बुधवार, 10 जनवरी 2024

गुणवत्तापूर्ण शिक्षा क्या है और क्यों जरुरी है?

गुणवत्तापूर्ण शिक्षा को समझने के लिए कुछ अवधारणाओं को समझने की आवश्यकता है - “आलोचनात्मक चिंतन” (Critical Thinking), “वैज्ञानिक मानसिकता” (Scientific Temper) और “दायरे से बाहर चिंतन” (Out-of-Box Thinking)। 

नयी शिक्षा नीति 2020 के दर्शन का एक प्रमुख बिंदु ही “आलोचनात्मक चिंतन” (Critical Thinking) विकसित करना है| इसके ही साथ “वैज्ञानिक मानसिकता” (Scientific Temper) और “दायरे से बाहर चिंतन” (Out-of-Box Thinking) भी शामिल है| ये सभी बातें अन्य बातों के अतिरिक्त नयी शिक्षा नीति 2020 के उद्देश्य-भूमिका (Preamble) में वर्णित है, लेकिन यही तीन सबसे प्रमुख है| हालाँकि अंग्रेजी और हिंदी भाषा में प्रयुक्त इन शब्दों में अंतर भी है, इसीलिए अंग्रेजी को ही मानक मान कर आगे बढ़ा गया है| ‘आलोचनात्मक चिंतन’, ‘वैज्ञानिक मानसिकता’ एवं ‘दायरे से बाहर चिंतन’ में एक स्पष्ट सम्बन्ध है और इसीलिए तीनों अलग अलग है, लेकिन यह तीनों महत्वपूर्ण अवधारणा है| ‘वैज्ञानिक मानसिकता’ को ‘वैज्ञानिकवाद’ (Scientism) भी कहते हैं, और ये दोनों एक दुसरे के पर्याय है| ‘दायरे से बाहर चिंतन’ को ही थामस सैम्युल कुहन ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “The Structure of Scientific Revolution” में “पैरेड़ाईम शिफ्ट” (Paradigm Shift) कहा है|

सभी स्तरीय परीक्षाओं में, जिसमे राज्य एवं केंद्र स्तरीय आयोग द्वारा संचालित परीक्षाएँ भी शामिल है, आलोचनात्मक चिंतन की आवश्यकता परीक्षाओं के सभी स्तर यथा प्रारंभिक, लिखित एवं साक्षात्कार पर होती है| अब रटे रटाए अधिगम (Rote Learning) यानि ‘प्रश्न के उत्तर’ रट लेने का जमाना गुजर गया, जबतक ‘आलोचनात्मक चिंतन’ की विशिष्ठ समझ नीति निर्धारकों को नहीं थी| आपने भी सुना होगा कि परीक्षक अभ्यर्थियों के उत्तर पुस्तिका को “देखता” है, अर्थात उसे “पढता” नहीं है| अर्थात परीक्षक अभ्यर्थियों के उत्तर पुस्तिकाओं को सरसरी निगाहों से तेजी देखता जाता है कि सब कुछ रटा रटाया हुआ ही है, या कुछ मौलिक और भिन्न भी है? अपनी उत्तर पुस्तिकाओं को परीक्षक से पढवा लेना अभ्यर्थियों का काम होता है, जो उसकी मौलिकता से ही आती है| यदि अभ्यर्थी अपने विशिष्ट मौलिक प्रस्तुति से परीक्षक को अपनी उत्तर पुस्तिकाओं में उत्तरों को पढने के लिए बाध्य कर देता है, तो परीक्षक बहुत खुश होकर पर्याप्त अच्छा अंक देता है| लेकिन यह विशिष्ट उत्तर यानि सामान्य से अलग मौलिक उत्तर अभ्यर्थियों के आलोचनात्मक चिंतन से ही आता है, अन्य दूसरा कोई विकल्प नहीं है| इस आलोचनात्मक चिंतन से सम्बन्धित प्रत्यक्ष प्रश्न साक्षात्कार (Interview) और लिखित परीक्षाओं में भी आने लगे हैं| इसीलिए यदि कोई विद्यार्थी अपने किसी भी परीक्षा में जबरदस्त सफलता चाहता है, तो उसे अवश्य ही आलोचनात्मक चिंतन विकसित करना चाहिए|

परीक्षा या परीक्षाएँ प्रत्येक व्यक्ति के जीवन के हर क्षेत्र में, हर मोड़ पर और हर समय होता रहता है| आलोचनात्मक चिंतन, वैज्ञानिक मानसिकता और विचारों में पैरेडाईम शिफ्ट करने वाले ही विश्व पर शासन करते हैं| आज विश्व के सभी विकसित देशों की संस्कृति में ही आलोचनात्मक चिंतन, वैज्ञानिकता और विचारों में पैरेडाईम शिफ्ट की प्रवृति यानि मानसिकता व्याप्त है| कोई भी विकसित देश सांस्कृतिक विरासत के नाम पर इसे आलोचनात्मक चिंतन, वैज्ञानिकता और विचारों में पैरेडाईम शिफ्ट की प्रवृति यानि मानसिकता को अवरोधित नहीं करता है| इसीलिए मात्र पांच या सात करोड़ की आबादी वाले देशों (जर्मनी, ब्रिटेन, फ़्रांस, इटली) से स्तर ऊपर उठने की मशक्कत में एक सौ पचास करोड़ वाला भारत देश लगा हुआ है, लेकिन इसकी सफलता आलोचनात्मक चिंतन, वैज्ञानिक मानसिकता और विचारों में पैरेडाईम शिफ्ट से ही प्राप्त कर सकता है| जीवन के किसी भी क्षेत्र में विशिष्ट पहचान के साथ अग्रणी रहने के लिए ही आलोचनात्मक चिंतन, वैज्ञानिक मानसिकता और विचारों में पैरेडाईम शिफ्ट की जरुरत है| इन्हीं गुणों से युक्त देश या संस्कृति यानि आलोचनात्मक चिंतन, वैज्ञानिकता और विचारों में पैरेडाईम शिफ्ट में अग्रणी देश या संस्कृति ही विश्व पर वास्तविक शासन कर रहे हैं|  आज सभी राष्ट्रों के शासनाध्यक्ष या शासन (Head of the Government) प्रमुख आज अपने देशों में मात्र “शासन प्रबंधक” (Manager for State –Affair) ही बन कर रह गए हैं, भले आप किसी संप्रभुता के भ्रम में हैं| जहाँ तक संप्रभुता की बात है, कोई इसे सामान्य शारीरिक आँखों से ही देख पाता है, और कोई मानसिक दृष्टि से देखता है| लेकिन मानसिक दृष्टि के लिए ही आलोचनात्मक चिंतन, वैज्ञानिक मानसिकता और विचारों में पैरेडाईम शिफ्ट की आवश्यकता होती है| इसीलिए आलोचनात्मक चिंतन, वैज्ञानिक मानसिकता और विचारों में पैरेडाईम शिफ्ट को विकसित करना जरुरी है|

आलोचनात्मक चिंतन का सीधा और साधारण अर्थ होता है – किसी भी चीज यानि किसी भी विषय/ प्रसंग को समुचित ढंग से समझना| मतलब किसी भी चीज यानि किसी भी विषय/ प्रसंग को समुचित ढंग से नहीं समझ कर, मात्र किसी अंधभक्त की तरह, यानि किसी आस्थावान की तरह, यानि किसी झुण्ड के भेड़ की तरह पीछे पीछे नहीं चलना होता है| बल्कि किसी भी चीज को अपनी बुद्धि, तर्क एवं विवेक से उसे सही एवं पर्याप्त तरीके से समझना और निर्णय लेना है| इसीलिए बड़ी बड़ी कंपनियों, संस्थानों एवं सरकारी उच्च पदस्थ स्थानों पर ऐसे ही गुणवत्ता के व्यक्ति चयनित किये जाते हैं|

