शनिवार, 2 दिसंबर 2023

आज़ युवा शक्ति क्या करे?

वर्तमान भारत में युवा शक्तियों की स्थिति और प्रकृति को देखते हुए उनकी उर्जा, उत्साह और संसाधन को सकारात्मक, सृजनात्मक और उपयोगी दिशा में उत्पादक बनाने के लिए एक "पंच सूत्रीय कार्यक्रम" की आवश्यकता है, जो वर्तमान युवाओं की आवश्यकताओं और उनके मनोविज्ञान के अनुरूप हो तथा वर्तमान समाज के भी अनुकूल हो। इस पंच सूत्रीय कार्यक्रम में 'उद्यमिता', 'वित्तीय जागरूकता', 'सामाजिक अंकेक्षण', 'सांस्कृतिक सामाजिक रुपांतरण की क्रियाविधि', और 'सफलता का विज्ञान' शामिल है।

उद्यमिता (Entrepreneurship)

सबसे पहले उद्यमिता को समझते है। आज सरकारी एवं गैर-सरकारी क्षेत्रों में नौकरियों की जो स्थिति है और कई कारणों से इनकी जो भविष्य में संभाव्यताएं है; उसमें उद्यमिता ही एकमात्र बेहतर विकल्प है। विज्ञान की प्रगति, तकनीकी सुधार, आटोमेशन, सेवाओं की आउटसोर्सिंग आदि कई ऐसे क्षेत्र हैं, जो उद्यमिता के विकास को ही प्रेरित करते हैं। मैं परम्परागत अर्थव्यवस्था की बातें नहीं लिखूंगा, क्योंकि सामान्य बातें हर जगह हर कोई को उपलब्ध है। लाभ के साथ किसी भी समस्या का समाधान करना ही उद्यमिता है। उद्यमिता एक नजरिया है, सोच है, तकनीक है, कौशल है और कार्य पद्धति है, जिसे कोई भी मनोयोग से सीख सकता है। यह जन्मजात प्रतिभा भी नहीं है। यह कोई भी खीख सकता है, वशर्ते उसमें कुछ करने का एक बड़ा सपना हो।

बड़ा सपना क्या होता है? जब आप अपने सपनों में बहुत से लोगों के कल्याण को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप में शामिल कर लेते हैं, तो आपका सपना बड़ा हो जाता है। जब आप अपने सोच में समाज, मानवता और प्रकृति को समाहित कर लेते हैं, तो आप महान बन जाते हैं| इसी के साथ आपकी उद्यमिता में सफलता शुरू हो जाती है। आप अपने मेंटर (प्रणेता) उन्हें बनाए, जो धरातल पर सफलता पाई है। असफल और नकारात्मक, थके हुए (अब कुछ भी नया और अलग नहीं हो सकता है, वाले मानसिकता के लोग) एवं पके हुए (जो अपनी मानसिकता को बदलने को तैयार नहीं हैं), यानि हारे हुए लोगों से बचिए। सदैव रोने वाले अर्थात सारा दोष व्यवस्था में देखने वाले लोगों से भी बचिए।

डा भीमराव आंबेडकर का एक सूत्र याद रखिए - Educate, Agitate, Organize अर्थात ईच्छित उद्यमिता का अध्ययन कीजिए, उसका मनन, मंथन कीजिए और उसके निष्कर्ष पर पहुंचिएं| यहाँ ध्यान दिया जाय कि इसमें 'संघर्ष' यानि 'Struggle' शब्द नहीं है, अपितु 'Agitate' शब्द हैं| Agitate का अर्थ हुआ – मथना, मंथन करना| शब्द agitate से agitator बना है, जो दही का मंथन कर घी निकालता है। इस प्राप्त निष्कर्ष के लिए संगठन बनाइए या पूर्व से बने किसी संगठन में शामिल होइए, ताकि आपको यथावश्यक दिशा निर्देश मिलता रहे। यह मनोबल बढ़ाए और बनाए रखने के लिए भी आवश्यक है। और सामान्य लोग इस उक्ति का अन्यथा अर्थ निकालते हैं, तो मुझे इस पर टिप्पणियां नहीं करना है।

भावी उद्यमिता की संभावनाओं को देखने के लिए आपको एक इतिहास बताता हूं। अठारहवीं शताब्दी में Steam Revolution,  उन्नीसवीं शताब्दी में Electricity Revolution, बीसवीं शताब्दी में Computer Revolution, तथा इक्कीसवीं शताब्दी में Intelligence Revolution हुआ है। इससे आपको वर्तमान और भविष्य के उद्यमिता को दृष्टि मिलेगा। इसी संदर्भ में आपको एक बात और बताना चाहता हूं। रुपांतरण (transformation) भी सृजन की श्रेणी में आता है। इसमें पुनर्स्थापन (Relocation), पुनर्चक्रण (Rotation), परावर्तन (Reflection), अनुकरण या अनुवाद (अपनी इच्छाओं, भावनाओं और सांस्कृतिक आवश्यकताओं के अनुरूप) (Translation), और पुनः आकृति निर्धारण ( Re - shaping) भी उद्यमिता के क्षेत्र में नवाचार (Innovation) लाता है, या ला सकता है।

