सोमवार, 3 मई 2021

बौद्धिक एवं सांस्कृतिक अपराधी कौन? (Who is Intellectual and Cultural Criminal?)

(Who is Intellectual and Cultural Criminal?)

आज मैं एक नए विषय पर विमर्श शुरू कर रहा हूँ – बौद्धिक अपराधी कौन है और सांस्कृतिक अपराधी कौन है? यह स्पष्ट है कि जो अपराध करता है, वही अपराधी होता है| तो सबसे पहले यह समझा जाय कि अपराध क्या है? अपराध कितने तरह के होते हैं? बौद्धिक अपराध क्या है और सांस्कृतिक अपराध क्या है? एक अपराध (crime) एक अपकृत्य (Tort) से अलग कैसे है? इसी क्रम में आगे यह भी देखना है कि बौद्धिक एवं सांस्कृतिक अपराधी कौन है? इस विमर्श में यह भी शामिल होना चाहिए कि अपराध के ये दोनों प्रकार अपराध के सामान्य अवधारणा से अब तक बाहर क्यों रहे? अभी तक यह सामान्य अपराधों के कारको के रूप में  बौद्धिक एवं सांस्कृतिक पृष्ठभूमि तक ही सीमित रही है| अर्थात वर्तमान प्रचलित अवधारणाओं के अपराध के कारको की पृष्ठभूमियों में इन अपराधियों के अन्य कारकों की तरह बौद्धिक एवं सांस्कृतिक पृष्ठभूमियों तक ही इस अध्ययन को सीमित रखा जाता रहा है|

इस बौद्धिक एवं सांस्कृतिक अपराध एवं अपराधी के इस गहन, गंभीर, व्यापक प्रभाव वाले महत्वपूर्ण पक्ष को गौण रखा गया है| यह विषय अब तक इसलिए गौण रहा, क्योंकि समाज के तथाकथित बुद्धिजीवी ही इन अपराधों के दोषी हैं, यानि यही बौद्धिक व्यक्ति या समूह ही अपराधी है| या अन्य किसी कारणवश इस महत्वपूर्ण विषय पर ध्यान ही नहीं गया|

पहले हम अपराध की अवधारणा, यानि सम्यक परिभाषा को समझते हैं| इस सम्बन्ध में हम विभिन्न विद्वानों और संस्थाओं के द्वारा दिए गए अवधारणाओं को समझते हैं| इसे साधारण शब्दों में एवं सहज भावार्थ में स्पष्ट किया जाना चाहिए| मेरे अनुसार,

किसी व्यक्ति,या समाज, या संगठन, या संस्था द्वारा

किया गया कोई क्रिया (सकारात्मक, या नकारात्मक, या निष्क्रिय)

यदि किसी व्यक्ति, समाज या मानवता के कल्याण एवं विकास को

अहित पहुचाता है,या बाधित करता है, या

अहित की यथास्थितिवाद को बनाये रखता है

तो यह अपराध है|”

यह बहुत व्यापक, परन्तु बड़ा ही स्पष्ट अवधारणा है| इस अवधारणा में किसी के द्वारा कोई कार्य नहीं करने (नकारत्मक कार्य) या चुपचाप देखते रहने (निष्क्रिय कार्य) से भी यदि सर्व समाज को नुकसान होता है, तो भी यह अपराध के श्रेणी के प्रकार में आएगा|

सामान्यत: अपराध की यह परिभाषा है कि कोई भी कार्य यानि कृत्य जो किसी नियमो या संहिताओं के विरोध में हो, यानि उल्लंघन  करती हो, अपराध है और नियमानुसार यह अपराध की श्रेणी में आता है| यदि इन नियमों या संहिताओं को व्यापक रूप में देंखे तो इसमें संविधान (Constitution), अध्यादेश (Ordinance), अधिनियम (Act), नियमावली (Rule), संकल्प (Resolution), अधिसूचना (Notification), आदेश (Order), परिपत्र (Circular), न्यायिक आदेश (Judicial Order) आदि शामिल हो जाते हैं| संविधान संविधान सभा द्वारा, अधिनियम एवं नियमावली विधायिका द्वारा, न्यायिक आदेश न्यायपालिका द्वारा, एवं अध्यादेश, संकल्प, अधिसूचना, आदेश एवं परिपत्र कार्यपालिका द्वारा निर्गत यानि जारी किये जाते हैं| इन सभी का व्यवहारिक प्रभाव नियमों एवं संहिताओं का ही होता है| एक तरह के नियमों के संकलन को संहिता (Code) कहते है, जैसे भारतीय दंड संहिता (IPC- Indian Penal Code), आदि| अपकृत्य की अवधारणा को आगे स्पष्ट किया गया है|

इन विधानों की आवश्यकता व्यक्ति, समाज एवं मानवता के कल्याण एवं विकास के लिए व्यवस्था (Order/ System) एवं ‘व्यवस्था के सञ्चालन’ (Administration) के नियमन के लिए किया जाता है| इन नियमनों का उल्लंघन, या इसे बाधित किया जाना सामान्यत: अपराध माना जाता है| जो नियमन अप्रत्यक्ष रहता है, उसे सामान्यत: अपराध नहीं माना जाता है| स्पष्ट है कि सभी नियमन सुपष्ट अभिव्यक्त रहता है| यहाँ मेरे कहने का अर्थ यह है कि जो नियमन प्रत्यक्ष अभिव्यक्त नहीं होते हुए भी यदि किसी व्यक्ति, समाज, या मानवता के कल्याण एवं विकास की व्यवस्था एवं सञ्चालन को बाधित करता है, या यथास्थितिवाद (प्रगति को रोके रख रहा है) को बनाये रखता है, तो भी इस कृत्य को अपराध माना जाना चाहिए| मैं यह कहना चाहता हूँ कि यदि इन प्रगति यानि विकास के उद्देश्यों को बाधित करने की क्रिया को रोकने के लिए नियमन नहीं  किये गए है और इसीलिए ऐसे विधान या विधानों के उल्लंघन का प्रश्न भी नहीं उठता है, तो भी इसे अपराध माना जाना होना चाहिए, क्योंकि यह उल्लंघन प्राकृतिक न्याय के विरुद्ध है| इस तरह ऐसा अपराध एक गंभीर, गहन एवं व्यापक प्रभाव का है और इस पर वैश्विक जगत का ध्यान अभी भी नहीं गया है| इस अपराध को रोकने के लिए आवश्यक विधान का नहीं होना भी एक गहरा एवं खतरनाक बौद्धिक षड्यंत्र है और इसीलिए यह भी एक बौद्धिक अपराध है|

अपराध को किसी ख़ास दुष्टता की मंशा या नीयत से किया गया ऐसे कृत्य को कहते हैं, जिससे व्यक्ति, समाज या मानवता को नुकसान पहुंचता है, या इनके लिए खतरनाक हो और ऐसा कृत्य जो नियमों के रूप में विशिष्ट रूप से परिभाषित हो, प्रतिबंधित हो एवं दंडनीय हो| अपराध का सन्दर्भ सामाजिक हित के विरुद्ध के अलावे स्थापित नियमो यानि विधानों का उल्लंघन करने के साथ साथ अपराधी की मंशा यानि नीयत का उद्देश्य गलत होना प्रमुख माना जाता है| इस तरह एक अपराध स्थापित नियमों के विरुद्ध किया गया कार्य है जो राज्य या अधिकृत अन्य द्वारा दंडनीय हो| लेकिन बौद्धिक एवं सांस्कृतिक अपराधो को तो अभी तक अपराध की श्रेणी में लिया ही नहीं गया और इसीलिए यह विचारणीय भी नहीं है तथा दंडनीय भी नहीं है|

कुछ व्यक्ति या समूह समुदाय के बहुमत से यह निर्धारित करते हैं कि कौन सा कृत्य अपराध की श्रेणी में आएगा और कौन सा इसके दायरे से बाहर रहेगा?  यह पद्धति वैसे समुदाय के लिए ठीक हो सकता है जिस समुदाय में तर्कशील, विश्लेषण क्षमता युक्त उच्च बौद्धिक स्तर के लोगों की बहुलता हो| लेकिन जिस समुदाय या कौम में बौद्धिकता के स्तर पर कुछ ही लोग उपलब्ध हो और उनमे भी प्राकृतिक न्याय के प्रति सम्मान नहीं हो, वैसे समुदाय से समुचित न्याय की आशा नहीं ही किया जाना चाहिए| ऐसे जागरूकता विहीन समाज में यह पद्धति उपयुक्त नहीं हो सकता| यह वैसे भी समाज में उपयुक्त नहीं हो सकता, जिसमे तथाकथित बौद्धिक लोग या समुदाय ही असमानतावादी एवं शोषक तंत्रों के संस्थापक, संरक्षक, व्यवस्थापक हों एवं इस व्यवस्था के लाभार्थी हों|

ब्रिटेन के प्रसिद्ध न्यायविद सर विलियम ब्लैकस्टोन भी कहते हैं कि

समूचे समुदाय के प्रति कर्तव्य और समूचे समुदाय के अधिकार का

उल्लंघन करना ही अपराध है|

यह ध्यान देने की बात है कि इन्होंने सम्पूर्ण समुदाय यानि सम्पूर्ण मानवता के सामूहिक हित के सन्दर्भ में बात रखी है| इनके अनुसार सम्पूर्ण समुदाय के प्रति जो कर्तव्य होने चाहिए और जो सम्पूर्ण समुदाय के अधिकार होने चाहिए, उनका समुचित ध्यान नहीं रखा जाना ही अपराध है| स्पष्ट है कि न्याय, समानता, स्वतंत्रता, एवं बंधुत्व को सुनिश्चित नहीं किया जाना भी एक अपराध है| इस तरह अपराध को सार्वजानिक क्षति को विषय माना जाता है| ब्रिटिश व्यवस्था में उसी नुकसानदेह कृत्य को अपराध मानता है, जो दुर्भावना से, स्वेच्छा से, एवं धूर्ततापूर्वक किया गया, या कराया गया, या करने दिया गया, या होने दिया गया है| यह परिभाषा व्यापक है और इस तरह इस परिभाषा में बौद्धिक एवं सांस्कृतिक अपराध शामिल हो जाता है| हर एक अपराध का तथा हर एक अपराधी का अध्ययन किया जाना चाहिए, ताकि हर अपराध एवं अपराधी की प्रवृति, उद्देश्य, प्रभाव एवं उसके सामाजिक प्रतिफल को जाना जा सके| इसके बिना किसी भी समाज को सभ्य, विकसित, कल्याणकारी, प्रगतिशील एवं मानवतावादी नहीं बनाया जा सकता| इसके बिना शान्ति, स्थिरता, प्रसन्नता, खुशहाली एवं समृद्धि स्थापित नहीं हो सकती| भारत के पिछड़ेपन का मुख्य कारण यही यह है कि इन अपराधों को कभी भी अध्ययन का विषय वस्तु बनाया ही नहीं गया|

संयुक्त राष्ट्र संघ (UNODC – The United Nation Office on Drugs and Crime) ने भी केवल समाज विरोधी कार्यों को ही अपराध स्वीकार किया है| संयुक्त राष्ट्र संघ का यह शाखा, जो वियना में कार्यरत है, ड्रग्स, अपराध नियंत्रण एवं अपराधिक न्याय को ही देखता है| हमें यह पता नहीं है कि इसने बौद्धिक एवं सांस्कृतिक अपराध के बार्रे में अभी तक सोचा भी है, या नहीं| लेकिन अब यह बात उस फोरम तक जाना चाहिए, ताकि इस गंभीर, गहन, महत्वपूर्ण, व्यापक एवं प्रभावशाली विषय पर गहन विमर्श शुरू हो सके|