आप आलोचनात्मक चिन्तन यानि क्रिटिकल थिंकिंग को अच्छी तरह समझने के लिए अंग्रेजी के पाँचों Vovel (स्वर) – ‘A’, ‘E’, ‘I’, ‘O’, एवं ‘U’ को क्रमानुसार याद रखें| इससे आप इसकी अवधारणा (Concept) और इसकी क्रियाप्रणाली (Methodology) को कभी भी नहीं भूलेंगे| इन पाँचो Vovel (स्वर) – A, E, I, O, एवं U को पाँच क्रिया (Verbs) – ‘Analyse’, ‘Examine’, ‘Inquire’, ‘Open/ Organise’ एवं ‘Unite’ के रूप में ही क्रमानुसार याद रखें| किसी भी शब्द, या वाक्य, या प्रसंग, या सन्दर्भ, या अन्य कोई भी बात को इसी क्रम में जांचे और कसे, आपको सब कुछ स्वत: स्पष्ट होता जायगा|

1.      किसी चीज को ‘विश्लेषित करने’ का अर्थ हुआ, कि उसको उसके मूलभूत तत्वों में ऐसा खंडित करना, कि उसकी वास्तविक प्रकृति का निर्धारण हो सके एवं उनके बीच के निश्चित संबंधों को जाना सके| जैसे आप किसी विषय पर कोई निबन्ध लिखते है, या किसी विषय को अपने सन्दर्भ में चुनते हैं, तो सर्वप्रथम उनमे प्रयुक्त शब्दों का अवधारणात्मक अर्थ (Conceptual Meaning) समझना ही विश्लेषण करना है|

2.      Examine : फिर उपर्युक्त विश्लेषण से प्राप्त सामग्री का ‘परिक्षण/ जांच करना’ होता है| इसका अर्थ हुआ, कि उस विश्लेषण से प्राप्त उसके मूलभूत तत्वों (अवधारणाओं) और उसके विभिन्न संबंधों और प्रसंगों को विभिन्न संभावित सन्दर्भों में जांच पड़ताल करना होता है| विश्लेषण से प्राप्त निष्कर्षों को विभिन्न आयामों में, जैसे उद्विकास, मनोविज्ञान, संस्कृति, विज्ञान, समय, क्षेत्र, भाषा आदि के सन्दर्भ में उसे जांचना ही Examine करना होता है|

3.      Inquire : तब उपरोक्त दोनों प्रक्रियाओं से प्राप्त निष्कर्ष पर ‘प्रश्न करना’ होता है| अर्थात उपरोक्त दोनों प्रक्रियाओं से प्राप्त निष्कर्ष के सम्बन्ध में विविध पक्षों एवं दृष्टिकोणों से प्रश्न खड़ा कर और विवेकपूर्ण ढंग से किसी समुचित निष्कर्ष तक पहुँचना होता है, जो सत्य के करीब होता हुआ होता है| इस सदी के महान वैज्ञानिक स्टीफन हाकिन्स का मानना है कि अध्ययन (समझने) का बेहतर तरीका ‘प्रश्न खड़ा करना’ होता है| बुद्ध भी किसी को समझाने के क्रम में सामने वाले पर उसी के बताए गए उत्तर पर ही प्रश्न खड़ा कर देते थे, और अन्त में उसको समुचित उत्तर मिल जाता था| अपने निष्कर्षों पर स्वयं ही प्रश्न करना भी आलोचनात्मक चिंतन का एक महत्वपूर्ण चरण होता है|

4.      Open : इसके बाद ‘खोलना/ व्यापक बनाना’ आता है, जिसका अर्थ हुआ कि इसे किसी बंद, यानि किसी संकीर्ण अर्थ, यानि किसी परिधि से बाहर करना, ताकि इसका व्यापक सन्दर्भ में अर्थ निकाला और समझा जा सके| इस चरण में अब तक प्राप्त निष्कर्ष का सर्व व्यापीकरण (Generalisation) करना होता है, जिसे सभी परिस्थति, समय एवं सन्दर्भ में उपयोग/ प्रयोग किया जा सके| इसे दुसरे शब्दों में, सैद्धान्तिकरण (Theorisation) भी कह सकते है, जिसमे प्राप्त निष्कर्ष को एक सिद्धांत (Theory) का रूप दिया जाता है|  

5.      Unite : सबसे अन्त में ‘एकीकरण करना’ हुआ, जिसका कई अर्थ होते हैं, जैसे उपरोक्त सभी प्रक्रियाओं एवं तथ्यों को एकत्रित करना, या समाहित करना (Integrate), या व्यवस्थित करना, या एकीकरण करना, या समाज, राष्ट्र और मानवता के सन्दर्भ में एक इकाई के रूप में लाना होता है| 

इस तरह ‘क्रिटिकल थिंकिंग’ (Critical Thinking) का अर्थ हुआ कि सम्बन्धित विषय का एक व्यापक, समेकित, समुचित, सार्थक, तार्किक, वैज्ञानिक एवं विवेकपूर्ण निष्कर्ष पर आना, जिसे सभी विचारवानों को जानना एवं समझना चाहिए|

अब सामान्य जन यह जानना चाहेंगे कि किसी भी विषय को “विश्लेषित करने” (Analyse) के बाद इसे किस सन्दर्भ, या प्रसंग, या पृष्ठभूमि में ‘जाचेंगे, यानि ‘परीक्षित’ करेंगे, यानि ‘प्रश्न खड़ा’ करेंगे? इसके लिए आपको चार्ल्स डार्विन का ‘विकासवाद’ (Theory of Evolution), कार्ल मार्क्स का ‘आर्थिकवाद (Theory of Economic Forces)’, सिगमण्ड फ्रायड का ‘आत्मवाद’ (Theory of Self), अल्बर्ट आइन्स्टीन का ‘सापेक्षवाद’ (Theory of Relativity), और फर्डिनांड डी सौसुरे का ‘संरचनावाद’ (Theory of Structure/ Structuralism) को समझना चाहिए| किसी को भी यदि ‘क्रिटिकल थिंकिंग’ को अपेक्षित ढंग से और वैज्ञानिक तरीके से विकसित करना है, तो उसे  यह सब समझना ही होगा| तब वह व्यक्ति “Critical Thinking”  में पारंगत हो जायगा| तब वह किसी भी क्षेत्र में उचाईयों को छुएगा|

चार्ल्स डार्विन का ‘विकासवाद’ (Theory of Evolution) समझाता है कि ब्रह्मांड में सब कुछ सरलतम (Simpler) स्तर से या स्वरुप से जटिलतर (Complexer) अवस्था में विकसित हुआ है और इसलिए किसी भी कृतत्व (Creation) में दैवीय शक्ति (Divine Power) का योगदान नहीं है। इस तरह इनके द्वारा पर्याप्त साक्ष्य के साथ ईश्वर (God) और ईश्वरीय व्यवस्था के अस्तित्व का खंडन हुआ, जो आलोचनात्मक चिंतन में एक क्रांतिकारी कदम है। अब विकासवादी सिद्धांत कई क्षेत्रों में व्यापक स्वरूप में प्रयुक्त होता है, जो कई परम्परागत अवैज्ञानिक अवधारणाओं को ध्वस्त करता है।

कार्ल मार्क्स के ‘आर्थिकवाद (Theory of Economic Forces)’ के अनुसार सामाजिक स्थायी  बदलाव यानि सामाजिक रुपांतरण (Social Transformation) का आधार आर्थिक्वाद है| इसीलिए इतिहास की वैज्ञानिक और समुचित व्याख्या आर्थिक शक्तियों के साधन और उनके अन्तर्सम्बन्धों के आधार पर ही, यानि उत्पादन, वितरण, विनिमय एवं उपभोग  के साधनों और शक्तियों के आधार पर ही किया जाना समुचित और वैज्ञानिक है। यह वैज्ञानिक व्याख्या की क्रियाविधि (Methodology) कई बनावटी मिथकों को इतिहास से बाहर कर देता है।

सिगमण्ड फ्रायड का ‘आत्मवाद’ (Theory of Self) बताता है कि किसी भी आदमी की मनोदशा यानि उसकी भावना, विचार एवं व्यवहार उसके आत्म (Self, आत्मा नहीं) के इड (Id), इगो (Ego) और सुपर इगो (Super Ego) के मध्य एक समुचित संतुलन से निर्धारित होता है।  'इड' किसी की पाशविक अभिवृत्तियों को अभिव्यक्त करता है, और 'सुपर इगो' समाज के उच्चतर आदर्श, मूल्य एवं प्रतिमान को अभिव्यक्त करता है। और आदमी इन इड एवं सुपर इगो के बीच अपनी सांस्कृतिक जड़ता, पृष्ठभूमि, अनुभव, ज्ञान, परिस्थिति, दबाव, व्यवस्था आदि के अनुसार अपने को संतुलित करता है और तदनुसार व्यवहार करता है। आलोचनात्मक चिंतन में भी इसकी भूमिका ध्यान देने योग्य है|

