मंगलवार, 16 जनवरी 2024

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की जबरदस्त शक्तियाँ

(Tremendous Power of Cultural Nationalism)

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की शक्तियां जबरदस्त होती है और इसीलिए राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के नाम पर जबरदस्त नाटक किया जाता है, या किया जा सकता है। आप जानते हैं कि राष्ट्रवाद का धमाका स्वयं शक्तिशाली होता है, और उसने कई राष्ट्रीय राज्यों को उदित किया है और कई साम्राज्यों को विघटित भी किया है। इस शक्तिशाली राष्ट्रवाद में संस्कृति को मिलाने पर वह बहुत समृद्ध एवं प्रभावशाली हो जाता है। अतः सांस्कृतिक राष्ट्रवाद एक ऐसा सख्त और प्रभावशाली ढाल है, जिसके आड़ में कोई उसी देश की मूल संस्कृति को और उसी राष्ट्रीय समाज, यानि उसी राष्ट्र को भी बर्बाद कर सकता है और उस राष्ट्रीय राज्य का कोई सदस्य उफ़ भी नहीं करेगा। ‘संस्कृति’ ‘राष्ट्रवाद’ का सबसे महत्वपूर्ण शर्त है। और स्वयं यह संस्कृति सबसे व्यापक एवं विस्तृत अवधारणा है, कि कोई भी इसे अपने सुविधा और आवश्यकता के अनुरूप ही इसे व्याख्यापित और अवधारित कर सकते हैं, या करते हैं।

संस्कृति और राष्ट्रवाद, दो ऐसा प्रभावशाली और लुभावना अवधारणा (Concept) है, कि इसके नाम पर आप कुछ भी धृष्टता या दुष्टता आसानी से, आराम से और सहजता से कर सकते हैं। संस्कृति और राष्ट्रवाद समाज के अनन्त अचेतन की गहराईयों तक सम्पर्क में रहती है, हालांकि राष्ट्रवाद की अवधारणा कोई दो-तीन शताब्दी ही पुरानी है और यह एक कल्पित वास्तविकता मात्र है। जब संस्कृति और राष्ट्रवाद इतने प्रभावशाली और लुभावना अवधारणा है, तो आपको मात्र संस्कृति और राष्ट्रवाद की अवधारणा को अपनी सुविधानुसार व्याख्यापित कर देना है, या अपनी सुविधानुसार अवधारित (Conceptualization) कर देना है और उसमें अपने लाभ या स्वार्थ के तत्वों को सावधानीपूर्वक चुपचाप शामिल कर लेना है। हमें इसकी उपादेयता को इतिहास के उदाहरण से समझना चाहिए और इसकी संभाव्य गत्यात्मकता (Feasible Dynamism) को भी समझना चाहिए।

कुछ लोग सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से दक्षिणपंथ और वामपंथ को भी जोड़ कर यानि दक्षिणपंथ और वामपंथ के संदर्भ में अपनी विद्वता को रेखांकित करने का प्रयास करते हैं। लेकिन दक्षिणपंथ और वामपंथ में कोई विभाजन रेखा नहीं होती है, सिवाय इसके 'क्रियान्वयन की गति' में अन्तर के। दोनों ही पंथों का अंतिम लक्ष्य मानवता की समृद्धि और सम्यक विकास बताया जाता है। दरअसल दक्षिणपंथ और वामपंथ की अवधारणा फ्रांस की क्रांति के बाद वहां के विधायी सदन में बैठने वाले विधायक समूह के स्थल दिशा की सापेक्षता से उपजा था। अध्यक्ष के आसन के बाएं हाथ की ओर जो विधायक समूह बैठ रहे थे, वे क्रांतिकारी बदलाव के समर्थक थे और इसलिए ये वामपंथी हुए| शेष अन्य सामान्य सदस्य कार्यक्रमों और योजनाओं को क्रियान्वित करने  में उतावलापन के पक्ष में नहीं थे, दक्षिणपंथी हुए। क्रांतिकारी बदलाव कुछ और अलग नहीं होता है, सिवाय क्रियान्वयन की गति की तीव्रता के। क्रांति का अर्थ होता है, बहुत कम समय में बहुत अधिक परिवर्तन, यानि बदलाव की तेज़ गति। इस बदलाव की गति को प्रभावित करने वाले कारकों में उनकी सहभागिता, तरीके, या नजरिया में अन्तर हो सकता है।

यदि हम राष्ट्र की अवधारणा और संस्कृति की अवधारणा को समुचित ढंग से नहीं समझा है, तो “सांस्कृतिक राष्ट्रवाद” को भी समुचित ढंग से नहीं समझ पाएंगे। इसीलिए सबसे पहले सरल, साधारण और सहज तरीके से इन अवधारणाओं को समझ लेते हैं। राष्ट्र की अवधारणा समझने के लिए जोसेफ स्टालिन के द्वारा दिया गया अवधारणा या परिभाषा ही पर्याप्त है, जो सरल भी है, सहज भी है, आधुनिक भी है और वैज्ञानिक भी है। "मार्क्सवाद और राष्ट्रीय प्रश्न' (पुस्तक) में जोसेफ स्टालिन ने राष्ट्र को एक ऐतिहासिक एकापन का स्थिर समुदाय बताया है, जिसका एक सामान्य चरित्र होता है। स्पष्ट है कि एक राष्ट्र किसी निश्चित भौगोलिक क्षेत्र में आर्थिक जीवन और मनोवैज्ञानिक संरचना में एक स्थिर समुदाय है, और अपने ऐतिहासिक एकापन (भले ही काल्पनिक हो) को मानता है।

भारत के संदर्भ में राष्ट्र की भौगोलिक स्थिति एवं संरचना विशिष्ट है तथा अन्य से अलग भी है। उत्तर में हिमालय एवं संबंधित पर्वत श्रेणियां और दक्षिण में सागर से घिरा प्रायद्वीप, इसे शेष विश्व से अलग पहचान देती है। इसकी उष्णकटिबंधीय एवं मानसूनी जलवायु भी सम्पूर्ण भारतीय जीवन को एक सामूहिक लय और प्रतिबद्धता भी देती है। भारत की सभी मुख्य भाषाओं का उद्विकास भी प्राकृत और पालि से हुई है, और इसकी ही संस्कारित स्वरुप संस्कृत (संस्कृत का अर्थ ही संस्कारित हुआ) आज़ भी भारत के व्यापक क्षेत्र में मौजूद है। इस तरह इनमें भाषाई एक्य भी है। भारत की बौद्धिक विकास और बौद्धिक संपदा के ऐतिहासिक अस्तित्व के कारण ही यह भौगोलिक क्षेत्र 'आभा रत' (आभा से रत, इससे 'आ' विलुप्त हो गया और शेष "भा रत" रह गया) मानी जाती रही है। ये सब भारतीय राष्ट्र के मौलिक तत्व हैं, जो भारत को एक राष्ट्र निर्माण के लिए ऐतिहासिक एकापन स्थापित कर प्रेरित करता रहा है। और इसी राष्ट्र को सशक्त, समृद्ध, विकसित और अग्रणी बनाने के लिए आवश्यक संबंधित विचारधारा को ही राष्ट्रवाद कहते हैं। राष्ट्रवाद और राष्ट्र एक "कल्पित वास्तविकता" (Imaginary Realties) है, जो मानसिक दृष्टि से काल्पनिक होते हुए भी वास्तविकताओं का निर्माण करता है। यह भावनात्मक रूप से उन लोगों में अपनत्व पैदा कर देता है, जो कभी मिले भी नहीं हो। इस तरह राष्ट्रवाद एक गौरवशाली और आदर्श प्रेरणा बन जाता है।