सामान्यत: अपराध के कई श्रेणी हैं, जिसमें

व्यक्ति के विरुद्ध अपराध (हत्या, आघात, बलात्कार,डकैती आदि),

संपत्ति के विरुद्ध अपराध (चोरी, लूट, आगजनी आदि),

घृणात्मक अपराध (लिंग, जाति, प्रजाति, धर्म, अपंगता, नस्लता आदि के सम्बंधित पूर्वाग्रह),

नैतिकता के विरुद्ध अपराध (वेश्यावृति, अवैध जुआ खेलना, अवैध ड्रग्स व्यापार आदि),

श्वेत कौलर अपराध (कर का अपवंचना, गबन करना, रिश्वतखोरी, अनाधिकृत व्यापार आदि), एवं संगठित अपराध (माफिया गतिविधियाँ आदि)

तक सीमित रहा जाता है|

परन्तु बौद्धिक एवं सांस्कृतिक अपराध की चर्चा नहीं होती| इन दोनों अपराध का प्रभाव लम्बे समय तक, या यों कहें कि यह सदियों तक रहता है| यह भी एक संगठित अपराध  ही है| और इसी कारण इसमें शामिल लोगों को गिरोह भी कहा जाता है| इस अपराध को संभव बनाना किसी अकेले व्यक्ति के लिए सदैव संभव नहीं है, अपितु यह कुछ खास विचारधारा या खास उद्देश्य की पूर्ति के लिए समर्पित लोगों के समुदाय से संगठित, संरक्षित, एवं समर्थित होता है| एक व्यक्ति या कुछ लोगो के समूह द्वारा भी यह अपराध को सफलतापूर्वक किया जाना सांभव हो सकता है| इस स्थिति का एकमात्र शर्त यह है कि समुदाय या समाज के शेष लोग, यानि बहुसंख्यक लोग अशिक्षित, नादान और मूर्खहों | कृपया, डिग्रीधारी या पदधारी व्यक्ति मात्र अपने डिग्री या अपने पद के कारण अपने को शिक्षित एवं जागरूक नहीं समझें| यदि वे तार्किक नहीं है, उनमे विश्लेषण क्षमता नहीं है और व्यापक मानवता के कल्याण की समझ नहीं है, तो वे धूर्तों के जाल एवं झोल में आसानी से आ जाते हैं| इन अपराधियों का उद्देश्य अक्सर या अधिकांशत: या सदैव ही समाज एवं मानवता के सामूहिक हित के विरुद्ध होता है| यदि इनके कृत्य या हित समाज के विरुद्ध नहीं होता, तो ये अपराध की श्रेणी में आता ही नहीं| समाज का सामूहिक हित क्या हो सकता है? समाज का कल्याण; समाज का विकास; समाज की प्रगति; समाज में सुख, शान्ति, संतुष्टि एवं समृद्धि की स्थापना ही समाज का व्यापक हित है| यह सदैव न्याय, समानता, स्वतंत्रता, एवं बंधुत्व की स्थापना के द्वारा ही आता है|

यदि हम बौद्धिकता को परिभाषित करते हैं तो हम पाते है कि, एक बौद्धिक व्यक्ति में सामान्य ज्ञान, भावनात्मक समझ, सामाजिक कल्याण की पहचान, तार्किकता, विश्लेषण की क्षमता, और वैज्ञानिक सोच होनी चाहिए| ऐसे लोग यदि अपने निजी स्वार्थ के लिए सभी बातों को जानते एवं समझते हुए भी इस बौद्धिकता के विरोध में कार्य करते हैं, तो ऐसे लोगों को धूर्त कहा जाता है| ऐसे धूर्त लोग नादान लोगों को मूर्ख बनाते है और समाज का बड़ा अहित करते हैं| चूँकि ये समाज के व्यापक हित को नुकसान पहुंचाते हैं, या इस नुकसान में जानते हुए भी सहभागी बनते हैं, इसलिए ही ऐसे लोगों को मैं बौद्धिक अपराधी की श्रेणी में रखता हूँ| इन्हीं के द्वारा गलत मंशा से किया अपराध बौद्धिक अपराध है|

सांस्कृतिक अपराध को समझने से पहले हमें संस्कृति को भी समझ लेना चाहिए| ‘संस्कृति’ जीवन जीने की एक सामान्य विधि है| यह एक सम्पूर्ण मानसिक निधि है, जो व्यव्क्ति एवं समाज के भावनाओं, विचारों एवं व्यवहारों को नियमित, संचालित, प्रभावित एवं नियंत्रित करता रहता है| यह अदृश्य रह कर भी पुरे सामाजिक तंत्र एवं व्यवस्था को ही नियमित, संचालित, प्रभावित एवं नियंत्रित करता रहता है, और इस तरह यह संस्कृति इस सामाजिक तंत्र के लिए एक साफ्टवेयर की तरह कार्य करता है, और इस अर्थ में सबसे महत्वपूर्ण है| इस महत्वपूर्ण संस्कृति का निर्माण या संशोधन उस समाज के इतिहास बोध से आता है| “इसलिए सांस्कृतिक परिवर्तन के लिए लोगों के इतिहास बोध को बदलना पड़ता है|”

इसीलिए इस सकारात्मक बदलाव के लिए बौद्धिक षड्यंत्र की आवश्यकता नहीं होती है, लेकिन यदि नकारात्मक बदलाव या नकारात्मक यथास्थिति को बनाये रखने के लिए बौद्धिक षड्यंत्र की अनिवार्यता हो ही जाती है| यही कालान्तर में ‘सांस्कृतिक षड्यंत’ साबित होती है| सामंत काल में संस्कृति को बदलने की आवश्यकता विश्व व्यापी थी| भारत सहित पुरे विश्व में संस्कृति को बदलने का मुहीम चला| भारत की सांस्कृतिक विरासत बहुत पुरानी थी और इसीलिए सामंत काल में इतिहास बोध को बदलने के लिए ही पुराने संस्कृति के साहित्यिक एवं पुरातात्विक साक्ष्यों को नष्ट कर दिया गया| कई क्षेत्रो में ऐतिहासिक समाज सुधारको के प्रयास को और उस उपलब्ध साहित्य को नए ढंग से व्याख्यापित कर एवं संस्कारित कर तथाकथित धर्म का स्वरुप दिया गया, जिसमे पश्चिमी सभ्यताएं प्रमुख हैं|

भारत में भी ऐसा किया गया| यहाँ भी पुरानी संस्कृति को विरूपित कर असमनातावादी समाज की स्थापना किया गया| प्रचलित संस्कृति को नष्ट करने के लिए लगभग सभी शिक्षण संस्थान, शोध संस्थान एवं पुस्तकालय, वाचनालय आदि नष्ट कर दिए गए| कई शब्दों के अर्थ एवं भावार्थ बदले गए, नए सन्दर्भ लाये गए, कल्पनाओं पर नए साहित्य रचे गए, नई परम्पराओं को बनाया गया, कई ढोंग एवं पाखंड भी स्थापित किए गए, सामान्य लोगो को शिक्षा से वंचित कर दिया गया, अंधविश्वास फैलाया गया, सारे सामाजिक एवं राजकीय नियमों को सामंतवाद के पक्ष में बदला गया| ये सब सामंतवादी हितो के अनुरूप किया गया, जिसमे एक बहुत छोटा समूह लाभार्थी था| इसे धार्मिक आवरण दिया गया| ऐसा करके बहुसंख्यक जनता पर कई निर्योग्यताएं (मनाहियां, Disabilities) थोपी गयी| पेशाओं (Professions) को योग्यता के आधार पर नहीं कर वंशानुगत बनाया गया| नए कौशल सिखने की प्रेरणा समाप्त कर दी गयी|

यह सब विश्व व्यापी स्तर पर घटित हुआ, लेकिन स्वरुप अलग अलग था| विश्व के शेष हिस्सों में बाद में आन्दोलन चला कर संस्कृति की बुराइयों को दूर कर दिया गया, परन्तु जहाँ धार्मिकता की आड़ में सांस्कृतिक शुद्धिकरण को मना कर दिया गया, वह समाज आज भी विकसित कहलाने को प्रयासरत है| भारत भी इसका एक उदहारण है| यही समाज के व्यापक हित के विरुद्ध एवं कुछ नगण्य आबादी के पक्ष में किया सफल षडयत्र ही सांस्कृतिक अपराध है|

ऐसा अपराध क्यों होता है? अर्थात ऐसे अपराध का मनोविज्ञान क्या है? इस सन्दर्भ में कुछ प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिको की राय जानते हैं| आधुनिक मनोविज्ञान में अपराध को मनुष्य की मानसिक उलझनों का परिणाम माना है| जब मनुष्य के मन में हीनता की भावना होती है, तो हीनता की ग्रंथियाँ सक्रिय हो जाती है, तो वह स्वयं को दुसरे व्यक्तियों या समूहों से श्रेष्ठ, सर्वोच्च, विशिष्ट, अलग, एवं ऐतिहासिक सिद्ध करने का अपराध करता है| हीनता की भावना एक मनुष्य में कब आती है? जब कोई मनुष्य योग्य नहीं होता है और उसे समाज में योग्य दिखना या मनवाना होता है, तो उसमे हीनता की भावना उत्पन्न होता है| इसका एक व्यावहारिक उपाय या समाधान पेशा को ही वंशानुगत बना देना होता है, जो प्रथा भारत में आज भी प्रचलित है|

मैं यहाँ कई मनोवैज्ञानिको को उद्धृत नहीं करते हुए एकमात्र प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक डॉ अल्फ्रेड एडलर को ही उद्धृत करना चाहता हूँ| अपराध और हीनता के सबंध का सिद्धांत प्रो एडलर का ही है जिसे आप भी देख सकते हैं|

वे मन में हीनता की भावना को ही अपराध का कारण मानते हैं|

यह स्थिति तब आती है,

जब कोई मनुष्य वास्तव में श्रेष्ठ, सर्वोच्च, अलग तथा विशिष्ट नहीं है

और इसे पाने की वास्तविक क्षमता भी नहीं है,

तो वह इसे अपराधिक तरीके से पाता है, या पाने का प्रयास करता है|

हीनता की भावना, यानि ग्रंथि (भावना के स्थायित्व को ग्रंथि कहा गया है) जिस मनुष्य के अचेतन, अवचेतन एवं चेतन में मौजूद रहता है, वह सदैव मानसिक असंतोष की स्थिति में रहता है| तब वह ऐसी कार्य योजना बनाते हैं, जो प्राकृतिक न्याय एवं समाज तथा राज्य के विधान के विरुद्ध हो जाता है| ऐसी ही कार्य योजना को षड्यंत्र कहते हैं और इसके कार्यान्वयन को अपराध कहते हैं| ऐसा करके वह मनुष्य या समूह सामाजिक मान्यता, सराहना, प्रशंसा और बहुत कुछ इससे जुड़े अन्य लाभ ही पाता है| ऐसे अपराधी के मन- मष्तिष्क में सदैव यह चलता रहता है कि उसे समाज में कैसे विशिष्ट, भिन्न, स्तरीय, श्रेष्ठ, खानदानी अर्थात ऐतिहासिक, उच्च या सर्वोच्च, ज्ञानी आदि माना जाय? वह इन सबका सामाजिक मान्यता चाहता है| इसे पाने के लिए वह जो कृत्य करता है और उसके मन में जो चलता रहता है, वही अपराध है| ऐसे लोग अपने को हमेशा चर्चा में भी रखना चाहता है| इसको पाने के लिए बड़ी बड़ी बातें करना, काल्पनिक साहित्यों की रचना करना, ढोंग एवं पाखण्ड करना, और अंधविश्वास फैलाना आदि कई कई तिगडम करते हैं| ऐसे लक्ष्य को पाना ही बौद्धिक एवं सांस्कृतिक अपराध है| ये लोग सर्व समाज के व्यापक हितों को नुकसान पहुंचाते है और इसीलिए अपराधी हैं|