अल्बर्ट आइन्स्टीन के ‘सापेक्षवाद’ (Theory of Relativity)  के अनुसार ब्रह्मांड में सब कुछ की स्थिति किसी विशेष के सापेक्ष (Relative) ही निर्धारित की जा सकती है। इसके अनुसार किसी भी चीज की अवस्था (Stage), गति (Motion), समय (Time), उर्जा, पदार्थ, आकाश (Space), बल (Force) आदि किसी के सापेक्ष ही निश्चित और निर्धारित किया जा सकता है। अर्थात किसी भी वस्तु या विषय या विचार का अर्थ उसके संदर्भ (Reference), पृष्ठभूमि (Background), समय, प्रस्थिति (Status), क्षेत्र (Region) आदि की सापेक्षता के अनुसार बदलता है। यह बहुत कुछ नवाचारी (Innovative) दृष्टिकोण देता है।

फर्डिनांड डी सौसुरे का ‘संरचनावाद’ (Theory of Structure/ Structuralism) यह समझाता है कि शब्दों, वाक्यों, प्रसंगों का सिर्फ  वही अर्थ नही होते हैं, जो साधारण रूप में दिखाई देता है, बल्कि उनके वास्तविक अर्थ उसकी संरचना (Structure) में निहित होता है। अर्थात किसी भी शब्द, वाक्य, प्रसंग के सतही (Superficial) अर्थ भी होता है और निहित (Implied) अर्थ भी होता है, जिसे समझ कर ही आप सही निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकते हैं। 

वैज्ञानिक मानसिकता (Scientific Temper) में किसी भी विषय या प्रसंग को तार्किकता (Logicality) और विवेकशीलता (Rationality) के आधार पर देखा और समझा जाता है| तार्किकता का अर्थ होता है किसी भी परिणाम को किसी समुचित कारण का परिणाम मानना, अर्थात हर घटना यानि हर उत्पाद का कोई सुनिश्चित कारण होना ही चाहिए| तार्किकता को ही कार्य –कारण (Cause & Effect/ Causation) सम्बन्ध भी कहते हैं| विवेकशीलता का अर्थ किसी भी विषय या प्रसंग को समाज, मानवता एवं प्रकृति, यानि भविष्य के सन्दर्भ में समझना ही होता है| इसी तार्किकता एवं विवेकशीलता से वस्तुनिष्ठता (Objectivity) आती है, और इसी से कोई विषय या प्रसंग तथ्यपरक (Factual) भी हो जाता है| अर्थात आलोचनात्मक चिंतन के लिए इस वैज्ञानिक मानसिकता की अनिवार्यता होती है| इसे “वैज्ञानिकवाद” (Scientism) भी कहते हैं, जिसका तात्पर्य किसी भी विषय या प्रसंग को वैज्ञानिक नजरिए से देखना समझना होता है|

‘दायरे से बाहर चिंतन’ (Out-of-Box Thinking) को  ही “पैरेड़ाईम शिफ्ट” (Paradigm Shift) भी कहा जाता है| इससे ही ‘नवाचार’ (Innovation) आता है, ‘आविष्कार’ (Invention) होता है, ‘खोज’ (Discovery) किया जाता है, और नए तरीके से आगे छलांग लगाया जाता है| स्पष्ट है कि वैज्ञानिक चिंतन से आलोचनात्मक चिंतन आता है, और आलोचनात्मक चिंतन से ही विचारों में. प्रक्रियाओं (Processess) में, क्रियाविधियों (Mechanism) में ‘पैरेड़ाईम शिफ्ट’ होता है|

अत: जीवन के किसी भी क्षेत्र में, किसी भी समय में, किसी भी परिस्थिति में आगे बढ़ने के लिए ‘वैज्ञानिक मानसिकता’, ‘आलोचनात्मक चिंतन’ एवं ‘दायरे से बाहर चिंतन’ को समुचित ढंग जानना एवं समझना जरुरी है|

आचार्य निरंजन सिन्हा 

रविवार, 7 जनवरी 2024

समाज को दिशा देने में साहित्यकारों की भूमिका

“समाज को दिशा देने में साहित्यकारों की भूमिका” को समुचित ढंग से समझने से पहले हमें ‘समाज’ (Society) को समझना चाहिए कि समाज क्या है, अर्थात समाज से क्या तात्पर्य है? तब हमें साहित्य (Literature) और साहित्यकार (Litterateur / Writer / Author) को समझ लेना चाहिए। जब बात साहित्य की आएगी, तो साहित्य के उद्विकास (Evolution) को भी समझना पड़ेगा। यदि हम इन्हें समझने का प्रयास नहीं करेंगे, तो "समाज को दिशा देने में साहित्यकारों की भूमिका" को आधुनिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से नहीं समझ सकेंगे। इसीलिए सबसे पहले 'समाज', 'साहित्य' और 'दिशा' (Direction) को ही समझते हैं।

‘समाज” ‘सम्बन्धों के जाल’ (Web of Relations) को कहते हैं। यानि ‘समाज’ एक व्यवस्था है, जो ‘आपसी संबंधों’ पर आधारित होता है। ‘समाज’ मात्र एक ‘समूह’ नहीं है, जो सिर्फ कुछ आदमियों का समुच्चय मात्र ही है। इसी तरह ‘समाज’ एक ‘समुदाय’ भी नहीं है, जो किसी संकुचित एवं विशिष्ट उद्देश्य से निर्मित होते हैं। इस तरह ‘समाज’ के कई स्तर हो सकते हैं, जो प्रसंग के संदर्भ में बदलता रहता है। ‘समाज’ को वास्तविक या मान्यता प्राप्त "विस्तारित परिवार" (Extended Family) कह सकते हैं, लेकिन इसे "संयुक्त परिवार" (Joint Family) नहीं कहा जाना चाहिए। संयुक्त परिवार कई अलग-अलग परिवार का समुच्चय हो सकता है, लेकिन विस्तारित परिवार एक ही परिवार का विस्तारित स्वरुप होता है, माना जाता है। भारतीय समाज में विस्तारित परिवार का ही स्वरूप मिलता है और संयुक्त परिवार का अस्तित्व भारत में परम्परागत रूप में नहीं है।

'साहित्य' में 'समाज का हित' (स माज + हित + इत्यादि) अन्तर्निहित होता है, और इसीलिए जब कोई भाषा अपने वाचिक या लिखित स्वरुप में ‘समाज के हित’ में अभिव्यक्त होता है, ‘साहित्य’ कहलाता है। जब भाषा संवाद करने का माध्यम बनी और जब भारत में यह प्राकृतिक अवस्था मे थी, प्राकृत भाषा कहलाया। जब प्राकृत भाषा व्याकरण के साथ व्यवस्थित एवं व्यापक क्षेत्र में प्रचलित हो गयी, तो यह समाज और शासन व्यवस्था की पालक भाषा हो गई, तो यह पालि भाषा और साहित्य बन गई। मध्य काल यानि सामंतवाद के काल में यह पालि भाषा और साहित्य संस्कारित होकर, यानि सुसंस्कृत होकर और परिमार्जित एवं परिवर्धित होकर संस्कृत भाषा और साहित्य हो गई। भारत में भाषा और साहित्य के उद्विकास का यही तार्किक, तथ्यात्मक, वैज्ञानिक एवं आधुनिक व्याख्या है। 

अतः भाषा संवाद का माध्यम हुआ और साहित्य सामाजिक सांस्कृतिक उपलब्धियों की तैयार की गई संचित निधि हो गई। इस तरह ‘साहित्य’ की रचना करने वाले ‘साहित्यकार’ (Litterateur) हुए। जब वह साहित्य की रचना करने वाला कुछ भी लिखता है, तो वह "लिखने वाला" अर्थात ‘लेखक’ कहलाया, जिसे अंग्रेजी में ‘Writer’ कहते हैं। और जब उसका लेखन अधिकारिक तौर पर ‘प्रामाणिक’ (Authentic)  होता है, तो वह Author कहलाता है। तो हमें समाज के हित में वाचिक और लिखित सामग्री सृजित करने वालों की क्रियाविधि और उसके प्रभाव को समझना है। हमें समाज की ऐसी क्रियाविधि और उसके प्रभाव को समझना है, जो समाज को नई दिशा दे। तय है कि ऐसा निर्मित समाज अपनी ऐतिहासिक विरासत की संस्कारों को अपनी जड़ों में जमाए रखेगा और उसकी उपलब्धियां आसमान की ऊंचाईयों में भी लहराता हुआ होगा।

