शुक्रवार, 16 मई 2025

अकसर वास्तविकताएँ होती नहीं है, बना दी जाती है

“वास्तविकता” (Reality) सदैव ‘वास्तविक’ (Real) नहीं होती है, अकसर काल्पनिक को ही वास्तविक बना दिया जाता है| ‘वास्तविक’ उसे कहते हैं, जो अपने नाम, स्वरुप, संरचना, स्वभाव, प्रकृति के अनुसार अपना प्रभाव या परिणाम उत्पन्न करता है| और यदि यही या ऐसा ही परिणाम कोई काल्पनिक भी उत्पन्न कर देता है, तो वह ‘वास्तविक’ नहीं होते हुए भी ‘वास्तविकता’ के ही समकक्ष हो जाता है, यानि इस मामले में वह काल्पनिक ही ‘वास्तविकता’ हो जाता है| अब इसे थोडा स्थिरता से और विस्तार से समझते हैं|’पहले भी और आज भी यह ‘काल्पनिकता’ ‘वास्तविकता’ की परिणाम दिलाता आ रहा है, चाहे यह राजनीति हो या आस्था हो, या जीवन दृष्टि के अन्य पक्ष|

आपने भी इसी तरह के कई वक्तव्य सुने होंगे, जैसे “संसाधन’ (Resource) होते नहीं है, बना दिए जाते हैं”| या, इसी तरह, “स्त्रियाँ होती नहीं है, बना दिया जाता है”| या, आदमी डरपोक (Timid) होता नहीं है, बना दिया जाता है| या, आदमी बेवकूफ (Silly) होता नहीं, बना दिया जाता है| या, घटनाएँ घटित नहीं होती है, लेकिन घटित होना स्थापित करा दिया जाता है| या, विकास वैसा होता नहीं है, लेकिन इसे स्थापित करा दिया जाता है| और इनमे वास्तविक्ताएँ नहीं भी होती हो, लेकिन परिणाम या प्रभाव पा लिए जाते हैं| और ऐसा खेल अज्ञानता के संसार में खूब चलता रहता है, या आप कहें तो ऐसा खेल शताब्दियों तक भी आसानी से चलता रहता है, या चलाया जाता रहा है, या आज भी बखूबी चल रहा है|

यह अर्थशास्त्र में स्थापित है कि संसाधन’ होते नहीं है, बना दिए जाते हैं”| जैसे कोयला एक पत्थर है, जिसे आदिम युग से ही उर्जा के स्रोत,  यानि संसाधन के रूप में उपयोग किया जा रहा है| तकनीक बदल कर यूरेनियम का उपयोग उर्जा के स्रोत के रूप में किया जाने लगा| लेकिन इन सभी उदाहरणों में तकनीक बदल कर, यानि प्रक्रिया बदल कर, यानि वास्तविकताओं को ही बदल कर प्रभाव पैदा कर लिया जाता है| इस तरह यह इस लेख के शीर्षक के अनुरूप सही नहीं हुआ, क्योंकि इसमें काल्पनिकताओ को स्थान नहीं दिया गया है|

लेकिन “स्त्रियाँ होती नहीं है, बना दिया जाता है” के मामले में एक परीक्षण किया जा सकता है| ऐसा प्रसिद्ध फ़्रांसिसी दार्शनिक सिमोन द बौआर कहती हैं| इनके अनुसार आदमी में यौन के आधार पर पुरुषों एवं स्त्रियों में ‘यौनिक विभेद’ (Sexual Discrimination) तो किया जा सकता है, जो एक दूसरे की पूरकता (Complementry) के रूप व्यक्त होता है, लेकिन पुरुषों एवं स्त्रियों में तो ‘लैंगिक विभेद’ (Gender Discrimination) समाज द्वारा स्थापित कर दिया जाता है| यह ‘लैंगिक विभेद’ सर्वथा अनुचित माना जाता है, क्योंकि यह काल्पनिकताओं पर आधारित नकारात्मकता होता है| यहाँ इन दोनों की पूरकता की ओर ध्यान नहीं देकर ‘विभेदता’ को ही वास्तविकता का आधार बना दिया जाता है| ‘लैंगिक विभेद’ में सामाजिक काल्पनिक मान्यताओं को स्त्रियों पर थोपा जाता है और इस काल्पनिक मान्यताओं का प्रभाव एवं परिणाम वास्तविक, लेकिन नकारात्मक एवं विध्वंसात्मक होता है| इस मामले में वास्तविकताएँ होती नहीं है, बना दी जाती है, और यह सही साबित भी हो जाती है|

इसी तरह, आदमी डरपोक (Timid) होता नहीं है, बना दिया जाता है| या, आदमी बेवकूफ (Silly) होता नहीं, बना दिया जाता है| जब आदमी डर जाता है, तब वह बहुत मुलायम (Soft) हो जाता है, और कोई भी उसे जानवर बना ले, या देवता बना दे, यह सब बनाने वाले की चतुराई पर निर्भर करता है| ‘भालू आ जायगा’ सुनकर तो बच्चा भी जल्दी सो जाता है, लेकिन ‘ऐसा नहीं करने पर नरक मिलेगा, या अगला जनम कुत्ता में होगा’ कह कर बुद्धिजीवियों को ठग भी लिया जाता है| वास्तविकता हो या नहीं हो, किसी को ‘डरा’ कर और अपने को ‘हीरो’ बना कर लोगों को अपने प्रभाव में ले आना बहुत साधारण कलाबाजी माना जाता है| आजकल ‘कृत्रिम बुद्धिमत्ता’ के जमाने में सब कुछ एक ही कमरे में बैठ कर काल्पनिकताओं को वास्तविक प्रभाव पैदा करने वाला बना दिया जाता है| इसी तरह जब कोई भी, तथाकथित डिग्रीधारी, या धनधारी, या पदधारी, को बेवकूफ बनाना हो, तो जैसे किसी को डरपोक बनाया जाता है, वैसे ही इन तथाकथित बुद्धिजीवियों को भी बेवकूफ बना दिया जाता है| कुछ संस्कृतियों में डिग्रीधारी, या धनधारी, या पदधारी होने के लिए आपको ‘आलोचनात्मक चिंतन’ (Critical Thinking) की आवश्यकता नहीं होती है, और आप सिर्फ अपने ‘सामाजिक पूँजी’ (Social Capital) के आधार पर ही बहुत कुछ पा ले सकते हैं| कुछ तथाकथित बुद्धिजीवियों से तो मात्र प्रतिक्रिया लेकर ही उनके समय, संसाधन, ऊर्जा एवं वैचारिकी को नकारात्मक दिशा में उपयोग कर उन्हें बर्बाद किया जाता है, या किया जा सकता है| इन दोनों अवस्थाओं में वास्तविकताएँ होती ही नहीं है, बना दी जाती है|

कुछ घटनाएँ इतिहास के कालों में घटित ही नहीं हुए, लेकिन उसे घटित हुआ माना जाता है, यानि उसे ऐतिहासिक तथ्य मान लिया जाता है और इतिहास में स्थापित कर दिया जाता है| ऐसा करना तथाकथित डिग्रीधारी, या धनधारी, या पदधारी के समय में बहुत सरल होता है, और यह बहुत ही साधारण बात होती है| कोई किसी भी घटना को ऐतिहासिक बताने के लिए उसे ‘रटन्त विद्या’ का सहारा देता है, या ज्यादा समझदार लोगों को ‘जीनीय शोध’ को आधार बता कर ही काल्पनिकता को वास्तविकता में बदल देने में सफल हो जाता है| साधारण बातें सामान्य जन को समझ में नहीं आती है, और इसी तरह तथाकथित डिग्रीधारी, या धनधारी, या पदधारी को भी ‘जीनीय शोध’ के नाम पर कुछ समझ में नहीं आता है| इन ‘जीनीय अध्ययनों’ के नाम पर एजेंडा का समर्थन करता हुआ कुछ भी प्रस्तुत कर दिया जाता है, और विपरीत जाते हुए साक्ष्यों को चर्चा में ही नहीं लाया जाता है| ऐसे नाटकों के लिए किसी भी पुरातात्विक साक्ष्यों की प्रमाणिकता की आवश्यकता ही नहीं होती है| और काल्पनिकताओं को वास्तविक बना दिया जाता है|

इसी तरह, कुछ व्यवस्था विकास का सही अर्थ समझती नहीं है, या तो खूब समझती है, लेकिन विकास का ढिंढोरा मीडिया पर नियंत्रण कर बुलंद करती रहती है, जैसे ये विकास के जादूगर ही हों| इन्हें विकास (Development) एवं वृद्धि (Growth) में अंतर समझ में नहीं आता, शायद इसीलिए सीमेंट के खपत में उछाल (वृद्धि) को ही विकास समझ लेता है और लोगों को ऐसा ही समझा देता है| प्रसिद्ध अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन लोगों की ‘क्षमता’ (Capability approacb) में विस्तार को ही ‘वास्तविक विकास’ मानते है, जबकि सरकारे लोगों के आय में वृद्धि के लिए विभिन्न योजनाओं के अंतर्गत धन को ही बाँट (लुटा) कर उनकी आय बढा देती हैं और विकास की वाहवाही लूट लेती है| यह भी काल्पनिकताओं को वास्तविकता में दिखाने का एक घटिया प्रयास होता है| इन वास्तविकताओं का प्रभाव चुनाव में तो दिख सकता है, लेकिन वास्तविक जीवन यथावत ही रहता है|

स्पष्ट है कि “अकसर वास्तविकताएँ होती  नहीं है, बना दी जाती है”, पूर्णतया सत्य है|

आचार्य प्रवर निरंजन जी

अध्यक्ष, भारतीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान|

शनिवार, 10 मई 2025

क्या इतिहास भी विज्ञान है?