अपराध की एक अलग स्थिति भी होती है| कुछ बालक कुशाग्र बुद्धि के होते हैं, परन्तु उनका बाल्यकाल सामान्य ढंग से नहीं बितता है तो वे भी कुशाग्र बुद्धि के अपराधी हो जाते हैं| ऐसे अपराधी अपनी बुद्धिमता का प्रयोग अपने अपराध को न्यायोचित ठहराने के लिए करते हैं| जब तक इसका उद्देश्य व्यक्तिगत लाभ तक सीमित है, तब तक यह बौद्धिक अपराध का उदहारण है| परन्तु यही बौद्धिक अपराध यदि सर्व व्यापकसामाजिक हितों के विरुद्ध हो जाता है और इसका प्रभाव व्यापक करने के लिए संगठित एवं व्यवस्थित होता है तो यह सांस्कृतिक अपराध में बदलने लगता है|

समाज का अहित करने वाले कृत्यों को मैं बौद्धिक एवं सांस्कृतिक षड्यंत्र होने के कारण ही बौद्धिक एवं सांस्कृतिक अपराध (Crime) मानता हूँ| मैं इस बौद्धिक एवं सांस्कृतिक अपराध (Crime) को अपकृत्य (Tort) नहीं मानता| अत: अपराध और अपकृत्य की अवधारणा को समझा जाय एवं दोनों में अंतर को भी| ऊपर अपराध को समझ चुके हैं, और अब अपकृत्य को समझा जाय| विधि के क्षेत्र में, ऐसे दोषपूर्ण कार्य को अपकृत्य या अपकृति (Tort) कहते हैं ,जो संविदा (Contract) के उल्लंघन से सम्बंधित नहीं हो और अपराध (Crime) की श्रेणी में भी नहीं आता हो| अपकृति विधानों में ऐसे अपकार या क्षति के अर्थ में होता है, जिसका प्रतिकार (Compensation) मुख्यत: क्षतिपूर्ति द्वारा संभव हो तथा कारावास भेजने की आवश्यकता भी नहीं हो| मूलत: इसका अर्थ सीधे एवं सरल मार्ग का अतिक्रमण है| इसमें किसी अन्य अधिकार का अतिक्रमण अथवा किसी अन्य व्यक्ति के प्रति कर्तव्य का उल्लंघन है| मिथ्या कारावास, अनाधिकार प्रवेश, मानहानि, धोखा, सार्वजानिक बाधा, आदि अपकृत्य के सामान्य उदहारण है| अपकृति क्षति या कर्तव्य का उल्लंघन है, जिसका सम्बन्ध व्यक्ति से होता है, जबकि अपराध सामाजिक लोक कर्तव्य से सम्बंधित होता है| अपकृति में व्यक्ति उपकारों का क्षतिपूर्ति का अधिकारी होता है, जबकि अपराध में अपराधी को समाज या राज्य दंड देता है| अपकृत्य का मामला व्यवहार न्यायालय देखता है, जबकि अपराधिक मामले को दंड न्यायालय देखता है| स्पष्ट है कि बौद्धिक एवं सांस्कृतिक षड़यंत्र के कृत्य अपराध है, अपकृत्य नहीं है|,

मैं भी एक भारतीय हूँ और इसीलिए इसमें भारतीय सन्दर्भ को भी शामिल करना आवश्यक है| हिन्दू संस्कृति में तत्कालीन सामन्ती समाज एवं राज्य के विधानों को धार्मिक आवरण दे दिया गया है| यह सब सामंत काल में यानि नौवी शताब्दी के बाद होना शुरू हुआ| इस संस्कृति के पूर्व का कोई पुरातात्विक साक्ष्य उपलब्ध नहीं है, इसके साहित्यिक साक्ष्य जो उपलब्ध भी हैं, वे दसवी शताब्दी के बाद के ही हैं| यह सब सामंतवाद की आवश्यकता थी जो आज भी अपने मूल स्वरुप में लागु है, या प्रचालन में है; ब्रिटिश शासन एवं वर्तमान व्यवस्था में बहुत कुछ बदलाव हुए हैं और बहुत कुछ अभी भी बदलने के इन्तजार में है| समाज एवं राज्य के विधानों को धार्मिक आवरण इसलिए दिया गया है ताकि लोग उसका पालन एक धार्मिक कर्तव्य के रूप में रूप में करें| इस तरह यह साधारण नादान लोगों के लिए बाध्यकारी भी है| इन धार्मिक विधानों में समाज एवं राज्य के नियमों के द्वारा समाज के कुछ विशिष्ट समूह अपनी श्रेष्ठता, सर्वोच्चता, विशिष्टता, भिन्नता, ऐतिहासिकता स्थापित कर लिया है| यह सब धार्मिक कर्तव्यों एवं बाध्यताओं के द्वारा पूर्णतया संरक्षित एवं सुरक्षित भी है| ऐसे विचारकों एवं विधान निर्माताओं में मनु, याज्ञवल्क्य, पराशर, नारद, वृहस्पति, कात्यायन, आदि प्रमुख नाम हैं| यह भी बौद्धिक एवं सांस्कृतिक अपराध के सुस्पष्ट उदहारण हैं, जिसे धार्मिक आवरण के कारण कोई देखना एवं समझना नहीं चाहता|

कुछ अपराधी या अपराधी समूह अपने को आनुवंशिक कोड या बनावट के आधार पर अपराधी के श्रेणी से बाहर होना यानि बचना भी चाहते हैं| इसका आधार वे उनकी सामान्य जनों से भिन्न एवं विशिष्ट जीनीय संरचना बताते हैं| इन अपराधियों के अपराधिक कृत्य तो स्पष्ट रहते हैं और इसीलिए वे अपराध की मंशा यानि नीयत को आनुवंशिक संरचना को दोष बता कर अपराधी घोषित होने से एवं दंड से बचना चाहते हैं| यदि ऐसे किसी मानव या मानव समूह में आनुवंशिक बनावट में वास्तव में दोष है, तो उनको असामान्य प्राणी मानते हुए अलग एवं पृथक (कारावास या जैवकीय पार्क) व्यवस्था की जानी चाहिए, उन्हें समाज में सामान्य रूप में रहने की स्वतंत्रता नहीं मिलनी चाहिए|

अब आप बौद्धिक एवं सांस्कृतिक अपराध को समझ गए हैं| बौद्धिक एवं सांस्कृतिक अपराधी कौन है, इसका निर्धारण करने के लिए आपको अपने क्षेत्र एवं अपने सन्दर्भ में प्रयास करना होगा| इसके लिए आप भी मनन मंथन करें| सादर|

निरंजन सिन्हा

व्यवस्था विश्लेषक एवं चिन्तक|

मंगलवार, 20 अप्रैल 2021

धम्म चक्र वर्ती अशोक

अशोक यानि असोक मगध देश का सबसे महत्वपूर्ण शासक था। इनके साम्राज्य का भौगोलिक विस्तार प्रत्यक्षतः पूरब में आसाम और पश्चिम में अफगानिस्तान तक फैला हुआ था। इसी असोक के कारण भारत को विश्व अध्ययन का विषय बनाया गया। इस असोक के सांस्कृतिक साम्राज्य के विस्तार में उस समय के ज्ञात विश्व को अपने में समाहित किए हुए था। इस तरह आधुनिक भारतीय राष्ट्र की परिकल्पना का भौगोलिक और सांस्कृतिक आधार इनके द्वारा ही दिया गया। इसी विशेषता ने सम्राट अशोक को महान बनाया।

मगध को उस समय मग्ग देस भी कहा जाता था। पालि में '' अक्षर का संयुक्ताक्षर नहीं होता है और इसलिए  "मग्ग" शब्द 'मार्ग' शब्द के लिए प्रयुक्त होता है। इस तरह 'मगध' को "मार्गदर्शक" कहा जाता रहा। इस अशोककालीन मगध ही विश्व को प्रकाशित किया था। अशोक की राजधानी और मगध (उस समय का भारत) देस (देश) इस भावार्थ को चरितार्थ करता रहा। पूरे भारत में विद्या विहारों की स्थापना और व्यवस्था की श्रृंखला ही भारत को विश्व गुरु बना सका। उन्होंने उज्जैन, सांची, तक्षशिला, गंधार, नालन्दा, उदंतपुरी, वल्लभी, सारनाथ, मथुरा, नागरा, पवनी, एरागुंडा, गिरनार, जगदलपुर, गुंटूर, कोसांबी, विक्रमशिला आदि में विद्या पीठ यानि विश्वविद्यालय स्थापित कर शिक्षा की ऊंचाईयों को स्थापित किया। वे जानते थे कि अज्ञानता ही सब दुखों का कारण है और ज्ञान ही समाज एवं जीवन में सुख, शांति, संतुष्टि और समृद्धि स्थापित कर सकता है।

असोक बुद्ध के अनुयाई हुए। बुद्ध ने एक व्यक्ति के रूप में जन्म लिया और संस्था के रूप में विकसित हो गए। इनके दर्शन और शिक्षाओं को असोक ने पहली बार व्यापक शासकीय समर्थन दिया। बुद्ध का ज्ञान शुद्ध विज्ञान और सामाजिक विज्ञान है, जो जीवन में सफलता का आधार देता है और इसकी क्रियाविधि समझाता है। इसका इन्होंने तत्कालीन विश्व में व्यापक प्रसार किया। इसके लिए प्रतीक चिन्ह की स्थापना, शिला लेख की लिखाई, कल्याणकारी योजनाओं का कार्यान्वयन और प्रशासकीय व्यवस्था कर अभूतपूर्व योगदान दिया। इनका शासन न्याय, समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व पर स्थापित था, जो प्रत्येक प्रगतिशील समाज और राष्ट्र का आदर्श है। विदेशों में पारिवारिक सदस्यों को दूत बनाकर भेजना ही भारत का सांस्कृतिक विस्तार कर सका। असोक ने मानवतावादी विचारों, मूल्यों, आदर्शों का पहली बार विश्व व्यापी सफल मार्केटिंग किया।

इन्होंने संसारिक व्यवस्था की व्यवहारिक आधारभूत व्यवस्था किया, जिसे धम्म पालन कहा जाता है। धम्म आधुनिक धर्म नहीं था, वरन संसार को सम्यक व्यवस्था देने का दर्शन एवं विज्ञान है। यह अलग बात है कि जो लोग धर्म के बिना जीवन में असहजता पाते हैं, वैसे लोगों  ने इस विज्ञान को धर्म बना दिया है। असोक ने अपने शासन व्यवस्था में इस धम्म का व्यापक व्यवहारिक अनुपालन का सफल प्रयोग किया, जिसके अध्ययन के लिए ही विश्व से विद्वानों का भारत आना रहा। इसी नीति पर व्यवस्था कर प्राचीन भारत समृद्ध, शक्तिशालीप्रभावशाली और गौरवशाली देस बना रहा। जब सामंतवाद का उदय हुआ और तत्कालीन विश्व को अपने प्रभाव में ले लिया, तो समतावादी समाज का रुपांतरण असमानतावादी समाज में हो गया। समानता के अंत के वाद को सामंत (समानता+अन्त) का वाद यानि सामंतवाद कहते हैं। 

