मंगलवार, 18 अगस्त 2020

आत्म (मन) और आत्मा

(Self and Soul)

किसी के आत्म (Self), मन (Mind), चित्त (चेतना - Consciousness की अवस्था) एवं आत्मा (Soul) में सम्बन्ध को समझने के लिए सबसे पहले हमें इन अवधारणाओं को समझना होगा| ‘आत्म’ किसी के ‘स्वयं’ (Self) के लिए प्रयुक्त होता है| इस प्रकार ‘आत्म’ का तात्पर्य किसी के अपने सन्दर्भ में है| इसमें किसी व्यक्ति के सचेतन अनुभवों, आदर्शों, विचारों, भावनाओं एवं व्यवहारों की समग्रता समाहित होता है| इसी ‘आत्म’ को ‘मन’ भी कहते हैं| इस तरह यह ‘मन’ किसी के शारीरिक अंग यथा ‘मस्तिष्क’ (Brain) से अलग हो जाता है| किसी का ‘मस्तिष्क’ उसके ‘मन’ एवं शरीर के लिए एक ‘मोड्यूलेटर (Modulator)’ की तरह कार्य करता है| किसी के ‘मन’ को शरीर से भिन्न परन्तु शरीर पर निर्भर एक ‘उर्जा आव्यूह’ (Energy Matrix) समझा जा सकता है, जो ‘मस्तिष्क’ के माध्यम शरीर को संचालित करती है|

यदि ‘चेतना’ किसी भी चीज को समझने और जानने की अवस्था है, तो किसी के चेतना के कार्य उसके ‘मन’, यानि उसके स्वयं’, यानि उसके ‘आत्म’ के द्वारा सम्पादित होते हैं| यहाँ यह प्रश्न उठता है कि फिर इस ‘आत्मा’ की आवश्यकता क्यों है और यह क्या है? ‘आत्म’ और ‘आत्मा’ एक जैसे शब्द होते लिए भी दोनों भिन्न भिन्न संरचनात्मक अर्थ, यानि निहित अर्थ रखते हैं, जो ‘अर्थ’ को ‘अनर्थ’ बना देता है| तो ‘आत्म’ के होते हुए ‘आत्मा’ की कोई आवश्यकता नहीं थी| इसीलिए यहाँ एक गहरी बौद्धिक साजिश नजर आने लगती है| यहाँ ‘आत्म’, ‘मन’, ‘चित्त’, ‘आत्मा’, ‘Soul’, एवं ‘Spirit’ में सजिशतन भ्रम पैदा की गयी है| यह भी यहाँ समझना है|

अब हमलोग ‘आत्म’ यानि ‘मन’, चेतना या चेतनता या सचेतनता के महत्त्व एवं क्रियाविधि को समझते हैं| सबसे पहले ‘आत्म’ यानि ‘मन’ की क्रिया विधि (Mechanics of Mind) को बुद्ध ने समझया| बुद्ध ने मन को सभी चीजों का केंद्र बिदु स्वीकार किया| उन्होंने ही मन को  सभी चीजों का पूर्वगामी माना| मन उर्जा (तरंग) पर प्रभाव डालकर उन चीजों को उत्पन्न करता है, जिनको मन उत्पन्न करना चाहता है| मन यदि नियन्त्रण में है तो सब कुछ नियंन्त्रण में है| मन ही सब मानसिक क्रियाओं में प्रधान है| मन ही मुख्य है| मन ही सभी चैतसिक (चित्त या चेतन संबंधी)  क्रियाओं का उपज का आधार है| इसलिए सबसे मुख्य बात मन की साधना है| मन एक ऐसा साधन है, जिसके माध्यम से व्यक्ति को ज्ञान एवं    दिव्यता की प्राप्ति हो सकती है| हम जिस किसी भी दिशा में अपने मन को ले जाना चाहें, हम उसे उस दिशा में ले जा सकते है| आज हम जो कुछ हैं, वह अब तक के मन के सोच का परिणाम हैं| बदले इच्छित स्वरूप में खुद को पाने के लिए आज से ही अपनी सोच को बदलना होगा| हम जो सोचते रहते हैं, जिस सोच में हम विश्वास करते हैं, हम वहीं बन जाते हैं|

फिर सोच क्या है ? किसी स्थिति पर मन के विचार का ठहराव ही सोच है|

मन ही सोच का उत्पादनकर्त्ता है| मन को नियन्त्रण में रखना और मन को इच्छित दिशा में संचालित करना ही बुद्ध का एक मुख्य अनुसंधान है, जिसे विपश्यना कहा गया है| बुद्ध की गया के ऊरूवेला वन में छह बर्षो की साधना का यह भी एक पारतोषिक है|

आधुनिक भौतिकी के स्ट्रिंग सिद्धांत (String Theory) के अनुसार प्रत्येक वस्तु एक विमीय कम्पनकृत धागा (One Dimentional Vibrating String) है, जो अतिसूक्ष्म अवस्था में कम्पन करता हुआ होता है| प्रत्येक वस्तु इस कम्पनकृत धागा के अतिरिक्त कुछ नहीं है| इस कम्पनकृत धागा के कम्पन प्रतिरूप (Pattern) और दिशा निर्धारण (Orientation) आदि के समुचित व्यवस्थापन (Arrangement) से ही उत्पादित वस्तुओं की प्रकृति निश्चित होती है| इसी उत्पादित वस्तुओं के विशिष्ट संयोजन से ही विशिष्ट पदार्थ का निर्माण होता है| इसी कम्पनकृत धागा से किसी पदार्थ में उर्जा या पदार्थ की मात्रा बढ़ती या घटती है| इस ब्रह्माण्ड में सभी वस्तुएँ तरंग एवं पदार्थ दोनों रूपों में एक साथ उपलब्ध रहता है| 

क्वांटम भौतिकी के अनुसार जिस क्षण उन तरंगों का अवलोकन (observation) किया जाता है, उसी क्षण उसकी तरंगीय प्रकृति पदार्थ में रूपान्तरित हो जाती है, वशर्ते उस वस्तु की उस क्षेत्र में पाए जाने की असीम संभावना हो| अवलोकन प्रक्रिया के द्वारा उस तरंगीय अवस्था में उर्जा का प्रवाह बढ़ता है और वहाँ उर्जा का संकेन्द्रण बढ़ता है| इससे मन में बने स्वरुप का ठोसीकरण (Solidification) उस तरंगीय उर्जा का होने लगता है, जिसको अवलोकित किया गया है, लेकिन यह सब उस परितंत्र में पाए जाने की पूर्व शर्त के अधीन है| इसे अवलोकनकर्ता के प्रभाव का सिद्धांत (Theory of Observer Effects) कहते हैं| 

तरंगीय प्रकार्य सिद्धांत (Wave Function Theory) में किसी भी वस्तु के कहीं पाए जाने की ज्यादा संभाव्यता को व्यक्त करता है| जहाँ कहीं अवलोकन किया जाएगा, वही उस वस्तु के प्रकट हो जाने की संभावना बढ़ जाता है और वह इच्छित वस्तु प्रकट हो सकता है| यहाँ यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि उस वस्तु के वहाँ पाए जाने का पहले से संभावना यानि माहौल पहले से ही उपलब्ध हो| विज्ञान के अध्यारोपण (अध्यास्थापन) सिद्धांत (Theory of Superposition) के अनुसार किसी भी वस्तु के सर्वत्र पाए जाने की सम्भावना है, परन्तु  उस वस्तु के किसी एक स्थान पर पाए जाने की संभावना सबसे अधिक होती है| इसके अनुसार किसी भी वस्तु के कहीं भी पाए जाने की संभावना नहीं होती है| इन सिद्धांतों का निष्कर्ष यह है कि जहाँ कहीं भी मन की शक्तियों का संकेद्रण होगा, वहाँ उस वस्तु के पाए जाने की संभावना अधिक हो जाती है, जिस वस्तु को पाए जाने के लिए मन को संकेद्रित किया गया था|

