रविवार, 24 दिसंबर 2023

डा आम्बेडकर की सांवैधानिक नैतिकता

 (The Constitutional Morality of Dr Ambedkar) 

डा भीमराव आम्बेडकर भारतीय संविधान के प्रारुप समिति के अध्यक्ष रहे, जिन्होंने भारतीय संविधान की मौलिक और मूल संरचनात्मक ढांचा  (Structural Framework) को तैयार किया। इन्होंने संविधान सभा में भारतीय संदर्भ में "सांवैधानिक नैतिकता" (Constitutional Morality) की बात की थी। आज़ के संदर्भ में, हम इसी ''सांवैधानिक नैतिकता"' की विवेचना करना चाहते हैं। 'सांवैधानिक नैतिकता' को किसी मूर्त अवस्था में आकलित नहीं किया जा सकता है, और इसे वैधानिक स्वरुप भी नहीं दिया जा सकता। लेकिन यह सांवैधानिक नैतिकता उसी तरह भारतीय संविधान और व्यवस्था में महत्वपूर्ण है, जैसे 'प्राकृतिक न्याय' (Natural Justice) बिना किसी लिखित अभिव्यक्ति के ही सभी लिखित 'वैधानिक न्याय' (Legal Justice) के निर्णयों पर प्रभावी रहता है, यानि सभी नियमों और निर्णयों को आच्छादित किए रहता है। 

यह 'सांवैधानिक नैतिकता' भी इसी तरह तरंगित अवस्था (Wave Form) में रहकर भी शासन के सभी अंगों पर वास्तविक रूप में छाए रहना चाहिए। अर्थात शासन के सभी अंगों यानि शासन के सभी चारों मौलिक एवं आवश्यक इकाईयों यथा विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और संवादपालिका (Media) पर प्रभावी रहना चाहिए। लेकिन इस 'सांवैधानिक नैतिकता' को संरचनात्मक ढांचा (Structural Framework) कौन देगा, जिसके अन्तर्गत इस 'सांवैधानिक नैतिकता'  को अपना दिशा और दशा निर्धारित करना है, या करता रहना चाहिए? अर्थात इस 'सांवैधानिक नैतिकता' के लिए वह कौन सा मौलिक और आधारभूत प्रेरणा होगा, जो उसे प्रेरित, या नियमित, या नियंत्रित करता रहेगा? यह भी एक मौलिक और महत्वपूर्ण प्रश्न है। इस "सांवैधानिक नैतिकता" का प्रेरक कारक यानि संरचनात्मक ढांचा देने का कार्य 'मानवता' (Humanity), 'न्याय (Justice)', 'समता' और समानता (Equality n Equity), 'मुक्ति' और 'स्वतंत्रता (Liberty n Freedom)', 'बंधुत्व (Fraternity)', 'वैज्ञानिकता' (Scientism), और 'आधुनिकता' (Modernity) ही करेगा। इसे दूसरे शब्दों में संविधान की उद्देशिका (Preamble) में निहित कहा भी जा सकता है। 

जब संविधान की उद्देशिका में, या स्वयं संविधान में संशोधन किया जा सकता है, तो यह प्रश्न उठता है कि इनमें किस हद तक संशोधन किया जाना चाहिए? क्या संविधान भी बदला या संशोधित किया जा सकता है? तो इसका स्पष्ट उत्तर होगा - हां, बदला या संशोधित किया जा सकता है, परन्तु किस हद तक? जब संविधान में संशोधन का अधिकार भारतीय प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने वाली  संस्था - भारतीय संसद को दिया गया है, तो इसे कौन रोकेगा, कैसे रोकेगा और क्यों रोकेगा?  यह "क्यों" (Why)  भी एक महत्वपूर्ण प्रश्न है। यहां भी सांवैधानिक नैतिकता ही एकमात्र विकल्प है, जो इसे किसी तार्किक सुनिश्चितता के साथ इसे रोक सकता है। 'आधुनिकता' एक व्यापक अवधारणा का शब्द है, जो अपने में मानवता, वैज्ञानिकता और न्याय की व्यापकता को समाहित किए रहता है। कोई भी इस आधुनिकता यानि आधुनिकीकरण को पश्चिमीकरण (Westernisation)" नहीं समझे।

इस तरह स्पष्ट है कि "सांवैधानिक नैतिकता" संविधान की मूल भावनाओं के क्रियान्वयन में निहित है।  निश्चिंतया सांवैधानिक नैतिकता भारत को समृद्ध, सशक्त, आधुनिक, वैज्ञानिक और अग्रणी बनाने के लिए नीति नियामकों को प्रेरित करता रहेगा। इससे इतर लक्ष्य या मनोदशा "सांवैधानिक अनैतिकता" ही होगा। दरअसल Constitutional Morality (सांवैधानिक नैतिकता) का अर्थ Morality शब्द में अन्तर्निहित है, जिसके अवधारणात्मक अर्थ के लिए हिन्दी में कोई उपयुक्त शब्द शायद नहीं है। कुछ लोग इसके लिए सदाचार, सत्यनिष्ठा, तो कुछ लोग नैतिकता शब्द का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन ये शब्द भी इसकी अन्तर्निहित उद्देश्य और भावना को शामिल नहीं कर पाता है। यहां Morality शब्द का अर्थ होता है कि जो भारतीय समाज के सम्यक और समुचित विकास एवं व्यवस्था के लिए अपेक्षित विषय के मूल और मौलिक तत्वों को धरातल पर उतारने में ईमानदार हो। इस Morality में उस संविधान के अन्तर्निहित उद्देश्य और भावना की अभिव्यक्ति उसके भावना, विचार, अभिव्यक्ति और व्यवहार में अवश्य रहे।

इस तरह Constitutional Morality का अर्थ हुआ कि संविधान के निर्माण के समय संविधान का निर्माण जिस भावनाओं और उद्देश्यों की पूर्ति के साधन के रुप में आत्मार्पित, अंगीकृत और अधिनियमित किया गया है, उन उद्देश्यों और भावनाओं को धरातल पर उतारने के प्रयास में ईमानदार रहना। हमें  Morality में Integrity को भी निहित करना चाहिए और इसके बिना इन दोनों का कोई कार्यात्मक अर्थ नही होगा। तो स्पष्ट है कि बदलते संदर्भों और आवश्यकताओं के अनुरूप संविधान को बदलते रहना भी पड़ेगा, अर्थात किसी भी संविधान को निश्चित उद्देश्य और भावना में किसी मजबूत संरचनात्मक ढांचा में बांधते हुए भी समय के अनुकूल ढालने और आगे बढ़ते रहने की जीवंतता रहनी चाहिए। इसीलिए संविधान में समय के अनुकूल संशोधन किए जाते रहते हैं। यह बात तो सैद्धांतिक रूप में सही और सहमत होने योग्य है, लेकिन संविधान के अनुसार शासन संचालन करने वालों की Morality के बंधन में कैसे बांधा जाए? इसे स्पष्ट नहीं किया जा सकता। 

