शनिवार, 26 सितंबर 2020

रूपान्तरण की प्रक्रिया : एक उदहारण- गया नगर

मैं संस्कृतियों के रूपांतरण प्रक्रिया का अध्ययन कर रहा था| इस प्रक्रिया को समझने में बिहार की मोक्ष नगरी – गया का एक उदहारण आपके समक्ष रखता हूँ|

आप एक और उदहारण गया नगर (बोधगया नहीं) के पितृपक्ष पक्ष मेला के आयोजन से समझें| गया गोतम बुद्ध के ज्ञान प्राप्ति की नगरी है जो बोधगया के नाम से प्रसिद्ध है और वर्त्तमान गया के पास है| वर्तमान गया का अद्यतन स्वरुप सामन्त काल यानि मध्य काल में आया| गया नगर में एक बड़ा मेला सम आयोजन होता है जिसमे हिन्दू संस्कृति के लोग अपने पुरखों को पिंडदान एवं तर्पण अर्पित करते हैं| यह समय सामान्यत: बरसात के महीने के बाद का अगला माह है जो आश्विन के नाम से जाना जाता है| यह विक्रम पंचांग का एक महीना है| इस पिंडदान एवं तर्पण से पुरखों को मोक्ष (पुनर्जन्म से मुक्ति) मिलती है| हिन्दू संस्कृति में शूद्रों अर्थात सेवकों की संख्या समाज में 90 % से अधिक है और सामान्यत: उनका जीवन कष्टमय रहता है| इसलिए आध्यात्म में जीवन का कष्टमय होना एक सामान्य बात होना बताया गया और इसे धार्मिक स्वीकृति भी मिली हुई है| लोगों को इससे सहमत कराया गया कि मानव का जीवन  कष्टमय होता ही है और इससे कोई नहीं बचता| इससे इस कष्टमय जीवन से किसी को आपत्ति नहीं होती है (चूँकि यह सामान्य जीवन का एक भाग है) और इसीलिए वे दूसरों के भी जीवन में सुख नहीं समझ पाते हैं एवं देख भी नहीं पाते| वे पिंडदान एवं तर्पण कर अपने पुरखों को पुनर्जन्म से मुक्त करते हैं और पुरखों का तथाकथित कल्याण करते हैं| इन कारणों से गया को मोक्ष नगरी भी कहा गया है|

दरअसल गया बुद्ध की नगरी के रूप में उस समय ज्ञात विश्व में प्रसिद्ध रहा और आज भी है| लोग बुद्ध के ज्ञान प्राप्ति के कारण वैशाख पूर्णिमा को ज्ञान- प्राप्ति दिवस एवं आषाढ़ पूर्णिमा को प्रथम प्रवचन के दिन को ज्ञान प्रसार दिवस के रूप में मानते एवं मनाते हैं| इसके बाद मानसूनी बरसात का समय आ जाता है| इस बरसात के बाद ही आश्विन माह आता है जिसमे लोग भारत एवं विश्व के विभिन्न भागों से बुद्ध स्थल के दर्शन को आते रहे| समूह में व्यापक पैमाने पर आना सामन्त काल में भी नहीं रुका जो सामन्तवादियों के लिए चिंता का विषय रहा| निरंजना नदी में स्नान के बदले लोगों को फल्गु नदी में स्नान करना मनाया एवं बनाया गया| बोधगया जाने वाली समूह को दस किलोमीटर पहले ही रोक दिया गया| बुद्ध के स्थान पर गया में एक असुर (दुष्ट राक्षस) बनाया गया जिसका नाम “गया का असुर” (गयासुर) रखा गया| आप समझ गए होंगे कि वह गया का असुर कौन है जिससे वे सामन्तवादी बहुत परेशान थे? सामंत काल में एक मन्दिर भी बनाया गया जो विष्णुपद मन्दिर के नाम से ख्यात है| बुद्ध को विष्णु का भी अवतार बनाया गया| “गया” नगर से सामन्तवादियों को इतनी चिढ है कि गया नगर से गुजरने वालो को आज भी निकृष्ट समझा जाता है; आज भी “गया गुजरा आदमी” निकृष्ट आदमी को कहा जाता है| गया क्षेत्र जिसे मगह या मगध कहा जाता है और आज भी बहुत से लोग इसीलिए गंगा के  दक्षिण किनारा (मगह को छूती किनारा) को अपवित्र मानते हैं| परम्परा से लोग अपना दाह संस्कार उत्तरी किनारा पर ही करना पसंद करते हैं|

यह भी परम्पराओं के रूपांतरण का सर्वश्रेठ उदहारण है| जब लोग अपनी मौलिक एवं सनातन (प्रारम्भ से चली आ रही वर्त्तमान तक की) परंपरा को नहीं छोड़ते हैं तो सामन्तवादी ने अपनी इच्छानुसार उस परंपरा में विरूपण कर मूल भाव को नष्ट कर देते है| इसे लोग समझें कि रूपांतरण की प्रक्रिया कैसे काम करता है?|

निरंजन सिन्हा

व्यवस्था विश्लेषक एवं चिन्तक

www.niranjansinha.com

(“बुद्ध: दर्शन एवं रूपांतरण” से)

मंगलवार, 15 सितंबर 2020

17 सितम्बर : पेरियार या विश्वकर्मा ?

हमारे भारत में “सांस्कृतिक साम्राज्यवाद” (Cultural Imperialism) इस तरह हावी है, या प्रभावी है कि यहाँ कोई चीज भी ‘साम्राज्यवाद’ के इस रूप में भी प्रचलित है कि किसी को इस पर विश्वास भी नहीं होता है| और इस ‘साम्राज्यवाद’ की कार्यप्रणाली भी ऐसी सूक्ष्म होती है कि अक्सर किसी भी भावना, विचार, व्यवहार या कर्म का मूल उद्देश्य भी हमें नहीं दिखता है। हमलोग साधारणतया बिना किसी आलोचनात्मक विश्लेषण एवं मूल्याङ्कन के और बिना समझे ही किसी परम्परा को धूमधाम से मनाने लगते हैं। हालाँकि यदि कोई परम्परा अपने ‘धार्मिक स्वरुप’ में रहती है, या दिखती है, तो इसका विश्लेषण एवं मूल्याङ्कन करना कठिनतर हो जाता है|

‘17 सितम्बर’ की कहानी भी ऐसी ही है। इस दिन मानवता के महान भारतीय नायक ‘पेरियार रामा स्वामी’ का जन्मदिन है| और इसी दिन भगवान विश्वकर्मा का जन्म दिन का त्योहार भी है| इन्हें हिन्दू देवता माना जाता है, जो भवन निर्माण एवं अन्य अभियंत्रण आदि के देवता हैं। आज के संदर्भ में कहें, तो ये सिविल इंजीनियरिंग सहित अन्य इंजीनियरिंग (अभियंत्रण) के देवता हुए। तो मूल प्रश्न यह उठता है कि इन दोनों में सबसे प्राचीन परम्परा कौन है और क्यों है? क्या भगवान विश्वकर्मा की जन्मोत्सव की परम्परा अति प्राचीन है, या रामा स्वामी पेरियार का जन्म पहले हुआ था? बहुत से लोगों का मानना है कि ‘पेरियार रामा स्वामी’ के जन्मोत्सव की बढती लोकप्रियता से चिंतित बौद्धिकों ने इनके कार्यों के कारण और इसके बाद ही भगवान विश्वकर्मा  के जन्मोत्सव की परम्परा शुरू की गई? 