अब हमें संस्कृति को भी समझ लेना चाहिए कि यह इतना महत्वपूर्ण और प्रेरक क्यों होता है? यदि किसी समाज की संस्कृति उस समाज में व्याप्त ऐतिहासिक गहराईयों की भावनाओं , विचारों, व्यवहारों और कार्यों की समेकित एवं संचित अभिव्यक्ति होती है, या ऐसा मानी जाती है, तो संस्कृति ही उस समाज को चेतन एवं अचेतन स्तर से संचालित, नियंत्रित, और नियमित करता रहता है। किसी भी समाज की संस्कृति उसके अबतक के इतिहास की समझ का समेकित परिणाम होता है। इसे दूसरे शब्दों में कहा जाए, तो यह उस समाज का ऐतिहासिक बोध होता है, जिसे वह समझता है। इसे आप "इतिहास बोध" (Perception of History) की उपज भी कह सकते हैं। संस्कृति के अनुरूप व्यवहार, विचार और भावना को व्यक्त करना या अभिव्यक्त करना ही संस्कार माना जाता है। लेकिन जब किसी का इतिहास बोध ही उसके संस्कृति को निर्देशित और नियमित करता है, तो हम इतिहास को नियंत्रित या बदल कर उसके सांस्कृतिक बोध को ही नियंत्रित कर सकते हैं। इस तरह संस्कृति भी बदल जाता है। वैसे इतिहास इतिहासकार की आवश्यकता के अनुसार सदैव बदलता रहता है और इसलिए सांस्कृतिक अवबोध को भी बदल जाना पड़ता है। इस तरह संस्कृति के उद्भव को समझा जा सकता है, लेकिन इसकी क्रियाविधि और उपयोगिता को भी समझना जरूरी है।

स्पष्ट है कि संस्कृति समाज जनित समाज का मानसिक पर्यावरण है, जो समाज के साफ्टवेयर की तरह अदृश्य क्रियाविधि द्वारा समाज को संचालित, नियंत्रित, नियमित  और शासित करता रहता है। इस तरह संस्कृति हमारे जीवन को, हमारी अभिवृति को, हमारे विचार करने की बौद्धिकता को, और हमारी प्रतिबद्धता को संचालित करने की हमारी अन्त:स्थ प्रकृति है। संस्कृति की भौतकीय अभिव्यक्ति ही कला कहलाती है, जो विभिन्न स्वरूपों और अवस्थाओं में अवलोकित किया जाता है। अतः संस्कृति किसी भी समाज को एक ऐतिहासिक विरासत के रूप में प्राप्त होता है। इसीलिए किसी भी समाज की संस्कृति उसकी भौगोलिक परिस्थितियों के सापेक्ष होती है, उसकी बौद्धिक संपदा एवं स्तर के अनुरूप होती है, उसकी वैज्ञानिकता और आधुनिकता की स्थिति के अनुसार विशिष्ट होती है| और संस्कृति इन्हीं बदलते परिप्रेक्ष्य के अनुकूलन के अनुरूप संशोधित एवं सम्वर्धित भी होती रहती है। इस तरह संस्कृति अपनी परिस्थितियों और अभिव्यक्ति के कारकों के बदलने से बदलती भी रहती है।

एक राष्ट्र भी अपनी संस्कृति को विरासत को रुप में देखता है, और इसलिए किसी देश की सांस्कृतिक विन्यास और स्वरुप उस देश की राष्ट्रीय विरासत माना जाता है। इस संस्कृति में उस राष्ट्र को अब तक प्राप्त, विकसित एवं सम्वर्धित सभी सांस्कृतिक सामाजिक पक्ष एवं स्वरूप समाहित हो जाता है। संस्कृति के संचयी प्रवृत्ति के होने के बावजूद इसमें गत्यात्मकता होती है और इसीलिए संस्कृति हमेशा नवाचारी बनी रहती है। अर्थात संस्कृति अपनी जड़ों के वजूद को स्थिर रखते हुए भी बदलते पारितंत्र के अनुकूल अनुकूलित होकर लहराती रहती है, और वही संस्कृति जीवन्त भी रहती है। मतलब आप किसी संस्कृति को जड़, यानि अचल,  यानि गतिहीन नहीं रख सकते। गत्यात्मकता और अनुकूलनशीलता संस्कृति की मौलिक प्रकृति और प्रवृत्ति होती है। इस तरह संस्कृति एक बहती जलधारा है, ठहरे हुए जल में तो सड़ांध पैदा हो जाता है। इसीलिए संस्कृति को सम्वर्धित, संशोधित और विकसित होते भी रहना चाहिए।

वैसे यह स्पष्ट है कि राष्ट्रवाद का सबसे मजबूत आधार, या एकमात्र आधार संस्कृति ही होता है, लेकिन राष्ट्रवाद में  विशेषण 'सांस्कृतिक' लगा देने मात्र से इसका भावनात्मक अर्थ बदल जाता है। अब आप राष्ट्र और राष्ट्रवाद को परिभाषित करने में संस्कृति पर ही केन्द्रित रह सकते हैं। राष्ट्रवाद वैसे ही मध्यम वर्गीय लोगों के लिए आकर्षक और लुभावना अवधारणा है, और इसमें सांस्कृतिक विशेषण लगा देने से इसका महत्व और बढ़ जाता है। तब हमें सिर्फ अपने आवश्यक संस्कृति को पुरातन और ऐतिहासिक साबित करना होता है। कोई भी वर्तमान संस्कृति यथास्थितिवादी होता है, क्योंकि संस्कृति में एक जबरदस्त आवेग (Momentum) होता है, जिसे हम सांस्कृतिक आवेग (Cultural Momentum) भी कह सकते हैं। यानि कोई समाज सांस्कृतिक जड़ता (Cultural Inertia) में जड़ (Fix) होता है। तब वर्तमान संस्कृति को पुरातन और ऐतिहासिक के साथ साथ सनातन यानि इसकी निरन्तरता साबित करना होता है। इसी आधार पर कोई संस्कृति गौरवशाली होता है, या हो जाता है और इसीलिए ऐसी संस्कृति सभी के लिए अनुकरणीय भी हो जाता है। तब इस संस्कृति का अनुकरण करना ही संस्कार होता है, या हो जाता है। यदि यह संस्कृति राष्ट्रीय साबित किया गया है, या राष्ट्रीय स्वरूप में प्रदर्शित किया गया है, तो उसका अनुसरण नहीं करना राष्ट्रवाद का और राष्ट्र का विरोध समझा जाएगा।