इसी के साथ डा भीमराव आंबेडकर ने "राजनीति में भक्ति" (Hero Worship) के ख़तरों के प्रति आगाह भी किया। उन्होंने धार्मिक भक्ति पर निष्पक्ष ध्यान कर इस पर कोई सकारात्मक या नकारात्मक टिप्पणी नहीं किया, लेकिन "राजनीति में भक्ति" को भारतीय लोकतंत्र पर खतरा बताया।  किसी भी भक्ति में पूर्ण आस्था और समर्पण निहित होता है और इसे मानसिक गुलाम भी मान लिया जाता है।'आस्था' किसी भी संबंधित शंका को प्रथम दृष्टया ही खारिज कर देता है, अर्थात आप कोई प्रश्न नहीं कर सकते हैं। जबकि विज्ञान सभी आशंकाओं और विपरीत संभावनाओं को सदैव आमंत्रित करता रहता है, ताकि उसका विकास पूर्ण जीवंतता के साथ होता रहे, और होता भी रहता है। स्पष्ट है कि 'राजनीतिक भक्ति' "लोकतंत्र" को "प्रजातंत्र" की ओर ले जाती है। यहां सावधान रहें कि लोकतंत्र और प्रजातंत्र, दोनों का अंग्रेजी अनुवाद 'Democracy'  हीं है। लेकिन 'लोकतंत्र' वहां के लोगों का तंत्र है और 'प्रजातंत्र' वहां की प्रजा का तंत्र हुआ। स्पष्ट है कि लोक यानि लोग एक निरपेक्ष शब्द है, जबकि प्रजा एक सापेक्ष शब्द है। स्पष्ट है कि कोई नागरिक या लोग उसी समय किसी की प्रजा हो सकता है, जब वहां कोई राजा (King) होगा। बिना राजा के कोई प्रजा नहीं हो सकता, और इसीलिए भारतीय संविधान के उद्देशिका में लोकतंत्र शब्द है, प्रजातंत्र नहीं है।

दरअसल भक्ति का उदय ही इतिहास के मध्य काल में हुआ था, जो सामंती काल था।  सामंतवाद के काल में "भक्ति"  समाज के हर क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण और विशिष्ट पहचान बनी, जो उस क्षेत्र के सभी सामंतों के प्रति जनता से अपेक्षित था। इसी से यह धार्मिक, सांस्कृतिक, सामाजिक के साथ साथ राजनीतिक भक्ति भी जन्म लिया और मजबूत भी हो गया। डा आम्बेडकर जैसे पारखी विद्वान यह देख रहे थे कि भक्ति का प्रभाव भारत में अभी भी राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्र में मजबूत और प्रभावशाली है। इसीलिए इस राजनीतिक भक्ति के ख़तरों को अपने मानसिक दृष्टि से देख रहे थे। चूंकि राजनीतिक सत्ता ही सभी क्षेत्रों का नियामक, निर्धारक, नियंत्रक, और निर्माता होता है, इसीलिए राजनीतिक भक्ति के ख़तरों को नव स्थापित लोकतंत्र के संदर्भ में भांप लिया था। इसे हमलोगों को भी समझना चाहिए।

इसके ही साथ में, इन्होंने राजनीतिक लोकतंत्र (Political Democracy) की सीमाओं को भी गहराई से रेखांकित किया है। इन्होंने सामाजिक लोकतंत्र का अर्थ और आवश्यकता को भी समझाया। तय है कि सामाजिक लोकतंत्र में सांस्कृतिक लोकतंत्र भी समाहित है, क्योंकि इन दोनों को अलग-अलग नहीं किया जा सकता। लेकिन भारत का दुर्भाग्य यह है कि सांस्कृतिक लोकतंत्र की चर्चा यानि विमर्श भारत के तथाकथित आम्बेडकरवादी बुद्धिजीवियों की बुद्धि में प्रमुख स्थान नहीं ले सका है। आम्बेडकर ने अपने आलेखों में सामाजिक सांस्कृतिक क्रांति यानि कम समय में बहुत बड़े बदलाव को प्रमुखता से रेखांकित किया है और इसे राजनीतिक लोकतंत्र की पूर्व शर्त भी माना है। भारत के सभी प्रमुख तथाकथित आम्बेडकरवादी भी इसे नहीं समझ रहे हैं, या अपने व्यक्तिगत स्वार्थ में इससे विमुख रहते हैं। ऐसे सभी बुद्धजीवी सिर्फ राजनीतिक लोकतंत्र के नाम पर अपने स्वार्थ सिद्धि कर रहे हैं और इसीलिए व्यक्ति बदलने की, यानि सत्ता बदलने की राजनीति तक ही अपने को सीमित किए हुए हैं। व्यवस्था परिवर्तन यानि सामाजिक सांस्कृतिक लोकतंत्र की स्थापना की दृष्टि (Vision) अधिकांश आम्बेडकरवादी नेताओं में नहीं है। मैं तो यह स्पष्ट करना चाहता हूं कि इस सामाजिक सांस्कृतिक लोकतंत्र की दृष्टि अधिकांश बुद्धिजीवियों में ही नहीं है, और यह किसी भी तात्कालिक आम्बेडकरवादी नेताओं में भी नहीं है।

मैंने डा भीमराव आम्बेडकर के Constitutional Morality को में इतना ही समझा है, शाय़द इसे और विस्तारित और व्याख्यायित किए जाने की भी आवश्यकता है। आप भी विचार कीजिए।

आचार्य प्रवर निरंजन जी

 

गुरुवार, 21 दिसंबर 2023

वर्तमान राजनीतिक क्रियाविधि का आधुनिक विश्लेषण

 The Depth Psychology of Present Political System 

आज़ हमलोग वर्तमान भारतीय राजनीति के एक "गहरे मनोविज्ञान" (The Depth Psychology) को समझने की कोशिश करते हैं। यानि वर्तमान भारतीय राजनीति का आधुनिक विश्लेषण करते हैं, या दूसरे शब्दों में कहें तो वर्तमान भारतीय राजनीतिक परिदृश्य और उसकी क्रियाविधि (Mechanism) को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझने का प्रयास करते हैं। तय है कि किसी भी क्रियाविधि का वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझने में उसका आधार तार्किक होना चाहिए, उसे तथ्यात्मक होना चाहिए और उस विषय पर कुछ आधुनिक वैज्ञानिकों की भी मंतव्य की प्रस्तुति होनी चाहिए। स्पष्ट है कि उपरोक्त तथ्यों और प्रक्रियाओं के अभाव में यह विश्लेषण छिछला, छिछोरा और "बनने दिखाने" का एक भद्दा प्रयास होगा। तो हमलोग आगे बढ़ते हैं।

आप यह स्पष्ट रहें कि मैं एक गैर राजनीतिक व्यक्ति हूं, परन्तु अकादमिक पृष्ठभूमि के कारण अकादमिक ही रहना चाहता हूं। इसीलिए यहां किसी भी राजनीतिक विचारधारा, राजनीतिक दल और किसी राजनीतिक व्यक्ति या संगठन का नाम भी शामिल नहीं करुंगा। लेकिन गैर राजनीतिक होने मात्र से ही मैं अपने समाज, मानवता, प्रकृति और भविष्य की उपेक्षा ही कर दूं, यह समुचित भी नहीं होगा। भविष्य को सजगता से अज्ञानता में रखना अमानवीय भी होगा, गैर सामाजिक भी होगा और इसके लिए भविष्य भी क्षमा प्रदान नहीं करेगा। तो हमें इस विषय पर, यानि वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य पर एक आधुनिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से प्रकाश डालना ही चाहिए, ताकि भारतीय लोकतंत्र की गणतांत्रिक व्यवस्था में वह सशक्तता आ सकें, जिसके बदौलत भारत एक बार फिर से "आभा" से "रत"  (आभा + रत  = भारत) यानि आभा युक्त हो सके।

