यह एक विचित्र स्थिति है कि दो विपरीत
अवस्थाओं को एक साथ सत्य और सही बताया जा रहा है| अक्सर लोग समझते हैं कि कोई
कल्पनाएँ कभी भी वास्तविक नहीं हो सकती, या कोई वास्तविक प्रभाव एवं परिणाम पैदा
नहीं करती है| लेकिन तथ्य यह है कि काल्पनिकता की वास्तविक और काल्पनिक, दोनों
अवस्थाओं में एक साथ मौजूद रहती है| यह सब कुछ उसके ‘परिप्रेक्ष्य’ पर निर्भर करता
है|
इसे दूसरी तरह से इस तरह व्यक्त किया
जा सकता है कि “क्या कल्पनाएँ भी वास्तविक होती है?” इसका उत्तर
सीधा ‘हाँ’ या ‘नहीं’ में नहीं दिया जा सकता, क्योंकि यह इस
पर निर्भर करता है कि हम “वास्तविक” से
क्या अर्थ लेते हैं? इसे हम भौतिक अर्थ (Physical Reality) में
और मनोवैज्ञानिक अर्थ (Psychological Reality) में समझने के
साथ साथ यह इस पर भी निर्भर करता है कि हमारी चेतना के लिए “कल्पना”
और “वास्तविक अनुभव” में
फर्क कितना है?
अगर “वास्तविक” से हमारा मतलब
है कि जो चीजें बाहर की दुनिया में भौतिक रूप से मौजूद हो, तो इस अर्थ में कल्पनाएँ
वास्तविक नहीं होतीं। ऐसी चीजें हमारे मन एवं मस्तिष्क के भीतर बनने वाले मानसिक
चित्र, विचार या संभावनाएँ होती हैं। ऐसी चीजों को छुआ,
तौला या मापा नहीं जा सकता। प्रसंगवश यह भी जान लेना चाहिए कि
क्वांटम भौतिकी के ‘कोपेनहेगन व्यक्तव्य’ में यह मान लिया गया है कि हमारी
कल्पनाएँ ही भौतिकताओं को जन्म देती है| यह सही है कि हमारी कल्पनाएँ ही बाहय भौतिकताओं
के अस्तित्व को आधार दे सकती है, लेकिन उन्हें जन्म नहीं देती है|
लेकिन अगर “वास्तविक” से हमारा अभिप्राय यह है कि जो हमारे अनुभव, भावना
और व्यवहार को प्रभावित करता है, तो इस अर्थ में कल्पनाएँ
पूरी तरह वास्तविक होती हैं। हमारी डर की कल्पना से हमारे दिल की धड़कन तेज़ हो
जाती है, भविष्य की कल्पना से प्रेरणा या चिंता पैदा होती है, प्रेम की कल्पना से वास्तविक
भावनाएँ उत्पन्न होती हैं, आदि आदि अनेक उदहारण हमारी दुनिया मौजूद हैं| यहाँ
कल्पना सिर्फ़ हवा में उड़ती चीज़ नहीं, बल्कि जैविक
तंत्रिका विज्ञान की घटनाओं का रूप ले लेती है| इसे मनोविज्ञान में ‘मनो –शारीरिक
प्रभाव’ (Psycho –Somatic Effect) कहते हैं| मानव मस्तिष्क में कल्पनाओं पर वैसे
ही रासायनिक प्रक्रियायों के परिणाम मिलते हैं, जैसे वास्तविकताओं पर निकलते हैं|
बहुत सी चीज़ें जो आज पूरी तरह काल्पनिक
लगती हैं, कल वास्तविक हो जाती
है| जो आज सिर्फ़ कल्पनाएँ मानी जाती हैं,
वे कल्पनाएँ आज “अवास्तविक” नहीं होती,
बल्कि ये “संभावित वास्तविकता” होती हैं। मशीने, कम्प्यूटर, इन्टरनेट, सामाजिक एवं सांस्कृतिक संस्थाएँ (समाज,
विवाह, धर्म, आदि), राजनीतिक संस्थाएँ (लोकतंत्र, राज्य, राष्ट्र आदि), आर्थिक
संस्थाएँ (मुद्रा) आदि इसी प्रकार की काल्पनिकता है| इस अर्थ में काल्पनिकता भविष्य
की वास्तविकताओं का रूप होती हैं। कल्पनाएँ भौतिक रूप से वास्तविक नहीं होतीं, लेकिन मानसिक, भावनात्मक और ऐतिहासिक स्तर पर गहरी
वास्तविकता रखती हैं। वे यथार्थ से कटे भ्रम नहीं, बल्कि
यथार्थ के संभावित रूप होती हैं।
आधुनिक तंत्रिका विज्ञान (न्यूरोसाइंस)
बताता है कि मस्तिष्क काल्पनिकता और वास्तविकता के अनुभव को पूरी तरह अलग नहीं
करता। चिकित्सीय तकनीकों, जैसे fMRI
और EEG के अध्ययनों से पता चलता है कि जब कोई
व्यक्ति किसी खाद्य पदार्थ को वास्तव में काटने की कल्पना करता है और किसी खाद्य
पदार्थ को वास्तव में काटता है, तो दोनों स्थितियों में एक सा परिणाम दिखता है|
उसके मस्तिष्क के दृश्य क्षेत्र (Visual Cortex), भावना क्षेत्र
(Insular Cortex) में, और शारीरिक संवेदना (Somatosensory
Cortex) में बहुत मिलती-जुलती न्यूरल गतिविधि दिखती है। इनमे अंतर
सिर्फ़ इतना होता है कि वास्तविक अनुभव में संकेत एवं सूचनाएँ ज़्यादा स्पष्ट, तेज़
और स्थिर होते हैं, जबकि कल्पना में वही नेटवर्क हल्के रूप में सक्रिय होते हैं और
