रविवार, 20 अगस्त 2023

सत्य सदैव सही क्यों नहीं होता?

सत्य (Truth) सदैव सही नहीं होता है| 'सही' का अर्थ यहाँ ‘Correct’ भी है, समुचित (Proper) भी है, और उपयुक्त (Appropriate) भी है, क्योंकि ‘शब्दों का अपना कोई अर्थ ही नहीं होता है’| 

‘शब्दों का अर्थ सदैव पाठक का होता हैं’, जो उनकी संस्कृति, उनके पारितंत्र (Ecosystem) एवं उनके इतिहास बोध (Perception of History) से निर्धारित होता है| प्रसिद्ध भाषा विज्ञानी फर्डीनांड डी सौसुरे तो शब्दों के ‘सतही’ (Superficial) अर्थ, ‘निहित’ (Implied) अर्थ, ‘भावात्मक’ (Emotional) अर्थ और ‘संरचनात्मक’ (Structural) अर्थ की ओर स्पष्ट रूप से ले जाते हैं| अर्थात प्रत्येक ‘सत्य’ का सतही अर्थ भी होता है, कुछ विशिष्ट लक्षित (Targeted) निहित अर्थ भी होता है, कुछ किसी की भावना को उकेरता हुआ या किसी गहराई से उखाड़ता हुआ और अपने बहाव में ‘उड़ा’ ले जाता हुआ अर्थ रखता है, या अपने संरचनात्मक बनावट के ढाँचे (Frame – Work) में डुबाता हुआ या उलझता हुआ अर्थ भी देता है|

अर्थात सत्य कभी भी एक स्थान और एक समय पर स्थिर नहीं होता है, लेकिन यह भी वस्तुओं की प्रकृति के अनुसार बदल भी जाता है| कहने का तात्पर्य यह है कि ‘भौतकीय’ सत्य एक स्थान और एक समय पर स्थिर हो सकता है, लेकिन ‘चेतनता’ युक्त वस्तुओं अर्थात जीवों का सत्य एक स्थान और एक समय पर स्थिर नहीं होगा|आप चेतनता को किसी के ‘मन’ (Mind) एवं Spirit (आत्म भाव) के रूप में समझ सकते हैं| आप भी जानते हैं कि किसी का मन एवं आत्म भाव उसके दिमाग (Brain) से अलग होता है, लेकिन किसी का दिमाग ही किसी के मन या आत्म (Self) का Modulator (मौडूलेटर – समझने योग्य अर्थ देने वाला) का काम करता है, और इसीलिए मन एवं आत्म भाव का दिमाग से अलग होते हुए भी एक दुसरे से पूरी तरह सम्बद्ध है|

अल्बर्ट आइन्स्टीन ने तो ‘सापेक्षवाद’ (Relativity) का सिद्धांत दे कर सभी कुछ को सापेक्षिक बना दिया| यानि परिस्थितियाँ (Situation) बदल दीजिए, सन्दर्भ (Reference) बदल दीजिए, पृष्ठभूमि (Background) बदल दीजिए, पारितंत्र (Ecosystem) यानि पर्यावरण बदल दीजिए, नजरिया (Attitude) बदल दीजिए, परिप्रेक्ष्य (Perspective) बदल दीजिए, किसी का सभी अर्थ ही बदल जाता है| जब एक ही तथ्य के इतने रूप या स्वरुप उपलब्ध हैं, तो यह भी स्पष्ट है कि इसकी उपयोगिया, इसकी ग्राह्यता, इसकी स्वीकार्यता का स्तर भी भिन्न भिन्न होगा ही|इसीलिए कहा जाता है कि एक ही तथ्य के कई सत्य होते हैं। तो सत्य के स्वरुप या प्रकार इतने क्यों हो जाते हैं, यह अभी तक पूरी तरह से स्पष्ट नहीं हो पाया है|

क्योंकि किसी भी सत्य को व्यक्ति, वर्ग, समाज और संस्कृति की अनुमोदन (Approval) की आवश्यकता होती है और उसके बाद ही वह सही साबित हो सकता है| इसीलिए सत्य सदैव सही नहीं हो पाता है, यानि सत्य सदैव कारगर यानि असरदार नहीं हो पाता है| सत्य अक्सर सामान्य लोगों के लिए कठोर, निष्ठुर और विचलित करने वाला भी होता है, क्योंकि यह परम्परागत मान्यता यानि सोच यानि अवधारणा से भिन्न होता है, और इसीलिए सामन्य जनों की सामान्य आदत से भिन्न या विपरीत भी हो जाता है| इसी कारण एक सत्य हर व्यक्ति, हर वर्ग, हर समाज और हर संस्कृति को सहजता से, सरलता से और स्वभाव से स्वीकार्य भी नहीं होता है। एक अलग और भिन्न सत्य को जानने एवं समझने के लिए उसमे विश्लेष्णात्मक मूल्याङ्कन की क्षमता एवं स्तर चाहिए, जो सामान्यत: सामान्य लोगों मे होता ही नहीं है| इसी आवश्यक विशेषता को आजकल आलोचनात्मक चिंतन (Critical Thinking) भी कहते हैं|

यह धारणा एक महज मिथक है, एक महाझूठ है कि सत्य हमेशा कारगर होता है और इससे सदैव हर समस्या का समाधान पाया जा सकता है। लेकिन यह धारणा सदैव ग़लत भी नहीं है। यह भौतिक वस्तुओं के संदर्भों में है, यानि यह भौतिकीय वस्तुओं एवं इंजीनियरिंग के लिए पूर्णतया सही ही है| यह सत्य निश्चित ही है और इसी कारण इस पर आज विज्ञान, इंजीनियरिंग (अभियंत्रण) एवं तकनीक (Technology) का इतना विकास हो चुका है। सत्य सदैव भौतिक वस्तुओं के संदर्भ में पूर्णतया सही होता हैं, लेकिन जहाँ मन है, चेतना है, वहाँ भावना है और इसीलिए वहाँ स्थिति बदल जाती है।

इसीलिए यह भी कहा जाता है कि लोकतंत्र (Democracy) के भविष्य का निर्णय इस बदलते समय में लोकतंत्र के मतदाता वास्तव में नही करते हैं, बल्कि इस बदलते तकनिकी युग में मतदाता के मत का निर्णय उसकी संस्कृति (सम्प्रदाय/ पंथ), बाजार (Market), सत्ता (राज्य/ Authority), एवं तकनीक (डिजीटल तकनीक सहित) के ध्वजवाहकों का संयुक्त गठबंधन या ‘महासत्ता’ करता है| यानि यह महासत्ता मतदाता के मन को ही उड़ा ले जाता है, या बहा ले जाता है| अर्थात इस बदलते युग में मतदाता अब गणतंत्र (Republic) एवं लोकतंत्र का वास्तविक नियामक नहीं रह गया है, वैसे सभी कोई अपने अपने भ्रम (Illusion) या विभ्रम (Delusion) में जीने के लिए या मानने के लिए स्वतंत्र हैं|