इसे आज़ हम 'गहरा मनोविज्ञान' (The Depth Psychology) से समझने की कोशिश करेंगे। वैसे इसे व्यापक रूप से समझने के लिए हमें सिग्मंड फ्रायड के "मनोविश्लेषणात्मक" (Psycho Analytical) अवधारणा और अब्राहम मैसलो की "मानवतावादी मनोविज्ञान" (Humanistic Psychology) की उपेक्षा भी नहीं कर सकते, लेकिन उन्हें बेहतर ढंग से समझने के लिए यहां फिर से विस्तार से नहीं जाना चाहूंगा। मैं आज फिर से संयुक्त राज्य अमेरिका की पूर्व संस्थान "The Institute of Propaganda Analysis"  के सातों तकनीक (प्रविधि) का स्थिर और शांतिपूर्ण अवलोकन एवं अध्ययन किए जाने की भी गहरी अनुशंसा तो सभी राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों - संस्थाओं से अवश्य करना चाहूंगा। इससे कोई भी अपने समाज में हो रहे या बदलते हुए परिदृश्यों को भी 'प्रचार तंत्र' (Media System) के संदर्भ में समझ सकता है और समझना भी चाहिए।

बात जब "गहरे मनोविज्ञान" (The Depth Psychology) पर जाती है, तो स्पष्ट है कि गहरे मनोविज्ञान की बातें मानव के अचेतन स्तर पर चली जाती है और स्वत: संचालन एवं नियंत्रण के मोड में चली जाती है। लेकिन यह बात किसी व्यक्ति के निजी व्यक्तित्व के ही अचेतन तक सीमित नहीं रहती है, बल्कि यह बात उसके "सामूहिक अचेतन" (collective unconscious) यानि "सामाजिक अचेतन" (Social unconscious) तक चली जाती है। तब तो स्विट्जरलैंड के मनोविज्ञानी कार्ल जुंग (Carl Gustav Jung) के अध्ययन को समझना भी जरूरी हो जाता है। यह चेतन व्यवहार और अचेतन मन की संरचनात्मक ढांचा (Structural Framework) एवं परिवेशीय व्यवस्था के संबंध को अभिप्रेरक (Motivational) अवस्थाओं और बाह्य उद्दीपन (External Stimuli) की परिवेशीय व्यवस्थाओं के संदर्भ में समझाना चाहते हैं। यह मानवीय चेतना की चेतन अवस्था और अचेतन अवस्था के साथ साथ उसके अभिप्रेरणा और उसके मन के प्रतिरूपों (Pattern of Mind) और उसके गत्यात्मकता (Dynamism) के संबंधों पर आधारित है। यहां व्यवहार में भावना, अभिव्यक्ति और शारीरिक क्रियाविधि भी शामिल रहेगा। यहां 'सामूहिक अचेतन' यानि 'सामाजिक अचेतन' को ही उस समाज की "संस्कृति" (Culture) कहना उचित होगा। सामूहिक अचेतन ही सामासिक और समेकित स्वरुप में संस्कृति ही होती है, जो समाज को नियमित, नियंत्रित और संचालित करती रहती है।

बहुत से राजनीतिक संगठन अपने प्रभाव क्षेत्र के मतदाताओं में यह देखते हैं कि अधिकांश मतदाता अभिप्रेरणा के पिरामिड में किस स्तर पर है? जैसे भारत में अधिकतर मतदाता अपनी शारीरिक आवश्यकताओं और उनसे संबंधित सुरक्षाओं से अभिप्रेरित हैं। इसीलिए अधिकतर राजनीतिक रणनीतिकार की रणनीतियां उनकी शारीरिक आवश्यकताओं और उनसे संबंधित सुरक्षाओं के इर्द-गिर्द ही घूमती रहती है। इसके लिए अब्राहम मैसलो की आवश्यकताओं का सिद्धान्त यानि अभिप्रेरणा का सिद्धान्त का पिरामिड पर्याप्त सहायता करता है। आप भी अपने आसपास के परिदृश्य में इन मौलिक अभिप्रेरणाओं को संतुष्ट करने के सरकारी प्रयासों में मुफ़्त या अनुदान के साथ व्यवस्था देखते हैं।

लेकिन 'गहरा मनोविज्ञान' तो जीवन की और गहराईयों में उतरता चला जाता है। कार्ल जुंग मानते हैं कि सभी जीवन और सभी मन (चेतना) अन्ततः किसी थीम (विषयगत) के प्रकार में या किसी प्रतिरूप (आंतरिक बुनावट या बनाबट) में कथानक (Narrative) बनाने में, यानि मिथक बनाने में, या मिथकीय चित्रण में अचेतन स्तर पर लगे रहते हैं। कुछ समझदार राजनीतिक दल ही इस कथानक यानि मिथकीय चित्रण की प्रक्रिया को समझते है और इसीलिए कुछ ही राजनीतिक दल इसका अवलोकन और विश्लेषण कर पाते हैं। ऐसे ही समझदार राजनीतिक संगठन इसके अनुकूल अपने राजनीतिक रणनीतियों को क्रियान्वित कर पाते हैं। 

किसी के अचेतन स्तर पर किया गया प्रयास चुपचाप और सदैव कार्यरत रहता है और सदैव परिणाम देता रहता है। इसी मिथकीय चित्रण में सामान्य वर्ग अपने सामान्य बुद्धि-विवेक के अनुसार ही मन की विभिन्न तरंगों में उतरते-डूबते -तैरते रहते हैं। मिथकीय चित्रण, यानि कथानक, यानि मिथक मात्र पौराणिक कथाएं नहीं होती है, बल्कि किसी भी चीज या घटना या प्रक्रिया की पुरातनता के नाम पर काल्पनिक व्याख्याएं है। कोई चीज यदि पुरातन है, तो वह विरासत भी मानी जाएगी और सनातन भी मानी जाएगी । ऐसी अवस्था मे हर पुरातन हमारे लिए गौरवमयी भी हो जाती है और इसलिए अनुकरणीय भी हो जाती है। इसमें मानव के आश्चर्यजनक एवं अलौकिक घटनाओं के नाम पर चित्रात्मक, कल्पनात्मक, विषयगत, प्रायोजित, प्रारुपित कहानी का विवरण ही होता है। चूंकि व्याख्याएं पुरातन मानी जाती है या होती है, तो निश्चिंतया ऐसी व्याख्या अवैज्ञानिक भी होगी, अतार्किक भी होगी, गैर तथ्यात्मक भी होगी, अविवेकी भी होगी, और इसीलिए यह अलोकतांत्रिक भी होगी, अमानवीय भी होगी एवं ग़लत भी होगी।

तो हमारे मन में यह कौंधता है कि मिथक की क्या उपयोगिता है और इसकी क्यों आवश्यकता होती है? मिथक साधारण रूप में एक कथानक (Narrative) ही है, जो ऐतिहासिकता और तथ्यात्मकता के आड़ में जन सामान्य को अपनी बातों को मनवाने और सहमत कराने के लिए गढ़ा जाता है। एक मिथक यानि एक कथानक के द्वारा ही कोई किसी भी गूढ़ बात को सामान्य जन के बौद्धिक स्तर तक उतर कर उसे समझा सकता है। एक मिथक यानि एक कथानक के द्वारा ऐतिहासिक तथ्यों को अपने पक्ष में तोड़ मरोड़ या उसे दिग्भ्रमित कर सकते हैं। एक मिथक यानि एक कथानक के माध्यम से ही इतिहास को बदला जाता है, जो अन्ततः संस्कृति को ही बदल डालता है। इसीलिए लेखक जार्ज आरवेल कहते हैं कि जो इतिहास (और इतिहास के नाम पर मिथक यानि कथानक) पर नियंत्रण रखता है, वह वर्तमान और भविष्य को भी नियंत्रित करता है।