इसी सामंतवादी रुपांतरण से ब्राह्मणवादी व्यवस्था का उदय एवं विकास हुआ। असोक का कल्याणकारी व्यवस्था का प्रभाव काफी लम्बे समय तक चला। बदलती ऐतिहासिक शक्तियों के कारण वैश्विक सामंतवाद का उदय हुआ। हां, सामंतवाद ने भारत में अपने स्वरुप को एक नए धार्मिक आवरण में रख लिया। इसी धार्मिक आवरण के कारण यथास्थितिवादी इतिहासकारों ने भारत में सामंतवाद के प्रभाव को नकार दिया है। इस सामंतवादी प्रभाव को हटाते ही भारत फिर से समृद्ध, शक्तिशाली, प्रभावशाली और गौरवशाली देस (देश) बन जाएगा। 

किसी भी काल में सामाजिक रुपांतरण की यानि इतिहास की वैज्ञानिक व्याख्या सिर्फ और सिर्फ उत्पादन , वितरण, विनिमय एवं उपभोग की शक्तियों एवं साधनों और उनके अन्तर्सम्बन्धों के आधार पर किया जा सकता है। इसे समझिए।

विद्वजन विचार करें।

धम्म चक्र वर्ती शासक अशोक (असोक) को शत् शत् नमन।

आचार्य निरंजन सिन्हा

पटना।

सोमवार, 12 अप्रैल 2021

बाबा साहब ने क्यों नहीं कहा : “संघर्ष करो”

"संघर्ष करो"

 शब्द बाबा साहेब के नहीं हैं।

दिनांक 18- 19 जुलाई 1942 को नागपुर में All India Conference of the Depressed Classes की सभा में डॉ भीम राव आम्बेडकर के अंतिम वाक्य थे –

My final words of advice to you are

Educate,  Agitate and  Organise;

have Faith in Yourself.”

इसमें Struggle शब्द नहीं थे।

यह बाबा साहब का सबसे ज्यादा गलत ढंग से उद्धृत (Most misquoted) किया जाने वाला नारा है| अब अक्सर लोग इसे Educate, Organise and Struggle लिखते, बोलते एवं उद्धृत करते हैं| इस नारा में एक नया शब्द – Struggle है और शब्दों की क्रमबद्धता (sequence) भी बदल दी गयी है| 

तो प्रश्न यह उठता है कि क्या बाबा साहेब को Agitate और   Struggle शब्द के अर्थ और भाव का पता नहीं था? , या आज के तथाकथित बुद्धिजीवी आन्दोलन करने वाले  लोगों को यह समझ नहीं है। 

पहले हम बाबा साहब के सही नारा का अर्थ हिन्दी भावार्थ के साथ समझते हैं | यदि “Educate, Agitate and Organise” का हिन्दी भावार्थ किया जाय, तो मेरे अनुसार “शिक्षित करो, मंथन (या मनन) करो, संगठित करो” होता है। नादान लोगों ने एक महान विचारक के एक शब्द बदल कर उनके सम्पूर्ण भावार्थ ही बदल दिया और इसकी क्रमबद्धता (Sequence) भी बिगाड़ दिया| वे Agitate को समझ नहीं पाए और इसलिए इसे हटा दिया| इसके बदले वे लोग एक नया शब्द लाये, जो उन लोगो को अच्छा लगता था और उनकी समझ के स्वभाविक स्तर में आता था| शब्दों का अर्थ उनके संदर्भ में होता है और प्रत्येक शब्द का अपना एक सुनिश्चित संरचना होता है। यही 'भाषा का संरचनावाद' (Structuralism of Language) भी कहता है।

दरअसल 'Struggle' (संघर्ष) शब्द से शारीरिक उद्वेलन, शारीरिक हलचल, शारीरिक उठा-पटक और शारीरिक हिंसा की गंध आती है। (द्वंदात्मक भौतिकवाद)। यह एक नकारात्मक शब्द है, जबकि मनन करना, मंथन करना एक सकारात्मक शब्द है। संघर्ष करना किसी के विरुद्ध होता है और मनन मंथन करना किसी का भी अपना होता है, लेकिन इसमें विरोध का भाव नहीं आता। 

साधारणतया या अक्सर लोग अपने व्यक्तित्व के अनुसार ही दूसरों के व्यक्तित्व को समझते हैं। साधारण लोग डा अम्बेडकर के बहुआयामी व्यक्तित्व को समझ ही नहीं पाते है। ये लोग उनके सांस्कृतिक, आध्यात्मिक, आर्थिक और वैज्ञानिक पहलु को कल्पना में भी देख नहीं पाते और अपने स्वभाव के अनुसार सिर्फ राजनीतिक पहलू तक सीमित रह जातें हैं। डाक्टर बाबा साहेब अंबेडकर के द्वारा  'Agitate' (मंथन, चिन्तन-मनन) शब्द विशुद्ध रूप से आत्मिक उन्नति के संदर्भ में प्रयुक्त किया गया है। .... और यह आध्यात्मिक क्षेत्र के प्रमुख लक्ष्यों जैसे- वास्तविक ज्ञान, परम संतोष, समस्त भयों से मुक्ति, स्थित-प्रज्ञता, समस्त सांसारिक दुखों से आत्यांतिक मुक्ति तथा अंततः निर्वाण की प्राप्ति हेतु किये जाने वाले उन कठिन मानसिक/ बौद्धिक पराक्रमों एवं पुरुषार्थों को इंगित करता है, जो मनुष्य अपने मन: क्षेत्र (Psychic Field) में सतत् सक्रिय रहकर इसे बुद्ध के अष्टांग मार्ग के संदर्भ में समझा जाय।

कोई शब्द अपने आप किसी अर्थ को जन्म नहीं देते, बल्कि वे एक मृत यांत्रिक ध्वनि संकेत मात्र हैं। वस्तुत: मनुष्य की 'समझ' (Power of Perception) ही किसी शब्द विशेष को कोई अर्थ प्रदान करती है। और यहां समझने वाली सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मानव की यह 'Perceptional Power' पीढ़ी दर पीढ़ी लगातार बदलती रहती है।..... और इसी लिए भाषाविज्ञानी कहते हैं कि हमारी भाषा-बोली के तमाम सारे शब्द पीढ़ी दर पीढ़ी अपना अर्थ बदलते जाते हैं या फिर मृत होकर हमारे शब्दकोश से ही गायब हो जाते हैं।

दूसरी बात यह कि किसी शब्द के पर्यायवाची शब्दों के अर्थ कभी भी पूर्णतः समान नहीं होते, बल्कि उनमें संदर्भ भेद के अनुसार थोड़ी-बहुत  भिन्नता अवश्य रहता है। वैसे ही किसी शब्दकोष (डिक्शनरी) में किसी शब्द के जो अनेक अर्थ दिये हुए होते हैं, वे सर्वथा समान अर्थ  नहीं रखते, और न ही उस शब्द के सभी पर्यायवाची शब्द स्थान की सीमा की वजह से अंकित हो पाते हैं। अतः मेरा निवेदन है कि 'Agitation' का एक अर्थ भारतीय अध्यात्मिक परंपरा के संदर्भ में समझने का प्रयास किया जाय, न कि उसका अर्थ केवल आधुनिक लोकतांत्रिक शासन प्रणालियों के जिन्दाबाद-मुर्दाबाद या साम्यवादी पृष्ठभूमि के शोषक- शोषित या मालिक- मजदूर के संदर्भ में ही समझा जाय।  

लेकिन लोग बाबा साहेब के राजनीतिक कैरियर से कंफ्यूज होकर इस शब्द का अर्थ साम्यवादी/ समाजवादी विचारधारा के संदर्भ में निकालने लगते हैं। बस सारी गड़बड़ी की जड़ यही है। और परिणाम यह होता है कि हम 'स्वतंत्रता आंदोलन' की परिस्थितियों की पृष्ठभूमि में उपरोक्त शब्द के वास्तविक संदर्भ को ही बदल बैठते हैं।

वर्तमान क्रांतिकारी शूरवीर यह नहीं समझना चाहते हैं कि एक महान विद्वान एवं विचारक ने ये शब्द क्यों दिए और उनकी क्रमबद्धता के विशिष्ट अर्थ क्या थे? वे कम से कम डॉ आम्बेडकर के नाम पर तो ठहर जाते| कम से कम उन्हें (बाबा साहब को) को तो हम अपनों से बड़ा जानकार मान लेते, तो शायद यह गलती नहीं करते| यह संशोधन किसी दूसरे के कहने पर किया गया, या नासमझी में किया गया, मुझे पता नहीं| इसमें परिवर्तन साजिश के अंतर्गत मानना भी गलत नहीं होगा| इस परिवर्तन का कितना बड़ा अंतर पड़ता है, शायद उनको इसका अंदाजा ही नहीं है| एक झटके में उस महान विचारक के शोधित (Refined) और गंभीर नारा को बरबाद कर दिया गया और मानवता का बहुत बड़ा अहित कर दिया|

पहले तो यह जाना जाय कि इस नारा के संकेत (Clue) या सूत्र बाबा साहब ने कहाँ से लाया? बाबा साहब मानवता के महान वैज्ञानिक तथागत बुद्ध के अनुयायी थे| इन्होंने उनके दर्शन एवं सिद्धांत का सम्यक अध्ययन किया और एक पुस्तक भी लिखी – “बुद्ध एवं उनका धम्म”| बुद्ध विश्व के महान विचारक एवं वैज्ञानिक थे| उनके दर्शन का मूल सिद्धांत था –

बुद्धम शरणम गच्छामि|

धम्म शरणम गच्छामि||

संघम शरणम गच्छामि|||

इनके क्रम पर भी ध्यान दिया जाय| 

बुद्धम शरणम गच्छामि” का अर्थ हुआ – बुद्धि के शरण में जाता हूँ| बुद्ध एक संस्था भी थे। और बुद्ध बुद्धि की एक उपाधि भी थी| गोतम (बुद्ध इस परम्परा में 28 वे बुद्ध थे) एक व्यक्ति भी थे, परन्तु बुद्ध भारत में बुद्धिवादियों की एक परम्परा के क्रम में एक नाम भी है| बुद्धि अवलोकन एवं अध्ययन (शिक्षा) से आता है| अत: बुद्ध (यानि बुद्धि) के शरण में जाता हूँ| 

धम्म शरणम गच्छामि” का अर्थ हुआ – किसी भी चीज के अवलोकन एवं अध्ययन (शिक्षण) के उपरान्त उसमे जो धारण करने योग्य है, उसे धारण करता हूँ| धम्म क्या है? धारेति ति धम्मो| जो धारण करने योग्य है, वह धम्म है| अर्थात मानवता के कल्याण में जो मानवीय गुण है, वह धारण करने योग्य है| अर्थात अवलोकन एवं अध्ययन के उपरान्त जो मानव कल्याणार्थ है, उसे धारित करता हूँ| 

इसी तरह “संघम शरणम गच्छामि” का अर्थ हुआ – आपने जो अवलोकन एवं अध्ययन के उपरान्त जो धारण किया, उस पर आवश्यकता अनुसार सम्यक निष्कर्ष के लिए संघ के शरण में जाता हूँ, या उन धारित तथ्यों एवं बातों को व्यवस्थित करता हूं| किसी भी अध्ययन का सही निष्कर्ष तभी पा सकते हैं, जब आप उसे विद्वानों की मंडली (संघ) में विमर्श के लिए उपस्थापित करते हैं | विद्वानों से विमर्श संघ, संगठन  में ही हो सकता है और इसीलिए संघ के शरण में जाता हूँ, ताकि अध्ययन का सही, सम्यक एवं मानवता के अनुरूप अर्थ पाया जा सके| शब्द Organise का एक अर्थ संगठित करना भी है। अर्थात सीखे गए और मनन मंथन किए गए विचारों को आवश्यकता अनुसार परिमार्जित करना भी है। इस पर ध्यान दिया जाए।