अर्थव्यवस्था के छात्र जानते हैं कि अर्थव्यवस्था का सेक्टर (Sector) में वर्गीकरण किया गया है। परन्तु सामान्य जनों के लिए इसकी पुनरावृति कर रहा हूं। प्राथमिक प्रक्षेत्र (Primary Sector) वह है, जिसमें प्रकृति प्रदत्त उत्पादों या संसाधनों का दोहन किया जाता है, जैसे कृषि, बागवानी, खनन, जलजीव उत्पादन, वनोत्पाद आदि है। द्वितीयक प्रक्षेत्र (Secondary Sector) में  प्राथमिक प्रक्षेत्र से प्राप्त वस्तुओं का मूल्य संवर्धन (Value Addition) किया जाता है, उसकी उपयोगिता को कई तरीकों से बढ़ाया जाता है। इसे औद्योगिक उत्पादन भी कहा जाता है। तृतीयक प्रक्षेत्र (Tertiary Sector) में सेवा क्षेत्र आता है। हालांकि सभी क्षेत्र महत्वपूर्ण है, परन्तु उच्चतर श्रेणी के क्षेत्र बेहतर आय के श्रोत होते हैं और वे निम्नतर क्षेत्रों के मजबूती पर आधारित होते हैं। चतुर्थक प्रक्षेत्र (Quaternary Sector) ज्ञान आधारित नया उभरता हुआ सितारा है। इसमें सूचनाओं को आधार बनाकर नीचे के क्षेत्र को ज्यादा उपयोगी बनाया जाता है। प्रसिद्ध प्रबंधन चिंतक फिलिप कोटलर कहते हैं कि यह युग “सूचनाओं” का नहीं रहा, अपितु यह “सूचनाओं के शेयरिंग” का हो गया है। पंचम प्रक्षेत्र (Quinary Sector) में वे गतिविधियां शामिल हैं, जिसमें चतुर्थ क्षेत्र से प्राप्त सूचनाओं के आधार पर नीतियों का निर्धारण किया जाता है। इसमें इन सूचनाओं के आधार पर आइडिया (Ideas) का नवनिर्माण किया जाता है, सूचनाओं का पुनर्गठन किया जाता है, नए और पुराने सूचनाओं की नई व्याख्या कर नए आईडिया का निर्माण किया जाता है, नई तकनीक विकसित की जाती है और पूर्वानुमान भी किया जाता है। यह क्षेत्र भारत में पूरी तरह से नया है, पर पूरी संभावनाओं से भरा हुआ है। विचार ही धन है। जब आप इस पर विचार करेंगे, तो संभावनाओं का दरवाजा भी खुल जाएगा।

उद्यमिता का क्षेत्र सिर्फ वस्तुओं और सेवाओं में ही नहीं है, बल्कि ज्ञान में भी विविधता से भरा क्षेत्र है। अब आप उद्यमिता का वैधानिक पहलू भी समझ लें। शुरुआती कारोबार में व्यवसाय स्वामित्वाधीन (Proprietorship) होना चाहिए, यदि आप इस उद्यमिता के क्षेत्र में नए है और आप छोटा स्तर पर ही शुरुआत कर रहे हैं। इसमें कराधान में विशेष छूट नहीं मिलता, पर इसे करना, सम्हालना और बढ़ाना आसान होता है। इसमें आपमें और आपके व्यवसाय के वैधानिक उत्तरदायित्व में अन्तर नहीं किया जाता है। एक से अधिक व्यक्तियों के द्वारा साझेदारी फर्म होता है, जो साझेदारी (Partnership) अधिनियम, 1932 के द्वारा संचालित और नियंत्रित होता है। इसमें उत्तरदायित्व का बंटवारा वैधानिक रूप से नहीं किया जाता है, जो मुख्य वैधानिक नकारात्मक पहलू है। उत्तरदायित्व के सीमित निर्धारण करने के लिए दो वैधानिक फर्म है - 'कम्पनी' और ‘एल एल पी’। एक कम्पनी भारतीय कम्पनी अधिनियम, 2013 से और एक ‘एल एल पी’ ‘सीमित उत्तरदायित्व साझेदारी अधिनियम, 2008’ से संचालित और नियंत्रित किया जाता है। सामाजिक कार्यों और अलाभकारी उद्यमिता के लिए सोसायटी रजिस्ट्रेशन अधिनियम 1860,  भारतीय न्यास (ट्रस्ट) अधिनियम 1882, सहकारिता अधिनियम 1912, कम्पनी अधिनियम 2013 आदि का प्रावधान है। यहां यह बताना ही प्रर्याप्त है कि आप इनकी समझदारी और जानकारी रखें; अन्यथा विधि आपको सभी संबंधित चीजों का जानकार मानता है| वैसे आप भारतीय संबंधित पदाधिकारियों के सहयोगात्मक रवैया से आप वाकिफ होंगे ही। इसमें कई विभिन्न शुभचिंतकों से राय ले सकते हैं, गूगल से भी सलाह लें सकते हैं। बाजार में कई रूपों में सलाहकार हैं, जिनकी अज्ञानता, और उनकी नियत भी ध्यान देने योग्य होता है।

कई सरकारी प्रशिक्षकों को देखा है, वे खुद उद्यमी नहीं बन सके और आज भी किसी के नौकर ही है; पर उद्यमिता का प्रशिक्षण दे रहे हैं, संस्कार सिखा रहे हैं। उद्यमिता एक संस्कार है और इसका संचरण वे नहीं कर पाते| जिसमें उद्यमिता का यह संस्कार है ही नहीं, वह दूसरों को उद्यमिता का संस्कार कैसे दे सकता है? 