वैज्ञानिक सर रोजर पेनरोज ने मन एवं चेतनता के संबंध की वैज्ञानिक व्याख्या की है| जब हम किसी वस्तु पर मन स्थिर करते हैं अर्थात् अपनी सोच को स्थिर करते हैं, तो उस वस्तु के उन तरंगीय उर्जा में से प्रकटीकरण की संभावना बढ़ जाती है, जिस वस्तु को हम प्रकट देखना या पाना चाहते हैं| इसके लिए मन का संकेन्द्रण आवश्यक है जो विपश्यना से उपलब्ध होता है| विपश्यना विधि पूर्णतया एक पंथ निरपेक्ष, सरल, साधारण  एवं व्यवहारिक विधि है, जैसे शरीर के लिए व्यायाम और औषधि पंथ निरपेक्ष है| विपश्यना में मन का संकेन्द्रण अभ्यास की शुद्धता से आता है| वैसे विपश्यना में मन के अंदर आ रही भावनाओं एवं स्थितियों का स्व अवलोकन किया जाता है| मन और चेतनता के संबंधों के अध्ययन के लिए रोजर पेनरोज, अल्फ्रेड नार्थ हाइटेड, बर्टेंड रसेल, जे राबर्ट ओपेनहाइमर, जीन पीगेट आदि के अध्ययनों का अवलोकन किया जा सकता है| मन की शक्ति की क्रिया विधि को सबसे पहले बुद्ध ने समझा| किसी लक्ष्य को प्राप्त करने का विज्ञान की कार्यविधि के संबंध में पहला वैज्ञानिक सम्मत स्पष्ट दर्शन बुद्ध का ही है, जिसको आधुनिक विज्ञान और आगे बढ़ाता है| इसके आधार पर मानवीय सफलताओं को नयी ऊचाइयाँ एवं नयी उपलब्धियाँ हासिल हो पायगी| बुद्ध ने मन पर नियन्त्रण एवं मन की शक्ति का प्रयोग कर आदमी को अपने जीवन में सफलता  पाने का विधि समझाया| इसी को दुख एवं कलह का निवारण करने के उपाय भी बताया हैं| 

मन पर नियन्त्रण कर ही आदमी अपने जीवन में सुख, शान्ति और समृद्धि पा सकता है| मन को संकेन्द्रित कर आदमी अपनी वैचारिक उत्पादकता को भी बढ़ाता है और नवाचारी विचार लाता है| यदि आप अपने मन पर नियंत्रण करना जानते हैं और अपने मन को नियंत्रित कर सकते हैं, तो आप कोई भी सफलता पा सकते हैं| आज विश्व के सभी सफल व्यक्ति, चाहे वह उद्यमी हो या निवेशक हो, चाहे वह चिकित्सक हो या इंजीनियर हो, या कोई भी प्रमुख हस्ती हो, सभी मन की साधना की बात करते हैं| महान वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिन्स बैठे बैठे मन की कल्पनाओं के आधार पर गूढ वैज्ञानिक प्रश्नों का समाधान किया जिसे वैज्ञानिक वर्ग ने सही पाया| अल्बर्ट आइन्स्टीन ने एक बार कहा था कि

“कल्पना अर्थात मन की उडान किसी के ज्ञान (जानकारी) से ज्यादा महत्वपूर्ण है”|

 मन के बारे इतनी गूढ बातें बुद्ध ने सबसे पहले रेखाकिंत किया था|  बुद्ध के अनुसार आत्मा (SOUL) पूर्णरूपेण कल्पना है, मिथ्या है, तथ्यहीन है, अवैज्ञानिक है| सभ्यता एवं संस्कृति के उद्विकास के पूर्व से ही सभी चेतन एवं अचेतन वस्तुओं एवं क्रियाओं में किसी ‘आत्मा’ यानि ‘शक्ति- पुंज’ के होने की अतार्किक अवधारणा वर्तमान थी, जिसे तार्किकता के आधार पर संशोधित एवं अलग कर ‘आत्म’ का स्वरुप दिया गया| सामन्ती काल में, यानि मध्य काल में फिर से उस ‘आत्म’ को ‘आत्मा’ से भ्रमित कर दिया गया| आत्मा के अस्तित्व का कोर्इ साक्ष्य नहीं है, जो इसके होने का तार्किक एवं बुद्धिमतापूर्ण प्रमाण दें और उसे सामान्य समझदार आदमी भी समझ सके| आत्मा अज्ञात है, अदृश्य है| जो चीज वास्तव में है, वह मन या चित्त या सचेतनता है, परन्तु आत्मा नहीं है| मन या चित्त आत्मा से भिन्न है| 

चुंकि आत्मा काल्पनिक है एवं गलत उद्देश्य के लिए अवधारित किया गया है और इसिलिए यह अवधारणा गलत है| चूंकि आत्मा गलत अवधारणा है, इसलिए परम आत्मा (परमात्मा) तथा महान आत्मा (महात्मा), ब्रह्मात्मा एवं देवात्मा  भी गलत अवधारणा है| इसी कारण बुद्ध को महात्मा बुद्ध कहना गलत है और अवैज्ञानिक है|

आत्मा के अस्तित्व में विश्वास करने वालों के अनुसार आत्मा वह तत्व विशेष है जो शरीर से पृथक है परन्तु उसके शरीर के भीतर उसके जन्म से मृत्यु तक बना रहता है और मृत्युपरान्त उसका अस्तित्व शरीर से अलग होकर स्वतंत्र रूप में इस धरती से परे किसी निश्चित स्थान पर रहने लगता है| यह आत्मा शरीर के साथ नहीं मरता है तथा इसके दूसरे शरीर (किसी भी जीव) में भी प्रवेश करने की संभावना रहती है| इसके विरूद्ध कर्इ तर्को के अतिरिक्त यह भी तर्क है कि जब इस संसार का उद्विकास (evolution) हुआ है, तब बढ़ते हुए जीवों के लिए इतने आत्मा कैसे निर्मित हुए या पैदा लिए? आत्मा के अस्तित्व में नहीं होने को ही अनात्मवाद कहा गया है| इस आत्मा का अघ्ययन करना समय की बरबादी है और इसका कोर्इ सामाजिक उपयोग नहीं है| आत्मा के संबंध में विद्या सिर्फ तथाकथित  विद्वता के लिए ही है ताकि उस व्यक्ति विशेष को विद्वान, ज्ञानी माना जा सके| चूँकि यह आत्मा की अवधारणा ही गलत है तो इस पर विद्वतापूर्ण आख्यान का काल्पनिक ग्रंथ बनाना उचित नहीं है|

जब किसी व्यक्ति को संविधान के अनुच्छेदों की व्याख्या समझने में समस्या आती है तो इसके उद्देशिका  (Preamble) को देखा जाता है, जिससे यह पता चलता है कि इस संविधान का निर्माण किस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए हुआ है| इसी तरह जब आत्मा की बात आती है, तो इसके निर्माण के उद्देश्य का अवलोकन किया जाना महत्त्वपूर्ण है| आत्मा की अवधारणा के निर्माण का मूल उद्देश्य है कि किसी आदमी के मरने के बाद भी उस मृत आदमी के उत्तराधिकारी को उस मृत आदमी के आत्मा को तथाकथित सुख या कष्ट देने यानि उसे नियंत्रित करने के नाम पर ठगा जा सकता है| अर्थात् आदमी के मृत हो जाने पर भी आत्मा के नाम पर ‘धार्मिक संस्कारक’  उस मृत आदमी के उत्तराधिकारी को प्रभावित करता रहता है| इसी आधार पर ‘धार्मिक संस्करक’   मृत आदमी के पास भौतिक पदार्थ भेजने के नाम पर आत्मा के सुखदुख के लिए भौतिक पदार्थ लेता रहता है|  उस मृतक के सम्प​त्ति के उत्तराधिकारी को इसके लिए ‘धार्मिक संस्करकों’ को खुश करना पडता है ताकि धार्मिक संस्कारक  मृत आत्मा के कष्ट दूर कर सके और उसे भौतिक सुख दे सके| इसी खतरनाक साजिश का उद्घाटन बुद्ध ने किया है| अब आप समझ गए होंगे कि आत्मा की अवधारणा क्यों बनायी गयी|

जब मन, चित्त और सचेतनता एवं आत्मा एक ही है या एक ही उद्देश्य को पूरा करता है तो आत्मा की अलग अवधारणा की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए थी| आत्मा के अवधारणा के समर्थक बताते है कि मन, चित्त और आत्मा एक ही है| जब जीव में चित्त, चेतनता का उदय होता है तो वह आदमी या जीव जीवित प्राणी बनता है| इसी मन, चित्त, चेतनता ही आदमी के जीवन में प्रधान वस्तु है| यही मन, चित्त या चेतनता ज्ञान मूलक है, भावना मूलक है और क्रिया मूलक है| चित्त या चेतनता के कार्य निर्धारण के बाद आत्मा के लिए अलग कोर्इ कार्य नहीं बचता, सिवाय कि मृत आदमी पर इसके माध्यम नियंत्रण बताया जाय और उसके बहाने मृत के उत्तराधिकारी का दोहन किया जाय|