‘विचारों के उपनिवेशीकरण’ के लिए यानि लोगों को ‘मानसिक गुलाम’ यानि दास बनाने के लिए यानि ‘अंधभक्त अनुयायी’ बनाने के लिए इतिहास, मनोविज्ञान एवं संस्थान का सक्रिय एवं उत्साही समर्थन की आवश्यकता होती है| संस्थान में सरकार सहित व्यवस्था एवं संस्कृति भी समाहित होता है| हमारी संस्कृति ही हमारे विचारों, संस्कारों, आदर्शों एवं व्यवहारों का नियामक एवं सञ्चालन कर्ता है, और हमारी संस्कृति हमारे इतिहास के बोध (Perception of History) से निर्मित होता है| यह मानवीय मनोविज्ञान की अनिवार्यता है कि अज्ञानी (डिग्रीधारी भी इसमें शामिल हैं) समाज में एवं अवैज्ञानिक संस्कृति में इतिहास का मिथकीकरण करना पड़ता है| किसी को भी नई या अलग सामाजिक एवं सांस्कृतिक अवधारणाओं या प्रस्थापनाओं की स्वीकार्यता के लिए इतिहास को ढाल यानि बंकर यानि छत के रूप में सहारा लेना पड़ता है, और इसीलिए मिथक को एक इतिहास के रूप में प्रस्तुत होना होता है| इतिहास को सनातन, पुरातन, और गौरवमयी बनाया जाता है, या बताया जाता है, लेकिन इतिहास के आड़ में मिथक ही इतिहास बन जाता है|

इतिहास को मानव मन के अनुकूल या मतदाता के मन के अनुकूल ढालने में या ‘अंधभक्त’ बनाने में ही मिथक काम आता है|मिथक अपने लक्षित मानव मन या मतदाता मन या अनुयायियों के ज्ञात सोच, संस्कार एवं संस्कृति के इतिहास के अनुरूप तैयार कर उसे सहज, सरल एवं स्वीकार्य बनाता है| यह सब उन लोगों पर लागू होता है, जिनमे आलोचनात्मक चिंतन का स्तर एवं क्षमता नहीं होता है| अर्थात जो लोग साक्षर एवं डिग्रीधारी तो होते हैं, परन्तु वे तार्किक, तथ्यपरक, विवेकशील एवं वैज्ञानिक मानसिकता के नहीं होते हैं, और इसीलिए उनमे आलोचनात्मक चिंतन नहीं ही होता है| अर्थात उनमे विश्लेष्णात्मक क्षमता, मूल्यांकन क्षमता और शंका करने की या प्रश्न- प्रतिप्रश्न करने की क्षमता एवं स्तर नहीं होता है, तब उनके लिए मिथक ही वास्तविक इतिहास का काम करता है| मिथक को समझना सरल होता है और सत्य को समझना कठिन होता है। सत्य तार्किक एवं तथ्यात्मक होता है| मिथक के बेसिर पैर का होने के बावजूद मिथक को समझना मानना आसान होता है, क्योंकि मिथक वाचक समाज के प्रतिष्ठित, सम्मानित एवं आदरणीय होते हैं|

फ्रांसीसी दार्शनिक जाक देरिदा का विखंडनवाद भी यही कहता है कि शब्द तो लेखक के होते हैं, लेकिन उसके अर्थ पाठकों के अपने होते हैं। मतलब एक ही शब्द के अर्थ पाठकों के अनुसार बदलता रहता है। 

इसलिए सिर्फ सत्य के सहारे आप सदैव विजयी नहीं हो सकते। सत्य सर्वव्यापक हो सकता है, परन्तु स्थानीयता और इसलिए उसकी भौगोलिकता, संस्कृति, मान्यता, परम्परा, आदर्श, मूल्य एवं प्रतिमान आदि को महत्वपूर्ण बनाने के लिए ही इतिहास के स्थान पर मिथक को आना पड़ता है| मिथक इतिहास को मानने एवं समझने में सरल, साधारण एवं सहज बना देता है, और इस तरह मिथक की स्वीकार्यता एवं मान्यता बढ़ जाती है| इसीलिए मानव मन या मतदाता मन या अंधभक्त अनुयायियों के लिए सत्य प्रभावी नहीं हो पाता है| आपसे अनुरोध है कि इसके अग्रेतर चिंतन आप स्वयं करे, और मुझे भी अपनी टिपण्णी से लाभान्वित करें|

आचार्य प्रवर निरंजन जी

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शनिवार, 12 अगस्त 2023

आधुनिकता की उलझनें

(Entanglements of Modernity)

यदि कोई व्यक्ति डार्विन के उद्विकास के सिद्धांत (Theory of Evolution) को

जानता है और समझता भी है, फिर भी ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार करता है,

और तदनुसार व्यवहार भी करता है, तो वह आधुनिकता की उलझनों में उलझा हुआ है|

यदि कोई व्यक्ति जानता है कि विश्व के सभी वर्तमान मानव एक ही व्यक्ति (होमो सेपियन्स) की संताने हैं, और यह भी जानता है कि सभी विभिन्नता उस समय के तत्कालीन पारितंत्र यानि पर्यावरण में बचे रहने के लिए प्राकृतिक अनुकूलन का ही परिणाम है, और फिर भी वह जाति एवं प्रजाति की भिन्नताओं में विश्वास करता है, तो वह अवश्य ही आधुनिकता की उलझनों में उलझा हुआ है|

यदि कोई व्यक्ति विज्ञान के मूल तत्वों को जानता है और

फिर भी आत्मा (आत्म नहीं) एवं पुनर्जन्म में विश्वास रखता है और

सम्बन्धित पाखण्ड, ढोंग, अंधविश्वास को अपनाता भी है,

तो वह अवश्य ही आधुनिकता की उलझनों में 

फंसा हुआ है|

और सबसे बड़ी बात यह है कि, 

यदि किसी व्यक्ति को आलोचनात्मक चिंतन (Critical Thinking) करना नहीं आता है, यानि इसकी समझ नहीं है, तो वह व्यक्ति अवश्य ही आधुनिकता की ओर नहीं चल रहा है, और वह अभी आधुनिकता की उलझनों में उलझा हुआ है| ऐसा व्यक्ति इसीलिए किसी भी शब्द, वाक्य या सन्दर्भ के सतही (Superficial) अर्थ और उसका निहित (Implied) अर्थ की भिन्नता को नहीं समझ पाता है| अर्थात उसे अभिव्यक्ति के शब्दों, वाक्यों एवं सन्दर्भों की संरचनात्मक बनावट (Sructural Construct) की समझ नहीं है, और इसीलिए वह आधुनिक होने की समझ रख कर भी उसमे उलझा हुआ है|

तो आधुनिकता (Modernity) क्या है और उसकी उलझने (Entanglement) क्या है? क्या यह पश्चिमीकरण (Westernisation) ही है, या कोई भिन्न अवधारणा है?

आधुनिकता एक ऐसी अवधारणा है, जिसे अधिकतर लोग जाने समझे बिना ही आधुनिक होने का दावा करते हैं, या आधुनिक होना समझ लेते हैं| दरअसल पश्चिमीकरण यानि पश्चिम का नक़ल यानि अनुकरण को ही आधुनिकीकरण समझने का भ्रम पाल लेते हैं| आधुनिकीकरण पश्चिमीकरण की अपेक्षा ज्यादा निरपेक्ष अवधारणा है, यानि पश्चिमीकरण एक सापेक्षिक अवधारणा है| इस गोलानुमा (Spherical) पृथ्वी पर पश्चिम का होना एक सन्दर्भ बिंदु के सापेक्ष होगा, जो सन्दर्भ बिंदु के सापेक्ष बदलता हुआ हो सकता है| हालाँकि पश्चिमीकरण अवधारणा पश्चिम जगत के अनुकरण करने के लिए प्रयुक्त है, जिसमे यूरोप एवं अमेरिका की संस्कृति का अनुकरण शामिल माने जाते हैं| और इसीलिए आधुनिकीकरण अवधारणा किसी क्षेत्र विशेष से बंधा हुआ नहीं है| अर्थात सभी आधुनिक व्यक्ति सिर्फ पश्चिम का ही हो, या सभी पश्चिमी व्यक्ति ही आधुनिक हो, ऐसा पूर्ण रुपेण संभव नहीं है|