बाबा साहेब ने ज्ञान के इसी सिद्धांत को आज की परिस्थितियों के अनुरूप एक क्रम में रखा – अध्ययन करो अर्थात शिक्षित बनों यानि शिक्षा पाओ (शिक्षित करों या बनो); उस अध्ययन यानि शिक्षा का मनन- मंथन करो, ताकि उसमे धारण करने योग्य बनाया जा सके (मंथन करो); और फिर उस धारण किये गए विषय वस्तु पर सम्यक विमर्श के लिए संगठित हो, ताकि सही, सम्यक एवं उचित निष्कर्ष पर पहुंचा जा सके (संगठित हो)| संगठित करने का एक अर्थ यह भी है कि अध्ययन किए गए और मनन मंथन के उपरान्त निकाले गए निष्कर्ष को अपनी आवश्यकता के अनुसार व्यवस्थित करना यानि संगठित करना भी है।

हमलोग उस महान विचारक का भाव एवं अर्थ समझे बिना उसमे संशोधन कर देते हैं, जो उस महान विचार के प्रति समुचित व्यवहार नहीं है| Agitate शब्द का सही अर्थ संदर्भवश मनन मंथन करना होता है ; नहीं कि संघर्ष करना| दही को मथ (मंथन) कर घी निकालने वाला यंत्र Agitator (घोटना) कहलाता है,  जो किसी भी ग्रामीण घर में होता है| इसे दाल घोंटना भी कहते हैं। अत: Agitate  शब्द को तथा उसके अर्थ को अन्यथा नहीं लिया जाना चाहिए, उसे सही संदर्भ में समझा जाना चाहिये|

बाबा साहब ने “संघर्ष करो” क्यों नहीं कहा? शब्दों का अर्थ, भाव, कल्पना और प्रभाव का बहुत अन्तर पड़ता है। हम जो शब्द बोलते हैं, बोलते ही उस शब्द की कल्पना में छायाचित्र बन जाता है| यह विज्ञान में स्थापित हो चुका है, कि जो शब्द हम कल्पना में लाते हैं, वे अपने से सम्बन्धित और विचारों को जोड़ते हैं, उसे समृद्ध करते है और उस पर हमारा केन्द्रण (Concentration) बढ़ जाता है, उसमें ऊर्जा का प्रवाह बढ़ जाता है| जिन शब्दों पर हमारा संकेंद्रण बढ़ता है और जो शब्द कल्पना में होते हैं, वहीं जीवन में भौतिक स्वरूप में बदल जाते हैं। ऐसे लोगों का जीवन सदैव संघर्षशील होता है और उन्हें शायद ही कोई सफलता मिलती हो। संघर्ष शब्द से हमारी सकारात्मकता एवं रचनात्मकता घटने लगती है| हम गलत दिशा में उलझने लगते हैं, भटकने लगते हैं। भारत के लोगों में सकारात्मकता एवं रचनात्मकता बढ़ाने के लिए ही बाबा साहेब ने "संघर्ष करो" नहीं कहा।

शब्दों के अर्थ क्या होते हैं और कितने महत्वपूर्ण होते है, यह समझने के लिए एक सही प्रसंग उद्धृत कर रहा हूँ| नोबल पुरस्कार से सम्मानित मदर टेरेसा कोलकाता में रहती थीं| एक बार कुछ सामाजिक कार्यकर्ता उनके पास एक “युद्ध विरोधी” रैली में शामिल होने के लिए अनुरोध करने आया| उन्होंने युद्ध विरोधी रैली में शामिल होने से मना कर दिया| उन्होंने कहा – “मैं युद्ध विरोधी रैली में शामिल नहीं हो सकती, परन्तु शान्ति के समर्थन में यदि कोई रैली निकलना तो मुझे जरुर बुलाना|” पहले दोनों शब्द (युद्ध एवं विरोधी) नकारात्मक थे - ये दोनों नकारात्मकता का भाव पैदा करता है, ऊर्जा का स्तर घटाता है और नकारात्मक चित्रण करता है, जो जीवन में ठोस स्वरुप लेने लगता है| जबकि “शान्ति के समर्थन“ में दोनों शब्द सकारात्मक हैं, सकारात्मक चित्रण करता है, और ऊर्जा का स्तर भी बढ़ता है| अब आप एक ही भावार्थ के दो विपरीत अर्थ के शब्दों को समझ गए होंगे| कितना अंतर पड़ गया और इसीलिए एक स्थापित हस्ती ने इसमें सावधानी बरतीं| हम भी सावधान हो जाएँ|

बाबा साहेब ने भारत में वह काम किया, जो शताब्दियों से कोई नहीं कर पाया| क्या उन्होंने संघर्ष किया? क्या कभी कोई उदहारण है, जो लाठी से भी संघर्ष किया गया है और उस संघर्ष में बाबा साहब शामिल हुए है? बिना किसी हथियार या संघर्ष के उन्होंने वह कर दिया, जो कोई बड़े सेना का सेनापति नहीं कर सकता है| बाबा साहेब चाहते थे कि उनका यह कारवां मानवता के लिए अग्रसर होता रहे| उनके असामयिक देहांत होने और उनके अनुयायियों के द्वारा उनके मिशन को भटका दिए जाने से निश्चय ही भारत में मानवता को अभूतपूर्व नुकसान हुआ है|

विक्टर ह्यूगो कहते हैं – “जब एक उपयुक्त विचार के लिए उपयुक्त समय आता है, तो सारी सेनाओं की शक्तियाँ उनके सामने कुछ नहीं होता|” यह विचार की शक्तियों को रेखांकित करता है। इसीलिए किसी चतुर चालाक साजिशकर्ता ने एक महान विचारक के सबसे प्रमुख विचार में ही विरुपण (Distortion) यानि तोड़फोड़ (Break off) कर उसके प्रभाव को घटा दिया है, या निष्प्रभावी (Ineffective) बना दिया है। बाबा साहेब के सबसे प्रमुख विचार के साथ यही साजिश की गई, जिसे नादान अनुयायियों ने सही मान लिया। ये नादान आज भी स्वयं भटक रहे हैं और अपने लोगों को भी भटका रहे हैं। यदि ऐसा नहीं है, तो क्या ऐसे लोग बाबा साहेब आंबेडकर से भी ज्यादा ज्ञानी है और इसलिए बाबा साहेब के प्रमुख निचोड़ सूत्र में ही संशोधन कर दिया? 

आज जब हम एक महान विचारक का प्रमुख सूत्र, यानि नारा, यानि उनके दर्शन यानि सिद्धांत के निचोड़ को ही बदल दिए हों;, तब हम कैसे आगे बढ़ेंगे और उनके कारवाँ को कैसे बढ़ाएंगे? हमें सोचने समझने के लिए ठहरना होगा| हमें समझना होगा| हमें विमर्श करना होगा कि समुचित और सत्य क्या है?

यदि कोई बाबा साहेब के उक्त सूक्त को बदलना चाहता है, तो बदल सकते हैं, संशोधित कर सकते हैं, लेकिन अपने नाम पर ऐसा करे; लेकिन बाबा साहेब के नाम पर नहीं करे, यानि ऐसे संशोधन को बाबा साहेब का बता कर प्रचारित, प्रसारित एवं प्रचालित कदापि नहीं करे। 

आइये, इस अवसर पर एक सम्यक विमर्श शुरू करें| तब ही 140 करोड़ का मानव संसाधन अपने संभाव्य क्षमता का महत्तम उपयोग कर सकेगा और मानवता का महाकल्याण हो सकेगा| इससे राष्ट्र और समाज में सुख, शान्ति एवं समृद्धि स्थापित होगा|

आचार्य प्रवर निरंजन जी

भारतीय संस्कृति का ध्वजवाहक

शुक्रवार, 9 अप्रैल 2021

बुद्ध का अध्यात्म

हम पहले अध्यात्म को समझें, फिर बुद्ध का अध्यात्म समझेंगे

इस "अध्यात्म" को 'अध्ययन एवं आत्म' का संयुक्ताक्षर भी समझा जाना चाहिए | अत: इसे आत्म (Self) का अध्ययन समझा जाना चाहिए| अब प्रश्न है कि यह आत्म का अध्ययन किसके सन्दर्भ में और क्यों"अध्यात्म" को 'अधि एवं आत्म' का संयुक्ताक्षर भावार्थ भी माना जाता है, जिसका अर्थ होता है आत्म से 'ऊपर' यानि 'परे' यानि 'अलग'| यही ऊपर या परे यह दर्शाता है, कि आत्म का सम्बन्ध किसी दुसरे सन्दर्भ में भी हैअध्यात्म को अंग्रेजी में SPIRIT कहते हैं, जिसका अर्थ "अधि प्राकृतिक वस्तु या भाव" (Super Natural Being or Essence) का होना हैइस अध्यात्म को मन (Mind - विचार, बुद्धि, मानस, मस्तिष्क, ध्यान, चित्त, स्मरण, रूचि) का विशेष अवस्था या ढांचा या अभिवृति (Attitude) भी कहते हैं| इसे मन का विशेष झुकाव (A mental disposition) भी समझा जाता है| इस मन या चित्त या आत्म को आत्मा (Soul) से नहीं जोडा जाए, जो विशिष्ट भारतीय अवधारणा है।  आत्म या मन, चित या मानस भारत में प्रचलित 'आत्मा' से सर्वथा भिन्न है| यह भी ध्यान रहे कि तथागत बुद्ध इस आत्मा अवधारणा को गलत, अवैज्ञानिक एवं साजिश भी मानते थे|

मानव जीवन के किसी भी क्षेत्र में या किसी विशेष उपलब्धियों को पाने वाले हरेक व्यक्ति आध्यात्मिक होता ही है| यह अलग बात है, कि वह सफल एवं विशेष व्यक्ति इसे अध्यात्म का नाम देता है या नहीं| शायद उसे उस प्रक्रिया का नाम अध्यात्म का पता ही नहीं होइसका अर्थ यह हुआ कि अध्यात्म एक प्रक्रिया है, जिससे हर सफल या विशिष्ट व्यक्ति गुजरता ही होता है| इसे विशेष पोशाक, व्यवहार, चाल- ढाल या निवास से इंगित नहीं किया जा सकता हैयह एक शुद्ध विज्ञान है, जो एक व्यक्ति को विशेष प्रक्रिया से अनन्त प्रज्ञा को जोडती है| इसे आगे समझते हैं|

अध्यात्म एक उत्सुकता पैदा करने वाला रोचक शब्द है| इसे मजाक में कुछ लोग आत्म से ऊपर गुजर जाने वाला अर्थ मानते हैं, अर्थात आत्म से जुडी वे सभी बातें जो समझ से परे हो| यानि आत्म से जुडी सभी ना समझ में आने वाली बातें अध्यात्म है| व्यावहारिक रूप में यह अर्थ गलत नहीं है, परन्तु समुचित भी नहीं है| सामान्य लोग इसे भक्ति या ईश्वर या अलौकिक सत्ता से जोड़ देते हैं, जो ग़लत है| ् इस तरह की इन गतिविधियों में लीन या लिप्त लोग आध्यात्मिककहा जाना गलत है|

