सोमवार, 17 जुलाई 2023

कथानक ही शासन करता है

 (The Narrative itself Rules)

चूंकि कथानक (Narrative) ही शासन करता है, यानि कथानक ही व्यवस्था और शासन को संचालित, नियमित, नियंत्रित करता है और उसे प्रभावशाली बनाता हैं, इसीलिए इस महत्वपूर्ण और सार्थक अवधारणा (concept) को समझना और उसकी क्रियाविधि (mechanism) के साथ साथ उसके प्रभाव एवं प्रयोग की विधि को जानना समझना जरूरी होता है। कथानक को आख्यान भी कहा जाता है। एक नारा (slogan) या एक उक्ति (quote) एक कथानक की संरचना का निचोड़ यानि सार (abstract) होता है। इसी कारण इसे ध्यान से समझा जाय, यदि आप शासन या व्यवस्था पर नियंत्रण या प्रभाव चाहते हैं

कथा एक छोटी कहानी (Story) होती है, जिसमें एक साहित्यिक रचना अपनी अभिव्यक्ति में सम्पूर्णता (प्रारंभ से समापन तक) लिए होती है। जबकि एक कथानक एक सुस्पष्ट भाव या मंशा को अभिव्यक्त करने के लिए एक कथा स्वरुप में होती है, जिसे किसी स्पष्ट लक्ष्य या उद्देश्य के लिए संगत, सरल और बुद्धिग्राह्य बनाकर प्रस्तुत किया जाता है। अतः एक कथानक यानि एक Narrative वह कहानी है, जिसमें व्यक्ति विशेष, घटनाओं और विचारों एवं आदर्शों को जोड़ते हुए उनका सूक्ष्म, विस्तृत, गहन और सुविचारित भावनात्मक ब्यौरा एवं वर्णन होता है, जिसका उद्देश्य सामने वाले श्रोताओं को कथाकार अपनी मंशा की मंजिल तक ले जाएं। इस तरह एक कथानक एक ऐसी वर्णनात्मक प्रसंग या कहानी होती है, जो भावनात्मक लहरें उत्पन्न कर श्रोताओं को बहाकर वहां ले जाती है, जहां उस कथानक का सृजनकर्ता अपने श्रोताओं को ले जाना चाहता है।

इस तरह एक कथा किसी भी कथ्यात्मक कृति का संरचनात्मक ढांचा (Structural Frame) मात्र होता है, जबकि एक  कथानक उस कथा के मूल संरचना पर आधारित किसी स्पष्ट और पूर्व निर्धारित लक्ष्य की ओर जनमानस को बहा ले जाने की भावना से प्रस्तुति होता है। स्पष्ट है कि एक कथानक वर्णनात्मक शैली में सरल, सहज और साधारण रूप में प्रस्तुत होगा एवं सभी के लिए बोधगम्य भी होगा। यह कथा स्वरुप से ज्यादा असरदार होता है और लक्ष्य को प्राप्त करने में अधिक कारगर साबित होता है। जहां एक कथा अपने वाचन में श्रोता को आने वाली अगली कड़ी (आगे क्या होगा) के लिए उत्सुकता जगाती हैं, वहीं एक कथानक अपने श्रोताओं को 'क्यों' और 'कैसे' आदि उत्सुकताओं को सम्हालता है और इसलिए एक कथाकार अपने श्रोताओं को बहा ले जाने में सक्षम और सफल भी होता है।

एक कथानक को तर्कसंगत कार्य -कारण अंत: संबंध पर आधारित दिखना होता है, यथार्थ एवं वास्तविकता की पूर्णता का आभास देता हुआ होना होता है, और विवेकशील यानि समाज और मानवता के लिए समुचित होने का झलक दिखलाना या झांसा देता हुआ (यानि झूठों का पुलिंदा) होना होता है। समेकित रूप में एक कथानक को वैज्ञानिकता से पूर्ण वास्तविक दिखना होता है। इतने तत्वों के संयोजन और समेकन से ही एक कथानक भावनापूर्ण उत्तेजना (धर्म अब ख़तरे में है) पैदा कर उसमें श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर अपने लक्ष्यों से सराबोर कर देता है। यह काल्पनिक होते हुए भी प्रभाव में वास्तविक होती है। एक कथानक अपने श्रोताओं को विचारों की जीवंतता प्रदान करता है।

कोई व्यवस्था या शासन या वर्ग या राष्ट्र कथानकों का उपयोग कर ही अपने विचार, आदर्श, मूल्य आदि का प्रचार प्रसार करता है और विरोधी को नुक़सान पहुंचाने (चीन विश्व में साम्यवाद फ़ैला देगा, मानों मानवता की बात मानवता के विरुद्ध होता है) में इसका प्रयोग उपयोग करता है। चूंकि इसमें भावनाओं को उभारने और बहा ले जाने की क्षमता होती है, इसीलिए यह ठोस तथ्यों और वास्तविकताओं के होने के बावजूद भी उस पर प्रभावी हो जाता है। कहा भी गया है कि दिमाग हमेशा दिल से हार जाता है, अर्थात तथ्य, तार्किकता एवं वैज्ञानिकता समेकित रूप में भी सदैव भावनाओं से हार जाता है। इसीलिए जनता को अपने पक्ष में करने के लिए मुद्दों को भावनात्मक बनाया जाता है और भावनात्मक रूप से प्रस्तुत भी किया जाता है। मानव अपनी इच्छाओं और आवश्यकताओं को भी भावनात्मक बातों में भूल जाता है (जैसे धर्म के सामने गरीबी का प्रसंग निरर्थक हो जाता है) , यानि उसे भी प्राथमिकता नहीं देता है।

किसी की संस्कृति उसके इतिहास से निश्चित और निर्धारित "ऐतिहासिक अवबोध" होता है, और यही ऐतिहासिक अवबोध संस्कार उत्पन्न करता है। और इसीलिए संस्कृति में भावनात्मक मुद्दे उभारने की क्षमता और योग्यता होती हैं। संस्कृति में तथाकथित धर्म भी होता है, प्रजाति भी होता है, जाति यानि समुदाय भी होता है, परम्परा एवं रीति रिवाज भी होता है। इस संस्कृति में विशालता, व्यापकता और गहानता लिए विरासत भी होता है। इस तरह संस्कृति जड़ता (Inertia) पैदा करता है, यानि समाज और समुदाय की सापेक्षिक स्थिति में स्थिरता देता है। यानि यदि वह गतिमान है, तो गति की अवस्था बनाए रखेगी, और यदि वह स्थिर है, तो स्थिरता की अवस्था बनाए रखेगी। इसे ही "सांस्कृतिक जड़ता" (Cultural Inertia) कहते हैं। इसी सांस्कृतिक जड़ता के गुण विशेषताओं का उपयोग कथानक में किया जाता है, और तब यह कथानक भयानक भावनाओं का उभार भूखो और नंगों में भी कर देता है। यही कथानक लोगों में डर और लालच भी पैदा कर देता है। धर्म यानि सम्प्रदाय, भाषा, क्षेत्र एवं समुदाय आदि इसी कारण भावनात्मक सैलाब लाता है। इसे समझ कर इसका उपयोग दुरुपयोग किया जा सकता है। इसीलिए व्यवस्था को अपने विचार धारा के अनुकूल इतिहास को बनाना पड़ता है। चूंकि सामान्य जन में आलोचनात्मक विश्लेषण और चिंतन नहीं होता है, इसलिए हर इतिहास उसके लिए प्रामाणिक और वैज्ञानिक होता है। इसीलिए इतिहास को बदलना पड़ता है।

संयुक्त राज्य अमेरिका की प्रथम महिला एलिनोर रूज़वेल्ट (Eleanor Roosevelt), जो राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डि रूज़वेल्ट की पत्नी थी, ने एक बार कहा था - छोटे लोग यानि छोटे विचारक व्यक्तियों का वर्णन ज्यादा करते हैं, मध्यम दर्जें के लोग यानि विचारक घटनाओं का ब्यौरा ज्यादा देते हैं, और बड़े विचारक आदर्शों, सिद्धान्तों और मूल्यों की बात ज्यादा करते हैं। अर्थात यह बढ़ते हुए यानि चढ़ते हुए क्रम में Individual, Incidence, Ideas (3 I's) के स्तर का निर्धारण करता है। तय है कि समाज में साधारण लोग ही अधिसंख्यक होते हैं और वे किसी व्यक्ति विशेष की चर्चा, यानि गुणगान एवं आलोचना में ही डूबे रहते हैं, और ऐसे लोग व्यक्ति वर्णन आधारित (जैसे मोहनलाल का तथाकथित कृतत्व) कथानक में आसानी से बहा लिए जाते हैं। समाज में मध्यम दर्जें के लोग अपेक्षाकृत बहुत कम होते हैं, और इसीलिए इनके मानसिक स्तर के अनुरूप इनको बहाने के लिए, यानि तैरने का अहसास दिलाने के लिए घटनाओं के "ब्यौरात्मक वर्णन" (Detailed Discription) की आवश्यकता होती है और ऐसी ही कथानक (जैसे कोई पुलिसिया या सैन्य कार्रवाई) बनानी पड़ती है। बड़े लोग यानि बड़े चिंतक एवं विचारक इस मानसिक स्तर के होते हैं कि किसी भी प्रकार की चटपटी कथानक उनकी आलोचनात्मक विश्लेषण, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और विवेकशील चिंतन के गर्मी में ठहर नहीं पाता और उसके वास्तविक प्रयोजन को जान लिया जाता है। एक शानदार कथानक बनाने में उपरोक्त स्तर और उनके मनोविज्ञान का ध्यान रखना पड़ता है। 

