रविवार, 15 जनवरी 2023

एक धर्म क्यों और कैसे खंडित होता है?

 एक धर्म क्या करता है, कि

कोई भी अपने धर्म के सामने

अपनी गरीबी, बेरोजगारी, विवशता, अशिक्षा, बिमारी, भ्रष्टाचार आदि आदि को

कोई महत्व नहीं देता है?

और जब वह पाता है कि उसके धर्म के तथाकथित संरक्षण में, या तथाकथित संकट के लिए उसका ईश्वर अपने लिए कुछ नहीं कर पाता, तब एक आस्थावान धार्मिक व्यक्ति अपने सर्वशक्तिशाली ईश्वर को तथाकथित संकट से निकालने के लिए अपनी जान को भी न्योछाबर करने को उद्दत (तत्पर) हो जाता है? ऐसा लगता है कि उस धर्म के अनुयायी को अपने ईश्वर की असीम शक्ति और क्षमता पर भी भरोसा नहीं रह जाता, और वह अपने धर्म को बचाने के लिए वह खुद ही कूद जाता है, मानो उस व्यक्ति के सामने उसके श्रद्धेय ईश्वर की कोई औकात ही नहीं है? ऐसा क्यों होता है? एक धर्म को हमसे क्या उम्मीद होती है, या हमें अपने धर्म से क्या उम्मीद होती है? इन धर्मों के मूलभूत आधार क्या है, जिस पर कोई भी धर्म टिका हुआ होता है? तो, आइए, हमलोग इन सभी सवालों का सम्यक विश्लेषण कर इसके सभी पहलुओं को समझें|

किसी भी धर्म की क्रियाविधि का सार यानि

किसी भी धर्म का मूल तत्व एक ही है –

एक विश्वास (Belief) और एक आस्था (Faith)|

ध्यान रहे कि एक विश्वास एक आस्था से भिन्न होता है और दोनों का अर्थ एवं उद्देश्य भी अलग अलग होता है| एक विश्वास किसी की जानकारी और उसके ज्ञान की अवस्था तथा स्तर से तय होता है, और इसीलिए उसका विश्वास अपने ज्ञान के प्रति ही होता है, जबकि एक आस्था किसी दूसरे व्यक्ति (प्राकृतिक या अप्राकृतिक) की शक्ति के प्रति होता है| किसी के प्रति आस्था क्या होता है? यह किसी के प्रति सम्मान से उत्पन्न होता है| यानि आस्था किसी के कृतज्ञता से उत्पन्न सम्मान है, और इसीलिए किसी की आस्था पर प्रश्न उसकी भावना पर आघात होता है| कुछ लोग आस्था को डरे हुए लोगों की अवस्था मानते हैं| स्पष्ट है कि कोई भी अपनी आस्था के प्रति उत्पन्न किसी भी प्रश्न का उत्तर अपने ‘स्वत: स्फूर्त क्रिया’ (Reflex Action) से देता है| आप भी जानते हैं कि एक ‘स्वत: स्फूर्त क्रिया’ मे उसका मस्तिष्क भाग नहीं लेता है, अर्थात यह पशुवत प्रक्रिया भी मान ली जाती है। इसीलिए आस्थावान लोग तार्किक नहीं होते हैं| एक विश्वास में चूँकि एक जानकारी होती है, ज्ञान होता है, इसीलिए एक विश्वास में ‘प्रश्न’ पूछने की गुंजाइश रहती है, जबकि एक आस्था में चूँकि भावनात्मक सम्मान यानि श्रद्धा होता है, इसलिए इसमें किसी शंका की कोई गुंजाइश ही नहीं होती और इसीलिए एक आस्था से सम्बन्धित कोई प्रश्न नहीं पूछा जा सकता है| आस्था में ह्रदय (Heart) से मानना होता है, जबकि विश्वास में दिमाग (Brain) से मानना होता है| आस्था में प्रमाण (Proof) की कोई जरुरत नहीं है, जबकि विश्वास में प्रमाण की जरुरत हो जाती है| इस तरह स्पष्ट है कि एक धार्मिक व्यक्ति अपनी आस्था को ही विश्वास समझता है और इसे विज्ञान से भी उपर समझता है। 

अर्थात किसी की आस्था को तोड़ने यानि नष्ट करने का एक ही सरल एवं साधारण उपाय है कि

उसकी ‘आस्था’ को नहीं,

अपितु उसके ‘आस्था’ के आधार स्तम्भ के तत्वों को ही नष्ट किया जाय

यानि उसके इस काल्पनिक विश्वास को ही खंडित किया जाय|

यदि एक पवित्र धर्म में मध्यकालीन सामन्तवादी नजरिया एवं धूर्ततापूर्ण उद्देश्य से उसमे सामाजिक बुराइयाँ एवं व्यापार (Business) घुसा हुआ है, तो एक धर्म के इन तत्वों को एवं उसकी क्रियाविधि को समझना जरुरी है और इसके अंतर को भी समझना है| अत: हमें किसी की आस्था के बारे में अपने विचार व्यक्त नहीं करना चाहिए, परन्तु हम किसी के विश्वास पर विमर्श कर सकते है और उस विमर्श मे किसी को भी शामिल कर सकते हैं| इसलिए एक आस्था में उस ईश्वर या उस सम्मानीय व्यक्ति के सम्पूर्ण व्यक्तित्व यानि कृतत्व के ब्योरे के प्रति समर्पण होता है और उस व्यक्तित्व या कृतत्व पर कोई विरोधी बात या प्रश्न मान्य नहीं है, यानि स्वीकार्य नहीं है| लेकिन एक विश्वास उस धर्म के मूल तत्वों के बारे होता है, जिस पर शंका या प्रश्न किया जा सकता है| सभी धर्मों का मूल तत्व सिर्फ पांच ही है, और इनमे से कोई भी तत्व किसी भी धर्म मे गायब नहीं हो सकता|

एक धर्म का मूल तत्व सिर्फ पांच ही है, जिसे ईश्वर (God), आत्मा (Soul), पुनर्जन्म (Re Birth), कर्मवाद (Effect of Deed) और नित्यवाद (Eternalism) के नाम से जाना जाता है| ‘स्वर्ग नरक’ या ऐसी कोई भी अवधारणा या कोई धार्मिक कहानी इन्हीं के इर्द गिर्द चक्कर लगाता रहता है| हम किसी की आस्था से सम्बन्धित किसी भी धार्मिक व्यक्तित्व या उनके कृतत्व के बारे में चर्चा नहीं करेगे, लेकिन उपरोक्त पाँचों तत्वों को तर्क एवं विज्ञान के स्तर पर जांच सकते हैं और उसकी वास्तविकता जानने के लिए उसकी आवश्यक समीक्षा कर सकते है| इससे किसी की आस्था पर कोई चर्चा ही नहीं होती, सिर्फ वैज्ञानिकता की बात होती है| वैज्ञानिकता का अर्थ – उसका सम्यक विश्लेषण, उसका सम्यक जाँच, और उसका तार्किक एवं विवेकपूर्ण निष्कर्ष निकलना होता है|

पहले ईश्वर की वैज्ञानिकता समझते हैं| वैज्ञानिक स्टीफन हाकिन्स ने भी स्पष्ट किया है कि ब्रह्माण्ड की शुरुआत के पहले ‘समय’ (Time) ही नहीं था, तो स्पष्ट है कि कोई तथाकथित ईश्वर भी उसके पहले नहीं था, और इसीलिए नित्य ईश्वर एक झूठ है| भौतिकी वैज्ञानिको ने तो ‘हिग्स बोसॉन’ (Higgs Boson) कण का नामकरण ही ‘गाड पार्टीकल’ (God Particle) रख दिया है, अर्थात  ‘हिग्स बोसॉन’ कण ही ईश्वर है| हालाँकि चार्ल्स डार्विन के अपने ‘उद्विकास सिद्धांत’ (Evolution Theory) के द्वारा ‘ईश्वर’ की महत्ता एवं चर्चा को एक बकवास साबित कर दिया था| इस कारण आज पश्चिमी विकसित देशों में धार्मिक स्थल उपेक्षित हो गये हैं, जबकि अन्य पिछड़े हुए देश अपनी धार्मिक सांस्कृतिक उलझन में ही उलझे हुए हैं| यह स्पष्ट है कि ईश्वर की अवधारणा की उत्पत्ति भले ही आदिम युग में अज्ञानता के कारण हुई और अस्तित्व में आई, परन्तु इसको पर्याप्त मजबूती मध्यकाल में सामन्तवाद की अनिवार्यताओं के कारण ही मिली| इस ईश्वर की आवश्यकता ‘आत्मा’, ‘पुनर्जन्म’ एवं ‘कर्मवाद’ की अंतर्क्रिया (Interaction) को स्थापित एवं संचालित करने के प्राधिकार (Authority) के रूप में हुई, अन्यथा ईश्वर की कोई आवश्यकता ही नहीं है|

