रविवार, 17 दिसंबर 2023

मानवीय उलझन और समाधान

  (The Psychology of Human Entanglements)

मानवीय उलझन और उसके समाधान को मानवीय मनोविज्ञान को ही जान एवं समझ कर पाया जा सकता है। इसे आप मानवीय उलझनों का मनोविज्ञान भी कह सकते हैं। अधिकतर समस्याओं का समाधान तो आसानी से मिल जाती है, लेकिन कुछ गूढ़ होती है। किसी भी चीज़ को यथास्थिति में समझना ही उसका समाधान है। अर्थात किसी भी चीज़ को उसी स्थिति, अवस्था, संरचना, विन्यास, ढांचा, परिस्थिति, पृष्ठभूमि और सन्दर्भ में समझ लेना ही उसका समाधान देता है। 

आज़ हमलोग मानव मन की उलझनों का विश्लेषण और उसका भिन्न-भिन्न संदर्भों, पृष्टभूमियों, परिस्थितियों एवं पारिस्थितिकीय परिवेशों में मूल्यांकन करना चाहेंगे। मानव की हर उलझन मनोवैज्ञानिक होती है, इसीलिए जिसके पास "मन" (Mind) नहीं होता है, उसके पास सुलझाने के लिए कोई उलझन भी नहीं होता है। अतः हमें सबसे पहले मानव को, मन को, उलझन को और मनोविज्ञान को समझ लेना चाहिए। दूसरे शब्दों में कहें, तो हमें मानव के मनोविज्ञान की क्रियाविधि का आलोचनात्मक चिंतन (Critical Thinking), यानि विश्लेषणात्मक मूल्यांकन (Analytical Evaluation) करना चाहिए। 

हम "मानव" (Man) उस स्तनपायी (Mammal) पशु (Animal) को कहते हैं, जो अपनी 'सोच' पर भी 'सोच' कर सकता है, और उसके 'सोच' में उसके निजी जीवन के अतिरिक्त अन्य का भी जीवन शामिल रहता है। इसी "सोच" के कारण एक होमो सेपियंस (Homo Sapiens) नामक दो पैरों वाला स्तनपायी पशु भी एक सामाजिक मानव (Homo Socius) और निर्माता मानव (Homo Faber) बन सका। यदि किसी मानव की सोच में यानि उसके जीवन में उसके अतिरिक्त कोई और परिवार, समाज, मानवता या प्रकृति शामिल नहीं है, तो वह महज़ एक पशु है, भले ही वह दो पैरों पर खड़ा है और कपड़े पहने हुए हैं। जो जीव बच्चे पैदा करता है, उसे पालता पोसता हुआ और उसे देखते हुए अपना जीवन व्यतीत कर लेता है, उसे ही पशु कहते हैं। एक मानव के जीवन मूल्य (Value of Life) में उसका समाज और मानवता के अतिरिक्त उसका प्राकृतिक पारिस्थितिकी भी शामिल होता है।

किसी का भी "मन" (Mind) उस जीवन इकाई का एक 'ऊर्जा का आव्यूह' (Matrix of Energy) होता है, जो उसके भौतकीय शरीर से सम्पोषित तो होता है, लेकिन उसके भौतकीय शरीर से बाहर होता है और उस व्यक्ति को संचालित, नियमित और नियंत्रित करता रहता है। किसी व्यक्ति का दिमाग (Brain) उसके 'मन' का मोड्यूलेटर (Modulator) होता है, जो उस व्यक्ति की भावनाओं, विचारों और व्यवहारों के लिए उसके मन और शरीर के मध्य एक अनुवादक की भूमिका अदा करता रहता है। मन को आप किसी का चेतना (Consciousness), या आत्म (Self) भी कह सकते हैं, लेकिन इसे भारतीय अवधारणा का आत्मा (Soul) कदापि नहीं कहा जाना चाहिए। किसी का आत्मा एक बार निर्मित तो होता है, परन्तु वह उसके जन्म मरण से परे होकर अपना अस्तित्व सदैव बनाए रखने का अवैज्ञानिक दावा करता है। मन किसी के जीवन में इतना महत्वपूर्ण है कि मन की अवस्था को बदल कर ही कोई अपना जीवन बदल सकता है। इसे ही कई विद्वानों ने भिन्न-भिन्न तरह से वर्णित किया है, यानि अभिव्यक्त किया है।

'उलझन' (Entanglement/ Complications /Tangles) मन की उस अवस्था को कहते हैं, जब 'मन' किसी भी भावना (Emotion), विचार (Thought), व्यवहार (Behaviour) यानि उसकी क्रियाविधि (Mechanism) को अच्छी तरह समझना चाहता है, लेकिन उसे अपनी महत्तम संतुष्टि तक नहीं समझ पाता है। इसी उलझन को ही कोई समस्या का स्वरूप समझता है। वैसे भी समस्या उसे कहते हैं, जिसका समाधान नहीं मिल पा रहा है। अतः किसी चीज को नहीं समझ पाना, यानि पूर्ण संतुष्टि तक नहीं जान पाना ही "उलझन" होता है। 

जब बात मनोविज्ञान की आती है, तब कोई भी इसे मन का विज्ञान समझता है, सही ही समझता है। अतः मनोविज्ञान मानव मन द्वारा संचालित, नियंत्रित और नियमित भावनाओं, विचारों और व्यवहारों का समुचित और सम्यक व्याख्या करता है। विवेकपूर्ण और व्यवस्थित ज्ञान ही विज्ञान है, अर्थात वैसा ज्ञान जो तार्किक भी हो, तथ्यात्मक भी हो, विवेकपूर्ण भी हो और व्यवस्थित भी हो, विज्ञान है। तार्किक अर्थात कार्य कारण पर आधारित हो। तथ्यात्मक अर्थात अवलोकन एवं परीक्षण योग्य हो और कल्पना आधारित नहीं हो। विवेकपूर्ण अर्थात उसमें वृहत् मानव कल्याण की भावना निहित हो, यह सब विज्ञान का एक अनिवार्य शर्त है। व्यवस्थित अर्थात क्रमानुसार एवं सरल, सहज और स्वाभाविक रूप में प्रस्तुति भी हो। इसी समेकित सम्पूर्णता को ही विज्ञान कहते हैं। विज्ञान सदैव अपने स्थापनाओं के विरुद्ध विचार भी आमंत्रित करता रहता है, ताकि वह बदलते संदर्भों, पृष्टभूमियों, परिस्थितियों और पारिस्थितिकीय परिवेशों में भी वास्तविकताओं की समुचित और सम्यक व्याख्या कर सके। अतः विज्ञान आस्थाओं का विरोधी भी होता है।