इसीलिए प्रचलित संस्कृति के कुछ लाभार्थी समूह ने अपनी सामंती संस्कृति को ही प्राचीनतम एवं सनातन साबित करने के लिए पुराने ग्रंथों को ही पुनर्व्याख्यायित कर दिया है, अपने लाभों के अनुरूप सम्पादित कर दिया है, भाषा भी बदल दिया है और उन प्राचीन मूल ग्रंथों को नष्ट भी कर दिया है। ध्यान रहे कि सभी सामंती संस्कृति की उत्पत्ति ही मध्य काल में हुआ, भले ही कोई प्राचीनता का दावा बिना पुरातात्विक आधार के ही करता रहे। मतलब यह है कि बहुत से प्राचीनतम संस्कृति का दावा करने वाली संस्कृति, यदि असमानतावादी है तो, निश्चिंतया वह मध्य युगीन उत्पन्न है। प्राचीनतम संस्कृति का "प्राथमिक प्रामाणिक साक्ष्य" यदि उपलब्ध नहीं है, तो वह संस्कृति मध्य युगीन उत्पन्न है, चाहे कोई कैसा भी दावा करें। लगभग सभी साहित्यिक साक्ष्य' प्राथमिक प्रामाणिक साक्ष्य' नहीं है। ये साहित्यिक साक्ष्य 'द्वितीयक प्रामाणिक साक्ष्य' भी नहीं है, क्योंकि वे किसी पुरातात्विक या ऐतिहासिक साक्ष्यों पर आधारित नहीं होकर मात्र मिथकीय कहानियां ही है।

इसीलिए किसी राष्ट्रीय संस्कृति को किसी अन्य नाम ( इतिहास के नवबोल संरचना – New Speak Structure of History के अनुसार) की संस्कृति का पर्याय बना दिया जाता है और फिर उस काल्पनिक संस्कृति को ही राष्ट्रीय संस्कृति बता दिया जाता है, या साबित कर दिया जाता है। फिर इस काल्पनिक संस्कृति का ही गुणगान ऐतिहासिक, पुरातन और सनातन के रूप में किया जाता है। इस तरह एक काल्पनिक संस्कृति को ही स्थापित कर दिया जाता है और यह काल्पनिक संस्कृति ही राष्ट्रवादी साबित हो जाती है। ऐसी स्थिति में अब इस काल्पनिक संस्कृति में कोई भी संशोधन या विमर्श या कोई प्रश्न करना भी ऐतिहासिक सांस्कृतिक राष्ट्रवाद पर सवाल खड़ा करना मान लिया जाएगा, या मान लिया जाता है।

यहां काल्पनिक संस्कृति कहना भी एक आपत्तिजनक हरकत मान लिया जा सकता है, लेकिन यदि आप इस तथाकथित ऐतिहासिक संस्कृति की ऐतिहासिकता और पुरातनता के समर्थन में कोई समकालीन पुरातात्विक साक्ष्य खोजना चाहेंगे, तो आपको मनोवैज्ञानिक साक्ष्य के अलावा कोई तार्किक एवं सुनिश्चित साक्ष्य नहीं मिलेंगे। यदि आप इसके समर्थन में कोई साहित्यिक साक्ष्य को देखना चाहेंगे, तो आपको उस काल का कोई समकालीन साहित्यिक साक्ष्य नहीं मिलेंगे, और कोई समकालीन उपलब्ध विदेशी साहित्य में भी उदाहरण या प्रसंग नहीं मिलेंगे। इन तथाकथित ऐतिहासिक विरासत की संस्कृति के समर्थन में जो भी साहित्यिक साक्ष्य मिलेंगे, वे सभी मध्ययुगीन सम्पादित या रचित साहित्य ही होंगे। इसका सबसे प्रमुख प्रमाण उनका मात्र कागजों पर ही मिलना है, जो निश्चितया कागज़ के आविष्कार होने और उस क्षेत्र में आयातित होने और उसके प्रचलित होने के बाद के समय का ही हो सकता है, उसके पहले के समय का नहीं।

जब आप किसी मिथकीय कहानियों को सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से जोड़ देते हैं, वे मिथकीय कहानियां भी संस्कृति की तरह पुरातन एवं सनातन हो जाती है और ये मिथकीय कहानियां हमारी विरासत भी हो जाती है। जब इन मिथकीय कहानियों के पात्र आदमी ही है, यानि होमो सेपियंस सेपियंस ही है, तो स्पष्ट है ऐसी कहानियां होमो सेपियंस की उत्पत्ति के बाद के ही होने चाहिए। अन्यथा इसकी उत्पत्ति के पूर्व की ऐसी कहानियां वास्तविक हो ही नहीं सकती, यानि ऐतिहासिक मानी ही नहीं जा सकती है। जो जीवन वृत्त यानि जो कहानियां किसी व्यक्ति पर आधारित है और वह वास्तविक मानी जाती है, तो उन कहानियों को किसी भी इतिहास की पुस्तकों में दर्ज होना चाहिए, अन्यथा वे मात्र कोरी कहानियां ही है। ध्यान रहे कि आधुनिक मानवों का अस्तित्व ही, मानववैज्ञानिकों के अनुसार, कोई एक लाख वर्ष पूर्व ही आया है, उसके पहले की किसी भी ‘संस्कृति का इतिहास’ ‘इतिहास की पुस्तकों’ में दर्ज नहीं है|

राष्ट्रवाद का दुरुपयोग भी किया जा सकता है, या किया जाता है। इसीलिए राष्ट्रवाद के विवादास्पद स्थिति के कारण प्रत्येक देश/ राष्ट्र को मानवतावादी दृष्टिकोण की ओर बढ़ना चाहिए। राष्ट्रवाद एक हथौड़े की तरह एक उपकरण है, जिसका उपयोग निर्माण में भी किया जा सकता है और किसी विध्वंस में भी किया जा सकता है। मानवतावाद सदैव सृजनात्मक ही होगा। अब तो आधुनिकीकरण भी राष्ट्रवाद को उसकी पहचान से वंचित कर रहा है। राष्ट्रवाद का दायरा सबसे विशाल होता है, जो जाति, प्रजाति, धर्म, भाषा, आदि से भी ऊपर होता है, लेकिन इससे उपर मानवतावाद है, जिसके उपर और कोई वाद नहीं हो सकता है। प्रकृतिवाद या भविष्यवाद का भी केन्द्रीय विंदु भी मानव ही है, कोई जाति, प्रजाति, धर्म, क्षेत्र या भाषा नहीं हो सकता है। यदि वैश्वीकरण की प्रक्रिया राष्ट्रवाद को जबरदस्त चुनौती दे रही है, तो राष्ट्रवाद का इस युग में उपयोग और प्रयोग करना एक प्रतिगामी क़दम कहा जाएगा। कुछ व्यक्तिगत (सीमित छोटे समुदाय सहित) स्वार्थों के लिए राष्ट्रवाद का उत्साहवर्धक समर्थन देना भी उस समाज या राष्ट्र के समुचित विकास के लिए घातक हो सकता है।