तथाकथित बौद्धिक लोग इसे घिसा- पिटा शब्द या भाव मानते हैं| इसे भावहीन, अर्थहीन एवं पुराना होने के कारण ही घिस गया मानते हैं| इसकी कोई उपयोगिता नहीं माने जाने से इसे पिट गया भी बताया जाता है| मैं भी दो दशक पहले इसे ऐसा ही समझता था| लेकिन अब इसे घिसा और पिटा हुआ नहीं मानता हूँ| अब इसे विज्ञान की आधुनिकतम क्षेत्र क्वांटम भौतिकी एवं क्वांटम क्षेत्र सिद्धांत (Quantam Field Theory) के आलोक में समझने एवं समझाने का प्रयास कर रहा हूँअध्यात्म का क्षेत्र जीवन में सफलता का सिद्धांत है|

वास्तव में अध्यात्म प्रकृति के कार्य- नियमों एवं उसकी क्रियाविधि को जानना है। इसे जान एवं समझ कर इसका जीवन में कल्याणकारी उपयोग करना ही अध्यात्म है| इसे आस्थावाद (परम्परागत भक्ति) से कोई लेना देना नहीं है| दरअसल इसके इतने महत्वपूर्ण पक्ष एवं महत्वपूर्ण उपयोग के कारण ही कुछ ढोंगी एवं स्वार्थी प्रवृति के लोग इसका दुरूपयोग कर रहे हैं, या यों कहें, इसका उपयोग नगण्य एवं दुरूपयोग अधिकतम हो रहा है|

स्पष्ट है कि अध्यात्म कोई ईश्वरीय ज्ञान या ईश्वरीय चर्चा का विषय या क्षेत्र नहीं हैयह अध्यात्म 'आत्म' को यानि 'आपको' "अनन्त प्रज्ञा" (Infinite Intelligence) यानि "अनन्त शक्ति" या "अनन्त व्यवस्था" से जोड़ने की विधा है, तकनीक है, कौशल है, विषय है, जिसे कोई भी सीख या प्राप्त कर सकता है| इसे आप ऐसा मानवीय स्वभाव कह सकते हैं, जिसके द्वारा कोई भी अनन्त प्रज्ञा अर्थात प्राकृतिक अदृश्य शक्तियों का उपयोग अपने एवं मानव कल्याण के लिए करता है

बुद्ध का अध्यात्म इसी आत्म का तटस्थ अवलोकन कर उसे नियंत्रित करना है। इस अवलोकन के लिए आपको अपने आत्म को अपने शरीर से अलग कर एवं तटस्थ कर अवलोकन करना होता है। इस विधि या प्रक्रिया को ही विपश्यना यानि विपस्सना कहा गया है। इसीलिए अल्बर्ट आईंस्टीन ने कहा है कि किसी भी समस्या का समाधान चेतना के उसी स्तर पर नहीं किया जा सकता है, जिस चेतना के स्तर पर उस समस्या का उत्पादन होता है। अतः किसी भी समस्या का समाधान उस चेतना के स्तर से भिन्न स्तर पर ही होगा।  उस 'आत्म' को अनन्त प्रज्ञा से जोड़ने एवं उसकी शक्तियों को प्राप्त कर मानव उपयोग में लाने की प्रविधि है, तकनीक है, अभियंत्रण हैविपश्यना आपके आत्म को अनन्त प्रज्ञा से जोड़ता है और अनन्त ज्ञान आपको उपलब्ध कराता है, जो आपको चाहिए।

अध्यात्म कोई पारलौकिक दर्शन या भक्ति का दर्शन या इसी प्रकार का कोई विश्लेषण भी नहीं हैयह किसी के शरीर से पृथक एक व्यापक सत्ता या व्यवस्था या प्रणाली से सम्बन्ध जोड़ने एवं उसका उपयोग करने की प्रक्रिया है, व्यवस्था है या प्रणाली हैयह शरीर से अलग कोई पृथक व्यक्तिगत सत्ता भी नहीं है; लोग आत्म (Self) को आत्मा (Soul) बनाकर शरीर से अलग एक सत्ता का भ्रम बनाते या पैदा करते देते हैं|

कुछ लोग प्रत्येक वस्तु के मूलभाव यानि मूल स्वाभाव को ही अध्यात्म कहते हैं, यह समुचित प्रतीत नहीं होताकिसी भी वस्तु के मूल भाव यानि मूल स्वभाव को ही बौद्ध दर्शन में 'धम्म' कहा गया है| “धारेती ति धम्मों”| जो गुणधारण किए हुए है, वह (गुण) उसका धम्म है, यानि धर्म है, यानि उसका स्वभाव है| पानी का गुण शीतलता प्रदान करना, आग बुझाना, बह जाना, बर्तन में धारित किए जाने पर बर्तन का आकार ग्रहण करना, अपना तल (Level) स्वयं खोज लेना आदि पानी का धम्म है, धर्म है, स्वभाव है| परन्तु यह गुण धारण करना अध्यात्म नहीं है|

अध्यात्म का स्वभाव मानव में हो सकता है, किसी दुसरे जीवों एवं वस्तुओं में नहींवस्तुओ में चेतना नहीं होती है और इसीलिए वस्तु स्वयं का प्रयोग नहीं कर सकता| जीवों में चेतना होती है और वह किसी भी दिशा में या दशा में कोई या कुछ कार्य कर सकता है, परन्तु वह मानव की तरह सोच एवं विचार नहीं कर सकता हैमानव ही एक ऐसा जीव है जो अपने सोच एवं विचार पर भी विचार करता है, कर सकता है; किसी और जीव में अपने सोच एवं विचार पर भी विचार करने की क्षमता नहीं होती| इसीलिए मानव आध्यात्मिक हो सकता है, कोई और जीव या वस्तु आध्यात्मिक नहीं हो सकता है|

किसी मानव के स्वयं सत्ता (Self Authority) और अनन्त प्रज्ञा यानि प्राकृतिक शक्तियों की सत्ता के मध्य कोई संक्रमणशील (Transit) सत्ता की अवधारणा मानी जा सकती है| चूँकि यह संक्रमणशील है, अत: इसे स्वतंत्र स्वरुप नहीं दिया जाना चाहिए| यह तो सिर्फ स्वयं की सत्ता एवं अनन्त प्रज्ञा की सत्ता के मध्य जोड़ने वाली अवस्था है, कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं| अत: अदृश्य या मानसिक स्तर पर दो ही सत्ता हुई एक स्वयं की सत्ता एवं दूसरी अनन्त प्रज्ञा की सत्ता|

स्वभाव किसी भी वस्तु या जीव का अपना (स्व का) भाव होता है| स्व एवं भाव| किसी भी वस्तु का स्वयं का भाव उसके अन्दर की व्यवस्था और बाह्य व्यवस्था के द्वारा संचालित, निर्देशित या नियंत्रित हो सकता हैस्वानुभूति किसी का स्व यानि स्वयं की अनुभूति होती है, अर्थात किसी के प्रति स्वयं की संवेदना या भाव होता है| किसी भी मानव का स्व का अस्तित्व उसके शारीरिक काया में ही रह सकता है, उसके शारीरिक  क्षेत्र से बाहर नहीं रह सकताकिसी के शरीर के अन्दर ही सुख है, दुःख है, विज्ञान है, दर्शन है, प्रश्न है, जिज्ञासा है, उत्सुकता है और शरीर के अन्दर ही बुद्धि, विवेक, विचार, दृष्टि, मन, चित्त आदि है| 'स्व' यानि 'स्वयं' यानि 'आत्म' को अभी तक तरंगीय या उर्जा या कण के मैट्रिक्स (Matrix – आव्यूह) की सता के रूप में परिभाषित या चिन्हित नहीं किया गया है| इस दिशा में विज्ञान को भी अपेक्षित सफलता नहीं मिली हैं| CERN के वैज्ञानिक भी इस अवस्था के पूर्व की अवस्थाओं की स्थापना एवं सत्यापन में लगे हुए हैं| शायद वे इस अवस्था के बाद उस दिशा में आगे बढ़ें|

"स्व" (Self) के लिए 'अर्थ' (धन) निकलना ही 'स्वार्थ' है, तो 'स्व' पर 'अभिमान' करना 'स्वाभिमान' है| किसी भी विचार या वस्तु के प्रति अभिमान करना एक हद तक गतिविधियों के सञ्चालन के लिए प्रेरक होता है| यह अभिमान किसी भी चीज को पैदा करने के लिए प्रेरित करता है, संचालित करता है और नियंत्रित करता है| किसी भी सीमाओं का अतिक्रमण नकारात्मक प्रभाव पैदा करता है और इसीलिए स्वाभिमान का अति सीमाओं का अतिक्रमण है|  

"स्व" (Self) का एक निर्धारित क्षेत्र होता है, जिसे विमाओं (Dimensions) के दृष्टिकोण से भौगोलिक (आकाशीय) क्षेत्र कह सकते हैं| वैसे तो किसी भी वस्तु के भौगोलिक क्षेत्र में स्थान निर्धारण में सामान्यत: तीन विमायें (X, Y, Z – अक्ष) ही स्वीकार्य है, परन्तु अल्बर्ट आइंस्टीन के चौथे विमा समय (Time) के साथ इसका क्षेत्र और विस्तारित एवं व्यापक हो जाता है| इस तरह 'स्व' की सीमा या दायरा यह भौतिक शरीर ही हैइसी स्व का विस्तार में परिवार, समुदाय, राष्ट्र एवं मानवता आता हैइस विस्तार में विविध वस्तुएं एवं जीव जन्तु आ सकते हैं| इसके महत्तम विस्तार में आप ब्रह्माण्ड को शामिल कर सकते हैं| इस्रायली लेखक युवाल नोहा हरारी जिस देव मानव” (Homo Deus) की कल्पना निकट भविष्य में की है, उसके कारण स्व में ब्रह्माण्ड भी शामिल होता दिखता है| जब स्व का चरम विस्तार हो जाता है, तो वह स्व परम हो जाता है| जब इस परम के लिए अर्थ जोड़ते हैं, तो आप परमार्थ करते हैं|

आपने देखा कि 'स्व' का सम्बन्ध 'भाव' से है और यह स्व एवं स्वभाव मिलकर संसार बनाता है और चलाता है| यही दोनों इस संसार को निर्देशित एवं नियंत्रित कर आपके लिए सफलताओं का द्वार खोलता हैतथागत बुद्ध कहते हैं कि स्व का भाव स्वभाव उस व्यक्ति के मन यानि चित्त यानि स्व से निर्देशित, नियंत्रित एवं संचालित होता हैअत: सबसे प्रमुख मन का अध्ययन, अवलोकन, नियंत्रण एवं केन्द्रण हैइस दिशा में तथागत का योगदान अवश्य ही अप्रतिम है|इस विधा का आविष्कार सबसे पहले तथागत बुद्ध ने किया, जो मानवता को शानदार उपहार है। यही बुद्ध का अध्यात्म है।

आचार्य निरंजन सिन्हा 

बुधवार, 17 फ़रवरी 2021

न्यायिक तंत्र में विश्वास और विकास (Faith in Judicial System and Development)