इन्हीं मिथकों यानि कथानकों के माध्यम से ही लोगों के इस वर्तमान जीवन को तुच्छ और नगण्य बताया जाता है और 'इस जीवन के बाद के जीवन' यानि 'पुनर्जन्म' (जो जीवों में होता ही नहीं है) को महत्वपूर्ण बताया जाता है। इसीलिए आप एक राजनीतिक दल के रूप में अपने मतदाताओं को संतुष्टि के स्तर तक भविष्य के जन्म के या काल्पनिक स्वर्ग नर्क के बहाने बेहतरीन काल्पनिक जीवन की व्यवस्थाओं को उपलब्ध कराने का आश्वासन दे सकते हैं। कोई राजनीतिक दल वर्तमान को सुधारने का प्रयास दिखाना चाहता है, तो कोई इस जन्म के पार की जीवन की व्यवस्थाओं का आश्वासन देता है। 

कोई "व्यक्तिगत चेतन और अचेतन" को संतुष्ट करना चाहता है और कोई इसके अतिरिक्त "सामूहिक अचेतन" को संतुष्ट करना चाहता है। इस तरह कुछ राजनीतिक दल सत्ता में बैठे व्यक्ति को बदलने की, यानि सत्ता बदलने की राजनीतिक दृष्टि रखता है, तो कोई व्यवस्था यानि संस्कृति को ही बदलने का सुनियोजित और सुनिश्चित मजबूत दृष्टि रखता है। कुछ राजनीतिक दल संस्थागत हो कर प्रयास करते हैं और अधिकतर व्यक्तिवाद तक ही सीमित रह जाता है। स्पष्ट शब्दों में कहा जाए तो कुछ राजनीतिक दल सदियों की राजनीति की रणनीति पर काम करते हैं और अधिकतर कुछ वर्ष या वर्षों की राजनीति की ही दृष्टि रखते हैं। अपने आसपास नजर घुमाने से आपको बहुत कुछ स्वत: स्पष्ट हो जाएगा। इसीलिए मैंने पूर्व में अपने एक ब्लाग के आलेख में लिखा है कि 'कथानक ही शासन करता है'।

आचार्य निरंजन सिन्हा

स्वैच्छिक सेवानिवृत्त

राज्य कर संयुक्त आयुक्त, बिहार, पटना।

 

 

 

रविवार, 17 दिसंबर 2023

मानवीय उलझन और समाधान

  (The Psychology of Human Entanglements)

मानवीय उलझन और उसके समाधान को मानवीय मनोविज्ञान को ही जान एवं समझ कर पाया जा सकता है। इसे आप मानवीय उलझनों का मनोविज्ञान भी कह सकते हैं। अधिकतर समस्याओं का समाधान तो आसानी से मिल जाती है, लेकिन कुछ गूढ़ होती है। किसी भी चीज़ को यथास्थिति में समझना ही उसका समाधान है। अर्थात किसी भी चीज़ को उसी स्थिति, अवस्था, संरचना, विन्यास, ढांचा, परिस्थिति, पृष्ठभूमि और सन्दर्भ में समझ लेना ही उसका समाधान देता है। 

आज़ हमलोग मानव मन की उलझनों का विश्लेषण और उसका भिन्न-भिन्न संदर्भों, पृष्टभूमियों, परिस्थितियों एवं पारिस्थितिकीय परिवेशों में मूल्यांकन करना चाहेंगे। मानव की हर उलझन मनोवैज्ञानिक होती है, इसीलिए जिसके पास "मन" (Mind) नहीं होता है, उसके पास सुलझाने के लिए कोई उलझन भी नहीं होता है। अतः हमें सबसे पहले मानव को, मन को, उलझन को और मनोविज्ञान को समझ लेना चाहिए। दूसरे शब्दों में कहें, तो हमें मानव के मनोविज्ञान की क्रियाविधि का आलोचनात्मक चिंतन (Critical Thinking), यानि विश्लेषणात्मक मूल्यांकन (Analytical Evaluation) करना चाहिए। 

हम "मानव" (Man) उस स्तनपायी (Mammal) पशु (Animal) को कहते हैं, जो अपनी 'सोच' पर भी 'सोच' कर सकता है, और उसके 'सोच' में उसके निजी जीवन के अतिरिक्त अन्य का भी जीवन शामिल रहता है। इसी "सोच" के कारण एक होमो सेपियंस (Homo Sapiens) नामक दो पैरों वाला स्तनपायी पशु भी एक सामाजिक मानव (Homo Socius) और निर्माता मानव (Homo Faber) बन सका। यदि किसी मानव की सोच में यानि उसके जीवन में उसके अतिरिक्त कोई और परिवार, समाज, मानवता या प्रकृति शामिल नहीं है, तो वह महज़ एक पशु है, भले ही वह दो पैरों पर खड़ा है और कपड़े पहने हुए हैं। जो जीव बच्चे पैदा करता है, उसे पालता पोसता हुआ और उसे देखते हुए अपना जीवन व्यतीत कर लेता है, उसे ही पशु कहते हैं। एक मानव के जीवन मूल्य (Value of Life) में उसका समाज और मानवता के अतिरिक्त उसका प्राकृतिक पारिस्थितिकी भी शामिल होता है।

किसी का भी "मन" (Mind) उस जीवन इकाई का एक 'ऊर्जा का आव्यूह' (Matrix of Energy) होता है, जो उसके भौतकीय शरीर से सम्पोषित तो होता है, लेकिन उसके भौतकीय शरीर से बाहर होता है और उस व्यक्ति को संचालित, नियमित और नियंत्रित करता रहता है। किसी व्यक्ति का दिमाग (Brain) उसके 'मन' का मोड्यूलेटर (Modulator) होता है, जो उस व्यक्ति की भावनाओं, विचारों और व्यवहारों के लिए उसके मन और शरीर के मध्य एक अनुवादक की भूमिका अदा करता रहता है। मन को आप किसी का चेतना (Consciousness), या आत्म (Self) भी कह सकते हैं, लेकिन इसे भारतीय अवधारणा का आत्मा (Soul) कदापि नहीं कहा जाना चाहिए। किसी का आत्मा एक बार निर्मित तो होता है, परन्तु वह उसके जन्म मरण से परे होकर अपना अस्तित्व सदैव बनाए रखने का अवैज्ञानिक दावा करता है। मन किसी के जीवन में इतना महत्वपूर्ण है कि मन की अवस्था को बदल कर ही कोई अपना जीवन बदल सकता है। इसे ही कई विद्वानों ने भिन्न-भिन्न तरह से वर्णित किया है, यानि अभिव्यक्त किया है।

'उलझन' (Entanglement/ Complications /Tangles) मन की उस अवस्था को कहते हैं, जब 'मन' किसी भी भावना (Emotion), विचार (Thought), व्यवहार (Behaviour) यानि उसकी क्रियाविधि (Mechanism) को अच्छी तरह समझना चाहता है, लेकिन उसे अपनी महत्तम संतुष्टि तक नहीं समझ पाता है। इसी उलझन को ही कोई समस्या का स्वरूप समझता है। वैसे भी समस्या उसे कहते हैं, जिसका समाधान नहीं मिल पा रहा है। अतः किसी चीज को नहीं समझ पाना, यानि पूर्ण संतुष्टि तक नहीं जान पाना ही "उलझन" होता है। 