इस तरह पश्चिमीकरण पश्चिमी संस्कृति का अनुकरण है, जबकि आधुनिकीकरण अपनी संस्कृति को वैज्ञानिकता के अनुरूप ढालना है| ये दोनों यानि पश्चिमीकरण एवं आधुनिकीकरण किसी समाज की गत्यात्मकता (Dynamism) को समझने का उपकरण है, या अवधारणा है| समाज की गत्यात्मकता ही स्वाभाविक रूप में संस्कृति में बदलाव या रूपांतरण है| पश्चिमीकरण की अवधारणा प्रोफेसर मैसूर नरसिंघाचार श्रीनिवास ने और आधुनिकीकरण की अवधारणा डैनियल लर्नर ने दिया है| किसी को पश्चिमी बनने के लिए कोई अतिरिक्त प्रयास नहीं करना पड़ता है, परन्तु किसी को आधुनिक बनने के लिए उसे सजग, सतर्क एवं निश्चित वैज्ञानिक प्रयास करना ही होगा| मतलब आधुनिक बनने के लिए ज्ञान यानि बुद्धिमत्ता की जरुरत होती है, और इसीलिए बहुत से डिग्रीधारी एवं पदधारी कोट पेंट पहनकर ही आधुनिक हो जाना समझ लेते हैं, जबकि उनके पास इसका ज्ञान एवं समझ ही नहीं होता है|

आधुनिकीकरण जहां समाज के लोगों का जीवन, संस्कार, मूल्य, आदर्श, संस्कृति, शिक्षा आदि को वैज्ञानिक बनाकर बेहतर बनाता है, वही पश्चिमीकरण मात्र पश्चिमी समाज एवं जीवन शैली का अनुकरण मात्र है| उदाहरण स्वरुप पश्चिम में ठण्ड के कारण भोजन करने में काँटा चम्मच का प्रयोग किया जाता है, और उसका गर्म देशों में भी उपयोग करना पश्चिमीकरण है, आधुनिकीकरण नहीं है| यह एक अलग बात है कि अधिकतर पश्चिमी देश विकसित हैं, और इसीलिए वहां आधुनिकीकरण भी बहुत हद तक सामानांतर क्रियान्वित है| इसी कारण बहुत से लोगों को पश्चिम का अनुकरण करना ही आधुनिकीकरण लग जाता है| दरअसल उनमे आलोचनात्मक चिंतन की कमी होती है| आधुनिकीकरण में विरासत की बहुत से अंधविश्वास, ढोंग एवं पाखंड को छोड़ना होता है, जबकि पश्चिमीकरण में पश्चिम के नक़ल करने से शुरू होता है|

इस तरह, आधुनिकता एक संस्कृति है, यानि जीवन जीने की शैली है, जिसमे मानवता, वैज्ञानिकता, प्रकृति यानि सम्पूर्ण परितंत्र, न्याय, शांति, विकास और स्थिरता को लक्षित कर जीवन अग्रसर होता है| आधुनिकता की उलझनें इसलिए अपने वजूद में हैं, क्योंकि हम पश्चिम का नक़ल कर अपने को आधुनिक समझ लेते हैं| जहाँ आधुनिकता होगी, वहाँ मानवता होगी| अर्थात वहाँ सभी मानवों में कोई नकारात्मक विभाजनकारी आधार नहीं होगा, चूँकि सभी एक ही होमो सेपियंस की संतान हैं| वैज्ञानिकता से तात्पर्य सभी विचारों, आदर्शो एवं व्यवहारों में कार्य- कारण सम्बन्ध होगा, तार्किकता होगी, तथ्यशीलता होगा और विवेकशीलता होगी| आधुनिक होने का एक आधुनिक शर्त यह है कि उसे अवश्य ही प्रकृति से प्रेम होगा, यानि पारितंत्र के संरक्षण एवं स्थिरता के लिए समर्पित भी होगा| वह अवश्य ही न्यायवादी होगा, यानि उसे समानता, समता, स्वतन्त्रता एवं बंधुत्व में विश्वास भी होगा| वह शांति प्रेमी होगा, यानि सहअस्तित्व उसके जीवन का आधार होगा| वह स्थिरता के साथ विकास का समर्थक भी होगा| वैसे वैज्ञानिकता एक व्यापक अवधारणा है, जो परंपरागत अंधविश्वास, ढोंग, पाखण्ड, भेदभाव से दूर प्रगतिशील विचारों, व्यवहारों एवं आदर्शों का व्यक्ति होगा|

अब तक स्पष्ट हो गया कि आधुनिकीकरण क्या है? आधुनिकीकरण की उलझने क्या है? समझ गए हैं| मैं किसी को भी यह भी नहीं कह रहा हूँ, कि कोई या आप भी आधुनिक ही हो जाइए| आप यथावत भी बने रह सकते हैं, लेकिन अपने भविष्य को यानि अगली पीढ़ी को तो आगे बढ़ने देने में सहयोग कीजिए, यानि आगे बढ़ने दीजिए| हमारी अगली पीढ़ी ही हमारे समाज, राष्ट्र एवं सम्पूर्ण मानवता का भविष्य हैं, जिन्हें वैश्विक स्तर पर बहुत कुछ समझना है, बदलना  है, और कई चुनौतियों को स्वीकार भी करना है| आधुनिकता सभी समस्याओं का समाधान है, क्योंकि इसमें ज्ञान है, विज्ञान है, मानवता है, न्याय है, तर्क है, प्रगति है, समृद्धि है, शांति है, स्थायित्व है|

आइए, हम आधुनिक बने, लेकिन पश्चिम का नक़ल नहीं करें|

आचार्य निरंजन सिन्हा

(मेरे अन्य आलेख आप niranjan2020. blogspot.com पर देख सकते हैं|)

 

गुरुवार, 10 अगस्त 2023

शासन की दुष्टता या कुशलता

 (The ‘Dark’ Psychology to Rule)

इसे आप शासन की दुष्टता समझें या कुशलता, यह शासन के अंधेरे का पक्ष है, जिसे सभी जागरूक को जानना चाहिए। आज मैं आपको शासन करने के डार्क  मनोविज्ञान” (The Dark Psychology to Rule)’ को बताना समझाना चाहता हूँ| मैंने यहाँ अंग्रेजी शब्द डार्क’ (Dark) का कोई हिंदी समानार्थी शब्द नहीं दिया है, क्योंकि कोई हिंदी शब्द यहाँ इसके लिए और उपयुक्त नहीं लगता हैकिसी शब्दों के सही और सम्यक अर्थ वही होते हैं, जिसे सामान्य बहुसंख्यक जिस भावार्थ में उस शब्द से जो अर्थ संप्रेषित करते हैं| अंग्रेजी के ‘डार्क’ (Dark) का अर्थ गहरा रंग’, ‘साँवला’, या वह अँधेरा जो अपने अँधेरे में बहुत कुछ छुपाये हुए है, या ऐसा ही कुछ और हो सकता है, लेकिन यह सब सही होते हुए भी इस सन्दर्भ में हिंदी का कोई भी शब्द यहाँ सही एवं सम्यक नहीं है| इसीलिए डार्कशब्द का वही भावार्थ रखने के लिए इसे हिंदी भाषा में भी डार्कही रहने दिया गया है| दरअसल यह डार्कइसलिए है, क्योंकि इसकी यह क्रियाविधि (Mechanism) या प्रणाली व्यवस्था (Action System) ‘लक्षित सन्दर्भके लिए गुप्त रहता है, यानि यह उस सब को अँधेरे में रख कर किया जाता है, यानि यह प्रणाली या व्यवस्था डार्कजैसा होता है|

