यह कोई आम सभा नहीं थी, कुछ विशेष का नजदिकी बैठक
था| आज जंगल में शेर अपने कुछ नजदीकी दरबारियों के साथ गपशप कर रहा था| कोई गंभीर
विषय या नीतिगत विमर्श भी नहीं था| बहुत दिनों के बाद सब कोई फुर्सत में था, किसी को
कोई जल्दबाजी भी नहीं है| कुछ चुहलबाजी भी हो जा रहा था|
उस जंगल में हिरणों की संख्या सबसे ज्यादा था,
लेकिन जंगली भैसों की संख्या भी कमतर नहीं था| हिरणों को इस बात पर क्षोभ है कि इस
आधुनिक लोकतंत्र और गणतंत्र के युग में भी व्यवस्था के प्रमुख शीर्षों पर उनकी
उपस्थिति नगण्य है| लेकिन इस सम्बन्ध में यह सवाल भी पूछने की हिम्मत उनमे नहीं
थी|
एक जंगली भैसा ने शेर से सवाल कर ही दिया – हुजुर!
आधुनिक युग लोकतंत्र और गणतंत्र का है और हमलोग बहुत बड़ी संख्या में भी हैं, तो
आपको चाहिए कि आप हमलोगों को सत्ता सौंप दे| शेर एक मिनट के लिए चुप रहा, फिर एक
गहरी साँस लेकर बोला – तुम्हें क्या लगता है कि शासन चलाने के लिए सिर्फ बहुमत चाहिए?
दरअसल शासन चलाने के लिए प्रखर बुद्धिमत्ता चाहिए होता है| हाँ, यह सही है कि
आधुनिक लोकतंत्र और गणतंत्र में कार्यपालिका प्रधान का चेहरा भैंस या हिरण का ही
होना चाहिए, लेकिन उसे परदे के पीछे से नियंत्रित और नियमित करने वाले बौद्धिक
लोगों का समूह रहता है, जो वास्तविक शासन करता रहता है|
उस भैंसा ने आपत्ति जताया कि – महाराज, तो क्या
भैंसा या हिरण जहाँ वास्तविक शासक दिखते हैं, वे सिर्फ मुखौटा मात्र हैं? शेर ने
बात आगे बढाई, - जब बहुतों को चमड़ी और चेहरा ही देख पहचान कर अपना पराया समझ में
आता है, तो ऐसा ही होता है| जब बहुसंख्यकों के प्रबुद्ध नेताओं को मानसिक और
आध्यात्मिक विश्लेषण और मूल्याङ्कन की क्षमता और दक्षता नहीं होती है, तो ऐसा ही
होता है| बहुसंख्यक अपनी बौद्धिकता के स्तर पर आसानी से बहाए ही नहीं, आसानी उडाये
जा सकते हैं| ये लोग बौद्धिकता से नहीं, सिर्फ भावनाओं से सही गलत पहचानते हैं|
सियार इस विमर्श में सक्रियता के साथ बोला – ‘बहुसंख्यकों
के साथ समस्या यह भी है कि सत्ता की नीतियों और योजनाओं का विरोध करने के अलावे इनकी
अपनी कोई दीर्घ कार्य योजना ही नहीं होता है| बेचारे बहुसंख्यक नेतागण अपनी
नेतागिरी करने के लिए सत्ता की नयी नीतियों के घोषणाओं के इन्तजार में रहते हैं,
ताकि सड़कों पर उसका तीव्र विरोध कर अपनी नेतागिरी चमकाई जा सके| ये नेतागण चमड़ी और
चेहरा के पहचान के आधार पर भावनात्मक बाते कर अपनी चैनलों की रेटिंग्स बढ़ाने के
लिए तत्पर रहते हैं| यदि सत्ता उन मुद्दों को किसी कारणवश वापस ले लिया या संशोधित
कर दिया, तो वे नेता फिर से बेरोजगार हो जाते हैं| ‘टिकट’ पा लेना उनका एकमात्र
रणनीति होता है, तो वे कैसे शासक बनेंगे’?
