शनिवार, 30 सितंबर 2023

सर्कस के जोकर का क्रान्तिकारी पैगाम

मुझे आजकल भारत में अधिकांश तथाकथित क्रान्तिकारी नेतागण, या यों कहें कि सभी तथाकथित क्रान्तिकारी नेताओं की हालत देख कर सर्कस के कलाकार याद आ जाते हैं, या स्पष्ट कहूँ, तो सर्कस के जोकर ही याद आ जाते हैं| इनको ‘व्यक्ति परिवर्तन’ और ‘व्यवस्था परिवर्तन’ में कोई मौलिक अंतर समझ में आता है, या नहीं, यह वही जानें| परन्तु दिखता तो यही है कि वे 'व्यक्ति परिवर्तन' को ही 'व्यवस्था परिवर्तन' समझते हैं|, यानि इन्हें इन दोनों अवधारणाओं में कोई फर्क समझ में नहीं आता|

ऐसा कहने का आधार यह है कि जिनको ‘व्यवस्था परिवर्तन’ की ‘क्रियाविधि’ (Mechanism) समझ में आता है, उनके पास उससे संबंधित कोई स्पष्ट ‘अवधारणा’ (Concept) होता है, भले ही उनकी रणनीति गुप्त रहे| ऐसे अवधारणाओं का एक स्पष्ट ‘दर्शन’ (Philosophy) होता है, जिसे बहुत ही कम लोग समझ पाते हैं, लेकिन एक स्पष्ट दर्शन तो होता ही है| ‘व्यक्ति परिवर्तन’ करने वाले ज्यादा से ज्यादा ‘दशको की राजनीति’ करते हैं, या करना चाहते हैं| लेकिन ‘व्यवस्था परिवर्तन’ करने वाले अधिकतर ‘सदियों की राजनीति’ करते हैं, या करना चाहते हैं| लेकिन व्यवस्था में परिवर्तन तो संस्कृति के परिवर्तन से ही होता है। महान क्रांतिकारी माओ त्से तुंग ने पहले माना था कि सत्ता बन्दूक की नली से मिलती है, लेकिन बाद में उन्हें भी यह समझ में आ गया कि व्यवस्था में परिवर्तन के लिए संस्कृति को ही बदलने की आवश्यकता होती है। इसलिए इनके द्वारा किए गये सांस्कृतिक क्रांति ही आज़ चीन को वैश्विक स्तर पर ले आ सका।

लेकिन इस 'सांस्कृतिक क्रांति 'के संदर्भ में व्यवस्था परिवर्तन’ शब्द या अवधारणा उचित नहीं है, इसके लिए तो उपयुक्त शब्द या अवधारणा ‘व्यवस्था का रूपांतरण’ (Transformation of System) होना चाहिए| दरअसल स्थायी और संरचनात्मक परिवर्तन के लिए ही ‘रूपान्तरण’ अवधारणा ही उपयुक्त है|

हालाँकि अब सर्कस प्रतिबंधित हो गया है, लेकिंन जिन्होने सर्कस देखा है, उन्हें सर्कस के जोकर और कलाकार खूब याद होगा| जिन्होंने सर्कस नहीं देखा है, या उसे देखने का अवसर नहीं मिला है, उन्हें प्रसिद्ध अभिनेता राजकपूर द्वारा अभिनीत ऐतिहासिक फिल्म “मेरा नाम जोकर” अवश्य देखना चाहिए| वैसे यह फिल्म ‘मानवीय जीवन मूल्यों एवं भावनाओं’ को उकेरती और अभिव्यक्त करती एक महान फिल्म है, लेकिन मेरा अनुरोध उनके कलाकारों और उनके जोकर (अभिनेता राजकपूर जी) की स्थितियों  एवं परिस्थितियों का ध्यान से अवलोकन करेंगे, तो आपको हमारे तथाकथित क्रान्तिकारी नेताओं की हरकतों को समझने का अवसर मिलेगा|

इन सर्कसों के जोकर एवं कलाकार को उसी सर्कस के ढाँचे (Framework) में, उसी बनावट (Structure) में एवं उन्हीं की नीतियों के अनुरूप ही अपनी कलाकारी दिखाना होता है, उसके बाहर नहीं| इसीलिए उन्हें पहले से ही प्रायोजित तरीके से ही कार्य करना होता है, या कर पाते हैं| इसी कारण वे सर्कस के प्रायोजित साफ्टवेयर में फिट होकर प्रायोजक की प्रयोजना के ही अनुरूप ही ‘शो’ करते हैं| यही हालत हमारे तथाकथित क्रान्तिकारी कलाकारों की है| 

वे भी उन्ही के चक्रव्यूह में, जिनके विरुद्ध ये दिखते हैं, बड़े प्रक्रम से एवं बड़ी सूक्ष्मता और गहराई से उन्ही के पक्ष में कलाकारी दिखाने में लगे रहेंगे| उन्ही के साहित्य एवं ग्रन्थ को पढ़ कर और उसे ही अकाट्य सत्य एवं सही मानेंगे, यानि ये जोकर उसी ढाँचे एवं व्यवस्था में और उन्हीं की नीतियों के अनुरूप तैरते एवं उड़ते रहेंगे, यानि कलाकारी करते रहेंगे| और ये इस काल्पनिक अहसास में भी रहेंगे कि ये अब क्रान्तिकारी विजय पाने ही वाले हैं। इन्हें ऐसा इसलिए भी लगता है क्योंकि इनको यथास्थितिवादियों के मैदान की गहरी प्रोग्रामिंग की समझ ही नहीं होती है| 

ये सिर्फ अपनी डफली ज़ोर ज़ोर से पिटते हैं, गला फाड फाड़ कर चीखते चिल्लाते भी हैं, और अपनी सिर नीचे एवं पैर ऊपर कर सारी धरती का बोझ अपने सिर पर रख लेने का दावा भी करते हैं| आप भी ऐसे चीखते -चिल्लाते और गला फाड़ते नेताओं को याद कर सकते हैं, यानि ध्यान में ला सकते हैं। जोकर के इस आकर्षक प्रदर्शन का तालियों की गडगडाहट से खूब स्वागत होता है। इसी तरह ये नेताजी भी तालियों की गडगडाहट से ही बहुत खुश हो जाते हैं|

लेकिन तालियों की गडगडाहट सुनने को बेकरार नेतागण, या तालियों की गडगडाहट सुन कर अति प्रसन्न होने वाले क्रान्तिकारी नेतागण यह भी याद रखें, कि ऐसी ही गडगडाहट मदारी के खेल वाले को भी मिलती हैं|फिर इन दोनों गड़गड़ाहट में अंतर वही जाने।

 ध्यान रहे, गंभीर विमर्श में, या गंभीर चिंतन में तो सन्नाटा छा जाता है| तो ये नेतागण गंभीर विमर्श या गंभीर चिंतन कर रहे होते हैं, या और कोई खेल दिखा रहे होते हैं, यह तो आप भी समझ रहे हैं| दरअसल चिरकालिक समस्या का समाधान भी गंभीर विमर्श, चिंतन, गहरा अध्ययन और मनन मंथन चाहता है।

हार्वर्ड विश्विद्यालय के प्रसिद्ध प्रोफ़ेसर सैम्युल थामस कुहन अपनी पुस्तक - The Structure of Scientific Revolutions में कहते हैं, कि हर क्रान्ति की मूल बुनियाद विचारों में पैरेड़ाईम शिफ्ट (Paradigm Shift) है| और यह विचारों में पैरेड़ाईम शिफ्ट सन्दर्भ, या परिस्थिति, या संरचना, या बनावट में मूलभूत बदलाव से ही आ सकता है। यह पैरेडाईम शिफ्ट उसी ढाँचे में रहकर, या उसी सन्दर्भ, या परिस्थिति, या संरचना, या बनावट में रह कर नहीं हो सकता| लेकिन ये तथाकथित क्रान्तिकारी नेता इसे समझते ही नहीं है, या समझना ही नहीं चाहते, या इसे समझने की उनमें कोई योग्यता एवं स्तर ही नहीं होता है| चूँकि ये नेता तथाकथित क्रान्तिकारी माने जाते हैं, और इसीलिए इन्हें “थके” हुए (अब कुछ नहीं हो सकता ), या “पके” (मैं पर्याप्त जानता हूँ और मुझे कुछ और जानने समझने की जरुरत नहीं है ) हुए, या “बिके” (अपने विरोधियों के हाथों बिके हुए यानि उनसे मिले हुए ) हुए कहने में भी डर लगता है|

मेरा सादर अनुरोध है कि कोई भी तथाकथित क्रान्तिकारी कलाकार, यानि क्रान्तिकारी नेता मेरे इस विश्लेषण एवं मूल्याङ्कन में अपने को रख कर नहीं देखें, और अपनी वर्तमान गति (Motion), सुर (Frequency) और अपनी लय (Harmony) में व्यक्ति परिवर्तन के अभियान में लगे रहें, और यथास्थितिवाद को मजबूती से जमाएँ रखें|  

आचार्य निरंजन सिन्हा 

बुधवार, 13 सितंबर 2023

भारतीय शिक्षा की यह दुर्दशा क्यों?

(The Plight of Indian Education System) 

आजकल शैक्षणिक जगत में यह चर्चा है कि विश्व के सर्वोत्कृष्ट 200 विश्वविद्यालयों की सूची में एक भी भारतीय विश्वविद्यालय नहीं है| अर्थात भारत की उच्च शिक्षा यानि महाविद्यालयी एवं विश्वविद्यालयी शिक्षा भी गुणवत्तापूर्ण और उत्कृष्ट नहीं हैसामान्य शिक्षा की अवस्था तो सभी को ज्ञात है ही। तो आखिर उच्च शिक्षा के साथ ऐसा क्यों है? और यदि यह सही है, तो इसका समाधान क्या है? अर्थात भारतीय विश्विविद्यालयों को उत्कृष्ट कैसे बनाया जाय? यह एक बहुत ही गंभीर एवं चिंतनीय विषय है| कैसे एक विश्व गुरु की यह दुर्दशा हो गई, हालांकि यह प्रश्न अर्थात इस ‘कैसे’ का मूल्याङ्कन एक अलग विषय है, जो विशद भी है, गंभीर भी है, विचारोत्तेजक भी है, क्योंकि इसकी ऐतिहासिक शक्तियों और प्रक्रियाओं को समझना एवं जानना एक विस्तारित विषय है और इसीलिए इस विषय को कभी अलग से विश्लेषणात्मक मूल्याङ्कन करूंगा|

यदि विश्व के सभी देशों की शैक्षणिक स्थिति का तुलनात्मक अध्ययन किया जाय, तो इस स्पष्ट विभाजन का आधार भी सुस्पष्ट हो जाता है| इन सभी देशों को दो स्पष्ट अलग अलग वर्ग में रखा जा सकता है, जिसका आधार सांस्कृतिक जड़ता’ (Cultural Inertia) और सांस्कृतिक गतिशीलता’ (Cultural Dynamism) ही स्पष्ट होगा| अर्थात इन समाजों यानि इन राष्ट्रों यानि इन संस्कृतियों में या तो “सांस्कृतिक जडता” होगी, या “सांस्कृतिक गतिशीलता” होगी| “सांस्कृतिक जडता” का अर्थ है - तथाकथित महान सांस्कृतिक धरोहर एवं परम्परा के नाम पर आधुनिकता, वैज्ञानिकता, तार्किकता, मानवता, न्यायवादिता, समता (एवं समानता), स्वतन्त्रता, बंधुता का ही व्यवहारिक विरोध करना| लेकिन “सांस्कृतिक गतिशीलता” का अर्थ है -  सामाजिक गतिशीलता, तकनिकी विकास और बाजार की शक्तियों की अनिवार्यताओं एवं आवश्यकताओं के अनुरूप आधुनिकता, वैज्ञानिकता, तार्किकता, मानवता, न्यायवादिता, समता (एवं समानता), स्वतन्त्रता, बंधुता को वास्तविक समर्थन देना और उसे सशक्त करना होता है|