इतिहास का अध्ययन समाज को, राष्ट्र को, मानवता को और भविष्य को सम्हालने, सजाने, संवारने एवं सुनियोजित संवर्धन के लिए अनिवार्य हो जाता है| इतिहास की समझ एवं अवधारणा ही हमारी संस्कृति को गढ़ती (to give the shape) रहती है| और यह संस्कृति ही समाज को, राष्ट्र को, मानवता को और भविष्य को सम्हालने, सजाने, संवारने एवं सुनियोजित संवर्धन के लिए एक ‘साफ्टवेयर’ के रूप में अदृश्य मोड़ में कार्य करते हुए नियमित, निर्देशित, नियंत्रित एवं संचालित करती रहती है| यह हमें, यानि हमारी भावनाओं को, विचारों को, व्यवहारों को तथा कर्मो को ‘स्वचालित मोड़’ (Autopilot Mode) में रखती है| इस तरह ‘इतिहास’ अध्ययन हमारे वर्तमान जीवन एवं हमारे भविष्य के समस्यायों को सुलझाने के लिए अनिवार्य हो जाता है| इसीलिए ‘शासन का दर्शन’  इतिहास की समझ के पथ से आगे जाता है|

तो इतिहास क्या ‘कला’ का विषय है, या ‘मानविकी’ का विषय है, या ‘शुद्ध विज्ञान’ का विषय है? मतलब इतिहास का अध्ययन किस रूप में करना समुचित और उपयुक्त है? ‘कला (Arts)’ विषयों में ‘दृश्य कला (Visual Arts)’, ‘गीत एवं संगीत’, ‘नाट्य एवं नृत्य’, ‘साहित्य’ और ‘सिनेमा’ आदि शामिल किया जाता है, जबकि ‘मानविकी’ (Humanities) के विषयों में ‘इतिहास’ ‘दर्शन’, ‘भाषा’, एवं ‘सांस्कृतिक तथा सामाजिक अध्ययन’ आदि शामिल किए जाते हैं| इस तरह ‘कला’ भावनाओं की अभिव्यक्ति हुई, और ‘मानविकी’ विचारों का मंथन, यानि विमर्श का विषय हुआ| लेकिन विज्ञान ‘प्राकृतिक नियमों’ को जानने एवं समझने की विधा हैं, जिसे ‘निरपेक्ष अवलोकन’ (Empirical Observation), ‘परिकल्पना निर्माण’ (Hypothesis Formation), ‘परीक्षण’ (Experimentation), ‘विश्लेषण’ (Analysis) एवं ‘निष्कर्षण’ (Conclusion) के द्वारा सम्पादित किया जाता है| यह विज्ञान किसी भी विषय का ‘व्यवस्थित’ (Systematic), ‘संगठित’ (Organised) एवं ‘विवेक’ (Rational) पूर्ण ज्ञान है| अर्थात किसी ज्ञान में इन तीनों में से कोई भी एक तत्व का अभाव हो जाता है, तो वह विज्ञान नहीं है| स्पष्ट है कि विज्ञान प्राकृतिक नियमों को जानने समझने का एक ‘विषय’ भी है, और यह विज्ञान उससे भी ज्यादा अध्ययन का एक विधा (Methodology) है, एक ‘अध्ययन विधि या तरीका’ (Way to Study) है, एक ‘नजरिया’ (Attitude) है, एक दृष्टिकोण (Perspective) भी है|

‘कला’ हो, या ‘मानविकी’ हो, या ‘विज्ञान’ हो, ये तीनों ही अध्ययन क्षेत्र मानव की अभिव्यक्ति के रूप में प्रकट (प्रत्यक्ष) होता है, जिसे मानवीय भावनाओं, विचारों, व्यवहारों एवं कर्मो के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है| ‘इतिहास’ को ‘बीते’ हुए काल की मानवीय भावनाओं, विचारों, व्यवहारों एवं कर्मो का व्यवस्थित, ‘संगठित’ एवं ‘विवेकपूर्ण’ ज्ञान माना जाता है, जो मानव को ‘और बुद्धिमान’ बनाता है| इस रूप में भी. इतिहास एक विज्ञान है| चूँकि विज्ञान अध्ययन का उपागम (Approach) है, और इतिहास का आधुनिक अध्ययन ऐसा ही वैज्ञानिक है, इसीलिए ‘इतिहास’ एक विज्ञान है|

लेकिन समय की धारा में, यानि ऐतिहासिक काल खंड में ‘इतिहास’ सदैव ही ‘विज्ञान’ नहीं रहा है| पहले ‘इतिहास’ अपने अध्ययन उपागम में, अपने अध्ययन विधि में और अपने तकनीक- उपयोग  में विज्ञान नहीं था, बल्कि एक कला या मानविकी का ही विषय रहा है| यह दौर सत्रहवीं एवं अठारहवीं सदी तक चलता रहा| यूरोपीय पुनर्जागरण के साथ ही ‘प्राकृतिक नियमों’ की खोज, परीक्षण, अन्वेषण, सत्यापन में ‘कार्य – कारण’ सम्बन्धों की कसौटी पर कसा जाने लगा, और इस क्रम में कई सिद्धांत स्थापित हुए| इस उपागम से भौतिकी, रसायन, जीवविज्ञान, खगोलीयशास्त्र, गणित आदि अनेक विषयों ने काफी प्रगति किया| दरअसल ‘गणित’ तो विज्ञान को जानने समझने की एक व्यवस्थित भाषा मात्र है, जिसे अंकों, अक्षरों एवं संकेतों के माध्यम से व्यक्त किया जाता है| इस वैज्ञानिक पुनर्जागरण ने पूर्व से स्थापित कई मान्यताओं, विश्वासों, धारणाओं एवं कई ‘तथाकथित पूर्व से स्थापित वैज्ञानिकता’ को ध्वस्त कर दिया, खंडित कर दिया और खारिज कर दिया| इन प्राकृतिक नियमों का उपयोग, या ऐसे ही प्राकृतिक नियमों की आवश्यकता ‘मानव सम्बन्धों’ की गतिशीलता को समझने के लिए भी आवश्यक था, लेकिन इस ओर तत्कालीन किसी भी दार्शनिकों का ध्यान नहीं गया|

कार्ल मार्क्स मानव इतिहास का वह पहला व्यक्ति हुआ, जिसे लगा कि मानवीय एवं सामाजिक सम्बन्धों गतिशीलता को जानने एवं समझने के लिए भी स्थापित नियम होने चाहिए, जो विज्ञान की तरह ही व्यवस्थित हो, संगठित हो, विवेकपूर्ण हो, तार्किक हो, जिसे सत्यापित किया जा सके, और जिसके आधार पर भविष्यवाणी भी किया जा सके, यानि पूर्वानुमान भी किया जा सके| अर्थात इतिहास के लिए स्थापित सिद्धांत (सिद्ध + अन्त) हो, यानि जो सिद्ध (Proved) भी हो और जो अंतिम (Final) भी हो| कार्ल मार्क्स ने अपने अध्ययन के बाद ‘सामाजिक सम्बन्धों की गतिशीलता’ को समझने के लिए, यानि अतीत के काल, वर्तमान काल एवं भविष्य के काल में “सामाजिक सम्बन्धों की गत्यात्मकता” (Dynamics of Social Relations) की वैज्ञानिक व्याख्या की| इस तरह मार्क्स ने इतिहास की वैज्ञानिक व्याख्या की और इसके सिद्धांत स्थापित किए| इसी उपागम के कारण ‘सामाजिक विज्ञान’ की वास्तविक अवधारणा  स्थापित हुए, एवं ‘सामाजिक सम्बन्धों’ के विषय के अध्ययन की दिशा बदल गयी|

