आजकल मैं एक किताब लिख रहा हूँ, जिसका शीर्षक है –
“750 करोड़ लोगो का विकास कैसे हो”| इसमें वैश्विक मानवता से सम्बन्धित एक
बड़ा सवाल उभरता है कि विश्व की कुल आबादी 800 करोड़ मे से कोई 750 करोड़ लोग
अपेक्षित विकास के लिए अभी भी आस लगाये हुए हैं? इसका एक स्पष्ट अर्थ यह है कि
विश्व में अभी तक कोई भी अर्थशास्त्री इन 750 करोड़ लोगों के सम्यक एवं समुचित विकास
का समाधान नहीं दे पाया हैं| ऐसी स्थिति में, यह कहा जा सकता है कि विकास के सम्बन्ध
में विश्व में अभी तक उपलब्ध सभी सिद्धांत, माडल, अवधारणा और क्रियाविधि व्यावहारिक
और सफल नहीं है|
यदि इन लोगों ने अभी तक अपेक्षित ‘न्यूनतम विकास’
(Minimum Development) नहीं किया है, तो प्रश्न यह भी है कि यह तथाकथित ‘न्यूनतम विकास’
क्या होता है? ‘न्यूनतम विकास’ उस व्यवस्था या फिज़ा (माहौल) का परिणाम होता है,
जिसके कारण कोई व्यक्तित्व अपने महत्तम अभिव्यक्ति के साथ मानवता को योगदान दे
सकता है| ‘न्यूनतम विकास’ की अवस्था में व्यवस्था या फिज़ाओं द्वारा वे सभी ‘आधारभूत
संरचनाएँ’, ‘प्रेरणाएँ’ एवं ‘सुविधाएँ’ सामान्य लोगों को उपलब्ध करायी जाती है,
जिससे ‘वास्तविक विकास’ उत्पन्न और विकसित होता है| ‘प्रेरणाओं’ में ‘Motivation’,
‘Inspiration’ एवं ‘Nudge’ (लेखक - रिचर्ड थेलर) को शामिल माना जाना चाहिए|
प्रोफ़० अमर्त्य सेन
को “कल्याणकारी अर्थशास्त्र” में
योगदान देने के लिए वर्ष 1998 में नोबेल पुरस्कार दिया गया| प्रो० सेन ने ‘विकास’
को ‘स्वतन्त्रता’ के रुप में परिभाषित किया है। प्रो० अमर्त्य सेन विकास की
अवधारणा को पारंपरिक आर्थिक आंकड़ों के जंजाल से निकाल कर ‘स्वतन्त्रता’ के नए
क्षितिज की ओर ले गये हैं| वे इस बात पर ज़ोर देते हैं कि प्रति व्यक्ति आय और
प्रति व्यक्ति राष्ट्रीय आय आदि जैसे आर्थिक सूचकांक आदि और उसके नागरिकों को
मिलने वाली ‘असली स्वतन्त्रता’ अर्थात ‘विकास’ के बीच कोई सीधा सम्बन्ध नहीं है।
‘विकास’ व्यवस्था का वह
अवस्था है, जो अपने लोगों को अपनी पसन्द के कार्य करने की ‘वास्तविक स्वतन्त्रता’
देता है| ‘विकास’ की अवधारणा ‘स्वतन्त्रता के रुप में’ एक ऐसा सूत्र –वाक्य है, जो
‘विकास’ को एक साथ राजनीतिक, अर्थशास्त्रीय, सांस्कृतिक, मनोवैज्ञानिक, समाज
शास्त्रीय, ऐतिहासिक आदि अध्ययन एवं व्यवस्था की बहु –विषयक समझ से जोड़ता है। प्रो०
सेन ने ‘विकास’ को मानव के ‘सक्षमता उपागम’ (Capability Approach) से जोड़ा
और इसके लिए लोगों की योग्यता और कौशल के उन्नयन को प्रमुख माना|
प्रो०
सेन समाजों के विकास के लिए ‘सांस्कृतिक स्वतन्त्रता’ को आवश्यक मानते है| ‘सांस्कृतिक
स्वतन्त्रता’ को मौलिक मानवाधिकार माना गया है| सभी लोगों को अपनी प्रजातीय,
भाषाई और धार्मिक पहचान बनाए रखने का अधिकार महत्वपूर्ण माना है| इन
पहचानों को पहचान देने और उनकी रक्षा करने वाली नीतियों को अपनाना ही अलग-अलग तरह
के समाजों में विकास का एकमात्र टिकाऊ तरीका मानते है। आर्थिक वैश्वीकरण तब तक
कामयाब नहीं हो सकता, जब तक ‘सांस्कृतिक स्वतन्त्रता’ का सम्मान और सुरक्षा न की
जाए, और सांस्कृतिक विविधता को स्वीकार्य नहीं कर लिया जाता है| ऐसा प्रो० सेन का मानना है|
प्रो०
सेन ‘विकास’ और ‘मानव विकास सूचकांक’ (HDI) की वैज्ञानिक अवधारणा देने के
लिए बधाई के पात्र हैं| प्रो० सेन ‘संस्कृति’ और ‘सांस्कृतिक स्वतंत्रता’ की
अवधारणा का प्रयोग किया है, लेकिन इसके लिए उनके शाब्दिक प्रयोग से यह स्पष्ट होता
है कि वे इन पारम्परिक अवधारणाओं को मूल रूप में नहीं समझ पाए हैं| यह ‘संस्कृति’