चेतनता से सम्बन्धित भौतिकी में प्रसिद्ध प्रयोग किया गया जिसे क्वांटम पारस्पारिता का सिद्धांत (Quantum Entanglement Theory) कहा गया| इस प्रयोग में एक फोटोन को दो उप- फोटोन में खंडित किया गया| इन दोनो खंडित युग्मक को ब्रह्माण्ड में अलग अलग कही पर एवं कितनी भी दुरी पर रखा गया और इसके किसी भी युग्मक पर कोई भी क्रिया करने पर तत्क्षण इसके दुसरे युग्मक पर सामान एवं विपरीत प्रतिक्रिया हो जाती है| इसमे गति कोई बाधा नहीं होती है| वैज्ञानिकों के अनुसार इसके प्रतिक्रिया समय के अनुसार यह पाया गया है इसकी गति को आइंस्टीन की प्रकाश की सीमित गति भी बाधित नहीं करता है| अर्थात इसकी गति प्रकाश की गति से भी तेज है जो आइंस्टीन के अनुसार संभव नहीं है| 

इस प्रयोग में सन्देश तत्क्षण दुसरे उप- फोटोन तक पहुँच गयी जैसे चेतनता पहुचती है| यह सन्देश इतना स्पष्ट पाया गया कि एक उप- फोटोन को यदि धनात्मक दिशा में घुमाया गया तो तत्क्षण इसका दूसरा युग्मक उप- फोटोन भी ऋणात्मक दिशा में घूम गया| यदि चित्त, मन या चेतनता तत्क्षण कहीं भी पहुँच जाता है तो फिर आत्मा का किस अलग प्रयोजन के लिए बनाया गया है? इसका अर्थ है कि आत्मा का अवधारणा किसी छुपे हुए षड़यंत्र का भाग है जिसके द्वारा पुनर्जन्म और कर्म का सिद्धांत को स्थापित किया जाता है| आत्मा के समर्थन में विज्ञान किसी भी रूप में समर्थन नहीं करता है| कुछ भारतीय लोग विदेशी अनुसंधानों के चेतनता के प्रायोगिक निष्कर्ष में सजिशतन चेतनता का हिन्दी या भारतीय अनुवाद आत्मा कर लोगों को भ्रमित करते हैं| स्पष्ट है कि आत्मा का अवधारणा लोगों को ठगने एवं मुर्ख बनाने के लिए करते हैं, जो पूर्णतया कल्पना पर आधारित है| वही चित्त या  मन या चेतनता या सचेतनता का अवधारणा विज्ञान सम्मत है|

आत्मा के समर्थन में विज्ञान किसी भी रूप में उपलब्ध नहीं है| स्पष्ट है कि आत्मा का अवधारणा ठगी करने के उद्देश्य से कल्पना पर आधारित है, जबकि चित्त, मन एवं सचेतना पर आधारित अवधारणा विज्ञान सम्मत है| चित्त, मन एवं सचेतनता को आधुनिक भौतिकी का समर्थन इसके भविष्य के उपयोग को और आगे बढ़ाएगा| बुद्ध के अनात्मवाद को भी आधुनिक विज्ञान का समर्थन है|

‘आत्मा’ के द्वारा ही ‘पुनर्जन्म’ संभव है|

जब ‘पुनर्जन्म’ होगा तब ही ‘कर्म का सिद्धांत’ लागू हो सकता है|

‘कर्म का सिद्धांत’ कहता है कि इस जन्म में जो आपकी अवस्था या दुर्दशा है,

वह आपके पिछले जन्म के आपके कर्म का परिणाम है|

इसीलिए आपकी दुर्दशा के लिए शासन या व्यवस्था कतई जिम्मेवार नहीं है,

बल्कि आप ही का पहले जन्म के कर्म दोषी है| और इस तरह यह शासन को कुव्यवस्था के दोष से सर्वथा मुक्त कर देता है|

 यह है आत्मा का असली उपयोग, जिस पर लोग ध्यान हो नहीं देते हैं| इसलिए ही मन एवं चित्त के अतिरिक्त इस आत्मा की जरुरत है| इसलिए आप भी इस पर विचार करें|

आचार्य प्रवर निरंजन

व्यवस्था- विश्लेषक एवं चिन्तक

 

 

सोमवार, 17 अगस्त 2020

संस्कृति और आष्टांगिक मार्ग

 

 

संस्कृति और आष्टांगिक मार्ग

  संस्कृति जीवन जीने की विधि है| संस्कृति मानव जनित एक मानसिक पर्यावरण है जिसमें सभी अभौतिक उत्पाद एक पीढी से दूसरी पीढी को प्रदान करते हैं| संस्कृति किसी समाज के वे सूक्ष्म संस्कार हैं, जिनके माध्यम से लोग परस्पर संप्रेषण करते हैं, विचार करते हैं, और जीवन के विषय में अपनी अभिवृत्तियों और ज्ञान को दिशा देते हैं| किसी देश या समाज की संस्कृति उसकी सम्पूर्ण मानसिक निधि को सूचित करती है| यह किसी समाज में गहरार्इ तक व्याप्त गुणों की समग्रता है जो उस समाज के सोचने, विचारने, और कार्य करने से बना है| इसकी अभिव्यक्ति इनके साहित्य, प्रगति, स्तर, व्यवहार, कार्य, आनन्द आदि के तरीकों से दृश्य (visible) होती है| संस्कृति का संबंध व्यक्ति और समाज में निहित संस्कारों से है और उसका निवास उसके मानस में होता है| हम कह सकते हैं कि संस्कृति मानवीय समाजों में पाए जाने वाले सामाजिक व्यवहार और सामाजिक प्रतिमान (norm, model, pattern) है| यह पीढी दर पीढी सीखी जाती है|

 

भारतीय उपमहाद्वीप में सभ्यता के उदय के साथ जिस संस्कृति का उदय हुआ और जिसमें भारतीयता रची बसी है, वही भारत की बौद्धिक संस्कृति है| यही भारत की मूल संस्कृति है|

 

विश्व की कर्इ सभ्यताओं - माया, ह्वांगहो नदी, दजला फरात नदी, नील नदी एवं सिन्धु नदी की धाटी की सभ्यताओं के साथ गंगा - यमुना नदी की घाटी की सभ्यता का भी उदय हुआ| मानव (होमो सेपिएंस) अपनी उत्पत्ति के साथ आखेटन करने लगा| सबसे पहले आखेटक (Hunting) संस्कृति (अर्थव्यवस्था) विकसित हु़ई| इसके बाद पशुचारण संस्कृति (अर्थव्यवस्था) का विकास हुआ| पशुचारण संस्कृति से कृषि संस्कृति का विकास हुआ| इसके बाद बौद्धिक संस्कृति आयी जिसे बुद्धि की संस्कृति भी कही गयी| पशुचारण संस्कृति में पारिवारिक व्यवस्था का उदय हुआ और मजबूत हुआ| कृषि संस्कृति में परिवार समाज की ओर अग्रसर हुआ| कृषि संस्कृति में जब अतिरेक उत्पादन (Surplus Production) हुआ तो नगर, शिल्प एवं सेवाओं के विकास को आधार मिला और समाज एवं राज्य का उदय हुआ| समय के साथ समाज एवं राज्य के बेहतर वर्त्तमान एवं भविष्य के विकास के लिए बेहतर दर्शन की आवश्यकता हु़ई| तत्कालीन कई विद्वानों और दार्शनिकों ने अपने ज्ञान एवं समझ के आधार पर कई दर्शन तैयार किए| कहा जाता है कि भारत में राज्यों के उदय के समय में कुल 62 दर्शन प्रचलित थे| सबसे उत्तम दर्शन उसे माना गया जो समाज में सुख, शांति, और समृद्धि स्थापित करें| इसके लिए दर्शन को न्याय, समानता, स्वतंत्रता, और बंधुत्व पर आधारित होना चाहिए, परन्तु इसका मार्ग अति गंभीर, अति कष्टकारी, अति विशिष्ट, और अति जटिल नहीं हो| यह बुद्धि पर आधारित होने पर बौद्धिक संस्कृति कही गयी|

 