हमें इन पिछड़े हुए अविकसित एवं तथाकथित विकासशील देशों अर्थात समाजों यानि संस्कृतियों को दृष्टि में रखते हुए एक व्यापक विश्लेषणात्मक एवं आलोचनात्मक मूल्याङ्कन (Analytical n Critical Evaluation) करने की आवश्यकता है, लेकिन भारत को मुख्य सन्दर्भ में रखना होगा| भारत के सम्बन्ध में इससे भी ज्यादा दुखदायी यह है कि भारतीय तथाकथित विद्वानों की इसके सम्बन्ध में जो सोच है, जो दृष्टि है, जो नजरिया है, और जो समझ है, वह मान्यतावादी ज्यादा है, एवं तर्कवादी कम हैं| ये भारतीय विद्वान् सरकारी महकमों में उच्चस्थ पदों पर विद्यमान हैं, या हाल तक नीति नियंता रहे हैं| ऐसे कई भारतीय विद्वान् भारतीय विश्विद्यालयों, सम्बन्धित प्राधिकरणों में और शैक्षणिक जगत के तथाकथित स्थापित शैक्षणिक सलाहकार या प्राधिकार हैं| ये लच्छेदार अंग्रेजी लिखते बोलते हैं, इनके बच्चे भारतीय विश्विद्यालयों में नहीं, अपितु विदेशी विश्वविद्यालयों में पढ़ते हैं, और इनके उच्चस्थ पद इनकी योग्यता की अपेक्षा इनकी ‘सामाजिक पूंजी’ (Social Capital) का सह उत्पाद (By Product) होता है| अर्थात इनमे इनकी पद के अनुरूप योग्यता का स्थान बहुत ही कम होता है, और इनकी मुख्य योग्यता इनका सामाजिक सम्बन्ध है, जिसका मुख्य आधार सांस्कृतिक साम्राज्यवादी ढांचे में ही निहित होता है| ऐसी स्थिति सिर्फ भारत में ही नहीं है, अपितु सभी पिछड़े हुए संस्कृतियों में होता है|

दरअसल यही लोग भारतीय सहित सभी पिछड़े हुए देशों की शैक्षणिक दुर्दशा के मूल एवं मुख्य कारण हैं, जिसको वो कभी रेखांकित करना नहीं चाहते हैं, और कभी ऐसा करना भी नहीं चाहेंगे| इन तथाकथित शैक्षणिक विद्वानों को कभी भी अपनी ‘सांस्कृतिक साम्राज्यवादी जड़ता’ (Inertia of Cultural Imperialism) का अहसास ही नहीं होता है| इनको ‘इतिहास’ (History), ‘दर्शन’ (Philosophy), एवं ‘मनोविज्ञान’ (Psychology) की व्यवहारिक समझ ही नहीं होता है, और इसीलिए ऐसा अधपका विद्वान कभी सम्यक नीति निर्माता हो ही नहीं सकता| इनको ‘इतिहास’ के बदलते स्वरुप की समझ ही नहीं होती, इनको बाजार को क्रियान्वित करने वाली शक्तियों की क्रियाविधि की कोई जानकारी नहीं होती, और इसीलिए इनको ऐतिहासिक शक्तियों की विश्लेषणात्मक मूल्याङ्कन का नहीं तो महत्त्व पता होता है, और नहीं ही इसको समझने स्तर होता है| अर्थात इन्हें “इतिहास के दर्शन” (Historiography) का ही समझ नहीं होता|और इसीलिए इन्हें शैक्षणिक जगत की गत्यात्मकता (Dynamism) पर 'सांस्कृतिक साम्राज्यवादी जडता' का प्रभाव का समझ ही नहीं होता।

इन तथाकथित शैक्षणिक (भारतीय सहित) विद्वानों को कभी भी अपनी ‘सांस्कृतिक साम्राज्यवादी की जड़ता’ की समझ नहीं होती, और इसीलिए इनकी शैक्षणिक नीतियाँ इस सांस्कृतिक साम्राज्यवादी की जड़ता में जड़ (Fix) हो गया है, और इसे समझने में कतई समर्थ नहीं हो सकते| ये राजनीतिक साम्राज्यवाद, वणिक साम्राज्यवाद, औद्योगिक साम्राज्यवाद आदि को जानते समझते हैं, परन्तु उन्हें ‘वित्तीय साम्राज्यवाद’ (Financial Imperialism), ‘डाटा साम्राज्यवाद’ (Data Imperialism) और ‘सांस्कृतिक साम्राज्यवाद’ (Cultural Imperialism) की कोई समझ ही नहीं होती| और ये शैक्षणिक नीतियों के नियामक, संचालक बन कर (भारत सहित) इन देशों यानि इन संस्कृतियों के भविष्य को गढ़ने वाले बने हुए हैं, और यही (भारत सहित) इनका दुर्भाग्य है|

मैंने देखा है कि भारतीय शैक्षणिक विद्वान् अपनी बातों में ‘Academic Excellence’ (अकादमिक उत्कृष्टता), ‘Industry Partnership’ (वाणिज्यिक सहभागिता), ‘Digital Technological Support’ (डिजीटल तकनिकी समर्थन), ‘Strong Financial Support’ (मजबूत वित्तीय समर्थन) एवं ‘Robust Services Support’ (जबरदस्त सेवा सहयोग) के अभाव का रोना रोते रहते हैं। ऐसा करते हुए वे अपनी शैक्षणिक मौलिक एवं मूलभूत समझ के अभाव और दूर दृष्टि के अभाव को ढके रहेंगे, लेकिन मूल और मौलिक समस्या की जड़ों पर जाने से बचें रहेंगे| ये ‘Interactive Digital Learning Platform, Contribution of less percentage of GDP, Social Impact Initiative, Diverse Inclusive Campus, आदि आदि आकर्षक, आधुनिक, तकनीकी एवं नवोन्मेषी (Innovative) शब्दों का उल्लेख अपनी बातों में अवश्य करेंगे, जिसे वे विदेशी अंग्रेजी अखबारों में पढ़ लेते हैं| इससे वे अपने को ज्ञानी होने का आभास देते हैं, लेकिन वे चिन्तन विहीन रट्टू तोता होते हैं। इन्हें अपनी सांस्कृतिक जड़ता की समझ की जिक्र करने की जरुरत नहीं है, ऐसा यह अज्ञानतावश करते हैं, या जान बूझकर करते हैं, ताकि इन्हें अपनी ‘परंपरागत संस्कृति जड़ता’ का लाभांश (Dividend) मिलता रहे| चूंकि ये अपने ‘सामाजिक पूजी’ के बदौलत शैक्षणिक नीति नियामक बने रहते हैं, इसीलिए इनमे योग्यता की सापेक्षिक कमी होती है| चूँकि इनमे (भारतीय सहित) अन्य देशों में यानि इन्हें अपनी संस्कृतियों एवं पारिस्थितिक परिस्थितियों के अनुरूप चिंतन सामर्थ्य नहीं होता, इसीलिए इन्हें अपनी बातों में आकर्षक एवं आदर्शात्मक शब्दावली को अनावश्यक रूप से रखते हैं|

यदि आप विश्व के सर्वोत्कृष्ट विश्विविद्यालयों की सूची का अवलोकन करेंगे, तो एक ही बात सबमें सामान्य (Common) यानि सबमें शामिल है, और वह यह है कि इन सभी विकसित राष्ट्रों यानी समाजों की संस्कृति आधुनिक, वैज्ञानिक, तार्किक, न्यायिक एवं मानवतावादी है| इन समाजों की संस्कृति में ढोंग, पाखण्ड, अंधविश्वास और अनावश्यक कर्मकांड का सर्वथा अभाव रहता है| इन देशों में यानि इन समाजों में वैज्ञानिक मानसिकता (Scientific Temper) होती है, ‘आस्था’ (Devotion) के स्थान पर ‘प्रश्नों’ (शंकाओं) को सम्मान मिलता है, व्यक्ति एवं समाज के अस्तित्व का संतुलन होता है, तार्किकता (Logic) एवं विवेकशीलता (Rationality) होती है,  स्वतन्त्रता एवं समता तथा समानता (Equality n Equity) होती है, और राजनेताओं एवं नीति नियामकों की ‘बातों’, ‘विचारों’, ‘भावनाओं’, एवं ‘व्यवहारों’ में “अखंडता’ (Integrity) अवश्य रहती है| अर्थात पिछड़े देशों यानि संस्कृतियों में इन सभी मूल और मौलिक तत्वों की स्थिति उलटा होती है| अत: स्पष्ट है कि शासन का ईश्वर के किसी स्वरुप में आस्था नहीं होता, आत्मा एवं पुनर्जन्म और कर्मवाद के अवैज्ञानिक अमानवीय सिद्धांतों को कोई मान्यता नहीं होता| इन्ही बातों का ध्यान शिक्षा के मूल में होना अनिवार्य है, जिसे पिछड़े हुए देश नहीं अपनाते हैं|अर्थात शिक्षा में आलोचनात्मक चिंतन और विश्लेषण होगा, प्रश्न पूछने एवं शंकाओं को सम्मान मिलेगा, वैज्ञानिकता से किसी की भी परम्परागत भावनाओं को खंडित किया जा सकता है, तर्कवादिता के साथ साथ विवेकशीलता महत्वपूर्ण होता है।

लेकिन भारत सहित सभी पिछड़े हुए देशों यानि संस्कृतियों में इन अवैज्ञानिक एवं अमानवीय सिद्धांतों को सांस्कृतिक धरोहर के रूप में मान्यता प्राप्त है, जो स्वयं मध्ययुगीन उत्पत्ति है| इनके पुरातनता का यानी प्राचीन काल के होने का कोई पुरातत्विक प्रमाण या प्राथमिक प्रमाणिक प्रमाण नहीं है| यह सांस्कृतिक साम्राज्यवाद एक वैश्विक घटना थी, जो वैश्विक सामंतवाद का क्षेत्रीय सांस्कृतिक उत्पाद था| इस सांस्कृतिक साम्राज्यवाद को यूरोप ने पुनर्जागरण आन्दोलन के द्वारा और रूस एवं चीन ने अपनी सांस्कृतिक बदलाव (क्रांति) के द्वारा समाप्त कर दिया| लेकिन इस मध्यवर्ती सांस्कृतिक साम्राज्यवाद को सभी पिछड़े हुए देशों में ‘सांस्कृतिक आवरण’ (Cultural Veil) में सुरक्षित रखते हुए आधुनिकता लाने का महज तमाशा किया जाता है| इस पर खुले दिमाग से और राष्ट्र हित में एक व्यापक विमर्श की आवश्यकता है, यदि वास्तव में भारत को फिर से वैश्विक गुरु बनाना है|

याद रहे कि आप भारत के सन्दर्भ में सही और सम्यक साबित हो सकते हैं, लेकिन वैश्विक परिदृश्य में आप अलग थलग नहीं रह सकते हैं| इस ‘वैश्विक गाँव’ (Global Village) में कोई भी एक देश आज उस ‘वैश्विक गाँव’ का एकमात्र टोला (Tola) बन कर रह गया है| हमलोग अवैज्ञानिक, अतार्किक, अविवेकी और अलोकतांत्रिक मानवता विरोधी सांस्कृतिक यथास्थितिवाद को मजबूत रखते हुए आज वैश्विक सन्दर्भ में पिछड़ते जा रहे हैं| आज भारत विश्व के सबसे बड़ी आबादी होने के कारण विश्व का सबसे बड़ा बाजार है, और भारत की आबादी के खाने और इसे पचा लेने की क्षमता के कारण को अपनी वैश्विक पूछ के कारण का कोई अन्य अर्थ मत निकालें| 

शिक्षा ही शांति, समृद्धि, विकास आदि का सबसे महत्वपूर्ण साधन है, प्रक्रिया है, क्रियाविधि है, और इसीलिए शिक्षा को उत्कृष्ट, सान्दर्भिक, वैज्ञानिक, तर्कशील एवं विवेकशील होना चाहिए एवं बदलती आवश्यकता के कदम से कदम मिलाता हुआ होना चाहिए| उत्कृष्ट शिक्षा ही ईश्वर, आत्मा, पुनर्जन्म और कर्मवाद के ढोंग, पाखंड, अंधविश्वास एवं अनावश्यक कर्मकांड को खंडित करते हुए उत्कृष्टता पर छा गए धुन्ध को मिटा सकता है और इस तरह विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी को मौलिक और मूलभूत आधार दे सकता है। शिक्षा में अनिवार्य रुप से सांस्कृतिक जड़ता दूर कर सांस्कृतिक गतिशीलता लानी ही होगी। इन सभी पर ठहर कर और गंभीर होकर आप भी विचार करें| इस आलेख को एक से अधिक बार पढ़ा जाय।

आचार्य निरंजन सिन्हा   

शनिवार, 2 सितंबर 2023

विद्रोह करें !