 यह एक ऐसा अध्ययन है जिससे हम मध्य काल एवं आधुनिक वर्तमान काल में शुरू की गई अनेक परम्पराओं का आलोचनात्मक विश्लेषण एवं मूल्याङ्कन करके उनकी वास्तविकता को समझ सकते हैं| इसके ही साथ हम ‘सांस्कृतिक साम्राज्यवाद’ की सूक्ष्म कार्यप्रणाली और क्रियाविधि को भी समझ सकते हैं| 15 सितम्बर को ही इंजीनियर्स (अभियंता) दिवस मनाते हैं। इस दिन आधुनिक भारत के महान अभियंता श्री मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया का जन्म दिन है, जो 15 सितम्बर को ही वर्ष 1861 में जन्म लिए। फिर दो ही दिन बाद 17 सितम्बर को एक गैर ऐतिहासिक व्यक्तित्व “भगवान विश्वकर्मा” का जन्म दिन को मनाने की आवश्यकता क्यों पडी? गैर ऐतिहासिक व्यक्तित्व का अर्थ हुआ कि इनको किसी भी इतिहास की पुस्तकों में कोई स्थान नहीं दिया गया है यानि कोई विवरण नहीं दिया गया है, यानि इनका कोई ऐतिहासिक अस्तित्व ही नहीं रहा है|

भगवान विश्वकर्मा का यह जन्म दिन एक ऐसा जन्मदिन है, जो विक्रम संवत या शक संवत पर आधारित नहीं होकर, ग्रेगेरियन पंचांग (अंग्रेजी कैलेण्डर) पर पूर्णतया आधारित है। अर्थात इनका जन्म किसी विक्रम संवत या शक संवत के महीने एवं तिथि के अनुसार नहीं होता है| इस “भगवान विश्वकर्मा” के अलावा हिन्दू संस्कृति में कोई भी ऐसा त्योहार नहीं है, जो ग्रेगेरियन पंचांग पर आधारित है| मकर संक्रांति यानि ‘तिलवा सक्रांत’ भी ग्रेगेरियन पंचांग में वर्षों बाद धीरे-धीरे बदलता रहता है, पर यह विश्वकर्मा जयंती यानि पूजा की तिथि ग्रेगेरियन पंचांग में नहीं बदलता। यह सदैव 17 सितंबर को ही मनाया जाता है। लगता है कि विश्वकर्मा के पूजन का इतिहास या अस्तित्व इतिहास भी एक शतक से ज्यादा पुराना नहीं है। कोई अन्य ऐतिहासिक प्रसंग उपलब्ध नहीं है। ऐसा लगता है कि भगवान विश्वकर्मा  का जन्म दिन और पूजन किसी खास उद्देश्य से स्थापित किया गया है।

17 सितम्बर 1879 को ही भारत में एक महान क्रान्तिकारी सामाजिक सांस्कृतिक आन्दोलन के जनक का जन्म दिन है, जिनका नाम ईरोड वेंकटप्पा रामासामी (ई० वी० रामास्वामी) था, जो “पेरियार” (हिंदी में ‘सम्मानित’) के नाम से प्रसिद्ध हुए। इस क्रांतिकारी व्यक्तित्व ने भारत में व्याप्त ‘सांस्कृतिक साम्राज्यवाद’’ के ढोंग, पाखण्ड, अन्धविश्वाश एवं अत्यधिक कर्मकांड पर करारा असरदार प्रहार किया। इन्होने ‘न्याय’, स्वतंत्रता’, ‘समता’ एवं ‘बंधुत्व’ के पक्ष में यानि ‘मानवता’ के लिए आन्दोलन किया| इस तरह ‘पेरियार’ जैसे इस महान व्यक्तित्व के सम्मान में इनका जन्म दिन एक सम्मान समारोह के रूप में आयोजित किया जाने लगा। इनके सम्मान समारोह पर ‘सांस्कृतिक साम्राज्यवादियों’ यानि ‘धार्मिक सामंतों’ को बहुत बुरा लगा। ‘समता’ के सिद्धांत एवं व्यवहार को ‘अंत’ करने वाली व्यवस्था यानि ‘समता’ + ‘अंत’ यानि ‘सामन्त’ व्यवस्था के लाभार्थियों को बहुत बुरा लगा| इसी कारण ‘पेरियार’ जैसे इस महान व्यक्तित्व के सम्मान को विलोपित करने के लिए ही इनके सादृश्य व्यक्तित्व को दुसरे नाम से प्रस्तुत किया गया|

आप पेरियार साहब के ‘मुखाकृति’ को देखिए| इनका चेहरा, दाढ़ी, मूंछ आदि देखें और तथाकथित भगवान विश्वकर्मा जी को देखें; आप उन दोनों की समानता देख अचंभित हो जाएंगे| आप सोचने और इस निष्कर्ष पर पहुँचने को विवश हो जाएंगे कि पेरियार जी और भगवान विश्वकर्मा में अद्भुत समानता है। ऐसा क्यों हुआ? आप विचार करें। 

मूल प्रश्न यह है कि 17 सितंबर को भगवान विश्वकर्मा जी का जन्म दिन है, या पेरियार का जन्म दिन है, या इन दोनों का? वैसे दाढ़ी मूंछ वाले भारतीय देवता बहुत ही कम हैं या नहीं ही है। आप भी इनसे समानता कर उस महान व्यक्तित्व पेरियार जी का जन्मदिन धूमधाम से मना सकते हैं और सांस्कृतिक नवनिर्माण के देवता के रूप में स्थापित कर सकते हैं।

मैं सिर्फ विचारों के युवाओं से अनुरोध करता हूं, कि वे विचार करें कि क्यों नहीं 17 सितम्बर को “सांस्कृतिक नव निर्माण” के अग्रदूत पेरियार का जन्म दिन मनाया जाय? 