चूँकि मार्क्स ने ‘सामाजिक सम्बन्धों की गत्यात्मकता’ को समझने के लिए प्राकृतिक नियमों की ही तरह, यानि भौतिकी की ही तरह प्राकृतिक नियमों, यानि सामान्य नियमों को स्थापित किया, इसीलिए इन ‘सामाजिक सम्बन्धों गतिशीलता के नियमों’ को “ऐतिहासिक भौतिकवाद” कहा| इस तरह यह ‘सामाजिक सम्बन्धों’ को समझने के लिए एक निश्चित, सर्वव्यापी, सर्वर्कालिक, सत्यापन योग्य सिद्धांत सुनिश्चित कर ‘इतिहास अध्ययन’ को ही विज्ञान की श्रेणी में ला दिया| आज इस “ऐतिहासिक भौतिकवाद” को “वैज्ञानिक भौतिकवाद” के नाम से जाना जाता है| आर्थिक साधन एवं शक्तियों के आपसी अन्तर्सम्बन्धो के आधार पर इतिहास के किसी भी काल खंड के समाज, संस्कृति, आर्थिक स्थिति, एवं सम्पूर्णता के उद्विकास एवं विकास, यानि स्थिति को जाना समझा जा सकता है|

आर्थिक साधन और शक्तियाँ सिर्फ भौतिक ऊर्जा एवं पदार्थों के उत्पादन, वितरण, विनिमय एवं उपभोग के प्रकार तथा प्रतिरूप को ही नियमित, निर्देशित, नियंत्रित, प्रभावित एवं संचालित कर इतिहास को नियमित एवं प्रभावित करती रही है, बल्कि आर्थिक साधन और शक्तियाँ ही बौद्धिकता और विचारों के भी सृजन एवं सृजनात्मकता को भी नियमित एवं नियंत्रित करती रही है| इसी क्रियाविधि एवं अवधारणा पर आधारित “वाद” को ही ‘वैज्ञानिक भौतिकवाद’ कहते हैं| इसके आधार पर इतिहास के किसी भी काल खंड एवं किसी भी क्षेत्र के “सामाजिक सम्बन्धों की गत्यात्मकता” को समझा जा सकता है| इतिहास भी बीते हुए काल के “सामाजिक सम्बन्धों की गत्यात्मकता” ही समझाती है, स्पष्ट करती है|

स्पष्ट है कि इतिहास की कोई भी वैज्ञानिक व्याख्या चार्ल्स डार्विन के ‘उद्विकासवाद’, सिगमण्ड फ्रायड के ‘मनोविश्लेषणवाद’, कार्ल मार्क्स का ‘ऐतिहासिक भौतिकवाद’, अल्बर्ट आइन्स्टीन का ‘सापेक्षवाद’, फर्डीनांड दी सौसुरे का ‘संरचनावाद’ एवं ज़ाक देरिदा का ‘विखंडनवाद’ की अवधारणाओं को अवश्य ही सहारा लेता हुआ होगा, अन्यथा उसकी व्याख्या में कुछ भी अस्पष्टता अवश्य ही रह जायगी|

कोई भी इतिहास दो तथ्यों से तैयार होता है – एक, ऐतिहासिक काल का तथ्य और दूसरा, इतिहासकार, जो इतिहास लिखता है| इतिहासकार वर्तमान काल का, यानि तत्कालीन काल का होता है, और इसीलिए वह इतिहासकार अपनी समझ, अपनी आवश्यकता, अपनी जड़ता, अपनी पृष्टभूमि आदि से नियमित एवं नियंत्रित भी होता है, और उस पर उपरोक्त सभी “वाद” भी कार्यशील होता है| ‘ऐतिहासिक तथ्य’ भी वही बोलता है, जिसे वह इतिहासकार अपनी समझ, अपनी आवश्यकता, अपनी जड़ता, अपनी पृष्टभूमि आदि के कारण बोलवाना चाहता है| यदि कोई भी इतिहास अपने प्रारंभ से आजतक ‘उदविकासीय कड़ी’ से सुसंगत नहीं है, और अपने किसी भी उत्पत्ति एवं विकास की व्याख्या के लिए “दैवीय शक्ति” का सहारा लेता है, या ऐतिहासिक तथ्यात्मक साक्ष्यों के अभाव में “रटन्त तकनीक” (Rote Learning Technique) का सहारा लेता है, तो वह अवश्य ही एक “षड़यंत्र” का हिस्सा है, और वह मात्र एक ‘मानसिक जड़ता’ (Mental Inertia) का प्रतिफल होता है|

स्पष्ट है कि आज ‘इतिहास’ एक स्थापित विज्ञान है, और इसके सहारे कोई भी वर्तमान को, या किसी अतीत की व्याख्या कर सकता है, यानि समझ सकता है, या  आगे का पूर्वानुमान भी कर सकता है|

आचार्य प्रवर निरंजन जी

अध्यक्ष, भारतीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान|

मंगलवार, 6 मई 2025

हमारे विरोधी कमजोर क्यों नहीं हो पा रहे हैं?

मैंने समाज में एक विचित्र प्रवृति देखी है| हमारा प्रयास रहता है कि हमारा दुश्मन कमजोर हो जाय, या मिट जाय, या बर्बाद ही हो जाय, लेकिन प्रतिफल हमारी भावना के विपरीत ही दिखता है, और हमारा दुश्मन ‘और मजबूत’ होकर उभरता हुआ होता है| ऐसा क्यों होता है, और ऐसा कैसे होता है? यह बात हमें विचित्र इसलिए दिखी, क्योंकि यह हमारी पूर्व से स्थापित धारणा के विपरीत हो रहा था| गंभीर एवं गहन जाँच से पता चलता है कि हमारी यह पूर्व से स्थापित धारणा,  कि ध्यान देने से कोई कमजोर होता है, ही अनुचित था और इसीलिए यह अनपयुक्त भी है|

हम अपने और सामाजिक जीवन में पाते हैं कि यदि हम अपने स्वास्थ्य पर ध्यान देते हैं, तो हमारा स्वास्थ्य सुधरता है और वह मजबूत होता जाता है| यदि हम अपने शिक्षा पर पर्याप्त ध्यान देते हैं, तो हमारी शिक्षा एवं बुद्धिमत्ता भी सुधरता हुआ होता है, यानि ‘और मजबूत’ होता जाता है| यदि हम अपनी आर्थिक समृद्धि पर ध्यान देते रहते हैं, तो हमारी आर्थिक समृद्धि और सुदृढ़ होती जाती है| अर्थात प्रकृति का यह स्थापित सिद्धांत हुआ कि हम जिस भी चीज पर अपना ध्यान देते रहते हैं, तो वह ‘और मजबूत एवं समृद्ध’ होकर उभरेगा| इसी सिद्धांत के अनुसार, इसी तरह, यदि हम अपने ‘दुश्मन’ पर ही ध्यान देते रहेंगे, तो वह दुश्मन ‘और मजबूत’ एवं ‘सशक्त’ होता जाएगा| तब तो ‘दुश्मन’ का इस अवस्था में, इस प्रक्रिया में ‘और मजबूत’ एवं ‘और सशक्त’ होकर उभरना अत्यंत स्वाभाविक है| इस तरह, इसके ‘और मजबूत’ होने की प्रक्रिया में कोई विचित्रता नहीं दिखनी चाहिए| यह तो स्वाभाविक प्राकृतिक सिद्धांत हुआ|

यदि यह एक स्थापित सिद्धांत है, तो इसकी क्रियाविधि (Mechanics) क्या है? हम जिस भी चीज पर ध्यान देते हैं, तो इसका यह अर्थ हुआ कि हम अपनी उर्जा, समय, संसाधन एवं वैचारिकी का उस ‘चीज’ पर निवेश करते हैं, लगाते हैं, देते रहते हैं| जब हम किसी भी चीज में ‘और उर्जा’ देते हैं, तो वह ‘और गतिमान’ हो जाता है, ‘उर्जावान’ हो जाता है और सक्रिय’ हो जाता है, और इस तरह यह अत्यधिक लोगों का ध्यान आकृष्ट करता है, अत्यधिक लोगों के विमर्श का केंद्र बिंदु बन जाता है| इस तरह ‘वह चीज’ उन लोगों, जो लोग ‘उन चीजो’ के विरोध करते होते हैं, का जीवन- दर्शन, सामाजिक- दर्शन एवं विश्व- दर्शन का केंद्र बन जाता है, उनका जीवन उसी के इर्द गिर्द घूमने लगता है| इस तरह उसका सम्पूर्ण समर्पण ही उसी के लिए हो जाता है|आपका ‘समय’, ‘संसाधन’ एवं ‘वैचारिकी’ का जो सदुपयोग आपके संवर्धन एवं विकास मे होना चाहिए था, वह ऐसे ही बेकार चला जाता है, या उसे ‘नकारात्मक’ ही मान लिया जाना चाहिए|