जब आप संस्कृतिवाद और राष्ट्रवाद की जबरदस्त शक्तियों को समझ गए, तो आप संस्कृतिवाद और राष्ट्रवाद के मूल और मौलिक तत्वों की ओर नजर घुमाइए, इनकी क्रियाविधि को समझिए। फिर "इतिहास की नवबोल संरचना" (New Speak Structure of History) को समझते हुए अपनी सुविधानुसार अपने अवधारणाओं और परिभाषाओं को इस संस्कृतिवाद और राष्ट्रवाद की स्थापित अवधारणाओं और परिभाषाओं के अनुरूप व्याख्यापित कर प्रतिस्थापित कर दीजीए। आप निश्चिंत रहिए, कि सामान्य जनता या डिग्रीधारी तथाकथित बौद्धिक लोग आपके इस बारीक बौद्धिक विस्थापन या प्रतिस्थापन को नहीं समझ पाएंगे| सतहों पर फिसलने वाले इन लोगों को गहराईयों में उतरना नहीं आता है। और आप सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की जबरदस्त शक्तियों का सफल उपयोग या प्रयोग (या दुरूपयोग) करते रहिए।

आप इस आलेख को अच्छी तरह से समझने के लिए अंतिम पारा को स्थिर होकर अवलोकन करें और फिर इसके मनन मंथन के बाद ही किसी निष्कर्ष पर पहुंचे।

आचार्य निरंजन सिन्हा

 

बुधवार, 10 जनवरी 2024

गुणवत्तापूर्ण शिक्षा क्या है और क्यों जरुरी है?

गुणवत्तापूर्ण शिक्षा को समझने के लिए कुछ अवधारणाओं को समझने की आवश्यकता है - “आलोचनात्मक चिंतन” (Critical Thinking), “वैज्ञानिक मानसिकता” (Scientific Temper) और “दायरे से बाहर चिंतन” (Out-of-Box Thinking)। 

नयी शिक्षा नीति 2020 के दर्शन का एक प्रमुख बिंदु ही “आलोचनात्मक चिंतन” (Critical Thinking) विकसित करना है| इसके ही साथ “वैज्ञानिक मानसिकता” (Scientific Temper) और “दायरे से बाहर चिंतन” (Out-of-Box Thinking) भी शामिल है| ये सभी बातें अन्य बातों के अतिरिक्त नयी शिक्षा नीति 2020 के उद्देश्य-भूमिका (Preamble) में वर्णित है, लेकिन यही तीन सबसे प्रमुख है| हालाँकि अंग्रेजी और हिंदी भाषा में प्रयुक्त इन शब्दों में अंतर भी है, इसीलिए अंग्रेजी को ही मानक मान कर आगे बढ़ा गया है| ‘आलोचनात्मक चिंतन’, ‘वैज्ञानिक मानसिकता’ एवं ‘दायरे से बाहर चिंतन’ में एक स्पष्ट सम्बन्ध है और इसीलिए तीनों अलग अलग है, लेकिन यह तीनों महत्वपूर्ण अवधारणा है| ‘वैज्ञानिक मानसिकता’ को ‘वैज्ञानिकवाद’ (Scientism) भी कहते हैं, और ये दोनों एक दुसरे के पर्याय है| ‘दायरे से बाहर चिंतन’ को ही थामस सैम्युल कुहन ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “The Structure of Scientific Revolution” में “पैरेड़ाईम शिफ्ट” (Paradigm Shift) कहा है|

सभी स्तरीय परीक्षाओं में, जिसमे राज्य एवं केंद्र स्तरीय आयोग द्वारा संचालित परीक्षाएँ भी शामिल है, आलोचनात्मक चिंतन की आवश्यकता परीक्षाओं के सभी स्तर यथा प्रारंभिक, लिखित एवं साक्षात्कार पर होती है| अब रटे रटाए अधिगम (Rote Learning) यानि ‘प्रश्न के उत्तर’ रट लेने का जमाना गुजर गया, जबतक ‘आलोचनात्मक चिंतन’ की विशिष्ठ समझ नीति निर्धारकों को नहीं थी| आपने भी सुना होगा कि परीक्षक अभ्यर्थियों के उत्तर पुस्तिका को “देखता” है, अर्थात उसे “पढता” नहीं है| अर्थात परीक्षक अभ्यर्थियों के उत्तर पुस्तिकाओं को सरसरी निगाहों से तेजी देखता जाता है कि सब कुछ रटा रटाया हुआ ही है, या कुछ मौलिक और भिन्न भी है? अपनी उत्तर पुस्तिकाओं को परीक्षक से पढवा लेना अभ्यर्थियों का काम होता है, जो उसकी मौलिकता से ही आती है| यदि अभ्यर्थी अपने विशिष्ट मौलिक प्रस्तुति से परीक्षक को अपनी उत्तर पुस्तिकाओं में उत्तरों को पढने के लिए बाध्य कर देता है, तो परीक्षक बहुत खुश होकर पर्याप्त अच्छा अंक देता है| लेकिन यह विशिष्ट उत्तर यानि सामान्य से अलग मौलिक उत्तर अभ्यर्थियों के आलोचनात्मक चिंतन से ही आता है, अन्य दूसरा कोई विकल्प नहीं है| इस आलोचनात्मक चिंतन से सम्बन्धित प्रत्यक्ष प्रश्न साक्षात्कार (Interview) और लिखित परीक्षाओं में भी आने लगे हैं| इसीलिए यदि कोई विद्यार्थी अपने किसी भी परीक्षा में जबरदस्त सफलता चाहता है, तो उसे अवश्य ही आलोचनात्मक चिंतन विकसित करना चाहिए|

परीक्षा या परीक्षाएँ प्रत्येक व्यक्ति के जीवन के हर क्षेत्र में, हर मोड़ पर और हर समय होता रहता है| आलोचनात्मक चिंतन, वैज्ञानिक मानसिकता और विचारों में पैरेडाईम शिफ्ट करने वाले ही विश्व पर शासन करते हैं| आज विश्व के सभी विकसित देशों की संस्कृति में ही आलोचनात्मक चिंतन, वैज्ञानिकता और विचारों में पैरेडाईम शिफ्ट की प्रवृति यानि मानसिकता व्याप्त है| कोई भी विकसित देश सांस्कृतिक विरासत के नाम पर इसे आलोचनात्मक चिंतन, वैज्ञानिकता और विचारों में पैरेडाईम शिफ्ट की प्रवृति यानि मानसिकता को अवरोधित नहीं करता है| इसीलिए मात्र पांच या सात करोड़ की आबादी वाले देशों (जर्मनी, ब्रिटेन, फ़्रांस, इटली) से स्तर ऊपर उठने की मशक्कत में एक सौ पचास करोड़ वाला भारत देश लगा हुआ है, लेकिन इसकी सफलता आलोचनात्मक चिंतन, वैज्ञानिक मानसिकता और विचारों में पैरेडाईम शिफ्ट से ही प्राप्त कर सकता है| जीवन के किसी भी क्षेत्र में विशिष्ट पहचान के साथ अग्रणी रहने के लिए ही आलोचनात्मक चिंतन, वैज्ञानिक मानसिकता और विचारों में पैरेडाईम शिफ्ट की जरुरत है| इन्हीं गुणों से युक्त देश या संस्कृति यानि आलोचनात्मक चिंतन, वैज्ञानिकता और विचारों में पैरेडाईम शिफ्ट में अग्रणी देश या संस्कृति ही विश्व पर वास्तविक शासन कर रहे हैं|  आज सभी राष्ट्रों के शासनाध्यक्ष या शासन (Head of the Government) प्रमुख आज अपने देशों में मात्र “शासन प्रबंधक” (Manager for State –Affair) ही बन कर रह गए हैं, भले आप किसी संप्रभुता के भ्रम में हैं| जहाँ तक संप्रभुता की बात है, कोई इसे सामान्य शारीरिक आँखों से ही देख पाता है, और कोई मानसिक दृष्टि से देखता है| लेकिन मानसिक दृष्टि के लिए ही आलोचनात्मक चिंतन, वैज्ञानिक मानसिकता और विचारों में पैरेडाईम शिफ्ट की आवश्यकता होती है| इसीलिए आलोचनात्मक चिंतन, वैज्ञानिक मानसिकता और विचारों में पैरेडाईम शिफ्ट को विकसित करना जरुरी है|