‘नित्यवाद’ (Eternity) का सिद्धांत सिर्फ ईश्वर और आत्मा की नित्यता को स्थापित करने के लिए है। इस काल्पनिक नित्यता के अलावे ब्रह्माण्ड में समय एवं आकाश सहित सभी चीजें एवं गतिविधियाँ अनित्य है| ‘बिग बैंग’ (Big Bang) सिद्धांत के अनुसार ब्रह्माण्ड का प्रसार होता जा रहा है, अर्थात ब्रह्माण्ड में कोई भी चीज या घटना स्थिर नहीं है, यानि कोई भी चीज एवं घटना नित्य नहीं है, हर समय अपनी स्थिति एवं स्वभाव को बदलता रहता है| अल्बर्ट आइन्स्टीन ने ‘समय’ को चौथा विमा (Dimension) बता कर सभी तथाकथित ‘नित्य’ को ‘अनित्य’ साबित कर दिया, क्योंकि समय सदैव बदलता रहता है और इसीलिए सभी कुछ समय के सापेक्ष बदलता रहता है| किसी की भी दशा एवं दिशा नित्य नहीं है, अत: विश्व के हर पीड़ित एवं वंचित व्यक्ति एवं समाज अपनी विविशता को नित्य नहीं माने और उस दशा एवं दिशा में अवश्य बदल जाने का विश्वास रखे और इसके लिए सम्यक प्रयास भी करे|

‘आत्मा’ (Soul) का सिद्धांत भी एक बौद्धिक घालमेल का मामला है| आप भी जानते हैं कि ‘आत्म’ (Self) होता है, जिसे ‘मन’ (Mind) भी कहा जाता है और इसे ‘चेतना’ (Consciousness) भी कहा जाता है| चेतना को अंग्रेजी में ‘Spirit’ भी कहा जाता है| षडयंत्रकारी बौद्धिक लोग इसी ‘आत्म’ को ‘आत्मा’ लिखकर और अंग्रेजी के Spirit का हिंदी अनुवाद ‘आत्मा’ कर लोगों को बेवकूफ बना रहे हैं| वैज्ञानिक भी ‘आत्म’ यानि ‘मन’ यानि ‘चेतना’ को वैज्ञानिक सत्य मानते हैं, और ‘आत्मा’ की किसी भी अवधारणा को सत्य नहीं मानते हैं| ‘आत्म’ यानि ‘मन’ यानि ‘चेतना’ किसी के शरीर के अस्तित्व तक अपना अस्तित्व बनाए रखता है, जबकि ‘आत्मा’ की निरंतरता उसके शरीर के नष्ट हो जाने के बाद भी बना रहता माना जाता है| तथाकथित ‘आत्मा’ की कोई वैज्ञानिक सत्यता नहीं है, और यह ‘आत्मा’ की अवधारणा सिर्फ ‘पुनर्जन्म’ को स्थापित करने के उद्देश्य से बनाया गया है|

पुनर्जन्म का सिद्धांत वस्तुओं और जीवों के लिए भिन्न भिन्न है| वस्तुओं का पुनर्जन्म हो सकता है, क्योंकि वस्तुओं में मन यानि चेतना नहीं होता है और उसकी भौतिक संरचना को कभी भी निर्धारित विधि से प्राप्त किया जा सकता है| परन्तु चेतना युक्त जीवन यानि मन वाला कोई भी जीवन का पुनर्जन्म कदापि नहीं हो सकता है| यह मन या चेतना यानि आत्म (आत्मा नहीं) क्या है? यह मन यानि ‘चेतना’ किसी भी जीव या व्यक्ति विशेष में एक विशिष्ट उर्जा आव्यूह(Energy Matrix) का अस्तित्व है, जो उसके शरीर से संपोषित (Cherished/ Nourished) होता रहता है और उसके अनुभव, ज्ञान, एवं समय के साथ विकसित होता रहता है, लेकिन यह उसके मष्तिष्क (Brain) की क्रिया प्रणाली (Mechanism) से अभिव्यक्त होता है,और अपने संपर्क में आए अन्य ऊर्जा से अनुक्रिया (Actions) एवं प्रतिक्रिया (Reaction) करता रहता है| परन्तु ‘आत्मा’ की काल्पनिक अवधारणा ही किसी चेतनयुक्त जीवन को पुनर्जन्म देने का आधार बनता है|

‘कर्मवाद’ का सिद्धांत समय के साथ बदल गया| यही ‘आत्मा’ एवं ‘पुनर्जन्म’ की कथा ही मिलकर ‘कर्मवाद’ के सिद्धांत को स्थापित करता है और मजबूती देता है, जो जन्म आधारित यथास्थितिवाद (आज की स्थिति को ऐसे ही बनाए रखना) को निरंतरता देने का कार्य करता है| ‘कर्मवाद’ का सिद्धांत यह कहता है कि ‘जो भी जैसा कर्म (काम) करेगा, उसका फल ईश्वर अवश्य ही देगा’| यह सिद्धांत बौद्धिक परम्परा में भी था, जिसमे कर्म एवं उसका फल इसी जन्म में यानि सब कुछ एक ही जन्म में होता है| इसीलिए यह सिद्धांत तार्किक एवं वैज्ञानिक था और इसीलिए यह आकर्षक भी था| परन्तु सामन्तकाल में इस सिद्धांत में इस जन्म में किए गए कर्म के फल यानि परिणाम को अगले जन्म में सुनिश्चित किया गया| इसी के लिए ‘पुनर्जन्म’ का सिद्धांत लाया गया| इस जन्म के कर्म के फल यानि परिणाम को अगले जन्म में प्रेषित किया जाना था, इसलिए किसी के शरीर के नष्ट हो जाने के बाद भी तथाकथित निरंतरता को तार्किक ढंग से स्थापित करने के लिए ही ‘आत्मा’ की अवधारणा की आवश्यकता हुई|

यह एक मनोवैज्ञानिक सत्य है कि कोई जीवन यानि जीव मरना नहीं चाहता, और मानव भी एक जीवन है और इसीलिए एक मानव भी मरना नहीं चाहता| इसलिए जीवन की तथाकथित निरंतरता का आश्वासन किसी भी मानव को सुकून देता है|  यह स्पष्ट है जीवन की निरंतरता किसी के शरीर के नष्ट हो जाने से अर्थात उसके चेतनता के नष्ट हो जाने के बाद किसी भी रूप में सम्भव नहीं है, परन्तु इस मनोवैज्ञानिक भय का उपयोग सामन्तवादियों ने अपने हित में बखूबी किया| इस तरह इन अवधारणाओं (Concepts) ने और इन प्रक्रियाओं (Process) की क्रियाविधि (Mechanism) की व्याख्या ने अशिक्षित व्यक्तियों को ‘जीवन की अनन्त विस्तार’ की अवधारणा में अखंड विश्वास दिलाया| यह सब अज्ञानियों के लिए एक सुखद अनुभव एवं अहसास दिलाता है, जिसे कोई भी अज्ञानी इसके काल्पनिक अवधारणा के होते हुए भी इसे खोना नहीं चाहता| परिणामत: इतने अंतहीन लम्बे जीवन का एक वर्तमान एवं छोटा कष्टकारक जीवन को भोग लेना आसान होता है, बशर्ते कोई तथाकथित ईश्वर एवं उसकी व्यवस्था एक सुखद भविष्य का आश्वासन देना वाला हो यानि उसका धर्म बना रहे यानि उसका धर्म तथाकथित सुरक्षित रहे| इसलिए इस वर्तमान जीवन में कोई भी अपने धर्म के इस आश्वासन के सामने अपनी गरीबी, बेरोजगारी, विवशता, अशिक्षा, बिमारी, भ्रष्टाचार आदि आदि को कोई महत्व नहीं देता है| इसे हर सामाजिक वैज्ञानिक यानि चिन्तक को समझना चाहिए|