 (Revolt Against)

मैंने कहा – “विद्रोह करें”, परन्तु किसके प्रति यानि किसके विरुद्ध ‘विद्रोह’ करना है? विद्रोह करने के साथ एक बहुत बड़ी उलझन है, कि आप जिसके विरुद्ध विद्रोह करते है, आप उसी के स्तर (Strata Level) या तल (Floor) पर पहुँच जाते हैं और उसी प्रतिबंध के स्तर या तल पर उलझ कर रह जाते हैं|अक्सर लोगो की ‘न्याय’ की अवधारणा के प्रति जो समझ होती है, उसे ही पाने के लिए तत्कालीन व्यवस्था या तंत्र के विरुद्ध विद्रोह करते हैं, या करना चाहते हैं। न्याय का तात्पर्य है - ‘स्वतंत्रता’, ‘समता’ (एवं समानता, इसे क्रमश: Equality व Equity भी कहते हैं). एवं ‘बंधुत्व’ की उपलब्धता| लोग इसी चेतनता के अपने बोध के अनुसार इसे पाने के लिए विद्रोह करते हैं, लेकिन उन्हें अपेक्षित सफलता नहीं मिलती है|

जब कोई किसी व्यवस्था (Order), तंत्र (System), विचार (Thought), मूल्य (Value) आदि के विरुद्ध विद्रोह करता है, या विद्रोह करना चाहता है, तो वह उस व्यवस्था, तंत्र, विचार या मूल्य आदि के उसी तत्व (Components) के स्तर एवं तल पर वह ठहर कर उलझ भी जाता है| ये कोई सृजनात्मक और रचनात्मक काम नहीं करना चाहते हैं। जैसे कोई जाति व्यवस्था का विरोध कर विद्रोह करता है| जाति व्यवस्था ऊँच – नीच के स्तरीकरण पर खड़ा एक अमानवीय मूल्यों पर आधारित ढांचा है| जब कोई जाति व्यवस्था के विरुद्ध विद्रोह करता है, तो अक्सर वह इस व्यवस्था के विरुद्ध अपनी जाति का समर्थन कर जातीय संगठन बना लेता है और उसे सशक्त करने और गौरवपूर्ण बनाने का प्रयास करता है| उसे यह समझ ही नहीं आता है, कि जिसका वह विरोध करने चला है, दरअसल वह उसी "जाति व्यवस्था" का समर्थन ही कर रहा है, और उसी को और मजबूत भी कर रहा है|

ऐसे सामान्य लोग समाज में लगे हीन प्रतिबंधों के विरुद्ध जो विद्रोह करते हैं, उस विद्रोह का स्तर एवं तल भी तो उसी स्तर या तल का होगा, जिस स्तर या तक का प्रतिबन्ध होगा| अर्थात इनका विद्रोह भी हीन (निम्न मानक का मापदंड) स्तर का ही होगा, और हीन स्तर एवं तल के विरुद्ध ही विद्रोह कर वह अपना सर्वस्व न्योछावर कर देगा| इस विद्रोह में वह अपना और अपने समुदाय या समाज का धन, संसाधन, ऊर्जा, समय, जवानी, उत्साह आदि झोंक कर बर्बाद कर देता है, और अपने समाज के लिए कुछ भी सकारात्मक रचनात्मक सृजन नहीं करता है तथा कोई दिशा भी नहीं देता है| वह समाज इसी स्तर या तल पर आकार ठहर जाता है, और वह किसी भी उच्च स्तरीय मानक की अपेक्षा नहीं कर पाता है|

ध्यान रहे कि मैं किसी भी प्रतिबन्ध, चाहे उसका स्तर या तल हीन हो या उच्च स्तर या तल का हो, यदि वह प्राकृतिक न्याय के विरुद्ध जाता है, तो मैं ऐसे किसी भी व्यवस्था, तंत्र, विचार या मूल्य आदि का समर्थन नहीं कर सकता हूँ| ऐसे किसी भी प्रतिबन्ध को ‘अमानवीय’ प्रतिबन्ध कहा जाता है, जो किसी के महत्तम सामाजिक विकास में बाधक बनता है, अर्थात जो प्रतिबन्ध किसी की स्वतन्त्रता, समता एवं बंधुत्व को कम करता है, या बाधित करता है, उसका प्रत्येक सजग, सतर्क एवं विवेकशील व्यक्ति और समाज विरोध करता ही है| तो ऐसी स्थिति में एक व्यक्ति या एक समाज को ऐसे प्रतिबंधो से मुक्ति कैसे मिल सकती है, जो बड़ा अहम् सवाल है?

डॉ भीम राव आम्बेडकर ने  19 जुलाई, 1942 के नागपुर में दमित वर्गों के सम्मलेन में स्पष्ट आह्वान किया – Educate (शिक्षित करना या होना), Agitate (मनन मंथन करना या उद्वेलित होना), Organise (उस विषय वस्तु को या उन लोगो को व्यवस्थित करना या संगठित करना), परन्तु राजनीतिक स्वार्थों के लिए लोगो ने इनके ‘सूत्र’ के शब्दों के क्रम भी बदल दिया, और शब्दों को भी बदल दिया| अब लोग Educate से तो शुरू करते हैं, परन्तु दुसरे क्रम में Organise ले आए, और Agitate को तीसरे क्रम पर लाकर उसे Struggle से प्रतिस्थापित कर दिया| यदि आपने उस महापुरुष के ‘सूत्र वाक्य’ को बदल दिया, तो उसके साथ आप अपना नाम लगा सकते हैं, इसमें किसी को कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन उस महापुरुष के मौलिक सूत्र वाक्य में छेड़छाड़ करने का अधिकार किसी को नहीं है| शब्दों के सिर्फ ‘सतही’ (Superficial) अर्थ ही नहीं होते हैं, उसके निहित (Implied) अर्थ भी होते हैं, जो प्रत्येक शब्दों की एक विशिष्ट संरचना (Structuralism in Language) में निहित होती है| सतही लोगो का ध्यान सिर्फ सतही अर्थ तक ही रहता है, क्योंकि उनका स्तर भी वही सतही होता है| उनको कम से कम एक विद्वान् के शब्दों के क्रम एवं चयन के नाम पर रुक कर गंभीरता से विचार कर लेना चाहिए था| लोग अपने “आत्म विद्रोह” (Agitate) को भूल कर, सीधे व्यवस्था, तंत्र, विचार या मूल्य आदि के विरुद्ध कूद जाते हैं|

सामान्यत: लोग जब अपने द्वारा किये गये विद्रोह का मूल्यांकन करता है, तो व्यवस्था, तंत्र, विचार या मूल्य आदि में आए बदलाव की प्रत्येक मात्रा के लिए अपने योगदान को आगे रख कर देखते हैं| परन्तु वे अदृश्य “बाजार की शक्तियों” की क्रियाविधि एवं प्रभाव को नहीं जानते हैं, या उसका मूल्याङ्कन की क्षमता ही उनमे नहीं होती है| बाजर की शक्तियां ही इतिहास की अवधि में ‘ऐतिहासिक शक्तियां’ कहलाती है, जो सामाजिक सांस्कृतिक व्यवस्था एवं ढाँचा में बड़ी स्थिरता से रूपांतरण करता रहता है| ये तथाकथित क्रांतिकारी बौद्धिक विद्रोही बाजार की शक्तियों के प्रभाव एवं परिणाम को भी अपनी उपलब्धि में समेट कर सामान्य जन को गुमराह करते रहते हैं| लेकिन यह भी सही है कि एक व्यक्ति का भी “तितली प्रभाव” (Butter Fly Effect) होता है| तो ऐसा व्यक्ति कौन होता है? इसे आगे स्पष्ट किया गया है|

ऐसा निम्न या हीन स्तर या तल पर विद्रोह करने वाला अपने को क्रांतिकारी विद्रोही दिखाना चाहता है कि वह स्वतन्त्रता, समता और बंधुत्व का सजग, सक्रिय एवं विवेकवान समर्थक है। परन्तु वह मूल रूप में उसी स्तर और उसी तल के खूंटे से मजबूती से बंधा होता है, जिसका वह विद्रोह करता है| वह उसी खूंटे के चक्कर लगाता रहता है और वह तथाकथित न्यायप्रियता के विरुद्ध विद्रोह की ‘आत्ममुग्धता’ के चम्मच (Spoon) में डुबकियां लगता रहता है| विद्रोह के इस खूंटे के बिना उसको अपने अस्तित्व का कोई बोध (Perception) ही नहीं होता है| अज्ञात का समाधान कभी भी ज्ञात से नहीं खोजा जा सकता है| किसी भी समस्या का समाधान उसी स्तर एवं तल पर रह कर नहीं पाया जा सकता है, जिस स्तर एवं तल का समस्या होता है, उसके समाधान के लिए समस्या के स्तर एवं तल से ऊपर उठना पड़ता है|

लोगो पर प्रभावी नियंत्रण का एक सफल एवं कारगर तरीका यह भी है कि लोगों से प्रतिक्रिया लेकर ही उसे नियंत्रित किया जाय| इस तरीके की यह बहुत बड़ी खासियत यह है कि प्रतिक्रिया देने वाले को किसी से नियंत्रित होना पड रहा है, इसका उसे कदापि अहसास ही नहीं होता है| वह प्रतिक्रिया देने वाला अपना समस्त ज्ञात ज्ञान को उस प्रतिक्रिया में उढेल कर “बौद्धिक’ दिखने का कोई अवसर नहीं छोड़ना चाहता है| ऐसा कर वह आत्ममुग्ध भी रहता है, और नित नए नए मुद्दों पर प्रतिक्रिया देकर वह खुश भी रहता है| नित नए नए मुद्दों के अभाव में वह बेरोजगार सा हो जाता है, और इसीलिए व्यवस्था या तंत्र भी नित नए नए मुद्दे परोसता रहता है| सामान्य जन भी क्रान्ति को गतिमान होने के आभासी (स्वप्निल) दावे में खुश रहता है, परन्तु मौलिक समस्या जस का तस रहता है| ऐसे तथाकथित प्रगतिशील बौद्धिकों को लगे रहने की बधाइयां| इस तरह ऐसे विद्रोही बौद्धिक ‘प्रतिक्रिया’ के बंधक बने रहते हैं, जनता मग्न रहती है, और व्यवस्था या तंत्र के संचालक सफल रहते हैं|

ऐसे दमित (Depressed/ Oppressed) लोगों को ही विद्रोह करना होता है| ऐसे दमित होने का आधार लैंगिक (Gender, not Sex) हो सकता है, रंग (श्वेत, अश्वेत) हो सकता है, वर्ग हो सकता है, जाति हो सकता है, भाषा हो सकता है, आस्था (पंथ/ सम्प्रदाय) हो सकता है या क्षेत्र हो सकता है| ऐसे दमित लोगों को अग्रगामी और पश्चगामी दोनों शक्तियों से प्रतिबंधित कर बाँध दिया जाता है| एक तो उस पर हीनता का प्रतिबन्ध लगा दिया जाता है, जिसे मैं अग्रगामी प्रतिबन्ध कहता हूँ| दूसरा प्रतिबन्ध उसके विद्रोह के स्तर एवं तल पर लगाया या उलझाया जाता है, जिसे मैं पश्चगामी प्रतिबन्ध (आगे और पीछे से प्रतिबंध) कहता हूँ| इसमें विद्रोह के मानक को ही निम्न स्तर एवं तल पर लाकर वह अपनी इस हीनता को स्वीकार कर लेता है| वह अपनी सोच, कार्य, अभिवृति, व्यवहार, ज्ञान का कोई उच्च स्तरीय मानदंड तय नहीं करता है, और उसी हीनता के छोटे चम्मच में डुबकियां लगता रहता है और तैरता रहता है| उसकी दुनिया वही चम्मच हो जाती है| तब विद्रोह का स्तर एवं तल ही उसके जीवन का सार बन जाता है| महिलायें विशेष प्रकार से सजधज कर अपना विद्रोह दर्ज करती है, रंग के आधार पर दमित लोग क्लबों में घुसकर विद्रोह प्रदर्शित करते हैं, जाति के प्रति विद्रोह करने वाले जातीय संगठन बना कर और सतही व मामूली कर्मकांडों का तथाकथित विद्वतापूर्ण विश्लेषण कर विद्रोह प्रदर्शित करते हैं|ऐसे लोगों में हीनता का भाव भरा हुआ होता है, अर्थात उनमें आत्मविश्वास की भारी कमी दिखती होती है| ‘वे कुछ भी करने में समर्थ हैं’, ऐसा सोच ही नहीं ला पाते हैं। ‘हीनता’ का माला जपना ही इनका विद्रोह है|