            इन सबमें सबसे व्यवस्थित, व्यवहारिक, वैज्ञानिक, तार्किक, कल्याणकारी, विकासवादी और मानवतावादी दर्शन बुद्ध का रहा है; कालान्तर में यह दर्शन और अधिक विशद एवं बारीक होने लगा| बुद्ध का दर्शन मूल भारतीय दर्शन है क्योंकि यह दर्शन सभी भारतीय दर्शनों के मंथनों के उपरान्त निकला निष्कर्ष- दर्शन है और पूर्णतया भारतीय परिस्थितियों में भारतीयों के सबसे अनुकूल दर्शन है| यह सफल जीवन जीने के लिए सभी मानव का जीवन दर्शन है| विश्व में आज जितनी भी संस्कृतियाँ विकसित हैं, सभी प्रत्यक्षत: या अप्रत्यक्षत: बुद्ध के दर्शन एवं शिक्षाओं पर आधारित है| अत: मैंने भारत के मूल एवं मौलिक संस्कृति को  वैज्ञानिक अवधारणाओं के आधार पर उपस्थापित कर व्याख्यापित करने का प्रयास किया है|  इसी को विकासवादी विज्ञान भी कहते हैं| यही आधुनिक विज्ञान का पौराणिक स्वरुप है|

 

            बौद्ध दर्शन दरअसल बुद्धि के विकास के दर्शन की परम्परा है जो सभ्यता के विकास के साथ शुरू हुई थी| सिन्धु घाटी सभ्यता भी बौद्ध दर्शन के साक्ष्य देते है| सिन्धु नदी घाटी सभ्यता में  बौद्ध विहार, बौद्ध मठ, पोशाक- विन्यास, प्रार्थना- शैली, योग मुद्रा, पीपल पत्र, धर्म चक्र इत्यादि के साक्ष्य स्पष्ट करते हैं कि बुद्धि यानि बुद्ध की परम्परा भारत में शुरू से ही रही है| उस समय के धर्म चक्र में छः तीलियाँ थी जो बुद्ध के समय आठ तीलियाँ हो गई|            

 

            बुद्ध मानवता को सम्यक मार्गदर्शन देने के लिए ही जाने जाते हैं| संसार के इतिहास में इससे पहले कभी किसी ने यह शिक्षा नहीं दी कि अविद्या ही सब दुखों का कारण है| अधिकांश विद्वान मानते हैं कि नव उदित समाज (नगरीय समाज) और नई राजनीतिक संस्था- राज्य के समुन्नत विकास के लिए भी एक सम्यक विकास एवं समृद्धि का दर्शन चाहिए था| मानव जीवन से दु:खों के निवारण के उपाय चाहिए ताकि मानव जीवन में और समाज में सुख, शांति, और समृद्धि स्थापित हो| बुद्ध ने इसके लिए जीवन में सामान्य आचार संहिता निर्धारित किया गया जो आष्टांगिक मार्ग के नाम से जाना जाता है| इन्हीं सामान्य आचार संहिता में आष्टांगिक मार्ग आता है| यही सम्यक मार्ग और मध्यम मार्ग कहलाता है| इसमें कुल आठ मार्ग हैं जिन्हें समुचित (सम्यक) बताया गया है|

 

   1.सम्यक दृष्टि - आदमी को प्रकृति (विज्ञान) और मानवीय-सामाजिक संबंधों के नियमों को जानने और समझने के लिए सम्यक दृष्टिकोण रखना चाहिए| जब तक आदमी में वैज्ञानिक मानसिकता का विकास नहीं होगा, तब तक आदमी में सम्यक दृष्टि की समझ नहीं आएगी| सम्यक दृष्टि के लिए सम्यक ज्ञान अर्थात सम्यक विद्या का होना अत्यन्त आवश्यक शर्त है| अविद्या के नाश से ही सम्यक दृष्टि के लिए  क्षमता आती है| विद्या से ही विश्लेषण क्षमता, तर्क क्षमता, निष्कर्ष क्षमता,अनुमान क्षमता और परिक्षण क्षमता आता है जिससे ही सम्यक दृष्टि विकसित होती है|  ऐसे लोगों की सत्य- असत्य, उचित- अनुचित, सदाचार- दुराचार, अच्छे कर्म एवं बुरे कर्म में विभेद करने की क्षमता बढ़ती है| बुद्ध का सम्यक दर्शन की सम्पूर्ण ज्ञान एवं समझ ही किसी व्यक्ति को सम्यक दृष्टि प्रदान कर सकता है|

 

एक सम्यक दृष्टि का व्यक्ति अंधविश्वास, ढोंग, पाखण्ड और अनावश्यक कर्मकांड से मुक्त होता है| वह हर सोच एवं विचार का विश्लेषण करने औए तार्किक ढंग से देखने एवं समझने का नजरिया एवं क्षमता रखता है| वह हर घटना का कारण को जानता है  या जानने की कोशीश करता है अर्थात वह यह समझता कि हर घटना का कोई न कोई कारण अवश्य होता है| वह प्राकृतिक शक्तियों और उसके व्यक्तिकरण (Personofication) किए गए के स्वरुप के स्वार्थ को यानि देवी- देवताओं के नाम पर किए  साजिश को एवं स्वार्थ को समझता है| अर्थात वह ईश्वर में विश्वास नहीं करता है| वह काल्पनिक और कल्पना आधारित बातों पर भी विश्वास नहीं करता| वह आत्मा, पुनर्जन्म, और कर्म के सिद्धांत में विश्वास नहीं करता है| वह परिवर्तन के नियमों को जानता और समझता हो| वह मानव और प्रकृति के स्वाभाव एवं व्यवहार को समझता हो| वह सभी चीजों को जानना एवं समझना चाहता हो| वह हमेशा विद्या ग्रहण को उत्सुक रहे| सम्यक दृष्टि एक व्यापक वैज्ञानिक, तार्किक एवं विश्लेष्णात्मक दृष्टिकोण को समाहित करता  है|

 

   2.सम्यक संकल्प – इनके अनुसार लक्ष्यहीन मानव का जीवन पशुतुल्य है| हर मानव के जीवन में एक निश्चित लक्ष्य अवश्य हो जिसे प्राप्त करने का मापदण्ड उसे दिखता रहे| लक्ष्य अर्थात संकल्प से उसे  प्रेरणा मिलती रहती है| हर मानव का  संकल्प उँचे स्तर की आकांक्षाओं के अनुरुप हो जो मानव के कल्याणार्थ हो और संकल्प दृढ भी हो| सम्यक संकल्प को राग-द्वेष रहित एवं दुसरे से तुलनात्मक नहीं हो अर्थात प्रतियोगात्मक नहीं होना चाहिए| संकल्पहीन व्यक्ति पतवार (Rider) विहीन नाव (बोट) के समान दिशाहीन होता है जो चलता तो है पर मंजिल का पता नहीं होता| ऐसे ही नाव की तरह संकल्पहीन या सम्यक संकल्प के बिना व्यक्ति का जीवन दिशाहीन हो जाता है|

 

हर मानव का संकल्प ऐसा हो जिससे समाज में सुख, शान्ति, संतुष्टि और समृद्धि स्थापित होता रहे| सम्यक संकल्प से किसी को न्याय की हानि नहीं हो|  ऐसे संकल्प से प्राप्त लक्ष्य में हर्ष, प्रेम, सुख, संतुष्टि और शान्ति मिला हुआ होता है| आजकल सम्यक संकल्प को स्मार्ट (SMART) संकल्प कहा जाता है अर्थात संकल्प विशिष्ट (Specific) होना चाहिए, मापने योग्य (Measurable) होना चाहिए, पाने योग्य (Achievable) होना चाहिए,  वास्तविक (Realistic) होना चाहिए, और संकल्प समयबद्ध (Time- bound) होना चाहिए| विशिष्ट का अर्थ है संकल्प (लक्ष्य) को परिभाषित होना चाहिए, न कि अपरिभाषित| विशिष्ट का अर्थ होता है लक्ष्य  सामान्य या अस्पष्ट नही हो, बल्कि सभी को समझने योग्य हो| संकल्प मापने योग्य हो अर्थात यह मापा जा सके कि कब कितना लक्ष्य पूरा हुआ है और कितना भाग या प्रतिशत और होना बाकी है| संकल्प पाने योग्य होना चाहिए परन्तु इसका यह अर्थ नहीं है कि “आउट ऑफ़ बॉक्स” सोचा ही नहीं जाना चाहिए| सोचना और संकल्प अलग अलग की अवस्था है| सोचना एवं विचार करना संकल्प की पूर्व अवस्था है| संकल्प वास्तविक एवं व्यवहारिक होना चाहिए यानि विधिपूर्ण एवं नैतिक होना चाहिए| निश्चित समय सीमा के बिना संकल्प का कोई अर्थ नहीं होता है| हर संकल्प के लिए एक निश्चित समय सीमा निर्धारित होना चाहिए| इससे संकल्प से भटकाव नहीं होता| पहले संकल्प पूरा होने पर ही दूसरा संकल्प किया जाना चाहिए| निश्चित समय सीमा से पहला संकल्प जल्दी पूरा होता है और संसाधन एवं समय का बचत होता है|