हमें कथानक गढ़ने और उसकी क्रियाविधि को समझने के लिए Institute of Propaganda Analysis के अध्ययन का भी एक अवलोकन अवश्य किया जाना चाहिए। यह संस्था अमेरिका में द्वितीय विश्व युद्ध के समय स्थापित किया गया था, जिसका उद्देश्य प्रचारित और प्रसारित कथानकों यानि प्रोपेगैंडा (Propaganda) की वास्तविकता को समझने के लिए किया गया था। इसे आप सामान्य जन में आलोचनात्मक विश्लेषण और चिंतन विकसित करना कह सकते है, जिसकी आवश्यकता आज़ भारत को भी है। इसे समझ कर कोई अपने मन या लक्ष्य के अनुरूप कथानक तैयार कर सकता है। यह सभी को अपने पारिस्थितिकी, अपनी परिस्थितियों, और अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप कथानक को तैयार करने में सहायता करेगा। इसमें कथानक को प्रचारित और प्रसारित करने की सात तकनीक बताई गई है, जिसे 1. Name - Calling, 2. Glittering Generality, 3. Transfer, 4. Testimonial, 5. Plain Folks, 6. Card Stacking, and 7. Bandwagon के नाम से जाना जाता है। 'वोल्गा मैया' ने बुलाया है, ' बिरयानी' की खुशबू ने पुकारा है, गरीबी को मिटाना है, धर्म ख़तरे में है (मानो इसके अनुयाई उनके ईश्वर से भी ज्यादा ताकतवर हो गए हैं और उनका ईश्वर धर्म बचाने सक्षम में नहीं है)वह गया (नगर) गुजरा आदमी है (मानों गया एक अपवित्र नगर है और उससे गुजरने वाले निकृष्ट लोग हैं), आदि आदि कई कथानकों के उदाहरण हैं। जब आप इन सातों तकनीकों का ध्यान पूर्वक अध्ययन करेंगे तो आपको समझ में आएगा कि कुछ प्रभावशाली राजनीतिक समूह भी इसका प्रभावपूर्ण उपयोग या दुरुपयोग आज कर रहे हैं।

वही शासन करता है, या कर रहा है, जिसे कथानक यानि Narratives गढना आता है। यदि आपकों भी शासक बनना है, या शासक वर्ग बनना है, तो आप भी कथानक की अवधारणा और क्रियाविधि को समझिए। और विश्व व्यवस्था पर शासन कीजिए। समझने के लिए, हो सकता है, इसे एक से अधिक बार पढ़ना पड़े। अन्यथा आप शासक बनने के दौर में घिसटते रहेंगे।

आचार्य प्रवर निरंजन  

(आप मेरे अन्य आलेख niranjan2020.blogspot.com पर अवलोकन कर सकते हैं)

शुक्रवार, 14 जुलाई 2023

सांस्कृतिक साम्राज्यवाद और धर्म

(Invisible Mechanism of Cultural Imperialism n Religion)

सांस्कृतिक साम्राज्यवाद (Cultural Imperialism) और किसी भी धर्म को समझने से पहले हमें साम्राज्यवाद की अवधारणा को समझना चाहिए। साम्राज्यवाद वह दृष्टिकोण (perspective) है, या क्रियाविधि (mechanism) है, या व्यवहार (practice) है, जिसके अनुसार कोई महत्त्वाकांक्षी समाज या वर्ग या राष्ट्र अपनी शक्ति, प्रभाव , नियंत्रण, लाभ और गौरव को बढ़ाने के लिए अन्य दूसरे के प्राकृतिक और मानवीय संसाधनों पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लेता है, और अपने निजी स्वार्थ में उनका उपयोग करता है। यह हस्तक्षेप, प्रभाव या नियंत्रण राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक या अन्य किसी भी प्रकार का या स्वरुप में हो सकता है। साम्राज्यवाद के सांस्कृतिक स्वरुप के अलावा अन्य स्वरुप सर्वज्ञात और दृश्य भी होता है। और जब कोई साम्राज्यवाद अपने को किसी सांस्कृतिक आवरण मे छुपा लेता है, तो वह सांस्कृतिक साम्राज्यवाद हो जाता है। 

लेकिन सांस्कृतिक साम्राज्यवाद का एक महत्वपूर्ण स्वरुप ही आजकल "प्रचलित धर्म" कहलाता है। सामन्तवाद और साम्राज्यवाद की संस्कृति को मानव, समाज, संस्कृति और मानवता के लिए सदैव नकारात्मक और विध्वंसात्मक माना जाता रहा है। हमें इस महत्वपूर्ण और प्रभावशाली कारक "संस्कृति" को ही साकारात्मक, रचनात्मक और सृजनात्मक बनाना है, जो मानवता का संवर्धन करता रहे। यह सामन्तवाद और साम्राज्यवाद ही उन व्यापक समाजों में "सामाजिक पूंजी" (Social Capital) और "सांस्कृतिक पूंजी" (Cultural Capital) का निर्माण नहीं होने देता। पूंजी वह धन है, जो उत्पादक (Productive) होता है। यह पूंजी अपने गुणात्मक प्रभाव में वित्तीय एवं अन्य पूंजी से कम महत्वपूर्ण नहीं है।

सांस्कृतिक साम्राज्यवाद का यह स्वरूप भी अदृश्य होता है, या अदृश्य बना दिया जाता है। आर्थिक साम्राज्यवाद में क्रमानुसार  वणिक साम्राज्यवाद, औद्योगिक साम्राज्यवाद और वित्तीय साम्राज्यवाद शामिल होता है। इस तरह आर्थिक साम्राज्यवाद का आधुनिक स्तर 'वित्तीय साम्राज्यवाद' भी अदृश्य होता है, या अदृश्य बना दिया जाता है। हालांकि सांस्कृतिक साम्राज्यवाद और वित्तीय साम्राज्यवाद का प्रभाव सबसे ज्यादा व्यापक, विस्तृत, गंभीर एवं खतरनाक स्वरुप का होता है।  लेकिन सांस्कृतिक साम्राज्यवाद "प्रचलित धर्म" के आवरण (veil) में सदियों तक निरंतरता और प्रभाव रखतीं हैंजिससे वह सनातन भी हो जाता है, या ऐसा कहने का दावा किया जाता है। धार्मिक आवरण के कारण ही साम्राज्यवाद के इस मौलिक स्वरूप की ओर किसी का ध्यान  ही नहीं जाता, लेकिन जिनका ध्यान जाता भी है, तो वे समाज के प्रभुत्व सम्पन्न समुदाय के होते हैं और वे निजी वर्ग स्वार्थ में चुप रहते है।

विश्व में आज जितने भी अविकसित या तथाकथित विकासशील देश हैं, यानि वर्तमान संसाधनों के बावजूद अपेक्षाकृत बहुत पिछड़े हुए हैं, वह सभी इन्हीं सांस्कृतिक साम्राज्यवाद के मारे हुए हैं। सांस्कृतिक साम्राज्यवाद तो सदैव धार्मिकता का आवरण ओढ़े ही रहता है, और इसी स्वरुप में वह क्रियाशील भी रहता है। धार्मिकता का आवरण दे देने से उपनिवेशित, यानि शोषित भी इसे अपना धार्मिक कर्तव्य समझ कर पूर्ण मनोयोग और समर्पण से उन कार्यों को करता रहता है, जो उन्हें मानवता के लिए नहीं करना चाहिए। तब वह किसी भी प्रकार के साम्राज्यवाद का शिकार भी है, सामान्यतः ऐसा वह मानने को भी तैयार नहीं होता है, खासकर जब साम्राज्यवादी तथाकथित अपने ही हों। ऐसा करना यानि धर्म के नाम पर दिए गए निर्देशों का अनुपालन करना तो उसके लिए अगले जन्म में बेहतर परिणाम या स्वर्ग पाने के लिए भी आवश्यक होता है, जो पूर्णतया काल्पनिक होता है। आधुनिक विज्ञान तो इन बकवास अवधारणाओं को कतई मान्यता नहीं देता है। तब यह सब उसका सांस्कृतिक विरासत और गौरवमयी हो जता है।