हमें प्रेरणा (Motivation) और अन्तप्रेरणा (Inspiration) में अन्तर समझना जरूरी है। प्रेरणा बाहरी कारक है और अन्तप्रेरणा आन्तरिक कारक है। प्रेरणा बाहरी सुविधाएं, अनुदान आदि से संचालित होता है, जबकि अन्तप्रेरणा आन्तरिक कारणों से, जो ज्यादा महत्वपूर्ण है। उद्यमिता के लिए आन्तरिक कारणों का होना अनिवार्य है, अन्यथा इन उद्यमियों के जल्दी टूट जाने का ख़तरा रहता है। मानसिक रूप से मजबूत होना ज्यादा जरूरी है। मन के सारे हार है। इसीलिए कहा गया है कि हर दस उद्यम में आठ उद्यम असफल हो जाते हैं, परन्तु हर दस उद्यमी में नौ उद्यमी सफल हो जाते हैं। उद्यमिता एक नाज़ुक, परन्तु महत्वपूर्ण एवं विशाल अवधारणा है और इसी कारण इसे पूर्णतया संतोषजनक और गारंटी युक्त नहीं बताया जा सकता है। इसका सतत विकास होता है और इसलिए शुरुआती दौर में इसे सरल, एवं छोटा उद्यम से ही शुरू कर जटिल, एवं बड़ा की ओर अग्रसर होना चाहिए।

वित्तीय जागरुकता (Financial Awareness)

वित्तीय जागरुकता या वित्तीय समझदारी या वित्तीय साक्षरता, सभी एक ही संदर्भ में है और यह धन से संबंधित भावना, व्यवहार और चिंतन प्रणाली है। इसमें धन (Wealth) को पूंजी (Capital) बनाने, बचत एवं निवेश, संरक्षण, संवर्धन एवं उपयोग से संबंधित क्रियाविधि को समझा जाता है। इसमें पूंजी बाजार सबसे प्रमुख है। इसके डिजीटलीकरण को समझना और इसका समुचित उपयोग भी शामिल हैं। इसमें भविष्य के ‘ब्लाक चेन तकनीक’ पर आधारित ‘क्रिप्टोकरेंसी’ को भी जानना और समझना जरूरी होगा। मैंने इस विषय पर कई आलेख अपने ब्लॉग पर लिखे है, यथा धन का विज्ञान (https://niranjan2020.blogspot.com/2023/05/blog-post.html), सदाबहार अमीरी का रहस्य (https://niranjan2020.blogspot.com/2020/06/secret-of-perpetual-rich.html), आपकी वित्तीय जागरुकता (https://niranjan2020.blogspot.com/2020/06/your-financial-awareness.html)। इसीलिए यहां दोहराव से बचना चाहता हूं।

सामाजिक अंकेक्षण (Social Audit)

सामाजिक अंकेक्षण सरकारी तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार समाप्त करने का अमोघ अस्त्र है। इसमें कोई व्यक्ति (Person) एक नागरिक के रूप में सूचना अधिकार अधिनियम, 2005 के अन्तर्गत सरकारी धन से संचालित योजनाओं एवं कार्यक्रमों की जानकारियों को प्राप्त करता है। फिर इन जानकारियों एवं प्रगति का सत्यापन उस क्षेत्र में किए गए धरातलीय कार्यो का मिलान लाभार्थी एवं स्थल पर प्रत्यक्ष अवलोकन से करता है और सरकार द्वारा निर्धारित लक्ष्य एवं प्रक्रिया के आलोक में अंकेक्षण करता है। इससे भ्रष्ट प्रक्रिया पर अंकुश लगता है और बेहतर परिणाम के लिए सुझाव आते हैं। इसका प्रशिक्षण युवाओं में नवनिर्माण के लिए सकारात्मक और उत्पादक जोश पैदा करता है और सरकारी तंत्र को स्वस्थ्य एवं बेहतर परिणाम देता है। इस अंकेक्षण प्रतिवेदन को सरकार के साथ साथ प्रिंट और डिजिटल मीडिया में दिया जा सकता है। इसका व्यवहारिक पहलू इस अंकेक्षण को कई गुणा कर प्रसारित कर वाइरस की तरह तेजी से फैलाता है और भ्रष्ट आचरण पर रोक लगाता है।

सांस्कृतिक रुपांतरण की क्रियाविधि (Mechanism of Cultural Transformation)

‘सांस्कृतिक सामाजिक रुपांतरण की क्रियाविधि' यानि इसके इतिहास एवं विज्ञान को वैज्ञानिक तरीके से जानना हर युवाओं के लिए अनिवार्य है। व्यवस्थित एवं विवेकपूर्ण ज्ञान को ही विज्ञान कहते हैं। सांस्कृतिक सामाजिक रुपांतरण को समझने के वैज्ञानिक तरीके है, जिसके बारे में प्रसिद्ध इतिहासकार प्रो रामशरण शर्मा जी ने बताया है। इनके अनुसार वैज्ञानिक इतिहास उत्पादन (और वितरण, विनिमय एवं उपभोग) की शक्तियों और उसके अन्तर्संबंधों के आधार पर समझा जाना चाहिए। वैज्ञानिक इतिहास तथ्यों, तर्कों और वैज्ञानिक प्रविधियों पर आधारित होना चाहिए; न कि भावनाओं, आस्थाओं और मनगढ़ंत मान्यताओं पर आधारित हो। यह वैज्ञानिक इतिहास लेखन इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इतिहास बोध ही समाज की संस्कृति का निर्धारण करता है। संस्कृति हमारे समाज रुपी कम्प्यूटर का वह साफ्टवेयर है, जो समाज को अचेतन, अवचेतन और सचेतन स्तर पर संचालित और नियंत्रित करता है। 

आज यदि हम रुढिवादिता, अंधविश्वास, जड़ता और पाखंड में अपना महत्तम ऊर्जा, समय, उत्साह और संसाधन बर्बाद कर रहे हैं, तो उसका एकमात्र कारण हमारा दूषित संस्कृति है| यह दूषित संस्कृति गलत और सामंतवादी इतिहास बोध से उत्पन्न हुआ है। प्रसिद्ध इतिहासकार प्रो ई एच कार अपनी पुस्तक ‘What is History’ में लिखते हैं कि ऐतिहासिक चिंतन हमेशा उद्देश्यवादी होता है। इतिहास के तध्य शुद्ध वस्तुनिष्ठ नहीं हो सकते, क्योंकि वे इतिहास के तथ्य तभी बनते हैं, जब इतिहासकार उसको महत्त्व देता या नकारता है। इतिहास में विकास का अर्थ है, मानव के स्वाधीनता की धारणा की दिशा में विकास। अभी तक इतिहासकारों में बहुलता उनकी ही है, जिन्हें यथास्थितिवादी यानि सांस्कृतिक सामंतवादी मानने में संकोच नहीं होना चाहिए।