 

   3.सम्यक वाणी - वाणी ही विचारों एवं भावनाओं की सम्प्रेषण का माध्यम है और यही किसी के व्यक्तित्व की पहचान का प्राथमिक आधार बनता है| कहा जाता है कि किसी व्यक्ति की वाणी ही किसी को सम्मान दिलाती है तो किसी को अपमान भी दिलाती है| सम्यक वाणी में सहृदयता, विनम्रता, मधुरता का होना भी सही एवं तथ्यात्मक होने के अतिरिक्त होना चाहिए| इसे बुद्ध ने धम्म- वार्ता भी कहा है| अत: यह बुद्धिसंगत हो, सौम्य हो, सार्थक हो, सोद्देश्य हो, कल्याणकारी हो और सत्य हो|

 

सम्यक वाणी में सत्यता होनी चाहिए परन्तु मधुरता का अभाव नहीं होना चाहिए| आप कितना भी ज्ञानी हो, आपके वाणी में शिष्टता और सौम्यता अवश्य होनी चाहिए| आपके वचनों से कठोरता, अभद्रता, अशिष्टता और दुर्व्यवहार नहीं झलकनी चाहिए| आपकी बातों में वकवास यानि व्यर्थ और फिजूल की बातें नहीं होनी चाहिए| आपकी बातें ऐसी नहीं हो कि उससे अव्यवस्था एवं शान्ति भंग हो जाए| मूर्खतापूर्ण बहस यानि बेमतलब के विमर्श से बचना चाहिए| अपनी बातों पर यह ध्यान रहना चाहिए कि बाते बुद्धिमतापूर्ण हो, उत्पादक हो, कल्याणकारी हो| एक सम्यक व्यक्ति किसी व्यक्ति एवं घटनाओं  के बारे में विवरण यानि विस्तार बताने में कम समय देता है| वह दुसरे व्यक्तियों की कम से कम आलोचना करता है|

 

यह विज्ञान है कि जब आप किसी बात को बोलते हैं तो आप उस वस्तु या भावना का अपने मष्तिष्क में चित्रण करते हैं| कोई भी चीज जब आपके मष्तिष्क में आती है यानि उसका चित्र आपके मष्तिष्क में बनता है तो उस चित्रण में उर्जा का प्रवाह शुरू हो जाता है| उर्जा के प्रवाह से चित्रण की प्रवृति उस चित्रण को साकार यानि मूर्त रूप लेने की हो जाती है| वाणी के शब्दों के भाव कितना महत्वपूर्ण होता है, इसे मैं एक उदहारण से समझाना चाहता हूँ| महान संत मदर टेरेसा कलकत्ता में रहती थी| एक व्यक्ति उन्हें एक युद्ध- विरोधी रैली में शामिल होने के लिए आमंत्रित करने गया था| उसने युद्ध- विरोधी रैली में शामिल होने से मना कर दिया, पर एक और बात उससे कहा| उस महान संत ने कहा यदि तुम शान्ति के समर्थन में रैली निकलना तो मुझे जरुर बुलाना| पहली बात में दो नकारात्मक बाते थी- यद्ध एवं विरोध| परन्तु दूसरी बात में दोनों शब्द सकारात्मक थे- शान्ति एवं समर्थन| यह उपयुक्त शब्दों की महता को रेखांकित करता है| किसी व्यक्ति के वाणी से ही उसके सम्पूर्ण व्यक्तित्व का दर्शन एवं पहचान होता है और इसी कारण वाणी का सम्यक, संतुलित एवं बुद्धिमतापूर्ण होना आवश्यक होता है|

 

  4.सम्यक कर्मान्त – अच्छे कर्म, अच्छे आचरण, और अच्छे व्यवहार को सम्यक कर्मान्त या सम्यक कर्मांक कहा गया है| यह योग्य व्यवहार की शिक्षा देता है| इसके अंतर्गत अहिंसा एवं सदाचार के नियमों का पालन बताया गया है| हमारा हर कार्य ऐसा हो कि जिसको करते समय हमें दूसरो की अधिकारों एवं भावनाओं का ध्यान रहे| इसमें दुसरे के प्रति सहानुभूति (Sympathy) के साथ साथ समानुभूति (Empathy) भी होनी चाहिए| इसी में संवेगात्मक यानि भावनात्मक बुद्धिमता (Emotional Intelligence) के साथ साथ सामाजिक बुद्धिमता (Social Intelligence) का भी ध्यान रखना चाहिए अर्थात दूसरों एवं समाज की भावनाओं की समझ के साथ साथ अपनी भावनाओं की पहचान एवं इस पर नियंत्रण होना चाहिए| आज सामाजिक बुद्धिमता को सफलता का नया विज्ञान बताया जाता है| सामाजिक बुद्धिमता वास्तव में जीवन में सफलता पाने का  कला एवं विज्ञान है| इसी को बुद्ध ने सम्यक कर्मान्त कहा था| यह आज नए शब्दों के साथ सामाजिक एवं भावनात्मक बुद्धिमता कहलाता है|

 

 हमारे हर कर्म (कार्य, व्यवहार) से दूसरों का अहित नहीं हो और समाज में सुख, शान्ति, एवं समृद्धि स्थापित हो| आधुनिक युग में इसकी महत्ता समझी जा रही है| आज समाज अपने क्षेत्र से बाहर निकल कर एक विश्वव्यापी सघन समाज का एक हिस्सा हो गया है| विभिन्न समाजो एवं विभिन्न संस्कृतियों को समझना और उसको नेतृत्व देना आज सफलता का एक आवश्यक शर्त हो गया है जो सम्यक कर्मान्त को समझने से ही समझा जा सकता है| इन दोनों (भावनात्मक एवं सामाजिक बुद्धिमता) को ही समेकित रूप में सम्यक कर्मान्त कहा गया है| 

 

  5.सम्यक आजीविका - प्रत्येक आदमी को अपने पारिवारिक एवं सामाजिक उत्तरदायित्व के निर्वहन के लिए आजीविका चलानी पडती है, जो आवश्यक भी है| परन्तु यह ध्यान रखना है कि उस आजीविका से समाज और व्यवस्था को हानि नहीं हो और आजीविका मानवीय गरिमा के विरुद्ध नहीं है| अपनी जीविका चलाने के लिए कोई अनैतिक कार्य नहीं करना चाहिए, हर आजीविका विधि से सुसंगत होना चाहिए, कोई भी आजीविका  समाज या व्यवस्था को अव्यवस्थित करने या भंग करने वाला नहीं हो| आपके आजीविका से किसी दुसरे को हानि नहीं होना चाहिए और आपके या किसी अन्य के मानवीय गरिमा एवं सम्मान के विरुद्ध भी नहीं होना चाहिए|

 

किसी भी व्यक्ति को वैसी ही आजीविका को चुनना चाहिए जिसे करने उसे आनंद आता हो| किसी भी व्यक्ति को ऐसा आजीविका नहीं चुनना चाहिए जो उसे यह पसंद नहीं हो और दुसरे के द्वारा आपकी इच्छा के विरुद्ध थोपा गया हो| ऐसे थोपे गए आजीविका से कोई भी व्यक्ति अपनी महत्तम क्षमता का उपयोग नहीं कर पाता और वह समाज को पूर्ण उत्पादकता से योगदान नहीं कर पाता है| ऐसे आजीविका से किसी भी व्यक्ति के व्यक्तित्व का महत्तम विकास नहीं हो पाता है| मन के विरुद्ध आजीविका करने में कोई भी व्यक्ति बहुत जल्दी ही थक और उब जाता है| मन पसंद आजीविका में कोई भी व्यक्ति काम नहीं करता हुआ होता है, बल्कि अपने मनपसंद के काम में आनंदित होता रहता है| जो अपनी इच्छा के विरुद्ध आजिविका करता है, चूँकि वह काम करता हुआ होता  है और इसीलिए वह काम से थक भी जल्दी जाता है| सम्यक आजीविका का यह सबसे महत्वपूर्ण बात है जिस पर लोग सबसे कम ध्यान देते हैं|

 