क्या स्वतन्त्रता या मुक्ति का अर्थ सिर्फ इन प्रतिबंधों से ऊपर उठना ही है, या कुछ और भी उच्च स्तरीय मानक एवं अर्थ भी है? इन्होने अपनी 'सोचने विचारने और समझने की जड़ता' को ही ‘हीनता की जड़ता’ (Inertia) में बदल दिया है| इन्होने अपनी ‘सामाजिक एवं सांस्कृतिक जड़ता’ को ही ‘हीनता की जड़ता’ में बदल दिया है| आजकल विद्रोह के स्वर बहुत मुखर हो गया है, लेकिन उस विद्रोह का स्तर (Level) या तल (Floor) भी हीनता के विरुद्ध होने के कारण निम्न स्तर का हो गया है, और इसीलिए इस विद्रोह का परिणाम ‘मृग मरीचिका’ (Mirage) बन गयी है| सभी को लगता है कि हमारे विद्रोह की दिशा और दशा सही है| बिस्मार्क ने अपने लोगों में ‘उत्कृष्टता’ का ‘आत्म’ भाव भर कर उस जर्मनी का निर्माण कर दिया, जिस शक्ति पर सवार होकर हिटलर ने विश्व को ही रौंद दिया| और भारत के लोग अपने ही लोगों में हीनता की भावना भरने को बेचैन हैं, पता नहीं यह मूर्खतावश है, या धूर्तता वश या अज्ञानता वश है| इसका सम्यक मूल्याङ्कन तो आपको करना है| इसीलिए आज भी भारत बिहार से कम आबादी वाले जापान या छह करोड़ की आबादी वाले जर्मनी, ब्रिटेन, फ़्रांस को पछाड़ने के प्रयास में लगा हुआ है, चीन और अमेरिका को पछाड़ना तो बहुत दूर की बात है|

लेकिन आत्मविद्रोह’ यानि अपने 'स्वयं' (Self) के विरुद्ध विद्रोह सबसे बड़ा और प्रभाशाली विद्रोह है, जो सब कुछ बदल देता है| बुद्धि के प्रबल ज्ञाता ‘बुद्ध’ ने इसका आविष्कार किया, जिसे आधुनिक युग में श्री सत्यनारायण गोयनका ने प्रसारित प्रचारित करवाया|अपने 'स्वयं का अवलोकन' (देखना) करना इस विद्रोह की शुरुआत है, इसे ही “विपस्सना” कहा गया है| तब आप अपने 'स्वयं' को अर्थात अपने 'चेतनता' को, यानि अपने 'मन' को समझने लगते हैं, उसका विश्लेषण, मूल्यांकन और संबंधित कई प्रश्नों के उत्तर के साथ निष्कर्ष निकालने लगते हैं, तो आप अपने मन को नियंत्रित एवं नियमित करने लगते हैं| तब आपको इस धरती पर अपने आने का प्रयोजन समझ में आने लगता है| तब कोई अपने जीवन मूल्यों को और जीवन के प्रयोजन को जानने समझने लगता है| तब उसमे कुछ नया करने का जज्बा और जुनून पैदा होता है| आजतक कोई भी अपने जज्बा और जुनून पैदा किए बिना सफल नहीं हुआ है। तब वह अपने ‘आत्म’ को ‘अधि’ (ऊपर) यानि अनन्त प्रज्ञा (Infinite Intelligence) से जोड़ पाता है| तब वह किसी समस्या के अज्ञात पक्ष को जानने समझने लगता है, उसका अन्तर्ज्ञान (Intuition) विकसित हो जाता है और उसे कई आभास भी आने लगता है। वह अपना स्तर एवं तल को समस्या के स्तर एवं तल से ऊपर उठा कर समस्या का समाधान खोज लेता है| ऐसे ही आध्यात्मिक व्यक्तियों में प्राचीन काल में ‘बुद्ध’ हुए, आधुनिक काल में अल्बर्ट आइन्स्टीन हुए, और इस शताब्दी में स्टीफन हाकिन्स हुए, जिन्होंने समस्या के स्तर एवं तल से बहुत ऊपर उठ कर कई समस्याओं का समाधान पाया| एक जुनूनी व्यक्ति ही समस्याओं के स्तर एवं तल से ऊपर उठकर अनन्त प्रज्ञा के अन्तर्ज्ञान के साथ कुछ सृजन और सकारात्मक कार्य एवं विचार के साथ समस्याओं का समाधान पा सकता है।

कृपया आप स्थिर होकर देखें कि आपके विद्रोह का स्तर एवं तल क्या है?

आचार्य निरंजन सिन्हा

 

मंगलवार, 29 अगस्त 2023

सामाजिक सांस्कृतिक परिवर्तन कैसे करें?

(Process of Socio Cultural Change)

यह तय है कि किसी भी समाज में तीव्र बदलाव 'सामाजिक सांस्कृतिक परिवर्तन से ही होता है, और उसका एक निश्चित एवं वैज्ञानिक विज्ञान’ होता है। इसे "चेतना के उन्नयन" का विज्ञान कह सकते हैं। इसे आप 'सामाजिक सांस्कृतिक रूपान्तरण का मनोविज्ञान’ (Psychology of Socio Cultural Transformation) भी कह सकते हैं। किसी वस्तु का, यानि किसी निर्जीव अस्तित्व का चेतना नहीं होता है, क्योंकि उसमें मन (Mind) नहीं होता और इसलिए उसकी संस्कृति भी नहीं होगी और उस चेतना से संबंधित विज्ञान भी नहीं होगा| यह ‘परिवर्तन का मनोविज्ञान’ अवश्य ही किसी सामाजिक सांस्कृतिक चेतनशील प्राणी का ही हो सकता है| पशु जगत के अन्य जीव भी चेतनशील होते हैं, लेकिन वे ‘सामाजिक सांस्कृतिक’ प्राणी नहीं होते हैं, अर्थात उच्चतर चेतना नहीं होता है।

यहाँ हमें समुदाय (Community) और समाज (Society) में अंतर समझना होगा| ‘समाज’ ‘सामाजिक संबंधों’ का जाल (Network/ Web) है, जो सिर्फ मानवों में ही होता है, जबकि 'समुदाय' एक ‘सामुदायिक भावना’ पर आधारित एक ‘समूह’ (Group) होता है| संस्कृति उसी समाज में होती है, जहां परम्पराओं का सजग, सतर्क एवं सक्रिय निरंतरता बनाए हुए रखी जाती है। एक ‘समुदाय’ सामान्य जीवन के सञ्चालन के लिए होता है, जबकि एक ‘समाज’ इससे बहुत अधिक व्यापक होता है| एक ‘समुदाय’ में ‘सहयोग’ (Co-operation) अवश्य होता है, लेकिन एक ‘समाज’ में इसके अतिरिक्त और बहुत कुछ होता है| एक ‘समुदाय’ सीमित उद्देश्य पर आधारित होता है, जबकि एक ‘समाज’ एक व्यापक उद्देश्य की पूर्ति करता है| इसी कारण मानव पशुवत ‘होमो सेपियंस’ (Homo Sapiens) से ‘होमो सोसिअस’ (Homo Socius)  और ‘होमो फेबर’ (Homo Faber) भी बन सका|

तो हम एक ऐसे जीव और उसके समूह के सामाजिक सांस्कृतिक परिवर्तन की बात कर रहे हैं, जिसका एक निश्चित ‘सामाजिक एवं सांस्कृतिक’ स्वरुप और संरचना होता है| यह जीव एक ‘पशुवत मानव’ (Homo Sapiens) है, जो एक ‘सामाजिक’ मानव (Homo Socius) भी है, एक ‘निर्माता’ मानव (Homo Faber) भी है, और इसीलिए यह सामाजिक सांस्कृतिक प्राणी है| इस मानव का ‘समुदाय’ भी होता है, ‘समाज’ भी होता है, और संस्कृति भी होता है| इसीलिए एक ही व्यक्ति एक ही ‘समाज’ में एक ही साथ किसी का पुत्र/ पुत्री हो सकता है, और उसी के साथ वह किसी पिता/ माता, दामाद/ बहु, पोता/ पोती, भतीजा/ भतीजी, मामा/ मामी इत्यादि इत्यादि कई अनगिनत संबंधों का पद धारित किये हुए हो सकता है| इसीलिए एक व्यक्ति पुरे गाँव या क्षेत्र का दामाद/ बहु मान लिया जाता है| स्पष्ट है कि एक व्यक्ति ‘समाज’ में एक ही साथ कई भूमिकाओं में कई उत्तरदायित्वों के साथ बंधा हुआ होता है, या जकड़ा हुआ होता है| यही सामाजिक सम्बन्धों का जाल है, जो सिर्फ मानवों में होता है, पशुओं या पशुवत समुदायों में ऐसा नहीं होता है| और इसी कारण मानव का ‘सामाजिक सांस्कृतिक परिवर्तन का मनोविज्ञान’ होता है, जिसे समझे बिना समाज में और संस्कृति में ‘परिवर्तन’ चाहना हवा हवाई है|इसे आप चेतना का उन्नयन कह सकते हैं। 

जब कोई भी स्थिर होकर सामाजिक सांस्कृतिक सम्बन्धों के जाल में अपनी भूमिका, कर्तव्य एवं उत्तरदायित्व का मूल्यांकन करता है, तो उसे ‘सामाजिक सम्बन्धों’ के जाल में सामाजिक स्थिति में अपनी ‘सांस्कृतिक जड़ता’ (Cultural Inertia) एवं ‘सामाजिक जड़ता’ (Social Inertia) का अहसास होता है| जैसे वस्तुओं की जड़ता (Inertia of Objects) को समाप्त करने के लिए अतिरिक्त ‘ऊर्जा’ (प्रयास) की जरुरत होती है, उसी तरह इन जड़ताओं को मिटाने के लिए भी अतिरिक्त ‘ऊर्जा’ (प्रयास) के साथ साथ ‘सजगता’ (Carefulness), ‘सतर्कता’ (Vigilance), सक्रियता एवं ‘मनोवैज्ञानिक समझ’ की अनिवार्यता होती है| इसीलिए मैं अक्सर कहता हूँ कि किसी भी नीति निर्धारण में, चाहे बदलाव का हो, या विकास का हो, आपको ‘इतिहास’ (History), ‘मनोविज्ञान’ (Psychology) एवं ‘दर्शन’ (Philosophy) की गहरी समझ होनी ही चाहिए|

इस तरह समाज में एक व्यक्ति एक पद के साथ कुछ अधिकार पाता है और उसके साथ कुछ अनिवार्य  उत्तरदायित्व का भी निर्वहन करता है, या करना होता है| इसीलिए ‘सामाजिक सांस्कृतिक परिवर्तन’ की मुहिम चलाने वाले अधिकतर ‘क्रान्तिकारी’ नेतृत्व यानि नेतागण इस समझ के अभाव में कुछ नहीं कर पाते हैं, यानि ‘हवाई’ ही रह जाते हैं, और अपने ‘लक्षित समाज’ (Target Society) पर मूढ़ता (Foolishness) और जड़ता (Inertia/ Inertness) का आरोप लगाकर ‘आत्ममुग्धता’ में सराबोर रहते हैं| वे ‘सामाजिक एवं सांस्कृतिक गतिशीलता’ (Socio Cultural Dynamism) और ‘सामाजिक एवं सांस्कृतिक गतिहीनता’ (Socio Cultural Immobility) की संरचना और ‘सांस्कृतिक' संरचना एवं ढांचा की अनिवार्य क्रियाविधि (Mechanism) और संरचनात्मक (Structural) एवं ढाँचागत (Framework) समझ की ओर ध्यान ही नहीं देते, या उनको इसे समझने का स्तर ही नहीं होता| यहीं सामाजिक सांस्कृतिक परिवर्तन ही चेतना का मनोविज्ञान’ है, जिसे समझना है| एक व्यक्ति का मनोविज्ञान कई दशाओं एवं अवस्थाओं के साथ ही उसका वर्तमान समाज और उसकी संस्कृति भी निर्धारित करता है, या नियंत्रित करता है, या हस्तक्षेप करता है, या नियमित करता है|

