‘सम्प्रभुता’ ही ‘राज्य’ की पहचान है, अन्यथा वह ‘देश’
या ‘राष्ट्र’ हो सकता है, लेकिन ‘स्वतंत्र सत्ता’ या ‘स्वतंत्र राज्य’ नहीं हो सकता| आधुनिक
वर्तमान युग में, विश्व के लगभग सभी’ राज्यों’ की ‘सम्प्रभुता’ (Sovereignity) का ‘विलोपीकरण’
हो रहा है| अब इसकी गति तीव्रतर हो गयी है| विश्व के लगभग तमाम देश के
राष्ट्रपति, या प्रधानमंत्री, या राजा, या अन्य कार्यपालिका प्रधान शासक अपने अपने
राज्यों की भौगोलिक सीमाओं में मात्र ‘प्रबंधक’ (Manager) ही रह गए हैं; भले
ही कोई अपने को कितना भी सम्प्रभु समझ ले, या घोषित करता रहे|
वैसे मध्य काल में ‘सामन्तवाद’ के उदय के
साथ ही, ‘सम्प्रभुता’ का ‘विखण्डनीकरण’ प्रारम्भ हो गया था| फिर आधुनिक काल
में यूरोपियन आगमानों के साथ ‘सम्प्रभुता’ का ‘विखण्डनीकरण’ का प्रवाह पूंजी’
(Capital) के हित में नए सिरे से प्रारम्भ हुआ| लेकिन इस वर्तमान युग में तो ‘सम्प्रभुता’
के ‘विखण्डनीकरण’ के स्थान पर ‘विलोपीकरण’ होना शुरु हो गया है| इसके उद्विकास को
इतिहास की यात्रा में समझते हैं|
‘राज्य’ के चार अनिवार्य तत्व होते हैं, भौगोलिक ‘भू
भाग’, उसमे निवासित स्थायी ‘आबादी’ और उसे व्यवस्थित रखने के लिए एक ‘सरकार’ के
अलावे उसकी ‘सम्प्रभुता’ होती है| भारत को सम्प्रभुता 15 अगस्त 1947 को मिली, जिसे
भारतीय संविधान में स्पष्ट उल्लेखित किया गया है| भारतीय सम्प्रभुता भारत के लोगों
में निहित है| लेकिन क्या सम्प्रभुता का भी विखण्डन या विलोपन किया जा सकता
है?
प्राचीन काल में सभी राज्यों की सम्प्रभुता अखंड रहता था, संरक्षित
राज्यों को छोड़ कर| वैसे ‘संरक्षित राज्य’ की सम्प्रभुता कुछ शर्तों एवं नियमों के
अधीन रहती थी, लेकिन उन्हें ‘सम्प्रभु’ राज्य माना भी नहीं जाता था| सम्प्रभुता का
विखण्डनीकरण मध्य काल में प्रारम्भ हुआ| यह सामन्तवाद की कार्य –प्रकृति का
सहज, स्वाभाविक और प्राकृतिक उत्पाद रही| मध्य काल के सामन्तवाद में सम्प्रभुता का
पहले ‘उर्घ्वाकार विखण्डनीकरण’ हुआ| बाद में, ‘क्षैतिजाकार विखण्डनीकरण भी हुआ| सम्प्रभुता के ‘उर्घ्वाकार विखण्डनीकरण’
का अर्थ सम्प्रभुता एक पदानुक्रम (Hierarchy) में खण्डित हो जाना है| पहले राज्य ने
स्थानीय प्रभावशाली शक्ति को ‘राज्य कर की उगाही’ का अधिकार दिया, बाद में उसे ‘राज्य
कर’ को भण्डारित करने और निदेशानुसार वितरित करने का भी अधिकार देना पड़ा|
प्राचीन काल में भी, राजस्व संग्रहण मुख्यत: कृषि
उत्पाद के रुप में होता था, लेकिन उसका मुद्रा में नगदीकरण कर उसे राज्य का
अधिकारी ही केन्द्रीय कोषागार में भेजता रहा| प्राचीन काल में सम्प्रभुता के किसी
भी प्रकार के विखण्डनीकरण की आवश्यकता नहीं थी| लेकिन मध्य काल में सामन्तवाद के
युग में प्रचलित मुद्राओं का पतन हो रहा था, या पतन हो गया था| पहले भी राज्य के
हिस्से का राजस्व संग्रहण कृषकों और शिल्पियों से वस्तुओं में प्राप्त होता था,
लेकिन मध्य काल में संग्रहण के बाद की स्थितियाँ बहुत बदल गयी| इन पदार्थों का
संग्रहण करना, उसका भण्डारण करना और उसे फिर निदेशानुसाय एवं आवश्यकतानुसार वितरित
करना एक अलग दायित्व बन गया|
कृषकों और शिल्पियों से प्राप्त वस्तओं का राजस्व संग्रहण
तो आसान था| लेकिन उन वस्तुओं को केन्द्रीय या उपकेन्द्रीय राजधानी में भण्डारण के
लिए भेजना और उसे एक समय के बाद सुदूर के क्षेत्रों में भुगतान के लिए वस्तुओं के
रुप में ही भेजना व्यावहारिक नहीं था| सामन्तवाद में स्थानीय सामन्तो को प्रशासनिक