  6.सम्यक व्यायाम – व्यायाम का सामान्य अर्थ अभ्यास होता है| सम्यक व्यायाम का अभिप्राय है कि नैतिक एवं आध्यात्मिक उत्थान के लिए ज्ञानयुक्त प्रयत्न या प्रयास या अभ्यास करना है| अविद्या को नष्ट करने के प्रयास को ही सम्यक व्यायाम कहा जाता है| सम्यक व्यायाम के चार अवस्था है| पहला, आष्टांगिक- मार्ग विरोधी चित्त- प्रवृतियों की उत्पत्ति को रोकना| दूसरा, ऐसी चित्त- प्रवृतियों को दबाना जो उत्पन्न हो गई हो| तीसरा, ऐसी चित्त- प्रवृतियों को उत्पन्न करना, जो आष्टांगिक- मार्ग की आवश्यकताओं की पूर्ति में सहायक हो| चौथा एवं अंतिम, ऐसी उत्पन्न चित्त- प्रवृतियों में और भी अधिक वृद्धि करना तथा उनका विकास करना|

 

 इसी के अंतर्गत अहंकार, क्रोध, ईर्ष्या, आदि तृष्णाओ का दमन करना माना गया है| मन (चित्त) और मस्तिष्क (विचार) स्वस्थ्य शरीर में ही वास करता है| मन एवं शरीर को स्वस्थ्य रखने के लिए किया गया प्रयास, कर्म और गतिविधि सम्यक व्यायाम है| इन्हें मात्र सैद्धांतिक तौर पर पढ़ने से जीवन में सफलता का मिलना शुरू नहीं होता है, अपितु उसका सम्यक अभ्यास अर्थात सम्यक व्यायाम से ही इसे अपने जीवन में उतर कर सफलता पाई जा सकती है|  हर व्यक्ति अपने अचेतन अर्थात आदत से संचालित होता है| आदत में परिवर्तन करने के लिए सजग एवं सतत प्रयास कर अपने अचेतन स्तर पर बदलाव करना होता है| एक बार अचेतन स्तर पर बदलाव हो जाता है तो आदत में बदलाव हो जाता है| आदत में परिवर्तन होते ही सब कुछ अपने आप ही होने लगता है| जीवन में हर महत्वपूर्ण को सीखने के लिए सम्यक प्रयास यानि सम्यक व्यायाम करना होता है| यह अभ्यास तैरना सीखने या किसी स्वचालित वाहन को चलाने सीखना जैसा है जिसे प्रारम्भ में प्रयास कर अभ्यास करना होता है| फिर वह तैरने एवं वाहन चलने में अभ्यस्त हो जाता है|

 

  7.सम्यक स्मृति (सति) – स्मृति का अर्थ होता है याद रखना यानि चेतन अवस्था पर किसी चीज को ध्यान में रहना| यह मन की सतत जागरूकता का दूसरा नाम है| आदमी को विचारों के मस्तिष्क और मन में प्रवेश के लिए सजग चौकसी करनी पडती है| यदि एक व्यक्ति स्मृति में आए विचार की सचेतन चौकसी नहीं करेगा तो उस व्यक्ति के अचेतन में बेकार एवं फ़ालतू विचारों का जंगल फ़ैल जाएगा| विचार ही आदमी के अचेतन में बैठकर आदमी को संचालित करता रहता है| इसीलिए कल्याणकारी एवं विकासवादी बातों को ही स्मृति में रखा जाना चाहिए और बेकार, अनुत्पादक, अकल्याणकारी विचारों के अचेतन मस्तिष्क में प्रवेश की सजग एवं सतत चौकदारी करनी पड़ती है|

 

यह धम्म का सबसे महत्वपूर्ण भाग है| बौद्ध दर्शन में धम्म की परिभाषा में बताया गया है – धारेति ति धम्मों| जो धारण करने योग्य है वही धम्म है| अर्थात जो कुछ भी किसी का गुण है, स्वभाव है, वही उसका धम्म है| पानी का धम्म है शीतलता प्रदान करना, सतह पर बह जाना, पात्र में रखे जाने पर पात्र का स्वरुप को ग्रहण कर लेना| इसी तरह जो मानव को धारण करने योग्य गुण या स्वाभाव है, वही मानव का धम्म है| मानव का यह गुण एवं स्वभाव उसके सम्यक स्मृति से ही आता है| मानव प्रबुद्ध बने, कल्याणकारी बने, और अन्य ऐसे ही उपयोगी गुणों एवं स्वभावों से सम्पन्न  बने, यह मानव के सम्यक स्मृति से होता है| यही मानव का धम्म है| 

 

आज का विज्ञान का कहता है कि आप जिस भी चीज पर ध्यान देते है, उस पर आप उर्जा का प्रवाह सुनिश्चित करते है और इस तरह उसमे ऊर्जा बढ़ाते हैं| उर्जा मिलने से सभी चीजे बढती है| इसी तरह स्मृति में आए अनावश्यक एवं फिजूल की बातों पर ध्यान देकर उसे नहीं हटाने से इन बातों को ही उर्जा मिलती है और ये ही बातें मस्तिष्क यानि चेतन एवं अचेतन में बढती जाती है| इन अनुत्पादक, फजूल, बेकार की बातों और विचारों पर ध्यान देकर इनकी उर्जा प्रवाह को रोक कर ही सम्यक स्मृति बनाई जा सकती है| इसके लिए सम्यक व्यायाम करने से ऐसा करने की आदत बन जाती है और हम बिना मिहनत किए ही इन बेकार, फालतू एवं अनुत्पादक बातों को अचेतन में जाने से रोक देते हैं| यह आदत निर्माण में बहुत ही महत्वपूर्ण है|

 

  8.सम्यक समाधि – समाधि का अर्थ होता है केवल चित्त की एकाग्रता| एक व्यक्ति को जो सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प, सम्यक वाणी, सम्यक कर्मान्त, सम्यक आजीविका, सम्यक व्यायाम, और सम्यक स्मृति को प्राप्त करना चाहता है, उसके मार्ग में ये पाँच बाधाएं- लोभ, द्वेष, आलस्य, विचिकित्सा, तथा अनिश्चय आती है| सामान्य समाधि से वैसे ध्यानो को प्राप्त किया जा सकता है जिसके रहते एक व्यक्ति बाधा उत्पन्न करने वाली - लोभ, द्वेष, आलस्य, विचिकित्सा, तथा अनिश्चय – ये पांचो संयोजन से बचे रह पाते हैं या बंधन को स्थगित रख पाते हैं| लेकिन ध्यान की ये अवस्थाएं अस्थायी होती है| इसलिए संयोजन या बंधन भी अस्थायी तौर पर ही स्थगित रहते हैं| आवश्यकता है कि चित में स्थाई परिवर्तन लायी जाए| इस ध्यान में स्थाई परिवर्तन लाने की प्रविधि को ही सम्यक समाधि कहा  जाता है|

 

सम्यक समाधि एक भावनात्मक वस्तु है| यह मन को कुशल कर्मो यानि अच्छे कर्मो का एकाग्रता के साथ चिंतन करने का अभ्यास डालती है| इस प्रकार यह मन की संयोजनात्मक अकुशल कर्मो की ओर आकर्षित होने की प्रवृति को ही समाप्त कर देती है| चित्त में परिवर्तन कर चित्त को शांत एवं स्थायी करने की विधि सम्यक समाधि है| मानव की हर गतिविधि यानि दृष्टि, वाणी, संकल्प, कार्य, स्मृति आदि सभी मन के अधीन है यानि सोच के अधीन है| अत: मन पर नियंत्रण ही मुख्य है| सम्यक समाधि ही मन को नियंत्रित करने की सम्यक विधि है| सम्यक समाधि मन को हमेशा ही कल्याण एवं भलाई सोचने की आदत डाल देती है| सम्यक समाधि किसी भी व्यक्ति को यह शक्ति प्रदान करती है जिससे वह व्यक्ति कल्याणरत हो जाता है|   विपश्यना को सम्यक समाधि माना जाना चाहिए| 

 

 विश्व के हर सफल व्यक्ति के साथ ये सद्गुण अवश्य होता है; चाहे वह इसका नाम या इसके प्रवर्तक नाम जाने या नहीं जाने| इसे आप हर सफल व्यक्ति के जीवन में जांच सकते हैं| हमें भी इस पर मनन मंथन करना चाहिए|

 

निरंजन सिन्हा|

 

(निरंजन सिन्हा की प्रकाशनाधीन पुस्तक- “बुद्ध: दर्शन एवं रूपान्तरण” से )

 

 

 

रविवार, 16 अगस्त 2020

सामाजिक बुद्धिमता के सिद्धांत (एवं बुद्ध ) (Theory of Social Intelligence n Buddha)

 

 

सामाजिक बुद्धिमता के सिद्धांत (एवं बुद्ध )

(Theory of Social Intelligence n Buddha)