अपने मौलिक चरित्र और क्रियाविधि में समानता रखते हुए भी साम्राज्यवाद जहां आधुनिक युग की अवधारणा है, वहीं सामन्तवाद मध्ययुगीन अवधारणा है। साम्राज्यवाद जहां दूसरे राष्ट्रीयता के लोगों पर आरोपित किया जाता है, सामन्तवाद में अपने - पराए की कोई बाध्यता नहीं होती है, यानि अधिकांशतः अपने ही लोग इसके शिकार होते हैं या प्रताड़ित हैं। सांस्कृतिक सामन्तवाद ही आधुनिक परम्परागत धर्म है, जबकि सांस्कृतिक साम्राज्यवाद अपने में सांस्कृतिक सामन्तवाद को भी शामिल करते हुए इससे विस्तृत अवधारणा है। सांस्कृतिक सामन्तवाद की कोई चर्चा ही नहीं होती है, क्योंकि इसी के साथ परम्परागत वर्तमान धार्मिक सम्प्रदाय अस्तित्व में आए हैं, जबकि सांस्कृतिक साम्राज्यवाद में सिर्फ साम्राज्यवादी देशों के सांस्कृतिक प्रसार और फैलाव को ही ध्यान में रखा जाता है। ध्यान रहे कि दोनों के मौलिक चरित्र और क्रियाविधि की वैसी चर्चा नहीं की जाती है, जिससे समाज के स्थापित परम्परागत समृद्ध और प्रभावशाली वर्गीय हितों को नुक़सान होता है। 

इसीलिए कई संस्कृतियों में यह  दोनों ही, अर्थात सांस्कृतिक सामन्तवाद और सांस्कृतिक साम्राज्यवाद एक ही होता है, जैसे वर्तमान भारतीय संस्कृति की अवस्था। इन दोनों अवस्था में सामन्तवादी और साम्राज्यवादी भी भारतीय ही हैं और इससे पीड़ित भी भारतीय ही है। सबसे बड़ी बात यह है कि इनके सामान्य ऐतिहासिक युग बीत जाने पर भी इसे मिथकों और कहानियों के सहारे आज़ भी जीवन्त बनाए रखा गया है। अर्थात इनकी प्रसारित ऐतिहासिक वास्तविकता वह नहीं है, जिसे बताया जाता है। इसी मिथकीय कहानियों को ही इतिहास मानकर इतिहास के प्रोफेसर और विशेषज्ञ हवाई काल्पनिक युद्ध भी कर रहे हैं और उसे जीतने का स्वप्न भी देख रहे हैं, जो कभी इतिहास ही नहीं था। इसे फिर से और ध्यान से पढ़ा जाय

ज्ञात कभी अज्ञात को नहीं जान सकता। ज्ञात केवल उसी को जान सकता है, जिसे उसने सीखा है, संचित किया है और समझा है। अज्ञात को जानने के लिए हमें संदर्भ बदलना ही पड़ता है, पृष्ठभूमि बदलना पड़ता है, परिभाषा यानि अवधारणा बदलना पड़ता है और संरचनात्मक  ढांचा भी बदलना पड़ सकता है। ऐसा बदलना ही "पैरेडाईम शिफ्ट" (Paradigm Shift) कहलाता हैं। रिक्तता, शून्यता, मौन, और उत्सुकता ही सृजन का, निर्माण का और विकास का आधार होता है, इसके बिना सृजन संभव नहीं है। अतः किसी भी परम्परागत और सनातन समस्या का समाधान इसी विधि से किया जा सकता है, किसी भी ज्ञात के आधार पर शताब्दियों की परम्परागत समस्या का समाधान नहीं किया जा सकता है, जिसे अभी तक नहीं पाया गया है।

संस्कृति हमारे विचारों, आदर्शों, मूल्यों, प्रतिमानों, व्यवहारों, परम्पराओं को नियंत्रित, निर्देशित, नियमित, संचालित और प्रभावित करता रहता है। यह समय के साथ विकसित होता है और इसके साथ इतिहास भी होता है और मिथक कहानियां भी होती है। फिर यह संस्कृति धर्म के आवरण में आ जाती है या लाई जाती है, और तब यह पवित्र भी हो जाती है। जब इसमें धर्म आ गया, तो यह जड़ भी हो जाता है और फिर इस पर कोई प्रश्न या शंका करना उस स्थापित संस्कृति के ही विरुद्ध हो जाता है, माना जाता है। 

जब कोई भी चीज जड़ (Stagnant) हो जाता है, तब उसमें जडत्व (Inertia) आ जाता है और 'जडत्व की शक्ति' (Power of Inertia) उसे उसके वर्तमान की स्थिति में ही बनाए रखती है। यही जडत्व यानि जड़ता इसमें निरंतरता देती है। इसे ही सांस्कृतिक जड़ता (Cultural Inertia) कहते हैं। यही निरंतरता बनाए रखती है। इससे ही जडत्व में स्वत: स्फूर्तता आ जाती है। इस तरह सामन्तवाद और साम्राज्यवाद अपने सांस्कृतिक और फिर धार्मिक आवरण में क्रियाशील रहता है। यदि यह व्यक्ति, समाज, संस्कृति सकारात्मक, रचनात्मक और सृजनात्मक नहीं है, तो हमें उसे ऐसा यानि सकारात्मक, रचनात्मक और विकासात्मक बनाना है। यह सामान्य समाज में व्यापक 'सामाजिक पूंजी' और 'सांस्कृतिक पूंजी' का निर्माण नहीं होने देता।

एक मनुष्य या समाज को अपने समस्याओं के समाधान के लिए अनुक्रिया और प्रतिक्रिया की क्रियाविधि को समझना जरूरी होता है। यह सिर्फ़ अपने वातावरण और विविध प्रतिक्रियाओं का ही परिणाम नहीं है, अपितु वह अनन्त प्रज्ञा से भी संबंधित कर आभास के रूप में भी समाधान प्राप्त करता है। वह वातावरण से अपने पांच शारीरिक इन्द्रियों के माध्यम से और "मन" की 'मानसिक दृष्टि' (vision) से ही अनुभूति प्राप्त करता है। वह अपने वातावरण को अपने इन्द्रियों से प्रत्यक्ष अनुभूति प्राप्त कर सकता है, लेकिन अनन्त प्रज्ञा से जुड़ कर और उसे नियंत्रित करने के लिए उसे अतिरिक्त प्रयास करना होता है, जो एक कौशल है और इसे कोई भी विकसित कर सकता है। जब किसी का मन (Mind) यानि उसके 'आत्म' (Self) अनन्त प्रज्ञा से जुड़ता है, तो उसे ही आध्यात्म कहते हैं, और प्राप्त ज्ञान को 'आभास' (Intuition) कहा जाता है।

जीवन में विकास या उद्विकास के त्रिस्तरीय आयाम होता है, प्रथम शारिरिक, द्वितीय मानसिक और तृतीय आध्यात्मिक। शारीरिक विकास या उद्विकास सामान्यतः प्राकृतिक रूप में होता है और इसके लिए एक मानव को कम क्रियाशील रहना होता है। मानसिक विकास यानि  मानसिक उद्विकास एक कौशल है और उसके प्रभाव को बढ़ाने के लिए उसे कौशल की तरह ही विकसित करना होता है, जिसे कोई भी विकसित कर सकता है। ज्ञान का उच्चतर अवस्था आध्यात्मिक होता है, या कहलाता है। किसी के आत्म को अनन्त प्रज्ञा से संबंधित होने को ही अध्यात्म कहा जाता है। इस तरह आध्यात्मिक विकास भी एक कौशल ही है, जो मानवता सहित प्रकृति के विकास के लिए सजगता से प्रयास किया जाता है। इसलिए हमें किसी के शारीरिक विकास से तुलनात्मक विश्लेषण नहीं करना चाहिए एवं निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए, सिर्फ अपना मानसिक और आध्यात्मिक विकास करना चाहिए।

हमें संस्कृति से सांस्कृतिक साम्राज्यवाद और सामन्तवाद के प्रभाव को हटा देना चाहिए। इसके लिए इतिहास से मिथकीय कहानियों को हटाना होगा। इसके लिए पुख्ता प्रामाणिक और वैज्ञानिक साक्ष्यों को ही मान्यता देकर इतिहास को समझना होगा, बाकी सब कथामात्र है। वह सामन्तवाद की यानि मध्य युगीन ऐतिहासिक आवश्यकता के कारण ऐतिहासिक प्रतिफल था। पुनर्जागरण के द्वारा यूरोप में इसके इन्हीं प्रभावों को समाप्त कर यूरोप में वास्तविक आधुनिक और वैज्ञानिक युग को लाना संभव किया। परन्तु पश्चिम मध्य एशिया, पूर्वी एशिया और भारतीय उपमहाद्वीप में यह अभी भी मध्ययुगीन संस्कृति को यथावत बनाए हुए है। इस सनातन, पुरातन और गौरवशाली संस्कृति के आवरण में मौजूद सामन्तवादी और साम्राज्यवादी व्यवस्था को ध्वस्त किए जाने की आवश्यकता है। इसके बिना समाज और संस्कृति में वैज्ञानिक मानसिकता, आलोचनात्मक विश्लेषण एवं चिन्तन और विकासात्मक विचारधारा का समुचित विकास नहीं हो सकता है।