एक बड़ा प्रश्न है कि क्या न्यायिक तंत्र में विश्वास और उस प्रदेश या देश के विकास में कोई प्रत्यक्ष संबंध है? इसका उत्तर काफी स्पष्ट और सकारात्मक है। इतिहास गवाह है कि स्पेन और पुर्तगाल विश्व के कई भू भागों को पहले ख़ोज निकाला और सबसे पहले उपनिवेश भी बनाना शुरू किया; लेकिन इस मामले में पूंजी (Capital) निवेश की भारी आवश्यकता होती है। इन देशों में उस समय न्यायिक तंत्र पर लोगों का भरोसा उठ गया था; परिणामत: देशी पूंजी निवेश बाहर जाने लगा और बाहरी पूंजी निवेश इन देशों में आने से बचने लगा। वहीं ब्रिटेन और हालैंड की न्यायिक तंत्र में लोगों का बड़ा विश्वास रहा और इसी से वे हर मामले में आगे बढ़ते चले गए। क्या भारत के बारे में ऐसा कहना उचित रहेगा? क्या यह नियम सर्व व्यापी है और सर्व कालिक है? यदि "हां", तो भारत के बारे में आवश्यक विश्लेषण अवश्य किया जाना चाहिए। नकारात्मक आलोचना नहीं हो, परन्तु सकारात्मक, रचनात्मक, सुधारात्मक और सृजनात्मक आलोचना का स्वागत किया जाना चाहिए। न्यायिक तंत्र में सिर्फ वैधानिक विधि ही शामिल नहीं है, अपितु प्रशासनिक विधि सहित विधि के प्रचलित सभी स्वरुप शामिल हो जाते हैं जो वैधानिक नियमों, निर्देशों, आज्ञाओं, प्रतिषेधों सहित सभी रुपों को नियमित, नियंत्रित, संचालित, और प्रभावित करता है।

जब  किसी क्षेत्र या समाज के न्यायिक तंत्र में किसी व्यक्ति, समाज या संस्थान का विश्वास नहीं होता तो वह वहां पूंजी, समय और संसाधन में निवेश नहीं करता है और परिणाम पिछड़ापन होता है। न्यायिक तंत्र में विश्वास नहीं होने का कई कारण हो सकते हैं - लोगों का निम्न शैक्षणिक स्तर, निम्न बौद्धिक क्षमता, जटिल एवं लम्बी न्यायिक प्रक्रिया, जजों की अपर्याप्त संख्या बल, जजों की बहाली की अपारदर्शी प्रक्रिया, और कभी कभी न्यायिक तंत्र से जुड़े लोगों का विवादास्पद, तथा अवैज्ञानिक एवं मानवीय मूल्यों के विरुद्ध बयान। लोगों (वैश्विक एवं स्थानीय) के अविश्वास के लिए व्यवस्था भी दोषी है। इसे बनाए रखने एवं इसे और मजबूत करने की जबावदेही क्या व्यवस्था पर नहीं है?

आप चर्चा पर रोक लगा सकते हैं और पारदर्शिता को बाधित कर सकते हैं, परन्तु भरोसा (Faith) को नियंत्रित नहीं कर सकते। यह भरोसा अपना काम अपने ढंग से करता रहता है। इन्टरनेट संबद्धता (Connectivity) और पारदर्शिता (Transperity) - दोनों को बढ़ा रहा है। आज़ के समय में पहले से उपलब्ध डिजिटल तकनीकों का बेहतर एवं सूक्ष्म समन्वय (Integration) हो रहा है और परिणाम शक्तियों के बदलते प्रभाव एवं नए स्वरूप में दिखता है। शक्तियां ऊर्ध्व (Vertical) से क्षैतिज (Horizontal) हो रहा है, विशिष्ट (Exclusive) से समाविष्ट (Inclusive) हो रहा है और व्यक्तिगत (Individual) से सामाजिक (Social) हो रहा है। इसी कारण न्यायिक तंत्र में अविश्वास का परिणाम पहले की तुलना में अधिक तेज (Fast), व्यापक (Vast) और प्रभावकारी (Effective) होता जा रहा है जो पहले इतना नहीं था। इसलिए ही कहा है कि वर्तमान युग "सूचना का युग"" नहीं; अपितु "सूचनाओं के प्रसार" (Sharing of the Information) का युग है।

कहा जाता है कि न्याय से किसी को हानि नहीं होती; सही कहा गया है परन्तु समुचित न्याय समुचित समय में एवं समुचित व स्वस्थ प्रक्रिया से मिले, तब किसी को हानि नहीं होती। शासन में पारदर्शिता और जवाबदेही तय करने के लिए ही "सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005" लागू किया गया है जो व्यवस्था में प्रशासनिक न्याय के कार्यान्वयन को समुचित नहीं मानता और सुधार की अपेक्षा करता है। यह भी कहा जाता है कि न्यायिक तंत्र में अविश्वास ही भ्रष्टाचार कारण है। यह भी कहा जाता है कि न्याय में अत्यधिक विलम्ब न्याय नहीं है। यह भी कहा जाता है कि न्यायिक तंत्र में विश्वास बनाना और बनाए रखना न्यायिक तंत्र की प्राथमिकता होनी चाहिए। जब न्याय विकास में इतना महत्वपूर्ण है तो जनता के भ्रम और अविश्वास कितना घातक होगा, यह समझने की चीज है। आप प्रचार तंत्र से इस पर काबू पा सकते हैं, परन्तु जब प्रचार तंत्र ही अपनी विश्वसनीयता खो दे तो प्रचार तंत्र भी निष्प्रभावी होने लगता है या हो जाता है। भारत के अधिकांश प्रचार तंत्र के बारे में यह निश्चिंतता से कहा जा सकता है।

ऐसे में यदि न्यायिक तंत्र से जुड़े लोग प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हैं, और विपरीत बयान देते हैं, इससे न्यायिक तंत्र की विश्वसनीयता क्षरित होता है। इस पर सवाल से यह ज्यादा महत्वपूर्ण है है कि उनको इस स्थिति का सहारा क्यों लेना पड़ावह भी बहुत ही जबावदेह और संवेदनशील उच्च पदस्थ प्राधिकारों को। पूर्व का कोई न्यायमूर्ति मोर - मोरनी के आंसुओं से उनके गर्भ धारण का वक्तव्य देता है या ऐसा ही कोई अन्य व्यक्ति ऐसा अटपटा अवैज्ञानिक, तथ्यहीन, अतार्किक बातें सार्वजनिक प्लेटफार्म पर कहता है तो स्वाभाविक है कि उसके तर्कक्षमता और विवेकशीलता पर प्रश्न चिह्न लगेगा। आज के वैज्ञानिक युग में यदि कोई, जो न्यायिक तंत्र से किसी तरह जुड़ा है; तर्क, तथ्य, और विवेक को छोड़ आस्था, रूढ़िवादिता, मानवीय मूल्यों के विरुद्ध बोलता है या व्यवहार करता है तो न्यायिक तंत्र के विश्वास को क्षति पहुंचती है।

न्यायिक तंत्र में विश्वास, राष्ट्र के निर्माण एवं विकास, और पूंजी निवेश के बीच के अन्तर्सम्बन्धों पर विशेष अध्ययन किया जाए और परिणाम का अवलोकन किया जाए। न्यायिक तंत्र में विश्वास ही पूंजी का निवेश कराता है, समृद्धि और विकास के लिए भावनात्मक आधार देता है। मानव भावनाओं से संचालित होता है और मशीन तर्क से प्रभावित होता है। कहा जाता है कि दिल (भावना - Emotions) हमेशा दिमाग (तर्क - Logic) पर हावी रहता है; खासकर कम शिक्षित एवं जागरूक लोगों के मामलों में। यदि यह महत्वपूर्ण है तो समाज और राष्ट्र इस पर विमर्श करें और खुले दिल एवं दिमाग से इस विमर्श को आगे बढाए। यह एक अति गंभीर विषय है।

आइए, एक नए मुद्दे पर विमर्श करें और नया सशक्त एवं समृद्ध समाज तथा राष्ट्र का निर्माण करें।

निरंजन सिन्हा

स्वैच्छिक सेवानिवृत्त,

राज्य कर संयुक्त आयुक्त, बिहार, पटना।

व्यवस्था विश्लेषक एवं चिन्तक।

शनिवार, 13 फ़रवरी 2021

आर्य आक्रमणकारी क्यों हुए?

कहा जाता है कि आर्यों ने 1500  वर्ष ईसा पूर्व भारत में आक्रमण किया और भारत में रच बस गए। इस तथाकथित सत्य का कोई पुरातात्विक साक्ष्य उपलब्ध नहीं है अर्थात कोई भी पुरातात्विक साक्ष्य उपलब्ध नहीं करा सका। फिर सवाल उठता है कि आर्यों को क्यों आक्रमणकारी होना पड़ा?

भारत के इतिहास की कुछ अलग विशिष्टताएं है। सौ साल पहले भारत का इतिहास पाषाण काल से सीधे वैदिक काल पर आ जाता था, परन्तु सिन्धु सभ्यता ने इस क्रमबद्धता को बिगाड़ दिया यानि वैदिक काल के आदि काल होने को झुठला दिया।

इसी तरह चालीस साल पहले तक भारत के इतिहास में महाकाव्य काल हुआ करता था अर्थात महाकाव्य काल को ऐतिहासिक होने का मान्यता थी, परन्तु अब इसे इतिहास के पन्नों से हटा दिया गया है। अर्थात यह काल आस्था का विषय मानते हुए गैर ऐतिहासिक स्थापित हो गया। ऐसा इतिहास के वैश्विक स्तर पर हुआ। अब बारी आर्यों के तथाकथित आक्रमणकारी होने के तथाकथित इतिहास की है।

भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद् के संस्थापक अध्यक्ष एवं प्रसिद्ध इतिहासकार प्रो रामशरण शर्मा जी ने भी अपने बाद के दिनों में लिखा है कि ॠगवेद काल में जो भौतिक साक्ष्य (मृदभांड इत्यादि) धरती पर मिली है, वह दूसरी कहानी कहती है। ॠगवेद का भौगोलिक क्षेत्र पंजाब तक सीमित बताया गया जबकि समकालीन भौतिक साक्ष्य पूरे गंगा- यमुना नदी घाटी सभ्यता क्षेत्र में विस्तारित था। ॠगवैदिक काल में चलन्त अर्थव्यवस्था वर्णित है जबकि भौतिक साक्ष्य स्थिर ग्रामीण अर्थव्यवस्था के स्थापित साक्ष्य उपलब्ध कराता है। प्रो शर्मा यहां कहते हैं कि या तो ॠगवैदिक सभ्यता जमीन पर नहीं था; या जो जमीन पर था, वह ॠगवैदिक सभ्यता नहीं था। इसी तरह उत्तर वैदिक काल के बारे में भी प्रो शर्मा लिखते हैं कि उत्तर वैदिक सभ्यता पूरे उत्तर भारत में विस्तृत बताया गया है जबकि उस काल में उपलब्ध भौतिक साक्ष्य (मृदभांड इत्यादि) नर्मदा नदी के दक्षिण तक विस्तारित था। उत्तर वैदिक काल की दो प्रमुख गतिविधियां - हवन (कुंड) एवं पशु बलि प्रचलित बताया गया जबकि इसके कोई भी भौतिक साक्ष्य जमीन में या सतह पर उपलब्ध नहीं मिले हैं। फिर प्रो शर्मा लिखते हैं कि उस काल में जमीन पर उपलब्ध सभ्यता या तो उत्तर वैदिक सभ्यता नहीं था या उत्तर वैदिक सभ्यता जमीन पर नहीं था।

अभी तक कोई भी ठोस साक्ष्य वैदिक सभ्यता के पक्ष में नहीं आया है। तो आर्यों को आक्रमणकारी क्यों होना पड़ा?