मानव मन को समझने में यदि आपने महान मनोवैज्ञानिक सिग्मंड फ्रायड की "मनोविश्लेषणात्मक" (Psycho Analytical) अवधारणा को नहीं समझा, तो मानव मन को समझना अधूरा रह जाएगा। यहां हम संक्षेप में फ्रायड के "Id," "Ego" और "Super ego" की अवधारणा को और उसकी क्रियाविधि को ही समझेंगे। मैं इन तीनों शब्दावली के हिन्दी अनुवाद के फेर में नहीं पड़ने जा रहा, ताकि आपको कोई भ्रम नहीं हो। यहां हम उसकी "रक्षा क्रियाविधि" (Defence Mechanism) को भी नहीं समझने जा रहें हैं।

मानव मन की तीन अवस्थाएं होती है। पहली अवस्था Id की होती है, जो एक मानव मन में सहज, स्वाभाविक रूप में, यानि प्राकृतिक रूप में उत्पन्न होती है। इसे पाशविक यानि जैवकीय प्रवृत्ति भी कह सकते हैं, क्योंकि यह सभी स्तनपायी पशुओं में स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होती है। यह शरीर के भौतिक अस्तित्व बनाए रखने के लिए अनिवार्य होता है। इसमें भोजन और यौन आनंद (Sex Pleasure) सबसे प्रमुख भूमिका में है। प्रकृति ने यौन आनंद के माध्यम से ही मानव की उत्तरजीविता (Survival) यानि निरन्तरता का सुनिश्चयन किया है। किसी व्यक्ति की Super Ego की अवस्था उस समाज की सांस्कृतिक मूल्यों एवं प्रतिमानों (Values n Norms) के अनुरूप उस व्यक्ति से उसके समाज को अपेक्षाएं (Expectations) होती है। इसे हम उस व्यक्ति के समाज की सामाजिक सांस्कृतिक भावनाओं, विचारों और व्यवहारों के उम्मीदों की अवस्था कह सकते हैं। एक मानव को अपने मन की पाशविक सहज प्रवृत्तियों  (Basic Instinct) और सामाजिक सांस्कृतिक आवश्यकताओं के बीच एक आवश्यक संतुलन बनाना होता है, जिसे ही Ego (अहम्) कहते हैं।

अर्थात एक मानव, जिसमें स्वाभाविक है कि इसमें महिला भी और इसके अन्य स्वरुप (Third Gender n Trans Gender) भी शामिल हैं, की भावनाओं, विचारों और व्यवहारों की व्याख्या इसी आधार पर किया जाना सम्यक, समुचित, वैज्ञानिक और आधुनिक होगा। इसीलिए यह व्याख्या संतोषप्रद भी होगा। बाकी अन्य व्याख्याएं भी इसी मूल अवधारणा की व्युत्पत्ति ही है। आप इस सामाजिक सांस्कृतिक मूल्यों एवं प्रतिमानों को समझने के लिए अब्राहम मैसलो का "अभिप्रेरणा सिद्धांत" (Theory of Motivation) को देख समझ सकते हैं, जो मानव मन को संचालित करने के लिए, यानि अभिप्रेरित करने के लिए प्रस्तुत है। लेकिन किसी व्यक्ति के जिद्द को यानि उसके बेवकूफी भरी हरकतों को समझने के लिए अब्राहम मैसलो का ही "हथौड़ा सिद्धांत" (Hammer Theory) को भी समझना चाहिए। यह जिद्द प्राधिकार प्राप्त व्यक्तियों के लिए लागू है, जिस पर हथौड़ा सिद्धांत स्पष्ट प्रकाश डालता है।

अब हम मानव मन की उलझनों को समझने के लिए एक सरलीकृत प्रस्तुति दे रहे हैं। आप भी अब्राहम मैसलो की पांचों अभिप्रेरक अवस्थाओं को जान समझ रहे हैं। तय है कि बच्चों की मानसिकता एवं व्यवहार संबंधी उलझनों को समझने के लिए यौन आनंद की अपेक्षा उसके भोजन और स्वास्थ्य सुरक्षा की आवश्यकता ज्यादा महत्वपूर्ण है। लेकिन जब कोई व्यक्ति युवा और प्रौढ़ावस्था में होता है, तो उसकी यौन आनंद की अनिवार्यता भी महत्वपूर्ण हो जाती है। हमें अब्राहम मैसलो की प्रेरक और बाध्यकारी अन्य अभिप्रेरक (Motive Drivers) आवश्यकताओं का ध्यान स्थिरता से रखना होता है। ध्यान रहे कि एक व्यक्ति अपने स्वीकरण (Self Actualization), आत्म संतुष्टि (Self Esteem), सुरक्षा, शारीरिक आवश्यकताओं और उसके सामाजिक सांस्कृतिक मूल्यों एवं प्रतिमानों के बीच संतुलित करने का प्रयास करता है। इसमें यौन आनंद यानि यौन संतुष्टि पर कई तरह के सामाजिक सांस्कृतिक मूल्यों एवं प्रतिमानों की कठोर संस्थागत ढांचा (Framework) और संरचना (Structure) का जाल (Web) बना हुआ होता है। परिणामस्वरूप लोगों को यौन आनंद की इच्छा या प्रवृत्ति को दबाना पड़ता है, या छिपाना पड़ता है। 