भारत के लोग जाति, वर्ण, और धर्म के आधार पर कई वर्गो में विभक्त है। भारत का सामाजिक एवं सांस्कृतिक विकास का इतिहास अवैज्ञानिक है। भारत के इतिहास पर सामंतवाद के प्रभाव का सम्यक अध्ययन नहीं किए जाने से अवैज्ञानिक सामंतवादी मानसिकता को मजबूती मिली हुई है। मानव की उत्पत्ति, प्रवास और सामाजिक विकास की गाथा यथास्थितिवाद बनाएं रखने को ही व्याख्यापित है। भारत के सशक्त और अग्रणी राष्ट्र निर्माण की पहली अनिवार्य शर्त इस कम्प्यूटर रुपी तंत्र का संस्कृति रुपी साफ्टवेयर को सुधारना है, जो इतिहास के वैज्ञानिक लेखन से ही होगा।

सफलता का विज्ञान (Science of Success)

सफलता का विज्ञान यानि सफलता प्राप्त करने की वह वैज्ञानिक और व्यवहारिक प्रविधि है, जिसको जानना और समझना हर भारतीय युवाओं के लिए जरूरी है। विचार एवं मानसिकता कैसे भौतिकता में रुपांतरित होता है और क्रियाओं को कैसे संचालित करता है - यह जानना जरूरी है। बुद्ध के दर्शन में मन को सभी चीजों का केन्द्र बिन्दु स्वीकार किया गया है। मन को सभी चीजों का पूर्वगामी माना गया है। मन ब्रह्मांड में फैला क्वांटम फील्ड पर ऊर्जा डालकर उन चीजों को उत्पन्न करता है, जिनको मन उत्पन्न करना चाहता है (क्वांटम क्षेत्र का अवलोनकर्ता का सिद्धांत)। मन यदि नियंत्रण में है, तो सब कुछ नियंत्रण में है। मन ही सभी मानसिक क्रियाओं में प्रधान है, जो सुविचारित लक्ष्यों को भौतिक तथ्यों में रुपांतरित करता है। अल्बर्ट आइंस्टीन ने इसलिए ही कल्पना (Imagination) अर्थात मन की उड़ान को ज्ञान से ज्यादा महत्वपूर्ण माना। वैज्ञानिक सर रोजर पेनरोज ने मन एवं चेतनता के संबंधों की वैज्ञानिक व्याख्या करते हुए बताते हैं कि जब हम किसी चीज पर मन को स्थिर करते हैं अर्थात अपनी सोच को स्थिर करते हैं, तो उस वस्तु के उन तरंगीय ऊर्जा में से प्रकटीकरण की संभावना बढ़ जाती है, जिस वस्तु को हम प्रकट देखना चाहते हैं। इसके लिए मन को संकेंद्रित करना चाहिए, जिसे विपश्यना भी कहा जाता है। इन सभी के लिए संक्षेप में विचार करना, कल्पना करना और लक्ष्य के लिए संगठित होकर शुरू करना जरूरी है।

अंत में सकारात्मक मनोविज्ञान (Positive Psychology)  के जनक अब्राहम मैसलो (1908-1970), एक अमेरिकी मनोवैज्ञानिक, का एक प्रसिद्ध पक्ति को दुहराना चाहूंगा, जो 1966 में प्रकाशित उनकी प्रसिद्ध पुस्तक  "The Psychology of Science" में है -

"If you have a Hammer, everything looks like a Nail." यदि आपके पास हथौड़ा है, तो आपको हर चीज कांटी की तरह ही दिखेगा। अर्थात आप हर चीज में हथौड़े के प्रयोग उपयोग करने को उद्यत होते हैं।

इसे मैं ऐसे भी लिखता हूं कि यदि कांटी को ठोकने के लिए हथौड़ा लेकर तैयार होते हैं, तो आपका ध्यान सिर्फ लक्ष्य (कांटी) पर होता है। अतः युवाओं से अनुरोध है कि आप तैयार रहें, निशाने पर कांटी ही होगा। आपके द्वारा समृद्ध, सुखमय और शांतिमय अग्रणी और विकसित भारत का उदय होगा।

आचार्य निरंजन सिन्हा

सोमवार, 6 नवंबर 2023

भारतीय गतिहीन समाज गतिमान कैसे बने?

एक सर की अध्यक्षता में "विमर्श बैठक" चल रही थी, कोई 'भाषण बैठक' या 'बहस बैठक' नहीं थी। मुद्दा बहुत अहम् था। प्रश्न यह था कि कुछ लोगों की हो रही 'आर्थिक समृद्धि' (Prosperity) या आर्थिक 'संवृद्धि' (Growth) को ही भारतीय विकास (Development) का पैमाना (Scale) या संकेतक (Indicator) मान लिया जाए? इसलिए विमर्श बैठक का विषय था कि हम भारतीयों को चाहिए कि इस गतिहीन भारतीय समाज को समुचित और सम्यक दिशा कैसे दिया जाय और इस गतिहीन भारतीय समाज को गतिशील कैसे बनाया जाय? मैं फिर कहता हूं कि विषय अतिगंभीर ही नहीं, विवादास्पद भी था, क्योंकि भारतीय समाज की गतिहीनता पर सर्व मान्यता या सर्व सहमति नहीं थी।