इसे ध्यान से पढ़ा जाय। किसी भी समाज, संस्कृति और इतिहास के पिछड़ेपन का मौलिक चरित्र और क्रियाविधि को समझा जाना अनिवार्य है। विरासत की निरंतरता होनी चाहिए, लेकिन मिथकीय कहानियों को इतिहास के रूप में निरंतरता नहीं होनी चाहिए। इतिहास ऐतिहासिक शक्तियों का ही परिणाम होता है। इसी में समाधान है। वैसे आज के आधुनिक, लोकतांत्रिक और वैज्ञानिक युग में यह सांस्कृतिक साम्राज्यवाद और सांस्कृतिक सामन्तवाद दरकता हुआ है और नष्ट होता हुआ है, सिर्फ एक धक्के लगाने की आवश्यकता है।

आचार्य प्रवर निरंजन जी

 

मंगलवार, 4 जुलाई 2023

साहित्य ज्ञान का केवल एक स्रोत ही नहीं है, साथ ही यह नैतिक और सामाजिक क्रिया का भी एक रूप है|

भाषा विज्ञान में यानि भाषा के सुव्यवस्थित ज्ञान में साहित्य का बहुत ही अधिक महत्त्व है| एक होमो सेपियंस को एक पशु मानव से अलग करने में भाषा और साहित्य का ही योगदान है, जिसने एक पशुवत मानव को एक सामाजिक मानव (Homo Socious) एवं तकनिकी मानव (Homo Faber) बनाया है| वस्तुत: “साहित्य” शब्द ‘सामाजिक’ ‘हित’ का ‘कृत्य’ (सा + हि + त्य) ही है| लेकिन साहित्य को समग्रता और व्यापकता में समझने के लिए हमें भाषा के उद्विकास (Evolution) को समझना होगा|

जब आदि काल में आदि मानव अपने किए गये शिकार को आग में पकाने के लिए, या ठण्ड या हिंसक पशुओ से बचने के लिए आग को घेर कर बैठने लगा, तब ही मानव में ‘विमर्श’ की प्रक्रिया शुरू हुई| विमर्श मन के सोच पर फिर से सोचना और उसे आपस में साझा करना हुआ, यानि ‘विचार विमर्श’ शुरू हुआ| इससे मानव में संज्ञानात्मक क्रान्ति (Cognitive Revolution) हुई, यानि एक मानव अपने आस पास के चीजों को समझने लगा, विमर्श करने लगा, उस पर मनन मंथन करने लगा, किसी अंतिम निष्कर्ष पर आने लगा और उसे सप्रेषित भी करने लगा|

इसी काल में मानव ने गुफाओं में अपने विचारों एवं भावनाओं को रेखांकन के रूप में व्यक्त करना शुरू कर दिया| इसी से लिपि का आदि स्वरुप उत्पन्न हुआ, जो संशोधित और संवर्धित होते हुए आधुनिक ‘लिपि’ के स्वरुप में आया| विशिष्ट ध्वनि के उद्गार से 'अक्षर' एवं ‘शब्द’ बने और शब्दों के समूह से ‘वाक्य’ बने| इसी के संयुक्त स्वरुप ने आदि स्वरुप में ‘बोली’ (Dialect) को जन्म दिया एवं प्रचलित किया| लेकिन किसी ‘बोली’ का प्रभाव क्षेत्र अत्यंत सीमित होता है| और सुव्यवस्थित व्याकरण के नियमों के अभाव में किसी भी ‘सन्देश’ या ‘समाचार’ के अर्थ का सम्प्रेषण दुसरे छोर पर वही नहीं हो पाता है, जो ‘सन्देश’ या ‘समाचार’ जारी करने वाला देता है| इसने शब्दों, वाक्यों एवं अभिव्यक्ति के सुस्पष्ट नियमों की आवश्यकता जताई|

इस तरह भाषा के सुस्पष्ट नियमों, जिसे व्याकरण भी कहा जाता है, के साथ ‘राजकीय भाषा’ की उत्पत्ति हुई| सुस्पष्ट व्याकरण के नियम और व्यवस्थित लिपि के साथ ही सामाजिक सन्दर्भो को भी भाषा के माध्यम से अभिव्यक्त किया जाने लगा| इसी के साथ भाषा ‘साहित्य’ के स्तर पर पहुँच जाता है| जब एक भाषा अपने साहित्य के द्वारा समाज में विकसित हो रहे विज्ञान, अभियंत्रण एवं तकनिकी को भी अभिव्यक्त करने, संरक्षित करने एवं संप्रेषित करने लगता है, तो एक भाषा अपनी उत्कृष्टता के शिखर को पा लेता है| कभी कभी किसी भी भाषा को जन सामान्य की पहुँच से बाहर कर देना होता है, तो उसे अलंकृत एवं तथाकथित रूप में संस्कारित कर समाज के विशिष्ट एवं तथाकथित उत्कृष्ट लोगों की भाषा बना देनी पड़ती है| विश्व की किसी भाषा के उद्विकास के क्रम में यदि कोई कड़ी लुप्त है, तो उसमे अवश्य ही कोई साजिश है, या कोई फर्जी कहानी है|

इस तरह हम पाते हैं कि जब कोई भाषा समाज के हितों के संरक्षण, समर्थन, संवर्धन एवं विकास के लिए समर्पित होता है, तब वह भाषा उसे विश्व पटल पर किसी उत्कृष्ट साहित्य के रूप में प्रस्तुत कर पाता है| सामाजिक व्यवस्था के लगातार संवर्धन एवं विकास के लिए ज्ञान का नैतिक होना, विवेकपूर्ण होना, तार्किक होना, व्यवस्थित होना और उसे समाज के लिए समर्पित होना अनिवार्य है| यदि साहित्य समाज के हितों के अनुरूप भाषा को दिशा नहीं देगा, तो वह साहित्य विध्वंसात्मक हो जायगा और ‘साहित्य’ के सम्मान से वंचित भी रह जायगा| समाज के हितों के अनुरूप ही भाषा को दिशा देना ही ‘नैतिकता’ का अनिवार्य कार्य या दायित्व है|

नैतिकता सामाजिक मान्यताओं पर आधारित सामाजिक मूल्यों एवं प्रतिमानों की प्रणाली का आदर्श या मानक होता है, जिसके द्वारा किसी मानव या समूह के कार्य को सही या गलत, यानि उचित या अनुचित माना जाता है| जब एक साहित्य समाज के हितो के लिए ही कृत्यों को सुनिश्चित करता हो, तो वह अवश्य ही ‘नैतिक’ होगा| सामाजिक नैतिकता को ही मानवीय गुण यानि धर्म कहा गया है| इस तरह नैतिकता में मानव, समाज, मानवता और प्रकृति के हित लाभ भी समाहित हो जाता है, क्योंकि ये सभी एक दुसरे से गुंथे हुए हैं और एक दुसरे पर निर्भर भी हैं|

एक साहित्य का विविध स्वरुप हो सकता है, जो अभिव्यक्ति के स्वरुप के अनुसार भिन्न भिन्न तरह से व्यक्त हो सकता है, परन्तु सबके मूल आधार में समाज के हितों का संवर्धन और विकास ही होगा| वह विश्लेषण हो सकता है, विवेचना हो सकता है, मूल्याङ्कन हो सकता है, व्यक्तित्व या घटनाओं का विवरण हो सकता है, या आदर्शों एवं सिद्धांतों का प्रतिपादन हो सकता है, या किसी समस्या का समाधान प्रस्तुत करता हुआ हो सकता है, लेकिन यदि इनमे सामाजिक हितों का संवर्धन मूलाधार नहीं है, वह अवश्य ही साहित्य का सम्मान नहीं पा सकता है|  

स्पष्ट है कि साहित्य ज्ञान या सूचना का केवल एक स्रोत ही नहीं है, साथ ही यह नैतिक और सामाजिक क्रिया का भी एक रूप है, सही एवं तथ्यपरक वक्तव्य है| इससे असहमति नहीं जताई जा सकती है|

आचार्य निरंजन सिन्हा  

(मेरे अन्य आलेख के लिए आप www.niranjansinha.com पर अवलोकन कर सकते हैं)

‘धर्म के बिना विज्ञान नांगर छै, विज्ञान के बिना धर्म आन्हर छै|”

 (धर्म के बिना विज्ञान लंगड़ा है, विज्ञान के बिना धर्म अन्धा है|)

यह बिहार एवं अन्य प्रान्तों में प्रचलित एक लोकोक्ति है, जिसका शाब्दिक अर्थ है कि धर्म और विज्ञान एक दुसरे के बिना विकलांग है| अर्थात एक दुसरे का पूरक है, यानि एक दुसरे के बिना अधुरा है| यह उक्ति अपनी सत्यता को प्रमाणित करने के लिए ‘धर्म’ एवं ‘विज्ञान’ की अवधारणा पर आधारित है, यानि ‘धर्म’ एवं ‘विज्ञान’ की परिभाषाओं पर निभर है| इन दोनों की अवधारणा यानि परिभाषा बदल जाने से ही यह उक्ति सत्य हो जाती है, या असत्य हो जाती है|