"दिशा देने" की बात सदैव सकारात्मक और सृजनात्मक ही होगी, क्योंकि इसके अलावा अन्य दिशा तो दिशाहीनता को ही दर्शाता है। अर्थात सकारात्मक और सृजनात्मक दिशा के अतिरिक्त अन्य दिशाओं के लिए तो किसी अतिरिक्त, सजग, सतर्क और समर्पित प्रयास की कोई आवश्यकता ही नहीं है। मतलब यह है कि किसी को भी यदि कोई दिशा दी जाए, तो उसे अवश्य ही सकारात्मक, रचनात्मक और सृजनात्मक परिणाम देने चाहिए, ताकि समाज, मानवता, प्रकृति और भविष्य लाभान्वित होता रहे। इस उपादेयता के बिना 'दिशा' दिए जाने का कोई मतलब नहीं है।

लिखना यानि साहित्य सृजन करना एक कौशल,  एक विधा है। यह किसी की कोई जन्मजात प्रतिभा या गुण नहीं है। इसे कोई भी प्रयास कर अभ्यास से सीखता है। इसे कोई भी विकसित कर सकता है। जैसे एक मानव शिशु का सजगता, सतर्कता और समर्पित प्रयास कर उसका पालन पोषण एवं उसे संवर्धित किया जाता है, उसी तरह एक साहित्यकार भी साहित्य का सृजन एवं विकास करता है। अर्थात एक साहित्यकार अपना साहित्यिक परितंत्र का, यानि पर्यावरण का निर्माण कर लेता है| वह साहित्य उत्कृष्ट माना जाता है, जो मानवीय संवेगों की अनुभूति रखता है, मानवता को समझता है, और उसे अपने साहित्य की अभिव्यक्ति में समुचित स्थान देता है|मानवता एक इतना व्यापक अवधारणा है जिसमें समुचित एवं पर्याप्त न्याय, स्वतंत्रता, समता समानता और बन्धुत्व की भावना होती है। 

एक अच्छा साहित्यकार उसे समझा जाता है, जिसे इतिहास, संस्कृति, मनोविज्ञान, और दर्शन की समझ होती है, भले ही उसके पास इन विषयों से संबंधित कोई अकादमिक उपाधि नहीं हो| विश्व के सभी स्थापित एवं प्रसिद्ध साहित्य इसी अभिव्यक्ति के कारण ही स्थापित और प्रसिद्ध साहित्य हुए हैं। उसमें इन्ही समझदारियों और दृष्टिकोण की झलक मिलती है| इन इतिहास, संस्कृति, मनोविज्ञान, और दर्शन को समझे बिना ही साहित्य दिशाहीन हो जाती है| समाज के नाम पर कुछ भी लिख देना साहित्य का प्रारंभिक स्वरुप हो सकता है, लेकिन वह अवश्य ही दिशाहीन साहित्य होगा, क्योंकि वह अपने प्रारंभिक अवस्था में है| इसीलिए मैंने इस विषय पर समाज, साहित्य, दिशा एवं साहित्यकार की अवधारणा को स्पष्ट किया है, जिसे हर साहित्यकारों को समझना चाहिए|

कहा जाता है कि कथानक (Narrative) ही शासन करता है और कथानक ही साहित्य होता है|कथानक क्या है? कथानक समाज से संबंधित किसी विषय या प्रसंग पर एक कथा है, जो विचारों, मानवीय भावनाओं और व्यवहारों की अभिव्यक्तियों को अपने समाहित कर जड़ मानव को गतिमान बना देता है। इन साहित्यों का आधार इतिहास, संस्कृति, सामाजिक सांस्कृतिक समस्या, या जीवन से जुड़ी हुई कोई भी रचना हो सकती है, जो समस्यायों पर प्रकाश डालती है, या समस्यायों के समाधान की ओर कोई दिशा देता हुआ होता है| 

वैसे साहित्य में कहानी, मिथक, नाटक, कविता या गीत इत्यादि कुछ भी हो सकता है, लेकिन साहित्य की मौलिक एवं मूलभूत प्रवृति समाज को दिशा देना ही है, और इसीलिए ही साहित्य को समाज का दर्पण भी कहा जाता है| यदि समाज से संबंधित कोई लेखन रचना समाज को दिशा नहीं देता है, तो स्पष्ट है कि उसे कचड़ा माना जाना चाहिए, साहित्य कदापि नहीं माना जाना चाहिए। 

यह कहना गलत नहीं होगा कि साहित्य ही व्यवस्था एवं शासन को भी नियमित एवं प्रभावित करता है| यह भी स्पष्ट मान्यता है कि फ़्रांस की प्रसिद्ध क्रान्ति में मुख्य एवं मौलिक भूमिका साहित्यकारों की ही रही, जिसमे इतिहास, संस्कृति, दर्शन समाहित था और मानवीय संवेगों को उभरता हुआ मनोविज्ञान की स्पष्ट भूमिका परिलक्षित है| भारत में ऐसे साहित्यों का अभाव तो अखरता ही है|

भारतीय साहित्यकार जिन समस्यायों के विरुद्ध लिखना चाहते हैं, या लिखते हैं, वे उन्ही समस्यायों को पैदा करने वालों के द्वारा रचित साहित्य को ही आधार बनाकर अपनी रचना करता है| यही भारतीय साहित्यों की दुर्दशा का कारण है कि उनके लेखन से भारतीय समाज को कोई दिशा नहीं मिलता है| ये साहित्यकार अपनी रचनाओं में उन्ही षड्यंत्रकारियों द्वारा तैयार संरचनात्मक ढांचा के अन्दर में ही तैरते रहते हैं, जिसके विरुद्ध ये लिखते हैं, और उन्ही के द्वारा निर्धारित एवं रचित लेखनों में उलझे रहते हैं| दरअसल ये साहित्यकार कहलाने वाले उनकी स्टील ढांचे में ही तैरते नहीं होते है, अपितु उसमें ही डूबते, उतरते और उपलाते रहते हैं। लेखक की इन रचनाओं का कोई सकारात्मक और सृजनात्मक परिणाम नहीं निकलता है| इसलिए ये नादान साहित्यकार इस असफलता में आम पाठकों की तथाकथित बेवकूफी देखते समझते हैं| ये साहित्यकार कुछ भी लिख देने को ही साहित्य की रचना समझते हैं| कुछ ही साहित्यकार वैश्विक उत्कृष्ट साहित्य की प्रवृति एवं अभिवृति को जानने, समझने और उसे अपने लेखन में उतारने की कोशिश करते हैं|

एक साहित्य में साहित्यकार की एक स्पष्ट मंशा या लक्ष्य होता है, और उस मंशा या लक्ष्य प्राप्त करने के लिए उसे लोकतान्त्रिक ढांचे यानि व्यवस्था के अंतर्गत मानवता का ध्यान रखना होता है| उस साहित्य को सांगत, सरल, साधारण, और सहज बुद्धिग्राह्य बनाकर प्रस्तुत करना होता है| ऐसे साहित्यों में व्यक्ति विशेष, घटनाओं, विचारों एवं आदर्शों को जोड़ते हुए उनका सूक्ष्म, विस्तृत, गहन और सुविचारित भावनात्मक ब्यौरा एवं वर्णन होता है, जिसका उद्देश्य सामने वाले पाठकों को अपनी मंजिल तक बहा कर ले जाना होता है| एक साहित्य में ऐसी वर्णात्मक प्रसंग या कहानी होता है, जो भावनात्मक लहरें उत्पन्न कर अपने पाठकों को बहाकर वहां ले जाता है, जहां वह साहित्यकार उसे ले जाना चाहता है, या उसे समझाना चाहता है| यह सब काल्पनिक होते हुए भी वास्तविक प्रभाव पैदा करता है|