दरअसल ‘विरोध’ करना भी मात्रात्मक रूप में ‘समर्थन’ करना ही है, सिर्फ इसकी दिशा ‘विपरीत’ होती है, अर्थात ‘विरोध करना’ भी नकारात्मक समर्थन ही है| आपको जहाँ अपनी दुनिया को समृद्ध बनाने के लिए ध्यान देना चाहिए, वहीं आप दूसरों के दुनिया पर ध्यान लगाये हुए हैं, जबकि आपके पास ‘समय’ तो एक निश्चित मात्रा में ही है, और उसका सृजन भी संभव नहीं है| कोई भी ‘उर्जा’, संसाधन’ एवं वैचारिकी का सृजन कर ले सकता है, लेकिन यदि यह भी महत्वपूर्ण है, तो हमें इसका भी सदुपयोग ही करना चाहिए|

यह ध्यान रखना चाहिए कि हमें किसी मौजूद लकीर को मिटाने या हटाने के पक्ष में नहीं रहना है, बल्कि उससे बड़ी लकीर खीचना चाहिए| लेकिन यह बड़ी लकीर भी अनुचित है, क्योंकि इसका सन्दर्भ वही पुरानी लकीर होगा| इसलिए नई कृति के लिए उस पहले की लकीर को भी सन्दर्भ में नहीं लेकर नई दुनिया का ही सृजन करना चाहिए| थोडा ठहर कर सोचिए|

जब हम अपने विरोधी, चाहे वह व्यक्ति, विचार, आदर्श या भावना हो, का विरोध करने के लिए अपना उर्जा, समय, संसाधन एवं वैचारिकी लगाते हैं, तब हम उस व्यक्तित्व का, उस विचार का, उस आदर्श का, एवं उन भावनाओं का प्रचार प्रसार करते हुए होते हैं, और अन्य सामान्य सम्बन्धित लोगों के विश्व दर्शन एवं जीवन दर्शन का केंद्र बनाते हुए होते हैं| तब हम अपना जीवन उद्देश्य उसके विरोध के अनुसार निर्धारित करते हुए होते हैं| तब प्रतिक्रया देना ही हमारा जीवन आदर्श हो जाता है, जीवन उद्देश्य हो जाता है, और तब हमारी चेतनता को सिर्फ प्रतिक्रिया देने की आदत सी हो जाती है| तब हमारा अपना कोई जीवन संवर्धन योजना या आदर्श नहीं रह जाता है, जिस पर हम कोई निश्चित कार्य करना चाहेंगे| ऐसी अवस्था में हमारी भावनाओं का, हमारे विचारों का, हमारे व्यवहारों एवं कर्मों का नियामक, निर्धारक, नियंत्रक एवं संचालक वह दुश्मन ही हो जाता है, जिससे हम मुक्ति चाहते होते हैं| इस तरह हम उसके नियंत्रण में होते हैं, जिससे हम मुक्ति (Liberty) एवं स्वतन्त्रता (Freedom) चाहते होते हैं| यह बड़ी ही विचित्र दास्तान है, जिसे ठहर कर और गंभीर होकर समझने की जरुरत है|

जैसे भौतिक पदार्थ भी समय के साथ स्थिर रहने पर ‘चट्टान’ बन जाता है, उसी तरह हमारे विरोधियों की भावनाएँ, विचार, कल्पनाएँ एवं मान्यताएँ भी समय के साथ एवं अपनी स्थिरता के साथ ही हमरे जीवन की वास्तविकता बन जाती है, सच्चाई बन जाती है, भले वे भावनाएँ, विचार, कल्पनाएँ एवं मान्यताएँ आदि किसी षड़यंत्र के तहत ‘गढ़ी’ गई हो| भारत में बहुत सी सामाजिक सांस्कृतिक भावनाएँ, विचार, कल्पनाएँ एवं मान्यताएँ मात्र कल्पना आधारित है| इसकी सत्यता को जानने के लिए उसे “वैज्ञानिक भौतिकवाद” पर कसने एवं जाँचने की आवश्यकता होती है|

शायद इसीलिए महान वैज्ञानिक एवं दार्शनिक अल्बर्ट आइन्स्टीन कहते हैं कि किसी भी समस्या का समाधान चेतनता के उसी स्तर पर रह कर नहीं किया जा सकता है, जिस चेतनता के स्तर पर समस्या का अस्तित्व वर्तमान है| इसीलिए हमें समस्या, यानि विरोधी के चेतनता के स्तर से उच्चतर स्तर पर अवश्य ही जाना चाहिए, अन्यथा हम अपने को और तथाकथित अपने लोगों से ‘खेल’ कर रहे होते हैं| ऐसे ‘खेलों’ को भारत में ‘तमाशा’ भी कहते हैं| इसीलिए आपने भी अपने समाज में ध्यान दिया होगा, कि हम जिन सामाजिक सांस्कृतिक समस्यायों से ‘मुक्ति’ या ‘स्वतन्त्रता पाना चाहते रहे हैं, और अपनी समझ के अनुसार जबरदस्त ढंग से विरोध भी करते रहे हैं, वह जबरदस्त ढंग से मजबूत होता जा रहा है, या उभरता हुआ दिख रहा है|

हमें किसी पर भी प्रतिक्रिया देने या किसी को जबाव देने के बजाय हमें अपनी नीति और योजना पर गंभीरता से आगे बढ़ना चाहिए। 

ठहरिए, थोडा स्थिर होइए| किसी भी बिंदु पर आपके ठहरने से ही आप उसकी गहराईयों में उतर सकते हैं, और उन समस्यायों की ‘जड़ों’ को देख, समझ सकते हैं| तब आपको उसका निदान, समाधान भी समझ में आने लगेगा|

 आचार्य प्रवर निरंजन जी

अध्यक्ष, भारतीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान|

सोमवार, 5 मई 2025

क्या आस्तिकता और नास्तिकता एक ही तथ्य के दो स्वरुप है?

यह सवाल कि क्या आस्तिकता और नास्तिकता एक ही तथ्य के दो स्वरुप है?  आपको बहुत अटपटा लग रहा होगा। हाँ, दोनों ही एक है। इसके लिए आपको इस संक्षिप्त आलेख को ध्यान से पढना और समझना है। इसके अन्तिम पैरा में आपको स्वत: स्पष्ट हो जाएगा। 

यदि हमलोग अपने आप को बुद्धिजीवी समझते हैं, और मानवता के वर्तमान एवं भविष्य को सजाना और संवारना चाहते हैं, तो बहुत अच्छी समझ है| लेकिन यदि हमलोग सिर्फ अपने को ही समझदार और बौद्धिक समझें, और इसके साथ ही सामने वाले को सिर्फ मूर्ख समझते रहें, तो यह हमारा घमंड है और इसीलिए शायद हमलोग बौद्धिक ही नहीं है| ऐसे लोग प्रत्येक सामाजिक फोरम पर दूसरे के ज्ञान एवं समझ पर नुक्स तो निकालते रहेंगे, लेकिन उनके द्वारा कोई व्यावहारिक समाधान नहीं सुझाया जायगा, या समाधान की ओर कोई नेतृत्व भी नहीं दिया जायगा| ऐसे लोग सिर्फ बड़ी बड़ी सैद्धांतिक बाते करेंगें, लेकिन ऐसे लोग कोई ठोस व्यवहारिक समाधान नहीं देंगे| ऐसे लोगों को अपने ज्ञान पर घमंड होता हैं, लेकिन उन्हें अपने घमंड का ज्ञान ही नहीं है|

'आस्तिकता और नास्तिकता' को जानने के लिए हमें बौद्धिकता, चेतनता एवं व्यावहारिकता को समझना चाहिए।|बौद्धिकता वह अवस्था है जिसमे कोई व्यक्ति बुद्धि का समुचित एवं उपयुक्त उपयोग एवं प्रयोग करता है| अपने परिवेश एवं पारिस्थितिकी के प्रति चेतनशील यानि संवेदनशील रहना, यानि इसके बदलते स्वरुप के प्रति सजग, सतर्क, संवेदनशील और व्यावहारिक रहना ही चेतनता है| बौद्धिकता और चेतनता का ऐसा उपयोग करना, जिससे मानवता के वर्तमान एवं भविष्य को सुधारा एवं सजाया जा सके, व्यावहारिकता कहलाता है| 

आप कोई बौद्धिक बात, वैज्ञानिक बात, यानि समझदारी भरी ज्ञान किसी को समझाना या देना चाहते हैं और सामने वाला वह व्यक्ति उन सब बातों को नहीं समझ पा रहा है, तो इसके क्या क्या निहितार्थ हो सकते हैं? इसका स्पष्ट मतलब है कि या तो उस सामने वाले व्यक्ति के चेतना का स्तर आपसे निम्नतर है, या आपका ही चेतना का स्तर उससे निम्नतर है, और इसीलिए उसे नहीं समझाया जा सकता है। तब आपका ऊर्जा, समय, संसाधन एवं वैचारिकी व्यर्थ जा रहा है, अर्थात आपका वह प्रयास ही व्यावहारिक नहीं है। स्पष्ट है कि चूँकि उसकी चेतना का स्तर ही आपसे निम्नतर है, या आपसे उच्चतर है, तो ऐसी अवस्था में चेतनता की दो अलग अलग दुनिया है, और इसीलिए इसमें बौद्धिकता का प्रवाह ही नहीं होगा|