बुद्ध ने अपने समय के नव उदित समाजों के लिए बुद्धिमता को तो समझाया ही, भावनात्मक और समाजिक बुद्धिमता (Social Intelligence) की अवधारणा, सिद्धांत एवं सूत्र भी दिया जो व्यक्तिओ को समाज में अनुकुलन (Adapt) करने और महत्तम सफलता प्राप्त के लिए अनिवार्य था| यह आज भी उतना ही सान्दर्भिक है जितना उस समय था| उन्होंने सामान्य बुद्धिमता (सामान्य शिक्षा – General Intelligence, Intelligent Quotient- IQ) के साथ साथ भावनात्मक बुद्धिमता (Emotional Intelligence, Emotional Quotient- EQ) और सामाजिक बुद्धिमता (Social Intelligence, Social Quotient- SQ) पर भी जोर दिया| सामान्य बुद्धिमता सामान्य शिक्षा से आती है जिसे जानकारी भी कह सकते है| सामान्य शिक्षा से किताबों का ज्ञान मिलता है जिसे सूचना एवं जानकारी कहा जाता है| सामान्य बुद्धिमता वह बुद्धिमता है जिसके द्वारा ग्रहण की गयी बातों का आवश्यकतानुसार पुनरोत्पादन किया जा सके| आज भी अधिकतर समाजो में इसे बहुत ज्यादा महत्त्व दिया जाता है| बुद्ध ने अपने समय में ही सामान्य बुद्धिमता को महत्त्व देते हुए भी भावनात्मक एवं सामाजिक बुद्धिमता को महत्त्व दिया|

 

हर व्यक्ति अपने आप को  सुधारना चाहता है| अपने आप को सुधारने के लिए बुद्धिमता की आवश्यकता होती है| पहले बुद्धिमता में सिर्फ ज्ञान को ही महत्त्व दिया जाता रहा जो किताबों को पढ़ने और रटने से  मिलती है और शिक्षण संस्थानों में पढाई जाती है| इसे सामान्य बुद्धिमता कहा जाता है जिसे IQ से मापा जाता है| इस जांच में गणित, तर्क, समस्या समाधान इत्यादि को स्थान दिया गया है और यह सर्वमान्य भी है| यह चीजो को  पढ़ने, समझने और इसकी प्रयोगशीलता से संबधित होता है| संवेगात्मक यानि भावनात्मक बुद्धिमता में अपने और दुसरे के भावनाओं को समझता है| हमलोग इस धरती पर सबसे ज्यादा संवेदनशील एवं भावनात्मक प्राणी हैं|  IQ एक उम्र के साथ घटता है जबकि सामाजिक बुद्धिमता उम्र के साथ साथ बढ़ता जाता है| ये दोनों एक दुसरे को आधार प्रदान करते हैं यानि एक दुसरे को समर्थन देते हैं|  IQ एक बेहतर विचार देता है तो EQ एक बेहतर प्रदर्शन या उपलब्धि देता है| इसलिए व्यवहारिक जीवन में दोनों की आवश्यकता होती है| एक रोबोट में IQ भरा पड़ा होता है पर संवेदना नहीं होता| इसलिए वह उपयुक्त निर्णय नहीं ले पाता| बुद्ध इन दोनों बुद्धिमता को समझते थे और इसी कारण इन दोनों पर सामान रूप से ध्यान देने को कहते थे| विद्या ही सभी दुखो का नाश करता है तथा आष्टांगिक मार्ग ही सामाजिक जीवन में सफलता दिलाता है|

 

डेनिअल गोलमैन ने एक किताब लिखी जिसका नाम “भावनात्मक बुद्धिमता”(Emotional Intelligence) था| इसमे उन्होंने बताया कि किसी भी आदमी के मस्तिष्क के दो भाग है - एक जो सोचता है एवं चिंतन- मनन करता है, और दूसरा जो भावनाओं को संचालित एवं नियंत्रित करता है| सामान्य लोग इसे क्रमश: दिमाग और मन कहते है| किसी भी व्यक्ति के व्यवहार एवं कार्य को संचालित एवं नियंत्रित करने में भावना यानि संवेग प्रमुख रहता है| इसीलिए कहा जाता है कि भावनात्मक बुद्धिमता हमेशा तर्कशील बुद्धिमता पर हावी यानि प्रभावी रहता है|

 

भावनात्मक बुद्धिमता में अपनी भावनाओं के साथ साथ सामने वाले की भावनाओ को भी समझना और ध्यान रखना होता है| इसमें दुसरे की भावनाओं को समझना और अपनी भावनाओं को नियंत्रित करना होता है| इन्होंने संवेदनात्मक यानि भावनात्मक बुद्धिमता को समझने के लिए इसे पाँच भागों में समझाया है| इसमे आत्म- जागरूकता (Self- Awareness), भावनाओं यानि संवेदनाओं का प्रबंधन (Managing Emotions or Self – Regulation), स्व- अंत:प्रेरणा (Self- Inspiration). समानुभूति (Empathy), और अन्तर संबंधों का व्यवहार (Handling Relationship or Social Skill) आता है| इन्होंने खुद को जानने एवं समझने को आत्म- जागरूकता बताया है| आपकी कमजोरी क्या है, आपकी शक्ति क्या है, आपका लक्ष्य क्या है, आपकी भावनाएं कब भड़क जाती  है, दुसरे के संवेगों के प्रति आपके मन में क्या क्या होता है, इत्यादि को जानना ही आत्म- जागरूकता है| दुसरे के संवेगों को जानना एवं समझना और उसके अनुसार तथा उसके अनुकूल अपने व्यवहार को सम्हालना ही संवेगात्मक या भावनात्मक प्रबंधन है| इसे आत्म- नियंत्रण भी कहा जा सकता है| दुसरे के अनुसार अपने व्यवहार को अनुकूलित करने के लिए अपने संवेगों को नियंत्रित करना और दुसरे के अनुकूल अपनी संवेदनाओं को व्यक्त करना ही भावनात्मक प्रबंधन है| ऐसे लोग अपनी विपरीत परिस्थितियों एवं संकट से अपने को कुशलता से और आसानी से निकाल लेता है| ऐसे लोग हमेशा अपने लिए स्व- अंत:प्रेरणा पैदा करते हैं या स्वत अंत: प्रेरित करते रहते है या आत्म प्रेरित रहते हैं| आपकी  जैसी संवेगात्मक स्थिति होती है, आप वैसी ही संवेदनाओं का प्रसार करते हैं| आप प्रसन्नचित्त है तो सामने वाला भी प्रसन्नचित्त महसूस करने लगता है| यदि आप डरे हुए है, तो आपके पास का व्यक्ति भी डरा हुआ महसूस करने लगता है| समानुभूति में आपको दुसरे की संवेदनाओं और व्यवहार को समझ कर उससे गहरी संवेदना व्यक्त करना और साथ देना होता है| समानुभूति मे आप अपने आप को सामने वाले की स्थिति में रख कर उसकी भावनाओं को समझने का प्रयास करते है| उपरोक्त बातों को समझ कर आपसी संबंधों को स्थापित करना ही अंतर संबंधों का व्यवहार है| इसे सामाजिक कुशलता भी कह सकते हैं| ऐसे लोग सफल नेतृत्वकर्ता होते है और लोग उनको काफी पसंद करते है| ऐसे लोग व्यतिगत जीवन में काफी सफल होते हैं| आप बुद्ध के आष्टांगिक मार्ग के सार में यही पाएँगे|

 

ध्यान दें कि बुद्धिमता कोई जन्मजात गुण नहीं होता है और यह न ही योग्यता है, यह तो कुशलता है जो सीखी जाती है| सामाजिक बुद्धिमता में जागरूकता (Awareness) होता है जो यह बताता है कि आपके अन्दर क्या चल रहा है| सामाजिक बुद्धिमता के दुसरे हिस्से में समस्वरता (Attunements) होता है जो दूसरों का अवलोकन करने और उसकी समानुभुतिक व्याख्या करने से सम्बधित है| सामाजिक बुद्धिमता में  अनुकुलनता (Adaptibility) भी होता है जिसमे पहले दोनों भागों (सामान्य बुद्धिमता एवं भावनात्मक बुद्धिमता) का  रचनात्मक एवं उत्पादक प्रयोग करना होता है| कार्ल अल्ब्रेच ने “सामाजिक बुद्धिमता” (Social Intelligence) नाम की एक किताब लिखी जिसे सफलता का नया विज्ञान (The New Science of Success) बताया| इसमे भी जागरूकता, स्पष्टता, समानुभूति, समस्वरता और अनुकुलनता को ही बताया गया है जो बुद्ध के सामाजिक सिद्धांतो का ही सार है|