बैठक में उपस्थित प्रोफेसर साहब ने भारतीय समाज की तथाकथित 'गतिहीनता' शब्द के प्रयोग पर आपत्ति कर ही दिया। जैसे सामान्य लोग 'पश्चिमीकरण' (Westernization) को 'आधुनिकीकरण' (Modernization) ही समझ लेते हैं, उसी तरह अर्थनीति की स्पष्ट दर्शन के अभाव में बहुत से लोग 'आर्थिक संवृद्धि' (Economic Growth) को ही 'विकास' (Development) मान लेते हैं। वैसे तो प्रसिद्ध अर्थशास्त्री श्री अमर्त्य सेन 'विकास' को 'स्वतंत्रता' एवं 'सक्षमता' उपागम (Capability) के रूप में परिभाषित करते हैं, जो उनकी प्रसिद्ध पुस्तक - "Development as Freedom" में आया था और इसी अवधारणा के लिए उन्हें नोबेल पुरस्कार भी मिला।

हमलोग या कोई भी समाज या उसकी छोटी इकाई आज जिस भी स्थिति में है, वह अपने वर्तमान सोच- विचार, मानसिकता एवं अभिवृति, परम्परा एवं संस्कार आदि आदि का उत्पाद है, यानि संक्षेप में कहें तो कोई भी समाज अपनी संस्कृति का उपज होता है। जिस संस्कृति में न्याय, स्वतंत्रता, समता एवं बंधुत्व की मूल और मौलिक भावना या लक्ष्य का ही अभाव हो, या कहें कि जिस संस्कृति में जाति, वर्ण, धर्म, क्षेत्र, भाषा आदि के आधार आज़ भी इस आधुनिक और वैज्ञानिक युग में भी भेदभाव प्रमुखता के साथ छाया हुआ है , वह सांस्कृतिक समाज को कैसे गतिशील मान लिया जाए? जिस समाज और संस्कृति में अवैज्ञानिक, अतार्किक, अविवेकी, अलोकतांत्रिक और अमानवीय ढोंग, पाखंड, अन्धविश्वास एवं अनावश्यक कर्मकांड व्याप्त हो और उसे सक्रियता के साथ धार्मिक संरक्षण, समर्थन और सहयोग प्राप्त हो, उस समाज को भी यदि गतिहीन नहीं कहा जाय, तो कैसे समाज एवं संस्कृति को गतिहीन कहा जाय?

समाज और संस्कृति की गतिहीनता को ही 'सांस्कृतिक जड़ता' (Cultural Inertia) कहा जाना चाहिए। मैं तो इसे सांस्कृतिक साम्राज्यवादी जडता' (Inertia of Cultural Imperialism) ही कहता है, यदि हम साम्राज्यवाद की मूल और मौलिक अवधारणा को समझते और मानते हैं। यदि किसी समाज या संस्कृति में कोई जड़ता (Inertia) है, तो उस जड़ता की स्थिति को बदलने के लिए भौतिकी के नियमों के अनुसार सजग, सतर्क, समर्पित अतिरिक्त उर्जा यानि अतिरिक्त प्रयास चाहिए।

अतः यदि सांस्कृतिक जड़ता है, तो समाज को गतिहीन मानने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। हमारा भारतीय समाज वस्तुत गतिहीन ही नहीं है, अपितु  उसके ही चाल में यानि उसके ही संस्थागत ढांचे (Institutionalised Framework) में उलझा हुआ है, जिससे वह निजात पाना चाहता है। दरअसल आप जिस चीज से निजात पा लेना चाहते हैं, तो आप अपनी सारी गतिविधियों और क्रियाविधियों का संदर्भ बिन्दु उसी को मान लेते हैं और उसके दुष्चक्र में कब और कितना फंस जाते हैं, आप समझ ही नहीं पाते हैं। हम भारतीय जो समाधान तलाशने का प्रयास कर रहे हैं, वे सभी समाधान उनके द्वारा उपलब्ध या प्रस्तुत विरोधी वैचारिकताओं के संस्थागत एवं संरचनात्मक ढांचे में ही विकल्प तलाश रही है। इसीलिए हम भारतीय उस संदर्भ लकीर से बड़ी और अलग लकीरें खींचने की मानसिक दृष्टि नहीं रखते हैं। वहीं लकीर हमारी अंतिम ध्येय हो जाता है, और उसके आगे कुछ भी नहीं सोचता। विमर्श बैठक में उपस्थित बिनोद सर का ऐसा ही मानना था। मेरी भी सर से सहमति थी।

इसीलिए बिनोद सर का मानना था कि हमें इतिहास के किसी संदर्भ में नहीं उलझकर नया, आधुनिक, वैज्ञानिक और मानवतावादी प्रगति करनी है, तो वह प्रगति ही स्वयं अपना इतिहास रच लेगा। इसीलिए हमें शून्य से शुरू करना चाहिए। हमें उनकी मान्यताओं और व्याख्याओं से अलग मान्यता और व्याख्या करनी होगी, जो नया, आधुनिक, वैज्ञानिक और मानवतावादी हो। इसे ही थामस सैम्युल कुहन ने "पैरेडाईम शिफ्ट" कहा था। सोच और प्रक्रिया में मौलिक बदलाव किए बिना समाज में परिवर्तन या रुपांतरण नहीं हो सकता है, लेकिन इसका क्रेडिट तो राजनीतिक नेता ले जाते, और वे बाजार की शक्तियों के प्रभाव से इंकार कर देते हैं।  वे आर्थिक शक्तियों की क्रियाविधि और प्रभाव को, यानि बाजार की शक्तियों के प्रभाव को नकार देना चाहते हैं।