तो हमें सबसे पहले ‘धर्म’ एवं ‘विज्ञान’ की अवधारणा को समझना चाहिए, यानि इसका आलोचनात्मक विश्लेषण करना चाहिए| धर्म को पालि में ‘धम्म’ कहा गया और हिंदी एवं संस्कृत में ‘धर्म’ ही है| इस तरह इन दोनों शब्दों का अर्थ या भावार्थ एक ही है| पालि में ‘धम्म’ को इस तरह परिभाषित किया गया है – “धारेति ति धम्मो”| अर्थात जो धारण करने योग्य है, यानि जो धारणीय  है, वही धम्म है, यानि धर्म है| यह व्यापकता एवं विशालता को अपने में सहेजे हुए एक अद्भुत अवधारणा है, जिसमे सजीव एवं निर्जीव सहित मानव भी समाहित हो जाता है| एक धातु का धर्म है – उष्मा एवं विद्युत का संचरण अपने से होने देना| पानी का धर्म है – शीतलता प्रदान करना, जिस पात्र में यह धारित है, उसका आकार ले लेना, और आग को बुझा देना| यह धर्म का एक व्यापक परिभाषा है, जो स्थान एवं समय के निरपेक्ष सत्य एवं स्थिर है| इसी तरह एक मानव का ‘धारणीय गुण’ यानि ‘धर्म’ होगा कि वह समाज, मानवता एवं प्रकृति के संरक्षण, संवर्धन एवं विकास के लिए कार्य करे, और कोई ऐसा कर्म, व्यवहार एवं मानसिकता नहीं रखे या करे, जो समाज, मानवता एवं प्रकृति के हितो के विरुद्ध हो|

स्पष्ट है कि जब एक धर्म स्थान एवं समय के निरपेक्ष सत्य और स्थिर है, तो यह अवश्य ही तर्कसंगत होगा, विवेकशील होगा, तथ्यपरक होगा और निश्चितया वह वैज्ञानिक भी होगा| तो प्रश्न यह उठता है कि जब एक धर्म स्थान एवं समय के निरपेक्ष सत्य और स्थिर है, तब विश्व में इतने धर्म प्रचलित हैं, वे क्या हैं? दरअसल ये सभी सम्प्रदाय हैं, विश्व के सभी मानवों का तो धर्म एक ही होगा, और यह भिन्न भिन्न हो ही नहीं सकता है| किसी ‘मजलिश’ का क्षेत्रीय सांस्कृतिक आवश्यकता एवं परम्परा एक ‘मजहब’ हो सकता है, किसी ‘रीजन’ (Region) का क्षेत्रीय सांस्कृतिक आवश्यकता एवं परम्परा एक ‘रिलीजन’ (Religion) हो सकता है, परन्तु वैश्विक जगत के सम्पूर्ण मानव का धर्म तो एक ही होगा, जो समाज, मानवता एवं प्रकृति के संरक्षण, संवर्धन, और विकास के पक्ष में ही होगा| एक सम्प्रदाय क्षेत्रीय आवश्यकताओं एवं परम्पराओं से उपजी एक विशिष्ट सांस्कृतिक बुनावट (Matrix) है|

अत: एक सम्प्रदाय को धर्म से अलग कर देने से सारे सम्बन्धित धुन्ध या भ्रम समाप्त हो जाते हैं| आजकल के सम्प्रदाय को ही धर्म कह देने से ही सारी स्पष्टता समाप्त हो जाती है| दरअसल धर्म को सम्प्रदाय बना देने, यानि मान लेने से इन दोनों एक दुसरे का पर्यायवाची बना दिया गया है| इसे एक दुसरे का पर्यायवाची बना देने से इन ‘सांप्रदायिक नेताओं’ को अपने को ‘धार्मिक नेताओं’ यानि ‘धार्मिक शुभचिंतक’ के रूप में अपने को प्रस्तुत करने में आसानी होती है| फिर इस तथाकथित धर्म में ‘ढोंग’, ‘पाखण्ड’, ‘अंधविश्वास’, ‘कर्मकांड’ स्थापित करने में आसानी हो जाती है, क्योंकि तब यह मानव का धर्म बन जाता है| तब इसके समर्थन के लिए विज्ञान के विरुद्ध ‘ईश्वर’, ‘आत्मा’, ‘पुनर्जन्म’, ‘स्वर्ग नरक’ और ‘कर्मवाद’ को स्थापित करने की आवश्यकता हो जाती है| सभी वर्तमान परंपरागत ‘धर्मों’ का वर्तमान स्वरुप सामन्ती काल की ऐतिहासिक आवश्यकताओं की देन है|

आधुनिक भौतिकी “हिग्ग्स बोसॉन’ कणिकाओं को ही “गाड़ पार्टीकल” कहता है, ‘आत्म’ (Self) यानि ‘मन’ (Mind) को ‘आत्मा’ का जबरदस्ती पर्यायवाची बना दिया गया| ये ईश्वर, पुनर्जन्म और आत्मा इत्यादि कभी भी विज्ञान सम्मत नहीं हो सकते हैं| आपने भी ध्यान दिया होगा कि इन तथाकथित धार्मिक नेताओं की वैज्ञानिकता संबंधित लम्बी लम्बी बातें सिर्फ सामान्य जन साधारणों के सामने ही होती है, लेकिन इनकी वैज्ञानिकता की बातें वैश्विक वैज्ञानिकों के सामने नहीं होती है| जन साधारण में किसी भी विषय का स्तरीय आलोचनात्मक विश्लेषण की क्षमता एवं स्तर नहीं होता है| एक परंपरागत ‘धर्म’ आस्था खोजता है, और ‘शंका करना’ यानि ‘प्रश्न पूछना’ सख्त मना है|

अब हमें विज्ञान को भी परिभाषित करना चाहिए| ‘विज्ञान’ का अर्थ ही होता है – ‘विवेकपूर्ण, विचारित एवं व्यवस्थित ज्ञान’| कोई भी ज्ञान यदि सुविचारित नहीं है, व्यवस्थित नहीं है और विवेकपूर्ण नहीं है, तो वह ‘विज्ञान’ नहीं है| कोई भी ‘व्यवस्थित, सत्यापित एवं क्रमबद्ध ज्ञान’ ही ‘विज्ञान’ है|  इस तरह स्पष्ट है कि विज्ञान अवश्य ही तार्किक होगा, तथ्यपरक होगा, विवेकपूर्ण होगा, सत्यापित भी होगा, और इसीलिए वह सामान परिस्थितियों में सभी स्थानों एवं समय पर एक समान ही होगा| यह शंकाओं एवं प्रश्नों को प्रोत्साहित करता है, इसीलिए विज्ञान का विकास होता रहता है, और यह इसके मूलभूत आधार बदलने से संवर्धित होता जाता है|

स्पष्ट है कि वैज्ञानिक एवं मानवीय धर्म के आड़ में सम्प्रदाय को ही धर्म कह कर परंपरागत सांप्रदायिक नेताओं ने धार्मिक नेता के रूप में अपनी महत्व बनाने एवं बढाने के लिए ही इस लोकोक्ति को रचा है| ये साम्प्रदायिक लोग ही विज्ञान और धर्म को एक दूसरे का पूरक और अलग अलग अवधारणा साबित करना चाहते हैं, जबकि धर्म भी विज्ञान है, लेकिन सम्प्रदाय नहीं। इस तरह यह लोकोक्ति गलत है, और भ्रामक है|

आचार्य निरंजन सिन्हा  

(मेरे अन्य आलेख के लिए आप www.niranjansinha.com पर अवलोकन कर सकते हैं)

सोमवार, 3 जुलाई 2023

मूर्तियों का मनोविज्ञान

आपने ध्यान दिया है कि आजकल फिर से मूर्तियाँ बनाने का एक प्रतियोगियात्मक अभियान चला हुआ है, भव्य मूर्तियाँ, विशाल मूर्तियाँ, ऊँची मूर्तियाँ, महँगी मूर्तियाँ , आदि आदि, यानि मूर्तियों में कोई अलग एवं विशिष्ट विशेषण लगी हुई मूर्तियाँ| ये मूर्तियाँ क्या काम करती है, यानि जन मानस पर कैसा प्रभाव डालती है, या सामान्य मानवों को हांक लिए जाने में कैसे उपयोगी होती है? आप भी सोसल मीडिया में मूर्तियों की विशद, गहन एवं महत्वपूर्ण चर्चा देख्ते होंगे, तो आप यह भी समझने का प्रयास कीजिए, कि ऐसे लोगों का मानसिक स्तर क्या है? क्या ये लोग किसी के द्वारा हांक लिए गए लोग हैं? क्या इन पर मूर्तियों का मनोविज्ञान काम कर रहा है? दरअसल मूर्तियों का मनोविज्ञान का प्रभाव कोई साधारण नहीं है, ये लोग तो मूर्तियों के मनोविज्ञान पर मस्त होकर थिरक भी रहे हैं|

तो इस महत्वपूर्ण मनोविज्ञान को हर किसी भी बुद्धिजीवी को, प्रशासक को, या राजनीतिज्ञ को जानना और समझना चाहिए, या यों कहे इसका उपयोग किया जाना चाहिए| जब चतुर - चालाक इस मनोविज्ञान का उपयोग कर रहे हैं, और आप भी यदि बुद्धिजीवी हैं, इस मनोविज्ञान को अवश्य ही समझें| इस मनोविज्ञान को जब आप समझ लेंगे, तो आप भी जन सामान्य को हांक ले सकते हैं| वैसे मूर्तियों के सामान्य उपयोग, जैसे ध्यान लगाना, आदर्श मानना, अनुकरणीय उदहारण के रूप में प्रस्तुत करना इत्यादि की चर्चा मैं नहीं करूंगा, वह आप जानते ही हैं| मैं इसके अलावा अन्य अनछुए पहलुओं पर आपका ध्यान खींचूंगा|