किसी भी शासन में मनोविज्ञान का बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है| लेकिन यहाँ शासन करने के अर्थ में सिर्फ राजनीतिक शासन को ही शामिल नहीं समझा जाय| यहाँ शासन का विस्तृत एवं व्यापक अर्थ में इसकी संरचना एवं निहित आशय समझा जाय| इसमें पारिवारिक शासन, सामाजिक शासन, सांस्कृतिक शासन, राजनीतिक शासन, आर्थिक शासन सहित अन्य शासन के स्वरुप समाहित किए जा सकते हैं| मैं नहीं जानता कि भारत में इस शासन विधा को कितने लोग या कितने समूह समुचित ढंग से जानते हैं| परन्तु यह तो निश्चित है कि यह डार्क मनोविज्ञानशासन करने का मूल, प्राथमिक, मौलिक एवं आवश्यक आवश्यकता है, यानि इसे हरेक ‘कुशल’ शासक जानता है| हालाँकि यह डार्क  मनोविज्ञानमानवीय मनोविज्ञान का नकारात्मक पक्ष माना जा सकता है, अर्थात यह सामन्ती स्वरुप, यानि असमानता के व्यवस्था में, यानि अमानवीय शासन तंत्र के लिए अनिवार्य होता है| कोई इस ‘डार्क’मनोविज्ञान का सदुपयोग कर अपने समाज एवं देश को एक सशक्त राष्ट्र भी बना देता है|

आप भी जानते होंगे कि शासन करने के लिए ज्ञान के तीन ही अनिवार्य आधार स्तम्भ - दर्शन शास्त्र (Philosophy), इतिहास (History), और मनोविज्ञान (Psychology) होते हैं| अर्थात जो समाज या वर्ग इन तीन विषयों में मौलिक (Fundamental) एवं प्राथमिक (Primary) चिंतन एवं मनन मंथन कर “अपने सन्दर्भ में” नवाचारी (Innovative) निष्कर्ष नहीं निकाल सकता, वह शासन कर ही नहीं सकता, चाहे वह कितना भी संगठित और क्रान्तिकारी हो| यह एक वैश्विक एवं सर्वकालिक सत्य है| अर्थात हर शासक वर्ग इसे बखूबी जानता है, समझता है, और इसका सदुपयोग या दुरूपयोग करता है| इसी के आधार पर कई राष्ट्र अन्य दूसरे राष्ट्रों पर भी शासन करते हैं| कुछ बड़ी आबादी के राष्ट्रों की वैश्विक पूछ उसकी बड़ी आबादी के खाने एवं पचाने की क्षमता , यानि बाजारू उपभोग की क्षमता के कारण होती है, जिसे शायद वह समझना भी नहीं चाहता है|

दर्शन शास्त्र (Philosophy) एक ऐसा विषय हैजो मानव के अस्तित्व, ज्ञान, तर्क, मूल्य, चेतना, आत्म, नैतिकता, नीति एवं अभिव्यक्ति जैसे विषयों से सम्बन्धित मौलिक प्रश्नों को दृष्टि देता है| यह इस विषयों का आलोचनात्मक विश्लेषण एवं मूल्याङ्कन कर सर्वव्यापक एवं सर्वकालिक निष्कर्ष “उस समाज के विशिष्ट सन्दर्भ” में निकाल कर शासन एवं समाज को दृष्टि देता है| यह शास्त्र उस काल में, उस समाज में, और उस परिस्थिति में समाज एवं शासन को वह तर्कसंगत एवं आलोचनात्मक दृष्टि (Vision) देता है, कि वह समय एवं समाज के पार यानि बहुत आगे का भविष्य देख सकता है, या देखता है| ‘दर्शनका सरल एवं साधारण अर्थ सम्यक रूप में देखनाही होता है|

इतिहास (History) की धारणा यानि अवबोध ही हमारी संस्कृति (Culture) का निर्माण करती है, और हमारी संस्कृति ही हमें चेतन, अचेतन एवं अधिचेतन स्तर पर सदैव संचालित, नियंत्रित, नियमित, निर्देशित, निर्धारित एवं प्रभावित करती रहती है| इस तरह इतिहास वर्तमान को समझने में सहायता करती है, और भविष्य के निर्माण को भी नियंत्रित करती है| स्पष्ट है कि हमारा इतिहास बोध (Perception of History) ही हमारी संस्कृति का निर्माण करती हैइतिहास सामाजिक सांस्कृतिक रूपांतरण का क्रमानुसार विश्लेष्णात्मक मूल्यांकन का विवरण होता है|

और मनोविज्ञान (Psychology)  वह विषय हैजो मानसिक प्रक्रियाओं, अनुभवों, एवं विभिन्न संदर्भो में भावनाओं, विचारों एवं व्यवहारों का अध्ययन करता है|मनोविज्ञान मानव के विकास सहित जगत के उद्दीपक (Stimulus) एवं अवाधानिक प्रक्रियाओं (Attentional Procedures) तथा प्रत्याक्षिक प्रक्रियाओं (Perceptual Procedures) को समझाता है| इसमें मानव में अधिगम (Learning), स्मृति (Memory), चिंतन (Thinking), अभिप्रेरणा एवं संवेग (Motivation n Emotion) और अभिवृति एवं सामाजिक संज्ञान (Attitude n Social Cognition) आदि की प्रक्रियाओं को बताता एवं समझाता है| इससे हमें मानव एवं उसके समूह समाज पर किये जाने वाली प्रक्रियायों को समझने में सहायता करती है|

स्पष्ट है कि उपरोक्त तीनों विषय में पारंगत और चिन्तनशील हुए बिना कोई भी स्थायी शासक नहीं बन सकता है| हाँएक बात याद रखिएगा कि रट्टू डिग्रीधारी तथाकथित हवाई बुद्धिजीविओं से कोई उम्मीद भी नहीं रखा जा सकता है क्योंकि ये रट्टू बुद्धिजीवी कदापि चिन्तनशील नहीं होते हैं| किताबी कीड़ा होना और चिन्तनशील होना, ये दोनों अलग अलग पक्ष होता है| और इसीलिए एक रट्टू (किताबी कीड़ा) सृजनात्मक एवं सकारात्मक नहीं होते हैं|

लेकिन जहाँ और जिस सामाजिक तंत्र में या सामाजिक पारितंत्र (Social Ecosystem) में वास्तविक लोकतान्त्रिक व्यवस्था नहीं होती है, यानि मात्र दिखावटी राजनीतिक लोकतंत्र होता है, वहीं शासन करने के लिए मनोविज्ञान का नकारात्मक उपयोग की आवश्यकता होती हैसामान्यत: मनोविज्ञान के नकारात्मक उपयोग को ही डार्क  मनोविज्ञान” (Dark Psychology) कहते हैं| इसका ही उपयोग कर इतिहास, और इसीलिए संस्कृति को भी मनमाना स्वरुप दिया जाता है| इसमें मानवीय मनोविज्ञान का वह हिस्सा शामिल है, जिसके द्वारा कोई भी दूसरों के विचार, अनुभव एवं व्यवहार को अपने अनुसार बहा ले जाता है, या बहते रहते देना चाहता हैइसे नकारात्मक दिशा में चेतना यानि मन (Mind) को नियंत्रित करने का विज्ञान एवं कला का संयुक्त या समन्वित विधा (Mode) कह सकते हैं| यह शक्ति की गत्यात्मकता’ (Power Dynamics) को समझ कर अपने लक्षित व्यक्ति या वर्ग को क्षति पहुंचा कर अपना लक्ष्य प्राप्त करता है, अर्थात इसके द्वारा किसी ख़ास समूह या वर्ग के तुच्छ लाभ को अन्य वर्ग को हानि पहुंचा कर प्राप्त किया जाता हैजब किसी सामाजिक सांस्कृतिक परितंत्र में लोकतान्त्रिक व्यवस्था किसी यथास्थितिवादी लाभार्थी समूह या वर्ग की अनुचित लाभ की निरन्तरता को नहीं रहने देता है, तो ऐसी स्थिति में यथास्थितिवादी लाभार्थी समूह या वर्ग ही मनोविज्ञान का नकारात्मक उपयोग करता है, जिसे ही डार्क  मनोविज्ञानकहते हैं|