'बाजार की शक्तियां' (Market Forces) ही वर्तमान को संचालित, नियंत्रित, नियमित और प्रभावित करती रहती है। यही 'बाजार की शक्तियां' ही तत्कालीन यानि समकालीन यानि समकालिक शक्तियां कहलाती है। यही समकालिक शक्तियां ही ऐतिहासिक काल में ऐतिहासिक शक्तियां बन जाती है, या कहलाती है। और आर्थिक शक्तियां ही बाजार की शक्तियां होती है। आर्थिक शक्तियों में उत्पादन, वितरण, विनिमय और उपभोग के साधनों और शक्तियों को शामिल किया जाता है। अतः जब भी सांस्कृतिक रुपांतरण को, यानि सामाजिक रुपांतरण को सम्यक और सही ढंग से, वैज्ञानिक और समुचित तरीके से समझना होगा, तो हमें इसी ऐतिहासिक साधनों और शक्तियों एवं उनके अंतर्संबंधों की क्रियाविधि (Mechanism) के आधार पर ही समझना होगा।

सामान्यतः लोग घिसे-पिटे परम्परागत सोच, अभिवृति और संस्कार से बाहर नहीं निकल पाते हैं। यही "सांस्कृतिक जड़ता" है, जिसे समझे बिना कोई भी आगे नहीं बढ़ सकता है। महान वैज्ञानिक गैलेलीयो ने संभवत 1546 में 'जडत्वीय संरचनात्मक ढांचा' (Inertial Structural Frame) का अवधारणा दिया था, जिसके बिना जड़ता के संरचनात्मक ढांचा और उसकी क्रियाविधि एवं प्रभाव को नहीं समझा जा सकता है। मैंने इस अवधारणा का उपयोग सांस्कृतिक जड़ता को समझने समझाने में सफल उपयोग किया है। कोई भी उपलब्ध ज्ञान एक पाठ (Lesson) हो सकता है, लेकिन एक पूर्ण समाधान नहीं हो सकता है। शायद इसीलिए अल्बर्ट आइंस्टीन ने कहा था कि कभी भी किसी अज्ञात को किसी भी ज्ञात से नहीं जाना जा सकता है।  

भारत के संदर्भ में एक बात और कहना महत्वपूर्ण है। जिन राजनीतिक दलों की अपनी कोई विशिष्ट विचार धारा नहीं होती है, वे सिर्फ सत्ता की राजनीति करते हैं और किसी खास क्षेत्र तक ही सीमित रहते हैं। और एक खास समय के बाद विलुप्त भी हो जाते हैं। ऐसे विचार धारा विहीन राजनीति दल कभी भी राष्ट्रीय स्तर का दल भी नहीं बन सकता है। इनके नेताओं को सत्ता, व्यवस्था और सांस्कृतिक क्रियाविधि की कोई समझ भी नहीं होती है। ऐसे राजनेता बरसों की राजनीति कर सकते हैं, सदियों की राजनीति की समझ ही नहीं होती है। ऐसे ही राजनेता "सत्ता बदलाव" को ही "व्यवस्था में बदलाव" समझते हैं, इसीलिए दशकों की समय के बाद भी समाज की सामाजिक सांस्कृतिक गतिहीनता समाप्त नहीं होती। ऐसे ही राजनेता तथाकथित विकास और संवृद्धि के तथाकथित मकड़जाल में उलझे हुए रहते हैं।

ऐतिहासिक परम्परा के महान सामाजिक सांस्कृतिक नेता अपने समय काल और संदर्भ में सही हो सकते हैं, लेकिन आज उनके विचार एवं दर्शन पूर्णतया सही, समुचित और सम्यक नहीं हो सकते हैं। यदि वे सामाजिक और सांस्कृतिक नेतृत्व पूर्णतया सही, समुचित और सम्यक ही होते, तो आज इस विमर्श बैठक की जरूरत ही नहीं होती, अर्थात उन्होंने इसका पूर्णतया सही, समुचित और सम्यक समाधान नहीं ख़ोज पाया था। इन इतिहास नेतृत्वकर्ताओं के द्वारा दिए गए विचार एक सीख (Lesson) हो सकती है, लेकिन उसका समाधान कदापि नहीं हो सकता है। इसीलिए हमें शून्य से ही शुरू करना होगा और किसी दूसरे के संरचनात्मक ढांचे (Structural Framework) में नहीं उलझना होगा।

बिनोद सर की बातों में मैं अपने विचारों में आगे बढ़ गया और यह सब याद आने लगा। शायद इसीलिए संयुक्त राज्य अमेरिका की प्रथम महिला ई० रुजवेल्ट ने कहा है कि छोटे चिंतक व्यक्तियों (Individual) का नाम एवं उनके ब्यौरा ज्यादा देते हैं, मध्यम दर्जे के चिंतक घटनाओं (Incidents) का विवरण ज्यादा करते हैं, और बड़े चिंतक आदर्शों (Ideas) एवं विचारों की बात ज्यादा करते हैं। इसलिए हमें व्यक्तियों और घटनाओं के विवरण ब्यौरा पर ज्यादा "विधवा विलाप" नहीं करना चाहिए। यही 3 I  (Individual, Incidents, Ideas) महत्वपूर्ण है।

इसी निष्कर्ष के साथ विमर्श बैठक समाप्त हो गयी। आप भी तो एक चिंतनशील प्राणी है और आपको भी अपने समाज एवं संस्कृति से प्रेम है, इसलिए आप भी इस विमर्श को बढ़ाइए। यह समाज और संस्कृति फिर से गौरवशाली और अग्रणी बनेगा।