एक धर्म अपने मौलिक प्रक्रम में अपने अनुयायियों को यह विश्वास दिलाता है, कि उसका यह जीवन अवधि एक लम्बे एवं अनन्त जीवन की तुलना में नगण्य है और इसीलिए इस जन्म के इस तथाकथित कष्ट एवं परेशानी का कोई विशेष मतलब भी नहीं है| उसे अपने अगले जीवन और उसके सुखमय भाग में विश्वास ही उसे गरीबी, बेरोजगारी, विवशता, अशिक्षा, बिमारी, भ्रष्टाचार आदि आदि को तुच्छ मानने और उसे नगण्य समझने को प्रेरित एवं बाध्य करता है| उसे अपने ईश्वर में असीम आस्था होती है कि उसके श्रेद्धय ईश्वर सब चीजों को व्यवस्थित रखेंगे और उसे अवश्य ही उसका न्यायिक हिस्सा मिलेगा, अर्थात उसका अन्य जीवन सुखमय बीतेगा और इसलिए इस जीवन का कोई भी कष्ट आसानी से सहा जा सकता है| क्या ऐसे लोगो के धार्मिक नेतृत्व को उसके तथाकथित शक्तिशाली ईश्वर की वैज्ञानिक झूठ के बारे पूरा पता होता है? हाँ, उसे यह सब कुछ पता होता है और इसीलिए वह धन ईश्वर से नहीं माँगता है, अपितु उस ईश्वर के नाम पर उनके अनुयायियों से ही मांगता है| यहाँ उसके धार्मिक नेतृत्व को अपने ईश्वर की असीम शक्ति एवं क्षमता पर विश्वास ही नहीं रहता और वह नेतृत्व अपने अनुयायियों को धर्म की रक्षा के नाम पर भड़काता है और उकसाता है|

एक ही धर्म के भिन्न भिन्न अर्थ क्यों है और वह क्या है? एक आदर्श धर्म और परम्परागत धर्म क्या है? ऐसे मौलिक रूप में धर्म का अर्थ प्रत्येक व्यक्ति एवं समाज का वह विशेष गुण है, जो प्रत्येक व्यक्ति को सामाजिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए और उसके सम्यक विकास के लिए सभी से अपेक्षित है| इस रूप में हर धर्म का स्वभाव वैश्विक रूप में एक ही होगा, क्योंकि सभी मानव सभी क्षेत्रों में मौलिक रूप में एक ही है| धर्म यानि पालि में धम्म की यह अवधारणा प्राचीन काल की यानि बुद्धि के विकास के काल की रही है|

धर्म की वर्तमान अवधारणा मध्य काल में सामन्तवाद के उदय एवं विकास के साथ साथ अपने क्षेत्रीय भौगोलिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक  एवं आर्थिक आवश्यकताओं के अनुरूप ढलता गया| सभी परम्परागत वर्तमान धर्म इसी काल में अपनी भौगोलिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक  एवं आर्थिक आवश्यकताओं के अनुरूप भिन्न भिन्न स्वरुप ले लिया| लेकिन किसी भी धर्म को आदरणीय और गौरवमयी होने के लिए उसे पुरातन एवं सनातन साबित किया जाना बहुत जरुरी हो जाता है| इसीलिए इस मध्य काल में विकसित सभी धर्मों को अपने भौगोलिक क्षेत्र में पूर्व से स्थापित गणमान्य सामाजिक एवं सांस्कृतिक व्यक्तित्व में समाहित कर देना एक अनिवार्य बाध्यता हो गई थी| यह सभी वर्तमान परम्परागत धर्मों  के लिए सही है| जिन समाजों यानि संस्कृतियों ने इस सामन्तवादी सांस्कृतिक ढाँचा को यानि वर्तमान धार्मिक ढाँचे को ध्वस्त कर दिया, वही समाज आज वास्तव में आधुनिक एवं विकसित है| बाकि के सभी समाज एवं संस्कृतियाँ, जो आज भी विकसित एवं आधुनिक होने के लिए प्रयासरत है, अपनी मध्यकालीन सामन्तवादी सांस्कृतिक एवं सामाजिक उलझन में उलझा हुआ है| और इसलिए उसके विकसित होने के सभी प्रयास महज एक नाटक बना हुआ है|

आज विश्व के जितनी भी संस्कृतियाँ सभी मायनों में पिछड़ी हुई है, सभी धर्म की इन्हीं सामन्तवादी उलझनों में उलझा हुआ है| ऐसे में कुछ देश अपनी बड़ी आबादी की उपभोग क्षमता यानि बाजारू उपयोग (यानि खा पचा लेने) की क्षमता के कारण वैश्विक स्तर पर पूछी जाती है| परन्तु ऐसे देशों के नेतृत्व एवं उनके उनुयायियों को उस देश की वैश्विक पूछ में उनके नेतृत्व में ही कमाल दिखता है, जबकि यह पहचान एवं पूछ उसकी आबादी की “खा एवं पचा लेने की विशाल क्षमता” के कारण होता है| ऐसे देश अपनी सम्पूर्ण आबादी के दसवें भाग की आबादी से कम आबादी के देशों के समक्ष भी बहुत से मामलों में पिछलग्गू बने रहने को बाध्य होते हैं, लेकिन उन्हें अपने पिछड़ेपन की मौलिक अवरोध का आभास ही नहीं होता|

अत: जिस भी समाज या संस्कृति को विकास पाना है, प्रगतिशील बनना है, और आधुनिक एवं वैज्ञानिक मानसिकता विकसित करनी है, उसे इन काल्पनिक एवं अवैज्ञानिक तथ्यों को नष्ट करना होगा| परन्तु इसके लिए किसी की आस्था को खंडित करने से बचना चाहिए, लेकिन इन आस्था के आधार के इन स्तंभों को खंडित करना चाहिए यानि ईश्वर (God), आत्मा (Soul), पुनर्जन्म (Re Birth), कर्मवाद (Effect of Deed) और नित्यवाद (Eternalism) की अवधारणा, सिद्धांत एवं इन पर आधारित क्रियाविधि को ही खंडित करना चाहिए| चूँकि आस्था में किसी के प्रति श्रद्धा होता है, सम्मान होता है, कृतज्ञता होता है, और इसलिए इसके खंडन से उसे भावनात्मक आघात लगता है, इससे हर किसी समझदार व्यक्ति को सावधान रहना चाहिए| परन्तु किसी के विश्वास को वैज्ञानिक एवं तार्किक आधार पर परिमार्जित (Modify) करने में, संशोधित (Rectify) करने में, शुद्धिकरण (Purify) करने में किसी को भी आपति नहीं होती है, क्योंकि हर कोई समझदार है और विकसित एवं प्रगतिशील होना चाहता है|

आइए, हमलोग अपने सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिमार्जन, संशोधन एवं शुद्धिकरण की क्रियाविधि का तरीका बदले, विचार बदले और अपने समाज एवं संस्कृति को एक वैज्ञानिक एवं तार्किक आधार दें| इससे हम अपने भविष्य को बेहतर अवसर दे सकते हैं|

आचार्य निरंजन सिन्हा 

सोमवार, 9 जनवरी 2023

मन का विज्ञान एवं क्रियाविधि (The Science n Mechanism of Mind)

मन क्या है? क्या यह आत्म है, या आत्मा? आज इसके विज्ञान को समझते हैं| मन या चेतना आज भी मानव जीवन का सबसे बड़ा रहस्य है| क्या यह मष्तिष्क है, या उससे भिन्न इसका कोई और अस्तित्व है? इस सम्बन्ध में विज्ञान क्या कहता है? यह अध्यात्म से कैसे और क्यों जुड़ता है? अध्यात्म क्या है और विज्ञान क्या है? मन यदि मष्तिष्क से भिन्न है, तो मष्तिष्क क्या है और मन से यह कैसे जुडा हुआ है?

मन के आधुनिक एवं वैज्ञानिक अवधारणा के लिए मानव जगत तंत्रिका वैज्ञानिक स्पेरी (Roger Wolcott Sperry) एवं भौतिकी वैज्ञानिक पेनरोज (Sir Roger Penrose) का आभारी रहेगा| तंत्रिका वैज्ञानिक स्पेरी ने चेतना अर्थात मन, मस्तिष्क एवं व्यवहार को जैववैज्ञानिकी के आधार पर उनके अन्तरक्रियाओं को समझाया है| पेनरोज का मानना है कि मन एक हवा हवाई अवधारणा नहीं है, बल्कि मन का संरचना भी क्वांटम स्तर पर उत्पन्न होता है और कार्यरत है|

मैंने मन को जो समझा है, ‘मन’ को ‘Mind’, या ‘आत्म’ (Self) या ‘चेतना’ (Consciousness) कह सकते हैं, लेकिन इसे ‘आत्मा’ (Soul) कदापि नहीं कहा जाना चाहिए| यह मन किसी भी जीव या व्यक्ति विशेष में एक विशिष्ट “उर्जा आव्यूह” (Energy Matrix) का अस्तित्व है, जो उसके शरीर से संपोषित (Cherished/ Nourished) होता रहता है और उसके अनुभव, ज्ञान, एवं समय के साथ विकसित होता रहता है, लेकिन यह उसके मष्तिष्क (Brain) की क्रिया प्रणाली (Mechanism) से अभिव्यक्त होता है,और अपने संपर्क में आए अन्य ऊर्जा से अनुक्रिया (Actions) एवं प्रतिक्रिया (Reaction) करता रहता है| यह अवधारणा मन से जुड़ी लगभग सभी प्रश्नों को समाधान की ओर दिशा देती है और सभी स्थितियों की संतोषप्रद व्याख्या भी करती है| यही मन सभी मनोवैज्ञानिक क्रियाएँ यथा संवेदन (Sensation), अवधान (Attention), प्रत्यक्षण (Perception), सीखना यानि अधिगम (Learning), स्मृति (Memory), चिंतन (Thinking), आदि आदि भी सम्पादित करता है|