एक साहित्यकार अपने लेखन से अपने विचार, आदर्श, मूल्य आदि का प्रचार प्रसार करता है| वह मानवीय भावनाओं को समझता है, और उसे समुचित दिशा भी देता है| दिमाग सदैव दिल से हार जाता है, यानि बुद्धि सदैव भावनाओं से हार जाता है। अर्थात तथ्य, तर्क, और विज्ञान भी समेकित रूप में समाज पर वह भाव या प्रभाव नहीं छोड़ पाता है, जो एक सुगठित साहित्य प्रभाव देता है| एक मानव भी अपनी इच्छाओं और आवश्यकताओं को भी अपनी भावनाओं में भूल जाता है| 

शासन भी वही समाज या वर्ग कर पाता है, जिसे उत्कृष्ट साहित्य की रचना करना आता है| अत: साहित्य की शक्ति को समझिए और समाज को दिशा दीजिए| लेकिन उससे पहले साहित्यकार को ही अपनी दिशा एवं स्थिति को अवश्य ही दुरुस्त कर लेना चाहिए, अन्यथा एक भटका हुआ साहित्यकार समाज को ही दिग्भ्रमित करता है, जो भारत में होता रहता है|साहित्य में भी सांस्कृतिक जडता को समाप्त कीजिये और साहित्य को न्यायपूर्ण बनाइए। 

ठहरिए और समझिए|

आचार्य निरंजन सिन्हा    

गुरुवार, 4 जनवरी 2024

किसी राष्ट्र का विकास या विनाश

(The Development or Destruction of any Nation)

आज़ हमलोग किसी भी राष्ट्र या समाज के विकास के लिए आवश्यक सैद्धांतिक शर्तों की चर्चा करेंगे, लेकिन संदर्भ भारत का होगा। कोई भी राष्ट्र, या राज्य, या संस्था, या संगठन कब विकसित होता हुआ होता है, या विनाश की ओर लुढ़कता हुआ होता है, या विकास एवं विनाश के बीच संतुलन बनाते हुए दोलित (झूलता हुआ) होता रहता है? इसके लिए एक और एक ही शर्त पर्याप्त होगा कि उसके सभी सदस्यों की गुणवत्ता का स्तर क्या है और वे उसके प्रति कितना समर्पित हैं। ध्यान रहे कि मानव ही किसी भी राष्ट्र का सबसे महत्वपूर्ण संसाधन होता है, जो अन्य संसाधनों का सृजन करता है| अर्थात विकसित होने या अग्रणी होने के लिए उनके अधिकतम सदस्यों या उसके सामान्य जनों में गुणवत्ता का उच्च स्तर हो और उनके प्रति समर्पण में कोई कमी भी नहीं हो।

बहुत से राष्ट्रों में बहुत से समूह या वर्ग गुणवत्ता पूर्ण होते हैं, लेकिन उनकी निष्ठा और समर्पण अपने छोटे हित समूह (यानि जातीय समूह) तक सीमित होता है। ये बातें तो करेंगे बड़ी बड़ी, लेकिन वे "सांस्कृतिक जड़ता" (Cultural Inertia) के शिकार होते हैं। ये अपनी सामाजिक सांस्कृतिक वर्चस्व की निरंतरता के हितों के लिए राष्ट्र हित को भी प्रमुखता नहीं देते, यानि अपनी सामाजिक सांस्कृतिक वर्चस्व में कोई संशोधन को तैयार नहीं होते हैं। इसीलिए ये यथास्थितिवाद को ही विकास की अवस्था के रूप में व्याख्यापित करने का तमाम जुगत लगाते रहते हैं। ये अपने कार्य एजेंडा में बड़ी बड़ी आदर्श की बातें रखेंगे, लेकिन उसे क्रियान्वित नहीं करना चाहेंगे।

इस क्रियाविधि को जानने और समझने के लिए किसी को सामान्य ज्ञानेन्द्रियो के अतिरिक्त उच्चतर मानसिक क्षमता एवं स्तर की आवश्यकता होगी, ताकि कोई इन आवश्यक शर्तों का आलोचनात्मक एवं विश्लेषणात्मक मूल्यांकन कर सके। मीडिया भी इस उपलब्धि का मूल्यांकन उनमें लगे लोगों, यानि इन तथाकथित बौद्धिक लोगों के द्वारा धारित अकादमिक उपाधियों, पदों और संबंधित प्रतिष्ठित संस्थानों के ओज की पृष्ठभुमि में ही प्रस्तुत करते हैं, ताकि सामान्य जन इन लोगों को स्थापित विद्वान कह सके। ऐसे तमाम तथाकथित स्थापित विद्वान सभी सामान्य लोगों में गुणात्मक परिवर्तन की आवश्यकता जताएंगे, लेकिन इस गुणात्मक परिवर्तन को स्थापित "सांस्कृतिक साम्राज्यवादी ढांचे" (Frame work of Cultural Imperialism) के घेरे के दायरे में ही रखे रहेंगे। सांस्कृतिक साम्राज्यवादी अवधारणा, यानि जन्म आधारित ऊंच नीच की अपरिवर्तनीय अवधारणा के अवैज्ञानिक, अतार्किक और अविवेकी होते हुए भी उसे झूठी विरासत के नाम पर ‘सांस्कृतिक जड़ता’ को समाप्त नहीं करना चाहते हैं। भारतीय अर्थशास्त्री चीन की अवस्थाओं की तुलना भारतीय अवस्थाओं से करते रहे हैं। लेकिन उसकी ‘सांस्कृतिक क्रांति” (Cultural Revolution) का उद्धरण जानबूझकर छोड़ देते हैं, क्योंकि तब इन्हें भी तथाकथित भारतीय प्राचीनतम  सांस्कृतिक जड़ता को समाप्त करने पर विचार करना होगा। चीन की सांस्कृतिक क्रांति 1966 से 1976 तक बहुत गहनता से चली, जिसका परिणाम आज का चीन है।

कई अर्थशास्त्री भारतीय अर्थव्यवस्था के 'एस- कर्व' (S- curve) में प्रवेश करने और उस पर आधारित मूल्यांकन में बड़ी बड़ी बातें एवं दावे कर रहे है। इसमें शहरीकरण, औद्योगीकरण, घरेलू आय और ऊर्जा खपत सबसे तेजी से बढ़ते बताते हैं। यह सही है कि यह अवस्था निवेश, तकनीकी प्रगति और उत्पादकता में बड़े सुधार से आता है। अर्थशास्त्री मानते हैं कि इस कर्व अवस्था के बाद अर्थव्यवस्था का बहुत तेजी से विकास होता है। यह एक बचकाना तुलनात्मक अध्ययन है, जैसे किसी एक मानव की बुद्धिमत्ता की तुलना किसी अन्य स्तनपायी पशुओं की बुद्धिमत्ता से उसके बचपन की अवस्था से करके उसके प्रौढ़ावस्था की बुद्धिमत्ता का अनुमान कर लिया जाए। यहां ध्यान देने की बात है कि स्तनपायी पशुओं के बच्चे शुरू से ही मानवों की तुलना में ज्यादा क्रियाशील होते हैं, लेकिन जल्दी ही मानव बहुत आगे निकल जाता है।  यहाँ कहने का तात्पर्य यह है कि लोगों की गुणवत्ता महत्वपूर्ण है| इन अर्थशास्त्रियों का मानना है कि भारतीय अर्थव्यवस्था और जनसांख्यिकी 1990 के दशक में चीन से मिलती जुलती है, और उसी के साथ उसने लम्बी छलांग लगाई थी। 