*आचार्य निरंजन सिन्हा*


शनिवार, 28 अक्टूबर 2023

सामाजिक नेतागिरी और हथौड़ा सिद्धांत

 Social Leadership and the Hammer Theory

भारतीय समाज में सामाजिक और सांस्कृतिक नेतागिरी की धूम मची हुई है, लेकिन जो सामाजिक और सांस्कृतिक संरचनात्मक बदलाव दिखनी चाहिए, वह दिख नहीं रहा है। इस असफलता के जितने कारण बताये जा रहे है, वे सभी उन नेताओ की बचकानी हरकतें है, बेवकूफी से भरी हुई तर्क है। सभी यह कहते हैं कि सभी नेताओं और संगठनों को एक हो जाना चाहिए, परन्तु उन्हें एक करने से कोई रोक तो नहीं रहा है। यह सब एक आदर्शात्मक काल्पनिक बातें हैं, जो सुनने एवं कहने में अच्छी लगती है, परन्तु यह सब उनके लिए व्यावहारिक नहीं होती है, क्योंकि उन्हें मनोविज्ञान, संस्कृति और दर्शन का समुचित ज्ञान ही नहीं होता| उनका ध्यान ही नहीं गया है कि उनकी मूल अवधारणा ही उपयुक्त नहीं है। स्पष्ट है कि दरअसल उन्हें न तो इतिहास (यानि संस्कृति) की कोई समझ होती है, न दर्शन (सार तत्व यानि दृष्टि) का कोई ज्ञान होता है, और न मनोविज्ञान (भावना, अनुभव, विचार एवं व्यवहार के विज्ञान) की कोई जानकारी होती| वे बनते तो हैं कि वे सब कुछ समझते हैं, लेकिन वास्तविक स्थिति इससे बहुत कुछ अलग यानि विपरीत होती है|।

सामाजिक नेताओं के द्वारा सामाजिक सांस्कृतिक संरचनाओं में रचनात्मक, सकारात्मक एवं स्थायी बदलाव यानि रुपांतरण करने के इनके अथक प्रयास के बावजूद कोई अपेक्षित प्रभावकारी परिणाम प्राप्त नहीं हो पा रहा है। ऐसा क्यों हो रहा है? यह एक गंभीर, तीक्ष्ण एवं गहरा विश्लेषण और मूल्यांकन का विषय है। दरअसल हर सामाजिक सांस्कृतिक समस्या का कोई स्पष्ट दर्शन होता है, कोई सम्यक इतिहास (जो संस्कृति के रुप में प्रकट होता है) होता है, कोई सुलझा हुआ मनोविज्ञान होता है, और उस सामाजिक सांस्कृतिक संरचना का कोई निहित अर्थशास्त्र भी होता है। ऐसे सामाजिक नेता सत्ता के शीर्ष पर बैठे व्यक्ति के बदलाव को ही व्यवस्था में परिवर्तन समझते हैं और इसीलिए ऐसे सामाजिक नेताओं के सत्ता में आने के बाद भी व्यवस्था (System) यानि तंत्र की व्यवस्था (Arrangement) यानि संरचना (Structure) यानि सामाजिक सांस्कृतिक तानाबाना में कोई परिवर्तन नहीं होता है।

तब सामान्य जन या क्षेत्र में सामान्य संवृद्धि या विकास तो दिख सकता है, परन्तु सामाजिक सांस्कृतिक संरचना और आव्यूह (Matrix) में कोई बदलाव नहीं आता है। दरअसल ऐसे सामाजिक नेताओं को सामाजिक सांस्कृतिक संरचना की नहीं तो कोई समझ होती है और नहीं तो कोई इस दिशा में समाधनात्मक दृष्टि (Vision) होती है| ऐसे नेताओं को समाज में ‘वृद्धि’ (Growth) और ‘विकास’ (Development) की अवधारणा में कोई अंतर समझ में नहीं आता है| दरअसल ये नेता इन दोनों के अन्तर को ही नहीं जानते समझते| यदि समाज में कोई सामाजिक और सांस्कृतिक बदलाव दिखता भी है, तो वह “बाजार की शक्तियों” से संचालित, नियंत्रित और नियमित होता है| ऐसे सामाजिक नेताओं को बाजार की शक्तियों के परिणाम स्वरुप समाज में हो रहे सामाजिक सांस्कृतिक बदलाव भी उन्हीं के आन्दोलन के प्रयास के परिणाम बताने में कोई संकोच नहीं होता है।

तो अब हमलोग प्रसिद्ध “हथौड़ा सिद्धांत” (The Hammer Theory) की ओर चलते हैं| पहले इस अवधारणा यानि इस सिद्धांत को समझते हैं| तब इनका भारतीय सामाजिक सांस्कृतिक नेतागिरी से संबंध समझते है| यह सिद्धांत क्या है? इसके बारे में वैश्विक विद्वानों की राय भी जानना समझना जरूरी हो जाता है। अभिप्रेरणा के सिद्धांत (Theory of Motivation) के प्रवर्तक अब्राहम मैसलो (Abraham Maslow) ने 1966 में अपनी प्रसिद्ध पुस्तक – “The Psychology of Science” में एक सिद्धांत दिया, जिसे हथौड़ा का सिद्धांत (The Theory of Hammer) कहा गया| इसमें किसी सर्व परिचित उपकरण/ यन्त्र (Tool) के लोकप्रिय उपयोग के प्रति अत्यधिक झुकाव की समझ को रेखांकित किया गया है| इसमें कहा गया कि "If the only tool you have is a hammer, it is tempting to treat everything as if it were a nail." अर्थात यदि आपके पास उपकरण में सिर्फ हथौड़ा ही है, तो आप सभी समस्याओं को कांटी मानकर ही उसे ठोंक देना चाहेंगे।

इसी तरह इसे अब्राहम कापलान (Abraham Kaplan) ने 1964 में ही “यन्त्र का नियम” (The Law of the Instrument) कहा, और जिसमे उसने कहा - “Give a small boy a hammer, and he will find that everything he encounters needs pounding." अर्थात यदि एक छोटे बच्चे को एक हथौड़ा दे दिया जाय, तो वह जिस (समस्या) का भी सामना करेगा, वह उसे (काँटी समझ कर) ही हथौड़े से ठोक देना ही चाहेगा| अत: ऐसे सामाजिक सांस्कृतिक नेताओं को अब्राहम कापलान एक “छोटा बच्चा” कहना चाहा है, यदि उनमें भी ऐसी ही प्रवृति है या ऐसी ही हरकतें हैं तो|