जब बात मनोविज्ञान की आती है, तब कोई भी इसे मन का विज्ञान समझता है, सही ही समझता है। अतः मनोविज्ञान मानव मन द्वारा संचालित, नियंत्रित और नियमित भावनाओं, विचारों और व्यवहारों का समुचित और सम्यक व्याख्या करता है। विवेकपूर्ण और व्यवस्थित ज्ञान ही विज्ञान है, अर्थात वैसा ज्ञान जो तार्किक भी हो, तथ्यात्मक भी हो, विवेकपूर्ण भी हो और व्यवस्थित भी हो, विज्ञान है। तार्किक अर्थात कार्य कारण पर आधारित हो। तथ्यात्मक अर्थात अवलोकन एवं परीक्षण योग्य हो और कल्पना आधारित नहीं हो। विवेकपूर्ण अर्थात उसमें वृहत् मानव कल्याण की भावना निहित हो, यह सब विज्ञान का एक अनिवार्य शर्त है। व्यवस्थित अर्थात क्रमानुसार एवं सरल, सहज और स्वाभाविक रूप में प्रस्तुति भी हो। इसी समेकित सम्पूर्णता को ही विज्ञान कहते हैं। विज्ञान सदैव अपने स्थापनाओं के विरुद्ध विचार भी आमंत्रित करता रहता है, ताकि वह बदलते संदर्भों, पृष्टभूमियों, परिस्थितियों और पारिस्थितिकीय परिवेशों में भी वास्तविकताओं की समुचित और सम्यक व्याख्या कर सके। अतः विज्ञान आस्थाओं का विरोधी भी होता है।

मानव मन को समझने में यदि आपने महान मनोवैज्ञानिक सिग्मंड फ्रायड की "मनोविश्लेषणात्मक" (Psycho Analytical) अवधारणा को नहीं समझा, तो मानव मन को समझना अधूरा रह जाएगा। यहां हम संक्षेप में फ्रायड के "Id," "Ego" और "Super ego" की अवधारणा को और उसकी क्रियाविधि को ही समझेंगे। मैं इन तीनों शब्दावली के हिन्दी अनुवाद के फेर में नहीं पड़ने जा रहा, ताकि आपको कोई भ्रम नहीं हो। यहां हम उसकी "रक्षा क्रियाविधि" (Defence Mechanism) को भी नहीं समझने जा रहें हैं।

मानव मन की तीन अवस्थाएं होती है। पहली अवस्था Id की होती है, जो एक मानव मन में सहज, स्वाभाविक रूप में, यानि प्राकृतिक रूप में उत्पन्न होती है। इसे पाशविक यानि जैवकीय प्रवृत्ति भी कह सकते हैं, क्योंकि यह सभी स्तनपायी पशुओं में स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होती है। यह शरीर के भौतिक अस्तित्व बनाए रखने के लिए अनिवार्य होता है। इसमें भोजन और यौन आनंद (Sex Pleasure) सबसे प्रमुख भूमिका में है। प्रकृति ने यौन आनंद के माध्यम से ही मानव की उत्तरजीविता (Survival) यानि निरन्तरता का सुनिश्चयन किया है। किसी व्यक्ति की Super Ego की अवस्था उस समाज की सांस्कृतिक मूल्यों एवं प्रतिमानों (Values n Norms) के अनुरूप उस व्यक्ति से उसके समाज को अपेक्षाएं (Expectations) होती है। इसे हम उस व्यक्ति के समाज की सामाजिक सांस्कृतिक भावनाओं, विचारों और व्यवहारों के उम्मीदों की अवस्था कह सकते हैं। एक मानव को अपने मन की पाशविक सहज प्रवृत्तियों  (Basic Instinct) और सामाजिक सांस्कृतिक आवश्यकताओं के बीच एक आवश्यक संतुलन बनाना होता है, जिसे ही Ego (अहम्) कहते हैं।

अर्थात एक मानव, जिसमें स्वाभाविक है कि इसमें महिला भी और इसके अन्य स्वरुप (Third Gender n Trans Gender) भी शामिल हैं, की भावनाओं, विचारों और व्यवहारों की व्याख्या इसी आधार पर किया जाना सम्यक, समुचित, वैज्ञानिक और आधुनिक होगा। इसीलिए यह व्याख्या संतोषप्रद भी होगा। बाकी अन्य व्याख्याएं भी इसी मूल अवधारणा की व्युत्पत्ति ही है। आप इस सामाजिक सांस्कृतिक मूल्यों एवं प्रतिमानों को समझने के लिए अब्राहम मैसलो का "अभिप्रेरणा सिद्धांत" (Theory of Motivation) को देख समझ सकते हैं, जो मानव मन को संचालित करने के लिए, यानि अभिप्रेरित करने के लिए प्रस्तुत है। लेकिन किसी व्यक्ति के जिद्द को यानि उसके बेवकूफी भरी हरकतों को समझने के लिए अब्राहम मैसलो का ही "हथौड़ा सिद्धांत" (Hammer Theory) को भी समझना चाहिए। यह जिद्द प्राधिकार प्राप्त व्यक्तियों के लिए लागू है, जिस पर हथौड़ा सिद्धांत स्पष्ट प्रकाश डालता है।

अब हम मानव मन की उलझनों को समझने के लिए एक सरलीकृत प्रस्तुति दे रहे हैं। आप भी अब्राहम मैसलो की पांचों अभिप्रेरक अवस्थाओं को जान समझ रहे हैं। तय है कि बच्चों की मानसिकता एवं व्यवहार संबंधी उलझनों को समझने के लिए यौन आनंद की अपेक्षा उसके भोजन और स्वास्थ्य सुरक्षा की आवश्यकता ज्यादा महत्वपूर्ण है। लेकिन जब कोई व्यक्ति युवा और प्रौढ़ावस्था में होता है, तो उसकी यौन आनंद की अनिवार्यता भी महत्वपूर्ण हो जाती है। हमें अब्राहम मैसलो की प्रेरक और बाध्यकारी अन्य अभिप्रेरक (Motive Drivers) आवश्यकताओं का ध्यान स्थिरता से रखना होता है। ध्यान रहे कि एक व्यक्ति अपने स्वीकरण (Self Actualization), आत्म संतुष्टि (Self Esteem), सुरक्षा, शारीरिक आवश्यकताओं और उसके सामाजिक सांस्कृतिक मूल्यों एवं प्रतिमानों के बीच संतुलित करने का प्रयास करता है। इसमें यौन आनंद यानि यौन संतुष्टि पर कई तरह के सामाजिक सांस्कृतिक मूल्यों एवं प्रतिमानों की कठोर संस्थागत ढांचा (Framework) और संरचना (Structure) का जाल (Web) बना हुआ होता है। परिणामस्वरूप लोगों को यौन आनंद की इच्छा या प्रवृत्ति को दबाना पड़ता है, या छिपाना पड़ता है। 

कभी कभी वैवाहिक जीवन में भी कार्य अधिकता, भौगोलिक दूरी, या अन्य कई कारणों से वैधानिक यौन साथी को पर्याप्त समय नहीं दिया जाता है। कभी कभी उच्च प्राधिकारों को बेहतर और सुविधाजनक यौन संतुष्टि का विकल्प भी मिल जाता है। तो ऐसी अवस्था मे किसी उच्चस्थ प्राधिकारों के Ego (अहम्) की क्रियाविधि की व्याख्याओं में इस महत्वपूर्ण कारक का ध्यान रखना होता है। अपराध अन्वेषण में भी जब कोई सूत्र स्वाभाविक रूप से और सहजता से स्थापित करना संभव नहीं होता है, तो अन्वेषक का ध्यान इस यौन आनंद के कारकों की ओर चला जाता है। जब कभी डिप्लोमेटिक संबंधों को भी समझने में उलझने आती है, तो यही सूत्र काम करता है।

अतः यदि आपके मानव मन को अपने आसपास या आपके किसी संज्ञान में आई किसी उलझन को समझने में कठिनाइयां हो रही है, तो आप उन उलझनों को समझने में महान मनोवैज्ञानिक सिग्मंड फ्रायड के मनोविश्लेषणात्मक अवधारणा को, अब्राहम मैसलो के अभिप्रेरणा सिद्धांत एवं हथौड़ा सिद्धांत, और इसमें यौन आनंद की प्रक्रिया को अवश्य ध्यान में रखिए, यह आपकी सारी उलझनों को सुलझा देगी। बशर्ते आपका विचाराधीन पात्र अपने यौवन की किस अवस्था में है। यहां यह भी ध्यान रहे कि यौन आनंद की अवस्था का शारीरिक उम्र की अपेक्षा मन की अवस्था यानि उमंग से ही है। 

अब आपको अपनी सभी उलझनों का समाधान मिल गया होगा।

आचार्य प्रवर निरंजन जी

  स्वैच्छिक सेवानिवृत्त

राज्य कर संयुक्त आयुक्त, बिहार, पटना।

  

 

शनिवार, 2 दिसंबर 2023

आज़ युवा शक्ति क्या करे?