ज्यादा स्पष्ट एवं स्थिर नहीं होते हैं| स्पष्ट है कि न्यूरॉन के स्तर पर कल्पना
भी एक वास्तविक जैविक घटना है।
कल्पना ही मानव मस्तिष्क में ‘संभावनाओं
को पैदा करने’ का प्रक्रम है| मस्तिष्क संभावित परिणामों को पूर्व-अनुभव करता है| हम
कल्पना से लक्ष्य-निर्देशित बनाते हैं और कल्पना में भावनात्मक रंग भरते हैं| कल्पना
कोई “भ्रम” नहीं है, बल्कि यह मस्तिष्क की एक उच्च स्तरीय
संज्ञानात्मक क्षमता है। प्लेसिबो प्रभाव (Placebo Effect)
में कल्पना शरीर को बदल देती है| यह सबसे
मज़बूत प्रमाण है, जो यह स्पष्ट करता है कि कल्पना “वास्तविक”
असर डालती है| कल्पना शरीर में वास्तविक रसायन छोड़ता है, और व्यक्ति पर वास्तविक शरिरिक, मानसिक एवं भावनात्मक प्रभाव होता है। यह
सब दिखाता है कि एक कल्पना उसके शरीर की गतिविधियों को बदल सकती है|
जब व्यक्ति किसी पुराने अनुभव को फिर
से कल्पना में लेता है, तब वह उसे दोबारा जीता है| ऐसे में उसका मस्तिष्क उसे “अतीत” नहीं मानता| वह उसे “अभी घट रही घटना” समझ लेता है| सिर्फ़ कल्पना से ही उसके शरीर में वही रासायनिक तूफ़ान उठ
जाता है, जो वास्तविकता में होता है। कल्पना से ‘दिमाग की संरचना’ (Neuroplasticity) तक बदल सकती है। जब वास्तविकता में कोई अभ्यास किया जाता है और जब उसी
का काल्पनिकता में अभ्यास किया गया, तो कुछ समय बाद (सप्ताह या महीना में) दोनों
के Motor Cortex में बदलाव दिखा| उनमे बदलाव का अन्तर सिर्फ
मात्रा में हुआ|
आधुनिक तंत्रिका विज्ञान यह स्पष्ट
करता है कि कल्पनाएँ बाहर की दुनिया में भौतिक रूप से मौजूद नहीं होतीं, लेकिन उसके मस्तिष्क
और शरीर के भीतर वे पूरी तरह वास्तविक जैविक घटनाएँ होती हैं। वे वही न्यूरल
नेटवर्क सक्रिय करती हैं, वही रसायन छोड़ती हैं, और वही संरचनात्मक बदलाव पैदा कर सकती हैं, जो “वास्तविक
अनुभव” करता है।
“काल्पनिक वास्तविकताओं’ को व्यक्तिगत
मस्तिष्क में, समाज में, और इतिहास में
समझ सकते हैं| व्यक्तिगत स्तर पर ये ऐसी “वास्तविकताएँ”
हैं जो बाहर नहीं होतीं, लेकिन व्यक्ति के लिए
पूरी तरह वास्तविक अनुभव बन जाती हैं। इस तरह कोई भी इन कल्पनाओं से अपने को तो
बदल सकता है, लेकिन अपने अस्तित्व के बाहर को प्रभावित नहीं कर सकता है| अपनी
कल्पनाओं से बाहय दुनिया को बदलने की तथ्यात्मक प्रक्रिया एवं परिणाम अभी तक बहुत
स्पष्ट नहीं है|
काल्पनिक वास्तविकताओं का अस्तित्व सामाजिक
स्तर पर भी होता है| ये वे चीज़ें हैं जो प्रकृति में नहीं पाई जातीं, लेकिन सामूहिक
विश्वास से पूरी तरह “वास्तविक” बन
जाती हैं। इनके उदाहरणों में मुद्रा (Currency), राष्ट्र (Nation), कानून (Law), जाति, नस्ल, वर्ग,
लोकतंत्र. मानवाधिकार, आदि प्रमुख हैं| राष्ट्र का कथानक (Narrative) इतनी
शक्तिशाली होता है कि लोग इसके लिए जान दे देते हैं। ये सब काल्पनिकताएँ प्रभावशाली
वास्तविकताएँ होते हैं। मिथक भी इतिहास की तरह कार्य करता है| प्रकृति में “अधिकार” नाम की कोई चीज़ नहीं होती, लेकिन इसकी काल्पनिकताएँ
आज संविधान, कानून और मानवाधिकार देती है|
आज समाज, व्यापार, राजनीति, पहचान
आदि सब इसी “डिजिटल कल्पना” पर टिका
है। जो चीज़ें कल्पना में जन्म लेती हैं, वह व्यवहार, शरीर
या इतिहास को बदल देती हैं| इसीलिए यह कहा जाता है कि कथानक शासन करता है|
कल्पनाएँ कर दुनिया को बदल दीजिए| वैज्ञानिकों की कल्पनाएँ ‘वर्तमान मानवता’ और ‘मानवता
के भविष्य’ को बदल रही है| वास्तविकता और काल्पनिकता की प्रक्रियायों को समझिए|
आचार्य प्रवर निरंजनजी
शिक्षक, लेखक, प्रेरक एवं दार्शनिक
अध्यक्ष, अन्तर्राष्ट्रीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान
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Right sir, thanks 🙏 for valuable content and thought
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