कभी कभी वैवाहिक जीवन में भी कार्य अधिकता, भौगोलिक दूरी, या अन्य कई कारणों से वैधानिक यौन साथी को पर्याप्त समय नहीं दिया जाता है। कभी कभी उच्च प्राधिकारों को बेहतर और सुविधाजनक यौन संतुष्टि का विकल्प भी मिल जाता है। तो ऐसी अवस्था मे किसी उच्चस्थ प्राधिकारों के Ego (अहम्) की क्रियाविधि की व्याख्याओं में इस महत्वपूर्ण कारक का ध्यान रखना होता है। अपराध अन्वेषण में भी जब कोई सूत्र स्वाभाविक रूप से और सहजता से स्थापित करना संभव नहीं होता है, तो अन्वेषक का ध्यान इस यौन आनंद के कारकों की ओर चला जाता है। जब कभी डिप्लोमेटिक संबंधों को भी समझने में उलझने आती है, तो यही सूत्र काम करता है।

अतः यदि आपके मानव मन को अपने आसपास या आपके किसी संज्ञान में आई किसी उलझन को समझने में कठिनाइयां हो रही है, तो आप उन उलझनों को समझने में महान मनोवैज्ञानिक सिग्मंड फ्रायड के मनोविश्लेषणात्मक अवधारणा को, अब्राहम मैसलो के अभिप्रेरणा सिद्धांत एवं हथौड़ा सिद्धांत, और इसमें यौन आनंद की प्रक्रिया को अवश्य ध्यान में रखिए, यह आपकी सारी उलझनों को सुलझा देगी। बशर्ते आपका विचाराधीन पात्र अपने यौवन की किस अवस्था में है। यहां यह भी ध्यान रहे कि यौन आनंद की अवस्था का शारीरिक उम्र की अपेक्षा मन की अवस्था यानि उमंग से ही है। 

अब आपको अपनी सभी उलझनों का समाधान मिल गया होगा।

आचार्य प्रवर निरंजन जी

  स्वैच्छिक सेवानिवृत्त

राज्य कर संयुक्त आयुक्त, बिहार, पटना।

  

 

शनिवार, 2 दिसंबर 2023

आज़ युवा शक्ति क्या करे?

वर्तमान भारत में युवा शक्तियों की स्थिति और प्रकृति को देखते हुए उनकी उर्जा, उत्साह और संसाधन को सकारात्मक, सृजनात्मक और उपयोगी दिशा में उत्पादक बनाने के लिए एक "पंच सूत्रीय कार्यक्रम" की आवश्यकता है, जो वर्तमान युवाओं की आवश्यकताओं और उनके मनोविज्ञान के अनुरूप हो तथा वर्तमान समाज के भी अनुकूल हो। इस पंच सूत्रीय कार्यक्रम में 'उद्यमिता', 'वित्तीय जागरूकता', 'सामाजिक अंकेक्षण', 'सांस्कृतिक सामाजिक रुपांतरण की क्रियाविधि', और 'सफलता का विज्ञान' शामिल है।

उद्यमिता (Entrepreneurship)

सबसे पहले उद्यमिता को समझते है। आज सरकारी एवं गैर-सरकारी क्षेत्रों में नौकरियों की जो स्थिति है और कई कारणों से इनकी जो भविष्य में संभाव्यताएं है; उसमें उद्यमिता ही एकमात्र बेहतर विकल्प है। विज्ञान की प्रगति, तकनीकी सुधार, आटोमेशन, सेवाओं की आउटसोर्सिंग आदि कई ऐसे क्षेत्र हैं, जो उद्यमिता के विकास को ही प्रेरित करते हैं। मैं परम्परागत अर्थव्यवस्था की बातें नहीं लिखूंगा, क्योंकि सामान्य बातें हर जगह हर कोई को उपलब्ध है। लाभ के साथ किसी भी समस्या का समाधान करना ही उद्यमिता है। उद्यमिता एक नजरिया है, सोच है, तकनीक है, कौशल है और कार्य पद्धति है, जिसे कोई भी मनोयोग से सीख सकता है। यह जन्मजात प्रतिभा भी नहीं है। यह कोई भी खीख सकता है, वशर्ते उसमें कुछ करने का एक बड़ा सपना हो।

बड़ा सपना क्या होता है? जब आप अपने सपनों में बहुत से लोगों के कल्याण को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप में शामिल कर लेते हैं, तो आपका सपना बड़ा हो जाता है। जब आप अपने सोच में समाज, मानवता और प्रकृति को समाहित कर लेते हैं, तो आप महान बन जाते हैं| इसी के साथ आपकी उद्यमिता में सफलता शुरू हो जाती है। आप अपने मेंटर (प्रणेता) उन्हें बनाए, जो धरातल पर सफलता पाई है। असफल और नकारात्मक, थके हुए (अब कुछ भी नया और अलग नहीं हो सकता है, वाले मानसिकता के लोग) एवं पके हुए (जो अपनी मानसिकता को बदलने को तैयार नहीं हैं), यानि हारे हुए लोगों से बचिए। सदैव रोने वाले अर्थात सारा दोष व्यवस्था में देखने वाले लोगों से भी बचिए।

डा भीमराव आंबेडकर का एक सूत्र याद रखिए - Educate, Agitate, Organize अर्थात ईच्छित उद्यमिता का अध्ययन कीजिए, उसका मनन, मंथन कीजिए और उसके निष्कर्ष पर पहुंचिएं| यहाँ ध्यान दिया जाय कि इसमें 'संघर्ष' यानि 'Struggle' शब्द नहीं है, अपितु 'Agitate' शब्द हैं| Agitate का अर्थ हुआ – मथना, मंथन करना| शब्द agitate से agitator बना है, जो दही का मंथन कर घी निकालता है। इस प्राप्त निष्कर्ष के लिए संगठन बनाइए या पूर्व से बने किसी संगठन में शामिल होइए, ताकि आपको यथावश्यक दिशा निर्देश मिलता रहे। यह मनोबल बढ़ाए और बनाए रखने के लिए भी आवश्यक है। और सामान्य लोग इस उक्ति का अन्यथा अर्थ निकालते हैं, तो मुझे इस पर टिप्पणियां नहीं करना है।