वर्तमान भारत में युवा शक्तियों की स्थिति और प्रकृति को देखते हुए उनकी उर्जा, उत्साह और संसाधन को सकारात्मक, सृजनात्मक और उपयोगी दिशा में उत्पादक बनाने के लिए एक "पंच सूत्रीय कार्यक्रम" की आवश्यकता है, जो वर्तमान युवाओं की आवश्यकताओं और उनके मनोविज्ञान के अनुरूप हो तथा वर्तमान समाज के भी अनुकूल हो। इस पंच सूत्रीय कार्यक्रम में 'उद्यमिता', 'वित्तीय जागरूकता', 'सामाजिक अंकेक्षण', 'सांस्कृतिक सामाजिक रुपांतरण की क्रियाविधि', और 'सफलता का विज्ञान' शामिल है।

उद्यमिता (Entrepreneurship)

सबसे पहले उद्यमिता को समझते है। आज सरकारी एवं गैर-सरकारी क्षेत्रों में नौकरियों की जो स्थिति है और कई कारणों से इनकी जो भविष्य में संभाव्यताएं है; उसमें उद्यमिता ही एकमात्र बेहतर विकल्प है। विज्ञान की प्रगति, तकनीकी सुधार, आटोमेशन, सेवाओं की आउटसोर्सिंग आदि कई ऐसे क्षेत्र हैं, जो उद्यमिता के विकास को ही प्रेरित करते हैं। मैं परम्परागत अर्थव्यवस्था की बातें नहीं लिखूंगा, क्योंकि सामान्य बातें हर जगह हर कोई को उपलब्ध है। लाभ के साथ किसी भी समस्या का समाधान करना ही उद्यमिता है। उद्यमिता एक नजरिया है, सोच है, तकनीक है, कौशल है और कार्य पद्धति है, जिसे कोई भी मनोयोग से सीख सकता है। यह जन्मजात प्रतिभा भी नहीं है। यह कोई भी खीख सकता है, वशर्ते उसमें कुछ करने का एक बड़ा सपना हो।

बड़ा सपना क्या होता है? जब आप अपने सपनों में बहुत से लोगों के कल्याण को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप में शामिल कर लेते हैं, तो आपका सपना बड़ा हो जाता है। जब आप अपने सोच में समाज, मानवता और प्रकृति को समाहित कर लेते हैं, तो आप महान बन जाते हैं| इसी के साथ आपकी उद्यमिता में सफलता शुरू हो जाती है। आप अपने मेंटर (प्रणेता) उन्हें बनाए, जो धरातल पर सफलता पाई है। असफल और नकारात्मक, थके हुए (अब कुछ भी नया और अलग नहीं हो सकता है, वाले मानसिकता के लोग) एवं पके हुए (जो अपनी मानसिकता को बदलने को तैयार नहीं हैं), यानि हारे हुए लोगों से बचिए। सदैव रोने वाले अर्थात सारा दोष व्यवस्था में देखने वाले लोगों से भी बचिए।

डा भीमराव आंबेडकर का एक सूत्र याद रखिए - Educate, Agitate, Organize अर्थात ईच्छित उद्यमिता का अध्ययन कीजिए, उसका मनन, मंथन कीजिए और उसके निष्कर्ष पर पहुंचिएं| यहाँ ध्यान दिया जाय कि इसमें 'संघर्ष' यानि 'Struggle' शब्द नहीं है, अपितु 'Agitate' शब्द हैं| Agitate का अर्थ हुआ – मथना, मंथन करना| शब्द agitate से agitator बना है, जो दही का मंथन कर घी निकालता है। इस प्राप्त निष्कर्ष के लिए संगठन बनाइए या पूर्व से बने किसी संगठन में शामिल होइए, ताकि आपको यथावश्यक दिशा निर्देश मिलता रहे। यह मनोबल बढ़ाए और बनाए रखने के लिए भी आवश्यक है। और सामान्य लोग इस उक्ति का अन्यथा अर्थ निकालते हैं, तो मुझे इस पर टिप्पणियां नहीं करना है।

भावी उद्यमिता की संभावनाओं को देखने के लिए आपको एक इतिहास बताता हूं। अठारहवीं शताब्दी में Steam Revolution,  उन्नीसवीं शताब्दी में Electricity Revolution, बीसवीं शताब्दी में Computer Revolution, तथा इक्कीसवीं शताब्दी में Intelligence Revolution हुआ है। इससे आपको वर्तमान और भविष्य के उद्यमिता को दृष्टि मिलेगा। इसी संदर्भ में आपको एक बात और बताना चाहता हूं। रुपांतरण (transformation) भी सृजन की श्रेणी में आता है। इसमें पुनर्स्थापन (Relocation), पुनर्चक्रण (Rotation), परावर्तन (Reflection), अनुकरण या अनुवाद (अपनी इच्छाओं, भावनाओं और सांस्कृतिक आवश्यकताओं के अनुरूप) (Translation), और पुनः आकृति निर्धारण ( Re - shaping) भी उद्यमिता के क्षेत्र में नवाचार (Innovation) लाता है, या ला सकता है।

अर्थव्यवस्था के छात्र जानते हैं कि अर्थव्यवस्था का सेक्टर (Sector) में वर्गीकरण किया गया है। परन्तु सामान्य जनों के लिए इसकी पुनरावृति कर रहा हूं। प्राथमिक प्रक्षेत्र (Primary Sector) वह है, जिसमें प्रकृति प्रदत्त उत्पादों या संसाधनों का दोहन किया जाता है, जैसे कृषि, बागवानी, खनन, जलजीव उत्पादन, वनोत्पाद आदि है। द्वितीयक प्रक्षेत्र (Secondary Sector) में  प्राथमिक प्रक्षेत्र से प्राप्त वस्तुओं का मूल्य संवर्धन (Value Addition) किया जाता है, उसकी उपयोगिता को कई तरीकों से बढ़ाया जाता है। इसे औद्योगिक उत्पादन भी कहा जाता है। तृतीयक प्रक्षेत्र (Tertiary Sector) में सेवा क्षेत्र आता है। हालांकि सभी क्षेत्र महत्वपूर्ण है, परन्तु उच्चतर श्रेणी के क्षेत्र बेहतर आय के श्रोत होते हैं और वे निम्नतर क्षेत्रों के मजबूती पर आधारित होते हैं। चतुर्थक प्रक्षेत्र (Quaternary Sector) ज्ञान आधारित नया उभरता हुआ सितारा है। इसमें सूचनाओं को आधार बनाकर नीचे के क्षेत्र को ज्यादा उपयोगी बनाया जाता है। प्रसिद्ध प्रबंधन चिंतक फिलिप कोटलर कहते हैं कि यह युग “सूचनाओं” का नहीं रहा, अपितु यह “सूचनाओं के शेयरिंग” का हो गया है। पंचम प्रक्षेत्र (Quinary Sector) में वे गतिविधियां शामिल हैं, जिसमें चतुर्थ क्षेत्र से प्राप्त सूचनाओं के आधार पर नीतियों का निर्धारण किया जाता है। इसमें इन सूचनाओं के आधार पर आइडिया (Ideas) का नवनिर्माण किया जाता है, सूचनाओं का पुनर्गठन किया जाता है, नए और पुराने सूचनाओं की नई व्याख्या कर नए आईडिया का निर्माण किया जाता है, नई तकनीक विकसित की जाती है और पूर्वानुमान भी किया जाता है। यह क्षेत्र भारत में पूरी तरह से नया है, पर पूरी संभावनाओं से भरा हुआ है। विचार ही धन है। जब आप इस पर विचार करेंगे, तो संभावनाओं का दरवाजा भी खुल जाएगा।