आलोचनात्मक चिंतन का सीधा और साधारण अर्थ होता है किसी भी चीज यानि किसी भी विषय/ प्रसंग को समुचित ढंग से समझना| मतलब किसी भी चीज यानि किसी भी विषय/ प्रसंग को समुचित ढंग से नहीं समझ कर, मात्र किसी अंधभक्त की तरह, यानि किसी आस्थावान की तरह, यानि किसी झुण्ड के भेड़ की तरह पीछे पीछे नहीं चलना होता है| बल्कि किसी भी चीज को अपनी बुद्धि, तर्क एवं विवेक से उसे सही एवं पर्याप्त तरीके से समझना और निर्णय लेना हैइसीलिए बड़ी बड़ी कंपनियों, संस्थानों एवं सरकारी उच्च पदस्थ स्थानों पर ऐसे ही गुणवत्ता के व्यक्ति चयनित किये जाते हैं|

आप आलोचनात्मक चिन्तन यानि क्रिटिकल थिंकिंग को अच्छी तरह समझने के लिए अंग्रेजी के पाँचों Vovel (स्वर) – ‘A’, ‘E’, ‘I’, ‘O’, एवं ‘U’ को क्रमानुसार याद रखें| इससे आप इसकी अवधारणा (Concept) और इसकी क्रियाप्रणाली (Methodology) को कभी भी नहीं भूलेंगे| इन पाँचो Vovel (स्वर) – A, E, I, O, एवं U को पाँच क्रिया (Verbs) – ‘Analyse’, ‘Examine’, ‘Inquire’, ‘Open/ Organiseएवं ‘Unite’ के रूप में ही क्रमानुसार याद रखें| किसी भी शब्द, या वाक्य, या प्रसंग, या सन्दर्भ, या अन्य कोई भी बात को इसी क्रम में जांचे और कसे, आपको सब कुछ स्वत: स्पष्ट होता जायगा|

1.      किसी चीज को विश्लेषित करने का अर्थ हुआ, कि उसको उसके मूलभूत तत्वों में ऐसा खंडित करना, कि उसकी वास्तविक प्रकृति का निर्धारण हो सके एवं उनके बीच के निश्चित संबंधों को जाना सके| जैसे आप किसी विषय पर कोई निबन्ध लिखते है, या किसी विषय को अपने सन्दर्भ में चुनते हैं, तो सर्वप्रथम उनमे प्रयुक्त शब्दों का अवधारणात्मक अर्थ (Conceptual Meaning) समझना ही विश्लेषण करना है|

2.      Examine : फिर उपर्युक्त विश्लेषण से प्राप्त सामग्री का परिक्षण/ जांच करना होता है| इसका अर्थ हुआ, कि उस विश्लेषण से प्राप्त उसके मूलभूत तत्वों (अवधारणाओं) और उसके विभिन्न संबंधों और प्रसंगों को विभिन्न संभावित सन्दर्भों में जांच पड़ताल करना होता है| विश्लेषण से प्राप्त निष्कर्षों को विभिन्न आयामों में, जैसे उद्विकास, मनोविज्ञान, संस्कृति, विज्ञान, समय, क्षेत्र, भाषा आदि के सन्दर्भ में उसे जांचना ही Examine करना होता है|

3.      Inquire : तब उपरोक्त दोनों प्रक्रियाओं से प्राप्त निष्कर्ष पर प्रश्न करना होता है| अर्थात उपरोक्त दोनों प्रक्रियाओं से प्राप्त निष्कर्ष के सम्बन्ध में विविध पक्षों एवं दृष्टिकोणों से प्रश्न खड़ा कर और विवेकपूर्ण ढंग से किसी समुचित निष्कर्ष तक पहुँचना होता है, जो सत्य के करीब होता हुआ होता हैइस सदी के महान वैज्ञानिक स्टीफन हाकिन्स का मानना है कि अध्ययन (समझने) का बेहतर तरीका ‘प्रश्न खड़ा करना’ होता है| बुद्ध भी किसी को समझाने के क्रम में सामने वाले पर उसी के बताए गए उत्तर पर ही प्रश्न खड़ा कर देते थे, और अन्त में उसको समुचित उत्तर मिल जाता था| अपने निष्कर्षों पर स्वयं ही प्रश्न करना भी आलोचनात्मक चिंतन का एक महत्वपूर्ण चरण होता है|

4.      Open : इसके बाद खोलना/ व्यापक बनाना आता है, जिसका अर्थ हुआ कि इसे किसी बंद, यानि किसी संकीर्ण अर्थ, यानि किसी परिधि से बाहर करना, ताकि इसका व्यापक सन्दर्भ में अर्थ निकाला और समझा जा सके| इस चरण में अब तक प्राप्त निष्कर्ष का सर्व व्यापीकरण (Generalisation) करना होता है, जिसे सभी परिस्थति, समय एवं सन्दर्भ में उपयोग/ प्रयोग किया जा सके| इसे दुसरे शब्दों में, सैद्धान्तिकरण (Theorisation) भी कह सकते है, जिसमे प्राप्त निष्कर्ष को एक सिद्धांत (Theory) का रूप दिया जाता है|  

5.      Unite : सबसे अन्त में एकीकरण करना हुआ, जिसका कई अर्थ होते हैं, जैसे उपरोक्त सभी प्रक्रियाओं एवं तथ्यों को एकत्रित करना, या समाहित करना (Integrate), या व्यवस्थित करना, या एकीकरण करना, या समाज, राष्ट्र और मानवता के सन्दर्भ में एक इकाई के रूप में लाना होता है| 

इस तरह क्रिटिकल थिंकिंग’ (Critical Thinking) का अर्थ हुआ कि सम्बन्धित विषय का एक व्यापक, समेकित, समुचित, सार्थक, तार्किक, वैज्ञानिक एवं विवेकपूर्ण निष्कर्ष पर आना, जिसे सभी विचारवानों को जानना एवं समझना चाहिए|