कुछ अर्थशास्त्री गोल्डमैन सैक्स, मार्गन स्टेनली, मूडीज समेत कई वैश्विक वित्तीय संस्थानों के उद्धरण देकर बताते हैं कि अगले 25 बरसों में वैश्विक अर्थव्यवस्था का केन्द्र होगा। किसी भी राष्ट्र को अर्थव्यवस्था का केन्द्र बनना उत्साहपूर्ण अवस्था हो सकता है, लेकिन यह भी समझना होगा कि वह अवस्था किस रुप में होगा। किसी भी राष्ट्र को अर्थव्यवस्था के केन्द्र आने के लिए क्या कुछ अलग और विशिष्ट किया जा रहा है, उसको भी रेखांकित किया जाय। यदि कोई राष्ट्र उपभोक्ता (Consumer) मात्र ही यानि उसके 'खाने और पचाने' (Consumption) के रूप में होती है, तो यह अवस्था उस राष्ट्र के लिए दुर्भाग्यपूर्ण होगा। भारत 2030 तक जापान (जिसकी आबादी भारत के एक प्रान्त बिहार से भी कम है) को भी पीछे कर देगा। अभी जापान की आबादी भारत की आबादी का सात प्रतिशत के लगभग है, अर्थात भारत की कोई सात प्रतिशत आबादी भी जापान की आबादी की गुणवत्ता नहीं रखता। यह भारत का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है और इस स्थिति को कोई भी  रेखांकित नहीं करता है। मानव संसाधनों में गुणवत्ता पूर्ण बदलाव की तो बात तो सैद्धांतिक रूप में किया जा रहा है, लेकिन जमीनी स्तर पर यह किसी भी दृष्टिकोण से नहीं दिखता है। स्पष्ट है कि "एस -कर्व" आदि का आधार भ्रामक है और यह भ्रम देश को नुक़सान पहुंचा रहा है, किसी विदेशी शक्तियों को नहीं।

भारत के तीव्र और ऊंची छलांग के दावे के आधार का भी अवलोकन किया जाय। अर्थशास्त्री बताते हैं कि भारत आज़ वहां है, जहां से चीन ने उड़ान भरी थी। भारत में आज़ प्रति व्यक्ति क्रय शक्ति (पी पी पी) 5.9 लाख रुपए है और यह चीन में वर्ष 2007 में थी। भारत में आज़ जो कामकाजी लोगों अर्थात 15- 64 वर्ष आयु वर्ग की लोगो की आबादी है, यह अवस्था चीन में बीस वर्ष पहले ही थी। भारत में आज उर्जा की खपत प्रति व्यक्ति 26 गीगा जूल बतायी जाती है और यह खपत दर चीन में बीस वर्ष पहले ही थी। इसी तरह शहरीकरण की वर्तमान स्थिति (35%) भी चीन में बीस साल पहले ही थी। इसमें महिलाओं के बढ़ते कदम को भी गहराई से रेखांकित किया गया है। शिक्षाविदों के अनुसार स्टेम (Science, Technology, English n Mathematics) विषयों में महिलाओं की भागीदारी लगभग आधी हो गई है ‌और यह स्थिति विश्व में सर्वाधिक है। इस क्षेत्र में अमेरिकी भी दूसरे स्थान पर है। इतने सुनहरे आंकड़ों के साथ लोगों की मानसिकता को वैज्ञानिक, आधुनिक, तार्किक और विवेकशील बनाने के किसी भी सजग सतर्क और समर्पित प्रयास की कोई चर्चा नहीं है। स्पष्ट है कि ये अर्थशास्त्री अपने राष्ट्र को, समाज को और मानवता को धोखा दे रहे हैं। ऐसे अर्थशास्त्रियों को भविष्य कभी माफ नहीं करेगा। ये अर्थशास्त्री अपने आंकड़ों में साक्षरता और शिक्षा में गड्ड-मड्ड कर रहे हैं और आंकड़ों को यथास्थितिवाद को बनाए रखने के लिए व्याख्यापित करते हैं।

लेकिन भारत में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI - Artificial Intelligence) और तकनीक - 4.0 (Technology 4.0) की स्थिति दयनीय है। इस वैज्ञानिकता की स्थिति के लिए जो आवश्यक है, उसका सम्पूर्ण ब्यौरा और विवरण “नई शिक्षा नीति 2020” के दर्शन में है, लेकिन धरातल पर जो क्रियान्वयन हो रहा है, उससे इस दर्शन का कोई प्रत्यक्ष संबंध परिलक्षित नहीं होता है। इस दर्शन में आलोचनात्मक चिंतन (Critical Thinking), समस्या समाधान (Problem Solving), पैरेडाईम शिफ्ट (Paradigm Shift - Out of Box Thinking), वैज्ञानिक मानसिकता (Scientific Temper) आदि आदि उच्च स्तरीय अवधारणाओं का प्रयोग किया गया है, लेकिन उसे व्यवहारिक रूप में पाने के जमीनी सच्चाई अलग है। तय है कि इसके लिए सामान्य जन के सोचने विचारने की अभिवृति (Attitude), प्रतिरूप (Pattern) और संरचनात्मक ढांचा (Structural Frame work) को बदलना होगा। सामान्य जन के इसी सोचने विचारने की अभिवृति, प्रतिरूप और संरचनात्मक ढांचा को ही एक शब्द में संस्कृति (Culture) कहते हैं। बात फिर सांस्कृतिक जड़ता पर आकर ठहर जाती है, जिसे हम पुरातन, सनातन, विरासत के नाम पर कोई बदलाव नहीं चाहते हैं। हमें अपने पुरातन, सनातन और विरासत को भी बदलने या संशोधित करने की आवश्यकता नहीं है, लेकिन इसे वैज्ञानिक और आधुनिक दृष्टिकोण से व्याख्यापित किए जाने की अनिवार्यता तो है ही। इस संस्कृति को संशोधित यानि इसे वैज्ञानिक एवं आधुनिक बनाए बिना भारतीय कोई नवाचार (Innovation) नहीं कर पा रहे हैं। सिर्फ "प्रस्तुति की विविधता" (Diversity in Presentation) दे रहे हैं, लेकिन कोई "पैरेडाईम शिफ्ट" (Paradigm Shift) इतनी बड़ी आबादी के अनुपात में नहीं है। इस वैज्ञानिक और आधुनिक दृष्टिकोण के बिना कोई भी समाज वैश्विक नेतृत्व नहीं दे सकता।

भारतीय अर्थशास्त्रियों की किसी भी प्रसंग में वित्तीय साम्राज्यवाद (Financial Imperialism) की अवधारणा परिलक्षित नहीं हुआ है। इनमें इस साम्राज्यवाद की समझ है, या नहीं है, मैं नहीं जानता। लेकिन इनमें सांस्कृतिक साम्राज्यवाद (Cultural Imperialism) की समझ यदि है भी, तो वह उनकी सांस्कृतिक जड़ता (Cultural Inertia) के कारण दिखती नहीं है। वे वणिक साम्राज्यवाद, (Mercantile Imperialism), औद्योगिक साम्राज्यवाद (Industrial Imperialism), आर्थिक साम्राज्यवाद (Economic Imperialism), को तो समझते होते हैं, लेकिन निवेश (Investment) भी वित्तीय साम्राज्यवाद का ही एक सरल स्वरुप है, को रेखांकित नहीं करते होते हैं। भारतीय इतिहासकारों ने भी वित्तीय साम्राज्यवाद के आगमन और उपस्थिति को कभी भी भारतीय राजनीतिक स्वतंत्रता के संदर्भ में नहीं समझाया है। आदरणीय इतिहासकार श्री रजनी पाम दत्त, "इंडिया टुडे" (आज़ का भारत) के लेखक इसके अपवाद हो सकते हैं। पश्चिमी विद्वानों का समाज तो इस वित्तीय साम्राज्यवाद का लाभार्थी है, तो उसे इस पर लिखने की कोई आवश्यकता नहीं है। ऐसे अर्थशास्त्रियों के द्वारा भारत को लेकर किए गए प्रक्षेपण (Projection) यानि पूर्वानुमान को मैं अतिरंजित और भ्रामक मानता हूं।

विज्ञान की मौलिक और मूलभूत शर्तें यथा वैज्ञानिक दृष्टिकोण (Scientific Attitude), आलोचनात्मक चिंतन (Critical Thinking), विश्लेषणात्मक अध्ययन (Analytical Studies), पैरेडाईम शिफ्ट, वस्तुपरकता (Objectivity) आदि आदि जैसे तत्वों में आवश्यक बदलाव किए विकास की बातें बेमानी है। कोई अर्थशास्त्री वैश्विक बाजार की शक्तियों (Forces of  World Market) के प्रभाव का मूल्यांकन अपने राष्ट्र, या समाज, संस्कृति में उसके तथाकथित विकास के संदर्भ में नहीं करता है और उस तथाकथित विकास का श्रेय वहां की व्यवस्था, या सत्ता, या राजनीतिक विचारधारा को दे दिया जाता है। यदि बाजार की शक्तियों के प्रभाव का वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन किया जाए, तो भारत में विकास की वास्तविक गति में व्यवस्था या सत्ता के विशेष अतिरिक्त प्रयास की उपलब्धि का मूल्यांकन किया जा सकता है।