उद्यमिता का क्षेत्र सिर्फ वस्तुओं और सेवाओं में ही नहीं है, बल्कि ज्ञान में भी विविधता से भरा क्षेत्र है। अब आप उद्यमिता का वैधानिक पहलू भी समझ लें। शुरुआती कारोबार में व्यवसाय स्वामित्वाधीन (Proprietorship) होना चाहिए, यदि आप इस उद्यमिता के क्षेत्र में नए है और आप छोटा स्तर पर ही शुरुआत कर रहे हैं। इसमें कराधान में विशेष छूट नहीं मिलता, पर इसे करना, सम्हालना और बढ़ाना आसान होता है। इसमें आपमें और आपके व्यवसाय के वैधानिक उत्तरदायित्व में अन्तर नहीं किया जाता है। एक से अधिक व्यक्तियों के द्वारा साझेदारी फर्म होता है, जो साझेदारी (Partnership) अधिनियम, 1932 के द्वारा संचालित और नियंत्रित होता है। इसमें उत्तरदायित्व का बंटवारा वैधानिक रूप से नहीं किया जाता है, जो मुख्य वैधानिक नकारात्मक पहलू है। उत्तरदायित्व के सीमित निर्धारण करने के लिए दो वैधानिक फर्म है - 'कम्पनी' और ‘एल एल पी’। एक कम्पनी भारतीय कम्पनी अधिनियम, 2013 से और एक ‘एल एल पी’ ‘सीमित उत्तरदायित्व साझेदारी अधिनियम, 2008’ से संचालित और नियंत्रित किया जाता है। सामाजिक कार्यों और अलाभकारी उद्यमिता के लिए सोसायटी रजिस्ट्रेशन अधिनियम 1860,  भारतीय न्यास (ट्रस्ट) अधिनियम 1882, सहकारिता अधिनियम 1912, कम्पनी अधिनियम 2013 आदि का प्रावधान है। यहां यह बताना ही प्रर्याप्त है कि आप इनकी समझदारी और जानकारी रखें; अन्यथा विधि आपको सभी संबंधित चीजों का जानकार मानता है| वैसे आप भारतीय संबंधित पदाधिकारियों के सहयोगात्मक रवैया से आप वाकिफ होंगे ही। इसमें कई विभिन्न शुभचिंतकों से राय ले सकते हैं, गूगल से भी सलाह लें सकते हैं। बाजार में कई रूपों में सलाहकार हैं, जिनकी अज्ञानता, और उनकी नियत भी ध्यान देने योग्य होता है।

कई सरकारी प्रशिक्षकों को देखा है, वे खुद उद्यमी नहीं बन सके और आज भी किसी के नौकर ही है; पर उद्यमिता का प्रशिक्षण दे रहे हैं, संस्कार सिखा रहे हैं। उद्यमिता एक संस्कार है और इसका संचरण वे नहीं कर पाते| जिसमें उद्यमिता का यह संस्कार है ही नहीं, वह दूसरों को उद्यमिता का संस्कार कैसे दे सकता है? 

हमें प्रेरणा (Motivation) और अन्तप्रेरणा (Inspiration) में अन्तर समझना जरूरी है। प्रेरणा बाहरी कारक है और अन्तप्रेरणा आन्तरिक कारक है। प्रेरणा बाहरी सुविधाएं, अनुदान आदि से संचालित होता है, जबकि अन्तप्रेरणा आन्तरिक कारणों से, जो ज्यादा महत्वपूर्ण है। उद्यमिता के लिए आन्तरिक कारणों का होना अनिवार्य है, अन्यथा इन उद्यमियों के जल्दी टूट जाने का ख़तरा रहता है। मानसिक रूप से मजबूत होना ज्यादा जरूरी है। मन के सारे हार है। इसीलिए कहा गया है कि हर दस उद्यम में आठ उद्यम असफल हो जाते हैं, परन्तु हर दस उद्यमी में नौ उद्यमी सफल हो जाते हैं। उद्यमिता एक नाज़ुक, परन्तु महत्वपूर्ण एवं विशाल अवधारणा है और इसी कारण इसे पूर्णतया संतोषजनक और गारंटी युक्त नहीं बताया जा सकता है। इसका सतत विकास होता है और इसलिए शुरुआती दौर में इसे सरल, एवं छोटा उद्यम से ही शुरू कर जटिल, एवं बड़ा की ओर अग्रसर होना चाहिए।

वित्तीय जागरुकता (Financial Awareness)

वित्तीय जागरुकता या वित्तीय समझदारी या वित्तीय साक्षरता, सभी एक ही संदर्भ में है और यह धन से संबंधित भावना, व्यवहार और चिंतन प्रणाली है। इसमें धन (Wealth) को पूंजी (Capital) बनाने, बचत एवं निवेश, संरक्षण, संवर्धन एवं उपयोग से संबंधित क्रियाविधि को समझा जाता है। इसमें पूंजी बाजार सबसे प्रमुख है। इसके डिजीटलीकरण को समझना और इसका समुचित उपयोग भी शामिल हैं। इसमें भविष्य के ‘ब्लाक चेन तकनीक’ पर आधारित ‘क्रिप्टोकरेंसी’ को भी जानना और समझना जरूरी होगा। मैंने इस विषय पर कई आलेख अपने ब्लॉग पर लिखे है, यथा धन का विज्ञान (https://niranjan2020.blogspot.com/2023/05/blog-post.html), सदाबहार अमीरी का रहस्य (https://niranjan2020.blogspot.com/2020/06/secret-of-perpetual-rich.html), आपकी वित्तीय जागरुकता (https://niranjan2020.blogspot.com/2020/06/your-financial-awareness.html)। इसीलिए यहां दोहराव से बचना चाहता हूं।

सामाजिक अंकेक्षण (Social Audit)

सामाजिक अंकेक्षण सरकारी तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार समाप्त करने का अमोघ अस्त्र है। इसमें कोई व्यक्ति (Person) एक नागरिक के रूप में सूचना अधिकार अधिनियम, 2005 के अन्तर्गत सरकारी धन से संचालित योजनाओं एवं कार्यक्रमों की जानकारियों को प्राप्त करता है। फिर इन जानकारियों एवं प्रगति का सत्यापन उस क्षेत्र में किए गए धरातलीय कार्यो का मिलान लाभार्थी एवं स्थल पर प्रत्यक्ष अवलोकन से करता है और सरकार द्वारा निर्धारित लक्ष्य एवं प्रक्रिया के आलोक में अंकेक्षण करता है। इससे भ्रष्ट प्रक्रिया पर अंकुश लगता है और बेहतर परिणाम के लिए सुझाव आते हैं। इसका प्रशिक्षण युवाओं में नवनिर्माण के लिए सकारात्मक और उत्पादक जोश पैदा करता है और सरकारी तंत्र को स्वस्थ्य एवं बेहतर परिणाम देता है। इस अंकेक्षण प्रतिवेदन को सरकार के साथ साथ प्रिंट और डिजिटल मीडिया में दिया जा सकता है। इसका व्यवहारिक पहलू इस अंकेक्षण को कई गुणा कर प्रसारित कर वाइरस की तरह तेजी से फैलाता है और भ्रष्ट आचरण पर रोक लगाता है।