डार्क मनोविज्ञान” (Dark Psychology) के उपयोग में हेरफेर (Manipulation) एवं समझाने (Persuasion) के तकनीकों एवं रहस्यों पर आपको बाजार में कई पुस्तकें मिल जायगी, जो इस विषय को समझने में आपकी सहायता करेगी| इसे आप भावनात्मक बुद्धिमत्ता (Emotional Intelligence) और सामाजिक बुद्धिमत्ता (Social Intelligence) का दुरूपयोग या नकारात्मक क्षेत्र भी समझ सकते हैंइस मनोवैज्ञानिक हेरफेर एवं मनाने तथा दबाब बनाने में एक मिथकीय यानि काल्पनिक अर्ध  या काल्पनिक प्रसंग या कथानक गढ़ा जाता है, जिसका उद्देश्य गुप्त या भ्रामक रणनीति के द्वारा दूसरों के व्यवहार या धारणा को बदल देना या यथास्थिति में बनाये रखना या और मजबूत करना होता हैयह ‘डार्क मनोविज्ञान’ सामान्य जनों के विचार, अनुभव एवं व्यवहार बदल देता है और इसमें अप्रत्यक्ष, धोखा या अन्य युक्ति लगाया जाता है| इसके द्वारा लोगो के उस विचार, अनुभव एवं व्यवहार में वह बदलाव किया जाता है, जो सामान्यत: उन जनों मे अपने आप नहीं होता| इसमें व्यक्ति के तथाकथित अहम् (Ego) की रक्षा करने का प्रयास दिखाया जाता है, जिसे आप सिगमंड फ्रायड का रक्षात्मक क्रियाविधि” (Defence Mechanism) समझ सकते हैं| 

अब  डार्क मनोविज्ञान के उपयोग करने के तरीके कुछ उदाहरण के साथ देखें, तो इसे बेहतर ढंग से समझा जा सकता है| इसे सत्ता पाने में, या इसे यथावत बनाये रखने में किया गया उपयोग ज्यादा चर्चित होता हैइसके सामान्य तकनीकों को निम्न रूप एवं व्यापकता में व्यक्त किया जा सकता है -

अपनापन की बरसात (Rain of Affinity/ Closeness) –

इसमें सबसे पहले लक्षित समूह (Targeted Group), यानि जिन पर 'डार्क मनोविज्ञान' का प्रयोग किया जाना है, उन पर अपनेपन की बरसातकी जाती है| इसमें प्रयोगकर्ता यानि शासक वर्ग लक्षित समूह से अपनापन दिखाता है|किसी के भी प्रति अपनापन दिखाने या अहसास कराने के लिए क्षेत्रीयता, भाषाई, नस्लीय, जातीय (भारत में), धार्मिक या अन्य आधार को भावनात्मक बनाया जाता हैइस सभी में अपनापन का भावनात्मक अपील रहता है| दिमागहमेशा ही दिलसे हार जाता है, यानि तर्क बुद्धि सदैव भावना से परास्त होता है| यदि इनमे कोई भी आधार उपयुक्त नहीं भी रहता है, तो किसी और को प्रतिद्वंद्वी बनाकर या बताकर शेष से अपनापन जताया जाता है| जैसे जहाँ जातिएक प्रमुख एवं वास्तविक विभाजनकारी आधार होता है, और यदि यह बड़े समूह (तथाकथित हिन्दू) को एकत्रित करने के लिए उपयुक्त नहीं है, तो वहां धर्मको अपनापन का आधार बताया जाता है| इसके लिए अपेक्षाकृत कम आबादी के अन्य धर्म (इस्लाम या ईसाई) का काल्पनिक हौवा खड़ा कर लक्षित समूह को अपना बनाया जाता है| इसके लिए इतिहास के नाम पर अनगिनत मिथक एवं कथानक रचे या गढ़े जाते हैं, या विरूपित (बिगाड़ना/ Distortion) किए जाते हैं| चूँकि ऐसे समूहों को बुद्धिजीवियों, मीडिया एवं व्यवस्था का समर्थन होता है, इसलिए इनका डार्क मनोविज्ञानबहुत कम प्रयास में भी काफी प्रभावकारी हो जाता है|

अज्ञानता का साम्राज्य (Empire of Fools)  -

अज्ञानता को ही मूर्खता कहा जाता है, यानि एक अज्ञानी ही मूर्ख है| जब व्यवस्था ही डार्क मनोविज्ञानका उपयोग करने लगती है, तो शासन अपने व्यवस्था के द्वारा अज्ञानता का भी प्रसार करता है, यानि उस ‘अज्ञानता के साम्राज्य’ मे स्थायित्व देता है| इसीलिए शिक्षण संस्थाओं की स्थापना एवं सञ्चालन के अलावे शासन अन्य गैर शैक्षणिक कार्यों को ही प्रमुखता देता रहता है| किसी भी धुंध (Mist) में किसी को भी मनचाही यानि कल्पित चीज वास्तविक दिखने लगती है, या उन्हें आसानी से दिखाया जा सकता है| अज्ञानता भी एक ऐसा ही धुंध होता है, जो लोगों की आलोचनात्मक, विश्लेषणात्मक एवं मूल्याङ्कन कम या सीमित कर देता है, या उसे समाप्त कर देता है| शिक्षा को महंगा बना देने से यथास्थितिवादियों के बच्चे तो पढ़ लेते हैं, क्योंकि वे पहले से ही समृद्ध होते हैं| परन्तु सामान्य एवं गरीब के बच्चे अज्ञानी ही रह जाते हैं| इसी अज्ञानता के कारण उन्हें अपने हित एवं अहित का अंतर नहीं समझ पाते हैं और धूर्त की कोई भी बात आसानी से मान लेते हैं| इसी आधार पर भीड़ एवं भेड़ों को हांकना आसान हो जाता है| स्पष्ट है कि साक्षरता’ (Literacy) और ज्ञान (Wisdom) अलग अलग चीज है| ईश्वरआत्मा, परमात्मा, पुनर्जन्म, स्वर्ग- नरक, आदि अवधारणा एवं उपयोग इसी अज्ञानता के उपकरण हैं|  