बाजार की बदलती हुई व्यवस्थाओं में, यानि तेजी से बदलती हुई आर्थिक शक्तियों के प्रभाव में चेतना संबंधित अवधारणाएँ भी तेजी से बदलती जा रही है। लेकिन सामान्यतः लोग इस बात को लेकर सचेत नहीं है कि उनकी चेतना के प्रति धारणाओं को कौन और किस विधि से स्वरूप दे रहा है? ये अवधारणाएँ व्यक्ति, परिवार, समाज और मानवता को किस दिशा में ले जा रही है, या ले जाना चाह रही है? यह चेतना ही हमारी जीवन दृष्टि है, विश्व दृष्टि है, भविष्य दृष्टि है। क्या हम अपने आसपास के लोगों के चेतना के स्तर की समझ रखते हैं? सभी लोग अपनी चेतना के अनायास प्रयास से ही अवधारित स्वरूप को ही अन्तिम सत्य मान चुके हैं। इसी कारण तथाकथित बुद्धिजीवियों को चेतना पर विमर्श के लिए ध्यान ही नहीं जाता, और परिणामस्वरूप ऐसे तथाकथित बुद्धिजीवियों में सिर्फ सामाजिक सांस्कृतिक पीड़ा ही व्यक्त होती रहती है।

किसी भी वस्तु या अवस्था का वास्तव में एक ही समय में एक ही स्वरूप होता है, लेकिन उसी का अर्थ अवलोकन करने वाले व्यक्तियों के चेतना के स्तर के अनुरूप ही बदलता रहता है। इस तरह एक ही तथ्य के कई सत्य स्वरूप हो जाता है। चेतनता के इसी मनोविज्ञान को तथाकथित बौद्धिक नहीं समझ पाते हैं, और इसीलिए अपने सम्पूर्ण समर्पण के वाबजूद भी सफल नहीं हो पाते हैं| ऐसे तथाकथित बुद्धिजीवी चेतना को ही नहीं समझते और वे चेतना के दर्शन को नहीं समझते, चेतना के मनोविज्ञान नहीं समझते, चेतना के विज्ञान एवं यांत्रिकी को नहीं समझते, और इसे समझे बिना ऐसे तथाकथित बुद्धिजीवी कोल्हू के बैल साबित होकर रह जाते हैं। चेतना का दर्शन हमें जीवन का सफर सुगम बनाने की समझ देता है। चेतना का मनोविज्ञान चेतनाधारक के जीवन को संचालित करने वाले साफ्टवेयर, यानि संस्कृति की सम्पूर्णता को समझाता है। तब हमें यह सब समझना चाहिए। मतलब किसी भी एक ही वस्तु या अवस्था का स्वरूप अवलोकन कर्ता के चेतना, यानि समझदारी के स्तर के अनुसार बदल जाता है, या बदलता रहता है, और वह अपनी समझ के अनुसार ही व्यवहार करेगा|

चेतना और कुछ नहीं है, यह सिर्फ किसी वस्तु, या अवस्था, या परिवेश को सम्यक् एवं समुचित रुप से समझना है। समाज में चेतना के स्तर पर तीन तरह के लोग होते हैं| ईल्यानोर रुजवेल्ट ने लोगों को उनके चेतना की प्रकृति के अनुसार तीन स्तर पर वर्गीकृत किया है| चेतना के प्रथम या उच्चतर स्तर, चेतना के द्वितीय यानि मध्यम स्तर, एवं चेतना के तृतीय यानि निम्नतर स्तर। मैडम रुजवेल्ट ने इसे क्रमशः बौद्धिकता के उच्चतर लोग या चिन्तक, मध्यमवर्गीय लोग या मध्यवर्गीय चिन्तक, और निम्न वर्गीय लोग या छोटे चिन्तक भी कहा है। किसी समेकित आबादी का स्वरुप चेतना के इन संयुक्त स्तर के लोग मिलकर एक पिरामिड का आकार देता हैं, जिसका आधार (base) निम्नतर चेतना वाले, शिखर (tip) पर उच्चतर चेतना वाले, और दोनों के मध्य में मध्यम चेतना के मध्यमवर्गीय लोग होते हैं, और इस स्वरूप में इसका जनसांख्यिक महत्व भी समझा जा सकता है।

मैडम के अनुसार, छोटे स्तर के चेतना के लोग व्यक्तियों (Individuals) की बात ज्यादा करते हैं, यानि व्यक्तियों के बारे में ब्यौरा ज्यादा देते हैं, यानि शारीरिक ज्ञानेन्द्रियों के स्तर पर ही निर्णय ले सकते हैं| उच्चतर स्तर के लोग विचारों एवं आदर्शो पर विमर्श (Ideas n Ideals) ज्यादा करते हैं, यानि शारीरिक ज्ञानेन्द्रियों के अतिरिक्त मानसिक एवं अध्यात्मिक शक्तियों (इसे अन्तर्ज्ञान - Intuition भी कहते हैं, और यह बाजारु आध्यात्मिकता से भिन्न है) का उपयोग करते हैं| मध्यमवर्गीय लोग घटनाओं (Incidences) के विवरण ज्यादा देते हैं, यानि ये लोग निम्नतर एवं उच्चतर स्तर के मध्य में होते हैं| स्पष्ट है कि एक ही वस्तु, या एक ही अवस्था, या एक ही परिवेश के लिए चेतना के विभिन्न स्तरों के आधार पर भिन्न भिन्न अर्थ निकलता है, या निकाला जाता है|

इसलिए एक ही वस्तु, या अवस्था, या स्थिति को भिन्न भिन्न स्तर के लोग अलग अलग नाम देते हैं| सम्पूर्ण विश्व एवं ब्रह्माण्ड एक ‘एकीकृत फील्ड’ (देखें Unified Field Theory) से संचालित है, और इसको इसी रूप में समझने वाले लोगों को चेतनता का उच्चतर अवस्था में रखते हैं, और इनको वैज्ञानिक या वैज्ञानिक मानसिकता वाले लोग कहते हैं|  ऐसे लोगों को ही 'नास्तिक' समझा जाता है।  इसी अवस्था को निम्नतर चेतनता के स्तर के लोग "ईश्वर" या ‘व्यक्ति स्वरुप’ (Personification) समझते एवं व्यवहार करते हैं| इसी को कुछ लोग “सर्वोच्च सत्ता” (Supreme Power) भी कहते हैं| ऐसे लोगों को ही 'आस्तिक' कहा जाता है। इन दोनों के मध्य चेतनता वाले लोग इसे ही ‘बलों’ (Forces) एवं कणों (Particles) का सञ्चालन समझते हैं|ऐसे लोग नास्तिकता और आस्तिकता के मध्य अस्पष्ट अवधारणा में होते हैं। 

इसीलिए यह एक ही तथ्य - "एकीकृत फील्ड" (Unified Field Theory) के दो पक्ष - नास्तिकता और आस्तिकता है, जिसकी समझ लोगों की चेतना, यानि उसकी बौद्धिकता के स्तर से निर्धारित होता है। इस तरह नास्तिकता और आस्तिकता एक ही सत्य के दो स्वरूप हुए। 

अत: हमें लोगों की चेतनता को समझना है, और इसी के अनुसार उनकी बौद्धिकता को भी समझना है, और इसी के अनुरूप हमें व्यवहारिक भी बनना है; अन्यथा हम हवा हवाई बौद्धिक हैं, और हम किसी व्यवहारिक उपयोग के लायक नहीं हैं|

कृपया विचार कीजिएगा|

आचार्य प्रवर निरंजन जी

अध्यक्ष, भारतीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान|

शनिवार, 3 मई 2025

किताबों में क्या लिखा है?