चूँकि मन उर्जा का एक आव्यूह है, इसलिए मन उर्जा के विभिन्न स्वरुप एवं अवस्था से क्रिया एवं प्रतिक्रिया करता रहता है| आव्यूह (Matrix) को एक वस्तु (Substance, not Goods), या एक अवस्था (Situation), या एक संरचना (Structure), या एक स्थान, या एक बिंदु, या एक वातावरण (Environment) के रूप में जाना जाता है, और इसमें किसी की उत्पत्ति (Origin) होती है, कोई स्वरुप ग्रहण (Takes Form) करता है या उससे घिरा हुआ (Enclosed) होता है| इस ऊर्जा आव्यूह को कोई व्यक्ति या तंत्र किसी व्यक्ति के ‘आभा मंडल’ (Halo) की तरह अभिव्यक्त होता हुआ देख या समझ पाता है| चूँकि यह किसी के शरीर से संपोषित होता रहता है, इसीलिए उस शरीर के नष्ट हो जाने पर वह ‘उर्जा आव्यूह’ भी संपोषण एवं संरक्षण के अभाव में खंडित होकर ‘अनन्त ऊर्जा भण्डार’ में विलीन हो जाता है और अपना मौलिक स्वरुप को खो देता है, जबकि तथाकथित ‘आत्मा’ अपने तथाकथित मौलिक स्वरुप को यथावत बनाए रखता है| चूँकि यह ‘मन’ उर्जा का ही एक ‘आव्यूह’ स्वरुप है, तो यह आव्यूह भी विद्युतीय चुम्बकीय तरंग (Electro Magnetic Wave) ही होगा, चाहे उसकी आवृति (Frequency) या तरंग दैर्ध्य (Wave length) यानि उर्जा (Energy) की मात्रा कुछ भी हो|

तो मन क्या क्या करता है? मन की प्रक्रिया यानि मानसिक प्रक्रिया किसी की चेतनाओं की प्रक्रिया है, और उनके अनुभवों एवं व्यवहारों को संचालित करता है, नियमित एवं नियंत्रित करता है और इस तरह पूर्ण रूपेण इन सभी को प्रभावित भी करता रहता है और इसीलिए मन इन सबों से भी प्रभावित होता रहता है| चेतना क्या है? चेतना अपने मानस यानि मन की सामान्य स्थिति से अवगत रहना, या विशेष मानसिक विषयवस्तु की जानकारी रखना, या स्वयं अपने अस्तित्व के बारे में अवगत रहना है| विज्ञान यह स्पष्ट करता है कि मानसिक क्रिया (Mental Actions) और मस्तिष्क की क्रिया (Brain Actions) एक ही नहीं है, तथापि ये एक दुसरे पर आश्रित है| मस्तिष्क कोशिकीय (Cellular) क्रियाएँ करता है, जबकि मन उर्जीय (Energetic) क्रियाएँ करता है, लेकिन दोनों एक दुसरे से आच्छादित लगती है, परन्तु वे समरूप (Identical) भी नहीं है| यह भी सत्य है कि मन मस्तिष्क के बिना कार्यरत नहीं रह सकता, फिर भी मन एक पृथक सत्ता है, एक अलग अस्तित्व है| इसलिए एक मानसिक क्रिया एक मस्तिष्क की क्रिया से ज्यादा व्यापक होता है| इस तरह एक मस्तिष्क उसके शरीर के मन का मोड्यूलेटर (Modulator) है| मोड्यूलेटर एक यंत्र होता है, जो डाटा या कम उर्जा वाले तरंगो को क्रियाशील होने योग्य बनाता है| जब हम सोते रहते हैं, तब भी मन जागता रहता है और सूचनाओं को ग्रहण, विश्लेषण एवं संश्लेषण करता रहता है| सोते समय भी अधिगम (सीखना / Learning) और स्मरण (Memory) की क्रिया जारी रहता है| विज्ञान ने यह भी स्थापित किया है कि किसी दुर्घटनावश यदि किसी का कोई अंग भंग भी हो जाय, यानि नष्ट हो जाय, तो भी वह व्यक्ति उस अंग का लाभ ले पा रहा था, जो निश्चितया उसका मन कर रहा था, भले ही वह पूर्णता तक नहीं था (जिसके विकसित किये जाने की संभावना है)| यह भी मन के द्वारा विज्ञान का नया अध्याय जोड़ रहा है यानि संभावनाओं के प्रयोग को प्रक्षेपित (Project) कर रहा है|

अनुभव (Experience) क्या है? किसी भी कार्य को करने से प्राप्त जानकारी, जो मन एवं मस्तिष्क में संग्रहीत होता है, अनुभव है| किसी का अनुभव वास्तव में आत्मपरक होता है, और यह उसकी चेतना यानि मन में ही रचा बसा होता है| अनुभवकर्ता का अनुभव उसकी आंतरिक एवं बाह्य दशाओं से प्रभावित होता है यानि संचालित, नियंत्रित एवं नियमित होता है| हमने देखा है कि एक ही भौतिक अवस्था में भी मन की स्थितियों के अनुसार अनुभव भी भिन्न भिन्न होता है, जैसे किसी थके हुए गृहिणी के यहाँ रात्रि काल में भोजन के समय अन्य अतिथि का आना और उसके नैहर (माता के आवास) के अतिथि का आना भिन्न भिन्न अनुभव देता है| किसी का अनुभव तो पूर्णतया ‘आंतरिक अवस्था’ होता है, लेकिन किसी का व्यवहार ‘आंतरिक एवं बाह्य’ दोनों होता है| आंतरिक अवस्था अप्रकट होता है, लेकिन बाह्य अवस्था प्रकट होता है और इसीलिए यह दूसरों के द्वारा प्रेक्षनीय (देखे जाने योग्य) भी होता है| यह व्यवहार उद्दीपक (Stimulus) एवं अनुक्रिया (Response) के सम्बन्ध से जाना जाता है| यह व्यवहार क्या है? किसी मानव या जीव का कोई भी प्रकट क्रिया या प्रतिक्रिया, जिसका प्रेक्षण किया जा सके, व्यवहार है|

हम जानते हैं कि चेतना यानि चेतनता का अनेक स्तर होता है, - अचेतन, अवचेतन, चेतन एवं अधिचेतन| चूँकि चेतना ही मन है, आत्म है और इसीलिए मन भी चेतना के इन सभी अवस्थाओं पर कार्यरत होता है| मनोवैज्ञानिक बताते हैं कि मन की संरचना का लगभग 90 % भाग अचेतन स्तर पर है और इसीलिए मन का सञ्चालन अधिकांशतया अचेतन स्तर पर ही होता है, जिसे वह व्यक्ति भी अपनी चेतना में आसानी से समझ नहीं पाता है| लेकिन चेतनता के हर स्तर पर अनन्त प्रज्ञा (Infinite Intelligence) छाया रहता है|

चेतनता का यानि मन का यानि आत्म का ‘अधि’ (Above) से यानि ऊपर से जुड़ना यानि किसी की ‘चेतना’ का अनन्त प्रज्ञा से जुड़ना ही “अध्यात्म” (Spirituality- Connecting Spirit to Infinite Intelligence) है| और विज्ञान क्या है? किसी भी विषय का क्रमबद्ध (Systematic) एवं सुव्यवस्थित (Well Organised) ज्ञान, जिसे कोई भी प्रयोग एवं निरिक्षण कर उसे सत्यापित कर सकता है, विज्ञान है| मतलब विज्ञान में प्रयोग, निरिक्षण, सत्यापन, प्रक्षेपण (Projection) एवं पुनर्परीक्षण की निश्चित क्रियाविधि (Methodology) ही प्राथमिक होता है| साहित्य में क्रमबद्धता एवं व्यवस्था के होते हुए भी इस क्रियाविधि (Methodology) के अभाव के कारण ही साहित्य आदि विज्ञान नहीं है|