सांस्कृतिक रुपांतरण की क्रियाविधि (Mechanism of Cultural Transformation)

‘सांस्कृतिक सामाजिक रुपांतरण की क्रियाविधि' यानि इसके इतिहास एवं विज्ञान को वैज्ञानिक तरीके से जानना हर युवाओं के लिए अनिवार्य है। व्यवस्थित एवं विवेकपूर्ण ज्ञान को ही विज्ञान कहते हैं। सांस्कृतिक सामाजिक रुपांतरण को समझने के वैज्ञानिक तरीके है, जिसके बारे में प्रसिद्ध इतिहासकार प्रो रामशरण शर्मा जी ने बताया है। इनके अनुसार वैज्ञानिक इतिहास उत्पादन (और वितरण, विनिमय एवं उपभोग) की शक्तियों और उसके अन्तर्संबंधों के आधार पर समझा जाना चाहिए। वैज्ञानिक इतिहास तथ्यों, तर्कों और वैज्ञानिक प्रविधियों पर आधारित होना चाहिए; न कि भावनाओं, आस्थाओं और मनगढ़ंत मान्यताओं पर आधारित हो। यह वैज्ञानिक इतिहास लेखन इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इतिहास बोध ही समाज की संस्कृति का निर्धारण करता है। संस्कृति हमारे समाज रुपी कम्प्यूटर का वह साफ्टवेयर है, जो समाज को अचेतन, अवचेतन और सचेतन स्तर पर संचालित और नियंत्रित करता है। 

आज यदि हम रुढिवादिता, अंधविश्वास, जड़ता और पाखंड में अपना महत्तम ऊर्जा, समय, उत्साह और संसाधन बर्बाद कर रहे हैं, तो उसका एकमात्र कारण हमारा दूषित संस्कृति है| यह दूषित संस्कृति गलत और सामंतवादी इतिहास बोध से उत्पन्न हुआ है। प्रसिद्ध इतिहासकार प्रो ई एच कार अपनी पुस्तक ‘What is History’ में लिखते हैं कि ऐतिहासिक चिंतन हमेशा उद्देश्यवादी होता है। इतिहास के तध्य शुद्ध वस्तुनिष्ठ नहीं हो सकते, क्योंकि वे इतिहास के तथ्य तभी बनते हैं, जब इतिहासकार उसको महत्त्व देता या नकारता है। इतिहास में विकास का अर्थ है, मानव के स्वाधीनता की धारणा की दिशा में विकास। अभी तक इतिहासकारों में बहुलता उनकी ही है, जिन्हें यथास्थितिवादी यानि सांस्कृतिक सामंतवादी मानने में संकोच नहीं होना चाहिए।

भारत के लोग जाति, वर्ण, और धर्म के आधार पर कई वर्गो में विभक्त है। भारत का सामाजिक एवं सांस्कृतिक विकास का इतिहास अवैज्ञानिक है। भारत के इतिहास पर सामंतवाद के प्रभाव का सम्यक अध्ययन नहीं किए जाने से अवैज्ञानिक सामंतवादी मानसिकता को मजबूती मिली हुई है। मानव की उत्पत्ति, प्रवास और सामाजिक विकास की गाथा यथास्थितिवाद बनाएं रखने को ही व्याख्यापित है। भारत के सशक्त और अग्रणी राष्ट्र निर्माण की पहली अनिवार्य शर्त इस कम्प्यूटर रुपी तंत्र का संस्कृति रुपी साफ्टवेयर को सुधारना है, जो इतिहास के वैज्ञानिक लेखन से ही होगा।

सफलता का विज्ञान (Science of Success)

सफलता का विज्ञान यानि सफलता प्राप्त करने की वह वैज्ञानिक और व्यवहारिक प्रविधि है, जिसको जानना और समझना हर भारतीय युवाओं के लिए जरूरी है। विचार एवं मानसिकता कैसे भौतिकता में रुपांतरित होता है और क्रियाओं को कैसे संचालित करता है - यह जानना जरूरी है। बुद्ध के दर्शन में मन को सभी चीजों का केन्द्र बिन्दु स्वीकार किया गया है। मन को सभी चीजों का पूर्वगामी माना गया है। मन ब्रह्मांड में फैला क्वांटम फील्ड पर ऊर्जा डालकर उन चीजों को उत्पन्न करता है, जिनको मन उत्पन्न करना चाहता है (क्वांटम क्षेत्र का अवलोनकर्ता का सिद्धांत)। मन यदि नियंत्रण में है, तो सब कुछ नियंत्रण में है। मन ही सभी मानसिक क्रियाओं में प्रधान है, जो सुविचारित लक्ष्यों को भौतिक तथ्यों में रुपांतरित करता है। अल्बर्ट आइंस्टीन ने इसलिए ही कल्पना (Imagination) अर्थात मन की उड़ान को ज्ञान से ज्यादा महत्वपूर्ण माना। वैज्ञानिक सर रोजर पेनरोज ने मन एवं चेतनता के संबंधों की वैज्ञानिक व्याख्या करते हुए बताते हैं कि जब हम किसी चीज पर मन को स्थिर करते हैं अर्थात अपनी सोच को स्थिर करते हैं, तो उस वस्तु के उन तरंगीय ऊर्जा में से प्रकटीकरण की संभावना बढ़ जाती है, जिस वस्तु को हम प्रकट देखना चाहते हैं। इसके लिए मन को संकेंद्रित करना चाहिए, जिसे विपश्यना भी कहा जाता है। इन सभी के लिए संक्षेप में विचार करना, कल्पना करना और लक्ष्य के लिए संगठित होकर शुरू करना जरूरी है।

अंत में सकारात्मक मनोविज्ञान (Positive Psychology)  के जनक अब्राहम मैसलो (1908-1970), एक अमेरिकी मनोवैज्ञानिक, का एक प्रसिद्ध पक्ति को दुहराना चाहूंगा, जो 1966 में प्रकाशित उनकी प्रसिद्ध पुस्तक  "The Psychology of Science" में है -

"If you have a Hammer, everything looks like a Nail." यदि आपके पास हथौड़ा है, तो आपको हर चीज कांटी की तरह ही दिखेगा। अर्थात आप हर चीज में हथौड़े के प्रयोग उपयोग करने को उद्यत होते हैं।

इसे मैं ऐसे भी लिखता हूं कि यदि कांटी को ठोकने के लिए हथौड़ा लेकर तैयार होते हैं, तो आपका ध्यान सिर्फ लक्ष्य (कांटी) पर होता है। अतः युवाओं से अनुरोध है कि आप तैयार रहें, निशाने पर कांटी ही होगा। आपके द्वारा समृद्ध, सुखमय और शांतिमय अग्रणी और विकसित भारत का उदय होगा।

आचार्य निरंजन सिन्हा

मौतें सामाजिक और ऐतिहासिक भी होती है

जी, यहाँ आदमियों की मौतों के बारे में बात हो रही है| शारीरिक मौतों के बारे तो सब कोई बहुत कुछ जानते हैं, लेकिन आज हमलोग सामाजिक मौतों और ऐ...