उपरोक्त विवेचना से प्राप्त जानकारियों एवं तथ्यों से आप इस अवस्था में आ ही जाएंगे कि आपके अपने संदर्भ के समाज या देश या संस्कृति वास्तविक विकास की ओर कदम बढ़ा रहा है, या विनाश की ओर बढ़ रहा है, या इन दोनों के बीच दोलन कर रहा है? इसका निर्णय आपको करना है|

आचार्य निरंजन सिन्हा

 

रविवार, 31 दिसंबर 2023

"विरोध करने" का मनोविज्ञान

(The Psychology of 'to Oppose')

आज हमलोग भारत के तथाकथित कई बौद्धिक सामाजिक सांस्कृतिक आन्दोलनों के उद्देश्यों के विपरीत उनको हो रही प्राप्ति का विश्लेषण गहराई से करेंगे और समझेंगे| ये आन्दोलनकर्ता जिस बात या अवधारणा का जबरदस्त विरोध करते दिखते हैं, कुछ दशकों से वही अवधारणा और ज्यादा मजबूत होकर उभरी है| हमलोग किसी का विरोध क्यों करते हैं?  और विरोध करने के स्पष्ट उद्देश्य और स्पष्ट मंशा के होते हुए भी विरोध के तरीकों की भिन्नता एवं विविधता से अलग अलग अर्थ कैसे निकलता है? क्या कभी कभी या अक्सर विरोध करने के कई तरीकों से उसी विरोधी लक्ष्य का समर्थन होता हैं, जिसका वे विरोध करने चले है? भारत में कई सामाजिक और सांस्कृतिक आन्दोलन, या अधिकतर आन्दोलन भी इसी विरोध के निहितार्थ को साबित कर रहे हैं, कि वे जिसका विरोध करते दिखते हैं, वस्तुत: वे उसका ही जबरदस्त ढंग से समर्थन कर रहे हैं? यह बात पूर्णतया सही है और इसीलिए यह बात विचित्र भी लगती है, लेकिन है पूर्ण सत्य। 

जानबूझकर तीख़ा विरोध दर्ज कर अपने काम को आगे ले जाने का एक उदाहरण भारतीय फिल्मों से लिया जा सकता है। जिन किसी फिल्म को यदि आम जन में दिलचस्प बनाकर उनमें उत्सुकता पैदा कर देने के लिए कई तरकीब सोची जाती है और उसमें सबसे ज्यादा कारगर तरीका  कोई "विरोध जताना" होता है। विरोध करने की मात्रा बढ़ाने और उसे सर्वोच्च स्तर पर ले जाने के लिए विरोध को माननीय न्यायालय मे भी ले जाया जाता है और उसके बाद मीडिया का सहारा लिया जाता है। इसमें फिल्म के निर्देशक या निर्माता के साथ मिलकर काफी विचार विमर्श कर निर्देशक या निर्माता अपने विरुद्ध उसी फिल्म के हीरो या हीरोईन से यौन उत्तेजना संबंधित कोई संवेदनशील आरोप किसी भी स्थिति में लगवा दिया जाता है और इस आधार पर विरोध दर्ज किया जाता है। इस तरह यह सामान्य दर्शकों के लिए उत्सुकता की वजह बन जाती है| फिर इन दोनों यानि पक्ष एवं विपक्ष मिलकर मीडिया के समर्थन से उस फिल्म को हिट करा दिया जाता है। यह विरोध दर्ज कर फिल्म प्रचार का अद्भुत प्रचार का तरीका है। इसमें सामान्य जनों के मनोवैज्ञानिक उपयोग के लिए सिग्मंड फ्रायड के 'मनोविश्लेषणात्मक अवधारणा' (Psycho Analytical Concept) और कार्ल जुंग के 'गहरे मनोविज्ञान' (The Depth Psychology) का उपयोग किया जाता है। 

ऐसे ही तरीके कुछ उच्च स्तरीय बौद्धिक लोग अपने सामाजिक और सांस्कृतिक आयोजनों को क्रियान्वित करने में प्रयोग और उपयोग करते हैं। ऐसे उच्च स्तरीय बौद्धिक लोग अपने विरोधियों से ही जबरदस्त विरोध करवा कर अपने एजेंडे को उन्हीं से क्रियान्वित कराते हैं और सफल बनाते हैं। यह अद्भुत और कारगर तरीका है, जिसे साधारण आंखों से नहीं देखा जा सकता। इसे सही रूप में समझने के लिए मानसिक दृष्टि अवश्य चाहिए, जो सामान्य जन में तो नहीं ही होती है और यह उनके नेतृत्व में भी नहीं ही होती है। यदि यह सब समझ किसी नेतृत्व में है भी, तो वह नेतृत्व भी बिक गया हुआ होता है, जिसे बिके हुए लोग कहते हैं।  ये बिके हुए नेता अपने मुद्दे के ही विरोधियों के हाथों में बिके हुए होते हैं और ऐसे नेता अपने अनुयायियों को भेड़ बकरी समझकर नेतृत्व देता रहता है। समाज के पके हुए और थके हुए लोगों से इसे समझने की कोई उम्मीद भी नहीं होती है। पके हुए लोगों की श्रेणी में वैसे ही लोग शामिल हैं, जिन्हें लगता है कि उनकी जानकारी समुचित और पर्याप्त है और उन्हें नया एवं अलग कुछ भी जानने की जरूरत ही नहीं है। थके हुए लोगों की श्रेणी में वैसे लोग शामिल हैं, जिन्हें लगता है कि ये सामान्य जन इतने जाहिल है कि इन्हें बदला ही नहीं जा सकता, और ऐसे लोग अब अपने को थके हुए पाते हैं। इन लोगों को न तो इतिहास और संस्कृति की समझ होती है और न ही मनोविज्ञान की समझ होती है। अतः ऐसे नादान लोग अपनी अज्ञानता को सामान्य जन की अज्ञानता समझकर छुपाने का प्रयास करते हैं। अब उम्मीद तो मात्र "विचारों के युवाओं" से ही है, चाहे उनकी शारीरिक उम्र कुछ भी हो।

जिसे हम गलत समझते हैं, या अनुचित मानते हैं, या अनावश्यक पाते है, उसका विरोध करना हमारी मानसिकता होती है। अर्थात यह मनोविज्ञान का विषय है। चूंकि विरोध करना मन का विज्ञान हुआ, और इसीलिए यह व्यक्ति के विचारों, भावनाओं और व्यवहारों का विज्ञान हो गया। मानव अपने मन से संचालित होता है और मन उसके पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा होता है। अर्थात मानव मन अपने पर्यावरण और परिस्थिति को जैसा देखता और समझता है, उसी से उसके मन की भावनाएं, विचार और व्यवहार निर्धारित, नियंत्रित, संचालित और प्रभावित होता है। इसमें उनके ज्ञान के स्तर की भूमिका महत्वपूर्ण होती है और इसीलिए इसमें उसके आलोचनात्मक और विश्लेषणात्मक मूल्यांकन की क्षमता और स्तर की बात शामिल हो जाती है। इसके लिए उसे शारीरिक आंखों सहित सभी ज्ञानेन्द्रियो के अतिरिक्त मानसिक दृष्टि की जरूरत होती है। सामान्य जनों के पास शारीरिक आंखें तो होती है, लेकिन मानसिक दृष्टि एक कौशल और योग्यता होता है, जिसे विकसित करना होता है और हर कोई इसे अपेक्षित मात्रा तक विकसित नहीं कर पाता है। इसीलिए विरोध किए जाने के निहितार्थ को समझने के बावजूद भी उससे प्राप्त प्रतिफल के विपरीत हो जाने को वे समझ नहीं पाते हैं।