कर्मचारियों एवं सेनाओं को रखना पड़ा, जिनका वेतन भुगतान इन्ही को करना था| इसी
क्रम में, पहले सम्प्रभुता और सत्ता का उर्घ्वाकार विखण्डनीकरण एवं स्तरीकरण (Stratification)
हुआ| लेकिन कमजोर पड़ता केद्रीय सम्प्रभुता एवं सत्ता और मजबूत होता स्थानीय सम्प्रभुता
और सत्ता के कारण सम्प्रभुता और सत्ता का क्षैतिजाकर विखण्डनीकरण भी हो
गया| ये स्थानीय सामन्त स्वतंत्र राज्य बनने लगे|
सामन्तवाद का पतन ‘पूंजीवाद’ के आगमन के
साथ प्रारंभ हुआ| यूरोपियनों के आगमन के साथ पहले ‘वणिक साम्राज्यवाद’
स्थपित हुआ| इसी के साथ उन सम्बन्धित राज्यों के सम्प्रभुता का विखण्डनीकरण और
विलोपीकरण, एक साथ प्रारम्भ हो गया| यूरोपीय पुनर्जागरण प्रारम्भ हो चुका था| यूरोपीय
सामन्तों को ‘धन –शक्ति’ में वृद्धि के लिए अपने ‘धन’ (Wealth) को ‘पूँजी’ (Capital)
में बदलना अनिवार्य हो गया था| उत्पादक ‘धन’ ही ‘पूँजी’ कहलाता है| इसी अनिवार्यता
का परिणाम ‘वणिक साम्राज्यवाद’ है|
यूरोपीय पुनर्जागरण के साथ विज्ञान और तकनीक ने
छलांग लगायी| उद्योगों की स्थापना के साथ, ‘वणिक साम्राज्यवाद’ के स्थान पर
‘औद्योगिक साम्राज्यवाद’ का उदय हुआ| पूरी राजनीति इसी ‘औद्योगिक साम्राज्यवाद’
के इर्द –गिर्द घूमने लगी| ‘औद्योगिक साम्राज्यवाद’ भूमि विस्तार चाहता था,
और इसी विस्तार के लिए विश्व को दो दो विश्व युद्ध झेलने पड़े| अब भौगोलिक
क्षेत्रों का और विस्तार करना संभव नहीं था| साम्राज्यवाद का मूल मकसद ‘पूँजी’ का
हित संवर्द्धन करना होता है| द्वितीय विश्व युद्ध की भारी तबाही के बाद यूरोपीय
शक्तियों को ‘पूँजी’ के हित संवर्द्धन के लिए साम्राज्यवाद को अपना प्रकृति और स्वरुप
को बदल देना पड़ा|
तब ‘औद्योगिक साम्राज्यवाद’ ही अपने नए और
प्रभावशाली स्वरुप ‘वित्तीय साम्राज्यवाद’ में बदल गया| अब
साम्राज्यवादियों को अपने उपनिवेशों में भौतिक रुप में उपस्थिति अनिवार्य नहीं
रही, इसलिए द्वितीय विश्व युद्ध के बाद विश्व के तमाम उपनिवेशों को ‘भौतिक स्वतन्त्रता’ दे दी गयी| जहाँ स्वतन्त्रता के
लिए आन्दोलन नहीं हुए, वे भी स्वतंत्र कर दिए, क्योंकि ‘वित्तीय साम्राज्यवाद’ के
लिए साम्राज्यवादियों की भौतिकी उपस्थिति आवश्यक नहीं रह गयी थी|
संयुक्त राष्ट्र संघ के लिए कई तमाम संगठन गठित
हुए, कई संधियाँ और बाध्यकारी समझौते हुए| राज्यों की तथाकथित सम्प्रभुता खंडित और
विलोपित होने लगी| इस ‘वित्तीय साम्राज्यवाद’ को अब ‘डाटा साम्राज्यवाद’ का
तकनीकी समर्थन भी मिलने लगा| इस ‘डाटा साम्राज्यवाद’ का आभास अभी तक बहुत से राज्यों को भी नहीं है| ‘डाटा’ अर्थात
सूचनाओं का संग्रहण, विश्लेषण, मूल्याङ्कन और उसका वित्तीय आवश्यकताओं के अनुरुप
उपयोग होने लगा|
अब विश्व मानवता के लिए ‘एकल राष्ट्र’ के निर्माण
की ओर तेजी से अग्रसर है| हम इस दिशा में सोचे, या नहीं सोचे,; यह अबाध गति से आगे
बढ़ रहा है| आज सभी राज्यों के शासनध्यक्ष अपने अपने भौगोलिक सीमाओं में अपने देश
के प्रबंधक मात्र रह गए| स्पष्ट है कि इन राज्यों की सम्प्रभुता का विलीनीकरण तेजी से हो रहा है| ठहरिए और
सोचिए|
आचार्य
प्रवर निरंजनजी
शिक्षक, लेखक, प्रेरक एवं दार्शनिक
अध्यक्ष, अन्तर्राष्ट्रीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन
संस्थान
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बहुत ही सांद्रर्भिक लेख सर । बधाई हो।
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