आज ही के दिन श्रीलंका के श्री डान डेविड हेवावर्तना का भी जन्म दिवस है, जो अनागरिक धम्म पाल के नाम से विख्यात हुए। ये भारत में महाबोधि सोसायटी के संस्थापक हुए और भारत में बौद्ध जीवन दर्शन के पुनर्रोधारक हुए। इन्होंने ने ही विश्व धर्म सम्मेलन (World’s Parliament of Religions, शिकागो, 1893) में स्वामी विवेकानंद को भाषण दिलाने में अहम भूमिका निभाई और यह भाषण ऐतिहासिक भी हुआ। 

मैंने सिर्फ विमर्श और मंथन के लिए सामग्री दिया है। इसका उपयोग आप पर निर्भर करता है।

 आचार्य प्रवर निरंजन जी

दार्शनिक, शिक्षक और लेखक।


शनिवार, 5 सितंबर 2020

बुद्ध का उदय: क्यों? (Emergence of Buddha: Why)

बुद्ध की परंपरा के साक्ष्य सिन्धु घाटी सभ्यता में भी मिली है| इसका यह अर्थ हुआ कि नव उदित नगरीय समाजों और राज्यों  के सम्यक विकास के लिए सम्यक दर्शन की खोज सिन्धु घाटी सभ्यता के समय में भी रहा और इसके पहले भी इसका खोज जारी रहा| समाज में बदलाव, वृद्धि एवं विस्तार के होने के साथ ही सम्यक दर्शन की खोज जारी था|

मानव और उसके समाज का प्रकृति में हस्तक्षेप तथा इसके परिणामस्वरूप विकास या रूपांतरण का ब्यौरा ही इतिहास कहलाता है| इतिहास (History) को अतीत का लिखित दस्तावेज के रूप में परिभाषित किया गया है| चूँकि इतिहास को अतीत का लिखित दस्तावेज कहा गया है, इसलिए इसके अलिखित या लिखित एवं अपठनीय दस्तावेज का भी वर्गीकरण इसी के आधार पर किया गया| अलिखित इतिहास को प्राक- इतिहास (Pre- History) कहा गया| जिस काल का लिखित दस्तावेज तो मिला परन्तु उसको पढ़ा नहीं जा सका, उस काल के इतिहास को आद्य इतिहास (Proto- History) कहा गया, जैसे सिन्धु घाटी सभ्यता| इसको दुसरे शब्दों में उत्पादन, वितरण, विनिमय एवं उपभोग के साधनों एवं शक्तियों के आधार पर भी वर्गीकृत किया गया| पाषाण काल को प्राक- इतिहास, ताम्र या कांस्य काल को आद्य- इतिहास और लौह काल को इतिहास कहा गया|

मानव के उद्विकास में मानव की कई प्रजातियाँ अवतरित हुई| मानव की कुछ प्रमुख प्रजाति  ऑस्ट्रेलोपिथेकस, नियंडरथल, होमो इरेक्टस समय के साथ समाप्त हो गई और होमो सेपिएंस (बुद्धिमान मानव, प्रबुद्ध मानव) ही आज तक जीवित बचे है जिनके वंशज हम सभी मानव हैं| पाषाण काल फल- कंद संग्राहक और शिकारी समाज का इतिहास रहा| आग एवं पहिया महत्वपूर्ण आविष्कार हो  गया था, जो उत्पादन की शक्तियों को प्रभावित कर रहा था| समय के साथ धातुओं ने पाषाण का स्थान लेना शुरू कर दिया था| सबसे पहले ताम्बा का प्रयोग हुआ, फिर इसे कडा कर इसकी उपयोगिता बढाने के लिए इसमे जस्ता और टिन मिलाया जाने लगा| इसे कांस्य (Bronze) मिश्र धातु (alloy) कहा गया| यह समय तीन हजार ईसा पूर्व का है| इस धातु युग के साथ ही कृषि और पशुपालन का सम्यक विकास हुआ| स्थाई आवास, मिश्रित अर्थव्यवस्था, सामाजिक समूह की निरंतर आवश्यकता, कृषि और पशुपालन एक दुसरे से गुंथे हुए थे और यह सब इस काल की प्रमुख विशेषता हो गई| इससे अलग ढंग का सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का विकास एवं बदलाव होने लगा| कृषि और पशुपालन से खाद्य पदार्थों का अतिरिक्त उत्पादन होने लगा, जिससे इस क्षेत्र में निवास करने वाले लोगों के अतिरिक्त अन्य लोगों के लिए भी भोज्य पदार्थ उपलब्ध होने लगे| विभिन्न किस्म के खाद्यान्न और पशु उत्पाद (घी, बाल, चमड़ा, सींघ, हड्डी) का संग्रहण, परिवहन और भंडारण शुरू हो गया| इस तरह  शिल्प, शासन, शिक्षा, चिकित्सा, सेवा, व्यापार और सुरक्षा में लगे लोगों का भरण- पोषण होने लगा| नगरों का उदय होने लगा और राज्यों के आदिम अवस्था स्वरुप में आने लगे| समय के साथ साथ लौह का उपयोग बढ़ता गया और इसने अपनी उपयोगिता में कांस्य को भी प्रतिस्थापित कर दिया| लोहा में कई ऐसे गुण हैं, जिससे यह कांस्य से कई मायनों में बेहतर साबित हुआ|

कोई लगभग एक हजार ईसा पूर्व में लोहा का उपयोग बढ़ गया| लोहा की सबसे प्रमुख विशेषता यह थी कि यह प्रचुर मात्रा में उपलब्ध था और सुलभता के साथ सर्व व्यापक भी था| इसके (लोहा के) मिश्र - धातु लोहा से अथिक कडा होते हैं और इसी कारण इसकी उपयोगिता और बढ़ जाती है| लोहा की उपलब्धता सर्वव्यापक थी यानि सभी क्षेत्रों में उपलब्ध रही| लोहा को किसी भी रूप में ढाला जा सकता है| लोहा के उपयोग से गहरी जुताई और बेहतर सिंचाई का प्रबंधन होने लगा, जिससे कृषि का उत्पादन काफी बढ़ने लगा| लोहा के उपयोग से परिवहन के बेहतर साधन का उत्पादन होने लगा| बेहतर नावों  एवं बेहतर गाड़ियों के निर्माण में लोहे के मजबूत उपकरण, कील, बंध, आदि का उपयोग बढ़ने लगा| लोहे के उपयोग ने बेहतर और विविध युद्ध के हथियार दिए| लोहा प्रकृति में ज्यादा हस्तक्षेप करने में सक्षम बनाया| पहाड़ो को काटना और पत्थरों को छांटना सुगम हो गया| जंगलों को साफ़ करना और खेतों से अनावश्यक पदार्थों को हटाने में भी लोहा अपेक्षाकृत ज्यादा उपयोगी साबित हुआ|

ई० पू० चौथी एवं तीसरी सहस्त्राब्दी से उत्तरी अफ्रीका के मिश्र, एशिया के भारत, इराक, एवं चीन तथा दक्षिण-पूर्वी यूरोप के यूनान में नव- पाषाण की ग्राम- संस्कृति से नदी- घाटी सभ्यता का उदय प्रारम्भ  हो गया था| इस तरह मानव सभ्यता प्रागैतिहासिक काल से आद्यएतिहासिक युग में प्रवेश करना शुरू कर दिया| शिल्प अब कृषि काअभिन्न भाग नहीं होकर स्वतंत्र आर्थिक प्रक्षेत्र के रूप में उभरने लगा| छोटी- बड़ी बस्तियों के बीच नगरों का उदय होने लगा| उसी समय एक नए सामाजिक एवं राजनीतिक संस्था “राज्य” का प्रदुर्भाव होने लगा और विकसित होने लगा था| इसी समय लेखन कला एवं सम्बंधित सामग्रियों का भी विकास होने लगा| मानव पहली बार फुर्सत के क्षणों में अपने सोंच पर सोचना शुरू दिया, यानि अपने सोच पर विचार, विमर्श एवं चिंतन- मनन की प्रक्रिया प्रारंभ कर दिया| शिक्षा की आवश्यकता सामाजिक रूप में स्वीकार्य हो गया और इसके लिए प्रयास भी शुरू हो गए|