और उसकी ‘गत्यात्मकता’ (Dynamism) की अवधारणा इतनी महत्वपूर्ण है कि विश्व में यदि
कहीं विकास गतिमान है, तो इसी समझ के कारण है; और यदि कहीं विकास घसीट रहा है या सरकने
का प्रयास कर रहा है, इसी नासमझी के कारण है| दरअसल ‘संस्कृति’ किसी समाज
के ‘इतिहास –बोध’ से निर्मित होता है और इससे सम्बन्धित विद्वान् ही जाने –अनजाने
में गलती कर रहे हैं|
अविकसित
एवं विकासशील देशों के ‘प्रभावशाली एवं यथास्थितिवादी वर्ग –समूह’ ने ‘संस्कृति’
और ‘सांस्कृतिक स्वतंत्रता’ की अवधारणा कर दुरूपयोग कर ही उन समाजों के विकास को
बाधित किया है| ऐसे ‘प्रभावशाली एवं यथास्थितिवादी वर्ग –समूह’ को क्रान्तिकारी
दार्शनिक एन्टोनियो ग्राम्शी ‘राजनीतिक समाज’ (Political Society) कहते
हैं| ‘राजनीतिक समाज’ ही अपना ‘सांस्कृतिक वर्चस्व’ (Cultural Hegemony) अपने
देश के ‘नागरिक समाज’ (Civil Society) पर स्थापित करता है| ‘संस्कृति’ में ‘जड़ता
की क्षमता’ (Power of Inertia) बहुत ज्यादा होती है| इस ‘जड़ता की क्षमता’ का
सकारात्मक और नकारात्मक उपयोग सुलभ होता है, लेकिन इसका उपयोग या दुरूपयोग उसके ‘कर्ता’
(Agent) पर निर्भर करता है|
दरअसल
‘संस्कृति’ शब्द की यात्रा ‘संस्कार’ शब्द से प्रारम्भ होता है|
शब्द ‘संस्कार’ समाज के ‘संस्मरण’ को ‘आकार’ (Shape) देना है| इन्ही ‘संस्कारों’
के समुच्चय को ‘संस्कृति’ कहते हैं| समाज के इन्ही ‘संस्मरणों’ को प्रसिद्ध
मनोवैज्ञानिक कार्ल जुंग ‘सामूहिक अचेतन’ (Collective UnConsciousness)
कहते हैं| यह ‘संस्कृति’ ही ‘व्यवस्था का फिज़ा’ होता है, जो उस समाज या
क्षेत्र के फिज़ाओं में तैरता रहता है| यह संस्कृति ही व्यवस्था का ‘फिज़ावेयर’
होता है| किसी व्यवस्था का आधारभूत भौतिक संरचना उस व्यवस्था का ‘हार्डवेयर’
कहलाता है और उस व्यवस्था को संचालित करने वाला अदृश्य तंत्र, जैसे कानून, शिक्षा,
धर्म, मीडिया आदि ‘साफ्टवेयर’ कहलाता है| इन अर्थशास्त्रियों का ध्यान व्यवस्था
के ‘फिज़ावेयर’, यानि ‘संस्कृति’ के इस स्वरुप पर नहीं गया है| ये विद्वान् व्यवस्था
के इन ‘फिज़ावेयर’, यानि ‘संस्कृति’ की अभिव्यक्ति को, जैसे कला, पेन्टिंग, भवन,
मूर्तियों, परम्पराओं, रीति –रिवाज आदि को ही ‘’संस्कृति’ समझ लेते हैं| इसी
नासमझी के कारण प्रो० अमर्त्य सेन भी विकास के व्यवहारिक समाधान से चूक गए हैं|
इस
‘सांस्कृतिक स्वतंत्रता’ के नाम पर विश्व के अधिकतर देशों में ‘सामन्ती काल में
विकसित या विरूपित संस्कृति’ को उस समाज और क्षेत्र की मौलिक संस्कृति बता कर
वैश्विक विकास को बाधित किया गया है| एक अर्थशास्त्री होने के कारण अमर्त्य
सेन भी ‘संस्कृति’ और ‘सांस्कृतिक गत्यात्मकता’ समझ नहीं पाए हैं| ‘संस्कृति’
को सम्मानजनक बता कर और इसकी ‘सांस्कृतिक जड़ता’ का दुरूपयोग कर ही वैश्विक विकास
को बाधित किया हुआ है| ऐसे लोगों को ‘संस्कृति’ की ‘गत्यात्मकता’ की समझ नहीं है|
विकास की अवधारणा के लिए
एक 'नवाचारी संस्कृति’ की ज़रूरत होती है| 'नवाचारी संस्कृति’ वैज्ञानिक मानसिकता, ‘बाक्स से बाहर चिंतन’, तार्किक
सोच और विवेकपूर्ण निर्णय से आती है| चूँकि किसी संस्कृति का आकार उस समाज के ‘इतिहास
की समझ’ से स्वरुप लेता है, इसलिए विकास के लिए ‘इतिहास –दर्शन’ (Historiography)
को भी समझना अनिवार्य है| इसके बिना कोई ‘विकास का नाटक’ तो कर सकता है,
लेकिन अपेक्षित विकास नहीं कर सकता है| प्रो० अमर्त्य सेन यही नहीं समझ पाए और
विकास अभी भी सरकने का प्रयास कर रहा है|
आचार्य प्रवर निरंजन जी
अध्यक्ष, भारतीय अध्यात्म एवं संस्कृति
संवर्धन संस्थान|
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