निष्क्रिय आक्रामक व्यवहार (Inert Aggressive Action) –

इसमें शासन या व्यवस्था अपने विरोधियों के बीच ऐसे ऐसे मुद्दे फेंकता रहता है, जिस पर तथाकथित हवाई बुद्धिजीवी अपनी सारी बुद्धिमत्ता निकालते रहते हैं| यानि उसी मुद्दों के बीच तैरते रहते हैं, परन्तु शासन या व्यवस्था के मूल, मौलिक एवं प्राथमिक गलती या कमजोरी की ओर ध्यान नहीं दे पाते हैं, जिस पर प्रहार किये जाने से वह ध्वस्त हो सकता है| ये सभी तथाकथित हवाई बुद्धिजीवी तालियों की गडगडाहट सुनकर मस्त रहते हैं और सामान्य जन को भी अपने स्तर का एक हवाई क्रान्तिकारी नेता मिल जाता हैगंभीर चिंतन में तो सन्नाटा छा जाता है| इसीलिए समस्या जस का तस रहता है, और समय गुजरता रहता है| विरोधी एवं सामान्य शक्तियां ऐसे ही बकवास आन्दोलन में अपने समर्थकों के समय, संसाधन, उर्जा, ध्यान एवं उत्साह खींचे रखते हैं, और इसीलिए व्यवस्था भी उन्हें क्षति नहीं पहुंचती है| वैसे हर समाज में पके हुए, थके हुए, एवं बिके हुए लोग होते हैंजिनकी बात मैं नहीं कर रहा हूँ|

इसका एक सुस्पष्ट उदाहरण मूल निवासीका आन्दोलन हैमूलत: यह आन्दोलन बहुसंख्यक आबादी के विरुद्ध नियोजित डार्कमनोविज्ञान का उदाहरण है| इन आन्दोलन कर्ताओं का मानना है कि इनकी जातीय जीनीय संरचना अपनी शुद्धता में हजारो वर्षों से यथावत बनी हुई है, और इसीलिए ये अभी तक यहाँ के ‘मूल निवासी’ का प्रतिनिधित्व करते हैं| अर्थात इनकी जातीय कार्यों की कुशलता एवं विशेषज्ञता की जीनीय संरचना एवं गुण हजारों वर्षों से यथावत संरक्षित बनी हुई हैइसीलिए ये जातियां अपने समाज और राष्ट्र को उसी कार्य क्षेत्र में महत्तम दे सकते हैं, जिनमें उनकी जीनीय विशेषज्ञता है, और हजारों वर्षों का अनुभव हो। कुछ शासन इनके हजारों वर्षों की जातीय कुशलता एवं विशेषज्ञता में और निखार लाने के लिए संस्थागत प्रयास भी कर रही है| बाद में जो जाति’ ‘शिक्षा एवं शासनकी विशेषज्ञता एवं कुशलता की जीनीय शुद्धता हजारो वर्षो से यथावत रखे हुए हैंउनके लिए ही शिक्षा एवं शासन आरक्षित किया जाना मूल निवासीआन्दोलन का अंतिम लक्ष्य होगा| यह अंतिम लक्ष्य इनके समर्थकों को नहीं दिखता है, क्योंकि इनको शारीरिक आँखे तो हैं, परन्तु इनकी मानसिक आँखों (Vision) का अहसास शायद इन्हें नहीं हो| यह भी डार्क मनोविज्ञान का उपयोग है| इस पैरा को दुबारा या कई बार पढ़ा जाय।

तथ्यों में छेडछाड (Manipulation in Facts) –

आज सूचनाओं और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) का युग है, एवं लोगों की व्यस्तता भी बहुत बढ़ गयी हैऐसी स्थिति में सूचनाओं या तथ्यों में हेरफेर करना यानि छेडछाड करना या बिगाड़ना बहुत आसान हो गया हैऐसी सूचनाओं में विडिओ, फोटो, आवाज, टेक्स्ट आदि मूल स्वरुप को बिगाड़ कर मनमानी स्वरुप दिया जा रहा है| इसकी सत्यता को जानने के लिए सामान्य लोगों में विश्लेष्णात्मक मूल्याङ्कन का स्तर नहीं है, और यदि यह स्तर है तो उनके लिए समय नहीं है, और यदि यह दोनों है भी, तो उनके सत्य उदघाटन को सर्वव्यापक करने को मीडिया का समर्थन नहीं है| ऐसे में तथ्यों में जो छेड़छाड़ व्यवस्था के समर्थन में होता है, उसे व्यवस्था का यानि उस नागरिक समाज वर्ग का समर्थन भी मिलता है और उसके विरुद्ध कुछ नहीं होता है| ऐसे तत्वों द्वारा प्रिंट, डिजीटल एवं अन्य मीडिया में भ्रामक, या त्रुटिपूर्ण, या गलत, या विरूपित तथ्य प्रस्तुत किया जाता है| किसी स्थापित व्यक्ति या सन्दर्भ या घटना को आधार बनाकर गलत तथ्य प्रस्तुत किया जाता है, जिसके उदाहरण भरे पड़े हैं| ऐसे बिगडे स्वरुप पर सामान्य साधारण जन आसानी से सहमत होकर डार्कमनोविज्ञान के शिकार हो जाते हैं| यदि मीडिया तंत्र समर्थन में होता है, तो कई गलत, भ्रामक, विरूपित किया गया काल्पनिक बातें भी बार बार कई माध्यमों से और कई भिन्न भिन्न तरीकों से प्रस्तुत कर सत्यसाबित करा दिया जाता है| इसके द्वारा लोगों को डरएवं लाभजैसे मनोवैज्ञानिक तत्वों या कारकों का उपयोग कर समाज को भ्रमित किया जाता है|

इन सभी से कुछ छोटे समूहों को तो लाभ होता है, परन्तु 'डार्क मनोविज्ञान' से सम्पूर्ण राष्ट्र एवं मानवता का बहुत बड़ा नुकसान होता है| इस “नुकसान” को इतिहास कभी क्षमा नहीं करेगा, और उनकी आगामी पीढ़ी भी ऐसे ‘राष्ट्रद्रोहियों से तत्वों से अपना सम्बन्ध बताने से भी बचना चाहेगा| मनोविज्ञान का सकारात्मक उपयोग किया जाना चाहिए, ताकि समाज, राष्ट्र और मानवता सशक्त एवं समृद्ध हो सके| लेकिन सत्ता की जड़ता (Inertia of Power) अपनी गति जारी रखेगी, जबतक कि लोग जागरूक होकर सावधान नहीं हो जाते|

आपसे अनुरोध है कि आप इस पर थोडा ठहर विचार विमर्श करेंगे| इसे आप शासन की दुष्टता समझें या कुशलता, निर्णय आपका है। 

आचार्य प्रवर निरंजन

 

शुक्रवार, 4 अगस्त 2023

नागरिक समाज, सामाजिक पूंजी और फासीवाद

(Civil Society, Social Capital and Fascism)

कुछ (सामान्य) समाज  में 'नागरिक समाज' (Civil Society) अपने 'सामाजिक पूंजी' (Social Capital) का नकारात्मक उपयोग कर, यानि अपने विशेष प्रकार के संबंध से 'फासीवाद' (Fascism) को उत्पन्न करता है और उसे मजबूत भी बनाता है। इस प्रक्रिया (Process), क्रियाविधि (Mechanism) और इसके मौलिक कारकों  और चरित्रों (Basic Factors n Characters) को समझने में यह आलेख आपकी सहायता करेगा। इससे आप किसी भी समाज में हो रही गतिविधियों से निकट भविष्य में उत्पन्न होने वाला 'फांसीवाद' को समझ सकते हैं और उसमें अपनी, अपने परिवार, समाज और राष्ट्र का हश्र अभी से देख सकते हैं।