प्रसंग यह था कि मैं एक वेबिनार में मुख्य वक्ता था| उसमे मैं यह बता रहा था कि मैं आजतक जो भी किताबें लिखा हूँ, वह सभी किसी भी अन्य किताबों के सहयोग के बिना ही लिखा हूँ| लेकिन मैं अपनी प्रथम किताब “बुद्ध दर्शन एवं रूपांतरण” में डॉ भीमराव आम्बेडकर द्वारा रचित किताब – ‘बुद्ध एवं उसका धम्म’ को ही सन्दर्भ ग्रन्थ बनाया था| इसी वक्तव्य पर एक श्रोता मुझसे यह जानना चाहते थे कि इस किताब – ‘बुद्ध एवं उसका धम्म’ में पुनर्जन्म एवं कुछ ऋषियों के भविष्यवाणियों की भी चर्चा है| तो क्या मैं इन अवधारणाओं को सत्य एवं सही मानता हूँ? मैंने उन्हें इस सम्बन्ध में जो समझाया, वह विस्तार से निम्न था|

किताबों में क्या लिखा होता है? किताबों में बहुत कुछ लिखा होता है, लेकिन एक पाठक उसमे जो कुछ पढता समझता है, दूसरा उसे ही कुछ अलग अर्थ में लेता है, और अन्य उसे कोई और भिन्न भिन्न अर्थ देता हुआ पढता एवं समझता है| प्रसिद्ध फ्रेंच दार्शनिक ज़ाक देरिदा भी कहते हैं कि किताबों में शब्द लेखक का अपना होता हैं, अर्थात लेखक की समझ के अनुसार होता है, लेकिन उन शब्दों के अर्थ पाठकों के समझ एवं पृष्ठभूमि के अनुसार भिन्न होते हैं| अर्थात किताबों के एक ही शब्द के अर्थ अलग अलग पाठकों के अनुसार बदल जाता है| तो ऐसा क्यों होता है? ऐसा इसलिए होता है क्योंकि एक ही “तथ्य” (Facts) के कई “सत्य” (Truths) होते हैं, जो उस पाठक के बदलते हुए दृष्टिकोणों, सन्दर्भों एवं पृष्ठभूमियों के साथ ही उसका अर्थ बदलता रहता है| क्या आपने यह ध्यान दिया है कि एक वस्तु पर विभिन्न कोणों से उस पर प्रकाश डाला जाता है, तो उसकी छाया अलग अलग आकार (Size) एवं आकृति (Shape) की बनाती है? अर्थात एक ही तथ्य (वस्तु) के अनेक सत्य होते हैं| फ्रांसीसी दार्शनिक ज़ाक देरिदा के इस अवधारणा को “विखंडनवाद” (Theory of Deconstruction) कहते हैं| मतलब एक ही तथ्य, या शब्द, या वाक्य का एक ही सत्य नहीं होता है, उसका वास्तविक सच्चा अर्थ भी बदलता रहता है| अब आप किसी किताब में अपनी चेतना के स्तर के अनुसार क्या समझ पा रहे हैं, आप ही जानते हैं|

इसके आलावा एक किताब में बहुत कुछ लिखा होता है, और कोई भी उनमे से किसी ख़ास अंश पर ज्यादा ध्यान देता है, और अन्य कोई किसी दूसरे अंश पर ज्यादा ध्यान देता है| ये अंश या अर्थ पाठकों के चेतना के स्तर के अनुसार भिन्न भिन्न हो जाता है| प्रसिद्ध अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रेंकलिन रूज़वेल्ट की पत्नी एल्योनॉर  रूज़वेल्ट लोगों के चेतना के स्तर एवं समझ के सम्बन्ध में कहती है – निम्नतर सोच के लोग व्यक्तियों (Individuals) का विवरण (Description) ज्यादा देते लेते हैं, मध्यम स्तरीय सोच के लोग घटनाओं (Incidence) का ब्यौरा (Details) ज्यादा देते लेते हैं, और उच्च स्तरीय सोच के लोग विचार एवं आदर्श (Ideas) पर विमर्श (Discuss) ज्यादा करते हैं| इन तीनों – ‘Individuals’ , ‘Incidence’ , एवं ‘Ideas’ को 3 I ‘s भी कहते हैं| कहने का तात्पर्य यह है कि एक ही किताब को लोग अपनी समझ यानि अपनी चेतना के स्तर से समझते हैं, और उन किताबों से ग्रहण करते हैं| मतलब किताब एक ही होता है, लेकिन उन किताबों से लोग अपनी अपनी चेतना, यानि अपनी अपनी समझ के अनुसार ही सीखते समझते हैं| मैंने उस श्रोता को बताया कि मैंने डॉ आम्बेडकर की उस किताब से ‘विचार’ एवं ‘आदर्श’ को समझा, अपनाया, और उसे मैंने अपनी उस किताब में समुचित स्थान दिया| आपने उस किताब से क्या ग्रहण किया, वह आप ही जाने? लेकिन डॉ आम्बेडकर ने तो अपनी किताब में अपने सभी श्रेणी यानि स्तर के पाठको को ध्यान में रख कर उस किताब को लिखा और चेतना के तीनों स्तर के पाठकों के लिए एक साथ एक ही किताब में समुचित स्थान दिया, ताकि पाठक उसे अपनी अपनी रूचि के अनुसार समझें एवं ग्रहण करें|

यदि हम किताबों के प्रयुक्त शब्दों, या वाक्यों, या वाक्य समूहों का सही एवं सान्दर्भिक अर्थ जानना एवं समझना चाहते हैं, तो प्रसिद्ध दार्शनिक सौसुरे की चर्चा के बिना यह प्रसंग अधूरा रह जायगा| प्रसिद्ध स्विट्ज़रलैंड निवासी भाषा वैज्ञानिक फर्डीनांड दी सौसुरे का “संरचनावाद” (Theory of Structure) यही समझाता है| इसके अनुसार किताबों के प्रयुक्त शब्दों, या वाक्यों, या वाक्य समूहों का सही एवं सान्दर्भिक अर्थ उसकी संरचना में निहित होता है| अर्थात किताबों के प्रयुक्त शब्दों, या वाक्यों, या वाक्य समूहों का सही एवं सान्दर्भिक अर्थ सतही (Superficial) भी होते हैं, और एक ही साथ उसके निहित (Implied) अर्थ भी होते हैं, जो उसके सतही अर्थ से भिन्न होता है| इसका अर्थ यह हुआ कि किताबों में प्रयुक्त शब्दों, या वाक्यों, या वाक्य समूहों का सही एवं सान्दर्भिक अर्थ उसकी बाह्य संरचना या ढाँचा, यानि उसके सन्दर्भ, पृष्ठभूमि, दृष्टिकोण, आदि पर भी निर्भर करता है, और उसकी आंतरिक संरचना पर भी निर्भर करता है| एक पाठक को किसी भी शब्द या वाक्य का अर्थ निष्पक्ष भाव से देखना आना चाहिए|

किताब हम क्यों पढ़ते हैं? हम किताबें इसलिए पढ़ते हैं, ताकि हम “और बुद्धिमान” (More Intelligent) बन सके| बुद्धिमान’ उसे कहते हैं, जो बदलते हुए परिस्थिति एवं पारिस्थितिकी के अनुकूल होकर उस माहौल में उसे नेतृत्व भी दे सके, यानि ‘आगे’ रह सके| ध्यान रहें कि कोई भी परिस्थिति एवं पारिस्थितिकी समय के सापेक्ष कभी भी ‘नित्य’ यानि स्थिर कभी नहीं रहता है, अपितु सदैव बदलता रहता है, और इसे ही बुद्ध का “अनित्यवाद” कहते हैं| हमें इस बदलते परिवेश के अनुरूप ही ‘अनुकूलन’ (Adaptation) करना होता है| हम किताबे इसलिए भी पढ़ते हैं ताकि हम ‘प्रज्ञावान’ (Wise man) बन सके, जिससे हम मानवता को सँवार सकें, प्रकृति को सक्रिय एवं जीवंत रख सके, और मानव प्रजाति के भविष्य को सुरक्षित एवं संरक्षित रख सकें| यही तीनों तत्व ‘UNDP’ (संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम) के सभी ‘धारणीय लक्ष्यों’ (Sustainable Goals) में समाहित है| इसलिए किताबें हमें सिर्फ ‘साक्षर’ (Literate) या ‘शिक्षित’ (Educated, यानि डिग्रीधारी) ही नहीं बनाती है, बल्कि हमें प्रज्ञावान भी बनाती है| हम जिस क्षेत्र, यानि जिस विषय का ज्ञाता बनना चाहते हैं, उसी विषय से सम्बन्धित किताबें पढ़ते हैं|

अब आप समझ गए होंगे कि किताबों में क्या क्या लिखा हुआ होता है?

आचार्य प्रवर निरंजन जी

अध्यक्ष, भारतीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान| 

शुक्रवार, 2 मई 2025

आतंकवाद क्यों समाप्त नहीं हो रहा?