अब सामान्य जन यह जानना चाहेंगे कि किसी भी विषय को “विश्लेषित करने” (Analyse) के बाद इसे किस सन्दर्भ, या प्रसंग, या पृष्ठभूमि में ‘जाचेंगे, यानि ‘परीक्षित’ करेंगे, यानि ‘प्रश्न खड़ा’ करेंगे? इसके लिए आपको चार्ल्स डार्विन का विकासवाद’ (Theory of Evolution)कार्ल मार्क्स का आर्थिकवाद (Theory of Economic Forces)’सिगमण्ड फ्रायड का आत्मवाद’ (Theory of Self)अल्बर्ट आइन्स्टीन का सापेक्षवाद’ (Theory of Relativity), और फर्डिनांड डी सौसुरे का संरचनावाद’ (Theory of Structure/ Structuralism) को समझना चाहिएकिसी को भी यदि ‘क्रिटिकल थिंकिंग’ को अपेक्षित ढंग से और वैज्ञानिक तरीके से विकसित करना है, तो उसे  यह सब समझना ही होगा| तब वह व्यक्ति Critical Thinking”  में पारंगत हो जायगा| तब वह किसी भी क्षेत्र में उचाईयों को छुएगा|

चार्ल्स डार्विन का विकासवाद’ (Theory of Evolution) समझाता है कि ब्रह्मांड में सब कुछ सरलतम (Simpler) स्तर से या स्वरुप से जटिलतर (Complexer) अवस्था में विकसित हुआ है और इसलिए किसी भी कृतत्व (Creation) में दैवीय शक्ति (Divine Power) का योगदान नहीं है। इस तरह इनके द्वारा पर्याप्त साक्ष्य के साथ ईश्वर (God) और ईश्वरीय व्यवस्था के अस्तित्व का खंडन हुआ, जो आलोचनात्मक चिंतन में एक क्रांतिकारी कदम है। अब विकासवादी सिद्धांत कई क्षेत्रों में व्यापक स्वरूप में प्रयुक्त होता है, जो कई परम्परागत अवैज्ञानिक अवधारणाओं को ध्वस्त करता है।

कार्ल मार्क्स के आर्थिकवाद (Theory of Economic Forces)’ के अनुसार सामाजिक स्थायी  बदलाव यानि सामाजिक रुपांतरण (Social Transformation) का आधार आर्थिक्वाद है| इसीलिए इतिहास की वैज्ञानिक और समुचित व्याख्या आर्थिक शक्तियों के साधन और उनके अन्तर्सम्बन्धों के आधार पर ही, यानि उत्पादन, वितरण, विनिमय एवं उपभोग  के साधनों और शक्तियों के आधार पर ही किया जाना समुचित और वैज्ञानिक है। यह वैज्ञानिक व्याख्या की क्रियाविधि (Methodology) कई बनावटी मिथकों को इतिहास से बाहर कर देता है।

सिगमण्ड फ्रायड का आत्मवाद’ (Theory of Self) बताता है कि किसी भी आदमी की मनोदशा यानि उसकी भावना, विचार एवं व्यवहार उसके आत्म (Self, आत्मा नहीं) के इड (Id), इगो (Ego) और सुपर इगो (Super Ego) के मध्य एक समुचित संतुलन से निर्धारित होता है।  'इड' किसी की पाशविक अभिवृत्तियों को अभिव्यक्त करता है, और 'सुपर इगो' समाज के उच्चतर आदर्श, मूल्य एवं प्रतिमान को अभिव्यक्त करता है। और आदमी इन इड एवं सुपर इगो के बीच अपनी सांस्कृतिक जड़ता, पृष्ठभूमि, अनुभव, ज्ञान, परिस्थिति, दबाव, व्यवस्था आदि के अनुसार अपने को संतुलित करता है और तदनुसार व्यवहार करता है। आलोचनात्मक चिंतन में भी इसकी भूमिका ध्यान देने योग्य है|

अल्बर्ट आइन्स्टीन के सापेक्षवाद’ (Theory of Relativity)  के अनुसार ब्रह्मांड में सब कुछ की स्थिति किसी विशेष के सापेक्ष (Relative) ही निर्धारित की जा सकती है। इसके अनुसार किसी भी चीज की अवस्था (Stage), गति (Motion), समय (Time), उर्जा, पदार्थ, आकाश (Space), बल (Force) आदि किसी के सापेक्ष ही निश्चित और निर्धारित किया जा सकता है। अर्थात किसी भी वस्तु या विषय या विचार का अर्थ उसके संदर्भ (Reference), पृष्ठभूमि (Background), समय, प्रस्थिति (Status), क्षेत्र (Region) आदि की सापेक्षता के अनुसार बदलता है। यह बहुत कुछ नवाचारी (Innovative) दृष्टिकोण देता है।

फर्डिनांड डी सौसुरे का संरचनावाद’ (Theory of Structure/ Structuralism) यह समझाता है कि शब्दों, वाक्यों, प्रसंगों का सिर्फ  वही अर्थ नही होते हैं, जो साधारण रूप में दिखाई देता है, बल्कि उनके वास्तविक अर्थ उसकी संरचना (Structure) में निहित होता है। अर्थात किसी भी शब्द, वाक्य, प्रसंग के सतही (Superficial) अर्थ भी होता है और निहित (Implied) अर्थ भी होता है, जिसे समझ कर ही आप सही निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकते हैं। 

वैज्ञानिक मानसिकता (Scientific Temper) में किसी भी विषय या प्रसंग को तार्किकता (Logicality) और विवेकशीलता (Rationality) के आधार पर देखा और समझा जाता है| तार्किकता का अर्थ होता है किसी भी परिणाम को किसी समुचित कारण का परिणाम मानना, अर्थात हर घटना यानि हर उत्पाद का कोई सुनिश्चित कारण होना ही चाहिए| तार्किकता को ही कार्य –कारण (Cause & Effect/ Causation) सम्बन्ध भी कहते हैं| विवेकशीलता का अर्थ किसी भी विषय या प्रसंग को समाज, मानवता एवं प्रकृति, यानि भविष्य के सन्दर्भ में समझना ही होता है| इसी तार्किकता एवं विवेकशीलता से वस्तुनिष्ठता (Objectivity) आती है, और इसी से कोई विषय या प्रसंग तथ्यपरक (Factual) भी हो जाता है| अर्थात आलोचनात्मक चिंतन के लिए इस वैज्ञानिक मानसिकता की अनिवार्यता होती है| इसे “वैज्ञानिकवाद” (Scientism) भी कहते हैं, जिसका तात्पर्य किसी भी विषय या प्रसंग को वैज्ञानिक नजरिए से देखना समझना होता है|

‘दायरे से बाहर चिंतन’ (Out-of-Box Thinking) को  ही “पैरेड़ाईम शिफ्ट” (Paradigm Shift) भी कहा जाता है| इससे ही ‘नवाचार’ (Innovation) आता है, ‘आविष्कार’ (Invention) होता है, ‘खोज’ (Discovery) किया जाता है, और नए तरीके से आगे छलांग लगाया जाता है| स्पष्ट है कि वैज्ञानिक चिंतन से आलोचनात्मक चिंतन आता है, और आलोचनात्मक चिंतन से ही विचारों में. प्रक्रियाओं (Processess) में, क्रियाविधियों (Mechanism) में ‘पैरेड़ाईम शिफ्ट’ होता है|