इसे समझने के लिए हमें संक्षेप में 'नागरिक समाज', 'सामाजिक पूंजी' और 'फासीवाद' को समझ लेना आवश्यक है। इसी तीनों के संयुक्त क्रियाविधि से फासीवाद का मौलिक चरित्र, यानि मौलिक लक्ष्य, यानि व्यवहारिक पक्ष स्पष्ट होता है। इसके अलावा हमें समाज के चारों प्रक्षेत्र (Sectors), यानि 'राज्य' (राज सत्ता State), 'बाजार' (Market), 'नागरिक समाज', और 'परिवार' (Family) के भी मौलिक चरित्र को समझना चाहिए, क्योंकि ये सभी एक दूसरे से गुंथे हुए हैं।

सबसे पहले हमें 'सामाजिक पूंजी' को समझना चाहिए। पूंजी की सर्वव्यापक अवधारणा यह है कि पूंजी (Capital) वह धन (Wealth) या सम्पदा (Asset) होता है, जो उत्पादक होता है, यानि लाभ देने वाला होता है। इसी तरह जब कोई व्यक्ति अपने तथाकथित समाज के सदस्यों के आपसी नेटवर्क के कारण उस समाज से अन्यथा लाभ प्राप्त करता है, या उसे लाभ पहुंचाता है, तो इसे 'सामाजिक पूंजी' कहते हैं। सामाजिक पूंजी सदस्यों के नेटवर्कों के आपसी जाल से बनता है, और यही नेटवर्क उनके सामाजिक संपर्क के व्यक्तियों और उनके समूहों की उत्पादकता को प्रभावित करता है। लोग विभिन्न लक्ष्यों एवं उद्देश्यों से अपने सम्पर्कों और रिश्तों को एक महत्त्वपूर्ण संसाधन की तरह इस्तेमाल करते हैं। यह आपसी संबंधों पर आधारित होता है, जो एक सामान्य पहचान, मूल्य, प्रतिमान, विश्वास, सहयोग, पारस्पारिकता के कल्पित या वास्तविक अहसास एवं इसके अन्तर्सम्बन्धों से गुंथा हुआ होता है। यह संबंध अपने प्रभावों में काफी असरदार होता है। इस चरित्र को ध्यान से समझा जाय, क्योंकि यही चरित्र फासीवादी स्वरुप को उत्पन्न करने एवं मजबूत करने में काम आता है। स्पष्ट है कि जब सामाजिक पूंजी का मौलिक चरित्र समाज में नकारात्मक प्रभाव पैदा करता है, तो फासीवादी बन जाता है। अर्थात सामाजिक पूंजी का कई सकारात्मक और रचनात्मक लाभ भी है। स्थानाभाव में इसे यहां विस्तारित नहीं किया जाना चाहिए। ऐसा सामाजिक पूंजी जब अपना मौलिक आधार अवैज्ञानिक, अतार्किक, अविवेकी और अलोकतांत्रिक बना लेता है, तो ही फासीवाद जन्म लेता है। तो फासीवादी कहने का क्या अभिप्राय है?

यह 'फासीवाद' का अवधारणा इटली में उत्पन्न हुआ, परन्तु यह बाद में विभिन्न नाम स्वरुपों में विश्व में प्रचलित हुआ। मूलतः यह अवधारणा वैसे तंत्र या व्यवस्था के लिए प्रयुक्त होता है, जिन्हें लोकतांत्रिक व्यवस्था, प्रक्रिया और संस्थाओं में कोई विश्वास नहीं होता है, और यह एक गिरोह की तरह कार्यरत होता है। इसका बाह्य आवरण राष्ट्रवाद, सांस्कृतिक विरासत का गरिमा, और  राष्ट्रीय गौरव का हो सकता है, लेकिन मूल और अन्तर्निहित उद्देश्य जातीय शुद्धता (भारत में इसे वर्ण एवं जाति के नाम से जाना जाता है) की स्थापना का होता है। भारत में "मूल निवासी" आन्दोलन अपने प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष स्वरुप में इसी फासीवाद को स्थापित करने के लिए समर्पित है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसके समर्थकों को इसमें भी राष्ट्रवाद दिखाई देता है, लेकिन इसके किसी भी समर्थकों को यह ध्यान में भी नहीं आता है कि वह फासीवाद का समर्थक भी हो गया है।

अब आप देख सकते हैं कि जब प्रबुद्ध और यथास्थितिवादी प्रभावशाली समूह मानवीयता और सम्पूर्ण जनता के पक्ष में नहीं होकर अपने वर्गगत हितों की ओर ही उन्मुख होता है, तो फासीवाद का उदय होता है। ये समूह वर्गगत होता है और क्षेत्रीयता के आधार पर विभिन्न नामों से जा सकता है। भारत में इसे वर्ण और जाति के नाम से जाना जाता है। 

यह जरूरी नहीं है कि फासीवाद अपने  अवधारणा में यूरोपीय पैमाने के अनुसार ही हो, यह अन्य स्वरुप में भी हो सकता है, लेकिन मूल चरित्र एक ही होगा, जो स्थायी एवं समरुप होगा। तब यह गिरोह की तरह कार्यरत होता है। तब ऐसे नागरिक समाज अपने सामाजिक पूंजी को इन्हीं प्रभावों, उद्देश्यों, और लक्ष्यों के लिए प्रयोग करते हैं। लेकिन जब सामाजिक पूंजी अपने नकारात्मक क्रियाविधि में आतीं हैं, तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था और वैज्ञानिकता के विरुद्ध चला जाता है। तब वह यानि सामाजिक पूंजी का उपयोग राज सत्ता पर प्रभाव बढ़ाने और जमाने के लिए  होता है और ऐसे 'नागरिक समाजअपने काल्पनिक या वास्तविक (जो अक्सर नहीं होता है) समानता या निकटता के आधार पर अपने लोगों को सत्ता में स्थान देते हैं। इसमें ऐसे लोगों की शैक्षणिक और कौशलीय योग्यता द्वितीयक हो जाती है, तो यही सामाजिक पूंजी का नकारात्मक प्रभाव पैदा करता है। अर्थात तथाकथित सांस्कृतिक या सामाजिक निकटता ही प्राथमिक उद्देश्य या शर्त है जाता है, और अन्य योग्यताएं  प्राथमिक शर्त नहीं रह जाती। यही नकारात्मकता फासीवाद को समर्थन देता है, हालांकि इसे देखने समझने के लिए गहरी मानसिक दृष्टि चाहिए।

लेकिन समाज के चारों प्रक्षेत्र यानि 'राज्य' या 'सत्ता', 'बाजार', "नागरिक समाज' और 'परिवार' को भी समझा जाना आवश्यक है, ताकि नागरिक समाज के समेकित क्रियाविधि और प्रभाव को समझा जा सके और इसके नकारात्मक प्रभाव के द्वारा फासीवाद के उदय की प्रक्रिया को समझा जा सके। 

'राज्य' एक सम्प्रभुता सम्पन्न सत्ता का प्रयोग करने वाला संस्थागत प्राधिकरण होता है और इसीलिए इसे शक्ति का स्रोत भी माना जाता है। इस तरह यह विधान बनाने वाला, उसे लागू कराने वाला और नियमों की व्याख्या करने वाला तंत्र या व्यवस्था होता है। विधान क्या है? यह समाज के व्यवस्थित विकास के लिए स्थापित प्रावधान होता है। इसीलिए सामाजिक वर्ग या हित समूह या गिरोह 'नागरिक समाज' के नाम पर या इसके आड़ में राज्य तंत्र को अपने प्रभाव में रखना चाहता है।

