गुरुवार, 30 जुलाई 2026

सिविल सेवाओं की परीक्षाओं में निबन्ध लिखने के लिए ...

सिविल सेवाओं में चयन के लिए होने वाली परीक्षाओं में आजकल निबन्ध लेखन का महत्व बढ़ गया है| निबन्ध -लेखन की कला, दर्शन एवं वैज्ञानिकता का उपयोग परीक्षाओं के अन्य प्रश्न –पत्रों में भी उपयोगी होता है| सिविल सेवाओं में जनता को बहुविध सेवा देना होता है| भारत की, और बहुसंख्यक राज्यों के लोगों की पृष्टभूमि भी बहुविध है| ऐसे में प्रशासन को किसी ख़ास विषय का विशेषज्ञ नहीं चाहिए होता है, बल्कि बहुविषयक सामान्य ज्ञाता होना चाहिए| एक प्रशासक को संविधान के अंतर्गत सरकार द्वारा सुनिश्चित मार्गदर्शन में समाज के कल्याण के लिए काम करना होता है| इसलिए उन्हें देश के सर्वोच्च अधिनियम – ‘संविधान’ के उद्देश्यों एवं भावनाओं के अनुरुप मानसिकता रखनी चाहिए|   

इन परीक्षाओं में अभ्यर्थियों से यह अपेक्षा की जाती है कि उनके निबन्ध लगभग 600 से 800 शब्दों में सीमित रहे| सामान्यत: दो या तीन निबन्ध को एक ही पाली (सत्र) में लिखना होता है| शीर्षक विविध विषयों के विविध मुद्दों पर होता है| इन दो –तीन निबन्धों से आपके ज्ञान स्तर के साथ साथ आपकी तार्किकता, रचनात्मकता, सकारात्मकता, मानवीयता, संवेदनशीलता, न्यायप्रियता और विवेकशीलता की मानसिकता एवं अभिवृति का सम्यक मूल्याङ्कन हो जाता है| इसलिए एक अभ्यर्थी ऐसी मानसिकता और अभिवृति (नजरिया) विकसित करने का प्रयास करे, ताकि इसका झलक आपके निबम्ध में अवश्य ही परिलक्षित हो जाए|

आपका निबन्ध आपके द्वारा चयनित शीर्षक के अनुरुप आपके भावों को, आपके ज्ञान को और आपके आलोचनात्मक चिन्तन को बखूबी रेखांकित करता हुआ हो| लेखन में स्पष्टता, क्रमबद्धता, व्यवस्था, तार्किकता और प्रभावशीलता होनी चाहिए| आपकी अवधारणा संक्षिप्त और स्पष्ट होनी चाहिए| शब्दों के चयन में उपयुक्तता और संक्षिप्तता अवश्य होनी चाहिए| ध्यान रहे कि इसमें विशेष विशेषज्ञता नहीं चाहिए होता है, क्योंकि आपकी टकराहट किसी विशेषज्ञ से नहीं होकर आपके ही जैसा अन्य अभ्यर्थियों से है, इसलिए ज्यादा तनाव भी नहीं लें|

प्रसंगवश आप  ‘आलोचनात्मक चिन्तन’, यानि आलोचनात्मक विश्लेषण, मूल्यांकन एवं समीक्षा को समझ लें| इसे आप अंग्रेजी वर्णमाला के पाँचों स्वर – A, E, I, O, U को क्रमानुसार याद रखें| ‘A’ से Analyse (विश्लेषण करना) अर्थात दिए गए शीर्षक को उसके मूल शब्दों की अवधारणा को, उसके सन्दर्भ और पृष्ठभूमि के सन्दर्भ में विश्लेषण करे; फिर, ‘E’ से Evaluate (मूल्यांकन करना) अर्थात दिए गये शीर्षक को वर्तमान या किसी सन्दर्भ में विश्लेषित कर मूल्याकन करे; फिर, ‘I’ से Interrogate (सवाल खड़ा करना) अर्थात अपने विश्लेषण और मूल्यांकन पर विभिन्न दृष्टिकोणों से प्रश्न करना है, ताकि आप पहले निकाले गये निष्कर्ष को सत्य के नजदीक ला सके; फिर, ‘O’ से Openness (खोलना यानि सामान्यीकृत करना) है, ताकि इन निष्कर्ष को सर्वसहमति यानि सर्वस्वीकृति मिल सके; और सबसे अन्त में, ‘U’ से Unite (मिला देना), यानि पूर्व के सभी प्रक्रियाओं को एक सूत्र में पिरो देना| यही प्रक्रिया ‘आलोचनात्मक चिन्तन’ है|