इसी तरह से 1984 में प्रसिद्ध निवेशक वारेन बफेट (Warren Buffett) ने ‘वित्तीय बाजार’ (शेयर बाजार) के तथाकथित स्थापित विशेषज्ञ विश्लेषकों के सम्बन्ध में कहा| वित्तीय बाजार की प्रवृतियों और दिशा निष्कर्षों के विश्लेषणात्मक मूल्याङ्कन करने के लिए गणितीय विशेषज्ञों के सम्बन्ध में कहा कि चूँकि ये तथाकथित विशेषज्ञ हैं और इसीलिए इन्हें अपनी तथाकथित विशेषज्ञता समाज को दिखाने के लिए अनावश्यक उठा पटक करनी पड़ती है या दिखानी पड़ती है| वारेन बफेट अनुसार चूँकि ऐसे विशेषज्ञता के कौशल सीखे गए हैं, और इसीलिए इन्हें समाज को नहीं दिखाना भी एक अपराध बोध जैसा लगता है, हालाँकि इनका कोई उपयोग शेयर बाजार में नहीं है, और इनका नकारात्मक प्रतिफल ही होता है| इसे ही निचोड़ में कहा गया कि एक आदमी को यन्त्र या उपकरण के नाम पर सिर्फ एक हथौड़ा ही हो, तो उस आदमी को सामने का हर चीज एक कांटी सदृश्य ही दिखता है| ऐसी ही स्थिति भारतीय सामाजिक सांस्कृतिक नेताओं की है, जिन्हें सिर्फ विरोध करना ही आता है, और कोई दुसरा रचनात्मक एवं सकारात्मक समाधान आता ही नहीं है| ऐसे भारतीय सामाजिक सांस्कृतिक नेता "विरोध" नामक उपकरण में सिर्फ नारेबाजी, प्रदर्शन, धरना और अपशब्द बोलना ही जानते हैं, कोई इस "विरोध" नामक उपकरण के अतिरिक्त दूसरा रचनात्मक सकारात्मक समाधान के बारे में सोच ही नहीं है|

भारतीय सामाजिक और सांस्कृतिक नेतृत्व भी ऐसे ही सामाजिक और सांस्कृतिक बदलाव के लिए अपने हाथ पैर मारते रहते हैं और अपने समर्थकों से भी ऐसा ही करवाते रहते है। इसके लिए वे भावनात्मक अपील, जातीय और धार्मिक लगाव एवं नाटकीय कौशल का उपयोग और दुरुपयोग करते हैं। ऐसा कर वे अपने समर्थकों का समय, संसाधन, धन, उर्जा और उत्साह सहित जवानी को भी बर्बाद करते रहते हैं। वे सत्ता के शीर्ष पर “व्यक्ति बदलाव” (Change in Person) को ही “व्यवस्था का बदलाव” (Change in System) समझते हैं और इसीलिए जनता को ऐसा ही समझाते बताते हैं। इन्हें संस्कृति की क्रियाविधि की कोई समझ नहीं होती है।

इसी तरह सामाजिक सांस्कृतिक कार्यकर्ता और नेता जो भी कुछ कहीं पढ़ लेते हैं, किसी से सुन लेते हैं, उसे बिना मनन मंथन किए ही समस्याओं रुपी कांटी पर अपने हथौड़े चलाने लगते हैं। वे यह भी विश्लेषण और मूल्यांकन नहीं कर पाते हैं कि वे हथौड़े उनके विरोधियों के द्वारा फैलाया गया व्यूह (Matrix) यानि रणनीति (Strategy) यानि  जाल  (Web) का एक अनिवार्य औजार है। तब वे अपने विरोधियों के ढाँचे (framework) यानि घेरे (Circle) में ही उलझे हुए होते हैं। वैसे यह वैश्विक पिछड़े हुए संस्कृतियों यानि समाजों की ही विशेषता होती है| इसे ही “लकीर का फ़क़ीर” होना भी कहा जाता है|

इसी सन्दर्भ में थामस सैम्युल कुहन (Thomas S Kuhn) ने “पैरेड़ाईम शिफ्ट” (Paradigm Shift) की अवधारणा 1962 में प्रकाशित अपनी पुस्तक – “The Structure of Scientific Revolutions” में दिया| किसी भी समस्या समाधान में जब कोई परंपरागत अवधारणा (Concept) या क्रियाविधि (Mechanism) काम नहीं करता है, तब उसमे मौलिक परिवर्तन ही समाधान है, और यही मौलिक परिवर्तन  ही पैरेड़ाईम शिफ्ट है| 

इसी तरह अल्बर्ट आइन्स्टीन ने भी कहा कि किसी भी समस्या का समाधान उसी समस्या के स्तर (Level) पर ही रहकर नहीं पाया जा सकता| अर्थात किसी भी समस्या के समाधान के लिए उसी ढाँचे (Framework) या संरचना या आव्यूह (Matrix) से बाहर निकलना ही होगा| जबकि भारतीय सामाजिक सांस्कृतिक नेतागण उस ढाँचे या संरचना या आव्यूह से बाहर निकलना ही नहीं चाहते| इसीलिए ऐसे भारतीय सामाजिक सांस्कृतिक नेताओं का सामाजिक और सांस्कृतिक संरचनाओं में बदलाव लाने का प्रयास महज एक नौटंकी या तमाशा बन कर रह जाता है|

आचार्य निरंजन सिन्हा 

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