लेकिन सवाल यह है कि शेर आजकल परेशान क्यों हो रहा
है? शेर जंगल का राजा क्यों है, जबकि जंगल में हाथी सबसे शक्तिशाली है| जंगल का
सबसे फुर्तीला और तेज चलने वाला चीता है, वह भी राजा नहीं है? सबसे धूर्त सियार
है, लेकिन वह भी राजा नहीं है| यह बात हाथी ने ही पूछा| शेर ने स्प्पष्ट किया कि ‘एक
राजा यानि एक कुशल और सफल शासक होने के लिए ‘शक्ति’ या ‘फुर्ती’ या ‘धूर्तता’ नहीं
चाहिए होता है| एक शासक बनने के लिए शासक को ‘शासक का मनोबल’ होना चाहिए होता है| ‘शासक
का मनोबल’ यानि ‘शासक का इच्छा –शक्ति’ सबसे महत्वपूर्ण होता है| दार्शनिक नीत्शे
ने भी यही समझाया था| मैं अपने को इस काबिल समझता हूँ, इसलिए मैं यहाँ हूँ| तुम भी
ऐसा विश्वास कर यहाँ आ सकते हो|’
एक शासक को अपने अतिरिक्त जनकल्याण भी सोचना चाहिए|
आम जनता के मनोभावों के बीच और अन्य के मध्य संतुलन भी बनाना होता है| आम जन के
मनोभावों के स्तर पर भी आना होता है| शेर ने आगे कहा कि ‘यह सब विवरणात्मक बहुत सी
बातें हैं, लेकिन जंगल असली राजा मैं नहीं हूँ| जंगल का असली का राजा एक दूसरा जानवर
है, जो दिखता कही नहीं है और इसीलिए तुम लोगों को यह नहीं समझ में आता है’| ‘असली
शासक’ के लिए किसी का ध्यान धन्ना –सेठों की ओर गया, किसी ने विदेशी
साम्राज्यवादियों की ओर ध्यान लगाया, और बहुतों को यह समझ में ही नहीं आया|
सवाल यह था कि जंगल का असली राजा शेर नहीं, तो
असली राजा कौन जानवर है? अब राजा की परेशानी के साथ अन्य लोग भी परेशान हो रहे थे|
इसे स्पष्ट करने का अनुरोध सभी दरबारियों ने राजा से की, क्योंकि यह बात पहली बार सुना
जा रहा था| शेर स्पष्ट किया कि ‘असली राजा संख्या, या बल, या धन से नहीं होता है,
बल्कि बुद्धि वाला होता है| आधुनिक ज़माने में सामान्य लोग मुखौटों को ही यानि चमड़ी
और चेहरा देख कर ही शासक को समझते हैं, जो वास्तविक शासक नहीं होता है’| शेर भी अपने
को जंगल का असली शासक मानने को तैयार नहीं था| सभी जानवर और परेशान होने लगे|
सवाल यह है कि यदि शासक सबसे ज्यादा बुद्धि वाला ही
होता है, ती इस धरती पर सबसे ज्यादा बुद्धि वाला कौन जानवर है? किसी का ध्यान ‘दो
पाए जानवर – आदमी’ की ओर जा ही नहीं रहा था, क्योंकि वह जंगल की राजधानी या उसके
आसपास रहता भी नहीं था| तो क्या जंगल के शेर और शहर के बुद्धिमान आदमी के मध्य कोई
अनुबंध तो नहीं है कि शेर इस जंगल में उसकी मर्जी के शर्तों पर रह रहा है, जिसे सब
कोई राजा समझ रहा है? एक बुद्धिमान आदमी तो एक शेर को मार भी सकता है या इस धरती
पर से उसका वंश भी मिटा सकता; वह आदमी बहुत कुछ कर सकता है| शेर के चेहरे से ‘बेचारगी’
का भाव झलक कर बाहर स्पष्ट रुप से अभिव्यक्ति हो रहा था|
लेकिन इसके ही साथ शेर ने सभी बंधुओ और दरबारी
मित्रों से विनम्र अनुरोध भी किया कि यह बात सभी कोई अपने तक ही सीमित रखे| शेर की भावना में अपनी पीड़ा अभिव्यक्त कर देने का ‘अपराध –बोध’ भी स्पष्ट हो रहा था| मैं
तो यह बात अपने तक ही सीमित रखूंगा और आप भी इसका ध्यान रखिएगा|
लेकिन यह बात पहली बार हमलोगों के शरीर और दिमाग
को झकझोर रहा था कि असली शासक कहाँ का और कौन आदमी है? या आदमियों का कोई विशेष
समूह है? इस धरती पर आदमी भी तो 750 करोड़ की संख्या में है, आदमी तो अपने देश के
बाहर भी रहता है, चीता ने सोचा| सभी अपनी अपनी बौद्धिकता के स्तर से असली शासक को
पहचाने की कोशिश करने लगे| मुझे तो समझ में नहीं आ रहा है| आप भी कोशिश कर सकते
हैं?
आचार्य प्रवर निरंजनजी
शिक्षक, लेखक, प्रेरक एवं दार्शनिक
अध्यक्ष, अन्तर्राष्ट्रीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन
संस्थान
Get solutions to your
personal problems at Ask Acharya Ji
सटीक और स्पष्ट विश्लेषण सर!
जवाब देंहटाएंसटीक और विचारोत्तेजक व्यंग्य है।देश की वर्तमान स्थिति को आसानी से समझा जा सकता है.।धन्यवाद।
जवाब देंहटाएंभारत ही नहीं बल्कि वर्तमान में दुनिया के तमाम सारे अविकसित और विकासशील देशों की संप्रभुता की वास्तविकता की पोल खोलने वाला बहुत ही तर्कपूर्ण रोचक व्यंग्य।
जवाब देंहटाएंवर्तमान राजनैतिक संदर्भ में अत्यंत सटीक एवं रोचक व्यंग्य।
जवाब देंहटाएं