 

यदि आप बुद्ध की सामाजिक बुद्धिमता और संवेदनात्मक यानि भावनात्मक बुद्धिमता की शिक्षाओं का अध्ययन करते हैं तो पाते हैं कि बुद्ध ने इन बातों को बहुत बढ़िया ढंग से समझाया है| विपश्यना आत्म- अवलोकन करने एवं आत्म- जागरूकता को  जानने समझने की ही प्रविधि है| इससे आप अपने को बहुत गहराई से जानने और समझने लगते हैं| यह आत्म- जागरूकता का अब सर्वमान्य तकनीक है| सम्यक दृष्टि रखना भी आत्म- जागरूकता है| जहाँ तक अपने संवेगों का समुचित प्रबंधन करने का प्रश्न है, बुद्ध ने सम्यक कर्मान्त और सम्यक वाणी का सिद्धांत दिया था| सम्यक कर्मान्त में दुसरे की संवेदनाओं और भावनाओं का ही ख्याल रख कर ही काम या व्यवहार करने की शिक्षा दी गयी है|  सम्यक व्यायाम और सम्यक आजीविका करने वाला व्यक्ति हमेशा ही स्वत- प्रेरित रहता है| इसके साथ सम्यक दृष्टि भी होता है जिससे वह विपरित परिस्थितियों में भी हताश या उदास नहीं होता और कभी अवसाद की स्थिति में नहीं जा पाता है| समानुभूति (Empathy) उस व्यक्ति में होता है जो प्रज्ञावान होता है, जो शीलवान होता है, जिसमे प्रेम एवं करुणा होता है, जिसमे मैत्री होता है और जिसमे समानता का भाव होता है| सम्यक वाणी और सम्यक कर्मान्त व्यक्तिगत एवं सामाजिक संबंधों का मुलभुत आधार होता है| इस तरह स्पष्ट है कि बुद्ध ने भावनात्मक बुद्धिमता के सूत्र या संकेत ही नही दिए अपितु स्पष्ट सिद्धांत भी दिए हैं|

 

बुद्ध ने जीवन मार्ग को सुगम बनाने के लिए कई सूत्र दिए| उन्होंने बताया कि प्रत्येक को शुभ कार्य करना चाहिए और पाप कर्म से बचना चाहिए| इसे समझाते हुए कहा कि जिस काम को करने के बाद आदमी को पछताना नहीं पड़े और जिसके फल को वह आनंदित मन से भोग सके, वही कार्य शुभ है| कामुकता से दुःख पैदा होता है और कामुकता से भय भी पैदा होता है| उन्होंने लोभ एवं तृष्णा से बचने को कहा| जिन्हें किसी से आसक्ति नहीं हो और जिन्हें किसी से घृणा नहीं हो, वे बंधन मुक्त हैं| किसी को वाणी एवं व्यवहार से क्लेश मत दो और किसी से द्वेष मत रखें| शत्रुता को मैत्री से जीतों| क्रोध नहीं किया जाए| सबसे बड़ा दुर्गुण अविद्या है| बुद्धिमान को इस बारे में सचेत रहना चाहिए कि वह कोई ऐसा अवसर किसी को नहीं दे कि कोई दूसरा उसे कोई अनावश्यक बात कहे| उन्होंने न्यायशील बनने को कहा| उन्होंने संगति का महत्त्व समझाते हुए कहा कि किसी को भी अपनी संगति अच्छे व्यक्तियों के साथ रखना चाहिए| जो व्यक्ति जैसा संगति रखता है, वह भी वैसा ही बन जाता है| कहा जाता है कि एक तरह के पंछी एक साथ रहते और उड़ते हैं| यदि किसी आदमी को अपने से श्रेष्ट या अपने समान साथी नहीं मिले तो उसे अकेले ही जीवन पथ पर आगे बढ़ना चाहिए| मुर्ख की संगति देर तक कष्ट देती है| एक मुर्ख की संगति में उसकी मुर्खता  कब दुसरे पर हावी हो जाती है और उसे संचालित करने लगाती है; उसे पता ही नहीं चलता| एक बुद्धिमान व्यक्ति के पास सत्य होता है, शील होता है, करुणा होता है, संयम होता है, शुद्धि होता है और बुद्धि होता है| हमें प्रत्येक कार्य करते समय जागरुक रहना चाहिए| बुद्ध ने स्पष्ट कहा कि हम जो कुछ हैं, यह सब कुछ हमारे विचारों का ही परिणाम है; यह हमारे विचारों पर ही आधारित है, यह हमारे ही विचारों से निर्मित है| विचार की निरंतरता ही समय के साथ वस्तु बन जाती है| यदि हम अपने को बदलना चाहते हैं तो हमें आज से ही अपने विचारों को बदल देना चाहिए|

 

उन्होंने भूख और गरीबी को सबसे बड़ा रोग बताया|  गरीबी से दुःख पैदा होता है लेकिन यह आवश्यक नहीं कि गरीबी दूर हो जाने से ही आदमी सुखी भी हो ही जाए| सुख का आधार ऊँचा जीवन- स्तर नहीं है अपितु ऊँचा आचरण का स्तर होना चाहिए| स्वास्थ्य सबसे बड़ा लाभ है, संतोष सबसे बड़ा धन है, विश्वास सबसे बड़ा रिश्तेदार है और निर्वाण सबसे बड़ा सुख है| ढोंग से बचना चाहिए क्योंकि यह लम्बे समय में छवि ख़राब कर देता है| सर्वश्रेष्ट मार्ग माध्यम मार्ग ही है| किसी दूसरों की आलोचना से विचलित नहीं होना चाहिए क्योंकि आलोचक अपने नजरिये से ही किसी का मूल्यांकन करता है परन्तु उनमे कोई सुधारात्मक सुझाव दिखे तो अनुपालन भी होना चाहिए| किसी भी सफलता का कोई छोटा मार्ग नहीं होता और व्यक्ति को इसके लिए स्वयं प्रयास करना होता है; दूसरा कोई भी सिर्फ मार्ग दर्शक ही हो सकता है|

 

आज के शोधों से स्पष्ट है कि किसी की सामाजिक सफलता या व्यक्तिगत सफलता में उनके सामान्य बुद्धिमता का हिस्सा 20% तक होता है तथा संवेदनात्मक या भावनात्मक बुद्धिमता का हिस्सा 80% तक होता है| व्यक्तिगत सफलता भी समाज में ही मिलती है क्योंकि व्यक्ति एक सामाजिक प्राणी है| आज के शिक्षा पद्धति के अनुसार सामान्य बुद्धिमता का अर्थ होता है सामान्य शिक्षा जो आज के विद्यालयों और महाविद्यालयों में पढाया जाता है| इसमे ज्यादा अंक लाने वाले को नौकरियां मिलती है और शैक्षणिक उपाधियां भी मिलती है| भारत में वर्तमान शिक्षा पद्धति में “क्या” (What) पढाया जाता है जो सिर्फ सूचनाओं एवं जानकारियों से भरा पड़ा होता है| संवेदनात्मक एवं भावनात्मक बुद्धिमता में “क्यों” (Why) और “कैसे” (How) पढाया जाता है|

 

जीवन में सफलता के लिए अन्य दोनों (सामान्य बुद्धिमता एवं भावनात्मक बुद्धिमता) से महत्वपूर्ण है- सामाजिक बुद्धिमता| सामाजिक बुद्धिमता समाज की भावनाओं को जानना और समझना है और इसी कारण इसमें सामाजिक परिवर्तन के अनुसार अनुकूलित करने की क्षमता है| भावनात्मक बुद्धिमता जहां वर्तमान से संबंधित है, वहीं सामाजिक बुद्धिमता भविष्य से संबंधित है| इनका आष्टाँगिक मार्ग और दस प्रज्ञा पारमिताएं का अनुपालन ही सामाजिक बुद्धिमता है| आष्टाँगिक मार्ग को अलग से विस्तारपूर्वक बताया गया है जो सामाजिक बुद्धिमता को रेखांकित करता है|  इनके इन तरीकों को ही आज सामाजिक बुद्धिमता कहा जाता है| इसलिए बुद्ध को  सामाजिक बुद्धिमता का प्रथम प्रवर्तक कहा जा सकता है|

 

निरंजन सिन्हा

व्यवस्था- विश्लेषक एवं चिन्तक

(निरंजन सिन्हा की प्रकाशनाधीन पुस्तक- “बुद्ध: दर्शन एवं रूपांतरण” से )

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