अब इतनी लम्बी भूमिका, जो इस ‘सामाजिक सांस्कृतिक परिवर्तन के मनोविज्ञान’ की अवधारणा को समझने के लिए आवश्यक भी था, को समझने के बाद इस ‘परिवर्तन के मनोविज्ञान’ को बड़ी स्थिरता से समझा जाय| कोई भी व्यक्ति किसी भी सामाजिक और सांस्कृतिक निर्णय में, चाहे वह व्यवहार हो, या विचार हो, या भावना से सम्बन्धित हो, अपने ‘दिल’ (Mind/ मन) और ‘दिमाग’ (Brain) दोनों का उपयोग करता है| ‘दिल’ से तात्पर्य ‘भावनात्मक’ (Emotional) अनुक्रियाओं एवं प्रतिक्रियाओं से है, और ‘दिमाग’ से तात्पर्य उसके ज्ञान (Wisdom) एवं तर्कशीलता (Logic) से है| ‘विवेकशीलता’ (Rationality) का उपयोग या प्रयोग ‘दिल’ एवं ‘दिमाग’ दोनों से होता है, यानि उसके सम्पूर्ण व्यक्तित्व पर निर्भर करता है| यह भी एक स्थापित सत्य है कि ‘दिमाग’ हमेशा ‘दिल’ से हार जाता है, यानि ‘भावना’ सदैव ‘बुद्धि’ यानि ‘ज्ञान’ एवं विवेक पर जीत हासिल करता है|

जिस समाज के बहुसंख्यक में ‘आलोचनात्मक चिंतन’ (Critical Thinking) की समझ, स्तर एवं क्षमता ही नहीं होती, उस बहुसंख्यक को कोई भी चतुर उड़ा ले जाता है, या बहा ले जाता है| लेकिन उस बहुसंख्यक को इस उड़ने की गतिशीलता में भी अपनी बौद्धिक समझदारी की गतिकी (Dynamics) का ही अहसास होता है| ‘आलोचनात्मक चिंतन’ में अनिवार्य रूप से विश्लेषण करना, मूल्यांकन करना, शंका करना, और उसका सामान्य निष्कर्ष निकलना शामिल होता है|

इसमें दूसरों के व्यक्तिगत मनोविज्ञान को समझकर उसकी कमजोरियों, डरों एवं लोभों से फायदा उठाना होता है| उसके सामाजिक एवं सांस्कृतिक जड़ता या विरोध को मुलायम (Soft) करने के लिए उसकी भावनाओं पर काम करना होता है| उनकी प्रिय चीजों को बने रहने का या उसकी आपूर्ति का आश्वासन दिया जाता है, और जिनसे वे डरते हैं, या जिनके खो जाने यानि नष्ट हो जाने से सशंकित हैं, उनकी निश्चितता की गारन्टी दिया जाता है| अगर कोई दूसरों (लक्ष्य) की भावनाओं की उपेक्षा करता है, तो ऐसे नेतृत्व नकार दिए जाएंगे, और उनसे वे बहुसंख्यक उस नेतृत्व यानि बदलाव के कर्ता से नफरत करने लगेंगे| इसीलिए राज्य को व्यक्ति के मन में यानि दिल में शासन करना होता है, उसके ‘समूह’ या ‘समुदाय’ या ‘समाज’ पर तो ऐसे ही सामाजिक और सांस्कृतिक नियंत्रण हो जाता है| यही  सामाजिक सांस्कृतिक परिवर्तन का मनोविज्ञान है|

यदि कोई सामाजिक या सांस्कृतिक बदलाव करने वाला उपरोक्त मनोभावों का ध्यान नहीं रखता है, तो वैसे बहुसंख्यक (लक्षित वर्ग) आपको उनका ‘समय बर्बाद’ करने वाला मानते हैं ,और आपको ‘शत्रु’ मान लेते हैं एवं आपसे घृणा भी करते हैं| उनके दिल का दरवाजा खोलना ही पड़ेगा| पहले आपको उनका प्यारा बनना होगा| आप भी जानते हैं कि एक ‘सेल्समैन’ के ‘वस्तु’ के बिकने से पहले ‘सेल्समैन’ को ही बिकना होता है, यानि ग्राहक का प्रियपात्र बनना होता है| हमें हर सामने वाले को ‘महत्वपूर्ण’ एवं ‘सम्मानित’ महसूस कराना होता है| उनको समझने के मनोविज्ञान में इसका ध्यान रखा जाता है कि उनकी भावनाओं को, उनके संस्कृति को, उनके ज्ञान को नजरअंदाज नहीं किया गया है| उनके ‘प्रेम’, ‘नफरत’ एवं ‘ईर्ष्या’ के भाव को जगा देने से यानि उनकी भावनात्मक प्रतिक्रिया तीव्र कर देने उनका ‘आत्म नियंत्रण’ कमजोर हो जाता है| इसे ‘दिल’ को झकझोरना भी कह सकते हैं| इससे उनकी बौद्धिक तर्कशीलता, यदि कुछ है तो भी वह, उड़ जाती है और आसानी से नियंत्रित हो जाते हैं|

हर व्यक्ति ‘बदलाव’ की जरुरत समझता है, लेकिन वह आदतों एवं परम्पराओं में जकड़ा हुआ होता है| इसीलिए बहुत ज्यादा सामाजिक सांस्कृतिक बदलाव उन्हें आदतन अटपटा लगता है, और इसीलिए ज्यादा बदलाव का विरोध किया जाता है, यानि स्वीकार नहीं किया जाता है| हमें परम्परा के प्रति सम्मान दिखाते हुए मामूली सतही बदलाव दिखाना चाहिए, भले यह एक क्रान्तिकारी बदलाव की आधारशिला साबित हो| यानि क्रान्तिकारी सामाजिक सांस्कृतिक बदलाव को भी मामूली और सतही बदलाव दिखना चाहिए, ताकि परम्परा स्थिर और अपरिवर्तनीय दिखे| ‘बुद्ध’ को कल्याणकारी ‘शीव’ यानि ‘शिव; में बदलने की गत्यात्मकता (Dynamism) को सावधानी से समझा जा सकता है|

यह सामान्य मनोविज्ञान है कि लोग समाज के और संस्कृति के कुछ परम्परागत ‘संस्थाओं’ में और ‘व्यक्तियों’ में नवीनीकरण चाहते हैं, लेकिन इसके साथ जुड़े वैसे परिणामों से वे चिढ जाते हैं, जो उनकी परम्परागत व्यक्तिगत आदतों को बदलती है या बदलने का प्रयास करती है| वे जानते हैं और मानते भी हैं कि नवीनता बौद्धिक रूप से सही है, वैज्ञानिक है और समुचित भी है, लेकिन मन की गहराइयों में वे सांस्कृतिक जड़ता से जड़े हुए होते हैं| चूँकि बदलाव एक शून्यता यानि खालीपन पैदा कर देता है, और इसीलिए बड़ा बदलाव आदमी को परेशान और विचलित कर देता है| इसीलिए वे समाज में और संस्कृति में सतही परिवर्तन चाहते हैं, और मूलभूत आदतों को बदलना नहीं चाहते हैं| इसके लिए पुराने जीवन मूल्यों एवं परम्पराओं को उनके स्थान पर नए जीवन मूल्यों एवं परम्पराओं से प्रतिस्थापित करना होता है, ताकि बदलाव की शून्यता नहीं रहे| इससे परिवर्तन से सशंकित लोगों की चिंताएँ शान्त यानि क्षान्त रहेगी| इस मनोविज्ञान को समझ कर और ध्यान में रख ही पहले भी इतिहास में सांस्कृतिक बदलाव किया गया है, और आगे भी बदला जायगा|इसी से सामाजिक और राजनीतिक बदलाव भी हो जाता है। यह सब बाजार की शक्तियां करती है, जिसे इतिहास में ऐतिहासिक शक्तियां कही जाती है।

इस सामाजिक और सांस्कृतिक परिवर्तन के मनोविज्ञान में बदलाव में पुराने पदनाम, स्वरुप, दिखावा, प्रक्रिया, संख्या, सामग्री के नाम, स्वरुप एवं संख्या को स्थिर रखा जाता है| इससे सामान्य जन अपने को सांस्कृतिक परम्पराओं से जुड़े रहने का अहसास कम नहीं होता है, और इसे इतिहास यानि सांस्कृतिक जड़ता का समर्थन मिलता रहता है| अर्थात उसका बाह्य ढांचा स्थिर रखते हुए उसकी आंतरिक संरचना बदली जाती है। इसीलिए इन तरीको के साथ हुए बदलाव का विरोध नहीं होता है| सामाजिक सांस्कृतिक परिवर्तनों को गुप्त रखने यानि छिपाने का एक तरीका यह है कि अतीत के सांस्कृतिक जीवन मूल्यों का जबरदस्त और सार्वजानिक समर्थन किया जाता है| ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक परम्परा का भक्त दिखना आपके क्रान्तिकारी बदलाव के विचारों को आच्छादित कर छुपा देता है| पुराने स्वरुप के आवरण से पुरानी संस्कृति की उष्णता बनी रहती है, और लोगों की शंकाओं एवं बेचैनी को मुलायम, कम या समाप्त करती है| लोगो की निहित रुढिवादिता को उनकी गौरवशाली सांस्कृतिक परम्परा मान कर उसके प्रति अटूट निष्ठा दिखाना पड़ता है| इसे ही युग बोध का ध्यान रखना समझा जाता है| लोगों को ‘अतीत’, ‘सुख’ और ‘परम्परा’ को उपलब्ध करने या वापस दिलाने का आश्वासन बहुत अच्छा लगता है|

इस सामाजिक सांस्कृतिक परिवर्तन या रुपांतरण में एक बात का और ध्यान रखना होता है कि जिन्हें सामाजिक सांस्कृतिक बदलाव से लाभ नहीं होता है, या बदलाव से हानि होता है, वे बदलाव नहीं होने देना चाहते हैं| अत: संस्थाओं में मात्रात्मक स्थिरता (बाह्य दिखावटी स्वरुप) बनाए रखते हुए ही गुणात्मक (मौलिक) बदलाव किये जाते हैं| इस परिवर्तन के मनोविज्ञान को ही समझ कर कोई सामाजिक सांस्कृतिक बदलाव कर सकता है|

सामाजिक सांस्कृतिक बदलाव सिर्फ चेतना के उन्नयन का मामला है। 

आचार्य प्रवर निरंजन जी, 

अध्यक्ष,,भारतीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान। 

(मेरे अन्य आलेख, जो विविध विषयों पर है, को आप niranjan2020.blogspot.com पर देख सकते हैं)

गुरुवार, 24 अगस्त 2023

एक पत्र पत्नी के नाम

बात उन दिनों (वर्ष 2005) की है, जब मेरी पदस्थापना कोषागार पदाधिकारी के रूप में प्रसिद्ध साहित्यकार फणीश्वर नाथ रेणु के शहर फारबिसगंज में हुई थी| फारबिसगंज भारत नेपाल सीमा पर सीमांचल के अररिया जिला का एक व्यावसायिक नगर है| रेणु जी का गाँव ‘औराही हिंगना’ इसी प्रखंड में है| योगदान देने के अगले रविवार को ही मैं औराही हिंगना में था| उनके घर पर काफी समय दिया, उस समय उनके बड़े और मंझले लड़के गाँव पर ही रहते थे| शाम में मैं वापस अपने आवास पर आया और उसी रात मैंने ‘रेणु’ जी के प्रेरणा से अपने जीवन का पहला आलेख “मैं क्या लिखूँ” लिखा| और इस तरह मेरे लिखने की शुरुआत हुई|

उन दिनों फारबिसगंज में मोबाइल सेवा बंद रहता था| मेरी पत्नी बच्चे के साथ पटना में रहती थी| एक रात मेरी नींद टूट गई| मैंने एक कार्ड बोर्ड पर पत्नी के नाम एक पत्र लिखा| इस पत्र को मेरे कम्पूटर आपरेटर मृत्युंजय ने लिख कर प्रिंट निकाल दिया| उसी समय एक सांस्कृतिक साहित्यिक पत्रिका – “परती पलार” के सम्पादक मेरे पास आए हुए थे, जिन्होंने इसे देखा| और इसकी एक प्रति ले ली और इसे अपनी पत्रिका में प्रकाशित भी कर दिया| ‘परती पलार’ का नाम रेणु जी की ऐतिहासिक कृति ‘परती परिकथा’ से लिया गया था| मेरे इस प्रकाशित पत्र की काफी प्रशंसा हुई|