चूँकि एक मन चेतना ही है, और यह अनुभव एवं व्यवहार सम्बन्धी चेतनाओं का अन्तरप्रक्रिया है, जो समय के साथ साथ विस्तृत होता जाता है और गहराता जाता है, इसीलिए कोई भी व्यक्ति अपने मन को क्षैतिज विस्तार एवं उर्घ्वाकार गहराई  दे सकता है और उसका असीमित लाभ भी ले सकता है| इसी कारण कोई व्यक्ति अपने को इस तरह विकसित कर पाता है कि वह अनन्त प्रज्ञा से ज्ञान प्राप्त करने लगता है, जिसे सहज बोध (Intuition) से नवाचार (Innovation) पाना भी कहते हैं| आप भी जानते हैं कि ज्ञान प्राप्ति की साधारण अवस्था में एक ज्ञान देने वाला (शिक्षक, पुस्तक, या अन्य स्रोत) होता है और दुसरा ज्ञान प्राप्त करने वाला, परन्तु ज्ञान प्राप्ति के उच्चतर अवस्था में ज्ञान देने वाला एवं ज्ञान पाने वाला, दोनों ही एक ही व्यक्ति होता है| हालाँकि दोनों अवस्था में मन का ही विस्तार होता है, लेकिन दुसरे अवस्था में यानि उच्चतर अवस्था में मन अनन्त प्रज्ञा से जुड़कर ज्ञान प्राप्त करने लगता है, जिसे कुछ लोग इसे ‘दिव्य ज्ञान’ या ‘दिव्य लोक से सन्देश प्राप्त करना समझते हैं| ज्ञान प्राप्त करने की इस विधि से कोई भी अनन्त प्रज्ञा से जुड़ कर ज्ञान प्राप्त कर सकता है|

जब कोई व्यक्ति समाज या मानवता के बेहतरीन भविष्य के लिए कार्यरत हो जाता है, तो उसके दिशा में कोई द्वंद नहीं रह जाता है और इसलिए उसके मानस उर्जा के आव्यूह की दिशा में कोई भटकाव नहीं होगा। ऐसी स्थिति में अनन्त प्रज्ञा उस मानस की उर्जा को बहुगुणित करने लगता है। इस तरह इन विचारों और कार्यों में अनन्त प्रज्ञा का अकल्पनीय सहयोग मिलने लगता है।

‘आत्म’ यानि ‘मन’ के होते हुए ‘आत्मा’ की अवधारणा की कोई आवश्यकता नहीं है| ‘आत्म’ शरीर के साथ उत्पन्न होता है और शरीर के साथ ही नष्ट हो जाता है, जबकि ‘आत्मा’ अपनी निरन्तरता शरीर की समाप्ति के बाद भी बनाए रखती है| ‘आत्म’ एक वैज्ञानिक अवधारणा है, जबकि ‘आत्मा’ एक काल्पनिक एवं अवैज्ञानिक अवधारणा है| ‘आत्म’ का उद्देश्य ‘मन’ की क्रियाविधि समझना है, जबकि ‘आत्मा’ का उद्देश्य यथास्थितिवाद को यथावत बनाए रखना है, जो मध्य काल के सामन्तवाद के समर्थन में ज्यादा विकसित हुआ| ‘आत्मा’ निश्चितया ‘पुनर्जन्म’, एवं ‘कर्मवाद’ से जुड़ा हुआ है, जो तथाकथित सुख या दुःख भोगने के लिए स्वर्ग - नरक भी जाता है, इत्यादि इत्यादि| यह तो बौद्धिक षड्यंत्रकारियों का खेल है कि ‘आत्म’ (Self) को या Spirit को ‘आत्मा’ बताते हैं या अनुवाद कर देते है| इसी तरह इन्होने ‘जाति’ (Jati) व्यवस्था को ‘Caste’ व्यवस्था बता दिया| यह सर्वज्ञात है कि ‘जाति’ आजन्म नहीं बदलने वाली भारतीय व्यवस्था है, जबकि ‘Caste’ एक ही जन्म में बदलने वाली एक पुर्तगाली अवधारणा है, और इसी कारण पश्चिमी जगत भारतीय ‘जाति’ को ढंग से नहीं समझ पाया|

मन के इसी वैज्ञानिक स्वरुप एवं क्रियाविधि के कारण ही ‘बुद्ध’ कहते रहे कि वास्तविकता यानि भौतिकता किसी के मन का अनुसरण ही करता है| इसीलिए यह कहा गया है कि मन जिसका भी कल्पना करता है और उसमे विश्वास करता है, वह उसे उस स्वरुप में पा भी लेता है, जिस स्वरुप में वह उसे पाना चाहता है| क्वांटम सिद्धांत का “अवलोकनकर्ता का प्रयोग” (Observer Experiment) भी इसी को संपुष्ट करता है| ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि मन उर्जा का एक निश्चित आव्यूह (Matrix) है, और इसीलिए वह मन अनन्त से एवं अन्य स्रोत से भी ऊर्जा ग्रहण कर, विश्लेषण एवं संश्लेष्ण कर मन के चित्रण (Imagination) को वास्तविकता यानि भौतिकता में बदल देता है, जिस चित्रण की वास्तविकता में वह मन विश्वास करता है|

इसी तरह कोई भी किसी भी विषय के प्रति ‘जुनून’ (Passion) के साथ समर्पित होता है, तो उसके मन की ‘ऊर्जा आव्यूह’ ब्रह्माण्ड की समस्त उर्जाओं पर संकेंद्रित होकर उसे उपलब्ध कराने के लिए क्रियाशील हो जाता है| अनन्त प्रज्ञा मन के उर्जा आव्यूह के कारण मानसिक चित्रण के स्वरुप निर्धारण में क्रियाशील हो उठता है, इस तरह इस प्रक्रिया में मन का उर्जा आव्यूह (Energy Matrix) एक उत्प्रेरक (Catalyst) के रूप में कार्य करता है|

‘मन’ के इसी ‘उर्जा आव्यूह’ के कारण ही कोई किसी भी घटना या अवस्था को आभास (Forewarning) या पूर्वाभास (Premonition/ Apprehension) कर लेता है| हम जानते हैं कि किसी घटना या अवस्था परिवर्तन का स्रोत ‘ऊर्जा की अवस्था’ में परिवर्तन होता है| इसी कारण कोई जीव अपने प्राकृतिक स्वाभाव के कारण मानव की अपेक्षा किसी प्राकृतिक घटना यथा भूकंप या सुनामी आदि का पूर्वाभास पहले ही कर लेता है, जो उर्जा के स्रोत में बदलाव की जानकारी से ही संभव है| मानव भी अपने ‘ऊर्जा आव्यूह’ को इस तरह विकसित कर सकता है, या विकसित कर लेता है कि कुछ घटनाओं एवं अवस्थाओं को कुछ समय पहले जान सकता है| इसका अर्थ यह नहीं होता है कि वह एक भविष्यवक्ता हो जाता है, क्योंकि एक परम्परागत भविष्यवक्ता किसी घटना या किसी अवस्था परिवर्तन के लिए ऊर्जा स्रोत में बदलाव से भी पहले की सूचना देने का वादा करता है, जो एक पाखंड है और इसीलिए एक धंधा है| इसे आभास से भिन्न माना जाना चाहिए|

अत: मन को समझिये, और

मन की क्रियाविधि को समझिये, और

अपनी कल्पनाओं को साकार कीजिए|

आचार्य निरंजन सिन्हा

शनिवार, 7 जनवरी 2023

एक अच्छा ‘संस्कारक’ क्यों और कैसे बनें?

संस्कार किसी भी पारिवारिक और सामाजिक जीवन में इतना महत्वपूर्ण होता है कि अपने परिवार और समाज के संस्कार के निर्माण एवं विकास का कार्य किसी भी दूसरे के हाथों में सौंपा नहीं जाना चाहिए। इसीलिए संस्कारक बनिए और अपने परिवार और समाज को उन्नत बनाइए। अब इसे अच्छी तरह समझते हैं। 

संस्कार से सम्बन्धित एक सच्चा प्रसंग है| एक बड़े अफसर के यहाँ एक कुत्ता पाला गया था| उस अफसर के विधुर वयोवृद्ध पिताजी भी उसी अफसर बेटे के साथ रहते थे| कुत्ता और उनके पिताजी के रहने का कमरा पास पास था| नौकरों की लापरवाही से पिताजी और उनके कुत्ता के खाने का वर्तन भी कभी कभी बदल जाया करता था| लापरवाही किसकी थी, मैं तय नहीं करना चाहता, परन्तु घर का मुखिया इस उत्तरदायित्व से बच नहीं सकता| एक बार कुत्ता के खाने का बर्तन गायब हो गया और उस वृद्ध पिताजी को खाना देने का समय हो गया| काफी खोज के बाद गायब बर्तन उस साहब के बेटे यानि उस वृद्ध के पोते के कमरे में मिला| उस बच्चे से पूछा गया कि उसने उस बर्तन को क्यों छिपाया? उसने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जब उसके पिताजी बूढ़े हो जायेंगे, तब वह पिताजी को खाने देने के लिए ऐसा बर्तन कहाँ से लायेगा? इसीलिए अपने पापा के लिए वह अभी से बर्तन को सुरक्षित रख दिया है| यह भी एक संस्कार है| यह एक अलग प्रश्न है कि एक संस्कारक की आवश्यकता किसको है?