कश्मीर के पहलगामा में पर्यटकों पर जिस तरह से वहशी और कायरतापूर्ण हमला किया गया, उसने मानवता को झकझोर दिया है। इससे यह सवाल उठता है कि हम कहाँ जा रहे हैं? आतंकवादी कौन होते है?, ये आतंकवादी क्यों बनते हैं? यह आतकवाद क्यों समाप्त नहीं हो पा रहा है? कोई बात या विचार जबरदस्ती किसी दूसरे पर थोपने के लिए किया दहशत यानि आतंक ही आतकवाद है| यह बहुत ही सटीक लेकिन व्यापक परिभाषा है, जिसमे सभी आतंकवाद शामिल हो जाता है, जो किसी भी श्रेष्टता, प्रजातीयता, सम्प्रदायिकता, राष्ट्रीयता, जातियता, या कोई अन्य संकीर्ण भावना पर आधारित होता है|

सभी आतंकवादियों का कुछ मौलिक एवं विशिष्ट प्रकृति तथा स्वभाव होता है, जो सर्वव्यापक एवं सार्वजनीन भी होता है| आतंकवादियों की संरचना के दो स्वरुप होते हैं, जिनमे पहला, खुलकर सामने आने वाले कार्यकर्ता होते हैं और दूसरा, इनका उपयोगकर्ता होता है| ये कार्यकर्ता बिना किसी हथियार के भी आतंक फैलाते हुए होते हैं, और हथियार के साथ भी आतंक फैलाते हुए होते हैं| इनका उपयोग अधिकतर राजनीति के लिए ही होता है, भले ही यह सामान्य लोगों को सांप्रदायिक, या धार्मिक, या जातीय, या नस्लीय, या भाषाई स्वरुप आदि के रूप में दिखता है|

यदि आतंकवाद विश्व से समाप्त नहीं हो पा रहा है, तो उसका एक बड़ा कारण यह भी है कि हम तथाकथित दूसरों का आतंकवाद तो समाप्त करना चाहते हैं, लेकिन अपना नहीं। इसी कारण व्व्यस्था आतंकवाद के मूल को समाप्त ही नहीं करना चाहता है। शायद इसका मूल कारण यह हो कि हम आतंकवाद की उत्पत्ति, उद्विकास, एवं क्रियाविधियों को ही नहीं समझते हैं। मानव मूलतः एक स्तनपायी पशु ही है, और इसीलिए निम्नतर मानसिकता के लोगों में इसकी हिंसक पाशविक प्रवृत्तियाँ अभी भी मौजूद है। हम यह भी जानते और समझते हैं कि शांति, सहयोग और समरसता की भावना के कारण ही हमलोग आज एक वर्तमान सभ्य एवं विकसित मानव बन सके हैं। मतलब हम शांति, सहयोग और समरसता की भावना को मूल पशुवत हिंसा की भावना पर प्राथमिकता देते हैं, और इसी कारण हम आज आधुनिक मानव भी बन सके। स्पष्ट है कि हमें मिल कर मूल पशुवत हिंसक भावना को हटाकर शांति, सहयोग और समरसता की भावना को उभारना होगा, और इसके लिए हमें सजग, सतर्क, समर्पित और योजनाबद्ध प्रयास और प्रयोग करना है।

आतंकवादियों में अधिकतर ऐसे लोग होते हैं, जो भावनात्मक रूप में बहने वाले होते हैं, आलोचनात्मक चिंतन के अभाव में विचारों में जड़ता होती हैं और इसीलिए ये अपनी पूर्व धारणाओं को बदल नहीं सकते| इसीलिए ये मूढ़ भी होते हैं और अंधभक्त भी होते हैं। ये लोग जिसे सत्य और सही मानते हैं, उनके लिए वही अंतिम तथ्य होता है, भले ही उसका तार्किकता, वास्तविकता, मानवता और वैज्ञानिकता से कोई संबंध नहीं हो। दरअसल आतंकवादियों के नेता या उपयोगकर्ता बहुत ही चतुर और चालाक होते हैं, जो अपने स्वार्थसिद्धि के लिए ‘मूर्खो’ को अपने साधन यानि ‘आतंकी कार्यकर्त्ता’ के रूप में उपयोग करते हैं| लेकिन ये आतंकवादी नेतागण जिन लोगों का उपयोग आतंक फैलाने में करते हैं, यदि ये ‘मूढ़’ लोग इनको उपलब्ध नहीं हों, तो इन आतंकवादियों के नेताओं को ही समाप्त होना होगा|

स्पष्ट है कि इन आतंकवादियों को समाप्त करने के लिए इन सामान्य लोगों के अज्ञानताओं को मिटाना, हटाना, और समाप्त करना होगा| दुर्भाग्य यह है कि राजनीतिक लोग अपनी राजनीतिक लाभ के लिए इन अज्ञानताओं को मिटाना ही नहीं चाहते हैं, और आतंकवादियों को मिटा देने का बड़ी बड़ी डींगें हाँकते रहते हैं| विश्व के जितने भी आतंकवादियों के संगठन हैं, उनके साथ यही हो रहा है| अफगानिस्तान के आतंकवादी हो, या अन्य किसी देश के आतंकवादी हो, या नक्सलवादी हो, सभी समस्याओं की जड़ यही अज्ञानता है|

ऐसा हर व्यक्ति, जो न्याय, स्वतंत्रता, समता, समरसता, बंधुत्व में विश्वास नहीं करता है, जिसके विचारों का तार्किकता, वास्तविकता, मानवता और वैज्ञानिकता से कोई संबंध नहीं है, जिसका विश्वास ही सत्यता का अपेक्षित प्रमाण है, उसका अवश्य ही आतंकवादी बनना सुनिश्चित है। ऐसा ही मूढ आदमी दुष्ट होता है, ऐसा ही आदमी अपने विचारों में जड़ होता है, और उसे लगता है कि जो उसके अनुसार नहीं है, वे सभी अनैतिक है, अधार्मिक है, गलत है। आतंकवादियों के सभी गुणों, स्वभावों एवं प्रकृतियों का आधार सिर्फ ‘अज्ञानता’ ही है| लोगों की अज्ञानता दूर कर दीजिए, आतंकवादियों का प्रत्येक संगठन समाप्त हो जायगा| अन्यथा ऐसा व्यक्ति, चाहे वह किसी भी प्रजाति, सम्प्रदाय, जाति, या राष्ट्रीयता का हो, आतंकवादी हो ही जा सकता है| ऐसे लोगों को सांप्रदायिक आधार या धार्मिक विश्वास, या नस्लीय दुर्भावना, या जातीय पूर्वाग्रह, या भाषायी श्रेष्ठता आदि भावनाओं में उड़ा या बहा ले जाना बहुत आसान होता है| ऐसा हर अतार्किक एवं अवैज्ञानिक आदमी आज नहीं, तो कल आतंकवादी बनेगा ही, या उसका समर्थक ही बनेगा|

हमलोग मूलत: एक पशु ही है, और इसीलिए इसकी हिंसक पाशविक प्रवृत्तियाँ अभी भी मौजूद है। हम यह जानते और समझते हैं कि शांति, सहयोग और समरसता की भावना के कारण ही हमलोग एक वर्तमान मानव बन सके हैं। मतलब हम शांति, सहयोग और समरसता की भावना को मूल हिंसा की भावना पर प्राथमिकता देते हैं, और इसी कारण हम मानव भी बन सके। स्पष्ट है कि हमें मिल कर मूल हिंसक की भावना को हटाकर शांति, सहयोग और समरसता की भावना को उभारना होगा, और इसके लिए हमें सजग, सतर्क, समर्पित और योजनाबद्ध प्रयास और प्रयोग करना है। इस योजनाबद्ध प्रयास में अन्य परंपरागत प्रयासों के अतिरिक्त ज्ञान एवं समृद्धि का विस्तार करना शामिल हो| ध्यान रहें कि यह ज्ञान (Wisdom) मात्र शिक्षाडिग्री (Educational Degree) या साक्षरता (Literacy) का पर्यार्य नहीं है, बल्कि शिक्षा या साक्षरता के बहुत बहुत आगे की चीज है| ज्ञान (Wisdom) में मानवता शामिल होता है, प्रकृति शामिल होता है, और भविष्य भी शामिल होता है|

यदि कोई उपरोक्त को नहीं समझता है, या नहीं समझना चाहता है, और फिर भी आतंकवाद समाप्त करना चाहता है, तो वह ऐसा करने का मात्र दिखावा करता है, नाटक कर रहा है। कोई भी यदि किसी भी स्वरूप के आतंकवाद को मिटाना चाहता है, और आतंकवाद के किसी दूसरे स्वरूप की निरन्तरता जारी रखना चाहता है, तो यह राजनीति है। ऐसी राजनीति किसी खास व्यक्ति या समूह को क्षणिक लाभ दिला सकती है, लेकिन यह सब मानवीय उद्विकासीय इतिहास में एक कलंक या धब्बा के रूप में याद किया जाएगा। इसे ध्यान में रखना है|

आचार्य प्रवर निरंजन जी

अध्यक्ष, भारतीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान|

गुरुवार, 1 मई 2025

आदमी को देवता बना देने से क्या होता है?