इतिहास का मध्य काल सामंतवाद के उदय के साथ शुरू होता है। इतिहास का सम्यक व्याख्या उत्पादन की शक्तियों और उनके अन्तर्सम्बन्धों के आधार पर किया जाना वैज्ञानिक दृष्टिकोण है और यह सब कुछ काफी संतोषजनक व्याख्या करता है। भारत का सामंतवाद पश्चिमी यूरोप या पूर्वी यूरोप के सामंतवाद से सर्वथा भिन्न था, फिर भी "समानता का अन्त होना" सभी सामंतवाद का मूलाधार है।

भारत में सामंतवाद के शुरुआती शताब्दियों में ही अन्य अरब एवं मुगल आक्रान्ताओ का आगमन हो गया। ये शासक वर्ग हुए। सामंतवाद की आवश्यकताओं ने "समानता के अन्त" के आधार पर ब्राह्मण और क्षत्रिय वर्ग को पैदा किया। इनको प्राचीन, पुरातन, सनातन और सांस्कृतिक बताने की आवश्यकता हुई। इन गुणों के कारण यह गौरवशाली भी हुआ, परम्परा भी हुआ और हमारी संस्कृति भी हुई। हमें शासक वर्ग की तरह विदेशी घोषित करने की भी आवश्यकता हुई ताकि सामान्य जन, जो सामान्यत: शुद्र और अछूत थे, से अलग एक विशिष्ट, सर्वश्रेष्ठ, सर्वोच्च गुणों से युक्त सामान्य जन से भिन्न साबित हो सकें।  इनके सहयोग से भारत में शासन भी आसान हुआ। इसके लिए इनकी प्रकृति एवं उत्पत्ति की अलग अवधारणा की आवश्यकता हुई जो प्राकृतिक, तार्किक एवं स्वाभाविक लगें।

ऐसी स्थिति में एक कहानी बनाया गया कि भारत में सभ्यता की शुरुआत एक घुमन्तू आक्रमणकारियों द्वारा हुईं और उसने ही भारत में सभ्यता की शुरुआत किया। सभी आक्रमणकारियों की तरह इसे भी पश्चिमी दिशा से आया बताया गया। यह अलग बात है कि सिन्धु सभ्यता ने अपने अंदाज में इस अवधारणा पर पहली चोट किया। आर्य आक्रमणकारी एवं उनकी तथाकथित सभ्यता का पुरातात्विक साक्ष्य नहीं है, अतः कथा बनाया गया कि उन लोगों को लिखना नहीं आता था, सिर्फ पढ़ना और रचना करना आता था। उनके समकालीन (पूर्व के सिन्धु सभ्यता और बाद के बौद्धिक सभ्यता) को लिखना आता था परन्तु इस तथाकथित सभ्यता और संस्कृति वाले को बारहवीं शताब्दी में लिखना आया, जब कागज़ का प्रचलन हो गया। बहुत कुछ साक्ष्य उपलब्ध है कि आर्यों की कहानी एक कथा है जिसकी कोई ऐतिहासिकता नहीं है। इसे जब विश्व की छियासी प्रतिशत जनता मान लेगा तो सत्रह प्रतिशत भारतीय भी मान लेगा ही होगा।

मैंने एक भिन्न अवधारणा प्रस्तुत कर दिया है, परन्तु यही सही है और उपरोक्त कारण ही वह कारण है जिसके कारण आर्यों को आक्रमणकारी बनना पड़ा। आप भी मनन मंथन करें। कम से कम इस नजरिए से इसे देखना शुरू कर दिया जाए, भारत के सभी समस्याओं का समाधान खुल जाएगा।

निरंजन सिन्हा

स्वैच्छिक सेवानिवृत्त राज्य कर संयुक्त आयुक्त,

 बिहार, पटना।

व्यवस्था विश्लेषक एवं चिन्तक।

रविवार, 7 फ़रवरी 2021

भारत में विधि या व्यवस्था?

विधि - व्यवस्था किसी शासन प्रणाली की एक अवस्था है, जिसमें विधि को बनाया जाता है, ताकि उसके अनुरूप व्यवस्था बनी रहे। यह एक सामान्य प्रचलित शब्द है, जिसका अर्थ भी बड़ा सामान्य है। परन्तु ध्यान से देखने पर पता चलता है कि इसमें दो भिन्न भिन्न शब्द है - विधि एवं व्यवस्था। दोनों ने कौन ज्यादा महत्वपूर्ण है और भारत में कौन ज्यादा अर्थवान है? प्रश्न असामान्य दिखता है, पर उत्तर गहरा और गंभीर है।

भारत में 'विधि' अधिक महत्वपूर्ण है, तो चीन में 'व्यवस्था' अब आप इन दोनों के अंतर के प्रभाव को माप सकते हैं - चीन भारत से अर्थव्यवस्था में 1985 तक पीछे था और अब भारत की अर्थव्यवस्था से सात गुना से अधिक बड़ा है, यद्यपि दोनों की जनसंख्या लगभग समान है। यह 'विधि' और 'व्यवस्था' की प्राथमिकता का फर्क है।

कोई विधि मानवीय आचरण को नियमित, नियंत्रित, एवं निर्देशित करने के सामान्य नियम होते हैं, जो राज्य द्वारा स्वीकृत होते हैं तथा जिसका अनुपालन अनिवार्य होता है। किसी भी नियम की संहिता को विधि कहा जाता है। यह समाज को सम्यक ढंग से संचालित करने के लिए आवश्यक होता है, ताकि समाज की उत्पादकता में संवर्धन होता रहे।  कोई व्यवस्था किसी संरचना की एक संगठित अवस्था है, जिसमें प्रत्येक चीज उनके उपयुक्त स्थान पर रहे। या, दूसरे शब्दों में,  कोई व्यवस्था किसी संरचना की वह अवस्था है, जिसमें व्यक्ति या वस्तुएं आवश्यकतानुसार एक दूसरे के संबंध में क्रमबद्ध तरीके से उपस्थित किए गए हों।

भारत में 'विधि' बनाने पर जोर दिया जाता है और चीन में 'व्यवस्था' बनाने पर। भारत में विधि को अव्यवहारिक रुप से अत्यधिक रुप से कठोर बनाया जाता है, जिसका शत प्रतिशत अनुपालन सार्वजनिक जीवन में संभव नहीं होता। एक उदाहरण - प्लास्टिक बैग पर प्रतिबंध। इसके व्यवहारिक एवं वैकल्पिक व्यवस्था किए बिना इसे लागू कर दिया जाता है, प्रशासन भी कुछ दिनों में इसका अनुपालन कराना छोड़ कर दूसरे तात्कालिक अनिवार्य आवश्यकता के विधि के अनुपालन में उलझ जाता है। इस तरह बना हुआ विधि कोई व्यवस्था नहीं कर पाता और विधि एक बड़ा तमाशा बन कर रह जाता है।  किसी विधि को अत्यधिक कडा बनाने से एक सिपाही को भी अथाह शक्ति देता है कि वह किसी भी सामान्य जन की औकात को नाप देता है। जेलों में बंद अधिकतर जनता विधि की प्रक्रिया झेल नहीं पाते हैं। ये व्यवस्था के कुप्रबंधन के शिकार होते हैं। 

भारत में 'स्थायी लेखा संख्या' (पैन) स्थायी माना जाता है, परन्तु भारत सरकार ही बैंकों में हर साल KYC को अनिवार्य बताता है। इसमें हर साल पैन कार्ड एवं आधार कार्ड को देना अनिवार्य बनाया; मानों यह दोनों कार्ड हर साल बदलने वाला है। यह विधि किस व्यवस्था के लिए आवश्यक है, पता नहीं। इसी तरह बैंकों में लोकपाल होता है और लोक शिकायत निवारण पदाधिकारी भी, परन्तु इनको विधि की प्रक्रिया की ही जानकारी नहीं होती। ये विधि के प्राधिकार शिकायतकर्ता के वाद को बैंक का पक्ष जानकर ही मामले को समाप्त कर देते हैं और वादी से इस संबंध में बैंक के उत्तर के संबंध में अपने पक्ष रखने का कोई अवसर ही नहीं देता। यहां विधि है, लेकिन इसके अनुरूप कोई व्यवस्था ही नहीं है।

भारत में नौकरशाह ही विधि के प्रारुप को अत्यधिक कडा बनाते हैं और चूंकि विधायिका एवं कार्यपालिका एक ही तंत्र के हिस्से होते हैं, इसीलिए इनके हर प्रारुप की स्वीकृति विधायन के रुप में भी हो जाता है। अक्सर विधायिका के सदस्य शिक्षा की उपाधि के बारे में एक गलतफहमी पाल लेता है, कि रट्टू परिक्षा प्रणाली में ज्यादा अंक लाने वाले ज्यादा प्रतिभाशाली होते हैं। इसके अलावा अस्थाई व्यवस्थापक भी स्थायी व्यवस्थापक से संभल कर रहता है, या यों कहें कि अस्थाई सामान्यतः स्थायी से डरता है ।  यही सामान्य जन की मानसिक हार है। 

विधि अपने आप में एक जटिल अवधारणा है और एक जटिल प्रक्रिया भी है। हमें समझना चाहिए कि रट्टू ज्ञान और प्रतिभा किसी बुद्धिमता के भिन्न भिन्न आयाम है। किसी की बुद्धिमत्ता उसके अध्ययन के साथ साथ उसके चिंतन मनन से विकसित होता है। यह किसी में भी विकसित हो सकता है। बुद्धिमत्ता एक कौशल है और उसे कोई भी विकसित कर सकता है। इस समझ के अभाव में राजनेताओं का भी इस बौद्धिक (मानसिक) हीनता के बोध से संचालित होना असामान्य नहीं है और इसलिए कोई विधि भी अपने सम्यक रूप में नहीं आ पाती। कोई विधि उसके लिए अपेक्षित व्यवस्था को तैयार किए बिना नकारात्मक प्रभाव पैदा करता है और व्यवस्था में निराशा का माहौल बनाता है।

हर विधि को व्यवहारिक होना चाहिए और उसे अपेक्षित व्यवस्था के साथ होना चाहिए। 'नो पार्किंग' के जुर्माने के साथ साथ ही पार्किंग की व्यवस्था भी होना चाहिए या पार्किंग की आवश्यकता ही नहीं होना चाहिए। व्यवस्था के बिना विधि एक तमाशा ज्यादा बन जाता है। दोनों की आवश्यकता है और दोनों साथ साथ रहें।

भारत क्यों नहीं अपेक्षित परिणाम दे रहा? यह नौकरशाही का क्रीड़ा क्षेत्र बन गया है। नौकरशाही की पारदर्शिता और जवाबदेही तय करने के लिए सूचना का अधिकार अधिनियम लागू है, लेकिन कड़े विधानों के साथ वही नौकरशाही ही हावी है। इस विधान में किसी सामान्य जन को दंडित किया जा सकता है,। विशिष्ट जनों का तो एक काकटेल होता है, सारे विशिष्ट जन एक दूसरे से लिपटे एवं गुंथे हुए हैं।  भारत के विशिष्ट जनों के कुछ आधार विश्व में अद्वितीय भी है, जैसे कुछ जन्म आधारित है और इसलिए अपरिवर्तनीय भी है। इस आधार का काकटेल तो अप्रीतम है।

भारत में क्या नहीं है, सिवाय समुचित व्यवस्था के? ऐसी व्यवस्था जो न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व पर आधारित है, अभी भी सैद्धांतिक अवस्था में ही है। इतने संसाधन युक्त देश की यह स्थिति। आपको भी अफसोस होता होगा। और मुझे भी अफसोस होता है।

निरंजन सिन्हा

व्यवस्था विश्लेषक एवं चिन्तक।

बुद्ध बुद्धि में हैं, धर्म में नहीं

अकसर लोग बुद्ध के धर्म अर्थात बौद्ध –धर्म की बात करते हैं, जबकि यह बुद्ध के नाम पर माध्य काल के कुछ लोगों ने इसे बनाया है| बुद्ध ने जीवन दर्...