यह विषय ही महत्वपूर्ण एवं गंभीर है, परन्तु उतना ही उपेक्षित भी है, जबकि सभी इस बारे में बहुत चिंतित भी हैं| संस्कारित व्यक्ति, संस्कारित समाज, संस्कारित राष्ट्र एवं संस्कारित मानवता सभी समय एवं सभी क्षेत्र के किसी भी समाज एवं राष्ट्र के सुख, शांति, विकास एवं समृद्धि के लिए अनिवार्य एवं पूर्व अपेक्षित शर्त है| तो, पहले हमें एक ‘संस्कारक’ की परिभाषा एवं अवधारणा को समझना चाहिए|

किसी में ‘संस्कार’ विकसित करना, या विकसित कराना, या विकसित होने का मार्ग प्रशस्त करना ही एक ‘संस्कारक’ की भूमिका है, दायित्व है, कर्तव्य है, समझदारी है| यह संस्कार सामाजिक जीवन से सम्बन्धित हो सकता है, या सांस्कृतिक जीवन से, या धार्मिक जीवन से या जीवन के अन्य पक्ष से भी सम्बन्धित हो सकता है| तो ‘संस्कार’ क्या है, जो जीवन में इतना महत्वपूर्ण है? 

‘संस्कार’ की अवधारणा  मूलत: व्यक्ति एवं प्रक्रिया के लिए होता है, जिसका अर्थ दोनों में अलग अलग होता है| किसी व्यक्ति को संस्कारयुक्त बनाने का तात्पर्य यह है कि उस व्यक्ति में उन गुणों का अधिस्थापन (स्थापित) कर दिया जाय, जिसे उस संस्कृति एवं सभ्यता में आदर्श माना जाता है| ‘संस्कार’ शब्द का अर्थ उसको सुसज्जित करना या सुसंस्कृत करना भी कहा जा सकता है, लेकिन इसे ‘शुद्धिकरण’ नहीं माना जाना चाहिए| शुद्धिकरण किसी अपवित्र या गन्दगी को हटाना या साफ़ करना हुआ, सुसज्जिकरण किसी अनगढ़े या संस्कार रहित व्यक्ति को उस संस्कृति एवं सभ्यता के अनुरूप आदर्श विचार, व्यवहार, अभिवृति एवं मानसिकता के गुणों से युक्त करना हुआ|

किसी व्यक्ति में संस्कार का अधिस्थापन व्यक्ति के शारीरिक स्तर पर, मानसिक स्तर पर एवं आध्यात्मिक स्तर पर किया जा सकता है, जबकि किसी विधि या प्रक्रिया या कर्म के संस्कार में उन घटनाओं या संबंधों को सांस्कृतिक एवं सामाजिक विधि स्थापित मान्यता  के अनुसार निष्पादित किया जाता है| और इसके साथ ही उन्हें उस समाज की सांस्कृतिक मान्यताओं के अनुरूप कर्तव्यों, दायित्वों, भूमिकाओं, व्यवहारों, आदर्शों, अभिवृत्तियों, परम्पराओं एवं विचारों के बारे में बताया जाता है और उसका उनमे स्थापना किया जाता है| इस तरह एक संस्कार किसी धर्म के सापेक्ष नहीं होकर सभी प्रचलित संस्कृति के सापेक्ष होता है| पालि में इसे ‘संखरा’ कहते हैं| इस तरह संस्कार में हर व्यक्ति को उनकी उस अवस्था से सम्बन्धित प्रकृति के नियमों एवं सांस्कृतिक सामाजिक नियमों एवं मूल्यों से उस व्यक्ति एवं समाज को अवगत कराना होता है| एक पशुवत मानव और एक परिष्कृत मानव में अन्तर उसका संस्कार ही कराता है, जिसे मानव समाज ही उसे "संस्कृति" के रुप में देता है|

अत: किसी  व्यक्ति का संस्कार उस व्यक्ति द्वारा किये गए उसके प्रत्येक क्रिया, विचार या आदर्श में होता है, जो उस व्यक्ति की अचेतन, अवचेतन, चेतन एवं अधिचेतन की संरचना (Structure) एवं ढांचा (Frame) में निहित होता है| इसी ‘संस्कार’ की ‘कृति’ ही किसी व्यक्ति या समाज की ‘संस्कृति’ कहलाती है| अर्थात संस्कृति का मुख्य कार्य व्यक्ति, समाज एवं राष्ट्र में ‘संस्कार’ देना है, यानि उसमें ऐसा मनोवृत्ति एवं अभिवृत्ति विकसित करना है, यानि उसमे संस्कार स्थापित करना है|

यही संस्कार

उनमे अभिवृति (Attitude) को निर्धारित करता है,

उनकी मानसिकता (Mentally) को आकार देता है,

उनकी उम्मीद एवं अपेक्षाओं (Expectation) को साकार करता है,

उनको भविष्य का रास्ता दिखाता है,

अपना आत्म मूल्यन (Self Evaluation) एवं आत्म निरीक्षण (Self Inspection) कराता है,

उसको सामाजिक मूल्यों (Values) एवं प्रतिमानों (Norms) की ओर ले जाता है और

भिन्न परिस्थितियों में उसके अनुरूप उसके व्यवहार, विचार एवं उसके आदर्श को संचालित एवं प्रभावित करता है|

इस तरह यही संस्कार उनकी प्रवृतियों (Tendencies), व्यावहारिक आवेगों (Impulses), अचेतन, चेतन, एवं अधिचेतन प्रभावों (Effects), अभ्यस्त स्वभावों (Mood /Dispositions), एवं सहज प्रवृतियों (Basic Instincts) के रूप में प्रकट होता है| इसे आइसबर्ग (Iceberg) का आन्तरिक भाग कह सकते हैं, जो किसी के ‘व्यक्तित्व’ के दिखने वाले भाग को नियमित एवं संचालित करता है, लेकिन यह भाग पानी के भीतर ही रहता है| ऐसे ही संस्कार आइसबर्ग का आन्तरिक संरचना हुआ| इस तरह संस्कार किसी भी व्यक्ति एवं समाज को सफलता के शिखर पर ले जाने में सहायक होता है|

मैं अब तक एक व्यक्ति के संस्कार की बात कर रहा था, अब प्रक्रियाओं के संस्कार की बात की जानी है| जीवन में कई महत्वपूर्ण घटनाएँ होती रहती है, जिसमे लोगों की सामाजिक प्रस्थितियाँ (Status), भूमिकाएँ (Role), एवं पदों (Post) में महत्वपूर्ण बदलाव होता है, कई नई संस्थाओं (विवाह, परिवार, नातेदारी) का गठन होता है, और कई नए उत्तरदायित्वों को ग्रहण या समापन किया जाना होता है| ऐसे अवसरों पर परिवार, नातेदार, मित्र समूह एवं सामाजिक सदस्यों को आमंत्रित कर इन सामाजिक प्रस्थितियाँ, भूमिकाएँ, एवं पदों में महत्वपूर्ण बदलाव एवं अन्य सम्बन्धित जानकारी दी जाती है, साक्ष्यात्मक उपस्थिति (गवाही) ली जाती है और नए उत्तरदायित्वों को ग्रहण या समापन किया जाता है|

इन सबों के लिए कुछ कार्यक्रमों का आयोजना किया जाना होता है, जिसे कुछ बुद्धिजीवी ‘कर्मकांड’ कहते हैं और कुछ ‘संस्कार’ विधि कहते हैं| ऐसा इसलिए किया जाता है, ताकि उपस्थित लोगों की संलग्नता यानि सहभागिता स्पष्ट हो सके| इस प्रक्रिया में कुछ समय भी लग जाता है, और इसीलिए उन आगुन्तकों के लिए आहार (Food) की सुविधानुसार व्यवस्था भी की जाती है| इन कार्यो के सम्पादन के लिए किसी संस्कारक को बुला लिया जाता है| समाज में ऐसे संस्कारक ‘पुरोहित’, ‘पुजारी’, ‘Priest. या अन्य शब्दों से संबोधित किया जाता है| ये धार्मिक कर्म, धर्मिक कृत्य, एवं अन्य सांस्कृतिक संस्कार कराते हैं| आजकल अतिव्यस्त एवं आधुनिक समाज में उपलब्ध संस्कारक अल्प ज्ञानी यानि मूढ़, विवेकहीन, संस्कारविहीन, स्वार्थी, लोभी और सम्बन्धित शास्त्रों के अल्प ज्ञाता भी होते हैं, या हो सकते हैं| इसके शिक्षण एवं प्रशिक्षण के लिए मैंने एक अलग आलेख “पुरोहित प्रशिक्षण एवं शोध संस्थान क्यों?” में सम्पर्क के बारे मे लिखा है। यह आलेख आप niranjan2020.blogspot.com  पर भी अवलोकनार्थ उपलब्ध है|