इसे भी एक उदाहरण से समझते हैं। भारतीयों का एक प्रमुख त्योहार है - होली, प्रकृति परिवर्तन यानि नए फसलों के घर आगमन के अवसर पर रंगों का पर्व या आयोजन। इसके शुरुआती दिन में घर- मुहल्ले के कूड़े कचडों को एकत्रित कर और अतिरिक्त ईंधन देकर जला दिया जाता है, जिसे “होली का दहन” यानि “होलिका दहन” कहा जाता है। तब अगले दिन सूखे गीले रंगों के साथ उमंगित हुआ जाता है। इसके साथ ही भारतीय पारंपरिक नव वर्ष की शुरुआत होती है। इसे आजकल कुछ तथाकथित बौद्धिक लोग इसे मिथकीय कहानियों को जोड़ कर इसे ऐतिहासिक मान लेते हैं और तब अपनी बौद्धिकता प्रमाणित करने का प्रयास करते हैं। ऐसे तथाकथित बौद्धिक लोग इससे जुड़े ईश्वरीय नामों की ऐतिहासिकता से इंकार करते हैं और इन ईश्वरीय नामों के ऐतिहासिक अस्तित्व का सख्त विरोध करते हैं, फिर भी वे उनकी ऐतिहासिकता को ही प्रमाणित करते रहते हैं। मैंने एक परिचित को रंगों के त्योहार - होली की शुभकामनाएं भेजी। तुरंत एक तथाकथित बौद्धिक उत्तर आया - 'मैं (वह परिचित) एक महिला के दहन किए जाने के अवसर पर आपकी (लेखक निरंजन सिन्हा की) शुभकामनाएं स्वीकार नहीं कर सकता'। मैंने उन्हें तुरंत उत्तर भेजा - "यदि होलिका एक ऐतिहासिक व्यक्ति थी, तो उसे बचाने वाला नरसिंह अवतार अवश्य ही एक ऐतिहासिक व्यक्ति रहा होगा और वह भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है। तब आप ईश्वरीय नामों के अस्तित्व भगवान श्रीराम की ऐतिहासिकता से कैसे इंकार करते हैं?" उन्होंने मोबाइल फोन का कनेक्शन ही काट दिया। यह भी विरोध करने की तथाकथित बौद्धिकता का नमूना है, जिन्हें इसका पता ही नहीं है कि वे किसका विरोध कर रहे हैं और किसका समर्थन कर रहे हैं| यह भी विरोध करने के मनोविज्ञान को स्पष्ट करता है।

आजकल जाति व्यवस्था के विरोध का प्रचलन है, या फैशन हो गया है, और उसके विरोध के लिए ही जाति आधारित संगठन बनाया जाता है। ये तथाकथित बौद्धिक जाति आधारित "सामाजिक पूंजी" (Social Capital) का निर्माण कर रहे हैं और अपने को जाति व्यवस्था विरोधी भी बता रहे हैं। ये अपने जाति की परम्परा को गौरवान्वित करने के अथक प्रयास में लगे हुए हैं और अपने को जाति व्यवस्था के विरोधी भी बताते हैं। वास्तव में जाति आधारित सामाजिक सांस्कृतिक व्यवस्था अवैज्ञानिक है, अलोकतांत्रिक है, मानवता विरोधी है और अनुचित भी है, जिसे समाप्त किया ही जाना चाहिए। लेकिन  इन संगठनों और गतिविधियों के परिणाम जो आ रहे हैं, वह इनके उद्देश्य के विपरीत है, यानि आज जाति आधारित सामाजिक सांस्कृतिक व्यवस्था ही और मजबूत होती जा रही है। आज जाति व्यवस्था के विध्वंस के जो उदाहरण मिल रहें हैं, वे बाजार की शक्तियो (Market Forces) के फलस्वरूप है। इसी तरह ब्राह्मणवाद के विरोध करते दिखने वाले ही सख्त  ब्राह्मणवादी हो गए हैं, क्योंकि इन्हे ब्राह्मणवाद के मूलभूत तत्वो यथा जाति आधारित ऊंच नीच में विश्वास, ईश्वर में विश्वास, कर्मकांड, अंधविश्वास, पाखंड में विश्वास आदि बहुत ज्यादा है। 

इसी तरह तथाकथित "मूल निवासी" की कहानी पर उछलने और विरोध करने की बौद्धिकता के आन्दोलन का मनोविज्ञान समझने योग्य है। वैश्विक मानव वैज्ञानिकों (Anthropologists) की एक ही मत है कि होमो सेपियंस सेपियंस की उत्पत्ति अफ्रीका के बोत्सवाना  के मैदान में कोई एक लाख साल पहले हुआं था। होमो के अन्य प्रजातियों का अस्तित्व बहुत पहले ही समाप्त हो गया था। अतः आज सभी मानव एक ही व्यक्ति की संतानें हैं। प्राक इतिहास और इतिहास के काल में आव्रजनों की कई धाराएं भारत आती रही है, तो तथाकथित मूल निवासी के सापेक्ष किसी एक ही धारा की चर्चा क्यों है? इसके सापेक्ष राजनीति को समझने के लिए शारीरिक आंखें पर्याप्त नहीं है और इसके लिए आलोचनात्मक (Critical) एवं विश्लेषणात्मक (Analytical) मानसिक दृष्टि चाहिए। इस संबंध में कई कथा कहानियों को इतिहास साबित करने का प्रयास जारी है। ऐसे मूल निवासी के समर्थक यह साबित करना चाहते हैं कि वे तथाकथित मूल निवासी कई हजार वर्षों से अपनी जाति और वर्ण के अनुसार काम करते आ रहे हैं (और शोषण के शिकार हैं), अर्थात इन्हें अपनी जाति के अनुसार कार्य करने की विशेषज्ञता और कुशलता विगत पांच हजार वर्षों से प्राप्त है। तब मूल निवासी का निहितार्थ यही है कि मूल निवासी समर्थकों के अनुसार इन्हें अपनी तथाकथित जाति के अनुसार ही कार्य का सम्पादन करना चाहिए, ताकि समाज और राष्ट्र को महत्तम योगदान हो सके एवं यही राष्ट्र हित में होगा| तब वे राष्ट्र को अपने इतने सर्वोत्तम योग्यता के आधार पर योगदान का विरोध क्यों करते हैं? यह भी विरोध करने के मनोविज्ञान की क्रियाविधि का एक स्पष्ट उदाहरण है। हालांकि तथाकथित मूल निवासियों की अपने पक्ष की और इसके विपरीत पक्ष की सभी कहानियाँ महज़ कहानियाँ ही है और उसमें कोई ऐतिहासिक वैज्ञानिकता नहीं है। दरअसल ये जातियाँ और वर्ण व्यवस्था मध्य काल की सामंतवादी व्यवस्था की भारतीय संस्करण है। 

ऐसे ही उदाहरण मनुस्मृति के विरोध का है 

और शूद्र वर्ण के विरोध का है।

किसी के विरुद्ध लगातार लगे रहना किसी आन्दोलन की सफलता का आवश्यक शर्त हो सकता है, जब उसके संभावित परिणामों को भी देखने समझने की मानसिक दृष्टि वे रखते हैं, लेकिन अपने विरोधियों के आव्यूह (Matrix) में ही उलझ कर उसी में समाधान खोजना भी मूर्खता होता है| किसी बिंदु पर ठहर जाना भी उसकी गहराइयों में उतरने का मौका देता है, दौड़ते रहना तो सतह पर फिसलना ही होता है| इस फिसलन का परिणाम यह होता है, कि आपको जाना कहाँ होता है और आप कहीं दूसरी अवांछित जगह पहुँच जाते हैं| जिसका आप विरोध कर बदलाव करना चाहते हैं, आज वही जबरदस्त ढंग से मजबूत होता जा रहा है| आज उपरोक्त “मूल निवासी” के स्पष्ट किया गया अर्थ के ही निहितार्थ को समझिए, मनुस्मृति के विरोध का और शूद्र वर्ण के विरोध का निहितार्थ और उसका मनोविज्ञान को कभी बाद में समझा जायगा|

" एक भारत! श्रेष्ठ भारत!! "

आचार्य निरंजन सिन्हा  

 

अंग्रेज क्यों चले गए?

अंग्रेज भारत आए और भारत से चले भी गए|   क्यों?   अंग्रेज अपने ‘धन’ से ‘धन’ कमाने के लिए भारत आए और अन्य देशों में भी गए| इनके धन की कमाई क...