पुन: आपके अवलोकनार्थ इस पत्र को प्रस्तुत कर रहा हूँ| शायद यह सबके लिए पठनीय है|

एक पत्र पत्नी के नाम

मेरी प्यारी रानी, नीलम,

     मैं समझता हूँ, मैं स्वीकारता हूँ कि मैं दुनिया का शायद सबसे सौभाग्यशाली व्यक्ति हूँ, जिसे तुम जैसी पत्नी मिली है|

    तुम प्यारी हो, सुन्दर हो - मन से, शरीर से, भावनाओं की अभिव्यक्ति में, व्यवहार में|

     तुम बेहतरीन सहयोगी हो| तुम दयालु हो, तुम्हारा मानव के प्रति जो प्रेम है, उस सन्दर्भ में भी महान हो| तुम उदार हो, समझदार हो, तार्किक हो| और मैं ऐसा सौभाग्यशाली हूँ कि तुम मेरी पत्नी हो|

     मैं तुम्हारी वित्तीय समझदारी एवं प्रबन्धकीय दुनियादारी का दिवाना हूँ| मैं ही नहीं, समाज के अनेक लोग, जो इस क्षेत्र के हस्ती हैं और तुम्हे जानते हैं; का भी ऐसा ही मानना है|

     तुम मेरे लिए मुस्कुराती हो| तुम्हारा मुस्कुराना, तुम्हारी हँसी, तुम्हारा खुशनुमा चेहरा मुझे बहुत अच्छा लगता है; चाहे उसकी कीमत कुछ भी हो, चाहे समाज के स्थापित नियमावली से ही विचलित क्यों न होना पड़े| तुम जानती हो कि तुम्हारे मुस्कुराते रहने से मेरे भाग्य का विस्तार होता है| तुम्हारी मुस्कराहट से ही तो मुझे सुख, शांति और संतुष्टि मिलती है| तुम्हारी मुस्कुराहट के लिए मैं तुम्हे वह सब कुछ उपलब्ध कराने के लिए सदैव तत्पर हूँ, जो तुम्हारी मुस्कराहट के लिए जरुरी है| समय के अनुकूल चलना एवं दूर- दृष्टि रखना बेहतरीन नियम है| अर्धांगिनी की मुस्कराहट के बिना शायद ही किसी का सर्वोत्तम विकास होता है|

     मैं यह सोचकर ही बहुत खुश रहता हूँ कि तुम समझती हो, स्वीकार करती हो कि तुम्हारी मुस्कुराहट से ही हमें सुख, शांति, संतुष्टि मिलती है और इसे दिलाने के लिए तुम तत्पर रहती हो| ऐसी भावनाएं दुनिया में अनेक पत्नियाँ अपने पति के लिए रखती हैं, परन्तु व्यवहारिक परिणाम विपरीत होते हैं| चूँकि उनमे तार्किकता नहीं होती, इस स्तर का विचार नहीं होता, इस स्तर का व्यवहार नहीं होता, व्यवहार में लचीलापन नहीं होता, इसीलिए उनमे इच्छा के बावजूद स्थितियाँ विपरीत और भयावह होती है| इस सन्दर्भ में भी मैं धन्य हूँ कि तुम जैसी विचारवान, तार्किकता से परिपूर्ण, दयालुता के सागर सम, सहनशील, उदार, शिष्ट पत्नी मिली|

     तुमने बड़ी सहजता के साथ अपने को बेहतरीन बनाया है, परन्तु तुम्हारी मौलिकता के लिए मैं तुम्हारे (स्व०) पिता के साथ ही, तुम्हारी माता का और अपने (सम्पूर्ण) परिवार का भी आजन्म आभारी हूँ, कि तुम्हें ढालने में पूरा सहयोग दिया है|

     दुनिया में तुम्हारी जैसी ही पत्नी की संख्या करोडो- अरबों में हो .,,.. यही मेरी कामना है|

     पुन: तुमको पाकर मैं धन्य हूँ|

       तुम्हारा जीवनसाथी

            निरंजन 

सोमवार, 21 अगस्त 2023

आधुनिक इतिहास लेखन कैसा हो ?

यदि आप इतिहास लिखने चले हैं, या कोई इतिहास लिखने वाले हैं, या पढ़ने वाले हैं, तो आपको सबसे पहले यह जानना समझना होगा कि इतिहास क्या है? इतिहास क्यों आवश्यक होता है? इतिहास लेखन कैसे किया जाय? आधुनिक यानि वैज्ञानिक इतिहास लेखन क्या है? चाहे आप इतिहास किसी व्यक्ति का, किसी वर्ग का, किसी जाति का, किसी संस्कृति का, किसी राष्ट्र का, किसी अर्थव्यवस्था का, या किसी विज्ञान इत्यादि का लिख रहे हैं, आपको उपरोक्त बिन्दुओ एवं अवधारणाओं को अच्छी तरह से जानना और समझना चाहिए|

वर्तमान एवं भविष्य की नींव इतिहास में है, इसलिए इतिहास पढ़ें, इतिहास जानें, इतिहास समझें, और इतिहास को सुधारें, ताकि आप का, समाज का, राष्ट्र का एवं मानवता का वर्तमान एवं भविष्य को सँवारा जा सके| लेकिन इतिहास को आधुनिक और वैज्ञानिक होना चाहिए| आइए, इतिहास को आधुनिक, वैज्ञानिक और पुरातात्विक दृष्टिकोण से समझें|

यहाँ महान लेखक जार्ज ऑरवेल को एक बार याद कर लें| उन्होंने कहा था - “जो इतिहास पर नियंत्रण रखता है, वह वर्तमान और भविष्य पर भी नियंत्रण रखता है|”                                                              

इतिहास क्या है? (What is History?)

‘इतिहास मानव समाज का सामाजिक सांस्कृतिक रूपान्तरण का क्रमानुसार व्यवस्थित ब्यौरा है, जो तथ्यों, तर्कों एवं साक्ष्यों पर आधारित होता है’| यानि किसी भी काल एवं किसी भी क्षेत्र में मानव का सामाजिक एवं सांस्कृतिक रूपांतरण का कालबद्ध एवं क्रमबद्ध ब्यौरा ही ‘इतिहास’ है| इसे दुसरे शब्दों में कहा जा सकता है, कि “इतिहास मानव का सामाजिक सांस्कृतिक रूपांतरण का क्रमानुसार विश्लेष्णात्मक मूल्याङ्कन का विवरण है”|  अर्थात इसमें मानव समाज का सामाजिक रूपांतरण भी शामिल है, और सांस्कृतिक रूपांतरण भी शामिल है| लेकिन इस रूपांतरण का विवरण या ब्यौरा विश्लेष्णात्मक (Analytical) भी होना चाहिए, और प्रकृति एवं मानवता के सापेक्ष यानि भविष्य के सापेक्ष इसका मूल्याङ्कन (Evaluation) भी होना चाहिए| इस पक्ष को शामिल किए बिना कभी भी एक सम्यक इतिहास रचा नहीं जा सकता है|

इस रूपांतरण को तत्कालीन ‘बाजार की शक्तियां’ (Market Forces) निर्धारित करती है, जो इतिहास के सन्दर्भ में ‘ऐतिहासिक शक्तियां’ (Historical Forces) कहलाती है| इसे ही वर्तमान में तत्कालीन यानि तात्कालिक शक्तियाँ भी कहते हैं| इन बाजार की शक्तियों यानि ऐतिहासिक शक्तियों में उत्पादन (Production), वितरण (Distribution), विनिमय (Exchange) एवं उपभोग (Consumption) के साधनों एवं शक्तियों एवं उनके अंतर्संबंधों की ही भूमिका प्रमुख है| इसी के कारण मानवीय संस्था, मूल्य, विचार, प्रतिमान, दृष्टिकोण, संस्कार, संस्कृति एवं इससे सम्बन्धित भौतिक स्वरुप भी बदल जाते हैं| मानवीय (मानव निर्मित) संस्था में विवाह, परिवार, समुदाय, राज्य, राष्ट्र, मुद्रा, बाजार, व्यापार, आस्था, आदि में परिवर्तन होता है, जिसे इतिहास के रूप में याद किया जाता है| समाज में इन ‘संस्थाओं के द्वारा किए गए क्रिया कलापों एवं उनके अंतर्संबंधों की शक्तियों एवं प्रभावों के कारण समाज में हुए परिवर्तन का क्रमबद्ध ब्यौरा ही इतिहास है’|

इस तरह, “मानव एवं उसके द्वारा निर्मित संस्थाओं (Institutions) के द्वारा प्रकृति में हस्तक्षेप से हुए सामाजिक सांस्कृतिक रूपांतरण (Social Cultural Transformation) के क्रमबद्ध ब्यौरा (Chronological Details) को ही इतिहास” कहा जाता है| ये सब संस्था मिलकर इतिहास को प्रभावित करते हैं, और स्वयं भी इनसे प्रभावित होते हैं| इस तरह इतिहास में मानव समाज के समुदाय’, ‘समूह’, ‘परिवार’, ‘संगठन’, ‘संघ’, ‘वर्ग’, ‘जाति’ आदि के मूल्य, विचार, प्रतिमान, दृष्टिकोण, संस्कार, संस्कृति में परिवर्तन होता है, और इससे विवाह, परिवार, समुदाय, राज्य, राष्ट्र, मुद्रा, बाजार, व्यापार, आस्था, आदि में रूपांतरण भी होता है| इन्ही सब का विस्तृत एवं व्यवस्थित क्रमबद्ध विवरण ही इतिहास होता है| जब परिवर्तन अपेक्षाकृत स्थायी होता है, तो वह रूपांतरण कहलाता है|

दुसरे शब्दों में, ‘विचारों’ (Thoughts) एवं ‘चेतनाओं’ (Consciousnesses) के ‘उद्विकास’ (Evolution) की व्याख्या ही ‘इतिहास’ है| पुरे इतिहास में मानवीय विचारों एवं चेतनाओं का ही क्रमिक विकास का व्यवस्थित विवरण है, जो विचारों एवं चेतनाओं का ही प्रातिफल है| मानव की सभी गतिविधियाँ विचार एवं चेतना की अवधारणाओं की सीमाओं में समाहित हो जाती है, और इस तरह यह इतिहास को समेकित रूप में व्याख्यापित कर लेता है|

इतिहास में व्यक्तियों, शासकों, राज्यों आदि के नाम, तथ्य (Facts), तिथियाँ, और विवरण तो इतिहास के उदाहरण होते हैं, स्वयं इतिहास नहीं होता है| कोई विशेष राजा, उसका राज्य, उसकी शासन प्रणाली, युद्ध, तिथियाँ इत्यादि इतिहास के तथ्य हैं, इतिहास के उदाहरण मात्र हैं| ये तथ्य किसी बदलाव का, बदलाव की प्रक्रिया का एवं बदलाव के परिणाम का उदाहरण होता हैं| इसीलिए इतिहास के व्यक्तियों के नाम एवं घटनाओं के ब्यौरे तथा तिथियों की बारीकियां इतिहास में महत्वपूर्ण नहीं होती है| इसे स्थिरता से एवं गंभीरता से समझा जाय| इसी कारण इतिहास की आधुनिक पुस्तकों में सामाजिक सांस्कृतिक रूपांतरण, उसके कारक शक्तियां, उनके क्रिया कलाप एवं प्रभाव तथा परिणाम का अध्याय होता है, शासकों के नाम का अध्याय नहीं होता है|