पाषाण काल जहाँ पत्थरों के स्रोतों पर निर्भर था और इसी कारण पहाड़ो की निकटता इसकी अनिवार्यता रही; वही नई संस्कृति नदी घाटी क्षेत्रों में मौजूद थी, जो नदी एवं समुद्री मार्गों से जुड़ा हुआ था| नदी घाटी क्षेत्र में समतल मैदान, उपजाऊ मिट्टी की प्रचुरता, पानी की सालों भर उपलब्धता एवं परिवहन की सुगमता कृषि और पशुपालन के सर्वथा अनुकूल रही| समतल मैदान हिंसक पशुओं के लिए सर्वथा अनुकूल नहीं होता है| समतल मैदान, सदाबहार नदियाँ, समुद्र तक नदियों तक पहुँच परिवहन को बहुत ही उपयुक्त बनाते हैं| इससे कृषि और पशुपालन का उत्पादन बहुत बढ़ गया| अधिशेष (Excess) एवं अतिरिक्त (Additional) उत्पादन, इस उत्पादन का आसान परिवहन, इन उत्पादों का लम्बे समय तक भंडारण ने अर्थव्यवस्था के द्वितीयक प्रक्षेत्र, तृतीयक प्रक्षेत्र, चतुर्थक प्रक्षेत्र एवं पंचक प्रक्षेत्र को जन्म दिया| परिवहन और व्यवसाय का समुचित विकास हुआ| साहित्य और शिक्षित समाज का उदय हुआ| नव उदित सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक, एवं आर्थिक गतिविधियों के लिए नए दर्शन की आवश्यकता तीव्रता से महसूस की जाने लगी| इसी नई आवश्यकता को बौद्धिक क्रान्ति भी कहा जाने लगा| इसी क्रम में बुद्धि और बुद्धिमानों का महत्त्व बढ़ने लगा| यह संज्ञानात्मक क्रान्ति का प्रतिफल था| यह विकास लोहे विकास के साथ साथ तेज होता गया| इसी कारण कई बुद्धिमान मानवों यानि बुद्धों की आवश्यकता हुई|

इन बुद्धों का क्या काम रहा? इन्हें समाज के आर्थिक अवस्था के चतुर्थक  एवं पंचक स्तर पर कार्य करना था| बौद्ध परम्परा के अनुसार यह कहा जाता है कि गोतम बुद्ध के समय सिर्फ गंगा के मैदान में ही  62 दर्शन प्रचलित थे और जैनियों की परंपरा में 263 दर्शन प्रचलित थे| मेरे कहने का यह अर्थ है कि उस समय सामाजिक, आर्थिक, राजनितिक, और सांस्कृतिक सूचनाओं का संग्रहण, वर्गीकरण, विश्लेषण के आधार पर नए निष्कर्ष निकाले जा रहे थे और नए सिद्धांत गढ़ने के प्रयास किए जा रहे थे, जो अर्थव्यवस्था का चौथा प्रक्षेत्र है| कुछ दार्शनिक तो इसके साथ साथ इन सूचनाओं एवं सिद्धांतो को एक नए दृष्टिकोण से देखने का प्रयास कर रहे थे| इन सूचनाओं एवं सिद्धांतो को नए पुनर्विन्यास (Re- Orient), नए पुनर्व्यवस्थापन (Re-Arrange) और नए पुनर्गठन (Re- Structure) करके नया स्वरुप देने में लगे हुए थे|

उस समय ह्वांगहो नदी घाटी में कन्फयुशिस और लाओत्से, दजला- फरात नदी घाटी में जरथ्रुष्ट, यूनान में पायथागोरस आदि इसी प्रयास में लगे हुए दार्शनिक विद्वान् थे| भारत मे इस परम्परा को बुद्ध का परम्परा कहा जाता था, अर्थात भारत में ऐसे प्रयासों के सफल माने जाने वाले दार्शनिकों को बुद्ध की उपाधि दी जाती रही|

ऐसे ही समय में गोतम का अवतरण हुआ, जो बुद्ध भी हुए | इन्होंने अपनी प्रथामिक एवं माध्यमिक शिक्षा अपने गणराज्य के शिक्षकों से प्राप्त की थी| ख्याति प्राप्त एवं उच्च स्तर के शिक्षको की उपलब्धता राजकीय परिवारों के बच्चों को आसानी से उपलब्ध रही; भले ही साहित्यिक रचनाकारों ने इन सामान्य बातों को असामान्य ढंग से अपने विद्वतापूर्ण वर्णन में स्थान नहीं दिया हो| इन प्राथमिक  एवं माध्यमिक शिक्षा के उपरान्त इनको उच्चतर अध्ययन की लगन रही| इसी समय रोहिणी नदी के जल विवाद ने इन्हें एक उपयुक्त निर्णय का मौका दिया| यह अलग बात है कि इनके विरोधियों ने सामंत काल में इनके व्यक्तित्व को धूमिल करने के प्रयास में पत्नी से चुपके चोर की तरह रात्रि में भागने की कहानी बना डाली| उस समय ज्ञात विश्व में मगध और लिच्छवी के क्षेत्र उच्चतर और दार्शनिक अध्ययन का प्रमुख केंद्र था| इसी कारण गोतम कपिलवस्तु से सीधे राजगीर आए और अध्ययन के केन्द्रों राजगीर एवं वैशाली और इसके आस-पास ही रह कर चिंतन एवं मनन करते रहे|

इस तरह स्पष्ट है कि बुद्धों का अवतरण उत्पादन, वितरण, विनिमय एवं उपभोग के साधनों एवं शक्तियों एवं उनके अंतर सम्बन्धों के कारण ही ऐतिहासिक आवश्यताओं का अनिवार्य परिणाम था| भारत में इन  किया, पुनर्संगठित किया एवं पुर्नार्विन्यासित किया|

इस तरह गोतम तथागत एवं बुद्ध हुए|

निरंजन सिन्हा

व्यवस्था- विश्लेषक एवं चिन्तक

(प्रकाशनाधीन पुस्तक-“बुद्ध: दर्शन एवं रूपांतरण”से)

शनिवार, 29 अगस्त 2020

बुद्ध से सम्बन्धित भ्रांतियाँ (Fallacy related to Buddha)

(Fallacy related to Buddha)

बुद्ध के जीवन से सम्बन्धित कई भ्रांतियां हैं जिसके बारे में एक संक्षिप्त परिचय दिया जा रहा है जो निम्न है ......

ब्राह्मणवाद के विरुद्ध आन्दोलन ?