भावी उद्यमिता की संभावनाओं को देखने के लिए आपको एक इतिहास बताता हूं। अठारहवीं शताब्दी में Steam Revolution,  उन्नीसवीं शताब्दी में Electricity Revolution, बीसवीं शताब्दी में Computer Revolution, तथा इक्कीसवीं शताब्दी में Intelligence Revolution हुआ है। इससे आपको वर्तमान और भविष्य के उद्यमिता को दृष्टि मिलेगा। इसी संदर्भ में आपको एक बात और बताना चाहता हूं। रुपांतरण (transformation) भी सृजन की श्रेणी में आता है। इसमें पुनर्स्थापन (Relocation), पुनर्चक्रण (Rotation), परावर्तन (Reflection), अनुकरण या अनुवाद (अपनी इच्छाओं, भावनाओं और सांस्कृतिक आवश्यकताओं के अनुरूप) (Translation), और पुनः आकृति निर्धारण ( Re - shaping) भी उद्यमिता के क्षेत्र में नवाचार (Innovation) लाता है, या ला सकता है।

अर्थव्यवस्था के छात्र जानते हैं कि अर्थव्यवस्था का सेक्टर (Sector) में वर्गीकरण किया गया है। परन्तु सामान्य जनों के लिए इसकी पुनरावृति कर रहा हूं। प्राथमिक प्रक्षेत्र (Primary Sector) वह है, जिसमें प्रकृति प्रदत्त उत्पादों या संसाधनों का दोहन किया जाता है, जैसे कृषि, बागवानी, खनन, जलजीव उत्पादन, वनोत्पाद आदि है। द्वितीयक प्रक्षेत्र (Secondary Sector) में  प्राथमिक प्रक्षेत्र से प्राप्त वस्तुओं का मूल्य संवर्धन (Value Addition) किया जाता है, उसकी उपयोगिता को कई तरीकों से बढ़ाया जाता है। इसे औद्योगिक उत्पादन भी कहा जाता है। तृतीयक प्रक्षेत्र (Tertiary Sector) में सेवा क्षेत्र आता है। हालांकि सभी क्षेत्र महत्वपूर्ण है, परन्तु उच्चतर श्रेणी के क्षेत्र बेहतर आय के श्रोत होते हैं और वे निम्नतर क्षेत्रों के मजबूती पर आधारित होते हैं। चतुर्थक प्रक्षेत्र (Quaternary Sector) ज्ञान आधारित नया उभरता हुआ सितारा है। इसमें सूचनाओं को आधार बनाकर नीचे के क्षेत्र को ज्यादा उपयोगी बनाया जाता है। प्रसिद्ध प्रबंधन चिंतक फिलिप कोटलर कहते हैं कि यह युग “सूचनाओं” का नहीं रहा, अपितु यह “सूचनाओं के शेयरिंग” का हो गया है। पंचम प्रक्षेत्र (Quinary Sector) में वे गतिविधियां शामिल हैं, जिसमें चतुर्थ क्षेत्र से प्राप्त सूचनाओं के आधार पर नीतियों का निर्धारण किया जाता है। इसमें इन सूचनाओं के आधार पर आइडिया (Ideas) का नवनिर्माण किया जाता है, सूचनाओं का पुनर्गठन किया जाता है, नए और पुराने सूचनाओं की नई व्याख्या कर नए आईडिया का निर्माण किया जाता है, नई तकनीक विकसित की जाती है और पूर्वानुमान भी किया जाता है। यह क्षेत्र भारत में पूरी तरह से नया है, पर पूरी संभावनाओं से भरा हुआ है। विचार ही धन है। जब आप इस पर विचार करेंगे, तो संभावनाओं का दरवाजा भी खुल जाएगा।

उद्यमिता का क्षेत्र सिर्फ वस्तुओं और सेवाओं में ही नहीं है, बल्कि ज्ञान में भी विविधता से भरा क्षेत्र है। अब आप उद्यमिता का वैधानिक पहलू भी समझ लें। शुरुआती कारोबार में व्यवसाय स्वामित्वाधीन (Proprietorship) होना चाहिए, यदि आप इस उद्यमिता के क्षेत्र में नए है और आप छोटा स्तर पर ही शुरुआत कर रहे हैं। इसमें कराधान में विशेष छूट नहीं मिलता, पर इसे करना, सम्हालना और बढ़ाना आसान होता है। इसमें आपमें और आपके व्यवसाय के वैधानिक उत्तरदायित्व में अन्तर नहीं किया जाता है। एक से अधिक व्यक्तियों के द्वारा साझेदारी फर्म होता है, जो साझेदारी (Partnership) अधिनियम, 1932 के द्वारा संचालित और नियंत्रित होता है। इसमें उत्तरदायित्व का बंटवारा वैधानिक रूप से नहीं किया जाता है, जो मुख्य वैधानिक नकारात्मक पहलू है। उत्तरदायित्व के सीमित निर्धारण करने के लिए दो वैधानिक फर्म है - 'कम्पनी' और ‘एल एल पी’। एक कम्पनी भारतीय कम्पनी अधिनियम, 2013 से और एक ‘एल एल पी’ ‘सीमित उत्तरदायित्व साझेदारी अधिनियम, 2008 से संचालित और नियंत्रित किया जाता है। सामाजिक कार्यों और अलाभकारी उद्यमिता के लिए सोसायटी रजिस्ट्रेशन अधिनियम 1860,  भारतीय न्यास (ट्रस्ट) अधिनियम 1882, सहकारिता अधिनियम 1912, कम्पनी अधिनियम 2013 आदि का प्रावधान है। यहां यह बताना ही प्रर्याप्त है कि आप इनकी समझदारी और जानकारी रखें; अन्यथा विधि आपको सभी संबंधित चीजों का जानकार मानता है| वैसे आप भारतीय संबंधित पदाधिकारियों के सहयोगात्मक रवैया से आप वाकिफ होंगे ही। इसमें कई विभिन्न शुभचिंतकों से राय ले सकते हैं, गूगल से भी सलाह लें सकते हैं। बाजार में कई रूपों में सलाहकार हैं, जिनकी अज्ञानता, और उनकी नियत भी ध्यान देने योग्य होता है।

कई सरकारी प्रशिक्षकों को देखा है, वे खुद उद्यमी नहीं बन सके और आज भी किसी के नौकर ही है; पर उद्यमिता का प्रशिक्षण दे रहे हैं, संस्कार सिखा रहे हैं। उद्यमिता एक संस्कार है और इसका संचरण वे नहीं कर पाते| जिसमें उद्यमिता का यह संस्कार है ही नहीं, वह दूसरों को उद्यमिता का संस्कार कैसे दे सकता है? 