लेकिन 'बाजार' एक सशक्त और प्रभावशाली तंत्र या व्यवस्था या पारितंत्र (Ecosystem) की तरह उभरा है। आजकल ग्लोबल विलेज (Global Village) के अवतरण के बाद और  सूचना प्रौद्योगिकी के प्रभाव में बाजार और शक्तिशाली भी हो गया है और बहुत से मामलों में अदृश्य (Invisible) क्रियाविधि को अपना लिया है। उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की संयुक्त भूमिका ने बाजार तंत्र को ऐतिहासिक रूप में बदल डाला है। इसने राज्यों की  सम्प्रभुता (Sovereignty) को भी संकुचित कर दिया है और राज्याध्यक्ष एवं शासनाध्यक्ष अपने ही देशों में बाजार की शक्तियों के नियंत्राधीन एक "स्थानीय प्रबंधक" (Regional Manager) मात्र की भूमिका में सिमट गए हैं। 

बाजार तंत्र का 'व्यवसायिक साम्राज्यवाद' और 'औद्योगिक साम्राज्यवाद' तो सभी को शारीरिक आंखों से दिख जाता था, लेकिन आज़ भी अधिकतर लोगों को 'वित्तीय साम्राज्यवाद' (Financial Imperialism) का व्यापकता एवं तीक्ष्णता मानसिक दृष्टि से भी नहीं दिखता है। बाजार के इस नए स्वरूप को एक शताब्दी होने जा रहा है और इसी की शक्तियों ने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अधिकांश देशों को तथाकथित राजनीतिक स्वतंत्रता दिलायी है। यह बाजार उत्पादन, वितरण, विनिमय एवं उपभोग के साधनों और शक्तियों से संचालित, नियमित, नियंत्रित और प्रभावित होता है। बाजार की शक्तियां नागरिक समाज की नकारात्मक क्रियाविधि में अवरोध पैदा करता है, यानि नागरिक समाज की फासीवादी शक्तियों को बाधित करता है। बाजार की शक्तियां ही ऐतिहासिक रुपांतरण करती है और वर्तमान में आधुनिकता का ध्वजवाहक भी है।

''नागरिक समाज'' को समाज का तीसरा प्रक्षेत्र माना जाता है और इसी कारण इसे राज्य और बाजार से भिन्न और राज्य के कार्यकारी नियंत्रण से अलग माना जाता है। यह एक संगठन के रूप में और एक संस्था के रूप में अस्तित्व में रहता है और कार्य करता है। इन्हें किसी परिभाषित या स्थापित अवधारणा के अनुसार या किसी खास उद्देश्य के लिए स्थापित गैर सरकारी संगठन या संस्था के रूप में जाना जाता है। यह विधानों से परिभाषित या निबंधित हो सकता है, या संस्था के रूप में संस्कृति या धर्म के आवरण में आवृत रह सकता है। विधानों से परिभाषित संगठन में अधिकार समिति, भाषा विकास संघ आदि कुछ भी उदाहरण हो सकता है। लेकिन यह नागरिक समाज संस्कृति से आवृत संस्था में जाति, वर्ण, पंथ, धर्म, भाषा, क्षेत्र आदि कुछ भी के स्वरूप में हो सकता है। ध्यान रहे कि यह एक सांस्कृतिक गौरव, विरासत, परम्परा आदि के नाम पर कल्पित या वास्तविक हो सकता है। इस तरह एक नागरिक समाज जनता में समान लक्ष्य, लाभ या अभिरुचि के लिए एक फ़ोरम या प्लेटफार्म देता है।

एक 'परिवार' समाज का सूक्ष्मतम निर्मात्री ईकाई (Building Blocks) है। और इसी कारण यह राज्य, बाजार और नागरिक समाज का भी निर्मात्री ईकाई हुआ। कुछ नागरिक समाज सत्ता पर, यानि राज्य पर प्रभावी नियंत्रण के लिए परिवार ईकाई को अशिक्षित, अर्ध बेरोजगार, कमजोर यानि अस्वस्थ और ढोंग पाखंड में डूबा रखना चाहता है। ऐसे परिवार से निर्मित समाज या राज्य पर नियंत्रण रखना बहुत आसान होता है, हालांकि इससे व्यापक समाज यानि राष्ट्र को बहुत बड़ा नुक़सान होता है। भारत में यह सब लम्बे समय से चल रहा है।

पहले अपने ग्रामीण आत्मनिर्भरता के कारण भारतीय राज्य, या बाजार पर वैश्वीकरण का व्यापक असर नहीं होता था। आज एक ग्लोबल विलेज के एक टोला बन जाने से "विकास" की स्थिति और स्तर की अवधारणा विश्व के सापेक्ष हो गई है, जो कल तक निरपेक्ष था। इसी पैमाने पर भारत सहित सभी पिछड़े हुए देश वैश्विक पटल पर अपेक्षानुरूप प्रदर्शन नहीं कर पा रहा है। भारत का वर्तमान प्रदर्शन इसके बाजारगत खपत के कारण प्रगति की गति को तेज़ होने का भ्रम देता है। लेकिन वैश्विक परिदृश्य में हो रहे मौलिक संरचनात्मक ढांचा में सकारात्मक बदलाव के अनुसार सभी पिछड़े हुए देशों में मौलिक संरचनात्मक ढांचा में बदलाव नहीं हो रहा है। भारत में सांस्कृतिक विरासत और गौरव के नाम पर रुढिवादिता पैर पसार रहा है। इस रुढिवादिता को जमीन पर उतारने और मजबूती से जमाने में इसी परिवार को निर्मात्री ईकाई के रूप में ही देखा और समझा जाना चाहिए।

लेकिन जब 'नागरिक समाज' ऐसे अवैज्ञानिक, अतार्किक और अलोकतांत्रिक तरीके से आगे बढ़ता है और उसे जब राज्य का समर्थन भी मिलता है, तब 'फासीवाद' का उदय हो जाता है और वह और मजबूत होने लगता है। तब बाजार में भी फासीवाद के पक्ष में स्थानीय शक्तियां, यानि पूंजिपतियों का उभार होने लगता है और वह मजबूत होने लगता है।  तब इन स्थानीय उदित शक्तियों का द्वंद वैश्विक शक्तियों से भी होने की संभावना रहती है, या वह भी इस वैश्विक गठजोड़ में शामिल हो सकता है। जो शक्तियां आज फासीवाद को मजबूत करती दिखती है, वही शक्ति कल बाजार की अनिवार्य आवश्यकताओं के कारण ही फासीवाद को खंडित भी करने लगती है। यानि यही नवोदित शक्तियां बाद में तथाकथित सांस्कृतिक विरासत और गौरव को जमींदोज भी कर देता है। यह सब विश्व की बदलती गत्यातमकता (Dynamism) के संदर्भ में देखा और समझा जाना चाहिए।

अब आप संक्षेप में, 'नागरिक समाज', 'सामाजिक पूंजी' और उसके 'नकारात्मक प्रभाव' से पैदा होने वाली 'फासीवाद' को समझ गए होंगे। इसकी संभावना अविकसित देशों, यानि तथाकथित विकासशील देशों, यानि पिछड़े हुए सामाजिक आर्थिक व्यवस्था के देशों में ज्यादा होती है। इन सभी स्थितियों , क्रियाविधियों , अवस्थाओं को आप कितनी गहराई तक देख पा रहे हैं, आप स्वयं ही महसूस कर सकते हैं।

आचार्य निरंजन सिन्हा

 

सिविल सेवाओं की परीक्षाओं में निबन्ध लिखने के लिए ...

सिविल सेवाओं में चयन के लिए होने वाली परीक्षाओं में आजकल निबन्ध लेखन का महत्व बढ़ गया है| निबन्ध -लेखन की कला, दर्शन एवं वैज्ञानिकता का उपयोग...