अधिकतर इतिहासकार बुद्ध के उदय को ही ब्राह्मणवाद के विरुद्ध और ब्राह्मणवाद के कारण ही मानते हैं| अब नए शोधों से यह स्थापित हो गया है कि उस समय ब्राह्मण और ब्राह्मणवाद नहीं था क्योंकि उसकी उत्पत्ति ही नहीं हुई थी| कुछ आधुनिक इतिहासकारों ने इस संदर्भित काल में ब्राह्मणवाद के समर्थन में पुरातात्विक साक्ष्यों के अभाव को जबरदस्त ढंग से रेखांकित किया है| वास्तव में ब्राह्मणवाद की उत्पति ही नौवीं शताब्दी के बाद सामंतवाद के कारण हुई है| ब्राह्मणवाद को ऐतिहासिक और पुरातन  बताना धार्मिक सामंतवाद की नितांत आवश्यकता थी| बौद्ध दर्शन समानता के समर्थक होने के कारण धार्मिक सामंतवाद का विरोधी दर्शन है| धार्मिक सामंतवादियों की यह अनिवार्यता थी कि ब्राह्मणवाद को सभ्यता के उदय के साथ या उससे पहले से ही उत्पन्न बताया जाय ताकि इसे गौरवपूर्ण बताया जा सके| इसीलिए इसे पशुचारण अवस्था तक ले जाया गया क्योंकि पशुचारियों की कोई स्थापित सभ्यता नहीं होती है| इससे पहले का बताया जाना ज्यादा तार्किक नहीं लगता बल्कि हास्यास्पद लगता और इसीलिए इस सामंती इतिहासकारों ने इसको पशुचारण काल तक ही रखा| यह सिद्धांत सिन्धु घाटी सभ्यता के आकस्मिक खोज के पहले तक ठीक चल रहा था पर इसने ब्राह्मणवादी इतिहास के स्थापित सुव्यस्थित  क्रम को बिगाड़ दिया| ,

दरअसल बुद्ध की महानता जीवन और सफलता के कई क्षेत्रों में नए वैज्ञानिक अवधारणाओं और सिद्धांतों की प्रस्तुति रही| उन्होंने नव उदित नागरीय समाजों के लिए और नव उदित राजनीतिक संस्था - राज्य के सम्यक विकास एवं संचालन  के लिए एक समुचित दर्शन तैयार किया| इसे तत्कालीन दुनिया में सराहा गया और आज भी कई देशों के संविधान के मूल में उपस्थित हैं|

इन्होंने संज्ञानात्मक क्रान्ति का प्रथम सैद्धान्तिकरण किया|

इन्हें सामाजिक बुद्धिमता और भावनात्मक बुद्धिमता का भी प्रथम सूत्रधार कहा जाना चाहिए|

इन्होंने विचारों अर्थात आईडिया का ऐसा विश्वव्यापी प्रसार कियाअर्थात ऐसा विश्वव्यापी सफल मार्केटिंग किया; जिसके पहले ऐसा करने का कोई उदाहरण ज्ञात इतिहास में नहीं है| इस रूप  में इन्हें मार्केटिंग प्रबंधन के प्रथम प्रवर्तक कहा जाना चाहिए|

इन्होंने जीवन में कष्ट के अनुभूति नहीं होने के लिए भी आष्टांगिक मार्ग सहित कई सूत्र दिए|

मन (स्व, आत्म - Self) को नियंत्रित करना,

 आत्म- अवलोकन, आत्म- निरिक्षण, आत्म- केन्द्रण की प्रविधि- विपश्यना का आविष्कार किया|

 इन्होंने ईश्वर के अस्तित्व, और आत्मा एवं पुनर्जन्म को अस्वीकार किया|

इन्होंने कार्य- कारण संबंधों का प्रतिपादन किया जो विज्ञान का आधार बना|

ऐसी अनेक अद्वितीय उपलब्धियों को गौण करने के लिए ही यथास्थितिवादी धार्मिक सामंत यह प्रचारित करते रहते हैं कि बौद्ध दर्शन का उदय ही ब्राह्मणवाद के विरुद्ध रहा और उनका दायरा भी वही तक सीमित करने का प्रयास भी किया|  यह एक गहरी साजिश है जिसे बुद्धिजीवी एवं युवा वर्ग समझने की कोशिश करें|

आप यह स्पष्ट कर ले कि बौद्ध दर्शन का ब्राह्मणवाद से कोई लेना- देना नहीं है| ब्राह्मणवाद सामंतवाद का धार्मिक स्वरुप है| यह अलग बात है कि ईश्वर, आत्मा, पुनर्जन्म, कर्मवाद, बलि (नर एवं पशु), जादू, भाग्य आदि अपने आद्य अवधारणाओं एवं आद्य स्वरूपों में प्रयोग एवं उपयोग में थे| यह आद्य काल से ही चला आ रहा था और बुद्ध के समय में भी समाज में प्रचलित रहे थे| आपको वैज्ञानिक तथ्यों पर अर्थात साक्ष्यों एवं तार्किकता के आधार स्वयं मनन एवं मंथन करना होगा|  बौद्ध दर्शन उन क्षेत्रों में भी फैला, जहाँ ब्राह्मणवाद नहीं था जैसे चीन, जापान, कोरिया आदि| यदि ब्राह्मणवाद बौद्ध दर्शन की उत्पत्ति का प्रमुख कारण होता तो इन क्षेत्रों में बौद्ध दर्शन को पल्लवित होने की आवश्यकता नहीं होती|

 वैदिक कर्मकांड के विरुद्ध आन्दोलन ?

बुद्ध को वैदिक कर्मकांडों एवं ब्राह्मणवाद के विरुद्ध बताया गया है| मैंने वैदिक काल एवं ब्राहमणवाद को अलग अलग दिखाया और बताया है| प्रो० आर्थर लेवेलिन (ए० एल०) बाशम (Arthur Llewellyn Basham) ने  “अद्भुत भारत” (The Wonder that was India) में वैदिक धर्म एवं ब्राह्मण धर्म को अलग अलग स्थान दिया है| इनके प्रमुख भारतीय शिष्य प्रो० रामशरण शर्मा ने अपने बाद के कालों में वैदिक काल को  ऐतिहासिक  साक्ष्यों के अभाव में वैदिक काल के ऐतिहासिक अस्तित्व पर ही प्रश्न कर दिया है (देखिए- ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस का इनके द्वारा रचित पुस्तक- “भारत का प्राचीन इतिहास”)|

वैदिक (उत्तर वैदिक काल) कर्मकांड का एक प्रमुख तथ्य “हवन कुंड” वर्णित है| उस वर्णित काल के इतिहास काल में ऐसा कोई पुरातात्विक साक्ष्य इतिहासकारों और पुरातत्ववेताओं को नहीं मिला है| वैदिक काल का इतिहास एक ऐसा इतिहास है जिसका कोई पुरातात्विक साक्ष्य नहीं है, सिवाय कागजी प्रस्तुति के| ध्यान रहे कि कागजों का साक्ष्य भी कागजों के आविष्कार के बाद के कालों का ही हो सकता है| इसका कोई साक्ष्य समकालीन अभिलेख, किसी धातु- पत्र, या समकालीन विदेशी सन्दर्भों में नहीं है| बुद्ध के द्वारा वैदिक कर्मकांडों के विरोध को मात्र इसलिए दिखाया एवं बताया जाता है ताकि वैदिक कर्मकांडों की प्राचीनता और पौराणिकता को सही साबित किया जा सके जिसका भेद अब खुलता जा रहा है| इसी कारण धार्मिक एवं राजनीतिक सामंतवादियों ने भारत के बौद्ध दर्शन के साहित्य, पुस्तकालय, एवं शिक्षण संस्थानों को नष्ट कर दिया ताकि इन साहित्यों को नए ढंग से सम्पादित और रचना किया जा सके|