यदि हमलोग अपने अपने समाज में शिक्षित, अनुभवी, विवेकशील, सामाजिक, स्तरीय, प्रशिक्षित एवं संस्कारी ‘संस्कारक’ तैयार करते हैं, तब ये संस्कारक इन प्रक्रियाओं के अलावे उस समाज के बच्चे एवं अन्य व्यक्तियों में भी अच्छे अच्छे संस्कार दे सकते हैं। इससे उनमें सामान्य बुद्धिमत्ता (General Intelligence) के अलावे ‘भावनात्मक बुद्धिमत्ता ’(Emotional Intelligence), ‘सामाजिक बुद्धिमत्ता(Social Intelligence), एवं ‘बौद्धिक बुद्धिमता’ (Wisdom Intelligence) का संस्कार, अभिवृति एवं नेतृत्व (Leadership) का संस्कार और ‘वित्तीय समझदारी’ (Financial Understanding) इत्यादि का संस्कार भी उत्पन्न एवं विकसित होगा| इसके अलावा उस क्षेत्र एवं काल और उस समाज की आदर्श संस्कृति को जागृत करने, विकसित करने एवं सशक्त करने में अहम् भूमिका निभायेगा| समाज इसे ही ‘सलाहकार’, ‘परामर्शदाता’ एवं ‘काउंसलर’ (Counsellor) भी कहते हैं| आजकल प्रत्येक समाज में ऐसे ‘सलाहकार संस्कारको’ की भारी कमी है, लेकिन इसकी पूर्ति अवकाश प्राप्त वरिष्ठ नागरिकों एवं युवाओं से की जा सकती है।

इससे भारत को अपनी पुरानी गौरवमयी सांस्कृतिक विरासत को शुद्धता, पूर्णता और मौलिकता में पुनर्जीवित करने एवं स्थापित करने में मदद मिलेगी| चूँकि यह योग्यता आधारित कौशल है, इसीलिए इसमें कोई भी उपयुक्त व्यक्ति प्रशिक्षित हो सकता है| चूँकि यह योग्यता आधारित पद है, उपाधि है, और इसीलिए इस संवैधानिक अधिकार को कोई भी समाज इसे अपने में स्थापित कर सकता है| ये संस्कारक अपने अपने समाजों के लिए ‘देवदूत’ साबित होंगे| ये अपने अपने समाज में वैज्ञानिक मानसिकता एवं आधुनिकता भी स्थापित करेंगे| ये संस्कारक प्रत्येक समाज में, परिवार में और देश में सुख, शांति, समृद्धि, एवं विकास के लिए आवश्यक है| इससे समाज में आ गई विकृतियों एवं विसंगतियों का शुद्धिकरण भी होगा और उसे अपनी मौलिक संस्कृति के स्थापना में सहायता भी मिलेगी|

तो आइए, इस दिशा में हमलोग एक विमर्श शुरू करें और इस दिशा में आगे बढे| इसके लिए आप मध्यप्रदेश के रीवा के सजग एवं सक्रिय श्री जनार्दन पटेल (संपर्क ईमेल – indianpurohit1@gmail.com) से संपर्क कर सकते है| आप भी इस दिशा में अपने समाज को ले जा सकते हैं|

इसी महत्वपूर्ण कार्य को एक ‘संस्कारक’ संपन्न करता है, जिसे हम किसी अनपढ़, स्वार्थी, लोभी , विवेकहीन एवं गैरजवाबदेह व्यक्ति को नहीं सौंप सकते हैं। यही संस्कार हम लोगों का, हमारे समाज का और हमारे राष्ट्र का भविष्य भी निश्चित करता है, आकार देता है|

एक अच्छा संस्कारक बनाना, समाज के सामने इसका विकल्प नहीं  है, बल्कि एक अनिवार्यता है! इसे करना ही पड़ेगा, यदि हमलोग अपने भविष्य को सुधरता हुआ देखना चाहते हैं।

आचार्य निरंजन सिन्हा

 

 

मंगलवार, 27 दिसंबर 2022

नालन्दा विश्वविद्यालय को क्यों जलना पड़ा?

ऐसा क्यों हुआ कि नालन्दा विश्वविद्यालय और भारत के ऐसे सभी संस्थानों के पालि एवं प्राकृत भाषा से सम्बन्धित उपलब्ध सारे साहित्यों एवं ग्रंथों को जल जाना पड़ा या नष्ट हो जाना पड़ा, लेकिन भारत की एक विशिष्ट भाषा ‘संस्कृत’ भाषा में रचित साहित्यों एवं ग्रंथो को जलने या नष्ट हो जाने से बच जाना पडा? ध्यान रहे कि भारत में वर्तमान सभी मौलिक प्राचीन पालि साहित्य एवं ग्रन्थ भारतीय राज्य सीमाओं से बाहर के देशों एवं क्षेत्रों से बहुत बाद के काल में भारत लाकर उसे पुनर्जीवित करना पडा. लेकिन संस्कृत को ऐसा आवश्यकता नहीं पड़ी? कहते हैं कि नालन्दा विश्विद्यालय आग में छह महीने तक जलता रहा| क्या तथाकथित ‘विदेशी आक्रान्ता’ इस विश्वविद्यालय को जला कर नष्ट करने के लिए नालन्दा में कैम्प कर दिया था या कोई स्थानीय आतताई इसे नष्ट कर रहा था?  यदि निश्चितया कोई विदेशी आक्रांता ही थे, तो उसने तथाकथित संस्कृत भाषा के साहित्यों एवं ग्रंथों को क्यों जलने से बचा दिया? क्या वह आक्रान्ता संस्कृत भाषा प्रेमी था? ध्यान रहे कि सामंतवादियों का कोई धर्म नहीं होता, इसलिए तो उनमे धर्म के परे भी वैवाहिक सम्बन्ध मजबूत रहे हैं। लेकिन ऐसा सिर्फ नालन्दा विश्वविद्यालय के साथ ही नहीं हुआ|

नालन्दा विश्वविद्यालय को नष्ट होना पड़ा, लेकिन यह जल कर नष्ट हुआ, जबकि अन्य भी नष्ट हुए, शायद अन्य को बिना जले ही नष्ट होना पडा | ऐसा क्यों? वास्तव में विश्वविद्यालय आधुनिक नाम दिया हुआ है, जिसका आशय एक विशाल अध्ययन केंद्र से है, जहाँ अध्ययन एवं गहन शोध होता रहा| उसकी भाषा माध्यम ‘पालि’ थी| भारत में ऐसे कई केंद्र रहे, जिनके अध्ययन संकुल में विद्यालय भी थे एवं विहार भी थे और इसी विहारों की बहुलता के कारण इस भौगोलिक क्षेत्र का नाम विहार पडा, जो भ्रमित होकर कालान्तर में ‘बिहार’ हो गया| बिहार के बेगूसराय जिले का ‘बिहट’ हो या बिहार के पटना जिले का ‘बिहटा’ हो, सभी ‘विहार’ ही तो थे, (जो विहार हट गए, विहार का हटना ही आज़ का बिहट और बिहटा है) जिन्हें भी नष्ट होना पडा| लेकिन निरंतरता यानि सनातनता सभी संस्कृति की खासियत होती है, जो कालान्तर में भ्रमित अवस्था में भी ‘मूल भाव’ को बचाए रखती है| राजस्थान का पाली हो, बिहार का पाली क़स्बा हो (पटना एवं आरा रेल खंड का पाली रेलवे हाल्ट) या पटना जिला का पालीगंज अनुमंडल नगर, सभी ‘पालि’ भाषा, साहित्य एवं दर्शन के प्रसिद्ध केंद्र रहे, जिन्हें भी नष्ट होना पड़ा| बुद्ध के सिद्धांतों या यों कहें बुद्ध के दर्शन के प्रचंड ज्ञाता ‘देव’ कहलाते थे, इसीलिए तो ऐसे समूहों के स्थायी आवास केंद्र ‘देवकुली’ (पटना जिले के बिहटा प्रखंड का एक गुमनाम कस्बा) या देवकुठार (देउर कोठार – मध्यप्रदेश के रीवा का एक स्थल) को भी उजड़ना पड़ा या नष्ट होना पड़ा| बात इतना ही नहीं है, बौद्ध ज्ञान के सभी अध्ययन केन्द्रों, शोध केन्द्रों, पुस्तकालयों, विहारों, स्तूपों, मंदिरों एवं अन्य सम्बन्धित स्थलों एवं भवनों को नष्ट होना पड़ा| किसी को जलना पड़ा, किसी को ध्वस्त होना पडा, किसी को उजाड़ना पड़ा और किसी में सम्बन्धित व्यक्तियों को ही भाग जाना पड़ा| यह सब एक छोटे काल में नहीं हुआ, अपितु सामन्तवाद के लम्बे अवधि होता रहा|