किसी का ‘इतिहास का बोध’ (Perception of History) ही उसकी संस्कृति के स्वरुप को निर्धारित करता है, यानि कोई अपने इतिहास को कैसे अपनाता है, यानि अपने इतिहास को कैसे समझता और स्वीकार करता है, और यही ‘समझ’ उसके संस्कृति के स्वरुप को निर्धारित करता है| इसके लिए इतिहास की प्रस्तुतिकरण भी महत्वपूर्ण है| यही संस्कृति 'मानसिक प्रक्रियाओं, अनुभवों, एवं व्यवहारों' यानि “सोचने एवं क्रियान्वयन के सॉफ्टवेयर” के रूप में व्यक्ति को, परिवार को,  समाज को, राष्ट्र को, और मानवता को तथा अन्य संस्थाओं को संचालित एवं नियंत्रित करता रहता है| ‘इतिहास का बोध’ संस्कृति के रूप में इन सबों को यानि विचारों, भावनाओं एवं व्यवहारों को चेतनता (Consciousness), अचेतनता (Un Consciousness), अवचेतनता (Sub Consciousness) और अधिचेतनता (Super Consciousness) के स्तर पर संचालित और प्रभावित करता है| इस तरह, ‘इतिहास का बोध’ किसी के वर्तमान की नींव है और भविष्य को स्वरुप देता है| अर्थात इतिहास की समझ ही वर्तमान एवं भविष्य को निर्धारित एवं निश्चित करता है यानि वर्तमान स्वरुप देता है|

प्रो० एडवर्ड हैलेट कार ने ऐक्टन को उद्धृत करते हुए कहा है कि – “हम अपने जीवन में ‘अंतिम इतिहास’ नहीं लिख सकते, लेकिन हम ‘परम्परागत इतिहास’ को रद्द कर सकते हैं|” मतलब कि कोई भी इतिहास अन्तिम रूप में लिखा नहीं जा सकता है, परन्तु इतिहास के वर्तमान स्वरुप में सदैव परिवर्तन किया जा सकता है, या सदैव परिवर्तन किया ही जाना चाहिए| ऐसा इसलिए कि समाज का सन्दर्भ बदलते परिस्थिति एवं आवश्यकता के अनुरूप सदैव बदलता रहता है, यानि समाज की आवश्यकताएं सदैव बदलती रहती है, और इसीलिए इतिहास के वर्तमान स्वरुप को भी सदैव बदलते रहना चाहिए| चूँकि इतिहास भी एक सापेक्षिक विषय है, और इतिहास भी एक जैविक जीव की तरह ही है, इसीलिए एक इतिहास को भी सन्दर्भ एवं परिस्थितियों के अनुरूप बदलती रहनी चाहिए|

'ऐतिहासिक तथ्य' स्वयं 'इतिहास' के लिए कच्चा माल (Raw Material) नहीं होता, बल्कि  'इतिहासकार' के लिए कच्चा माल होता है| इन ऐतिहासिक तथ्यों की व्याख्या एवं निर्धारण उन इतिहासकारों के पूर्वग्रहों एवं मान्यताओं से सुनिश्चित होता है| एक इतिहासकार को अपनी रचना के द्वारा जनता यानि समाज की सोच, विचार, संस्कार, आदर्श, मूल्य, मंतव्य, आशय (Intention), प्रयोजन (Purpose), लक्ष्य (Target), राय (Opinion), अवधारणा और दृष्टिकोण आदि को प्रभावित करना होता है| इसे प्रभावित करने का सबसे असरदार तरीका यह है कि वह इतिहासकार जो प्रभाव उत्पन्न करना चाहता है, उसी उद्देश्य एवं लक्ष्य के ही अनुरूप ही उपलब्ध तथ्यों एवं प्रक्रियाओं का उपस्थापन (Presentation) और व्याख्या (Explanation) करें| ध्यान रहे, तथ्य वही बोलता है, जो वह इतिहासकार उन तथ्यों से बोलवाना चाहता है|

जब तक आप एक इतिहासकार की मंशा (Intention) नहीं समझ लेते हैं, तब तक आप उस इतिहास को नहीं समझ सकते हैं| यह इतिहासकार कौन है और उसकी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि क्या है? किसी तथ्य या प्रस्तुतीकरण अपने आप में तबतक इतिहास नहीं बन जाता है, जब तक कि ये मानव के सामाजिक, संस्कृतिक एवं आर्थिक विकास यानि उन्नयन की गाथा में प्रासंगिक नहीं बन जाता| इतिहास का अर्थ सिर्फ यह नहीं है कि वह तथ्यों की व्याख्या करें, जो उसने समझा है या जो वह बताना या समझाना चाहता है, बल्कि वह समग्र समाज को मानवता एवं प्रकृति के भविष्य का भी ध्यान रखें| एक इतिहासकार अपने युग के साथ अपने मानवीय अस्तित्व के सुनहरे भविष्य की शर्तों पर जुड़ा  होता है| एक इतिहास में विश्लेषण (Analysis) भी होता है, मूल्याङ्कन (Evaluation) भी होता है, सभी संभाव्य प्रश्नों यानि शंकाओं (Inquiry) का समाधान भी होता है, इन सभी का एक सामान्यीकृत एवं सर्वव्यापक (Openness) स्वरुप भी होता है, और उपरोक्त सभी कुछ एक में संयोजित या संगठित (Unite) होता है| किसी इतिहासकार को वर्तमान की सर्वव्यापक आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर उसे अतीत के सन्दर्भ में लिखना होता है|

इतिहास महत्वपूर्ण क्यों? (Why History is Important?)

इतिहास क्यों महत्वपूर्ण है अर्थात इसका अध्ययन क्यों किया जाता है, या क्यों किया जाना चाहिए? इतिहास वह विषय है, जो मानव को और ज्यादा बुद्धिमान बनाता है| और यदि कोई ‘इतिहास लेखन’ मानव को और ज्यादा बुद्धिमान नहीं बनाता है, तो निश्चितया वह ‘लेखन’ इतिहास नहीं है, अपितु एक कथा वर्णन है| अर्थात इतिहास हमें विश्लेषण करना सीखाता है, तर्क करना भी समझाता है, विवेकशीलता भी बढाता है और वैज्ञानिक समझ भी विकसित करता है| किसी भी समाज की वर्तमान सोच, समझ, व्यवहार, मूल्य, प्रतिमान, आदर्श, संस्कार, संस्कृति, एवं गतिविधियों को अच्छी तरह समझने के लिए हमें उसके इतिहास को समझना होता है|

 “विचारों का जड़त्व” यानि ‘सांस्कृतिक जड़ता’ किसी को वही देखने या समझने को बाध्य करता है, जो वह आदतन अभी तक देख या समझ रहा होता है, या वह देखना एवं समझना चाहता है| एक अध्येता का उद्देश्य उसे उसी समय समझ में आता है, जब वह सावधान एवं सजग होता है| यानि इतिहास के अध्ययन में तीक्ष्ण, गहन, गहरा, सूक्ष्म एवं व्यापक विश्लेषण क्षमता के साथ साथ उसमे कार्य कारण सम्बन्ध और उपने सम्यक उद्देश्य की समझ के लिए आवश्यक विवेक भी होनी चाहिए| यह पाया गया है कि बहुत से क्रान्तिकारी व्यक्ति या समूह सामाजिक, या सांस्कृतिक, या आर्थिक, या शैक्षणिक क्रान्ति करना तो चाहते हैं और उसके लिए समर्पित भी हैं, परन्तु इसके लिए उन्हें कैसा इतिहास चाहिए, उसकी समझ ही नहीं है| वे इसके लिए किसी का विरोध करना ही क्रान्ति की कार्य विधि यानि प्रक्रिया का पर्यार्य समझ लेते हैं| ‘इतिहास’ की भूमिका किसी भी व्यक्ति एवं समाज में सृजनात्मक सोच एवं कार्य कैसे पैदा करता है? इस विषय पर कभी स्थिरता एवं गंभीरता से विचार एवं विमर्श किया ही नहीं जाता| जबकि यह सब अनिवार्य है|

कहा जाता है कि ‘कथानक (Narrative) ही जन समुदाय पर शासन करते हैं’| ‘कथानक’ क्या है? किसी भी विषय या सन्दर्भ में एक विश्वास करने योग्य कहानी ही कथानक है| चूँकि एक कथानक को विश्वास करने योग्य होना चाहिए, इसलिए यह विश्वास कथानक बनाने वाले की योग्यता एवं सुनने यानि मानने वाले की योग्यता के स्तर पर निर्भर करता है| यानि एक कथानक निर्माता को चतुर एवं श्रोता को नादा यानि नासमझ होना चाहिए, इससे एक कथानक की विश्वसनीयता अच्छी तरह से स्थापित होती है| एक कथानक एक मिथक के रूप में एक काल्पनिक कहानी हो सकता है, एक कथानक एक इतिहास के रूप में सत्य के निकट हो सकता है, या एक कथानक इतिहास एवं विज्ञान का आवरण ओढ़े एक महज कल्पना हो सकता है| कहने का तात्पर्य यह है कि किसी भी कहानी में 'इतिहास का सुगंध' यानि 'इतिहास का छौंक' ही उस कहानी यानि कथानक को विश्वसनीय बनाता है|

अक्सर एक कथानक इतिहास बन कर समाज को प्रभावित करता रहता है, और इसीलिए एक कथानक को इतिहास के रूप में प्रस्तुत होना होता है| कथानक काल्पनिक हो, या ऐतिहासिक हो, उसे इतिहास के प्रसंग के रूप में ही आना होता है, या उसे इसी रूप में मान लिया जाता है| मतलब एक कथानक को इतिहास के रूप में प्रस्तुत किया जाता है| इतिहास के एक हिस्से या प्रसंग के रूप में प्रस्तुत होने से इसके प्रवाह में अच्छे अच्छे बुद्धिजीवी की ‘तथाकथित’ वैज्ञानिकता, प्रज्ञाशीलता एवं विद्बता बह जाता है| यह कथानक उनको बहा ले जाने या उड़ा ले जाने का बहुत ही आसान तरीका है|

किसी भी समय में किसी व्यक्ति, समाज एवं व्यवस्था की अवस्था उसकी सभ्यता एवं संस्कृति का समेकित (Integrated) परिणाम होता है| किसी भी समाज या व्यवस्था की संस्कृति उस समाज या व्यवस्था की वह मानसिक अवस्था (Mental Status) होती है, जो उसके विचारों (Thoughts), आदर्शों, संस्कारों (Rituals/ Impressions), मूल्यों, प्रतिमानों (Norms) एवं व्यवहारों (Behaviors) के समुच्चय (Set) से निर्मित होती है| और किसी भी संस्कृति की अवस्था या स्तर उस समाज एवं व्यवस्था के बारे में उन समाज के ‘इतिहास के बोध’ (Perception of History) से निर्मित एवं निर्धारित होता है| इस तरह किसी भी समाज एवं व्यवस्था का वर्तमान एवं भविष्य का विकास, समृद्धि, सफलता आदि भी उसके ‘इतिहास बोध’ से निर्मित एवं निर्धारित होता है|

इससे स्पष्ट है कि किसी भी समाज के विकास एवं समृद्धि के स्तर की जड़े उसकी इतिहास की व्याख्या पर निर्भर करती है| अपने वर्तमान संस्कृति में यानि लोगों के वर्तमान सोचने एवं विचारने के प्रतिरूप (Pattern) में अपने दृष्टिकोण के पक्ष में ‘पैरेडाईम शिफ्ट’ (Paradigm Shift) करना पड़ता है| ‘पैरेडाईम शिफ्ट’ किसी भी अवधारणा, विचार, दृष्टिकोण एवं अभिवृति में बहुत बड़ा परिवर्तन है| इसे आप नए आधार यानि नए अवधारणा यानि नए सन्दर्भ पर आधारित होना भी कह सकते हैं| किसी भी वर्तमान को समझने के लिए उसके इतिहास को समझना होता है, क्योंकि किसी भी वर्तमान का स्वरुप या प्रतिरुप उसकी इतिहास की जड़ों से ही सिंचित एवं निर्मित होता है| कोई भी वर्तमान उनकी इतिहास की जड़ों (Roots) पर टिका होता है| इस तरह हम वर्तमान की जड़ों को समझ कर ही वर्तमान को सही, आवश्यक एवं समुचित ढंग से समझ सकते हैं| इसे समझ कर ही कोई भी वर्तमान की समस्यायों को सुलझा सकता है| इसी तरह हमें अपने भविष्य को बदलने के लिए भी वर्तमान में अपने इतिहास बोध को बदलना होगा| इसके लिए हमें नीव की क्षमता एवं संरचना को जानना एवं समझना होता है| इसी कारण अपने सुनहरे भविष्य के लिए हमें अपने इतिहास बोध को मानवीय, वैज्ञानिक, समुचित ,सम्यक, समेकित, न्यायपूर्ण एवं विस्तृत बनाना पड़ता है|