यह सही माना जा सकता है कि उन्होंने समाज की कई बुराइयों को समाप्त करना चाहा,परन्तु उनका दर्शन  व्यापक था| उनका ध्यान मात्र वैदिक एवं ब्राह्मणवाद की बुराइयों तक सीमित बताया जाना, वास्तव में उनके विरुद्ध और उनकी बौद्धिकता के विरुद्ध एक गहरी साजिश है| जो वास्तविकताएं उनके समय या उनके निकट समय में थी ही नहीं, उसका विरोध करने का तर्क ही अवैज्ञानिक है|     

वृद्ध और शव देखने के बाद विरक्ति ?

प्रवज्या के कारण के सम्बन्ध में डा० आम्बेडकर ने अपनी पुस्तक “बुद्ध और उनका धम्म” के परिचयात्मक भाग में लिखा है कि बुद्ध को जिस स्वरुप में और जिस चरित्र में पेश किया जा रहा है, उसमे कितनी विसंगति है? इन समस्याओं पर चर्चा इसलिए किया गया है ताकि एक स्वस्थ्य विमर्श हो सके? उनके अनुसार पहली समस्या भगवान बुद्ध के जीवन की प्रधान घटना प्रव्रज्या के सम्बन्ध में है| बुद्ध ने प्रव्रज्या क्यों ग्रहण की? परम्परागत उत्तर है कि उन्होंने प्रव्रज्या इसलिए ग्रहण की, क्योंकि उन्होंने एक वृद्ध पुरुष, एक रोगी व्यक्ति, तथा एक शव को अन्तेयष्टि के लिए ले जाते देखा था| स्पष्ट ही यह उत्तर गले के नीचे उतरने वाला नहीं लगता| जिस समय सिद्धार्थ (बुद्ध) ने प्रव्रज्या ग्रहण की थी, उस समय उनकी उम्र 29 वर्ष की थी| एक छोटे गणतंत्र का 29 वर्षीय राजकुमार जो ग्रामीण आबादी में रहता है और उस उम्र तक कभी किसी बुढा को नहीं देखा हो, कभी किसी बीमार को नहीं देखा हो, कभी किसी शव को नहीं देखा हो; अतार्किक और अकल्पनीय प्रतीत होता है| जीवन परिवर्तन की घटनाओं को इन अतार्किक बातों से नहीं जोड़ा जाना चाहिए और मुझे डा० आम्बेडकर की विचारों से सहमति है|   

दरअसल यह प्रव्रज्या उनके उच्चतर शिक्षण का महत्त्वपूर्ण और अनिवार्य आवश्यकता एवं हिस्सा था| यदि यह मात्र जीवन से विरक्ति का परिणाम होता तो बुद्ध अध्ययन और शिक्षण केन्द्रों की ओर नहीं जाकर दूरस्थ दक्षिण के या निकटवर्ती उत्तर के हिमालयी वनों में भी जा सकते थे| उन्होंने राजगीर और वैशाली जाना पसंद किया क्योंकि तत्कालीन ज्ञात दुनिया और भारत के लगभग सभी प्रसिद्ध शिक्षण और अध्ययन संस्थान राजगीर और वैशाली में और उसके आस- पास ही मौजूद थे| उन्हें दुखों का निवारण मात्र का उपाय नहीं खोजना था अपितु उन्हें नव उदित नागरीय समाजो और नव उदित राजनीतिक संस्थान  - राज्यों का उदय होने के परिणामस्वरूप उनके सम्यक विकास के लिए एक सम्यक दर्शन को परिष्कृत करना था जिसको पाने के लिए तत्कालीन दुनिया के कई विद्वान् और दार्शनिक लगे हुए थे|  

चुपके से गृह त्याग ?

गोतम बुद्ध के चारित्रिक हनन एवं व्यक्तित्व धूमिल करने के प्रयास में इनके विरोधियों ने इस कहानी को गढ़ा| डा० आम्बेडकर ने अपनी पुस्तक “बुद्ध और उनका धम्म” में इस पर सम्यक प्रकाश डाला है| शाक्य गणतंत्र और इनके पड़ोसी गणतंत्र के मध्य बहने वाली रोहिणी नदी के जल- उपयोग के बंटवारे से सम्बन्धित विवाद के गहरा हो गया था| इसके कारण उत्पन्न राजनीतिक संकट और कोशल नरेश के कतिपय शासनात्मक शर्तों के अधीन इन्हें सर्व सम्मति से राज्य से बाहर निकलने का निर्णय करना पड़ा| व्यस्क राजकुमार होने के नाते इन्हें अपने नानी के और ससुराल के परिवार के विरुद्ध युद्ध का नेतृत्व करना था क्योंकि गणतंत्र के संघ का यही निर्णय था और यह निर्णय भी बाध्यकारी था|

मेरा स्पष्ट मानना है कि उस समय के प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षणोंपरांत इन्हें उच्चतर शिक्षण की आवश्यकता रही, रोहिणी नदी के जल विवाद ने समाज एवं राज्यों के सम्यक संचालन के लिए नए समुचित दर्शन की आवश्यकता और उसकी खोज, कोसल राज्य का अधिनायकात्मक शर्त और उनके गणतंत्र के सामान्य हितों के दृष्टिकोण से इन्हें राज्य से निकलने का निर्णय लेना पड़ा| मेरे कहने का अर्थ यह है कि इनकी उच्चतर शैक्षणिक आवश्यकता सबसे प्रमुख थी| ये अपने प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा के उपरान्त उच्चतर शिक्षा पर विचार कर ही रहे थे| यह आकस्मिक संयोग ही था कि इसी मनन- मंथन के क्रम में ये घटनाएँ भी हो चली| यदि ये उच्चतर शिक्षण पर विचार नहीं कर रहे होते और चुपके से रात्रि में भागते तो बिना कही भटके ही उच्चतर शिक्षा के केन्द्रों में नहीं पहुँच पाते|  यही तर्क एवं स्थिति यह स्पष्ट करता है कि इन्होंने चुपके से और रात्रि में भागे नहीं थे, अपितु सम्यक विचारों उपरान्त सबके सहमति  एवं आज्ञा लेकर ही पूर्व निर्धारित शिक्षा के निश्चित स्थान के लिए प्रस्थान किया था|  

चार आर्य सत्य मूल आविष्कार है ?