मूर्तियों का भी मनोविज्ञान होता है| हालाँकि यह बहुत से लोगों को अटपटा लग सकता है, जिन्हें अपने वर्तमान ज्ञान के क्षितिज से बाहर हर चीज को नए ढंग से देखने में असहजता महसूस होती है| मूर्तियाँ बनाने का एक लम्बा इतिहास है और मूर्तियाँ कुछ विशिष्ट एवं ख़ास लोगो की बनाई जाती है| दरअसल मूर्तियों में तो न ही मन यानि चेतना होता है और न ही दिमाग यानि मस्तिष्क होता है, तो फिर मूर्तियों का मनोविज्ञान क्या हुआ? लेकिन जैसे धन का, विज्ञान का, सफलता का आदि आदि का मनोविज्ञान होता है, तो वैसे ही हमलोग एक अनछुए पहलु – मूर्तियों का मनोविज्ञान समझते हैं|

दरअसल मूर्तियों के बहाने मानव मन पर कुछ लोगो द्वारा क्रिया एवं प्रतिक्रिया किया जाता है और प्रक्रिया एवं प्रतिक्रिया लिया जाता है, इसीलिए मूर्तियों का मनोविज्ञान हुआ| मूर्तियों को देखना, समझना, पूजना, फूलमाला चढ़ाना, बनाना और अन्य कई कार्य मानव द्वारा ही किए जाते हैं, और एक मानव में ही मन भी होता है, दिमाग भी होता है और उसे करने या अभिव्यक्त करने के लिए एक भौतकीय शरीर भी होता है| यह सब एक सामान्य शारीरिक मानसिक विशेषताओं से युक्त एक मानव ही करता है, तो अवश्य ही वह मनोविज्ञान के तत्व एवं क्रिया से संचालित, नियंत्रित, निदेशित एवं प्रभावित भी होगा|

तो सबसे पहले हमें मनोविज्ञान की और मूर्तियों की अवधारणा को जानना एवं समझना चाहिए| मनोविज्ञान मानव मन यानि आत्म (आत्मा नहीं) यानि चेतनता का अध्ययन है| इस तरह मनोविज्ञान मानसिक प्रक्रियाओं, अनुभवों एवं विभिन्न सन्दर्भों में व्यवहारों का अध्ययन है| हमें मानसिक (मन – Mind की) क्रियाओं और मस्तिष्क (दिमाग – Brain) की क्रियाओं को एक नहीं मानना चाहिए| एक मस्तिष्क किसी के मन, यानि आत्म, यानि चेतनता की उत्सर्जित तरंगों का एवं अन्य तरंगों का संवर्द्धक (Modulator) होता है| मानसिक प्रक्रियाओं का आशय किसी चीज को जानने या स्मरण करने या किसी समस्या का समाधान करने की मन की क्रियाओं से है| अनुभव हमारी चेतना में रचा –बसा होता है| हमारे व्यवहार में हमारे द्वारा की गई अनुक्रिया एवं प्रतिक्रिया शामिल रहती है|

अब हमें मूर्तियों (Statue/ Sculpture) की अवधारणा को समझ लेना चाहिए| किसी की आकृति को जब तीनों विमाओं (Dimension) में अभिव्यक्त किया जाता है, मूर्ति कहा जाता है, चाहे वह वास्तविक (Real) हो या आभासी (Virtual) हो| इस तरह मूर्ति किसी की आकृति का ठोस स्वरुप में दृश्य रूप होता है| यह किसी भी पदार्थ (वास्तविक) या तरंग (आभासी) से निर्मित होता है| यह शारीरिक आँखों से हर किसी को दिख जाता है, और इसके लिए कोई मानसिक उपक्रम नहीं करना पड़ता है| इसी तरह जब कोई आकृति दो विमाओं में यानि समतल में दिखती है, उसे चित्र (Picture) कहते हैं| इस तरह मूर्तियों के मनोविज्ञान में हमें चित्र को भी समाहित कर लेना चाहिए, क्योंकि यह भी प्रक्रियाओं, अनुभवों एवं व्यवहारों में मूर्तियों के समान ही होता है|

चूँकि मनोविज्ञान में मानव मन की विभिन्न अवस्थाओं एवं क्रियाओं, अनुभवों, व्यवहारों और प्रभावों का अध्ययन किया जाता है, इसीलिए मूर्तियों के बहाने या मूर्तियों के सहारे मानव मन एवं उससे सम्बन्धित कार्यों एवं व्यवहार का अध्ययन किया जाता है| इस तरह यहाँ मनोविज्ञान के अध्ययन का मकसद मूर्तियों के सहारे मानव व्यवहार का विवरण देना, उसकी व्याख्या करना, उनके व्यवहार का पूर्वानुमान करना और उनको परिवर्तित या नियंत्रित करना होता है| यहाँ मूर्तियों के बहाने हम मानव मन का संज्ञानात्मक, भावनात्मक एवं व्यवहारात्मक प्रक्रियों समझते हैं और उसका अपने मन के अनुकूल उपयोग एवं प्रयोग करके मानव समूह को नियंत्रित एवं प्रभावित करते हैं|

अब तो यह स्पष्ट हो गया कि यह एक महत्वपूर्ण विषय है, और हमें मूर्तियों के विश्वव्यापी खेल को समझना चाहिए| सामान्यत: हमारी पांच ज्ञानेन्द्रिया हैं- आँख, कान, नाक, त्वचा एवं जीभ| इसमें मूर्तियों के सन्दर्भ में सबसे प्रमुख आँख है| लेकिन बुद्ध ने छठी ज्ञानेन्द्रिय “मन’ यानि चेतना को बताया| इसे “मानसिक दृष्टि” कहा गया| इसी का विस्तारित सातवाँ ज्ञानेन्द्रिय अधिचेतना समझाया, जिसे ‘अनन्त प्रज्ञा’ से जुड़ना भी कहते हैं| इसे ही “आध्यात्मिक दृष्टि” भी कहा जाता है|

 मूर्तियाँ किसी साधारण व्यक्ति की नहीं होती है, वह किसी विशिष्ट व्यक्ति, या किसी देव तुल्य, या किसी तथाकथित ईश्वर की ही होती है| अर्थात इनके बहुत सारे अनुयायी होते हैं| इन अनुयायियों में बहुसंख्यक (लगभग 95% से अधिक) में कोई आलोचनात्मक चिंतन का स्तर एवं क्षमता भी नहीं होता है| ये मानसिक दृष्टि में अंधापन का शिकार माने जाते है| इनकी सिर्फ शारीरिक आँखें ही काम करती है| ये किसी भी चीज का सिर्फ सतही अर्थ ही समझ सकते हैं, जो इन्हें सामान्य आँखों से दिखता है| किसी भी चीज का निहित अर्थ यानि संरचनात्मक अर्थ, यानि विशिष्ट अर्थ समझना इनके स्तर से ऊपर का होता है| यही स्थिति इनके तथाकथित बुद्धिजीवी नेताओं की भी होती है|

किसी भी विशिष्ट व्यक्ति या देव तुल्य व्यक्ति का आदर्श समझना, और उसका अनुपालन करना सबके लिए सरल, सहज एवं आसान नहीं होता है| यही स्थिति उन जन साधारण के नेतृत्वों की भी होती है, वे भी इन महान व्यक्तित्वों के आदर्शों एवं सिद्धांतों को नहीं समझते हैं| ऐसे तथाकथित ज्ञानी एवं बुद्धिजीवी नेतृत्व भी महान व्यक्तियों के जन्म तिथि, पुण्य तिथि, कर्म तिथि, गर्भधारण तिथि, प्रवेश तिथि, निकास तिथि, अपमानित कर दिए जाने की तिथि, आदि आदि के समारोहों तक अपने को सीमित रखते हैं| चूँकि ऐसे तथाकथित ज्ञानी एवं बुद्धिजीवी नेतृत्व इतना ही जानते हैं, उनके आदर्शों एवं सिद्धांतो को समझते ही नहीं हैं| अल्बर्ट आइन्स्टीन ने कहा था कि यदि कोई भी व्यक्ति किसी सामान्य जन को कोई भी बात ठीक से नहीं समझा पा रहा है, तो वह तथाकथित ज्ञानी एवं बुद्धिजीवी व्यक्ति खुद ही उसे नहीं समझा है| ऐसे ही आयोजनों एवं समारोहों से जन सामान्य उन्हें क्रान्तिकारी एवं अभूतपूर्व नेता मान लेती है, तो उन्हें भी जन सामान्य को समझाने के लिए अतिरिक्त मेहनत करने की जरुरत ही नहीं पड़ती है|