अत: जीवन के किसी भी क्षेत्र में, किसी भी समय में, किसी भी परिस्थिति में आगे बढ़ने के लिए ‘वैज्ञानिक मानसिकता’, ‘आलोचनात्मक चिंतन’ एवं ‘दायरे से बाहर चिंतन’ को समुचित ढंग जानना एवं समझना जरुरी है|

आचार्य निरंजन सिन्हा 

रविवार, 7 जनवरी 2024

समाज को दिशा देने में साहित्यकारों की भूमिका

“समाज को दिशा देने में साहित्यकारों की भूमिका” को समुचित ढंग से समझने से पहले हमें ‘समाज’ (Society) को समझना चाहिए कि समाज क्या है, अर्थात समाज से क्या तात्पर्य है? तब हमें साहित्य (Literature) और साहित्यकार (Litterateur / Writer / Author) को समझ लेना चाहिए। जब बात साहित्य की आएगी, तो साहित्य के उद्विकास (Evolution) को भी समझना पड़ेगा। यदि हम इन्हें समझने का प्रयास नहीं करेंगे, तो "समाज को दिशा देने में साहित्यकारों की भूमिका" को आधुनिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से नहीं समझ सकेंगे। इसीलिए सबसे पहले 'समाज', 'साहित्य' और 'दिशा' (Direction) को ही समझते हैं।

‘समाज” ‘सम्बन्धों के जाल’ (Web of Relations) को कहते हैं। यानि ‘समाज’ एक व्यवस्था है, जो ‘आपसी संबंधों’ पर आधारित होता है। ‘समाज’ मात्र एक ‘समूह’ नहीं है, जो सिर्फ कुछ आदमियों का समुच्चय मात्र ही है। इसी तरह ‘समाज’ एक ‘समुदाय’ भी नहीं है, जो किसी संकुचित एवं विशिष्ट उद्देश्य से निर्मित होते हैं। इस तरह ‘समाज’ के कई स्तर हो सकते हैं, जो प्रसंग के संदर्भ में बदलता रहता है। ‘समाज’ को वास्तविक या मान्यता प्राप्त "विस्तारित परिवार" (Extended Family) कह सकते हैं, लेकिन इसे "संयुक्त परिवार" (Joint Family) नहीं कहा जाना चाहिए। संयुक्त परिवार कई अलग-अलग परिवार का समुच्चय हो सकता है, लेकिन विस्तारित परिवार एक ही परिवार का विस्तारित स्वरुप होता है, माना जाता है। भारतीय समाज में विस्तारित परिवार का ही स्वरूप मिलता है और संयुक्त परिवार का अस्तित्व भारत में परम्परागत रूप में नहीं है।

'साहित्य' में 'समाज का हित' (स माज + हित + इत्यादि) अन्तर्निहित होता है, और इसीलिए जब कोई भाषा अपने वाचिक या लिखित स्वरुप में ‘समाज के हित’ में अभिव्यक्त होता है, ‘साहित्य’ कहलाता है। जब भाषा संवाद करने का माध्यम बनी और जब भारत में यह प्राकृतिक अवस्था मे थी, प्राकृत भाषा कहलाया। जब प्राकृत भाषा व्याकरण के साथ व्यवस्थित एवं व्यापक क्षेत्र में प्रचलित हो गयी, तो यह समाज और शासन व्यवस्था की पालक भाषा हो गई, तो यह पालि भाषा और साहित्य बन गई। मध्य काल यानि सामंतवाद के काल में यह पालि भाषा और साहित्य संस्कारित होकर, यानि सुसंस्कृत होकर और परिमार्जित एवं परिवर्धित होकर संस्कृत भाषा और साहित्य हो गई। भारत में भाषा और साहित्य के उद्विकास का यही तार्किक, तथ्यात्मक, वैज्ञानिक एवं आधुनिक व्याख्या है। 

अतः भाषा संवाद का माध्यम हुआ और साहित्य सामाजिक सांस्कृतिक उपलब्धियों की तैयार की गई संचित निधि हो गई। इस तरह ‘साहित्य’ की रचना करने वाले ‘साहित्यकार’ (Litterateur) हुए। जब वह साहित्य की रचना करने वाला कुछ भी लिखता है, तो वह "लिखने वाला" अर्थात ‘लेखक’ कहलाया, जिसे अंग्रेजी में ‘Writer कहते हैं। और जब उसका लेखन अधिकारिक तौर पर ‘प्रामाणिक’ (Authentic)  होता है, तो वह Author कहलाता है। तो हमें समाज के हित में वाचिक और लिखित सामग्री सृजित करने वालों की क्रियाविधि और उसके प्रभाव को समझना है। हमें समाज की ऐसी क्रियाविधि और उसके प्रभाव को समझना है, जो समाज को नई दिशा दे। तय है कि ऐसा निर्मित समाज अपनी ऐतिहासिक विरासत की संस्कारों को अपनी जड़ों में जमाए रखेगा और उसकी उपलब्धियां आसमान की ऊंचाईयों में भी लहराता हुआ होगा।

"दिशा देने" की बात सदैव सकारात्मक और सृजनात्मक ही होगी, क्योंकि इसके अलावा अन्य दिशा तो दिशाहीनता को ही दर्शाता है। अर्थात सकारात्मक और सृजनात्मक दिशा के अतिरिक्त अन्य दिशाओं के लिए तो किसी अतिरिक्त, सजग, सतर्क और समर्पित प्रयास की कोई आवश्यकता ही नहीं है। मतलब यह है कि किसी को भी यदि कोई दिशा दी जाए, तो उसे अवश्य ही सकारात्मक, रचनात्मक और सृजनात्मक परिणाम देने चाहिए, ताकि समाज, मानवता, प्रकृति और भविष्य लाभान्वित होता रहे। इस उपादेयता के बिना 'दिशा' दिए जाने का कोई मतलब नहीं है।

लिखना यानि साहित्य सृजन करना एक कौशल,  एक विधा है। यह किसी की कोई जन्मजात प्रतिभा या गुण नहीं है। इसे कोई भी प्रयास कर अभ्यास से सीखता है। इसे कोई भी विकसित कर सकता है। जैसे एक मानव शिशु का सजगता, सतर्कता और समर्पित प्रयास कर उसका पालन पोषण एवं उसे संवर्धित किया जाता है, उसी तरह एक साहित्यकार भी साहित्य का सृजन एवं विकास करता है। अर्थात एक साहित्यकार अपना साहित्यिक परितंत्र का, यानि पर्यावरण का निर्माण कर लेता है| वह साहित्य उत्कृष्ट माना जाता है, जो मानवीय संवेगों की अनुभूति रखता है, मानवता को समझता है, और उसे अपने साहित्य की अभिव्यक्ति में समुचित स्थान देता है|मानवता एक इतना व्यापक अवधारणा है जिसमें समुचित एवं पर्याप्त न्याय, स्वतंत्रता, समता समानता और बन्धुत्व की भावना होती है। 