हमें प्रेरणा (Motivation) और अन्तप्रेरणा (Inspiration) में अन्तर समझना जरूरी है। प्रेरणा बाहरी कारक है और अन्तप्रेरणा आन्तरिक कारक है। प्रेरणा बाहरी सुविधाएं, अनुदान आदि से संचालित होता है, जबकि अन्तप्रेरणा आन्तरिक कारणों से, जो ज्यादा महत्वपूर्ण है। उद्यमिता के लिए आन्तरिक कारणों का होना अनिवार्य है, अन्यथा इन उद्यमियों के जल्दी टूट जाने का ख़तरा रहता है। मानसिक रूप से मजबूत होना ज्यादा जरूरी है। मन के सारे हार है। इसीलिए कहा गया है कि हर दस उद्यम में आठ उद्यम असफल हो जाते हैं, परन्तु हर दस उद्यमी में नौ उद्यमी सफल हो जाते हैं। उद्यमिता एक नाज़ुक, परन्तु महत्वपूर्ण एवं विशाल अवधारणा है और इसी कारण इसे पूर्णतया संतोषजनक और गारंटी युक्त नहीं बताया जा सकता है। इसका सतत विकास होता है और इसलिए शुरुआती दौर में इसे सरल, एवं छोटा उद्यम से ही शुरू कर जटिल, एवं बड़ा की ओर अग्रसर होना चाहिए।

वित्तीय जागरुकता (Financial Awareness)

वित्तीय जागरुकता या वित्तीय समझदारी या वित्तीय साक्षरता, सभी एक ही संदर्भ में है और यह धन से संबंधित भावना, व्यवहार और चिंतन प्रणाली है। इसमें धन (Wealth) को पूंजी (Capital) बनाने, बचत एवं निवेश, संरक्षण, संवर्धन एवं उपयोग से संबंधित क्रियाविधि को समझा जाता है। इसमें पूंजी बाजार सबसे प्रमुख है। इसके डिजीटलीकरण को समझना और इसका समुचित उपयोग भी शामिल हैं। इसमें भविष्य के ‘ब्लाक चेन तकनीक’ पर आधारित ‘क्रिप्टोकरेंसी’ को भी जानना और समझना जरूरी होगा। मैंने इस विषय पर कई आलेख अपने ब्लॉग पर लिखे है, यथा धन का विज्ञान (https://niranjan2020.blogspot.com/2023/05/blog-post.html), सदाबहार अमीरी का रहस्य (https://niranjan2020.blogspot.com/2020/06/secret-of-perpetual-rich.html), आपकी वित्तीय जागरुकता (https://niranjan2020.blogspot.com/2020/06/your-financial-awareness.html)। इसीलिए यहां दोहराव से बचना चाहता हूं।

सामाजिक अंकेक्षण (Social Audit)

सामाजिक अंकेक्षण सरकारी तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार समाप्त करने का अमोघ अस्त्र है। इसमें कोई व्यक्ति (Person) एक नागरिक के रूप में सूचना अधिकार अधिनियम, 2005 के अन्तर्गत सरकारी धन से संचालित योजनाओं एवं कार्यक्रमों की जानकारियों को प्राप्त करता है। फिर इन जानकारियों एवं प्रगति का सत्यापन उस क्षेत्र में किए गए धरातलीय कार्यो का मिलान लाभार्थी एवं स्थल पर प्रत्यक्ष अवलोकन से करता है और सरकार द्वारा निर्धारित लक्ष्य एवं प्रक्रिया के आलोक में अंकेक्षण करता है। इससे भ्रष्ट प्रक्रिया पर अंकुश लगता है और बेहतर परिणाम के लिए सुझाव आते हैं। इसका प्रशिक्षण युवाओं में नवनिर्माण के लिए सकारात्मक और उत्पादक जोश पैदा करता है और सरकारी तंत्र को स्वस्थ्य एवं बेहतर परिणाम देता है। इस अंकेक्षण प्रतिवेदन को सरकार के साथ साथ प्रिंट और डिजिटल मीडिया में दिया जा सकता है। इसका व्यवहारिक पहलू इस अंकेक्षण को कई गुणा कर प्रसारित कर वाइरस की तरह तेजी से फैलाता है और भ्रष्ट आचरण पर रोक लगाता है।

सांस्कृतिक रुपांतरण की क्रियाविधि (Mechanism of Cultural Transformation)

‘सांस्कृतिक सामाजिक रुपांतरण की क्रियाविधि' यानि इसके इतिहास एवं विज्ञान को वैज्ञानिक तरीके से जानना हर युवाओं के लिए अनिवार्य है। व्यवस्थित एवं विवेकपूर्ण ज्ञान को ही विज्ञान कहते हैं। सांस्कृतिक सामाजिक रुपांतरण को समझने के वैज्ञानिक तरीके है, जिसके बारे में प्रसिद्ध इतिहासकार प्रो रामशरण शर्मा जी ने बताया है। इनके अनुसार वैज्ञानिक इतिहास उत्पादन (और वितरण, विनिमय एवं उपभोग) की शक्तियों और उसके अन्तर्संबंधों के आधार पर समझा जाना चाहिए। वैज्ञानिक इतिहास तथ्यों, तर्कों और वैज्ञानिक प्रविधियों पर आधारित होना चाहिए; न कि भावनाओं, आस्थाओं और मनगढ़ंत मान्यताओं पर आधारित हो। यह वैज्ञानिक इतिहास लेखन इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इतिहास बोध ही समाज की संस्कृति का निर्धारण करता है। संस्कृति हमारे समाज रुपी कम्प्यूटर का वह साफ्टवेयर है, जो समाज को अचेतन, अवचेतन और सचेतन स्तर पर संचालित और नियंत्रित करता है। 