एक निबन्ध के तीन खंड होते हैं –पहला, परिचयात्मक भाग; दूसरा, मुख्य भाग, जिसमे उस शीर्षक -विषय का आलोचनात्मक विश्लेषण, मूल्यांकन एवं समीक्षा होता है, और अन्त में, आपका अन्तिम निष्कर्षात्मक भाग| निबन्ध का परिचयात्मक भाग और अंतिम भाग यानि निष्कर्षात्मक भाग कम शब्दों में वर्तमान के सन्दर्भ में रहे| अंतिम यानि निष्कर्षात्मक भाग में आपकी पूर्ण सहमति, या अस्वीकृति, या आंशिक सहमति, या अन्य कोई और बात स्पष्ट होना चाहिए| निबन्ध या आलेख को अपने निर्धारित शीर्षक के द्वारा निश्चित ढांचे के अन्तर्गत ही होना चाहिए| उस निबन्ध के मुख्य भाग को उस निश्चित शीर्षक के ढाँचे में ही उसका आलोचनात्मक विश्लेषण और मूल्यांकन के साथ उपयुक्त समीक्षा होना चाहिए|

निबन्ध के मुख्य भाग को काफी आकर्षक और उत्कृष्ट बनाने के लिए यानि, मुख्य भाग में आलोचनात्मक विश्लेषण, मूल्यांकन और समीक्षा के लिए यहाँ पाँच प्रकार के टूल्स दिया जा रहा है| सभी जैविक, भौतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक वस्तुओं एवं क्रियायों की वर्तमान अवस्था को समझने के लिए चार्ल्स डार्विन (Charles Darwin)  और हर्बर्ट स्पेंसर (Herbert Spencer) का उद्विकासवाद आवश्यक है| किसी भी व्यक्ति (नेता, दार्शनिक, लेखक, इतिहासकार आदि) के सभी व्यक्तव्यों, व्यवहारों और भावनाओं की वर्तमान समझ के गूढ़ एवं अदृश्य कारण को समझने के लिए सिगमण्ड फ्रायड (Sigmund Freud), कार्ल जुंग (Carl Jung), विक्टर फ्रैकल (Viktor Frankl), और अल्फ्रेड एडलर (Alfred Adler)  का मनोविज्ञानवाद  यानि मानसिक समझ को समझना आवश्यक है| किसी भी सामाजिक, सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक प्रक्रिया को वैज्ञानिक एवं तार्किक तरीके से समझने के लिए कार्ल मार्क्स (Karl Marx) और  एंटोनिया ग्राम्शी (Antonio Gramsci) का क्रमश: आर्थिकवाद और सांस्कृतिक वर्चस्ववाद  को जान लेना महत्वपूर्ण है| सभी जैविक, भौतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक व्यवहार या प्रक्रिया को वर्तमान में समझने के लिए गैलीलियो (Galileo Galilei) और अल्बर्ट आइन्स्टीन (Albert Einstein) का विभिन्न सापेक्षवाद का ध्यान रखना जरुरी है| अन्त में, किसी भी भाषा के शब्द, मुहावरे, वाक्य या अन्य प्रस्तुति को वास्तविक संदर्भ में समझने के लिए फर्डीनांड डी सौसुरे (Ferdinand de Saussure) और जाक देरिदा (Jacques Derrida) का क्रमश: संरचनावाद और विखंडनवाद  को समझ लेना चाहिए|

उपरोक्त को अच्छी तरह जान और समझ लेने मात्र से आपकी समझ में अभूतपूर्व बदलाव दिखेगा| यह बदलाव आपको सिविल सेवाओं की परीक्षाओं के निबन्ध, सामान्य अध्ययन, अन्य विषय एवं साक्षात्कार में मिले अंकों मे स्पष्ट दिखाई देगा

आप यू –ट्यूब (YouTube) के मेरे चैनल –  ‘Life Changer Niranjan’ पर भी और बहुत कुछ देख सकते हैं| (यह निबन्ध लगभग 800 शब्दों में, अग्रेजी शब्द अंग्रेजी भाषा के अभ्यर्थियों के लिए हैं)

आचार्य प्रवर निरंजनजी

अध्यक्ष, अन्तर्राष्ट्रीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान|

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