एक अच्छा साहित्यकार उसे समझा जाता है, जिसे इतिहास, संस्कृति, मनोविज्ञान, और दर्शन की समझ होती है, भले ही उसके पास इन विषयों से संबंधित कोई अकादमिक उपाधि नहीं हो| विश्व के सभी स्थापित एवं प्रसिद्ध साहित्य इसी अभिव्यक्ति के कारण ही स्थापित और प्रसिद्ध साहित्य हुए हैं। उसमें इन्ही समझदारियों और दृष्टिकोण की झलक मिलती है| इन इतिहास, संस्कृति, मनोविज्ञान, और दर्शन को समझे बिना ही साहित्य दिशाहीन हो जाती है| समाज के नाम पर कुछ भी लिख देना साहित्य का प्रारंभिक स्वरुप हो सकता है, लेकिन वह अवश्य ही दिशाहीन साहित्य होगा, क्योंकि वह अपने प्रारंभिक अवस्था में है| इसीलिए मैंने इस विषय पर समाज, साहित्य, दिशा एवं साहित्यकार की अवधारणा को स्पष्ट किया है, जिसे हर साहित्यकारों को समझना चाहिए|

कहा जाता है कि कथानक (Narrative) ही शासन करता है और कथानक ही साहित्य होता है|कथानक क्या है? कथानक समाज से संबंधित किसी विषय या प्रसंग पर एक कथा है, जो विचारों, मानवीय भावनाओं और व्यवहारों की अभिव्यक्तियों को अपने समाहित कर जड़ मानव को गतिमान बना देता है। इन साहित्यों का आधार इतिहास, संस्कृति, सामाजिक सांस्कृतिक समस्या, या जीवन से जुड़ी हुई कोई भी रचना हो सकती है, जो समस्यायों पर प्रकाश डालती है, या समस्यायों के समाधान की ओर कोई दिशा देता हुआ होता है| 

वैसे साहित्य में कहानी, मिथक, नाटक, कविता या गीत इत्यादि कुछ भी हो सकता है, लेकिन साहित्य की मौलिक एवं मूलभूत प्रवृति समाज को दिशा देना ही है, और इसीलिए ही साहित्य को समाज का दर्पण भी कहा जाता है| यदि समाज से संबंधित कोई लेखन रचना समाज को दिशा नहीं देता है, तो स्पष्ट है कि उसे कचड़ा माना जाना चाहिए, साहित्य कदापि नहीं माना जाना चाहिए। 

यह कहना गलत नहीं होगा कि साहित्य ही व्यवस्था एवं शासन को भी नियमित एवं प्रभावित करता है| यह भी स्पष्ट मान्यता है कि फ़्रांस की प्रसिद्ध क्रान्ति में मुख्य एवं मौलिक भूमिका साहित्यकारों की ही रही, जिसमे इतिहास, संस्कृति, दर्शन समाहित था और मानवीय संवेगों को उभरता हुआ मनोविज्ञान की स्पष्ट भूमिका परिलक्षित है| भारत में ऐसे साहित्यों का अभाव तो अखरता ही है|

भारतीय साहित्यकार जिन समस्यायों के विरुद्ध लिखना चाहते हैं, या लिखते हैं, वे उन्ही समस्यायों को पैदा करने वालों के द्वारा रचित साहित्य को ही आधार बनाकर अपनी रचना करता है| यही भारतीय साहित्यों की दुर्दशा का कारण है कि उनके लेखन से भारतीय समाज को कोई दिशा नहीं मिलता है| ये साहित्यकार अपनी रचनाओं में उन्ही षड्यंत्रकारियों द्वारा तैयार संरचनात्मक ढांचा के अन्दर में ही तैरते रहते हैं, जिसके विरुद्ध ये लिखते हैं, और उन्ही के द्वारा निर्धारित एवं रचित लेखनों में उलझे रहते हैं| दरअसल ये साहित्यकार कहलाने वाले उनकी स्टील ढांचे में ही तैरते नहीं होते है, अपितु उसमें ही डूबते, उतरते और उपलाते रहते हैं। लेखक की इन रचनाओं का कोई सकारात्मक और सृजनात्मक परिणाम नहीं निकलता है| इसलिए ये नादान साहित्यकार इस असफलता में आम पाठकों की तथाकथित बेवकूफी देखते समझते हैं| ये साहित्यकार कुछ भी लिख देने को ही साहित्य की रचना समझते हैं| कुछ ही साहित्यकार वैश्विक उत्कृष्ट साहित्य की प्रवृति एवं अभिवृति को जानने, समझने और उसे अपने लेखन में उतारने की कोशिश करते हैं|

एक साहित्य में साहित्यकार की एक स्पष्ट मंशा या लक्ष्य होता है, और उस मंशा या लक्ष्य प्राप्त करने के लिए उसे लोकतान्त्रिक ढांचे यानि व्यवस्था के अंतर्गत मानवता का ध्यान रखना होता है| उस साहित्य को सांगत, सरल, साधारण, और सहज बुद्धिग्राह्य बनाकर प्रस्तुत करना होता है| ऐसे साहित्यों में व्यक्ति विशेष, घटनाओं, विचारों एवं आदर्शों को जोड़ते हुए उनका सूक्ष्म, विस्तृत, गहन और सुविचारित भावनात्मक ब्यौरा एवं वर्णन होता है, जिसका उद्देश्य सामने वाले पाठकों को अपनी मंजिल तक बहा कर ले जाना होता है| एक साहित्य में ऐसी वर्णात्मक प्रसंग या कहानी होता है, जो भावनात्मक लहरें उत्पन्न कर अपने पाठकों को बहाकर वहां ले जाता है, जहां वह साहित्यकार उसे ले जाना चाहता है, या उसे समझाना चाहता है| यह सब काल्पनिक होते हुए भी वास्तविक प्रभाव पैदा करता है|

एक साहित्यकार अपने लेखन से अपने विचार, आदर्श, मूल्य आदि का प्रचार प्रसार करता है| वह मानवीय भावनाओं को समझता है, और उसे समुचित दिशा भी देता है| दिमाग सदैव दिल से हार जाता है, यानि बुद्धि सदैव भावनाओं से हार जाता है। अर्थात तथ्य, तर्क, और विज्ञान भी समेकित रूप में समाज पर वह भाव या प्रभाव नहीं छोड़ पाता है, जो एक सुगठित साहित्य प्रभाव देता है| एक मानव भी अपनी इच्छाओं और आवश्यकताओं को भी अपनी भावनाओं में भूल जाता है| 

शासन भी वही समाज या वर्ग कर पाता है, जिसे उत्कृष्ट साहित्य की रचना करना आता है| अत: साहित्य की शक्ति को समझिए और समाज को दिशा दीजिए| लेकिन उससे पहले साहित्यकार को ही अपनी दिशा एवं स्थिति को अवश्य ही दुरुस्त कर लेना चाहिए, अन्यथा एक भटका हुआ साहित्यकार समाज को ही दिग्भ्रमित करता है, जो भारत में होता रहता है|साहित्य में भी सांस्कृतिक जडता को समाप्त कीजिये और साहित्य को न्यायपूर्ण बनाइए। 

ठहरिए और समझिए|

आचार्य निरंजन सिन्हा    

बहुजनों की समस्याएँ बढती ही जा रही है, क्यों?

भारत में बहुसंख्यको की समस्याएँ बढती ही जा रही है, जबकि उनलोगों की उम्मीद इसके घटने की है| ‘बहुजन’, अर्थात बहुसंख्यक जन| लोग अपनी सुविधा और ...