आज यदि हम रुढिवादिता, अंधविश्वास, जड़ता और पाखंड में अपना महत्तम ऊर्जा, समय, उत्साह और संसाधन बर्बाद कर रहे हैं, तो उसका एकमात्र कारण हमारा दूषित संस्कृति है| यह दूषित संस्कृति गलत और सामंतवादी इतिहास बोध से उत्पन्न हुआ है। प्रसिद्ध इतिहासकार प्रो ई एच कार अपनी पुस्तकWhat is History में लिखते हैं कि ऐतिहासिक चिंतन हमेशा उद्देश्यवादी होता है। इतिहास के तध्य शुद्ध वस्तुनिष्ठ नहीं हो सकते, क्योंकि वे इतिहास के तथ्य तभी बनते हैं, जब इतिहासकार उसको महत्त्व देता या नकारता है। इतिहास में विकास का अर्थ है, मानव के स्वाधीनता की धारणा की दिशा में विकास। अभी तक इतिहासकारों में बहुलता उनकी ही है, जिन्हें यथास्थितिवादी यानि सांस्कृतिक सामंतवादी मानने में संकोच नहीं होना चाहिए।

भारत के लोग जाति, वर्ण, और धर्म के आधार पर कई वर्गो में विभक्त है। भारत का सामाजिक एवं सांस्कृतिक विकास का इतिहास अवैज्ञानिक है। भारत के इतिहास पर सामंतवाद के प्रभाव का सम्यक अध्ययन नहीं किए जाने से अवैज्ञानिक सामंतवादी मानसिकता को मजबूती मिली हुई है। मानव की उत्पत्ति, प्रवास और सामाजिक विकास की गाथा यथास्थितिवाद बनाएं रखने को ही व्याख्यापित है। भारत के सशक्त और अग्रणी राष्ट्र निर्माण की पहली अनिवार्य शर्त इस कम्प्यूटर रुपी तंत्र का संस्कृति रुपी साफ्टवेयर को सुधारना है, जो इतिहास के वैज्ञानिक लेखन से ही होगा।

सफलता का विज्ञान (Science of Success)

सफलता का विज्ञान यानि सफलता प्राप्त करने की वह वैज्ञानिक और व्यवहारिक प्रविधि है, जिसको जानना और समझना हर भारतीय युवाओं के लिए जरूरी है। विचार एवं मानसिकता कैसे भौतिकता में रुपांतरित होता है और क्रियाओं को कैसे संचालित करता है - यह जानना जरूरी है। बुद्ध के दर्शन में मन को सभी चीजों का केन्द्र बिन्दु स्वीकार किया गया है। मन को सभी चीजों का पूर्वगामी माना गया है। मन ब्रह्मांड में फैला क्वांटम फील्ड पर ऊर्जा डालकर उन चीजों को उत्पन्न करता है, जिनको मन उत्पन्न करना चाहता है (क्वांटम क्षेत्र का अवलोनकर्ता का सिद्धांत)। मन यदि नियंत्रण में है, तो सब कुछ नियंत्रण में है। मन ही सभी मानसिक क्रियाओं में प्रधान है, जो सुविचारित लक्ष्यों को भौतिक तथ्यों में रुपांतरित करता है। अल्बर्ट आइंस्टीन ने इसलिए ही कल्पना (Imagination) अर्थात मन की उड़ान को ज्ञान से ज्यादा महत्वपूर्ण माना। वैज्ञानिक सर रोजर पेनरोज ने मन एवं चेतनता के संबंधों की वैज्ञानिक व्याख्या करते हुए बताते हैं कि जब हम किसी चीज पर मन को स्थिर करते हैं अर्थात अपनी सोच को स्थिर करते हैं, तो उस वस्तु के उन तरंगीय ऊर्जा में से प्रकटीकरण की संभावना बढ़ जाती है, जिस वस्तु को हम प्रकट देखना चाहते हैं। इसके लिए मन को संकेंद्रित करना चाहिए, जिसे विपश्यना भी कहा जाता है। इन सभी के लिए संक्षेप में विचार करना, कल्पना करना और लक्ष्य के लिए संगठित होकर शुरू करना जरूरी है।

अंत में सकारात्मक मनोविज्ञान (Positive Psychology)  के जनक अब्राहम मैसलो (1908-1970), एक अमेरिकी मनोवैज्ञानिक, का एक प्रसिद्ध पक्ति को दुहराना चाहूंगा, जो 1966 में प्रकाशित उनकी प्रसिद्ध पुस्तक  "The Psychology of Science" में है -

"If you have a Hammer, everything looks like a Nail." यदि आपके पास हथौड़ा है, तो आपको हर चीज कांटी की तरह ही दिखेगा। अर्थात आप हर चीज में हथौड़े के प्रयोग उपयोग करने को उद्यत होते हैं।

इसे मैं ऐसे भी लिखता हूं कि यदि कांटी को ठोकने के लिए हथौड़ा लेकर तैयार होते हैं, तो आपका ध्यान सिर्फ लक्ष्य (कांटी) पर होता है। अतः युवाओं से अनुरोध है कि आप तैयार रहें, निशाने पर कांटी ही होगा। आपके द्वारा समृद्ध, सुखमय और शांतिमय अग्रणी और विकसित भारत का उदय होगा।

आचार्य निरंजन सिन्हा

सोमवार, 6 नवंबर 2023

भारतीय गतिहीन समाज गतिमान कैसे बने?