आपने भी अपने अपने समाज, या अपनी संस्कृति, या राष्ट्र या देश में किसी ऐतिहासिक व्यक्ति को देवता (God) बनते या बनाते हुए देखा होगा| यों तो इसका आधार उनका कृतित्व होता है, चाहे इसमें उनका कार्य शामिल हो, विचार शामिल हो, या व्यवहार शामिल हो, लेकिन उनके गुजर जाने के बाद क्या क्या होता है, यह बहुत ध्यान देने योग्य होता है| तो किसी व्यक्ति के देवता बन जाने के बाद क्या होता है?

सबसे पहले हमें यह समझ लेना चाहिए कि कोई व्यक्ति महान बनता है, या महान पैदा लेता है? कभी कभी किसी समाज में कोई व्यक्ति महान बन जाता हैं। मतलब वह व्यक्ति महान पैदा नहीं होता है, बल्कि अपनी सोच, समर्पण, ज्ञान, विश्वास, दृढ़ता और दूरदर्शी दृष्टिकोण के साथ ही महान बन जाता है। अर्थात कोई भी व्यक्ति महान बन सकता है, लेकिन कोई जन्म से महान पैदा नहीं लेता है। कहने का तात्पर्य यह है कि जन्म से पहले उस व्यक्ति का कोई स्वतंत्र और पूर्व से स्थापित पहचान नहीं होता है। किसी का भी गर्भधारण से पहले सिवाय किसी खास जीनीय संरचना में पुनर्गठन के अलावा कोई पहचान नहीं होता। हाँ, उस जन्मे बच्चे को ऐसा सकारात्मक एवं समृद्ध माहौल मिल सकता है। उसकी चेतनता को ऐसा माहौल और अवसर मिल सकता है, जिससे कोई भी अपने को विशिष्ट एवं महान बना सके| मतलब समुचित माहौल देकर किसी भी समाज या संस्कृति में महान व्यक्तियों की संख्या बढायी जा सकती है|

स्पष्ट है कि जब कोई व्यक्ति अपने विचारों या कार्यो से महानता प्राप्त कर लेता है, तो उसके देवता बन जाने, या बनाए जाने की संभावना बढ़ जाती है। यह भी सही है कि वह व्यक्ति देवता तुल्य होता है, या किसी सर्वशक्तिमान या आदरणीय से कमतर भी नहीं होता है। लेकिन किसी भी व्यक्ति के देवता बन जाने से उसके सन्दर्भ में क्या क्या बदलने लगता है? यह विचारणीय है।

आदमी को देवता मान लेने से सामान्यत: लोगों को उन व्यक्तित्वों के विचारों से मुक्ति पायी जा सकती है, या पा ली जाती है। चूंकि समय बदलता रहता है, शोध एवं अनुसंधान के कारण पूर्व से स्थापित मान्याताएं  एवं सिद्धांत बदलते रहते हैं, परिस्थितियाँ और संदर्भ भी बदलती रहती है, इसीलिए समय, संदर्भ एवं परिस्थितियों के साथ ही विचारों को भी अनुकूल होने के लिए बदलना पड़ता है। ऐसी स्थिति में यदि कोई विचार या विधि को अनुकूल नहीं बनाया जाय, तो वह विचार ही समय एवं सन्दर्भ के सापेक्ष अनुपयुक्त हो जाता है। 

मार्क्सवाद को सफलता के लिए अनुकूलित होकर रूस में लेनिनवाद हो जाना पड़ा, और यही फिर चीन में अनुकूलित होकर माओवाद हो गया| यदि ऐसे किसी विचार को बेकार या अनुपयुक्त बनाना हो, यानि उस सम्बन्धित समाज का अहित करना हो और उस समाज में कोई रचनात्मक सुधार के लिए उन विचारों में कोई अनुकूलन नहीं करने देना हो, तो सर्वप्रथम उस विचारक को ही देवता बना दिया जाए। मात्र देवता बनाने देने से ही उस तथाकथित देवताओं के विचार में कोई सुधार, संशोधन एवं संवर्धन की गुंजाइश समाप्त हो जाती है। किसी व्यक्ति के विचार पर ऐसा विमर्श किया जा सकता हैं, लेकिन किसी देवता के विचार पर किसी भी सुधार, संशोधन, परिमार्जन सम्बन्धित विमर्श की गुंजाइश ही नहीं बचती। तब उस महान विचारकों के विचारों की हत्या आसानी से किया जा सकता है।

किसी महान व्यक्ति को देवता बना देने से सबसे बड़ी बात यह होती है कि उनके ज्ञान को अन्तिम सत्य मान लिया जाता है। इसके बाद उनके अनुयायियों को कुछ और जानने एवं सीखने के लिए नहीं रह जाता है। नतीजा यह होता है कि उनके अनुयायी अपने ज्ञान और बुद्धि में सापेक्षिक रुप में पिछडने लगते हैं। तब वह समाज और संस्कृति भी पिछड जाता है। ऐसी अवस्था में अब और जानने की आवश्यकता नहीं होती है। आप उन महान व्यक्तियों को ढाल बना कर कुछ भी कह सकते हैं। आजकल उनके नाम पर बहुत ज्यादा गलत बताया जा रहा है। 

सामान्य व्यक्ति किसी महान व्यक्तित्व को अपनी शारीरिक इन्द्रियों द्वारा ही देख पाते हैं, और ये अक्सर उनके विचारों की गहराइयों में नहीं पहुँच पाते है, या पहुँचने की योग्यता ही नहीं होती है| ऐसे लोग अपने देवता स्वरूप व्यक्तित्व को मूर्तियों में ही देख पाते हैं, और उसकी पूजा भी कर अपना दायित्व को पूरा कर पाते हैं| ऐसे लोगों की संख्या अधिक होती है और उन समाजों या संस्कृतियों के लोगो के चुनावी मत (Vote) पाने के लिए नेताओं को उन महान व्यक्तित्वों का समर्थक दिखना पड़ता है| इसीलिए उनकी मूर्तियों का पूजन कर, या माल्यार्पण मात्र करके भी ऐसे नेता अपने को उनका महान अनुगामी या अनुयायी साबित कर पाते हैं। ऐसा उसी समय किया जा सकता है, जब वैसे महान व्यक्तित्वों को देवता या देवता- तुल्य बना दिया जाय| तब यह सब भावनात्मक स्तर पर करना बहुत ही आसानी से संभव हो जाता है|

ऐसा कर, यानि उन्हें देवता मान लेने मात्र से उनकी विचारों को जड़ बनाया जा सकता है, यानि उन विचारों की गतिशीलता समाप्त किया जा सकता है। उनके कोई भी विरोधी अपनी विकृत विचारों को उस दैवीय व्यक्तित्व के आवरण से ढक कर उस समाज को उलझा सकता है| विचारों के अर्थ बदल देने के लिए शब्दों की संरचना बदल दी जा सकती है, मनोवैज्ञानिक उलझन पैदा करने के लिए शब्दों के वैकल्पिक चयन और स्थान चयन में बदलाव कर दिया जाता है, और कभी सन्दर्भ बदल कर उसे प्रसंग विहीन साबित किया जा सकता है| यह सब उन्हें देवता के रूप में स्थापित करने के बाद ही आवश्यक हो जाता है| किसी भी देवता से लोगों का एक भावनात्मक श्रद्धा एवं समर्पण होता है| इस तरह उनके मौलिक विचारों में बदलते वैज्ञानिकता और बदलते परिवेश के अनुरूप अपेक्षित संशोधन, परिमार्जन और अनुकूलन को रोका जा सकता है| इससे उनके मौलिक विचारों से लोगों को विमुख करने बहुत आसनी होती है।

अक्सर ऐसा भी देखा जाता है कि किसी महापुरुष के विचारों के विरोधी भी ऐसे महापुरुषों को देवता बनाने में बढ चढ़ कर भूमिका में रहते हैं। इससे उनको उस महापुरुष के महान अनुयायी की श्रेणी का मान लिए जाने में सुविधा होती है| इसके अतिरिक्त उनको माल्यार्पण या किसी संगोष्ठी कर देने मात्र से ही उस समाज या संस्कृति का समर्थन मिल जाता है और उन नेताओं का काम पूर्ण होता है। तब उनके सामान्य अनुयायियों को भी इनके विचारों एवं आदर्शो की विवेचना और विश्लेषणात्मक मूल्यांकन के बौद्धिक अभ्यास से मुक्ति मिल जाती है।

आप भी उपरोक्त कड़ी में कुछ जोड़ सकते हैं| थोडा विचार कीजिए|

आचार्य प्रवर निरंजन जी

अध्यक्ष, भारतीय अध्यात्म एवं संस्कृति संवर्धन संस्थान|

 

 

स्त्रियाँ क्या होती है?

सवाल यह है कि स्त्रियाँ क्या होती है ? प्राकृतिक व्यवस्था में एक स्त्री क्या होती है? दूसरे स्तनपायी पशुओं एवं अन्य जीवों में इनकी क्या व्यव...