वह कौन सा आक्रान्ता था, जो शताब्दियों के काल में अपने आतंको में एक ही स्थिरता की गति की निरंतरता बनाए रखा था? चूँकि भारत एक छोटा सा देश या क्षेत्र नहीं था और आज भी नहीं है, भारत एक विविध संस्कृतियों को अपने में समेटे एक उपमहादीप आकार का एक एकात्म भाव लिए ‘भारत भूमि’ था और आज भी है, इसलिए इस विशाल महाद्वीप में, विशाल क्षेत्र एवं विविध संस्कृति में इतने विविध केन्द्रों को नष्ट होने में शताब्दियाँ लगी| 

एक चिकित्सक के तर्क विहीन भावनात्मक हो जाने से अपने रोगी का सम्यक विश्लेषण नहीं कर सकता है और  आवश्यक ईलाज या आपरेशन भी नहीं कर सकता है, ऐसे रोगी का रोग बढ़ता जाता है एवं जटिल भी होता जाता है| भारत की दुर्दशा का कारण भी कुछ ऐसा ही है, कि संस्कृति एवं धर्म की सनातना, निरन्तरता, गरिमा एवं गौरव के नाम पर हमें आवश्यक विश्लेषण, ईलाज या चिडफाड़ (आपरेशन) नहीं करने दिया जाता है| ऐसा नहीं है कि ऐसा सिर्फ भारत में हो रहा है| ऐसा सभी पुरानी संस्कृतियों के साथ होता है, जिसमे 'जड़ता' (Stagnation) का गुण जरुरत से बहुत ज्यादा होता है| ठेठ भाषा में कहें तो इसके अनुयायियों में ‘कट्टरता’ एवं ’अंधआस्था’ बहुत ज्यादा होता है| इसीलिए ऐसी संस्कृतियों के देशों में अपेक्षित विकास नहीं हो पाता है, इसी कारण ऐसे क्षेत्रो यानि ऐसी संस्कृतियों में व्यवस्था द्वारा किये गए प्रयास को कुछ लोग ‘विकास’ करने का ‘नाटक’ भी कहते हैं|

तो, नालन्दा विश्वविद्यालय को क्यों जलना पडा? यह संस्थान इतना बड़ा, इतना प्रसिद्ध एवं इतना गौरवशाली था, कि इसके 'जलने संबंधित' इस उत्तर से ही अन्य संस्थानों एवं सम्बन्धित केन्द्रों तथा स्थलों के नष्ट होने का उत्तर भी मिल जायगा| इसका उत्तर ‘सामन्तवाद’ के उदय एवं विकास में है| भारत में भारतीय सामन्तवाद का जितना अध्ययन होना चाहिए, उतना नहीं हुआ है| भारत में ‘इतिहास लेखनशास्त्र’ (Historiography) के पहले पुरोधा प्रो० दामोदर धर्मानन्द कोसाम्बी ने सबसे पहले भारतीय सामंतवाद पर 1954 में On the Development of Feudalism in India लिखी| भारतीय इतिहास अनुसन्धान परिषद् के संस्थापक अध्यक्ष प्रो० राम शरण शर्मा ने इसे आगे बढाते हुए 1965 में “भारतीय सामंतवाद” लिखी| लेकिन उत्पादन, वितरण, विनिमय एवं संचार की शक्तियों एवं साधनों के अंतर्संबधों के आधार पर ही की गयी इतिहास की व्याख्या सब कुछ स्पष्ट कर सकता है|

‘सामन्तवाद’ में ‘समानता का अन्त’ होता है, अर्थात ‘अर्जित ज्ञान एवं कौशल’ के आधार पर योग्यता का निर्धारण ख़त्म हो जाता है| और इसके स्थान पर ‘जन्म आधारित विशेषाधिकार’ एवं ‘जन्म आधारित निर्योग्यता’ ही योग्यता के निर्धारण का मूल एवं मौलिक आधार बनता है या रहता है| ऐसे में न्याय, स्वतंत्रता, समानता एवं बंधुत्व के दर्शन को मिटने के लिए बाध्य कर दिया जाता है, या मिटा दिया जाता है, या मिटा ही दिया गया| प्राचीन काल से भारत में न्याय, स्वतंत्रता, समानता एवं बंधुत्व के दर्शन पर आधारित ‘बौद्धिक संस्कृति’ अपनी निरन्तरता यानि सनातनता बनाए हुए था| ‘विचारों के जड़त्व’ (Inertia of Thought) में ऐसा सशक्त जड़ता (Stupor/ Stagnation) होता है कि वह सामान्य इतिहासकारों को वही देखने को बाध्य करता है, जो परम्परा से वह मानता एवं जानता आया है| वह किसी मान्यता या जानकारी के समर्थन में ‘प्राथमिक प्रमाणिक साक्ष्य’ (Primary Authentic Evidences) नहीं खोजना चाहता, बल्कि कागजी पौराणिक ग्रंथो को ही मौलिक आधार मान लेता है, जो स्वयं कागज़ के भारत आने के बाद लिखा गया है, और वह भी बिना किसी ‘प्राथमिक प्रमाणिक साक्ष्य’ के आधार पर|

संस्कृत एक ऐसी भाषा है, जिसकी ‘बोली’ (Dialect) अब तक अज्ञात है, यानि इसकी कोई बोली नहीं है| भाषा के "प्राकृतिक उद्विकास" में क्रमानुसार सबसे पहले ‘बोली’ आता है, फिर उसके बाद उसका साहित्य बनता है, और फिर अन्त में, उच्चतर अवस्था में सुसंस्कृत हो जाता है और ‘विज्ञान एवं प्रावैधिकी’ का साहित्य भी हो जाता है| ‘संस्कृत’ भाषा एक ‘संस्कार युक्त’ उच्चतर अवस्था की भाषा है, अर्थात संस्कार कृत (संस्कारित) भाषा ही ‘संस्कृत’ हुआ| तो प्रश्न उठता है कि संस्कृत पूर्व से प्रचलित किस भाषा का संस्कारित उच्चतर अवस्था की भाषा हुई या बनी? क्या यह, जैसा अब अधिकतर विद्वान् कहने लगे हैं, कि यह ‘पालि’ भाषा का ही उच्चतर संस्कारित भाषा है, जो स्वयं ‘प्राकृत’ बोली से विकसित हुआ? 

इस तरह भाषा विकास के प्राकृतिक उद्विकास (Natural Evolution) में यह कड़ी सही बैठता है कि पहली अवस्था में यह बोली ’प्राकृत’ था, फिर साहित्यिक अवस्था में यह ‘पालि’ हुआ और अंतिम उच्चतर संस्कारिक अवस्था में ‘संस्कृत’ हुआ? तो क्या किसी विशिष्ट भाषा को विशिष्ट स्थान दिलाने के लिए ‘पालि’ भाषा साहित्य को नष्ट होना पडा, ताकि सामन्तवादियों की व्यवस्था निर्बाध गति से चलता रहे? ध्यान रहे कि पालि भाषा ही उस समय न्याय, स्वतंत्रता और समानता की दर्शन की भाषा थी, जो सामंतवाद के लिए अहितकर था। तो क्या ‘पालि’ भाषा के कुछ दार्शनिक एवं प्राकृतिक स्वरूप एवं स्वभाव के साहित्य एवं ग्रंथ आज भी कुछ दुसरे नामों में कुछ आवश्यक संशोधन, विलोपन, सम्पादन के साथ उपलब्ध हैं, जिसे संस्कृत भाषा ने सुरक्षित रखा है?

बहुत से प्रश्न है, जो अनुत्तरित हैं| बिना उत्तर के भी 'प्रश्न' बहुत महत्वपूर्ण होते हैं और बहुत उपयोगी होते हैं। प्रसिद्ध वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन और स्टीफन हाकिन्स ने भी बहुत से प्रश्न खड़े किए यानि अनुत्तरित प्रश्न छोड़ दिए, जिसके उत्तर बाद में मिलते जा रहे हैं, और विज्ञान की गुत्थियाँ सुलझती जा रही है, विज्ञान विकसित होता जा रहा है|

आइए, आप भी भारत की विकास की गुत्थियों को सुलझाने में सहयोग कीजिए और भारत को अपनी प्राचीन गौरव पाने में मदद कीजिए एवं भारत को फिर से वैश्विक गुरु बनाने के रास्ते तैयार कीजिए|

आचार्य निरंजन सिन्हा।

www.niranjansinha.com


 

भारतीय राष्ट्र की समस्याएँ और समाधान

‘भारतीय राष्ट्र’ (Nation) की अनेको समस्याएँ हैं| ध्यान रहे कि ‘भारतीय देश’ (Country) की या ‘भारतीय राज्य’ (State, not Province) की अनेकों सम...