एक सर की अध्यक्षता में "विमर्श बैठक" चल रही थी, कोई 'भाषण बैठक' या 'बहस बैठकनहीं थी। मुद्दा बहुत अहम् था। प्रश्न यह था कि कुछ लोगों की हो रही 'आर्थिक समृद्धि' (Prosperity) या आर्थिक 'संवृद्धि' (Growth) को ही भारतीय विकास (Development) का पैमाना (Scale) या संकेतक (Indicator) मान लिया जाए? इसलिए विमर्श बैठक का विषय था कि हम भारतीयों को चाहिए कि इस गतिहीन भारतीय समाज को समुचित और सम्यक दिशा कैसे दिया जाय और इस गतिहीन भारतीय समाज को गतिशील कैसे बनाया जाय? मैं फिर कहता हूं कि विषय अतिगंभीर ही नहीं, विवादास्पद भी था, क्योंकि भारतीय समाज की गतिहीनता पर सर्व मान्यता या सर्व सहमति नहीं थी।

बैठक में उपस्थित प्रोफेसर साहब ने भारतीय समाज की तथाकथित 'गतिहीनता' शब्द के प्रयोग पर आपत्ति कर ही दिया। जैसे सामान्य लोग 'पश्चिमीकरण' (Westernization) को 'आधुनिकीकरण' (Modernization) ही समझ लेते हैं, उसी तरह अर्थनीति की स्पष्ट दर्शन के अभाव में बहुत से लोग 'आर्थिक संवृद्धि' (Economic Growth) को ही 'विकास' (Development) मान लेते हैं। वैसे तो प्रसिद्ध अर्थशास्त्री श्री अमर्त्य सेन 'विकास' को 'स्वतंत्रता' एवं 'सक्षमता' उपागम (Capability) के रूप में परिभाषित करते हैं, जो उनकी प्रसिद्ध पुस्तक - "Development as Freedom" में आया था और इसी अवधारणा के लिए उन्हें नोबेल पुरस्कार भी मिला।

हमलोग या कोई भी समाज या उसकी छोटी इकाई आज जिस भी स्थिति में है, वह अपने वर्तमान सोच- विचार, मानसिकता एवं अभिवृति, परम्परा एवं संस्कार आदि आदि का उत्पाद हैयानि संक्षेप में कहें तो कोई भी समाज अपनी संस्कृति का उपज होता है। जिस संस्कृति में न्याय, स्वतंत्रता, समता एवं बंधुत्व की मूल और मौलिक भावना या लक्ष्य का ही अभाव हो, या कहें कि जिस संस्कृति में जाति, वर्ण, धर्म, क्षेत्र, भाषा आदि के आधार आज़ भी इस आधुनिक और वैज्ञानिक युग में भी भेदभाव प्रमुखता के साथ छाया हुआ है , वह सांस्कृतिक समाज को कैसे गतिशील मान लिया जाएजिस समाज और संस्कृति में अवैज्ञानिक, अतार्किक, अविवेकी, अलोकतांत्रिक और अमानवीय ढोंग, पाखंड, अन्धविश्वास एवं अनावश्यक कर्मकांड व्याप्त हो और उसे सक्रियता के साथ धार्मिक संरक्षण, समर्थन और सहयोग प्राप्त हो, उस समाज को भी यदि गतिहीन नहीं कहा जाय, तो कैसे समाज एवं संस्कृति को गतिहीन कहा जाय?

समाज और संस्कृति की गतिहीनता को ही 'सांस्कृतिक जड़ता' (Cultural Inertia) कहा जाना चाहिए। मैं तो इसे सांस्कृतिक साम्राज्यवादी जडता' (Inertia of Cultural Imperialism) ही कहता है, यदि हम साम्राज्यवाद की मूल और मौलिक अवधारणा को समझते और मानते हैं। यदि किसी समाज या संस्कृति में कोई जड़ता (Inertia) है, तो उस जड़ता की स्थिति को बदलने के लिए भौतिकी के नियमों के अनुसार सजग, सतर्क, समर्पित अतिरिक्त उर्जा यानि अतिरिक्त प्रयास चाहिए।

अतः यदि सांस्कृतिक जड़ता है, तो समाज को गतिहीन मानने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। हमारा भारतीय समाज वस्तुत गतिहीन ही नहीं है, अपितु  उसके ही चाल में यानि उसके ही संस्थागत ढांचे (Institutionalised Framework) में उलझा हुआ है, जिससे वह निजात पाना चाहता है। दरअसल आप जिस चीज से निजात पा लेना चाहते हैं, तो आप अपनी सारी गतिविधियों और क्रियाविधियों का संदर्भ बिन्दु उसी को मान लेते हैं और उसके दुष्चक्र में कब और कितना फंस जाते हैं, आप समझ ही नहीं पाते हैं। हम भारतीय जो समाधान तलाशने का प्रयास कर रहे हैं, वे सभी समाधान उनके द्वारा उपलब्ध या प्रस्तुत विरोधी वैचारिकताओं के संस्थागत एवं संरचनात्मक ढांचे में ही विकल्प तलाश रही है। इसीलिए हम भारतीय उस संदर्भ लकीर से बड़ी और अलग लकीरें खींचने की मानसिक दृष्टि नहीं रखते हैं। वहीं लकीर हमारी अंतिम ध्येय हो जाता है, और उसके आगे कुछ भी नहीं सोचता। विमर्श बैठक में उपस्थित बिनोद सर का ऐसा ही मानना था। मेरी भी सर से सहमति थी।

इसीलिए बिनोद सर का मानना था कि हमें इतिहास के किसी संदर्भ में नहीं उलझकर नया, आधुनिक, वैज्ञानिक और मानवतावादी प्रगति करनी है, तो वह प्रगति ही स्वयं अपना इतिहास रच लेगा। इसीलिए हमें शून्य से शुरू करना चाहिए। हमें उनकी मान्यताओं और व्याख्याओं से अलग मान्यता और व्याख्या करनी होगी, जो नया, आधुनिक, वैज्ञानिक और मानवतावादी हो। इसे ही थामस सैम्युल कुहन ने "पैरेडाईम शिफ्ट" कहा था। सोच और प्रक्रिया में मौलिक बदलाव किए बिना समाज में परिवर्तन या रुपांतरण नहीं हो सकता है, लेकिन इसका क्रेडिट तो राजनीतिक नेता ले जाते, और वे बाजार की शक्तियों के प्रभाव से इंकार कर देते हैं।  वे आर्थिक शक्तियों की क्रियाविधि और प्रभाव को, यानि बाजार की शक्तियों के प्रभाव को नकार देना चाहते हैं।