क्रोशे ने घोषणा की कि “सभी इतिहास ‘समसामयिक इतिहास’ होते हैं”| इसका स्पष्ट अर्थ यह हुआ कि इतिहास का लेखन ही वर्तमान की समस्यायों को सुलझाने के लिए होता है| इस तरह कोई अपने अतीत को यानि अपनी जड़ों को देख कर और समझ कर ही अपने वर्तमान को समझता है| अर्थात जैसे वर्तमान बदलता रहता है, उसी तरह इतिहास भी समय के साथ बदलता रहता है| एक इतिहासकार का मुख्य कार्य किसी घटना या व्यक्ति का ब्यौरा या विवरण (Details/ Description) देना ही नहीं है, अपितु उस समय के उस क्षेत्र विशेष की सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक पहलुओं एवं प्रतिफलों का मूल्याङ्कन (Evaluation) करना होता है और जनता को अपनी मनोवांछित इच्छा या व्याख्या से सहमत कराना होता है|

इतिहास वही है, जो एक इतिहासकार इतिहास के रूप में रचता है या बनाता है| एक इतिहासकार अतीत में जाकर वर्तमान और भविष्य को बनाता है और निर्धारित करता है| इस तरह एक इतिहास यानि अतीत सामाजिक एवं सांस्कृतिक संरचना का वह आधार (Foundation/ Base) होता है, जिस पर समाज का वर्तमान एवं भविष्य की अधिसंरचना (Infrastructure) खड़ा किया जाता है| इतिहास को तर्क एवं तथ्यों की व्याख्या का संयुक्त स्वरुप माना जाता है| एक इतिहासकार भी उस इतिहास की जड़ता का शिकार होता है, यानि उस 'ऐतिहासिक जडत्व' (Historical Inertia) से बंधा हुआ होता है| लेकिन वह इस बन्धन को महसूस भी कर सकता है या नहीं भी कर सकता है|

इतिहास स्पष्टतया एक विज्ञान है| इसमें पहले तथ्यों की जांच होती है, फिर निष्कर्ष निकाले जाते है और इसे कुछ ऐतिहासिक सिद्धांतों पर कसा जाता है| लेकिन यहाँ इतिहासकार उन तथ्यों को वैसा ही समझता है, जिसे वह अपनी पृष्ठभूमि, अपनी पसंद, अपने दृष्टिकोण से देखता एवं समझता है| एक व्यक्ति, एक समुदाय, एक समाज, एवं एक राष्ट्र जैसा सोचता और समझता है, उसी के अनुरूप उसकी वास्तविकता एवं उसकी भौतिकता रूपांतरित होकर अपना भौतिक स्वरुप लेता होता है| इनकी सोच एवं समझ इनकी ऐतिहासिक संस्कृति से निर्धारित होता है, जिसका निर्माण उसके अपने इतिहास बोध (Perception of History) से होता है| संस्कृति किसी व्यक्ति, समाज, एवं राष्ट्र का समेकित एवं सम्पूर्ण मानसिक निधि है, जो उसे उसके परम्परा एवं पर्यावरण से प्राप्त होता है| यह परम्पराओं एवं संस्कारों के निर्धारित एवं निश्चित प्रतिरूपों से समाज में सीखा जाता है| कोई भी संस्कृति किसी समाज को संचालित, प्रभावित, नियंत्रित करने वाला एक साफ्टवेयर है| किसी भी सांस्कृतिक बोध की जड़ें उसकी ऐतिहासिक बोध में होती है| इसलिए संस्कृति रूपी साफ्टवेयर को बदलने एवं समझने के लिए इतिहास का अध्ययन किया जाता है| यह सब ही इतिहास का वैज्ञानिक दृष्टिकोण है| इसी दृष्टिकोण से किसी भी समाज, संस्कृति, क्षेत्र या राष्ट्र का इतिहास - लेखन होना चाहिए, ताकि वह अपने मानवीय एवं प्राकृतिक संसाधनों का महत्तम एवं समुचित विकास कर सके|

संक्षेप में, हमारी संस्कृति ही हमारे विचारों, संस्कारों एवं व्यवहारों को नियमित एवं संचालित करती है, और यही संस्कृति हमारे इतिहास बोध से उत्पन्न एवं निर्मित होती है| और हमारा इतिहास बोध हमारे इतिहास के अध्ययन एवं हमारी समझ से बनती है| इसीलिए हमें इतिहास के लेखन एवं अध्ययन को जानना एवं समझना चाहिए| इस तरह ‘इतिहास’ किसी भी व्यक्ति, समाज, राष्ट्र एवं मानवता के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है|

यदि कोई भी उपरोक्त विश्लेषण एवं मूल्याङ्कन को समझता है, तो वह अवश्य ही आधुनिक एवं वैज्ञानिक इतिहास लिख सकता है, जो पुरातात्विक एवं प्राथमिक प्रमाणिक साक्ष्यों एवं तथ्यों पर आधारित तर्कपूर्ण, वैज्ञानिक एवं विवेकशील होगा| जहां पुरातात्विक एवं प्राथमिक प्रमाणिक साक्ष्यों एवं तथ्यों को शोधों एवं अनुसंधानों में शामिल नहीं किया जाता है, वहाँ कथानक यानि मिथक ही शासन करता है| इसी सब के आधार पर इससे सम्बन्धित शोध एवं अनुसंधान किए जा सकते हैं|

जातीय इतिहास क्यों?

जाति एक भारतीय जमीनी वास्तविकता है, जिसके सामानांतर विश्व में कोई दुसरा उदाहरण नहीं है| इसीलिए बहुत से समाजशास्त्री ‘जाति’ का अंग्रेजी अनुवाद पुर्तगाली अवधारणा पर आधारित अंग्रेजी ‘Caste’ को सही नहीं मानते हैं, और ‘जाति’ का अंग्रेजी अनुवाद ‘Jaati’ (Jati) ही रखने के पक्ष में हैं| जाति को भारतीय समाज में परिवार नामक संस्था का विस्तारित स्वरुप माने जाने के कारण ही एक जाति को ‘विस्तारित परिवार’ (Extended Family) भी माना जाता है| जाति समाज को विभाजित करने वाली जन्माधारित एक स्तरीकृत (Stratified) एवं पदानुक्रमण (Hierarchy) व्यवस्था है, जिसे एक जन्म काल में कभी बदली नहीं जा सकती है| यह जाति की मौलिक प्रकृति है|

जाति एवं वर्ण का कोई भी पुरातात्विक एवं प्राथमिक प्रमाणिक साक्ष्य प्राचीन काल से सम्बन्धित नहीं है, अर्थात किसी भी तथाकथित जाति एवं वर्ण का कोई भी अस्तित्व प्राचीन काल में नहीं था| यानि जाति एवं वर्ण की उत्पत्ति ही मध्ययुगीन है, जिसे ऐतिहासिक सामन्ती शक्तियों ने मध्य काल में जन्म दिया है| मध्य काल में जाति व्यवस्था एवं वर्ण व्यवस्था एक दुसरे के पूरक और एक दुसरे पर आधारित सामानांतर व्यवस्था थी| वर्ण व्यवस्था सामन्ती शासन की कार्यपालिका व्यवस्था थी, जो अपने अस्तित्व के लिए सर्वव्याप्त ‘गतिशील जाति व्यवस्था’ में कार्यरत भारतीय समाज पर आधारित थी|

प्रथम विश्व युद्ध की आहट ने प्रत्येक राष्ट्रों में जन समर्थन पाने के लिए ‘वयस्क मताधिकार’ की आवश्यकता को गहराई एवं गंभीरता से रेखांकित कर दिया| ब्रिटेन की संसद में उसी समय इसके सम्बन्ध में घोषणा की गयी| समाज के यथास्थितिवादी प्रबुद्ध लोगों को इस आहट एवं सुग्बुगाहट की समझ सबसे पहले हुई, जैसे पेड़ की फुनगी को हवा का रुख सबसे पहले पता चल जाता है| संभावित लोकतंत्र में वयस्क मताधिकार की शक्ति एवं आवश्यकता ने भारतीय विभाजित समुदायों को भावनात्मक रूप में गोलबंद करने की अनिवार्यता को स्पष्ट कर दिया| अब नए स्वरुप में इतिहास लेखन कर प्रथम तीन वर्ण को जाति बना कर और विलुप्त हो चुकी ‘शुद्र’ वर्ण को पुनर्स्थापित कर जाति व्यवस्था और वर्ण व्यवस्था का सम्मिश्रण तैयार किया गया| 'शुद्र' सामन्ती व्यवस्था में सेवक थे, जो अपनी क्षुद्र भूमिका एवं क्षुद्र (नगण्य) संख्या के कारण ब्रिटिश साम्राज्यवाद के काल में लुप्त हो गए थे| इस नए एवं सम्मिलित  सम्मिश्रित स्वरुप को इतिहास के अप्रचलित हो चुके अवधारणा “हिन्दू” का बहुप्रसारित उपयोग एवं प्रयोग किया गया| ध्यान दिया जाय कि जो सल्तनत काल में "वैदिक संस्कृति" हो गयी, मुग़ल काल में "ब्राह्मणी संस्कृति" हो गयी, फिर वही संस्कृति ब्रिटिश साम्राज्यवाद में "आर्य संस्कृति" हो गयी, प्रथम विश्वयुद्ध की समाप्ति पर "हिन्दू संस्कृति" हो गयी, और वही अब "सनातनी संस्कृति" कहला रही है| सामाजिक सांस्कृतिक रूपांतरण की इस क्रियाविधि  की गत्यात्मकता (Dynamism of Mechanics) को समझे बिना इसे नहीं समझा जा सकता है|  

हिन्दू व्यवस्था को मजबूत करने के लिए ‘जाति व्यवस्था’ को मजबूत करना, और जाति व्यवस्था को ऐतिहासिक साबित करना जरुरी हो जाता है| यही जाति व्यवस्था ही इस तथाकथित हिन्दू संस्कृति की निर्माण ब्लाक (Building Block) है| इसीलिए इस हिन्दू संस्कृति को गौरवशाली बनाना और सनातन स्थापित करना आवश्यक हो गया है| इसके लिए इतिहास को मिथक से मिलना आवश्यक हो जाता है। यदि यह सब नहीं किया गया, तो हिन्दू व्यवस्था का संरचनात्मक ढाँचा ही ध्वस्त हो जायगा| हिन्दू व्यवस्था का आधारभूत संरचनात्मक ढाँचा ‘ईश्वर’, ‘आत्मा’, ‘पुनर्जन्म’, 'करमवाद', ‘जाति एवं वर्ण’ पर आधारित है, और जाति एवं वर्ण व्यवस्था इसका महत्त्वपूर्ण स्तम्भ है| इसीलिए व्यवस्था भी जाति को गौरवमयी बनाने का, इसके लौकिक व्यक्तित्व को अलौकिक बनाने का, जाति को सभ्यता एवं संस्कृति के उदय से सनातन, पुरातन एवं स्थायी साबित करने के अभियान का समर्थन करता है, और सहयोग भी करता है| इसे ही और इसे ही समझना जरूरी होगा|

इस अभियान में हम और हमारा समाज कहाँ है, इसका विश्लेष्णात्मक मूल्यांकन आपको करना होगा| सभी तथाकथित प्रगतिशील एवं क्रान्तिकारी वैचारिक्ताएं अपने विरोधियों द्वारा उपलब्ध कराये गए ढाँचे में ही और उन्ही के द्वारा परोसे गये सामग्रियों में विकल्प तलाश रही है| यानि उसी के मकडजाल में उलझी हुई और मृगतृष्णा में दौड़ दौड़ कर मंजिल पाने का विभ्रम पाले हुए है| इसका समाधान नवाचार और नवाविष्कार में ही है, जिसे प्रो० थामस सम्युल कुहन ने ‘पैरेड़ाईम शिफ्ट’ कहा है|

अन्त तक बने रहने के लिए आपको सादर धन्यवाद |

आचार्य निरंजन सिन्हा 

बहुजनों की समस्याएँ बढती ही जा रही है, क्यों?

भारत में बहुसंख्यको की समस्याएँ बढती ही जा रही है, जबकि उनलोगों की उम्मीद इसके घटने की है| ‘बहुजन’, अर्थात बहुसंख्यक जन| लोग अपनी सुविधा और ...