अधिकांश विद्वान और बौद्ध मतावलम्बी मानते हैं कि चार आर्य सत्य का सिद्धांत ही बुद्ध का मूल और सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत है| ऐसा मानना अधिकतर वैसे विद्वानों का है जो सिर्फ परम्परागत  लिखित साक्ष्यों तक अपने को सीमित रखते हैं और उनमे कोई विश्लेषणात्मक एवं तार्किक दक्षता का नहीं होना प्रतीत होता है| उन्हें इस बात तथा तथ्य का भान ही नहीं है कि जिस उपलब्ध ऐतिहासिक साक्ष्यों का अवलोकन वे कर रहे हैं, वे सामंतवादियों के द्वारा नष्ट और जला देने के बाद सामंतवादी शक्तियों की आवश्यकताओं के अनुरूप पुन: रचित एवं उपलब्ध साहित्य के आधार पर मात्र है|

सामंतवादियों ने वैसे अंशों और साक्ष्यों को प्रमुखता देने से मना कर दिया जो उनके सामंतवादी दर्शनों और आवश्यकताओ के विपरीत एवं विरुद्ध थे जैसे ईश्वर नहीं है, आत्मा एक साजिश का परिणाम है, पुनर्जन्म यथास्थितिवाद को बनाए रखने के लिए एक आवश्यक अवधारणा है, हर घटना का कोई निश्चित कारण अवश्य है, कर्म का सिद्धांत का अगले जन्म से कोई सम्बन्ध नहीं है, आदि आदि| ये सिद्धांत सामंतवादियो के मूल एवं मौलिक अवधारणाओ के लिए “पोटैसियम साईनामाईड” की तरह मारक (Fatal) जहर है और इसी कारण यह सामंतवादी मानसिकताओं की उपेक्षाओं की शिकार हुई|

डा० भीमराव आम्बेडकर ने अपनी पुस्तक “बुद्ध और उनका धम्म” के परिचय में प्रश्न किया है कि दुःख एक आर्य सत्य है तो क्या ये चारों सत्य भगवान बुद्ध की मूल शिक्षाओं में समाविष्ट होते हैं? जीवन स्वभावत: दुःख है, यह सिद्धांत जैसे बुद्ध- धम्म की जड़ पर ही कुठाराघात करता प्रतीत होता है| यदि जीवन ही दुःख है, मरण भी दुःख है, पुनरुत्पत्ति भी दुःख है, तब तो सभी कुछ समाप्त है| न धर्म ही किसी आदमी को इस संसार में सुखी बना सकता है और न दर्शन ही| यदि दुःख से मुक्ति ही नहीं है तो फिर धर्म भी क्या कर सकता है और बुद्ध भी किसी आदमी को दुःख से मुक्ति दिलाने के लिए क्या कर सकता है, क्योंकि जन्म ही स्वभावत: दुखमय है| यह चारों आर्य सत्य – जिनमे प्रथम दुःख ही आर्य- सत्य है- अबौद्धो द्वारा बौद्ध धम्म ग्रहण किए जाने के मार्ग में बड़ी बाधा है| ये उनके गले आसानी से नहीं उतरते| ऐसा लगता है कि ये सत्य मानव को निराशावाद के गढ़े में धकेल देते हैं| ये ‘सत्य’ बुद्ध के धम्म को एक निराशावादी धम्म के रूप में उपस्थित करते हैं| ये शिक्षाएं बुद्ध के मूल सिद्धांत नहीं हैं या ये बाद के भिक्षुओं द्वारा किया गया प्रशिप्तांश है? उपरोक्त विचार डा० आम्बेडकर के हैं और मैं भी उनसे सहमत हूँ|      

धर्म (बौद्ध) की स्थापना ?

कहा जाता है कि गोतम बुद्ध ने  बौद्ध धर्म की स्थापना की थी| वास्तव में धर्म की अवधारणा ही मध्य काल की अवधारणा है| यह अलग बात है कि सामंतकाल में बुद्ध के धम्म को धर्म का पर्यायवाची बना दिया गया| कोई भी धर्म ईश्वर की स्थापित अवधारणा के साथ होता है और बुद्ध की शिक्षाओं में ईश्वर या उनके प्रतिनिधि को कोई स्थान ही नहीं दिया गया|

मध्य काल के पहले जिन दर्शनों की स्थापना हुई है, उनके संस्थापकों ने कोई  धर्म की स्थापना नहीं की; अपितु उस अव्यवस्थित समाज को उनके सांस्कृतिक, शैक्षणिक, भौगोलिक, सामाजिक एवं राजनीतिक आवश्यकतानुसार एक सम्यक दृष्टिकोण और दर्शन देने का सफल प्रयास किया| ईसा मसीह और मोहम्मद पैगम्बर साहब भी इसी श्रेणी में आते हैं| ईसा मसीह ने प्रत्येक रीजन (Region) में उत्पन्न क्रिया – विधियों को रिलिजन (Religion) कहा तो मोहम्मद पैगम्बर साहब ने प्रत्येक मजलिश की क्रिया- विधियों को मजहब कहा|  इसी तरह गोतम बुद्ध ने भी उस समय के आवश्यकतानुसार समाज और राज्य के लिए एक सम्यक दर्शन – धम्म  दिया जिसे जीवन का दर्शन कहा जाना चाहिए| सामंत काल में सामंती आवश्यकताओं के अनुरूप इन्हें धार्मिक स्वरुप देते हुए संप्रदाय (समूह के विश्वास एवं मान्यता) को धर्म का नाम दिया गया| बाद के अनुगामियों ने अपने निजी स्वार्थों के कारण इन सम्यक दर्शनों को सामंत काल में समकालीन व्याख्या के नाम पर उसे धर्म का रूप दे दिया और उन संवाद वाहकों को ही ईश्वर या समतुल्य बना दिया गया|

धर्म का वर्तमान स्वरुप की उत्पत्ति ही सामंत काल की अनिवार्यता रही| सामंत काल में पहले स्थापित आध्यात्मिक एवं धार्मिक तंत्र को ही विरूपित कर उसे सामंतवाद की व्यवस्था के अनुरूप ढाल दिया गया|

धर्म की आवश्यकता उनको होती है

जिनका शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक स्तर विश्लेषणात्मक, विवेचनात्मक एवं तर्कपूर्ण नहीं होती|

 

ऐसा व्यक्ति प्राकृतिक शक्तियों और उनके व्यक्ति स्वरुप

यानि व्यक्तिकरण (Personification) के अंतर को नहीं समझ पाता है,

दोनों को ही एक दुसरे का पर्यायवाची समझ लेता है|

 ऐसे कम विश्लेषणात्मक क्षमता के लोगों को धम्म और धर्म का अंतर संक्षेप में नहीं समझाया जा सकता है| उनके लिए आगे के खण्डों में समझाने का प्रयास किया गया है|

धर्म किसी के जीवन का निजी मामला है

और इसमे बदलाव का बाहरी प्रयास भी नहीं होना चाहिए|

लेकिन एक सफल जीवन के लिए  

वैज्ञानिक एवं तार्किक दर्शन एवं शिक्षाओं को समझने को धार्मिक नहीं माना जाना चाहिए |

जैसे एक बीमार व्यक्ति को दवा की आवश्यकता होती है और एक अज्ञानी को शिक्षा की आवश्यकता होती है, वैसे ही एक व्यक्ति को जीवन में सुख, शान्ति, सफलता और समृद्धि के लिए इस दर्शन की आवश्यकता  होती है, चाहे उसका नाम जो दिया जाए|

 क्या बुद्ध महात्मा थे?