'बाजार की शक्तियां' (Market Forces) ही वर्तमान को संचालित, नियंत्रित, नियमित और प्रभावित करती रहती है। यही 'बाजार की शक्तियां' ही तत्कालीन यानि समकालीन यानि समकालिक शक्तियां कहलाती है। यही समकालिक शक्तियां ही ऐतिहासिक काल में ऐतिहासिक शक्तियां बन जाती है, या कहलाती है। और आर्थिक शक्तियां ही बाजार की शक्तियां होती है। आर्थिक शक्तियों में उत्पादन, वितरण, विनिमय और उपभोग के साधनों और शक्तियों को शामिल किया जाता है। अतः जब भी सांस्कृतिक रुपांतरण को, यानि सामाजिक रुपांतरण को सम्यक और सही ढंग से, वैज्ञानिक और समुचित तरीके से समझना होगा, तो हमें इसी ऐतिहासिक साधनों और शक्तियों एवं उनके अंतर्संबंधों की क्रियाविधि (Mechanism) के आधार पर ही समझना होगा।

सामान्यतः लोग घिसे-पिटे परम्परागत सोच, अभिवृति और संस्कार से बाहर नहीं निकल पाते हैं। यही "सांस्कृतिक जड़ता" है, जिसे समझे बिना कोई भी आगे नहीं बढ़ सकता है। महान वैज्ञानिक गैलेलीयो ने संभवत 1546 में 'जडत्वीय संरचनात्मक ढांचा' (Inertial Structural Frame) का अवधारणा दिया थाजिसके बिना जड़ता के संरचनात्मक ढांचा और उसकी क्रियाविधि एवं प्रभाव को नहीं समझा जा सकता है। मैंने इस अवधारणा का उपयोग सांस्कृतिक जड़ता को समझने समझाने में सफल उपयोग किया है। कोई भी उपलब्ध ज्ञान एक पाठ (Lesson) हो सकता है, लेकिन एक पूर्ण समाधान नहीं हो सकता है। शायद इसीलिए अल्बर्ट आइंस्टीन ने कहा था कि कभी भी किसी अज्ञात को किसी भी ज्ञात से नहीं जाना जा सकता है।  

भारत के संदर्भ में एक बात और कहना महत्वपूर्ण है। जिन राजनीतिक दलों की अपनी कोई विशिष्ट विचार धारा नहीं होती है, वे सिर्फ सत्ता की राजनीति करते हैं और किसी खास क्षेत्र तक ही सीमित रहते हैं। और एक खास समय के बाद विलुप्त भी हो जाते हैं। ऐसे विचार धारा विहीन राजनीति दल कभी भी राष्ट्रीय स्तर का दल भी नहीं बन सकता है। इनके नेताओं को सत्ता, व्यवस्था और सांस्कृतिक क्रियाविधि की कोई समझ भी नहीं होती है। ऐसे राजनेता बरसों की राजनीति कर सकते हैं, सदियों की राजनीति की समझ ही नहीं होती है। ऐसे ही राजनेता "सत्ता बदलाव" को ही "व्यवस्था में बदलाव" समझते हैं, इसीलिए दशकों की समय के बाद भी समाज की सामाजिक सांस्कृतिक गतिहीनता समाप्त नहीं होती। ऐसे ही राजनेता तथाकथित विकास और संवृद्धि के तथाकथित मकड़जाल में उलझे हुए रहते हैं।

ऐतिहासिक परम्परा के महान सामाजिक सांस्कृतिक नेता अपने समय काल और संदर्भ में सही हो सकते हैं, लेकिन आज उनके विचार एवं दर्शन पूर्णतया सही, समुचित और सम्यक नहीं हो सकते हैं। यदि वे सामाजिक और सांस्कृतिक नेतृत्व पूर्णतया सही, समुचित और सम्यक ही होते, तो आज इस विमर्श बैठक की जरूरत ही नहीं होती, अर्थात उन्होंने इसका पूर्णतया सही, समुचित और सम्यक समाधान नहीं ख़ोज पाया था। इन इतिहास नेतृत्वकर्ताओं के द्वारा दिए गए विचार एक सीख (Lesson) हो सकती है, लेकिन उसका समाधान कदापि नहीं हो सकता है। इसीलिए हमें शून्य से ही शुरू करना होगा और किसी दूसरे के संरचनात्मक ढांचे (Structural Framework) में नहीं उलझना होगा।

बिनोद सर की बातों में मैं अपने विचारों में आगे बढ़ गया और यह सब याद आने लगा। शायद इसीलिए संयुक्त राज्य अमेरिका की प्रथम महिला ई० रुजवेल्ट ने कहा है कि छोटे चिंतक व्यक्तियों (Individual) का नाम एवं उनके ब्यौरा ज्यादा देते हैं, मध्यम दर्जे के चिंतक घटनाओं (Incidents) का विवरण ज्यादा करते हैं, और बड़े चिंतक आदर्शों (Ideas) एवं विचारों की बात ज्यादा करते हैं। इसलिए हमें व्यक्तियों और घटनाओं के विवरण ब्यौरा पर ज्यादा "विधवा विलाप" नहीं करना चाहिए। यही 3 I  (Individual, Incidents, Ideas) महत्वपूर्ण है।

इसी निष्कर्ष के साथ विमर्श बैठक समाप्त हो गयी। आप भी तो एक चिंतनशील प्राणी है और आपको भी अपने समाज एवं संस्कृति से प्रेम है, इसलिए आप भी इस विमर्श को बढ़ाइए। यह समाज और संस्कृति फिर से गौरवशाली और अग्रणी बनेगा।

*आचार्य निरंजन सिन्हा*


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