ियों एवं मिट्टियों के पट्टियों पर उपलब्ध था, उन्हें नए स्वरुप एवं नयी भाषा में तत्कालीन आवश्यकताओं के अनुकूल एवं अनुरुप सम्पादित कर दिया गया| इन नए स्वरुपों में सम्पादन के बाद इन सामग्रियों को यथासम्भव नष्ट कर दिया गया|

मध्य युग वैश्विक सामन्तवादी युग था, तो उनके अनुकूल प्राचीन इतिहास के दर्शन को ध्यान में रख कर तत्कालीन नए इतिहास के स्वरुप को तैयार किया गया| लेकिन वह सम्पादित इतिहास आज भी वर्तमान युग में मौजूद है| अब हमारे प्राचीन काल के इतिहास को वर्तमान वैश्विक आवश्यकताओं के अनुकूल एवं अनुरुप प्रस्तुत किया जाना अनिवार्य है| यही व्याख्या भारत को दुर्भाग्य से बाहर निकलेगा, बाकी सब प्रयास मौलिक नहीं है|

वर्तमान भारत के बहुसंख्यक या लगभग सभी इतिहासकार संस्कृति या इतिहास के वर्चस्ववादको नहीं समझते होते हैं| ये सभी इतिहासकार, चाहे वे अपने को प्रगतिशीलकहें या इतिहास का संशोधककहें, इसी ऐतिहासिक वर्चस्ववादयानि सांस्कृतिक वर्चस्ववादके चक्रव्यूह में उलझे हुए हैं| ‘सांस्कृतिक वर्चस्ववाद’ (Cultural Hegemony) एक ऐसी अवधारणा है, जिसे अलग से, गहनता से और विस्तार से समझे जाने की आवश्यकता है| इसे समझे बिना भारत कभी वैश्विक नेतृत्व नहीं दे सकता है, कोई भी चाहे जो प्रयास कर ले| आज प्राचीन भारत का जो इतिहास उपलब्ध है और हमारी महान संस्कृति का मूल आधार है, वह मध्य काल में सामन्ती आवश्यकताओं के अनुरुप संपादित है| इस प्राचीन काल के इतिहास दर्शन को मरोड़दिया गया, जो भारत में संस्कृति को भ्रमात्मक बना देता है|

इतिहास कोई स्थिर सत्य नहीं होता है, बल्कि इसे शासक वर्ग अपनी आवश्यकता अनुसार बदलता रहता है’| शासक वर्ग, जिसे ‘राजनीतिक समाज’ भी कहा जाता है, इतिहास को नियंत्रित कर वह वर्तमान एवं भविष्य को नियंत्रित रखता है’| इसीलिए सत्ता वर्ग इतिहास को बदल कर वर्तमान संस्कार और संस्कृति को अपनी आवश्यकताओं के अनुरुप बनाता  रहता है| इसीलिए प्रत्येक इतिहास’ ‘समकालीन इतिहास’ (Contemporary History) हो जाता है’| इसका अर्थ यह हुआ कि  इतिहास केवल अतीत की घटनाओं का विवरण नहीं होता है, बल्कि इसका वर्तमान की आवश्यकतायों के अनुसार पुनर्सृजन होता हैइसी कारण इतिहास को शासक वर्ग के हितों के अनुरुप बदलना पड़ता है| इतिहास वर्तमान के दृष्टिकोण से अतीत का मूल्याङ्कन करता है’| इसीलिए ‘आप वर्तमान इतिहास को अस्वीकृत कर सकते हैं, लेकिन आप कोई अन्तिम इतिहासनहीं लिख सकते हैं’| यह इतिहास भविष्य में बदलता रहेगा| आज भी अपने प्राचीन इतिहास को तार्किक, तथ्यात्मक और वैज्ञानिक बनाने की आवश्यकता है|

आचार्य प्रवर निरंजनजी

शिक्षक, लेखक, प्रेरक एवं दार्शनिक

अध्यक्ष, अन्तर्राष्ट्रीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान

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