यदि आपको किसी जन समूह को अपने पक्ष में करना है, तो सबसे आसान, सरल एवं सहज तरीका है कि आप उनके किसी महान आदर्श व्यक्तित्व का भव्य, विशाल,  ऊंची एवं आकर्षक मूर्ति बनवा दीजिए और उनसे सबंधित तिथि को कोई भव्य आयोजन कर दीजिए| अब आपको उनके आदर्शों के अनुयायी मान लिए जाने का प्रमाण पत्र मिल गया| अब आप उनके किसी भी, या सभी हितों के विरुद्ध गहन एवं खतरनाक खेल सकते हैं| आप उनके आदर्शों एवं सिद्धांतों को माने या नहीं माने, या उनके धूर विरोधी ही हो, आपको सिर्फ उनसे सम्बन्धित आयोजन करना है और मिठाईयाँ बंटवा देनी है , या उनके किसी आयोजन में शामिल होकर फूलमाला, अक्षत या कोई अन्य चीज अर्पित कर देना है| अब आप बहुसंख्यको की आशंकाओं के घेरे से बाहर हो जाते हैं|

आपने गौर किया है कि विकसित समाजों में, यानि विकसित संस्कृतियों में उनकी स्मृति में विद्यालय एवं चिकित्सालय खोलने पर जोर दिया जाता है, लेकिन आलोचनात्मक चिंतन से अभावग्रस्त समाजों, यानि संस्कृतियों में भव्य, विशाल एवं आकर्षक मूर्तियों का निर्माण प्राथमिकता में होती है| ये आकर्षक, भव्य एवं विशाल मूर्तियाँ बुद्धिजीवी या प्रबुद्ध समाज या वर्ग के लिए नहीं होती है, ये जन साधारण के लिए ही होती है, चूँकि इनको इतना ही दिखता है और इतना समझ में आता है| ऐसा क्यों होता है? जिन्हें उन महान व्यक्तित्वों के आदर्शों एवं सिद्धांतों को मानने की जरुरत नहीं होती है, और उन आदर्शों एवं सिद्धांतों के विरुद्ध भी कोई काम करना है, और उनके अनुयायियों को अपने पक्ष में रखना है, तो सबसे आसान, सरल एवं सहज तरीका है – उनकी मूर्ति बनवाना और उस पर आयोजन करना एवं समारोह मानना| आप ध्यान दीजिए|

जितने भी मूर्तियों के उपासक हैं, उनको उनके आदर्शों एवं सिद्धांतों की कोई समझ ही नहीं होती है| जिन महापुरुषों ने भी स्पष्ट्या अपनी मूर्तियों के पूजन से मना कर दिया, उनके भी मूर्ति पूजन उन्ही के तथाकथित अनुयायी मना रहे हैं| इससे उन्हें उन्हें उनके गहन आदर्शों एवं सिद्धांतों पर मनन मंथन करने की जरुरत नहीं पड़ती है| यदि किसी महान पुरुष ने किसी भी विषय पर मनन "मंथन" (AGITATE) पर गौर करने को कहा, तो उनके अनुयायी उस विशेष शब्द को ही "संघर्ष" (STRUGGLE) से बदल दिया| ये तथाकथित ज्ञानी एवं बुद्धिजीवी किसी भी चीज के सतही अर्थ को ही समझते हैं, निहित या संरचनात्मक अर्थ समझना ही नहीं चाहते| ये लोग सिर्फ विशिष्ट तिथियाँ मनाते रहेंगे, मिठाईयाँ खाते रहेंगे और अपना सब कुछ बदल जाने के दिवास्वप्न में मस्त रहेंगे|

इसीलिए अल्बर्ट आइन्स्टीन ने एक बार पागलपन की परिभाषा में कहा कि “एक काम को बार बार एक ही तरीके से करना, और परिणाम के बदल जाने की उम्मीद करना ही पागलपन है”| मैं समझता हूँ कि आप अब मूर्तियों के मनोविज्ञान को समझ गए होंगे|

आचार्य प्रवर निरंजन  जी

शनिवार, 17 जून 2023

विचार जीवन का आधार है|

(यह निबंध बिहार लोक सेवा आयोग द्वारा वर्ष 2023 में आयोजित मुख्य परीक्षा से है, लेकिन इस सीरिज में आगे के निबंध इसके अतिरिक्त संघ लोक सेवा आयोग के भी होंगे| यह इस सीरीज का चौथा निबन्ध है|)

‘विचार करना ही मनुष्यता है’, और यही विचार करना ही हमें पशुओं से अलग करता है। हमारे विचार के स्तर से ही हमारे जीवन का भी स्तर निर्धारित होता है। तो हमें ‘विचार’ को समझना चाहिए| विचार क्या है? यह ‘सोच’ पर स्थिरता से ‘सोचना’ है, यानि यह अपनी ‘सोच’ पर फिर से ‘सोच’ करना ही विचार है| अर्थात ‘स्थिर सोच’ ही विचार कहलाता है| एक पशु भी चेतनशील होने के कारण ‘सोच’ सकता है, लेकिन वह अपनी सोच पर भी फिर से सोच करना नहीं जानता है, और इसी कारण वह एक पशु है| यही विचार करना ही एक पशुवत मानव को, जिसे होमो सेपियंस कहते हैं, को मनुष्य यानि होमो सोसिअस (Socious) और सृजनशील मानव यानि होमो फेबर (Faber) बनाया|

लेकिन क्या यही विचार जीवन का आधार है? यदि हम होमो सेपियंस यानि पशुवत मानव की बात करे, तो विचार जीवन का आधार नहीं है| ऐसा इसलिए क्योंकि वैसे जीव भी अपना जीवन जी ले रहे हैं, जो विचार नहीं करते हैं या नहीं कर सकते हैं| लेकिन जब बात एक मानव की हो रही है, तो यह स्पष्ट है कि ‘विचार’ ही जीवन का मूल आधार है| यही विचार मानव जीवन में संस्कार एवं संस्कृति के स्वरुप में आता है|

विचार जीवन में बहुत महत्वपूर्ण है, और इसीलिए बुद्ध कहते हैं कि

‘हम वही बन जाते हैं, जो विचार हम उत्पन्न करते हैं,

उन्ही विचारों के अनुरूप हम अपनी दुनिया बना लेते हैं’|

और बोद्ध साहित्य में कहा गया है कि ‘मानव जीवन बैल गाडी की तरह उसी तरह चलता है, जैसे मन रूपी बैल आगे आगे चलता है’| हम जानते हैं कि विचार का उत्पादन केंद्र उसका ‘मन’ हो होता है| इसीलिए मन पर ध्यान देना, मन का अवलोकन करना. मन को स्थिर करना और मन का संकेन्द्रण करना ही जीवन की सफलता है| दरअसल यह अपने विचारों का अवलोकन है, उसका संकेन्द्रण है, और उसकी गहराइयों में उतरना है|

किसी का आधार वह पृष्ठभूमि होता है, या वह नीव होता है, जिस पर वह टिका हुआ होता है| यदि वह भवन है, तो यह आधार उसका नीव होगा, और यदि यह जीवन है, तो यही से उसका भोजन पानी एवं सब कुछ प्राप्त होता रहता है, यानि उसका परितंत्र उसी आधार पर अवस्थित होता है| इस तरह कोई आधार ही उसके कार्यात्मक जीवन को संपोषित करता है और उसके अनुकूल वातावरण उपलब्ध कराता है|

यदि हम मानव जीवन के शुरू से अब तक के इतिहास का विश्लेषण करेंगे, तो मानव जीवन की सम्पूर्ण यात्रा का सूत्र मानव के विचारों में ही सिमट जाता है| मानव विज्ञानी बताते हैं कि यही विचार की शक्ति थी, जिसके बदौलत एक होमो सेपियंस ने अपने समकालीन शारीरिक रूप से अधिक शक्तिशाली होमो इरेक्टस और नियंडरथल को पराजित किया और उसको मिटा भी दिया| कोई पचास हजार साल पहले मानव को ‘संज्ञानात्मक समझ’ (Cognitive Understanding) आई| किसी चीज को देखना, समझाना और निष्कर्ष निकलना ही संज्ञानात्मक समझ है| यह सब विचारों की प्रक्रिया से ही संभव हुआ| इस तरह विचार ही मानव जीवन का वह ‘मोड़’ है, जिसने मानव प्रगति की शुरुआत किया|

इसी विचारों के क्रमबद्ध प्रक्रम ने मानव के अर्थव्यवस्था में प्राथमिक, द्वितीयक, तृतीयक प्रक्षेत्र के बाद चौथे एवं पाँचवें प्रक्षेत्र के स्तर पर पहुँच गया है| आज ज्ञान एवं नीतियों का निर्धारण प्रक्षेत्र सिर्फ शुद्ध विचारों की  कलाकारी ही है| इसी विचारो की शक्ति को Soft Power कहते हैं|

इसीलिए कहा गया है कि हमें इस मामले में सदैव सचेत रहना चाहिए कि कोई नकारात्मक एवं विध्वंसात्मक विचार हमारे मन में कभी नहीं आए| हमें सचेतन होकर सिर्फ सकारात्मक एवं सृजनात्मक विचार ही मन में जाने देना चाहिए| मन तो विचारों का निरपेक्ष उत्पादन केंद्र है, अर्थात जैसा भी विचार मन में जायगा, वैसा ही विचारों का वह उत्पादन करता है| और यह विचार उनकी कल्पनाओं में आता है| इसीलिए महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइन्स्टीन ने कहा है कि कल्पनाशीलता ही सृजन का आधार है| यही सत्य को उद्घाटित करने का उपक्रम है| यही कल्पना विचारों को उत्पन्न करता है|