बुद्ध को अक्सर लोग महात्मा बुद्ध कहते हैं| क्या यह कहना गलत है तो क्यों? महात्मा का अर्थ होता है- महान आत्मा| जब बुद्ध ने आत्मा के अवधारणा को एक साजिश का परिणाम बताया और इसे विकास का विरोधी अवधारणा बताया हो तो ऐसे व्यक्तित्व को महान आत्मा अर्थात महात्मा कहना अपनी अज्ञानता का परिचय देना होगा| जब आत्मा नहीं है तो महात्मा (महान +आत्मा)  एवं परमात्मा (परम + आत्मा ) भी नहीं होगा| परमात्मा परम आत्मा अर्थात सर्वोच्च आत्मा है जिसे ईश्वर भी कहा जाता है| इसी तरह ब्रह्मात्मा (ब्रह्म + आत्मा) एवं देवात्मा (देव + आत्मा) भी नहीं होगा| ब्रह्मात्मा में आत्मा का ब्रह्म से मिलन या आत्मा का ब्रह्म में विलीनीकरण होता है| ब्रह्म को ब्रह्माण्ड के अर्थ में लिया जाता है| देवात्मा का अर्थ देव अर्थात देवताओं का आत्मा से है| देवात्मा का उपयोग सामंत काल में राजाओं में दैवीय शक्ति के पुनर्स्थापन करने में होता रहा| देवात्मा की अवधारणा के द्वारा देवताओं की शक्ति को कहीं भी नियोजित या स्थापित किया जाता था या है| देवात्मा की अवधारणाओं से पुरोहित भी देवता स्वरुप या देवता बनते थे| स्पष्ट है कि बुद्ध को अज्ञानी लोग ही महात्मा कहते हैं या सजिशतन महात्मा कहा जाता है| कृपया आप तो सावधान रहें| आप उन्हें गौतम बुद्ध, सिद्धार्थ गौतम, तथागत बुद्ध या गोतम कह सकते हैं|

 क्या बुद्ध भगवान है?

सामान्यत: भगवान का अर्थ ईश्वर (God) से लिया जाता है जिसको सामान्य अर्थ में यह माना जाता है कि  इस संसार के रचियता वह ईश्वर है और इसी के ईच्छा से संसार का संचालन होता है| यह प्राकृतिक शक्तियों से अलग होता है| प्राकृतिक शक्तियाँ प्राकृतिक नियमों से संचालित होता है, किसी के ईच्छा से संचालित नहीं होता| ईश्वर व्यक्ति स्वरुप में होता है और इसी कारण (आदमी के स्वरुप होने के कारण ही) वह हमारी प्रार्थना  एवं आवाज सुनता है, समझता है| चूँकि ईश्वर आदमी स्वरूप में होता है और इसीलिए कुछ आदमी के विशेष वर्ग (पुरोहित) ईश्वर एवं सामान्य आदमी के बीच मध्यस्थता करने लगता है| चूँकि ईश्वर भी आदमी स्वरुप में, पुरोहित भी आदमी, और सामान्य जन भी आदमी और इसी कारण ये  तीनों एक दुसरे की बातों एवं भावनाओं को समझते हैं| साधारण शब्दों में कह सकते हैं कि ईश्वर प्राकृतिक शक्तियों का व्यक्तिकरण (Personification) या व्यक्ति स्वरुप है| इस तरह सामान्य आदमी अपनी विश्लेषणात्मक एवं तार्किक क्षमता के अभाव में प्राकृतिक शक्तियों को ही ईश्वर और ईश्वर को ही प्राकृतिक शक्तियाँ समझ लेता है तथा पुरोहितों का काम चलता रहता है|

पालि भाषा जो बौद्ध दर्शन की मूल भाषा थी, में भगवान उस व्यक्तित्व को कहते हैं जिसने अपने रागों (अनुराग, आसक्ति) और द्वेषों (इर्ष्या, घृणा) को भग्न (नष्ट) कर लिया है| आज के हिन्दी और संस्कृत के भगवान और पालि के भगवान में कोई तारतम्यता नहीं है| यह रूपांतरण के मनोविज्ञान की तात्कालिक आवश्यकता थी कि उस भगवान को विरूपित कर आस्था वाला भगवान बना दिया जाए| यह परिवर्तन (Change) के विभिन्न स्वरुप परावर्तन (Reflection), अनुवाद (Translation), और विरूपण (Distortion) के प्रकार का उत्तम उदहारण है| संस्कृत और हिन्दी में भगवान को ईश्वर का पर्यायवाची बना दिया गया है ताकि बौद्धों द्वारा प्रयुक्त भगवान के स्थिति में भ्रम पैदा किया जा सके| इस तरह यह परावर्तन और अनुवादित परिवर्तन के साथ साथ विरूपण का स्पष्ट परिणाम है| बुद्ध ने ईश्वर  के अस्तित्व को ही अस्वीकार कर दिया है और उसी शब्द को संस्कृत में विपरीतार्थी अर्थ में लाया जाना स्पष्टतया पालि के भगवान का विरूपण है|

इसलिए बौद्ध दर्शन या बौद्ध धम्म में भगवान के प्रयोग में सावधानी बरतनी है और इसे ईश्वर का पर्यायवाची के रूप में नहीं लिया जाना है| अर्थात बौद्ध दर्शन में बुद्ध भगवान थे परन्तु ईश्वर नहीं थे| इस अर्थ में वह सभी जीवों के प्रति उपेक्षित भाव रखते थे, किसी से घृणा नहीं और किसी आसक्ति नहीं| वह इस संसार के रचियता या संचालक नहीं थे| सामान्य जनों के बीच भगवान शब्द के प्रयोग में ही सावधानी बरतनी चाहिए|

ये बुद्ध के सम्बन्ध में प्रचलित, सामान्य एवं व्यापक भ्रांतियाँ हैं जिन्हें हर सामान्य बुद्धिमान व्यक्तियों को जानना चाहिए| आशा करता हूँ कि मैं युवाओं एवं बुद्धिमान व्यक्तियों को समझाने में सफल रहा|

निरंजन सिन्हा

व्यवस्था- विश्लेषक एवं चिन्तक

(प्रकाशनाधीन पुस्तक – “बुद्ध : दर्शन एवं रूपांतरण” से )

मौतें सामाजिक और ऐतिहासिक भी होती है

जी, यहाँ आदमियों की मौतों के बारे में बात हो रही है| शारीरिक मौतों के बारे तो सब कोई बहुत कुछ जानते हैं, लेकिन आज हमलोग सामाजिक मौतों और ऐ...