आजकल भौतिकी का क्वांटम क्षेत्र सिद्धांत कहता है कि हम जिस चीज का अवलोकन करना चाहते हैं और यदि उसके प्रकटीकरण की संभावना है, तो वही वास्तविकता में बदल जाती है| इसे सूक्ष्म कणों के सन्दर्भ में सही पाया गया है| भौतिकी का अवलोकनकर्ता का सिद्धांत यही है| जब हम किसी सोच पर स्थिर हो जाते है, अर्थात अपने विचार को स्थायी एवं स्थिर कर देते हैं, और उसके प्रकटीकरण के लिए आवश्यक माहौल बना लेते हैं, तो हम कल्पनाओं को अतिरिक्त ऊर्जा का सम्प्रेषण करने लगते हैं, और वह भौतिकता में बदलने लगता है|

इसीलिए कहा गया है कि जो हम सोचते हैं यानि स्थिरता से विचार करते हैं और उस पर विश्वास करते हैं, वह भौतिकता में हमारे जीवन में उपलब्ध हो जाता है| अब यह वैज्ञानिक सिद्धांत हो गया है| इस तरह स्पष्ट है कि विचार ही जीवन का आधार है|

आचार्य प्रवर निरंजन जी 

उत्कृष्ट कला हमारे अनुभव को प्रकाशित करती है या सत्य को उद्घाटित करती है|

(यह निबंध बिहार लोक सेवा आयोग द्वारा वर्ष 2023 में आयोजित मुख्य परीक्षा से है, लेकिन इस सीरिज के आगे के निबंध इसके अतिरिक्त संघ लोक सेवा आयोग के भी होंगे| यह इस सीरीज का तीसरा निबन्ध है|)

अक्सर लोग एक उत्कृष्ट कला को सत्यता का पर्याय मान लेते हैं। एक कला की अभिव्यक्ति कलाकार का अनुभव भी होता है। लेकिन उपरोक्त के किसी भी अंतिम निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले उत्कृष्टता, कला, अनुभव एवं सत्य को समझना चाहिए| इसके लिए इन सबका एक सम्यक विश्लेषण एवं मूल्याङ्कन करना होगा| कला किसी व्यक्ति के ‘विचारों’ एवं ‘भावनाओं’ की ‘अनुभव जन्य’ ‘सुन्दर’ एवं ‘बाह्य अभिव्यक्ति’ है| अर्थात किसी भी व्यक्ति के विचारों एवं भावनाओं की ऐसी ‘सुन्दर’ अभिव्यक्ति है, जिसे दूसरा कोई भी अपने ज्ञानेन्द्रियों से अनुभव कर सके| ‘सुन्दर’ का अर्थ आनन्दित यानि आह्लादित करने वाला है| यह रेखा, रंग, मूर्ति, ताल, शब्द आदि के सहयोग से अभिव्यक्त होता है, तथा रेखाचित्र, मूर्तिकला, नृत्य, संगीत, कविता एवं साहित्य आदि के विविध रूप में समाज में प्रस्तुत होता है|

इस तरह यह एक ऐसा मानवीय कौशल है, जो मनुष्य को आनन्दित कर सके| प्लेटो ने तो यह भी कह दिया कि ‘कला सत्य की अनुकृति है’| अत: कला एक क्रिया है, एक तकनीक है, एक कौशल है, एक अनुकृति है, एक कल्पना है, एक अभिव्यक्ति है, एक सौन्दर्य है, एक सृजन है, शिक्षण का बोधगम्य माध्यम है, ज्ञान का सम्प्रेषण है और उस कलाकार के व्यक्तित्व का परिचायक भी है| लेकिन यह ‘उत्कृष्ट कला’ अनुभव को प्रकाशित करती है, या सत्य को उद्घाटित करती है? यह जानने एवं समझने के लिए हमें उत्कृष्टता, अनुभव एवं सत्य को भी समझना चाहिए|

प्रत्यक्ष ज्ञान ही अनुभव है, चाहे यह शारीरिक स्तर पर प्राप्त किया गया है, या मानसिक या आध्यात्मिक स्तर पर| यह प्रत्यक्षण यानि ‘Perceive करना’ यानि किसी चीज को कैसे समझते हैं, इस पर निर्भर करता है| शारीरिक स्तर पर अनुभव हम अपने पाँचों परंपरागत ज्ञानेन्द्रियों के उपयोग से प्राप्त करते हैं, लेकिन मानसिक एवं आध्यात्मिक स्तर का अनुभव हम अपने मन से करते हैं, यानि हम अपनी कल्पनाओं से करते हैं| आधुनिक युग में महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइन्स्टीन और स्टीफन हाकिन्स ने जो भो अनुभव प्राप्त किया, वह मानसिक एवं आध्यात्मिक अनुभव ही था, जो उन्होंने अपनी कल्पनाओं में ज्ञात किया|

किसी की उत्कृष्टता उसकी स्पष्टता, गहनता, गहराई को समेटे हुए मानवीय मूल्यों के अनुरूप होता है| चूँकि उत्कृष्टता के स्तर को समाज ही स्थान देता है, यानि यह समाज की समझ के सापेक्ष स्तर का होता है| अर्थात यह उस समाज के मूल्य, आदर्श, अभिवृति, संस्कार एवं संस्कृति आदि के समझ एवं स्तर के अनुसार ही कोई चीज ‘उत्कृष्टता’ का स्थान पा सकता है|  सिद्धांतत: ‘सत्य’ उसे कहते हैं, जो स्थान एवं समय के सापेक्ष स्थिर हो, यानि निरपेक्ष हो| अर्थात सत्य एक ही होता है और वह अटल होता है||

लेकिन जब ‘सत्य’ का विश्लेषण करते हैं, तो हम पाते हैं ‘सत्य’ एक नहीं होता है, बल्कि एक समय एवं स्थान में भी अनेक सत्य होता है| यह निरपेक्ष भी नहीं होता है| वैसे अब विज्ञान के अनुसार स्थान यानि आकाश (Space) एवं समय में भी विरूपण (Distortion) आता रहता है, यानि इसकी आकृति में बदलाव आता रहता है, इसलिए ब्रह्माण्ड को भी अटल नहीं माना जाता| अर्थात एक ही सत्य ब्रह्माण्ड में सापेक्षिक है, निरपेक्ष नहीं है| एक ही सत्य अवलोकनकर्ता के अनुसार बदलता रहता है, इसलिए एक ही तथ्य के लिए अनेक सत्य होते हैं| कहा गया है कि किसी सुनी गयी बात का अर्थ सुनने वाले के समझ के अनुसार होता है, एवं देखी गयी कोई वस्तु का सत्य उसके नजरिया से निश्चित होता है| इसलिए कोई भी एक निश्चित सत्य नहीं है|

इसके बाद भी, कोई भी व्यक्ति अपनी संस्कृति, समझ, ज्ञान के स्तर, पृष्ठभूमि और सन्दर्भ में अपने अनुभव प्राप्त करता है| किसी का यह अनुभव किसी सत्य के कितना निकट है, यह सब उसके नियामक कारको पर निर्भर करता है| एक कलाकार अपने किसी भी कलात्मक अभिव्यक्ति में पूर्णतया ईमानदार होता है| अत: किसी भी कलाकार के कलात्मक अभिव्यक्ति में उसकी सत्यनिष्ठा पर शंका नहीं किया जा सकता है| एक उत्कृष्ट कलाकार अपनी अभिव्यक्ति में अपना सब कुछ समर्पित कर अपना उत्कृष्ट प्रदर्शन करना चाहता है| इसके उत्कृष्टता के स्तर में जो भी कमियाँ है, यदि है भी, तो वह उस कलाकार के पृष्ठभूमि एवं संस्कृति की कमी होगी या यह आलोचना करने वाले के स्तर या संस्कृति के कारण होगी|

चूँकि किसी कलाकार का सत्य भी उसके अनुभाव से निश्चित एवं निर्धारित होता है, और सत्य भी सापेक्षिक होता है, इसलिए यह स्पष्ट है कि कथन ‘उत्कृष्ट कला हमारे अनुभव को प्रकाशित करती है या सत्य को उद्घाटित करती है’, में कोई एक पूर्ण सत्य प्रतीत नहीं होता है| अत: हम कह सकते है कि एक "उत्कृष्ट कला हमारे अनुभव को भी प्रकाशित करती है और सत्य को भी उद्घाटित करती है"|

आचार्य प्रवर निरंजन जी

 

सिविल सेवाओं की परीक्षाओं में निबन्ध लिखने के लिए ...

सिविल सेवाओं में चयन के लिए होने वाली परीक्षाओं में आजकल निबन्ध लेखन का महत्व बढ़ गया है| निबन्ध -लेखन की कला, दर्शन एवं वैज्ञानिकता का उपयोग...